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सुरता चंदैनी गोंदा - 3 Surata Chaindaini Gonda

Hanumant Naidu
चंदैनी गोंदा की स्मारिका के मुख-पृष्ठ की हालत जर्जर हो गई है। स्मृतियां भी धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही हैं। ऐसे में नई पीढ़ी तक चंदैनी गोंदा की जानकारी को स्थानांतरित करना आवश्यक हो गया है। आज की श्रृंखला में डॉ हनुमंत नायडू (हिन्दी के प्रोफेसर और प्रथम छत्तीसगढ़ी फ़िल्म "कहि देबे संदेश" के गीतकार) के आलेख के कुछ अंश प्रस्तुत हैं, जिन्हें पढ़कर नई पीढ़ी को कुछ और नई जानकारियां मिलेंगी। श्रृंखला-1 में कुछ पात्रों के नाम का उल्लेख किया गया था। उन पात्रों की भूमिका, इस आलेख को पढ़ने के बाद कुछ और अधिक स्पष्ट होगी। साथ ही यह भी ज्ञात होगा कि चंदैनी गोंदा के पात्र, महज पात्र नहीं बल्कि प्रतीक हैं। तो लीजिए! डॉ. हनुमंत नायडू के आलेख - "छत्तीसगढ़ी लोक मंच-एक नया सांस्कृतिक संदर्भ", "छत्तीसगढ़ी आंसुओं का विद्रोह-चंदैनी गोंदा", इस शीर्षक से स्मारिका में प्रकाशित आलेख के कुछ अंश -

"चंदैनी गोंदा"
चंदैनी गोंदा यथार्थ में एक विशेष प्रकार के नन्हे नन्हे गेंदे के फूलों का नाम है जो छत्तीसगढ़ में बहुतायत पाए जाते हैं। चंदैनी गोंदा भी धरती की पूजा का फूल है। श्री देशमुख के ही शब्दों में चंदैनी गोंदा पूजा का फूल है। चंदैनी गोंदा छोटे-छोटे कलाकारों का संगम है। चंदैनी गोंदा, लोकगीतों पर एक नया प्रयोग है। दृश्यों, प्रतीकों और संवादों द्वारा गीतों को गद्द देकर छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के माध्यम से एक संदेश पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रस्तुतीकरण --- यही चंदैनी गोंदा है। जिन्होंने इसे नाटक, नौटंकी या नाचासमझकर देखा होगा वह अवश्य ही निराश हुए होंगे लेकिन जिन्होंने इसे लोकगीतों पर एक नए प्रयोग के रूप में देखा होगा वह अवश्य ही हर्षित हुए होंगे।

गेहूं के क्षेत्रों में तो हरित क्रांति हो चुकी है परंतु धान के क्षेत्रों में नहीं हो पाई। यही तथ्य चंदैनी गोंदा के प्रस्तुतीकरण की प्रेरणा का प्रमुख स्रोत रहा है। चंदैनी गोंदा का सर्वप्रथम प्रदर्शन बघेरा गांव के एक खलिहान में सन 1971 को हुआ था इसके बाद तो पैरी, भिलाई, राजनाँदगाँव, धमधा, नंदिनी, धमतरी, झोला, टेमरी, जंजगिरी आदि अनेक स्थानों में पचास-पचास हजार दर्शकों के समक्ष यह सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा चुका है। चंदैनी गोंदा में छत्तीसगढ़ी जीवन के जन्म से मरण तक के सभी सांस्कृतिक पक्षों को सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इन सब तथ्यों को गूँथने के लिए कथा का एक झीना-सा तन्तु लिया गया है।

प्रमुख पात्र दुखित और मरही किसान दंपत्ति, भारत के किसानों के प्रतीक हैं। गंगा, गांव की बेटी है जो गांव की पवित्रता को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करती है। शिव, गांव का बेटा है जो गांव की आस्था का प्रतीक है। चांद-बी, शोषित का प्रतीक ही नहीं भावनात्मक एकता की अभिव्यंजना भी है। बटोरन लाल, एक शोषक है जो छत्तीसगढ़ में ही नहीं, देश के किसी भी कोने में पैदा हो सकता है। "किसान ही भारत की आत्मा है" - इस तथ्य की व्यंजना, दुखित के इस संवाद से बड़े ही सशक्त ढंग से होती है - "मैं रोहूं तो मरही रो देही, मरही रो देही तो गांव रो देही गांव रो देही तो भारत रो देही। भारत माता ला मैं रोते नहीं देख सकंव। (मैं रो दूंगा तो मरही (पत्नी) रो देगी। मरही रो देगी तो गांव रो देगा और गांव रो देगा तो भारत रो देगा और भारत-माता को रोते मैं नहीं देख सकता)

शिव, युवक है अतः वह सब पहले भोपाल और दिल्ली में प्रजातांत्रिक ढंग से शोषितों की समस्या को हल करना चाहता है परंतु असफल होने पर तेलंगाना (साम्यवाद का प्रतीक) जाने की धमकी देता है परंतु छत्तीसगढ़ी धरती का प्रेम, त्याग और बलिदान उसके कदम सेना की ओर मोड़ देते हैं। वह देश की रक्षा करते हुए युद्ध में मारा जाता है। दुखित भी इस आघात को सहन नहीं पाता। शिव के रूप में गांव की आस्था मरती नहीं बल्कि देश के लिए बलिदान होकर अमर हो जाती है, परंतु हरित क्रांति और शोषकों पर किए गए तीखे व्यंग हृदय को चीरते चले जाते हैं। चंदैनी गोंदा की एक विशेषता यह है कि इसका प्रारंभ छत्तीसगढ़ी के साहित्यकारों के सम्मान से प्रारंभ होता है। इसके अनेक दृश्यों में "दौरी" ( बैलों से धान के सूखे पौधों को खुंदवा कर धान अलग करना) हरित-क्रांति, गोरा पूजा (पार्वती पूजन) गम्मत तथा फौज आदि प्रमुख हैं। अभिनेताओं में दुखित के रूप में श्री रामचंद्र देशमुख और शिव के रूप में छत्तीसगढ़ी फिल्मों और रंगमंच के कलाकार शिव कुमार एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। शिवकुमार के "हरित क्रांति" लमसेना (घर जवाई) जैसे बहु-प्रशंसित, एक पात्रीय लघु नाटकों को चंदैनी गोंदा में गूँथ दिया गया है। "रविशंकर शुक्ल" तथा "लक्ष्मण मस्तूरिया" आदि के गीत और खुमान साव का संगीत, चंदैनी गोंदा की एक प्रमुख विशेषता है -- उसमें मानो प्राण फूंक देते है।
("छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा"स्मारिका से साभार)
प्रस्तुतकर्ता - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (9907174334)

सुरता चंदैनी गोंदा - 2 What is Chandaini Gonda

चंदैनी गोंदा क्या है ? इस प्रश्न को अनेक विद्वानों से अनेक आलेखों में उत्तरित किया है। सबके अपने अपने दृष्टिकोण हैं। चंदैनी गोंदा क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं दाऊ जी के शब्दों में पढ़िए। अकाशवाणी द्वारा लिए गए साक्षात्कार को चंदैनी गोंदा स्मारिका में साभार प्रकाशित किया गया था। जिन्होंने यह स्मारिका नहीं पढ़ी है, उनके लिए यह पोस्ट महत्वपूर्ण और उपयोगी हो सकती है -

चंदैनी गोंदा क्या है ? : श्रद्धेय रामचंद्र देशमुख के शब्दों में
प्रश्न 1 - चंदैनी गोंदा क्या है ?
उत्तर : चंदैनी गोंदा पूजा का फूल है।चंदैनी गोंदा छोटे-छोटे कलाकारों का संगम है। चंदैनी गोंदा लोकगीतों पर एक नया प्रयोग है। दृश्य प्रतीकों और संवादों द्वारा गद्दी देकर छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के माध्यम से एक संदेश पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रस्तुतीकरण - यही चंदैनी गोंदा है। जिन्होंने इसे नाटक, नौटंकी या नाचा समझकर देखा होगा, वे अवश्य ही निराश हुए होंगे लेकिन जिन्होंने लोकगीतों पर एक नए प्रयोग के रूप में देखा होगा वे अवश्य ही हर्षित हुए होंगे।
प्रश्न 2 - आपको इसके लिए प्रेरणा कहां से मिली?
उत्तर : आपको स्मरण होगा कि भारतीय स्वतंत्रता की 24 वी वर्षगांठ पर 15 अगस्त 1971 को राष्ट्रपति महोदय ने देश के नाम अपने संदेश में कहा था कि गेहूं के इलाके में तो हरित क्रांति हो चुकी लेकिन धान के इलाकों में नहीं हो पाई। यह एक बहुत बड़ा सत्य है और भारत का धान उगाने वाला हर औसत किसान इसकी पुष्टि करेगा। गेहूं और धान के इलाकों के भूगोल पर मैं नहीं जाता, उपलब्ध सुविधाओं पर मुझे कुछ नहीं कहना है लेकिन इतना तो अवश्य है कि स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के पश्चात धान के इलाकों का किसान जहां का तहां है। अभी भी उसके शोषण का चक्र जारी है। उसके अनेक अवतार हैं। चंदैनी गोंदा में यदा-कदा प्रसंगवश हरित क्रांति के उद्घोषक के स्वार्थ, कुचक्र और दूरदर्शिता पर व्यंग किया गया है। इसके पीछे एक औसत किसान की व्यथा ही कर्मशील है तो "राष्ट्रपति के भाषण का अंश ही चंदैनी गोंदा की प्रेरणा भूमि है"।
प्रश्न 3 - आपने अपने कलाकार विभिन्न भाषा-भाषी चुने हैं। साथ ही चंदैनी गोंदा प्रारंभ होने पहले आपने विभिन्न प्रांतों के लोकगीत प्रस्तुत किए हैं। ऐसा क्यों ?
उत्तर : भावनात्मक एकता भी हमारे उद्देश्यों में से एक है इसलिए चंदैनी गोंदा विभिन्न भाषा-भाषियों का संगम है। छत्तीसगढ़ी लोक गीतों को हम भारतीय लोक-जीवन के एक खंड विशेष के लोक गीत के रूप में नहीं देखते, हम उसे भारतीय लोकजीवन में व्याप्त लोकगीतों को विशाल शृंखला में एक प्रतिनिधि लोकगीत के रूप में मान्यता देते हैं। लोकगीत भारत के जिस अंचल के हैं, उनमें जो लोक तत्व हैं, उन्हें किसी भी भारतीय लोकगीत में देखा जा सकता है।




प्रश्न 4 - चंदैनी गोंदा का प्रदर्शन आपने गांव में ही करने का निश्चय क्यों किया ?
उत्तर : भारत के किसी भी अंचल का कोई सा भी गांव अपनी पूरी पहचान के साथ भारत का हर गांव हो सकता है। फिर यह एक महत्वपूर्ण बात है कि आधुनिक जीवन-बोध और आमतौर से शहरी जीवन-बोध जब हमें भारतीय गंध नहीं दे पा रहा है, हमें तलाश है एक निजी भारतीय जीवन स्पंदन की जो अपनी शैली एवं संगीत में हमें एक देसी छुअन दे सके। तब हमें ग्राम-धरा की जीवनधारा की ओर लौटना पड़े तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। भारतीय संस्कृति के अजस्र स्रोत ये गांव आज की संभावना है। जरूरत है रचनाशील जीवन दृष्टि की। चंदैनी गोंदा के लोकगीत लोकपाय और लोकजीवन की अभिव्यक्ति इसी के आसपास की चीजें हैं। इस कार्यक्रम को मैंने गांव के खलिहान स्थल पर ही मंचित करने का निर्णय क्यों लिया ? उत्तर स्पष्ट है कि "झील के सौंदर्य को बेलबूटे युक्त किसी तश्तरी के जल में कैसे देखा जा सकता" ?
प्रश्न 5 - आपने लोकगीतों पर ही इतना ज्यादा परिश्रम किस उद्देश्य से किया ?
उत्तर : भारतीय लोकजीवन को लोकगीतों के माध्यम से अधिक सार्थकता के साथ संदेश पहुंचाया जा सकते है। लोक बोलियां लोक भाषा जिन अनुभूतियों एवं संवेदनाओं को जितनी अधिक सटीक व्यंजना दे सकती हैं, संभवतः उतनी कोई अन्य भाषा नहीं।
दूसरी बात यह है कि फिल्मों के माध्यम से आए हुए पश्चिमी-बोध या फिल्मों में ओढ़े गए पूर्वी-बोध की तुलना में चंदैनी गोंदा दर्शक को विशुद्ध ग्राम-बोध प्रदान कराता है। ग्राम-बोध इसलिए भी क्योंकि इसमें आज के एक भारतीय गांव के खेतिहर जीवन की कथा-व्यथा है।
प्रश्न 6 - चंदैनी गोंदा, जबकि लोकगीतों का कार्यक्रम है। संवाद दृश्यों और प्रतीकों को किसलिए स्थान दिया गया है ?
उत्तर : यही तो हमारा नया प्रयोग है। संवाद, दृश्य और प्रतीकों के माध्यम से लोकगीतों को ज्यादा प्रभावकारी बनाया गया है। इसके द्वारा निहितार्थ को भी संप्रेषित करने का प्रयास किया गया है।
प्रश्न 7 - चंदैनी गोंदा का और कोई उद्देश्य हो तो स्पष्ट करिए।
उत्तर : बहुत से उद्देश्यों में से एक यह भी है कि श्रेष्ठ कवियों की रचनाएं उनकी कॉपियों और कवि सम्मेलन तक सीमित रह जाती हैं, उन्हें सुंदर स्वर देकर आम जनता को सौंपने का प्रयास किया गया है। अकाल का दृश्य और तत्त्संबंधित लोकगीत किसी कारणवश हम प्रस्तुत नहीं कर सके। उनके माध्यम से हमने सिंचाई व्यवस्था को ज्यादा सुदृढ़ और व्यापक बनाने की मांग की है। सब लोगों के स्नेह और आशीर्वाद का संबल लेकर, अनेक विघ्न बाधाओं को पार कर मैं "चंदैनी गोंदा" का विनम्र उपहार माटी को समर्पित करने का साहस जुटा सका हूं और साथ ही मैंने माटी के ऋण से उऋण होने का प्रयास किया है।
(आकाशवाणी से साभार)

प्रस्तुति - अरूण कुमार निगम

सुरता चंदैनी गोंदा - 1

दाऊ रामचंद्र देशमुख के चंदैनी-गोंदा की कथावस्तु

उद्घोषक -  मूल कार्यक्रम प्रारंभ करने के पहले हम यह बतला देना आवश्यक समझते हैं कि चंदैनी गोंदा कोई नाटक गम्मत या तमाशा नहीं है। चंदैनी गोंदा एक दर्शन है, एक विचार है जो कि एक औसत भारतीय किसान के इर्द-गिर्द घूमता है। यह हमारी मान्यता है कि छत्तीसगढ़ का कोई भी औसत किसान अपने सारे परिवेश में भारत के किसी भी शोषित, पीड़ित और उपेक्षित क्षेत्र का किसान हो सकता है। इस दृष्टिकोण से चंदैनी गोंदा प्रतीकात्मक ढंग से एक भारतीय किसान के जीवन के चित्रण का प्रयास है।

कृषक जीवन को चंदैनी गोंदा में प्रस्तुत करने के लिए हमने प्रधानतः छत्तीसगढ़ी लोक गीतों और कवियों की रचनाओं का आश्रय लिया है जो धरती और धरतीपुत्र से संबंधित हैं। इन गीतों को किसी कथानक के सूत्र में न गूँथते हुए हमने इसे ऐसी क्रमबद्धता प्रदान कर दी है कि यही क्रमबद्धता आपको कथानक का आनंद देने लगती है। साथ ही छत्तीसगढ़ की अंतर-वेदना को भी साकार करती है और अंत में एक व्यथा, कथा का रूप ले लेती है । गीतों को प्रतिभाशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए हमने दृश्यों, प्रतीकों, संवादों आदि का आश्रय अवश्य लिया है किंतु हमारा पुनः अनुरोध है कि इसके कारण आप चंदैनी गोंदा को नाटक की दृष्टि से न देखें। हम अभिनय की उच्चता का कोई दावा नहीं करते। नाटकीयता से दूर रहने के कारण हम रूप-सज्जा, वस्त्र परिवर्तन, मंच व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान नहीं देते। इसका कारण है कि हमें स्वाभाविक और प्रतीकात्मक रूप से एक औसत किसान को चंदैनी गोंदा में प्रस्तुत करना है।

आपके मन में सहज ही एक जिज्ञासा उठती होगी कि इस कार्यक्रम का नाम चंदैनी गोंदा क्यों रखा गया है? दरअसल गेंदे दो प्रकार के होते हैं। पहला प्रकार बड़े गेंदे का होता है जो प्रधानतः श्रृंगार के काम आता है। गेंदे का दूसरा प्रकार छत्तीसगढ़ में चंदैनी गोंदा कहा जाता है जो आकार में छोटा होने के कारण ग्रामीण युवतियों के जुड़े की शोभा तो नहीं बन सकता किंतु देवी देवताओं के चरणों में चढ़ने का श्रेय उसे अवश्य प्राप्त है।

छत्तीसगढ़ में ऐसे अनेक अज्ञात कलाकार भी पड़े हैं जो चंदैनी गोंदा की तरह आकार में छोटे तो अवश्य हैं किंतु उनमें प्रतिभा है, लगन है, कला की ऊंचाई है। इनकी कला से वास्तव में सरस्वती की पूजा की जानी चाहिए किंतु ऐसा हो नहीं पाता। हमने भागीरथ प्रयास करके छत्तीसगढ़ की माटी से कुछ कलाकार रूपी चंदैनी गोंदा चुनकर एक सूत्र में पिरोया है। इस सूत्रबद्ध पुष्पमाला को हम चंदैनी गोंदा के नाम से संबोधित करते हैं और यही कारण है कि परिवार द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम को "चंदैनी गोंदा" की संज्ञा दी है। इस तरह चंदैनी गोंदा, गीतों की माला है और छोटे-छोटे कलाकारों की माल्य है।

 लोग रत्नों की खोज में छत्तीसगढ़ आते हैं और प्राप्त कर लेने पर भोपाल, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, आगरा के बाजारों में भुना लेते हैं। श्री रामचंद्र देशमुख ने कुछ रत्न पाए हैं। परखने के लिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

 फूल खिलते हैं, मुरझाते हैं और धूल में मिल जाते हैं किंतु 7 नवंबर 1971 को जिस चंदैनी गोंदा के पौधे को दुर्ग के निकटस्थ ग्राम बघेरा में रोपा गया है उसे न मुरझाने देने का संकल्प छत्तीसगढ़ की जनता ने कर लिया है। इस लंबी भूमिका के बाद अपने परिवार की इष्ट देवी सरस्वती की वंदना, भारत माता को समर्पण और दर्शकों के अभिनंदन के साथ अपना कार्यक्रम प्रारंभ करते हैं
सुमन का प्रवेश:
 कमेंट्री:  मन की बात जानने वाला केवल मन है
           सबसे अच्छा फूल की जिसका नाम सुमन है
दुखित का प्रवेश:
 कमेंट्री:  हँसमुख प्रसून सिखलाते पल भर जो हँस पाओ
          अपने उर के सौरभ से जग का आंगन भर जाओ
गीत:  देखव फूलगे -
        चंदैनी गोंदा फूलगे
कमेंट्री:  गांव में फूल घलो गोठियाथे, जब सब किसान सो जाथे। आज भारत-वासियों की आत्मा स्वतंत्रता के पवित्र पर्व में प्रकाशित है परंतु 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में दिन में भी अंधियारी रात थी। 1857 में स्वतंत्रता आंदोलन की जो ज्योति हमारे पूर्वजों ने प्रज्वलित की वह 1942 में विकराल रूप धारण कर ब्रिटिश शासन को जलाने पर तुल गई थी। भारत का आकाश करो या मरो, अंग्रेजों भारत छोड़ो, इंकलाब जिंदाबाद, महात्मा गांधी की जय, तिरंगे झंडे की जय से गूंज उठा था। वंदे मातरम की एक आवाज पर गोलियों की बौछारों को रोकने के लिए हजारों सीने अड़ जाते थे।
गीत: वंदे मातरम
कमेंट्री:  फिर आया 15 अगस्त 1947, अंधियारा छटा। स्वतंत्रता का सूरज उदित हुआ। पूर्वजों का बलिदान सार्थक हुआ। तिरंगा भारत के स्वतंत्र आकाश में लहराने लगा। झूम गया सारा भारत, झूम गया सारा गाँव।
गीत: आगे सुराज के दिन रे संगी
कमेंट्री:  नवजात स्वतंत्रता के साथ जिन बच्चों ने जन्म लिया था वह एक अर्थ में बहुत भाग्यशाली थे। उनके माथे पर गुलामी का कलंक नहीं था। इन्हीं के हाथों में आगे चलकर भारत की बागडोर सौंपी जानी थी इसलिए माताओं ने उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।

गीत : सोहर गीत
         देवार गीत
कमेंट्री: नवजात शिशु की उम्र थोड़ी बढ़ी, साथ ही नई पीढ़ी की उम्र भी। उसी समय दंगों की आग से भारत माता का आँचल जल रहा था। रो पड़ी आजादी, रो पड़ा नई पीढ़ी का बचपन,  उसकी आँच सहन न कर सकने के कारण। माताओं को उनका रोना सहन नहीं हुआ। लोरियां फूट पड़ी कंठ से।
गीत:  लागे झन काकरो नजर
कमेंट्री: आजाद भारत में जन्मी नई पीढ़ी ने अभी होश भी नहीं संभाला था। उसके दूध के दाँत टूटे भी नहीं थे कि आई 30 जनवरी 1948 की काली संध्या। कहीं से तीन गोलियां आई और धँस गई बापू के कलेजे में। मानवता कराह उठी। भारत मां की आंखों से बहुत गंगा जमुना की धाराएं।
गीत:  ओ पापी ओ बइरी
कमेंट्री:  गांधी जी की मौत के साथ गांधी के सपनों के भारत की भी हत्या हो गई। दिन पर दिन बीते गए। आजाद पूरी जवान हो चली उसकी जवानी गांव में बसने वाले भारत की ओर नहीं, शहर में बसने वाले भारत की ओर आकर्षित हो गई। काश कि तुलसी के अनगढ़ बिरवे उसे गांव की ओर आकर्षित कर पाते। काश, बहन की राखी उसे गांव में रोक पाती ।
गीत: चल शहर जातेन
कमेंट्री: आजादी के बाद योजना, परियोजना बनती गई मगर गांधी के सपनों का रामराज्य नहीं आया। गाँवों में जाने वाला भारत, अन्न के लिए दूसरे के सामने झोली फैलाता रहा क्योंकि औसत भारतीय किसान दुखित रहा।
दुखित का प्रवेश -
कमेंट्री: लोग यह क्यों नहीं सोचते कि भारत हमारी माता है, यदि भारत का कोई भी भाग शोषण से कमजोर होता है तो भारत माँ का ही कोई अंग तो कमजोर होता है।
 हाँ, यही तो है हमारा छत्तीसगढ़, भारत माँ के पेट के पास। इसका शोषण भारत माँ के उदर का शोषण है।
हर आँख यूं तो बहुत रोती है
हर बूँद मगर अश्क नहीं होती है
पर देखकर जो रो दे जमाने का गम
उस आँख से आँसू जो गिरे मोती है।
दुखित इन मोती के दानों को यूं ना बह जाने दो, सहेजो इन्हें,  निराश होकर बैठो मत। उठो अपनी शक्ति को पहचानो। यदि तुम्हारे भोलेपन के बदले तुम्हें तिरस्कार पूर्ण संबोधन मिलता है तो तुम भयानक विषधर भी बन सकते हो मगर शायद तुम विषधर बनना पसंद नहीं करोगे
गीत:  मैं छत्तीसगढ़िया अँव
        मोर संग चलो रे
कमेंट्री: भारत भर में आपको छत्तीसगढ़ के इस दुखित की तरह अनेक दुखित मिलेंगे जिन्हें किसी भी प्रकार का शोषण उत्पीड़न और तिरस्कार कर्तव्य पथ से डिगा नहीं सकता। माटी के प्रति उसके आकर्षण को कम नहीं कर सकता। जेठ की दुपहरी में जब गाँव में मरघट जैसा सन्नाटा छाया रहता है, तब भी किसान की कर्तव्य पथ की यात्रा निर्बाध गति से चलती रहती है।
गीत:  रेंगव रेंगव रे रेंगइया
कमेंट्री:  जेठ के बाद आषाढ़ में जैसे ही काले काले मेघा मंडराते हैं, किसान का मन मयूर नाच उठता है। वर्षा की बूँदों से जब धरती गूंजती है तो किसान का तन मन धन सब खुशी से भींज उठता है। धरती से उठती माटी की सोंधी गंध उसे खेतों की ओर आकर्षित करती है।  होठों पर गीत थिरक उठते हैं और किसान कंधे पर हर रखे चल पड़ता है खेतों की ओर, जो उसका कर्म क्षेत्र है

गीत:  चल चल गा किसान बोए चली धान
कमेंट्री: किसी समर्थ पुरुष ने यह तो माना कि धान के क्षेत्र में हरित क्रांति आना बाकी है। तो वह कौन सी फाइल में दबी पड़ी है ? लो वह स्वयं आ रही है अपनी व्यथा कहते -
हरित क्रांति बाई का एक-पात्रीय अभिनय:
कमेंट्री: प्यासी धरती जब सावन में पूरी तरह तृप्त हो जाती है तब हरे भरे खेत किसान के कठोर श्रम की मांग करते हैं। किसान की जिंदगी एक अंतहीन श्रम की कथा है। श्रम की कठोरता में घिरा हुआ किसान का मन उल्लास और नवीन स्फूर्ति पाने के लिए लोकगीतों के लालित्य की ओर मुड़ पड़ता है। श्रम की घुमड़ती हुई घटनाओं के बीच जब ददरिया की तान छिड़ती है तब चारों ओर संगीत झरने लगता है और किसान का थका मन श्रृंगार-पूरित हो उठता है।
गीत: मोर खेती खार रुमझुम
कमेंट्री: सावन के बाद आता है भादो। भादो का महीना छत्तीसगढ़ में औरतों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। तीज त्यौहार के कारण किसान की पत्नियों के मन में मायके जाने की ललक, पति से नई साड़ी लाने का अनुरोध और पति पत्नी की नोक झोंक से सिक्त भादो।
गीत:  मोला मइके देखे के साध, धनी मोर बर लुगरा ले दे
कमेंट्री: कभी-कभी ऐसा होता है कि तीज में मायके जाने की किसानिन की साध मन में ही रह जाती है। उसे कोई लिवाने नहीं आता। मायके से केवल साड़ी भेज दी जाती है। वह साड़ी उसके अतीत के पृष्ठों को एक-एक करके सामने रखने लगती है।
गीत: दाई के दया दादा के मया
कमेंट्री: भादो में ही आता है गणेश पक्ष। गांव में गणेश की प्रतिमा जहां स्थापित हो जाती है वहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ जाती है इसी बाढ़ में प्रायः चंदैनी नाच भी देखने को मिलता है। सतनामियों के नाचने की अपनी विशिष्ट शैली, अमर्यादित मस्ती और अक्खड़पन इसकी विशेषता होती है।

चंदैनी नाच:
कमेंट्री: तीज त्यौहार के बीच भादो बीतने लगता है किंतु कृषक समुदाय अपने कर्तव्य को भूलता नहीं है। निंदाई का दूसरा दौर भादो में चलता है। खड़े हो जाइए आप खेतों की मेड़ पर ददरिया की तान आपके मन को आल्हादित कर देगी।
 गीत: झन आंजबे टूरी आँखी म काजर
कमेंट्री: कुंवार निंदाई के तीसरे दौर का महीना।  जुआर फूलने लगता है। ह्रदय के भाव गीत बनकर बिजली की तरह कौंध जाते हैं ।
गीत:  चिरई चले आबे
कमेंट्री:  दीपावली अपनी समस्त प्रभाव के साथ कार्तिक में आती है।बच्चों बूढ़ों सब में एक अपूर्व उल्लास भर जाता है। लक्ष्मी पूजा की रात छत्तीसगढ़ के गांव में शिव के रूप में गौरा की पूजा होती है। घर घर से कलश एकत्रित कर गांव में किसी सार्वजनिक स्थान पर रखे जाते हैं, फिर गौरा की सेवा की जाती है। गौरा गीत से वातावरण मुखरित हो जाता है।
गीत: जोहर जोहर मोर
कमेंट्री: दिन बीतते जाते हैं, बीतते जाते हैं। अगहन आता है किसान के श्रम की पूजा स्वीकार होती है। महीनों के कठिन परिश्रम की कमाई खेतों में धान के रूप में खड़ी है। पीले पीले धान के खेत जब हवा में लहराते हैं तब किसान को ऐसा लगता है कि मानो उसे शीघ्र आने का इशारा कर रहे हैं। वह आतुर हो उठता है, उसे खलिहान में लाने के लिए
गीत: भैया का किसान हो जा तैयार
       छन्नर छन्नर पैरी बाजय
कमेंट्री: जब भी मौका मिलता है गांव की अल्हड़ किशोर बालाएं बड़े बूढ़ों से मजाक और छेड़खानी करने से नहीं चूकती।
गीत: हर चांदी हर चांदी
कमेंट्री: फसल कट चुकी है। दुखित और मरही भारा लिए खेतों की ओर से आ रहे हैं। दुखित जलोदर का मरीज है और मरही दमा की मरीज है किंतु भरपूर फसल को देखकर दोनों अपनी पीड़ा भूल चुके हैं।
गीत:  तोला देखे रहेंव गा
कमेंट्री: दुखित की फसल खलिहान में पहुंच चुकी है।धान की मिंजाई होने वाली है। दुखित अपनी संतान-हीनता के दुख को गांव के बच्चों को देखकर भूल जाता है। गांव के बच्चे भी छुट्टी का घंटा बजते ही उसके खलिहान की ओर दौड़ पड़ते हैं।
गीत: चंदा बनके जीबो हम
कमेंट्री: यह कैसा अनर्थ है, किसने इन मासूम बच्चों के मन में सांप्रदायिक घृणा का विष बो दिया है। इस भावना को लेकर यदि बच्चे जवान होंगे तो देश का भविष्य क्या होगा?
गीत: धरती के अंगना मा
कमेंट्री: दौरी में जुते सात लड़के सात दिनों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो दुखित के जीवन के यथार्थ से संबंधित है। सात लड़कियां इंद्रधनुष के सात रंगों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जो मरही के जीवन का स्वप्न है। मेड़वार कानून और गर्दन में फंसी रस्सी नियति का प्रतीक है। किसान का यथार्थ और किसानिन का स्वप्न वर्ष भर इस कानून के डंडे के चारों ओर घूमता रहता है।
गीत: आज दौरी  मा बइला मन घूमत हें
       जुच्छ गरजे मां बने नहीं
कमेंट्री: छत्तीसगढ़ में यह मान्यता है कि जब तक औरत के शरीर में गोदने का निशान नहीं होता तब तक उसे मुक्ति नहीं मिलती। भागवती एक संतान-हीन विधवा औरत है, जिसे दुखित ने चाँद-बी को सौंप दिया है। वह चाँद-बी को गोदना गुदवाना चाहती है।
गीत:  तोला का गोदना ला गोदँव
कमेंट्री: इधर शिव की पत्नी विरह वेदना से पीड़ित है कर्तव्य बोध तो उसे है किंतु पति से दूर रहने का दुख भी तो उसे है। बगैर शिव के उसे गांव, घर, खलिहान सब सूने लगते हैं।
गीत:  मोर कोरिया सुन्ना रे
कमेंट्री: उधर शिव मोर्चे पर घायल हो जाने के कारण शिविर में भेज दिया जाता है।वहां उसे पत्नी का पत्र प्राप्त होता है और अक्षर, पत्नी की छवि में परिणित होते जाते हैं।
गीत: वा रे मोर पड़की मैना
कमेंट्री:  फागुन का महीना, नगाड़े की आवाज और उल्लास का महीना। खरीफ की फसल तो मिली पर रबी की नहीं मिल पाई
।गांव के अधिकांश लोग रोजी रोटी की चिंता से, दूर चले गए मगर दुखित ने गांव नहीं छोड़ने का निश्चय किया।
गीत:  नरवा के तीर मोर गांव
कमेंट्री:  दूसरे साल और भी भयानक अकाल पड़ गया। धरती की छाती फट गई।  प्यासी धरती की पीड़ा उसके हृदय की पीड़ा बन गई। आज पौष-पूर्णिमा है। दान दक्षिणा का पुण्य-पर्व।

गीत:
कमेंट्री: दुखित की बची शक्ति नष्ट हो जाती है। दुखित जेब से डिब्बा निकालता है। मिट्टी खाता है।  मिट्टी का चंदन लगाता है। ईमान की तिजोरी भर चुकी थी। काँटों से डिब्बा भर चुका था। अब कोई जगह शेष नहीं थी। काँटों से मुक्ति का अवसर था। उसने मिट्टी का महाप्रसाद खाया। आँसुओं का गंगाजल पिया। मस्तक पर मिट्टी का चंदन खुद अपने हाथों लगा लिया। सन्यास की अवस्था में उसे बच्चे रूपी चंदैनी गोंदा दिखाई देते हैं। वर्षा का आह्वान करते हुए।
गीत:  घानी मुनी घोर दे
कमेंट्री:; बटोरन लाल की बद्दुआ सच हो रही है। अंतिम समय, दुखित के पास ना मरही है , न शिव,  न गंगा, न भागवती और न चांद-बी। केवल उसका मन उस पर न्योछावर है। सुमन, सुंदर मन।
कमेंट्री: अरे ! यह कौन आ रहा है दुखित की लाश के पास ? गिद्ध की नाईं बटोरन लाल।  बटोरन लाल ! अकाल की काली छाया ने तुम्हें भी नहीं बख्शा? अब क्या लेने आए हो यहां? सब कुछ खत्म हो गया। दुखित के तन को बटोरन लाल ने अपने सीने से लगा लिया।  काश!  बटोरन लाल का यह भाव सर्वव्यापक हो पाता। वह गिद्ध की नाईं आया और राजहंस की भांति जा रहा है। दुखित की पीड़ा व्यर्थ नहीं गई। उसने बटोरन लाल का हृदय परिवर्तन कर दिया। अब बटोरन लाल को दूसरा नाम देना होगा। कौन कहता है कि दुखित मर गया है?  मरता वह है जो जिंदगी के टूटे,  थके हारे या जो पराए दर्द के काँटे न बुहारे । दुखित मानवता है । प्रदीप्त है।  अटूट है। अतीत है। बेशक तुमने देखा है उसको, उसकी जिंदगी को हिम्मत और मस्ती को, तुम अवाक रह गए हो कि वह असाधारण रूप से साधारण है। एक औसत भारतीय किसान का उदाहरण है। आओ तुम्हें आमंत्रित करता हूँ, दुखित जैसा बनो, कुछ माटी में सनो,  फिर चाहो तो कह देना कि दुखित मर गया। किंतु मुझे अमरत्व पर विश्वास है क्योंकि उसका अहिंसक बलिदान बटोरन लाल को अपना सुमन सौंपने का संदेश देकर गया है। कौन कहता है दुखित मर गया ? मानवता की मिसाल लिए माटी का बेटा सदा के लिए सो चुका है। उसकी चिता की अग्नि मशाल बन गई ऐसा लगता है।
छत्तीसगढ़ महतारी इस वियोग की बेला में फफक-फफक कर रो पड़ी है। अपनी निराशा बेबसी और एकाकीपन के बीच वह अपने सोए हुए बेटों की ओर ताकते हुए इधर ही आ रही है। उनकी तंद्रा भंग करने।

जीवन की लहर-लहर से हँस खेल खेल रे नाविक
जीवन के अंतस्थल में नित बूड़-बूड़ रे नाविक
हँसमुख प्रसून इकलौते, पल भर है जो हाथ पाओ
अपने डर के सौरभ से जग का आंगन भर जाओ।
उपर्युक्त संपूर्ण कथानक के साथ लोक धुनों में आबद्ध छत्तीसगढ़ी के अनेक गीतों छत्तीसगढ़ के नयनाभिराम दृश्यों और ग्रामीणों तथा नागर संस्कृति के लोक-नाट्यों के मिश्रित स्वरूप में प्रस्तुत चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ में एक वैचारिक क्रांति उत्पन्न की। दाऊ रामचंद्र जी देशमुख अपने श्रम को सार्थक स्वरूप प्रदान कर पाने में पूरी तरह सफल रहे।
(डॉक्टर सन्तराम देशमुख "विमल" की किताब "छत्तीसगढ़ी लोक नाटक के विकास में दाऊ रामचंद्र देशमुख का योगदान",  से साभार)
प्रस्तुतकर्ता - अरुण कुमार निगम

चंदैनी-गोंदा की स्मृतियाँ

एक बार फिर चंदैनी-गोंदा की स्मृतियाँ ताजी हो गई और कुछ लिखने की इच्छा जाग गई. सत्तर के दशक की शुरुवात में ग्राम- बघेरा, दुर्ग के दाऊ राम चन्द्र देशमुख ने ३६ गढ़ के 63 कलाकारों को लेकर "चंदैनी-गोंदा" की स्थापना की. "चंदैनी-गोंदा" किसान के सम्पूर्ण जीवन की गीतमय गाथा है. किसान के जन्म लेने से लेकर मृत्यु होने तक के सारे दृश्यों को रंगमंच पर छत्तीसगढ़ी गीतों के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया गया कि यह मंच एक इतिहास बन गया.

चंदैनी गोंदा की प्रथम प्रस्तुति दाऊ रामचंद्र देशमुख के गृहग्राम बघेरा में हुई। दूसरी प्रस्तुति ग्राम पैरी (बालोद,जिला दुर्ग के पास) छत्तीसगढ़ के जन कवि स्व.कोदूराम "दलित" को समर्पित करते हुए दाऊ जी ने मंच पर उनकी धर्म-पत्नी को सम्मानित किया था. इस आयोजन की भव्यता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि चंदैना गोंदा देखने सुनने के लिए लगभग अस्सी हजार दर्शक ग्राम पैरी में उमड़ पड़े थे. इस प्रदर्शन के बाद जहाँ भी चंदैनी-गोंदा का आयोजन होता,आस -पास के सारे गाँव खाली हो जाया करते थे. सारी भीड़ चंदैनी-गोंदा के मंच के सामने रात भर मधुर गीतों और संगीत की रसभरी चांदनी में सराबोर हो जाया करती थी. इसके बाद छत्तीसगढ़ के कई स्थानों पर चंदैनी-गोंदा के सफल प्रदर्शन हुए.चंदैनी-गोंदा के प्रदर्शन छत्तीसगढ़ के बाहर भी कई शहरों में हुआ.

चंदैनी-गोंदा के उद्घोषक सुरेश देशमुख की मधुर और सधी हुई आवाज दर्शकों को भोर तक बाँधे रहती थी.चंदैनी गोंदा के मधुर गीतों को स्वर देने वाले प्रमुख गायक-गायिका थे रविशंकर शुक्ल, लक्ष्मण मस्तुरिया, भैय्या लाल हेडाऊ, केदार यादव, अनुराग ठाकुर, संगीता चौबे, कविता हिरकने (अब कविता वासनिक) साधना यादव, संतोष झाँझी, लीना,किस्मत बाई आदि. प्रमुख गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया के आलावा रवि शंकर शुक्ल, पवन दीवान, स्व.कोदूराम "दलित", रामेश्वर वैष्णव, नारायणलाल परमार, रामरतन सारथी, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, भगवती सेन, हेमनाथ यदु आदि। पारंपरिक गीत भी रहे. इन गीतों को संगीतबद्ध करने वाले संगीतकार थे खुमान लाल साव. खुमान लाल साव के साथ बेन्जो पर गिरिजा शंकर सिन्हा, बांसुरी पर संतोष टांक, तबले पर महेश ठाकुर आदि. मंच पर सशक्त अभिनय का लोहा मनवाते थे- दाऊ रामचंद्र देशमुख, भैया लाल हेडाऊ, शिव कुमार दीपक (हास्य), सुमन, शैलजा ठाकुर आदि. साउंड-सिस्टम पर नियंत्रण रहता था स्वर-संगम, दुर्ग के बहादुर सिंह ठाकुर का. (गायक, गीतकार, वादक, अभिनय के नाम अपनी याददाश्त के अनुसार लिख रहा हूँ, इन नामों के आलावा और भी बहुत से कलाकारों का संगम था चंदैनी-गोंदा में. यदि किसी पाठक के पास जानकारी उपलब्ध हो तो मेरे लेख को पूर्ण करने में मदद करेंगे,मैं आभारी रहूँगा.)

छत्तीसगढ़ी गीतों से सजे चंदैनी-गोंदा के मधुर गीतों का उल्लेख किये बिना यह लेख अधूरा ही रह जायेगा. चल - चल गा किसान बोये चली धान असाढ़ आगे गा में जहाँ आसाढ़ ऋतु का दृश्य सजीव होता था वहीँ आगी अंगरा बरोबर घाम बरसत हे -गीत ज्येष्ठ की झुलसती हुई गर्मी का एहसास दिलाती थी. छन्नर –छन्नर पैरी बजे, खन्नर-खन्नर चूरी गीत में धान-लुवाई का चित्र उभर आता था, आज दौरी माँ बैला मन... गीत अकाल के बाद किसान की मार्मिक पीड़ा को उकेरता था. किसान कभी अपना परिचय देता है...मयं छत्तीसगढ़िया हौं गा. मयं छत्तीसगढ़िया हौं रे, भारत माँ के रतन बेटा बढ़िया हौं गा.....कभी अपनी मातृ- भूमि को नमन करते हुए गा उठता है... मयं बंदत हौं दिन-रात,मोर धरती-मैय्या जय होवै तोर.. चंदैनी-गोंदा में बाल मन में-चंदा बन के जिबो हम,सुरुज बनके जरबो हम, अनियाई के आगू भैया, आगी बरोबर बरबो हम जैसे गीत के माध्यम से देश प्रेम की भावना का संचार किया गया तो कभी आगे सुराज के दिन रे संगी ... के द्वारा आजादी का आव्हान किया गया.. संयोग श्रृंगार में नायक-नायिका ददरिया गाते झूमते नजर आते थे-मोर खेती-खार रुमझुम, मन भँवरा नाचे झूम-झूम किंदर के आबे चिरैया रे... नई बाँचे चोला छूट जाही रे परान, हँस-हँस के कोन हा खवाही बीड़ा पान. छत्तीसगढ़ी श्रृंगार -गीत में खुमान लाल साव ने अद्भुत संगीत से इस गीत को संवारा-बखरी के तुमा नार बरोबर मन झूमे.... अपने नायक की स्मृति में कभी नायिका कह उठती है... तोला देखे रहेवं गा, तोला देखे रहेवं रे,धमनी के हाट माँ बोइर तरी... नायिका अपने घर का पता कुछ तरह से बताती है.. चौरा माँ गोंदा, रसिया मोर बारी माँपताल.... प्रेम में रमी नायिका को जब मुलाकात में हुई विलम्ब का अहसास होता है तो घर लौटने का मनुहार कभी इस प्रकार से करती है... अब मोला जान दे संगवारी, आधा रत पहागे मोला घर माँ देही गारी रामा... और कभी कहती है.... मोला जावन दे ना रे अलबेला मोर, अब्बड़ बेरा होगे मोला जावन दे ना.. नायिका के विरह गीतों में काबर समाये रे मोर बैरी नयना मा,  मोर कुरिया सुन्ना से,बियारा सुन्ना रे,मितवा तोर बिना का बेहतरीन मंचन किया गया..

चंदैनी-गोंदा में पारंपरिक गीतों में सोहर, बिहाव-गीत, गौरा-गीत, करमा, सुवा-गीत, राउत नाचा, पंथी नृत्य तथा अन्य लोक गीतों का समावेश भी खूबसूरती से किया गया था. गौरा गीत मंचन के समय बहुत बार कुछ दर्शकों पर तो देवी भी चढ़ जाती थी जिसे पारंपरिक तरीकों से शांत भी किया जाता था. चंदैनी-गोंदा के मंच के सामने पता ही नहीं चलता  था की रात कैसे बीत गई.

चंदैनी-गोंदा के मुख्य गायक- गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया हैं. उपरोक्त अधिकांश गीत उन्ही के द्वारा रचित हैं सन 2000 के दशक के प्रारंभ से शुरू हुई अनेक छत्तीसगढ़ी फिल्मों में उनके गीत लोकप्रिय हुए.. संगीतकार खुमान लाल साव ने छत्तीसगढ़ी गीतों को नया आयाम दिया. आपने भी छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अपना योगदान दिया है. चंदैनी-गोंदा के बाद छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य परिष्कृत रूप में बनने प्राम्भ हो गए. बाद के अन्य संगीतकारों की संगीत रचनाएँ भी काफी मशहूर हुई किन्तु उनमें कहीं न कहीं खुमान लाल साव की शैली का प्रभाव जरुर होता था.बंगाल में जैसे रविन्द्र-संगीत का प्रभाव है उसी तरह खुमान - संगीत पर भी विचार किया जाना चाहिए. भैयालाल हेडाऊ ने  सत्यजीत रे की फिल्म सद्गति में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी.शैलजा ठाकुर भी रुपहले परदे पर नजर आई. सन १९८२ में तेरह इ.पी.रिकार्ड के जरिये चंदैनी गोंदा के बहुत से गीतों ने छत्तीसगढ़ में धूम मचाई, आज भी अच्छे सुनने वालों के पास ये गीत उनके संकलन में हैं.

दाऊ रामचंद्र देशमुख ने चंदैनी गोंदा के बाद "देवार- डेरा" और "कारी" का भी सफल मंचन किया. इनमें संवाद लेखक प्रेम साइमन थे। चंदैनी गोंदा के प्रदर्शन के लगभग साथ-साथ ही दुर्ग के दाऊ महा सिंह चंद्राकर ने "सोनहा-बिहान" और "लोरिक चंदा" को मंच पर प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ को अनमोल भेंट दी. इनके बाद छत्तीसगढ़ में बहुत से कलाकारों ने इस दिशा में प्रयास किये हैं किन्तु चंदैनी गोंदा और सोनहा बिहान ही सर्वाधिक सफल मंच रहे. केदार यादव के " नवा-बिहान" ने भी काफी लोकप्रियता हासिल की. दुर्ग के संतोष जैन के  मंच "क्षितिज रंग शिविर" ने छत्तीसगढ़ तथा भारत के अनेक प्रदेशों में अपने उत्कृष्ट से अभिनय को नई उँचाईयां प्रदान की हैं. छत्तीसगढ़ के रंगमंच को जीवंत करने में अर्जुन्दा के दाऊ दीपक चंद्राकर और दुर्ग के दाऊ विनायक अग्रवाल की महत्वपूर्ण भूमिका भी कभी भुलाई नहीं जा सकती।
(समस्त चित्र लोकप्रिय पत्रिका-धर्मयुग -25 मार्च 1979 में प्रकाशित श्री परितोष चक्रवर्ती के आलेख से साभार)

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़

शब्द गठरिया बांध : अरूण कुमार निगम

हिन्दी कविता में छंद का अनुशासन जब से कमजोर हुआ है, हिन्दी की कविता जन मन से दूर होती गई है। छंद बंधन से मुक्त कवितायें एकांतिक पाठ के आग्रह के साथ ही विशिष्ठ पाठक वर्ग और बौद्धिक मनों में सीमित होती गई। बंधन मुक्त कविता नें अभिव्यक्ति के नव आलोक को जन्म तो दिया पर वह लोक के कंठों में तरंगित नहीं हो सकी। संभवत: आदि कवियों नें साहित्य को लोक कंठों में बसाने के लिए ही संस्कृत छंद शास्त्र में शब्दों का अनुशासन लिखा था। जिससे अनुशासित शब्दों से पिरोए गए वाक्यांश स्वमेव गीतात्मकता को जीवंत रखे।


अरूण कुमार निगम जी के पोते
यश निगम के हाथों में ‘शब्द गठरिया बाँध’
छत्तीसगढ़ में ऐसे ही एक जनकवि हुए जिनका नाम प्रदेश बड़े सम्मान के साथ लेता है, उनका नाम है जनकवि कोदूराम दलितदलित जी जितने अपने पद्य में अभिव्यक्त शब्दों के प्रति अनुशासित थे उतने ही अपने जीवन आर्दशों के प्रति वे अनुशासित थे। उन्हीं के जेष्ठ पुत्र अरूण कुमार निगम नें विरासत में मिली इस परम्परा को पल्लवित एवं पुष्पित किया। अरूण कुमार निगम जी के कविता साधना से निकले छंदबद्ध रचनाओं का संकलन 'शब्द गठरिया बांध' अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद से अभी-अभी प्रकाशित हुई है। दोहा, सवैया, आल्हा, कहमुकरी, कुण्डलियॉं और विविध छंदों से युक्त इस संग्रह को पढ़ते हुए गीतों के अर्थ और भाव सहज रूप से ग्राह्य होकर हृदय में उतरते जाते हैं। इस संकलन में शब्दों की गठरी जब खुलती है तब शब्द बरबस बुदबुदानें और गुनगुनाने को मजबूर करते हैं।

विभिन्न विषयों और अलंकारों से युक्त इस संकलन में कवि आरंभ में ही, कलम की महिमा बहुत सहज रूप से दोहे में प्रस्तुत करते हुए कहता हैं -
मान और सम्मान की, नहीं कलम को भूख।
महक मिटे ना पुष्प की, चाहे जाये सूख।।
कवि की यही सहजता काव्य को उसके लक्ष्य- तक पहुंचाती है। संग्रह के 112 पृष्टों तक, हर पृष्ट में कवि अपने कलम से निरंतर विभिन्न विषयों के उपर उत्कृष्ट रचनाओं का सुवासित पुष्प बिखराते हैं। संग्रह के विभिन्न छंदों को पढ़ते हुए लगता है कि हम रीतिकालीन या भक्तिकालीन काव्य का पठन कर रहे हैं जबकि कवि समय के बंधन से मुक्त , निराला और पंत के साथ ही वर्तमान समय को भी अपने गीतों में पिरोते आगे बढ़ते हैं -
कार्तिक अगहन पूस ले, आता जब हेमंत।
तन की चाहत सोंचती, बनूँ निराला पन्त।।

हिन्दी साहित्य में कवियों नें प्रकृति का मनोहारी चित्रण किया है, हमारे काव्य साहित्य में ऋतु वर्णन के प्रचुर छंद विद्यमान है। इसके बावजूद आज भी जब कोई कवि ऋतुओं पर छंद लिखता है तो मन उसे पढ़कर आनंदित होता है। ऋतु, प्रकृति और पर्यावरण पर इस संग्रह में कवि नें भी खूबसूरत कलम चलाई है, सावन पर इस संग्रह में संग्रहित मालती सवैया देखें -
सावन पावन है मन भावन, हाय हिया हिचकोलत झूलै
बॉंटत बूंदनियॉं बदरी, बदरा रसिया रस घोरत झूलै
झॉंझर झॉंझ बजै झनकै, झमकै झुमके झकझोरत झूलै
ए सखि आवत लाज मुझे, सजना उत मोहि बिलोकत झूलै।

अरूण कुमार निगम जी के पास शब्दों का अपार भंडार है, उनकी कल्पना जब छंदों में श्रृंगार करती है तो इस तरह के सावन के दोहे बन पड़ते हैं -
भरे कल्पना छन्द में, इंद्रधनुष से रंग।
शब्दों का सावन करे, कुदरत को भी दंग।।
देख—देख श्रृंगार को, छलका रस श्रृंगार।
पानी—पानी वादियॉं, बदरा आये द्वार।।

मनभावन सावन जब आल्हा छंद में कवि द्वारा अभिव्यपक्त होता है तो उसके शब्द प्रयोग की कुशलता देखते बनती है -
चोट लगी वृक्षों को जब भी, होता घायल यह आकाश।
रो न सकी है आंखें इसकी, बादल इतना हुआ हताश।।
आने वाले कल से छीनी, तूने कलसे की हर प्यास।
आज मनाता जल से जलसे, कल की पीढ़ी खड़ी उदास।।

इसी तरह के ढेरों उदाहरणों से परिपूर्ण उत्कृष्ठ छंदों के इस संग्रह के कुछ उल्लेखनीय दोहे देखें, दीपावली में बने खीर के संबंध में, निर्जीव चूल्हे और प्रकृति का मानवीकरण बहुत सुन्दर रूप में अरूण जी इस दोहे में करते हैं -
मिट्टी का चूल्हा हॅंसा, सॅंवरा आज शरीर।
धूँआ चख—चख भागता, बटलोही की खीर।।

पर्यावरण पर कवि की चिन्ता दोहे में देखें -
बॉंझ मृदा होने लगी, हुई प्रदूषित वायु।
जल जहरीला हो रहा, कौन हाय दीर्घायु।।

मजदूरनी पर कवि की कल्प ना पर दोहा देखिए -
मौन हो गई चूड़ियॉं, बिंदिया भी चुपचाप।
पीर गज़ल गाती रही, धड़कन देती थाप।।

शब्दों शक्ति से परिपूर्ण कवि का मद्यपान पर दोहा देखें -
मैं की मय पीकर करे, मैं मैं मैं का जाप।
सुन मैं मय के बावरे, मैं मय दोनों पाप।।

इस पूरे संग्रह में एक से एक पद है जिनका उल्लेख यहॉं आवश्यक जान पड़ता है किन्तु यह संभव नहीं। मैं सिर्फ इस संग्रह से आपका परिचय करा रहा हूं, यह संग्रह shimply.com, flipkart.com और redgrab.com पर आन लाइन उपलब्ध और अरूण कुमार निगम जी के छंदों से साक्षात्कार कर सकते हैं। अरूण कुमार निगम जी के छंदों को आप उनके ब्लॉग मितानी गोठ में भी पढ़ सकते हैं। अरूण कुमार निगम जी सोशल मीडिया के चर्चित कवि हैं वे निरंतर कविता रचते हुए ओपन बुक्‍स आनलाईन एवं फेसबुक आदि के माध्यम से लगातार नव रचनाकारों को उत्साहित करते हुए छंद शास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं एवं हिन्दी में खो रहे गीत को नई दिशा दे रहे हैं। प्रभावशाली व उपयुक्त शब्दों को जोड़-जोड़ कर गीत रचते निगम जी व्याकरण को अपना आधार मानते हैं। उन्होंनें अपने संग्रह के शीर्षक कविता में स्वयं लिखा है-
अक्षर—अक्षर चुन सदा, शब्द गठरिया बॉंध।
राह दिखाए व्याकरण, भाव लकुठिया बॉंध।।

- संजीव तिवारी

शब्द गठरिया बांध के विमोचन के समय के कुछ चित्र - 
 
देश के वरिष्ठ गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र तथा यश मालवीय के करकमलों से विमोचन इलाहबाद में
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय क्षेत्रीय केंद्र इलाहबाद के सत्य प्रकाश मिश्र सभागार में लोकार्पण में उपस्थित साहित्यकार


विमोचन समारोह में कविता पाठ करते अरूण कुमार निगम
भिलाई के ग़ज़लकार गिरिराज भंडारी और इलबबद के साहित्यकार सौरभ पाण्डेय के साथ अरुण व सपना निगम
युवा ग़ज़लकार और अंजुमन प्रकाशन के संचालक वीनस केसरी इलाहबाद

छत्तीसगढ़ के जन-कवि स्व.कोदूराम "दलित" के 102 वें.जन्म दिन पर विशेष...


-अरुण कुमार निगम 

कवि कोदूराम 'दलित' का जन्म ५ मार्च १९१० को ग्राम टिकरी(अर्जुन्दा),जिला दुर्ग में हुआ . आपके पिता श्री राम भरोसा कृषक थे.आपका बचपन ग्रामीण परिवेश में खेतिहर मजदूरों के बीच बीता. आपने मिडिल स्कूल अर्जुन्दा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की . तत्पश्चात नार्मल स्कूल रायपुर , नार्मल स्कूल बिलासपुर में शिक्षा ग्रहण की .स्काउटिंग,चित्रकला ,साहित्य विशारद में आपको सदैव उच्च स्थान प्राप्त हुआ .१९३१ से १९६७ तक आर्य कन्या गुरुकुल,नगर पालिका परिषद् तथा शिक्षा विभाग दुर्ग की प्राथमिक शालाओं में आप अध्यापक और प्रधान अध्यापक के रूप में कार्यरत रहे .

अपने १९२६ में कवितायेँ लिखना प्रारंभ की. आपकी रचनाएँ अनेक समाचार पत्रों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं."सियानी गोठ"(१९६७) तथा "बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय"(२०००) आपकी प्रकाशित पुस्तकें हैं.आपकी कविताओं तथा लोक कथाओं का प्रसारण आकाशवाणी भोपाल ,इंदौर, नागपुर, रायपुर से अनेक बार हुआ है.मध्य प्रदेश शासन , सूचना-प्रसारण विभाग , म.प्र.हिंदी साहित्य अधिवेशन ,विभिन्न साहित्यिक सम्मलेन ,स्कूल-कालेज के स्नेह सम्मलेन, किसान मेला, राष्ट्रीय पर्व ,गणेशोत्सव के कई मंचों पर अपने काव्य पाठ किया है. सिंहस्थ मेला (कुम्भ) उज्जैन में भारत शासन द्वारा आयोजित कवि सम्मलेन में महाकौशल क्षेत्र से कवि के रूप में आप आमंत्रित किये गए. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के नगर आगमन पर अपने काव्यपाठ किया है.

आप राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा, इकाई -दुर्ग के सक्रिय सदस्य रहे .दुर्ग जिला साहित्य समिति के उपमंत्री, छत्तीसगढ़ साहित्य के उपमंत्री, दुर्ग जिला हरिजन सेवक संघ के मंत्री, भारत सेवक समाज के सदस्य,सहकारी बैंक दुर्ग के एक डायरेक्टर ,म्यु.कर्मचारी सभा नं.४६७, सहकारी बैंक के सरपंच, दुर्ग नगर प्राथमिक शिक्षक संघ के कार्यकारिणी सदस्य, शिक्षक नगर समिति के सदस्य जैसे विभिन्न पदों पर सक्रिय रहते हुए आपने अपने बहु आयामी व्यक्तित्व से राष्ट्र एवं समाज के उत्थान के लिए सदैव कार्य किया है.

आपका हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य में गद्य और पद्य दोनों पर सामान अधिकार रहा है. साहित्य की सभी विधाओं यथा कविता, गीत, कहानी ,निबंध, एकांकी, प्रहसन, बाल-पहेली, बाल-गीत, क्रिया-गीत में आपने रचनाएँ की है. आप क्षेत्र विशेष में बंधे नहीं रहे. सारी सृष्टि ही आपकी विषय-वस्तु रही है. आपकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं. आपके काव्य ने उस युग में जन्म लिया जब देश आजादी के लिए संघर्षरत था .आप समय की सांसों की धड़कन को पहचानते थे . अतः आपकी रचनाओं में देश-प्रेम ,त्याग, जन-जागरण, राष्ट्रीयता की भावनाएं युग अनुरूप हैं.आपके साहित्य में नीतिपरकता,समाज सुधार की भावना ,मानवतावादी, समन्वयवादी तथा प्रगतिवादी दृष्टिकोण सहज ही परिलक्षित होता है.

हास्य-व्यंग्य आपके काव्य का मूल स्वर है जो शिष्ट और प्रभावशाली है. आपने रचनाओं में मानव का शोषण करने वाली परम्पराओं का विरोध कर आधुनिक, वैज्ञानिक, समाजवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण से दलित और शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया है. आपका निति-काव्य तथा बाल-साहित्य एक आदर्श ,कर्मठ और सुसंस्कृत पीढ़ी के निर्माण के लिए आज भी प्रासंगिक है.

कवि दलित की दृष्टि में कला का आदर्श 'व्यव्हार विदे' न होकर 'लोक-व्यव्हार उद्दीपनार्थम' था. हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों ही रचनाओं में भाषा परिष्कृत, परिमार्जित, साहित्यिक और व्याकरण सम्मत है. आपका शब्द-चयन असाधारण है. आपके प्रकृति-चित्रण में भाषा में चित्रोपमता,ध्वन्यात्मकता के साथ नाद-सौन्दर्य के दर्शन होते हैं. इनमें शब्दमय चित्रों का विलक्षण प्रयोग हुआ है. आपने नए युग में भी तुकांत और गेय छंदों को अपनाया है. भाषा और उच्चारण पर आपका अद्भुत अधिकार रहा है. आपकी रचनाएँ इन्टरनेट के www.gharhare.blogspot.in पर पढ़ी जा सकती है. पर पढ़ी जा सकती है.

कवि कोदूराम"दलित" का निधन २८ सितम्बर १९६७ को हुआ.

जाने चले जाते हैं कहाँ..... पार्श्व गायक मुकेश की पुण्य तिथि पर.....

महान पार्श्व गायक मुकेश जी की 35 वीं पुण्य तिथि. लगता ही नहीं कि उन्हें खोये इतने बरस बीत चुके हैं. उनका अंतिम गीत ‘चंचल,शीतल, निर्मल, कोमल, संगीत की देवी स्वर सजनी’ क्या 35 साल पुराना हो चुका है ? सोचो तो बड़ा आश्चर्य होता है. न हाथ छू सके, न दामन ही थाम पाये बड़े करीब से कोई उठ कर चला गया... व्यक्ति जाता है, व्यक्तित्व नहीं जाता. गायक जाता है, गायन नहीं जाता. कलाकार जाता है, कला नहीं जाती. इसीलिये ऐसी हस्तियों के चले जाने के बावजूद उनकी मौजदगी का एहसास हमें होता रहता है.

जग में रह जायेंगे प्यारे तेरे बोल.........जी चाहे जब हमको आवाज दो, हम हैं वहीं –हम थे जहाँ.......... मुकेश जी का जन्म दिल्ली में माथुर परिवार में 22 जुलाई 1923 को हुआ था. उनके पिता श्री जोरावर चंद्र माथुर अभियंता थे. दसवीं तक शिक्षा पाने के बाद पी.डब्लु.डी.दिल्ली में असिस्टेंट सर्वेयर की नौकरी करने वाले मुकेश अपने शालेय दिनों में अपने सहपाठियों के बीच सहगल के गीत सुना कर उन्हें अपने स्वरों से सराबोर किया करते थे किंतु विधाता ने तो उन्हें लाखों करोड़ों के दिलों में बसने के लिये अवतरित किया था. जी हाँ ‘अवतरित’ क्योंकि ऐसी शख्सियत अवतार ही होती हैं. सो विधाता ने वैसी ही परिस्थितियाँ निर्मित कर मुकेशजी को दिल्ली से मुम्बई पहुँचा दिया. 

तत्कालीन अभिनेता मोतीलाल ने मुकेश को अपनी बहन के विवाह समारोह में गीत गाते सुना और उनकी प्रतिभा को तुरंत ही पहचान लिया. मात्र 17 वर्ष की उम्र में मुकेश मोतीलाल के साथ मुम्बई आ गये. मोतीलालजी ने पण्डित जगन्नाथ प्रसाद के पास उनके संगीत सीखने की व्यवस्था भी कर दी. मुकेश के मन में अभिनेता बनने की इच्छा बलवती हो गई थी. उनकी यह इच्छा पूरी भी हुई. 1941 में नलिनी जयवंत के साथ बतौर नायक फिल्म निर्दोष में उन्होंने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुवात की. इस फिल्म में उनके गीत भी रिकार्ड हुये. दुर्भाग्यवश फिल्म फ्लॉप रही. इसके बाद मुकेश ने दु:ख-सुख और आदाब अर्ज फिल्म में भी अभिनय किया. ये फिल्में भी चल नहीं पाई. 

मोतीलाल जी ने मुकेश को संगीतकार अनिल बिस्वास से मिलवाया. अनिल बिस्वास ने उन्हें महबूब खान की फिल्म के लिये ‘साँझ भई बंजारे’ गीत गाने के लिये दिया मगर मुकेश इस गाने को बिस्वास दा के अनुरुप नहीं गा पाये. अनिल बिस्वास ने मजहर खान की फिल्म पहली नज़र के लिये ‘दिल जलता है तो जलने दे, आँसू न बहा फरियाद न कर’ मुकेश जी की आवाज में रिकार्ड कराया. यह गीत मुकेश के लिये मील का पत्थर साबित हुआ. इस गीत की सफलता ने स्वर्णिम भविष्य के सारे द्वार खोल दिये. 1947 में फिल्म अनोखा प्यार के गीत जीवन सपना टूट गया बेहद हिट हुआ. 

‘दिल जलता है तो जलने दे – इस गीत को सहगल साहब सुनकर चकित रह गये थे कि उन्होंने यह गीत कब गाया है. जब उन्हें पता चला कि इसे मुकेश ने गया है तो उन्होंने आशीर्वाद दिया कि मुकेश ही मेरा उत्तराधिकारी होगा. इसी दौरान नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में मेला और अंदाज फिल्म में मुकेश जी के गीतों ने देश में धूम मचा दी. फिल्म इंडस्ट्री के दो महान सितारों राज कपूर और मुकेश का पावन संगम रंजीत स्टुडियो में जयंत देसाई की फिल्म बंसरी के सेट पर हुआ. मुकेश वहाँ प्यानो बजाते हुये गा रहे थे. इस मुलाकात ने क्या रंग दिखाया, इसे लिखने की जरूरत ही नहीं है. 

1949 में रिलीज राज साहब की सुपर-हिट बरसात की सफलता में फिल्म के गीतों का अहम रोल था. छोड़ गये बालम हाय अकेला छोड़ गये गीत में मुकेश से सहगल शैली तज कर अपनी मौलिक आवाज में गीत गाया. वैसे मुकेश को मुकेश की आवाज में प्रस्तुत करने के दावे और भी संगीतकारों ने किये हैं. इसी दौर की फिल्मों में आग, आवारा के गीतों ने धूम मचा दी. आवारा की कामयाबी के बाद एक बार मुकेश ने फिर से अभिनय में किस्मत आजमाने की कोशिश की .माशूका और अनुराग में फिर से वे नायक बने मगर एक बार फिर ये फिल्में फ्लॉप रहीं. अब मुकेश ने अभिनय से तौबा कर ली और पूरा ध्यान गायिकी पर केंद्रित कर दिया.

1951 में मुकेश ने फिल्म मल्हार में संगीत भी दिया. बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम, कहाँ हो तुम जरा आवाज दो गीत लोगों की जुबाँ पर चढ़ गये. आग , आवारा , बरसात के बाद मुकेश अंत तक राज कपूर की आवाज बने रहे. आह, अनाड़ी, दिल ही तो है , दुल्हा-दुल्हन, संगम ,नजराना, सुनहरे दिन ,बावरे नैन, श्री 420 ,परवरिश , तीसरी कसम , जिस देश में गंगा बहती है, दीवाना , एराउंड दी वर्ल्ड , आशिक, धरम-करम , मेरा नाम जोकर , सत्यम शिवम सुंदरम आदि फिल्मों में मुकेश की आवाज पर्दे पर राज कपूर की आवाज बनी रही. मुकेश को चार बार फिल्म फेयर अवार्ड मिला. ये गीत थे सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी (अनाड़ी -1959) सबसे बड़ा नादान वही है (पहचान-1970) जै बोलो बेईमान की ( बेईमान-1972) और कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है (कभी-कभी -1976) फिल्म रजनीगंधा के गीत कई बार यूँ ही देखा है के लिये वर्ष 1974 में मुकेश को सर्व श्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. जीवन के अंतिम दिनों में मुकेश ने रामायण को अपनी आवाज में रिकार्ड कराया. 

27 अगस्त 1976 को मात्र 53 वर्ष की आयु में मुकेश इस दुनिया को बिदा कर गये. उनके निधन पर राज कपूर ने कहा था - मेरी आवाज और आत्मा दोनों चली गई.

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना हमीं सो गये दास्ताँ कहते- कहते.

विश्व रंगमंच दिवस पर आरम्भ के सुधि पाठकों के लिए... चंदैनी-गोंदा का सफर

आज विश्व रंगमंच दिवस है. लोक  गायिका कविता विवेक वासनिक के पुत्र के विवाह का निमंत्रण-पत्र आया है. जेहन में चंदैनी-गोंदा की स्मृतियाँ ताजी हो गई और  कुछ लिखने की इच्छा  जाग गई. सत्तर के दशक की शुरुवात में ग्राम- बघेरा, दुर्ग के दाऊ राम चन्द्र देशमुख ने ३६ गढ़ के ६३ कलाकारों को लेकर "चंदैनी-गोंदा" की स्थापना की. "चंदैनी-गोंदा"  किसान के सम्पूर्ण जीवन की गीतमय गाथा है. किसान के जन्म लेने से लेकर मृत्यु होने तक के सारे दृश्यों को रंगमंच पर छत्तीसगढ़ी गीतों के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया गया कि यह मंच एक इतिहास बन गया.
चंदैनी गोंदा की आरंभिक प्रस्तुति ग्राम पैरी (बालोद,जिला दुर्ग के पास) छत्तीसगढ़ के जन कवि स्व.कोदूराम "दलित" को समर्पित करते हुए दाऊ जी ने मंच पर उनकी धर्म-पत्नी को सम्मानित किया था. इस आयोजन की भव्यता का अनुमान इस बात से  लगाया जा सकता है कि चंदैना गोंदा देखने सुनने के लिए लगभग अस्सी हजार दर्शक ग्राम पैरी में उमड़ पड़े थे. इस प्रदर्शन के बाद जहाँ भी चंदैनी-गोंदा का आयोजन होता,आस -पास के सारे गाँव खाली हो जाया करतेथे. सारी भीड़ चंदैनी-गोंदा के मंच के सामने रात भर मधुर गीतों और संगीत की रसभरी चांदनी में  सराबोर हो जाया करती थी. इसके बाद छत्तीसगढ़ के कई स्थानों पर चंदैनी-गोंदा के सफल प्रदर्शन हुए.चंदैनी-गोंदा के प्रदर्शन छत्तीसगढ़ के बाहर भी कई शहरों में हुआ.
चंदैनी-गोंदा के उद्घोषक सुरेश देशमुख की मधुर और सधी हुई आवाज दर्शकों को भोर तक बाँधे रहती थी.चंदैनी गोंदा के मधुर गीतों को स्वर देने वाले प्रमुख गायक-गायिका थे लक्ष्मण मस्तुरिया, भैय्या लाल हेडाऊ, केदार यादव, अनुराग ठाकुर, संगीता चौबे, कविता हिरकने (अब कविता वासनिक) साधना यादव आदि. प्रमुख गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया के आलावा रवि शंकर शुक्ल, पवन दीवान, स्व.कोदूराम "दलित", रामेश्वर वैष्णव, पारंपरिक गीत आदि. इन गीतों को संगीतबद्ध करने वाले संगीतकार थे खुमान लाल साव. खुमान लाल साव के साथ बेन्जो पर गिरिजा शंकर सिन्हा, बांसुरी पर संतोष टांक, तबले पर महेश ठाकुर आदि. मंच पर सशक्त अभिनय का लोहा मनवाते थे- दाऊ रामचंद्र देशमुख, भैया लाल हेडाऊ, शिव कुमार दीपक (हास्य), सुमन, शैलजा ठाकुर आदि. साउंड-सिस्टम पर नियंत्रण रहता था स्वर-संगम,दुर्गके बहादुर सिंह ठाकुर  का. (गायक, गीतकार, वादक, अभिनय के नाम अपनी याददाश्त के अनुसार लिख रहा हूँ,इन नामों के आलावा और भी बहुत से कलाकारों का संगम था चंदैनी-गोंदामें. यदि किसी पाठक के पास जानकारी उपलब्ध हो तो मेरे लेख को पूर्ण करने में मदद करेंगे,मैं आभारी रहूँगा.)
छत्तीसगढ़ी गीतों से सजे चंदैनी-गोंदा के मधुर गीतों का उल्लेख किये बिना यह लेख अधूरा ही रह जायेगा. चल - चल गा किसान बोये चली धान असाढ़ आगे गा में जहाँ आसाढ़ ऋतु का दृश्य सजीव होता था वहीँ आगी अंगरा बरोबर घाम बरसत हे -गीत ज्येष्ठ की झुलसती हुई गर्मी का एहसास दिलाती थी. छन्नर –छन्नर पैरी बजे, खन्नर-खन्नर चूरी गीत में धान-लुवाई का चित्र उभर आता था, आज दौरी माँ बैला मन... गीत अकाल के बाद किसान की मार्मिक पीड़ा को उकेरता था. किसान कभी अपना परिचय देता है...मयं छत्तीसगढ़िया हौं गा. मयं छत्तीसगढ़िया हौं रे, भारत माँ के रतन बेटा बढ़िया हौं गा.....कभी अपनी मातृ- भूमि को नमन करते हुए गा उठता है... मयं बंदत हौं दिन-रात, मोर धरती-मैय्या जय होवै  तोर.. चंदैनी-गोंदा में बाल मन में-चंदा बन के जिबो हम,सुरुज बनके जरबो हम, अनियाई के आगू भैया, आगी बरोबर बरबो हम जैसे गीत के माध्यम से देश प्रेम की भावना का संचार किया गया तो कभी आगे सुराज के दिन रे संगी ... के द्वारा  आजादी का आव्हान किया गया.. संयोग श्रृंगार में नायक-नायिका ददरिया गाते   झूमते नजर आते थे-मोर खेती-खार रुमझुम ,मन
भँवरा नाचे झूम-झूम किंदर के आबे चिरैया रे... नई बाँचे  चोला छूट जाही रे परान, हँस-हँस के  कोन हा खवाही बीड़ा पान. छत्तीसगढ़ी श्रृंगार -गीत में खुमान लाल साव ने अद्भुत संगीत से इस गीत को संवारा-बखरी के तुमा नार बरोबर मन झूमे.... अपने नायक की स्मृति में कभी नायिका कह उठती है... तोला देखे रहेवं गा, तोला देखे रहेवं रे, धमनी के हाट माँ बोइर तरी... नायिका अपने घर का पता कुछ तरह से बताती है.. चौरा माँ गोंदा, रसिया मोर बारी माँ पताल.... प्रेम में रमी नायिका को जब मुलाकात में हुई विलम्ब का अहसास होता है तो घर लौटने का मनुहार कभी इस प्रकार से करती है... अब मोला जान दे संगवारी, आधा रत पहागे मोला घर माँ देही गारी रामा... और कभी कहती है.... मोला जावन दे ना रे अलबेला मोर, अब्बड़ बेरा होगे मोला जावन दे ना.. नायिका के विरह गीतों में काबर समाये रे मोर बैरी नयना मा,  मोर कुरिया सुन्ना से,बियारा सुन्ना रे, मितवा तोर बिना का बेहतरीन मंचन किया गया.. 
चंदैनी-गोंदा में पारंपरिक गीतों में सोहर, बिहाव-गीत, गौरा- गीत, करमा, सुवा-गीत, राउत नाचा, पंथी नृत्य तथा अन्य लोक गीतों का समावेश भी खूबसूरती से किया गया था. गौरा गीत मंचन के समय बहुत बार कुछ दर्शकों पर तो देवी भी चढ़ जाती थी जिसे पारंपरिक तरीकों से शांत भी किया जाता था. जिस प्रकार चंदैनी-गोंदा के मंच के सामने पता ही नहीं चलता  था की रात कैसे बीत गई, उसी प्रकार उसके गीतों को याद करते करते आज  रविवार का दिन भी बीता जा रहा है. बाकी दिन तो काम की वजह से इतना लम्बा लिखने की फुर्सत ही नहीं रहती. फिर टायपिंग सीखी भी नहीं है. एक-एक बटन देख कर इतना लिख लिया, यही बहुत है. 
चंदैनी-गोंदा के मुख्य गायक- गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया हैं. उपरोक्त अधिकांश गीत उन्ही के द्वारा रचित हैं सन २००० के दशक के प्रारंभ से शुरू हुई अनेक छत्तीसगढ़ी फिल्मों में उनके गीत लोकप्रिय हुए.. संगीतकार खुमान लाल साव ने छत्तीसगढ़ी गीतों को नया आयाम दिया. आपने भी छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अपना योगदान दिया है. चंदैनी-गोंदा के बाद छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य परिष्कृत रूप में बनने प्राम्भ हो गए. बाद के अन्य संगीतकारों की संगीत रचनाएँ भी काफी मशहूर हुई किन्तु उनमें कहीं न कहीं खुमान लाल साव की शैली का प्रभाव जरुर होता था.बंगाल में जैसे रविन्द्र-संगीत का प्रभाव है उसी तरह खुमान - संगीत पर भी विचार किया जाना चाहिए. भैयालाल हेडाऊ ने  सत्यजीत रे की फिल्म सद्गति में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी. शैलजा ठाकुर भी रुपहले परदे पर नजर आई. सन १९८२ में तेरह इ.पी.रिकार्ड के जरिये चंदैनी गोंदा के बहुत से गीतों ने छत्तीसगढ़ में धूम मचाई, आज भी अच्छे सुनने वालों के पास ये गीत उनके संकलन में हैं.
दाऊ रामचंद्र देशमुख ने चंदैनी गोंदा के बाद "देवार- डेरा" और "लोरिक चंदा" का भी सफल मंचन किया. चंदैनी गोंदा के प्रदर्शन के  लगभग साथ-साथ  ही दुर्ग के दाऊ महा सिंह चंद्राकर ने "सोनहा-बिहान" को मंच पर प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ को अनमोल भेंट दी. इनके बाद छत्तीसगढ़ में बहुत से कलाकारों ने इस दिशा में प्रयास किये हैं किन्तु चंदैनी गोंदा और सोनहा बिहान ही सर्वाधिक सफल मंच रहे. केदार यादव के " नवा-बिहान" ने भी काफी लोकप्रियता हासिल की. दुर्ग के संतोष जैन के  मंच "क्षितिज रंग शिविर" ने छत्तीसगढ़ तथा भारत के अनेक प्रदेशों में अपने  उत्कृष्ट से अभिनय को नई उँचाईयां प्रदान की हैं.
अरूण कुमार निगम
इस आलेख के लेखक श्री अरूण कुमार निगम छत्‍तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम 'दलित' जी के पुत्र हैं। निगम जी बचपन से रेडियो श्रोता संघ से जुड़े हुए हैं। छत्‍तीसगढ़ की कला-संस्‍कृति व समसामयिक मुद्दों पर उनका आलेख समय समय पर स्‍थानीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहता है। निगम जी हिन्‍दी व छत्‍तीसगढ़ी में समान रूप से लिखते हैं। निगम जी वर्तमान में भारतीय स्‍टैट बैंक, जबलपुर में प्रबंधक के रूप में सेवारत हैं।

सपना की इंदिरा को श्रद्धांजली और अरूण के मजेदार संस्‍मरण

तरूणाई में रेडियो श्रोता संघ से जुडे अरूण कुमार निगम जी एक मजेदार वाकया बतलाते हैं, हुआ यूं कि रेडियो फरमाईसी में विभिन्‍न स्‍थानों के श्रोताओं के नियमित नाम आने के चलते नियमित रेडियो श्रोताओं के बीच एक अंतरंग संबंध स्‍थापित हो चुका था और एक दूसरे के बीच पत्रोत्‍तर भी होने लगा था। इसी बीच रेडियो में रायपुर के एक नियमित श्रोता के पत्र को आकाशवाणी के 'आपके पत्र' कार्यक्रम के तहत पढ़ा गया, श्रोता ने अपने विवाह में उद्घोषक उद्घोषिका एवं श्रोता मित्रों को भी आमंत्रित किया था, वह रेडियो का बहुचर्चित श्रोता था निगम जी व उनके मित्र उससे मिलना चाहते थे। विवाह रायपुर में ही हो रही थी इस कारण पहुचना आसान था, नियत समय में निगम जी श्रोता मित्रों से चंदे कर गिफ्ट का पैकैट लिया और श्रोता मित्रों के साथ निकल पड़े रायपुर के लिए, विवाह किसी भवन में हो रहा था, जिसका विवाह हो रहा था उस श्रोता के नाम को पूछकर आश्‍वस्‍त होकर निगम जी की टीम रिशेप्‍शन स्‍टेज पर पहुची गिफ्ट दिया हाथ मिलाया, अपना परिचय दिया और नीचे उतर आये।
... पर निगम जी को कुछ अटपटा लग रहा था, यद्धपि वे अपने श्रोता मित्र 'वर' के चेहरे से परिचित नहीं थे किन्‍तु उन्‍हें लग रहा था कि रेडियो श्रोता संघ का परिचय देने के बावजूद मित्र 'वर' के चेहरे पर चमक नहीं थी, ऐसा तो नहीं कि यह हमारा श्रोता मित्र ना हो, स्‍टेज के नीचे उतर कर कुछ और पूछताछ की तो शक हकीकत में बदल गया, उस 'वर' का नाम तो वही था किन्‍तु वह रेडियो श्रोता नहीं था। इस भवन में दो शादियॉं हो रही थी दोनो 'वर' का नाम एक ही था इसी गलतफहमी के शिकार निगम जी और उनके मित्र हो गए थे, जेबखर्च के पैसे से गिफ्ट खरीदा गया था, वापसी के टिकट के पैसे के अतिरिक्‍त जेब में पैसे नहीं थे, दूसरा गिफ्ट कैसे खरीदें ... सभी मित्रों का उत्‍साह काफूर हो गया था, क्‍या करें सूझ ही नहीं रहा था ... निगम जी ने हिम्‍मत की, झिझकते हुए 'वर' के रिश्‍तेदार से अपनी समस्‍या बतलाई ... और उसने निगम जी व मित्रों के द्वारा दी गई गिफ्ट वापस की ... मित्रों के सांस में सांस आई ... फिर वे भवन के दूसरे सिरे पर हो रहे रेडियो श्रोता मित्र 'वर' के वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल हुए किन्‍तु उनका उत्‍साह जाता रहा।
अपने कालेज के दिनों के इस संस्‍मरण को हमसे साझा करने वाले अरूण कुमार निगम जी छत्‍तीसगढ़ी के जनकवि कोदूराम ‘दलित’ के ज्‍येष्‍ठ पुत्र हैं एवं भारतीय स्‍टैट बैंक में सेवारत हैं। लेखन इन्‍हें विरासत में प्राप्‍त हुआ है, किन्‍तु बैंक कार्यों में व्‍यस्‍तता के कारण आजकल लिख नहीं पाते हैं। जब से इन्‍होंनें हिन्‍दी ब्‍लॉग की दुनिया को निहारा है तब से पुन: इनका लेखक मन कुलाचें भरने लगा है। हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के जी.के.अवधिया जी, शरद कोकाश जी एवं शाय़र डॉ. संजय दानी जी इनके पूर्व परिचित हैं। मेरी निगम साहब से पहली मुलाकात फोन में हुई थी हुआ यह कि विगत वर्ष आदरणीय जनकवि कोदूराम ‘दलित’ जी की पुण्‍यतिथि पर स्‍थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापन में अरूण कुमार निगम जी का नाम व फोन नम्‍बर प्रकाशित था। मैं सहज उत्‍सुकतावश उन्‍हें जब फोन किया तब से उनसे सतत फोन संपर्क जारी है। अरूण जी वर्तमान में जबलपुर में पदस्‍थ है, इस कारण फोन से संपर्क विवशता है किन्‍तु हर वार्ता में आपस में मिलने की चाह भी रही। अरूण जी छुट्टियों में दुर्ग आते रहते हैं, पिछले दिनों अरूण जी दीपावली की छुट्टियां मनाने दुर्ग आये तब उनसे मिलने का अवसर आया और हम पहुच गये उनके आदित्‍य नगर स्थित घर में।
छत्‍तीसगढ़ के नवागढ़ में एक महाविद्यालय का नामकरण आदरणीय कोदूराम ‘दलित’ जी के नाम पर हुआ है वहां पिछले दिनों दलित जी की पुण्‍यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम के संबंध में स्‍थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार से यह भी ज्ञात हुआ कि अरूण जी की पत्‍नी श्रीमती सपना भी लेखन में रूचि रखती हैं। पिछले दिनों अरूण कुमार निगम जी दीपावली मनाने दुर्ग आये थे तब हमारी उनसे मुलाकात हुई, सहज सरल स्‍वभाव के अरूण-सपना निगम से दीपावली भेट में मिठाईयों की मिठास के साथ ही अरूण जी के दुर्ग में पढ़ाई के दौरन के संस्‍मरणों की रोचक चर्चा होती रही। उन दिनों रेडियो का बोलबाला था वे रेडियो के पक्‍के अनुरागी थे, रेडियो सीलोन व विविध भारती के दीवाने, ढेरों पोस्‍टकार्ड रेडियो स्‍टेशनों को भेजा करते। पत्रों में अपनी फरमाईस व कार्यक्रमों की समीक्षा भेजते, अरूण जी का अलग-अलग स्‍थानों से रेडियो में फरमाईस करने वाले एवं पत्र लिखने वालों से धीरे-धीरे एक अदृश्‍य संबंध स्‍थापित होने लगा था। अरूण जी ने अपने नगर के रेडियो प्रेमी लोगों को इकट्ठा कर एक श्रोता संघ का गठन कर लिया और वे इस श्रोता संघ के नाम से रेडियो में पत्र भेजते रहे एवं कार्यक्रमों का आनंद उठाते रहे बाद में इन्‍हें आकाशवाणी में कुछ कार्यक्रम प्रस्‍तुत करने का अवसर भी प्राप्‍त हुआ, उनके इन्‍हीं संस्‍मरणों मे से एक का उल्‍लेख मैंने इस पोस्‍ट के आरंभ में किया है
हमारे अनुरोध पर अरूण कुमार निगम जी ने जनकवि आदरणीय कोदूराम जी 'दलित' की रचनाओं को जनसुलभ कराने के लिये एक ब्‍लॉग 'सियानी गोठ' एवं अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए 'मितानी गोठ' के नाम से ब्‍लॉग बनाया है, जिसके पहली पोस्‍ट पर वे छत्‍तीसगढ़ी गीतों पर अपनी गहरी दृष्टि प्रस्‍तुत कर रहे हैं। भाभी श्री मूलत: छत्‍तीसगढ़ी भाषा में लिखती हैं उनकी रचनाओं को गुरतुर गोठ में पढ़ा जा सकता है, छत्‍तीसगढ़ी के साथ ही उन्‍होंनें हिन्‍दी में भी लिखने का प्रयास किया है, आज श्रीमती इंदिरा गांधी जी की जयंती पर श्रीमती सपना निगम जी नें एक कविता लिखी है आप भी देखें एवं इस ब्‍लॉगर जोड़ी को शुभकानायें देवें :-

प्रियदर्शिनी इंदिरा

19 नवम्बर 1917
शीतकाल थी रात उजियारी
इस दिन जन्म हुआ था आपका
गूंजी थी पहली किलकारी
माता कमला नेहरु , आपके
पिता जवाहरलाल
बेटी बनकर जनम लिया
दुनिया में किया उजाल
इलाहाबाद में बचपन बीता
प्राथमिक शिक्षा रही घर में
कॉलेज की पढाई विलायत में की
ऑक्सफोर्ड - लन्दन शहर में
सन 42 में विवाह हुआ था
2 बेटो की बनी माता
पर नियति को मंजूर नहीं था
घर-गृहस्थी से आपका नाता
पिता की प्रेरणा और प्रभाव से
राजनीति मिली विरासत में
सूचना प्रसारण मंत्री बनी थी
शास्त्री जी की हकूमत में
प्रधानमंत्री का पद मिला
सन 66 में पहली बार
कुशल प्रशासन किया आपने
दुश्मन को किया लाचार
मैत्री निभाई साम्यवाद से
पूंजीवाद से किया था किनारा
जन-जन के दिल पे राज किया
गरीबी हटाओ का दिया था नारा
नारी की तुम बनी प्रेरणा
देश का मान बढाया था
सारी दुनिया देखती रह गयी
तिरंगा जब फ़हराया था
चिर परिचित मुस्कान आपकी
महक उठी-वसुंधरा
इन्द्रलोक से आई थी जैसे
प्रियदर्शिनी-इंदिरा .......!!!

श्रीमती सपना निगम

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...