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मार्च, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

यदि मैना बिल्कुल सामने दिखे तो क्या चोर-डाकुओ से धन की हानि होती है?

14. हमारे विश्वास , आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक , कितने अन्ध-विश्वास ? - पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय यदि मैना बिल्कुल सामने दिखे तो क्या चोर-डाकुओ से धन की हानि होती है ? पक्षियो और जानवरो से सम्बन्धित ऐसी कई तरह की बाते प्राचीन ग्रंथो मे मिलती है। जैसे दशहरे के दिन नीलकंठ को देखना शुभ माना जाता है। देश के मध्य भाग मे मैना को देखने पर तरह-तरह की बाते की जाती है। उनमे से एक है मैना के दिखने पर चोर-डाकुओ से धन हानि की बात। इन बातो का कोई वैज्ञानिक आधार नजर नही आता है। आजकल जो तंत्र-मंत्र की नयी पुस्तके आ रही है उसमे इस तरह की बातो को प्रकाशित किया जा रहा है। जब मैने प्राचीन ग्रंथो को खंगाला तो मुझे मैना और अन्य पक्षियो से जुडी ऐसी सैकडो बाते पता चली। इन्हे पढकर यह बात भी मन मे आती है कि कही इसके गहरे मायने तो नही है। हो सकता है हमारे बुजुर्गो के पास इसके कारण रहे हो और पीढी दर पीढी बाते तो आती रही पर राज नही आ पाये। मै यह बात इसीलिये भी कह पा रहा हूँ क्योकि बिल्ली के रास्ता काटने पर उस

शव्दो आधारित विज्ञापन : गूगल कंटेंट और लिंक एड सेंस (Google Ad 1)

कंटेंट एड मूलत: शव्‍द आधारित विज्ञापन है जो समय समय पर चित्र एवं शव्‍दों का विकल्‍प चुननेपर चित्र रूप में भी प्रस्‍तुत होते हैं । कंटेंट एड को क्लिक करने पर क्लिकर सीधे विज्ञापनदाता के वेबसाइट या पेज तक पहुंचता है । यदि आप इसमें सिर्फ शव्‍दों का विकल्‍प चुनना चाहते हैं तो ऐसा विकल्‍प भी वहां मौजूद है । मेरा मानना है कि यहां सिर्फ शव्‍द आधारित विकल्‍प ही चुने क्‍योंकि चित्र आधारित विकल्‍प के लिए गूगल बाबा नें विशेष रूप से रिफरल एवं वीडिओ एड बनाया है जिसके संबंध में हम बाद में चर्चा करेंगें । इसके अतिरिक्‍त कंटेंट एड में पांच विज्ञापन तक के विकल्‍प मौजूद हैं यानी क्लिक होने की संभावनाओं की संख्‍या में वृद्धि । यहां अर्न मनी पर क्लिक के द्वारा बूंद बूद से आपका घडा भरना आरंभ होगा । लिंक एड गूगल सर्च के विभिन्‍न खोज परिणामों तक पहुचाता है जहां एक विंडो में एक विषय के कई वेब साईट या पेज की जानकारी दी गई होती है जिसे क्लिक करने पर विज्ञापन प्रदाता के वांछित विषय तक पहुचा जाता है । इन दोनों एड के लिए जो महत्‍वपूर्ण सूत्र है वह है ‘चैनल’ । अपने द्वारा इच्छित विषय के विज्ञापन प्राप्‍त क

का तै मोला मोहनी डार दिये गोंदा फूल: छत्ती सगढ में फाग (Fagun on Chhattisgarh)

छत्‍तीसगढ में फाग 2 संजीव तिवारी छत्तीसगढ में धडतके नगाडे और मांदर के थापों की बीच उल्लास का नाम है फाग । भारत के अलग-अलग हिस्सों में फाग अपने अनुपम उत्साह के साथ गाया जाता है जिसमें छत्तीसगढ का फाग निराला है । फाग का गायन बसंत पंचमी से लेकर होली तक गांव के गुडी चौपाल या किसी सार्वजनिक स्थान पर होता है जिसमें पुरूष ही फाग गायन करते हैं । कृषि प्रधान इस प्रदेश में फागुन में खेती का संपूर्ण कार्य समाप्‍त हो जाता है, परसा (टेसू) के गहरे लाल फूलों के खिलने के साथ ही किसान मस्त हो जाते हैं, बाग-बगीचे में आमों में बौर के आने से कोयली कूकने लगती है, पारंपरिक गीतों में फाग की स्वर लहरियां गूंजने लगती हैं । गीतों में प्रथम पूज्य गजानन का आवाहन कर फाग मुखरित होता है – गनपति को मनाउं, गनपति को मनाउं प्रथम चरण गणपति को । समूचे भारत में कृष्ण को होली का आदर्श माना जाता है, फाग का सृजन राधा कृष्ण प्रेम के गीतों से हुआ है । छत्तीसगढ में भी फाग गान की विषय वस्तु राधा कृष्ण का प्रेम प्रसंग ही होता है । गणपति वंदना के बाद कृष्ण को फाग गाने एवं होरी खेलने हेतु आमंत्रित किया जाता है – दे दे ब

कहानी : नदी, मछली और वह (Kahani Vinod Sao)

विनोद साव हम सबने कार से उतरकर जमीन पर पांव धरा तो पैरों को बड़ा सुकुन मिला और इसलिए मन को भी। लम्बी यात्रा के बाद जब कभी भी हम धरती पर पांव धरते हैं एकदम हल्के हो जाते हैं। सारी थकान मिट जाती है। जैसे खेल थककर आए बच्चे को मां की गोद मिल गई हो। मातृत्व का यह एहसास शायद उन्हें और अधिक होता है जिनकी मां असमय छिन गई होती हैं। मुझे हो रहा था। ` आइये.. जूते उतार लीजिए और पांव धो लीजिए पहले। ` उस नारियल बेचने वाले युवक ने कहा था जैसे घर आए पहुने को कोई कहता हो। ` संगम किस तरफ है ?` मैंने उतावलेपन से पूछा था। ` इस तरफ। ` उसने अपनी बांयीं ओर ईशारा किया था। ` दूर है ?` नहीं.. बस दो मिनट का रास्ता है ?` हम मंदिरों को छोड़कर नदी की ओर आ गए थे। मंदिर दर्शन की आस से कहीं ज्यादा नदी की प्यास थी। यह प्यास नदी के जल की नहीं थी बल्कि नदी के दर्शन की थी। ऐसा अक्सर लगता है कि इन मंदिरों का अस्तित्व तो नदियों के कारण है। अगर ये नदियां नहीं होतीं तो मंदिर भी नहीं होते। न कोई मेला यहां भरता न संस्कृति की कोई विरासत होती।

हसदो नदी के तीर में, कालेश्वरनाथ भगवान (Kalesharnath Shiv)

२६ मार्च को पीथमपुर में शिव बारात के अवसर पर , प्रो. अश्विनी केशरवानी छत्तीसगढ़ प्रांत में भी ऐसे अनेक ज्योतिर्लिंग सदृश्‍य काल कालेश्‍वर महादेव के मंदिर हैं जिनके दर्शन , पूजन और अभिशेक आदि करने से सब पापों का नाश हो जाता है। जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर जिला मुख्यालय से ११ कि.मी. और दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे के चांपा जंक्शन से मात्र ८ कि.मी. की दूरी पर हसदेव नदी के दक्षिणी तट पर स्थित पीथमपुर का काले वरनाथ भी एक है। जांजगीर के कवि स्व. श्री तुलाराम गोपाल ने '' शिवरीनारायण और सात देवालय '' में पीथमपुर को पौराणिक नगर माना है। प्रचलित किंवदंति को आधार मानकर उन्होंने लिखा है कि पौराणिक काल में धर्म वंश के राजा अंगराज के दुराचारी पुत्र राजा बेन प्रजा के उग्र संघर्श में भागते हुए यहां आये और अंत में मारे गए। चंूकि राजा अंगराज बहुत ही सहिश्णु , दयालु और धार्मिक प्रवृत्ति के थे अत: उनके पवित्र वंश की रक्षा करने के लिए उनके दुराचारी पुत्र राजा बेन के मृत भारीर की ऋशि-मुनियों ने इसी स्थान पर मंथन किया। पहले उसकी जांघ से कुरूप बौने पुरूश का जन्म हुआ। बाद में भुजाओं क

गिरधर जी.बरनवा के हाइकू

कथ्‍य और शिल्‍प की दृष्टि से हाइकू गागर में सागर भरने की काव्‍य विधा है । हाइकू पांच, सात, पांच अर्थात सत्रह सत्रह अनुशासन में निबद्ध विलक्षण विधा है । जापान में बौद्धमत में आये विसंगतियों को उजागर कर दुरूस्‍त करने हेतु सूत्रों में, कम शव्‍दों में अपनी बात कहने के लिए इस विधा का उद्भव हुआ । हाइकू की विषयवस्‍तु है प्रकृति । सेनरेय की तकनीक (पांच, सात, पांच अर्थात सत्रह अक्षरानुशासन) ही हाइकू के विकास की पृष्‍टभूमि मानी जा सकती है । आज दुनिया में तमाम मुल्‍कों में विभिन्‍न भाषाओं में हाइकू लेखन जारी है । हिन्‍दी में अज्ञेय, डॉ.सुधा गुप्‍ता, डॉ.महावीर, शंभूशरण द्विवेदी, डॉ.भगवत शरण अग्रवाल, रामनिवास पंथी, मदन मोहन उपेन्‍द्र, उर्मिला कौल, सूर्य देव पराग, राजेन्‍द्र परदेशी, कु.नीलिमा शर्मा, सूर्यदेव पाठक आदि सशक्‍त हस्‍ताक्षर हैं । फिलहाल मनुष्‍य भी तो प्रकृति का अहम हिस्‍सा है उसके हाव-भाव, क्रिया कलाप अलग नहीं हैं और इसीलिये सेनरेय और हाइकू की स्‍पष्‍ट लकीर खींची नहीं जा सकती हो सकता है भावी लेखनी में दोनो अलग अलग रूप में साहित्‍य में अपना स्‍थान बना लें । इस पर मैं खुलकर बहस करना चाहता ह

क्या उल्लू का कपाल आपके दुश्मन का सर्वनाश कर सकता है?

13. हमारे विश्वास , आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक , कितने अन्ध-विश्वास ? - पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय क्या उल्लू का कपाल आपके दुश्मन का सर्वनाश कर सकता है? तंत्र से सम्बन्धित ज्यादातर साहित्यो मे यह दावा किया जाता है कि विधि-विधान से उल्लू के कपाल के प्रयोग से दुश्मन का सर्वनाश किया जा सकता है। इस दावे के समर्थन मे देश भर मे लेख छपते रहते है। इस दावे की सत्यता जानने के लिये मै सैकडो तांत्रिको से मिला और उनसे इस दावे को प्रमाण सहित सिद्ध करने का अनुरोध किया पर जवाब मे मुझे बडी-बडी बाते ही सुनने को मिली। ज्यादातर तांत्रिक उल्लू के कपाल को बेचने की फिराक मे नजर आये। समय-समय पर अपने हिन्दी लेखो के माध्यम से मै खुले रुप से इन्हे चुनौती देता रहा पर आज तक नतीजा सिफर ही रहा। अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति, रायपुर के संस्थापको मे से एक माननीय चन्द्रशेखर व्यास सदा ही से अपने व्याख्यानो मे इस दावे को चुनौती देते रहे है। वे कहते है कि यदि उल्लू के कपाल मे इतनी ही शक्ति है तो तांत्रिक देश सेवा क

खेलूंगी कभी न होली, उससे जो नहीं हमजोली

खेलूंगी कभी न होली , उससे जो नहीं हमजोली प्रो. अश्निनी केशरवानी फागुन का त्योहार होली हंसी-ठिठोली और उल्लास का त्योहार है। रंग गुलाल इस त्योहार में केवल तन को ही नही रंगते बल्कि मन को भी रंगते हैं। प्रकृति की हरीतिमा , बासंती बहार , सुगंध फेलाती आमों के बौर और मन भावन टेसू के फूल होली के उत्साह को दोगुना कर देती है। प्रकृति के इस रूप को समेटने की जैसे कवियों में होड़ लग जाती है। देखिए कवि सुमित्रानंदन पंत की एक बानगी: चंचल पग दीपि शिखा के घर गृह भग वन में आया वसंत। सुलगा फागुन का सूनापन सौंदर्य शिखाओं में अनंत। सैरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर उर में मधुर दाह आया वसंत , भर पृथ्वी पर स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह। प्रकृति की इस मदमाती रूप को निराला जी कुछ इस प्रकार समेटने का प्रयास करते हैं :- सखि वसंत आया भरा हर्श वन के मन नवोत्कर्श छाया।