पिछले कुछ दिनों से मेरे घर के बागवानी के लिए सुरक्षित रखे गए स्थान में एक सूखी लकड़ी पर एक चिडि़या लगातार चोंच मार रही थी, मेरा पुत्र उसको उत्सुकता से देखता था और उत्सुकता के कारण मुझसे उसके संबंध में जानकारी मांगता था। वह सुन्दर चिडि़या लकड़ी में छेद करने का प्रयास कर रही थी जिसके कारण यह माना जा सकता था कि वह कठफोड़वा ही होगी किन्तु छत्तीसगढ़ के गांवों में देखे मेरे आंखों और स्मृतियों में समाये कठफोड़वा से उसकी छवि कुछ अलग थी जिसके कारण मैं फैसला नहीं कर पा रहा था कि यह वही चिडि़या है। .. किन्तु यह दो-तीन दिनों में ही उसने उस लकड़ी में अपने घुसने लायक जगह बना ली तो यह विश्वास पक्का हो गया कि यह कठफोड़वा ही है। ... हालांकि उस लकड़ी के सहारे मेरी श्रीमती नें कपड़ा सुखाने का तार बांध रखा है जो अब कमजोर हो चला है फिर भी चिडि़या के लगातार मेहनत और सूखी लकड़ी को चोंच में अपने आकार से बड़ा छेद करने की लगन को देखकर मन प्रसन्न हुआ। क्रमिक रूप से उस चिडि़या के प्रयासों को हमारी श्रीमती जी नें कैमरे में कैद किया जिसे हम अपने ब्लॉग एल्बम में सुरक्षित रख रहे हैं ताकि सनत रहे वक्त पर काम आवे .......
हमारी श्रीमती ने इन चित्रों के साथ हमारे लिए छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजन ठेठरी-खुरमी भी पेश किया, जिसे पाठकों और तिजहारिनों को ललचाने के लिए हम यहां लगा रहे हैं.
आप सभी का स्वागत है, ठेठरी-खुरमी मिलने की गारंटी ... टिल स्टाक.




