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डा: संजय दानी "कंसल" की गज़ल : माहे- रमज़ान

रोज़ा रखो या न रखो माहे- रमज़ान में,
दिल की बुराई तो तजो माहे -रमज़ान में।

ख़ुशियां ख़ूब मना ली जीवन में गर तो,
ग़ैरों के दुख को हरो माहे-रमज़ान में।

कि बड़ों को आगे झुकना वाजिब है पर,
सच के ख़ातिर न झुको माहे -रमज़ान में।

बेश डरो अपने माबूद से जीवन भर,
झूठ फ़रेब से भी डरो माहे-रमज़ान में।

हर ज़ीस्त ख़ुदा का है,हर ज़ीस्त ख़ुदा जब,
ज़ीस्ते ख़ुदा से न लड़ो माहे-रमज़ान में।

पाप की टोकरी तुम सदियों ढो चुके,तो बस,
नेकी की फ़स्ल रखो माहे-रमज़ान में।

उलजन,फ़िसलन,विचलन,संशय बंद भी हो ,
कि सबल किरदार करो माहे-रमज़ान में।

बीबी बच्चों से बड़ा जग में शय ना इक,
वापस घर लौट चलो माहे-रमज़ान में।

डॉ.संजय दानी "कंसल" दुर्ग

डॉ.संजय दानी "कंसल" पेशे से चिकित्‍सक हैं एवं उर्दू अद़ब से जुड़े हुए हैं। इंटरनेट की दुनियॉं में इनका एक ब्‍लॉग भी है। गज़ल एवं कहानियॉं लिखते हैं, वर्तमान में वे दुर्ग जिला हिन्‍दी साहित्‍य समिति के अध्‍यक्ष एवं विभिन्‍न साहित्यिक व अदबी संस्‍थाओं से जुड़े हुए हैं। डॉ.दानी जनअधिकारों एवं जनमुद्दों पर भी समय समय पर आवाज उठाते रहते हैं। अभी हाल ही में उन्‍होंनें भारतीय रेल में यात्रा के दौरान सेवा में कमी के लिए, रेलवे के विरूद्ध दायर किए गए मुकदमें में सफलता पाई है जिसकी सर्वत्र चर्चा हुई है। उक्‍त मुकदमें की संक्षिप्‍त जानकारी यहॉं है

फेसबुकिया कविता : उनकी हर एक कविता मेरी है

कवितायें भी लिखते हो मित्र
मुझे हौले से उसने पूछा
कवितायें ही लिखता हूँ मित्र
मैने सहजता से कहा.

भाव प्रवाह को
गद्य की शक्‍ल में ना लिखकर
एक के नीचे एक लिखते हुए
इतनी लिखी है कि
दस-बीस संग्रह आ जाए.

डायरी के पन्‍नों में
कुढ़ते शब्‍दों नें
हजारों बार मुझे आतुर होकर
फड़फड़ाते हुए कहा है
अब तो पक्‍के रंगों में
सतरंगे कलेवर में
मुझे ले आवो बाहर
पर मैं हूँ कि सुनता नहीं
शब्‍दों की .

शायद इसलिए कि
बरसों पहले मैंनें
विनोद कुमार शुक्‍ल से
एक अदृश्‍य अनुबंध कर लिया था
कि आप वही लिखोगे
जो भाव मेरे मानस में होंगें
और उससे भी पहले
मुक्तिबोध को भी मैंने
मना लिया था
मेरी कविताओं को कलमबद्ध करने.

इन दोनों नें मेरी कविताओं को
नई उंचाईयां दी
मेरी डायरी में दफ्न शब्‍दों को
उन तक पहुचाया
जिनके लिये वो लिखी गई थी
उनकी हर एक कविता मेरी है
क्‍या आप भी मानते हैं कि
उनकी सारी रचनांए आपकी है.

संजीव

ब्‍लॉगिया कविता : नोबेल की राह पर

ब्‍लॉ.ललित शर्मा के नये ब्‍लॉग
एनएच 43 के शेयर इशू होते ही
मेरे मन में दबी छिपी आकांक्षा
फिर हिलोरे मारने लगी...
बहुत दिनों से इच्‍छा थी कि
एक नया ब्‍लॉग बनांउ
जिसमें स्‍वरचित कवितायें पोस्‍ट करूं.

हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के टाप लिस्‍टों में
कविता ब्‍लॉगों की चढ़ती लोकप्रियता
मुझे बार-बार कविता लिखने को
प्रेरित करती रही है.
कविता ब्‍लॉगों के पोस्‍टों में पोस्टित
कवितायें मुझे मेरे सृजन को ललकारती हैं.
उनमें आये कमेंट मुझे चिढ़ाते हैं
और मेरा मन कहता है कि
तुम क्‍यों नहीं लिखते कवितायें ...

मेरा शाश्‍वत कहता है कि
मैं नहीं लिख पाउंगा कवितायें
क्‍योंकि पद्य गद्य की कसौटी है
जबकि मेरा मन कहता है कि क्‍यूं नहीं,
जो बात तुम लम्‍बे चौड़े गद्य में कहते हो
उसे थोड़ा छोटा करके चार-चार शब्‍दों में
एक के नीचे एक लिखते जाओ,
हो गई कविता.

'हो गई कविता ...'
पब्लिश करो उसे, पाठकों को पसंद आयेंगीं.
यकीं मानों, रविन्‍द्र नाथ, मुक्तिबोध सब
अब ब्‍लॉग से ही उदित होंगें
संपूर्ण विश्‍व की संवेदना ब्‍लॉग की कविताओं में 

समा जावेगी.

ब्‍लॉग पाठकों के पास समय कम होता है,
ब्‍लॉग पढ़ने के लिए
वे पढ़ते कम हैं
अपनी उपस्थिति ज्‍यादा दर्ज करवाते हैं
लम्‍बे-चौड़े गद्य के बजाए
कविताओं वाले पोस्‍टों में
एक नजर घुमाते ही
'सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति' दर्ज हो जाती है ...

तो कादम्बिनी फेम राजेन्‍द्र अवस्‍थी के चेले बनो
बंधन मुक्‍त समाज में 

लीव इन रिलेशन वाली 
नई कविता लिखो ...
टिप्‍पणिया पावो
और बड़े कवि बन जावो.


बारंबार मना रहा हूँ मन को
मुझे कवि मत बनाओ,
देखिये कब मानता है
मन और मानस के चलते द्वंद तक
कुछ राहत है
और मेरा एक अजन्‍मा ब्‍लाग 

आप लोगों के सामने आहत है.

ब्‍लॉग कवियों से क्षमा सहित - मानसून के आगमन पर - निर्मल हास्‍य फुहार

संजीव तिवारी

भाई, बिनायक सेन कौन है ?

पिछले कुछ महीनों से
लगातार
और पिछले दिनों से
बार बार
पूछ रहा हूँ मैं

छत्‍तीसगढ़ के गांवों से ,
गांवों में रहने वाले
रोग ग्रस्‍त, गरीब
ग्रामीणों से,
बस्‍तर के जंगलों से,
जंगल में रहने वाले
लंगोटी पहने आदिवासियों से
रायपुर के एमजी रोड से,
वहॉं के दुकानों में
बारह-सोलह घंटे
जिल्‍लत से काम करते
नौकरों से
और भी कई ऐसे लोगों से
जिनका सचमुच में सीधा वास्‍ता है
जल जंगल और जमीन से
कि भाई, बिनायक सेन कौन है ?

मुझे किसी नें भी
नहीं बतलाया.

हैरान हूँ मैं ,
पूरी दुनिया जानती है उन्‍हें
छत्‍तीसगढ़ के शोषित पीडि़त
जन-जन के दधीचि के रूप में

किन्‍तु दुख है ?
छत्‍तीसगढ़ का जन उसे पहचानता नहीं है

फिर क्‍यूं पिछले कुछ महीनों से
लगातार
और पिछले दिनों से
बार बार
पूछ रहा हूँ मैं
कि भाई, बिनायक सेन कौन है

कितने बिनायक हैं यहॉं
जिन्‍हें नहीं मिल पाया विदेशी अवार्ड
जिन्‍हें नहीं मिल पाया नामी वकील
जिन्‍हें नहीं मिल पाया विरोध का मुखर स्‍वर
जो आज भी न्‍याय के आश में बंद हैं
छत्‍तीसगढ़ व बस्‍तर के जेलों में.

मन, मत पूछ किसी से भी कुछ
क्‍योंकि कुछ लोग
कुछ भी कह देते हैं
और कुछ लोग
कुछ भी समझ लेते हैं
ऐसा पूछने से लोग मुझे
मानवता का दुश्‍मन समझ बैठेंगें.

संजीव तिवारी

लोकगीत 'बखरी के तूमा नार बरोबर मन झुमरे' हिन्‍दी अनुवाद और वीडियो

बखरी के तूमा नार बरोबर मन झुमरै
डोंगरी के पाके चार ले जा लाने दे बे.
मया के बोली भरोसा भारी रे
कहूँ दगा देबे राजा लगा लेहूँ फॉंसी.
बखरी के तूमा नार .....
हम तैं आघू जमाना पाछू रे
कोने पावे नहीं बांध ले मया म काहू रे.
डोंगरी के पाके चार ....
तोर मोर जोड़ी गढ़ लागे भगवान,
गोरी बइंहा म गोदना गोदाहूँ तेरा नाम.
बखरी के तूमा नार .....
मउहा के झरती कोवा के फरती
फागुन लगती राजा आ जाबे जल्‍दी.
बखरी के तूमा नार .....
डोंगरी के पाके चार ....

गीत सुने व वीडियो देखें युवराज भाई के यू ट्यूब चैनल से -



प्रिये ! घर की बगिया में लगे लौकी के बेल की तरह मन झूम रहा है. प्रियतम ! तुम जंगल से मेरे लिए पके हुए चार फल ला देना.
तुम्‍हारे प्रेम की बोली में मुझे बहुत भरोसा है, मेरे राजा अगर तुमने धोखा दिया तो मैं फॉंसी लगा लूंगी.
हम दोनों प्रेम के रास्‍ते पर बहुत आगे बढ़ चुके हैं, जमाना पीछे छूट चुका है. अब हमारे प्रेम को कोई रोक नहीं सकेगा और हम एक दूसरे के अतिरिक्‍त किसी दूसरे के प्रेम पाश में नहीं बंधेंगें.
प्रियतम भगवान नें हमारी तुम्‍हारी जोड़ी बनाई है. मैं अपनी गोरी बाहों में तुम्‍हारा नाम गुदवांउगी.
महुआ के फूल जब झरने लगे, और कोवा पकने लगे, तब फागुन के आते ही मेरे पियतम तुम शीघ्र आना.

(चार फल जिसकी चिरौंजी मेवे में उपयोग किया जाता है)

मईनखे बर मईनखे के स्वारथ खातिर !

छत्‍तीसगढ़ की वर्तमान परिस्थिति में नक्‍सली हिंसा और इससे निबटने की जुगत लगाते बयानबाज नेताओं की जुगाली ही मुख्‍य मुद्दा है. हर बड़े घटनाओं के बाद समाचार पत्र रंग जाते हैं और बयानबाजी, कमजोरियों, गलतियों का पिटारा खुल जाता है. दो चार दिन दिखावटी मातम मनाने के बाद सत्‍ता फिर उनींदी आंखों में बस्‍तर के विकास के स्‍वप्‍न देखने लगती है, जो सिर्फ स्‍वप्‍न है हकीकत से कोसों  दूर. नक्‍सली जमीनी हकीकत में फिर किसी सड़क को काटकर लैंडमाईन बिछा रहे होते हैं. आदिवासी और जवान जिन्‍दगी के सफर के लिए फिर किसी बस  का इंतजार करते हैं....  स्‍वारथ के गिद्धों की दावत पक्‍की है. नीचे दी गई मेरी छत्‍तीसगढ़ी कविता यद्धपि इस चिंतन से किंचित अलग है किन्‍तु सामयिक है, देखें - 
 
चिनहा

कईसे करलाई जथे मोर अंतस हा
बारूद के समरथ ले उडाय
चारो मुडा छरियाय
बोकरा के टूसा कस दिखत
मईनखे के लाश ला देख के
माछी भिनकत लाश के कूटा मन
चारो मुडा सकलाय
मईनखे के दुरगति ला देखत
मनखे मन ला कहिथे
झिन आव झिन आव
आज नही त काल तुहूं ला
मईनखे बर मईनखे के दुश्मनी के खतिर
बनाये बारूद के समरथ ले उडाई जाना हे

हाथ मलत अउ सिर धुनत
माछी कस भनकत
पुलिस घलो कहिथे
झिन आव झिन आव
अपराधी के पनही के चिनहा मेटर जाही

फेर में हा खडे खडे सोंचथौं
जउन हा अनियाव के फौजी
पनही तरी पिसाई गे हे
तेखर चिनहा ला कोन मेटार देथे ?
मईनखे बर मईनखे के स्वारथ खातिर !

- संजीव तिवारी
(१९९३ के बंबई बम कांड के दूसरे दिन दैनिक भास्कर के मुख्य पृष्ट पर प्रकाशित मेरी छत्‍तीसगढ़ी कविता)

कब तक ? कब तक होता रहेगा यह प्रयोग .. ?

चलती है बुलडोजर
कांपती है जिन्दगी
बिखरती है सासें
और ... बिरजू की रोटी
पिस जाती है धूल मे धूल.
नाक में गिर आये एनक को
फिर से अपने जगह में स्थापित करने के लिए मैं
अपनी उंगली बढाता हूं.
कंपनी का बुलडोजर
फिर मंगत की रोटी की ओर झपटता है.
रूकती है एक कंटेसा मुस्कुराता हूं मैं
अपनी टोपी उतार
सलाम करता हूं उसे, वह ...
मशीनी शक्ति से समतल हुए टूटती सासों को देखता है
उसे उपलब्धियॉं नजर आती है
बहुमंजिला नायाब इमारत के रूप में
वह आयाति‍त हम पर हावी भाषा में
मुझे बधाई देता है
और कंटेसा सूखे जुबान वालों की
भीड को चीरती हुई निकल जाती है .
मैं धूल से भर आये अपने बालों को झाडता हूं ...
मनहूस धूल.
आंखों में उड/पड आये कंकड को
रूमाल के कोने से
निकालने का भरसक प्रयत्नं करते हुए
फिर बुलडोजर चालक को इतनी सहजता से आदेश देता हूं
जैसे मैनें बुधारो के बढे पेट और
संतू के कटे हांथ को देखा ही नहीं है
जैसे मैं उस कंटेसा वाले का भाई हूँ/बेटा हूं
कब तक ? कब तक होता रहेगा यह प्रयोग .. ?
मेरे शक्ति का/मेरे साहस का
मेरे मानस का .. ?
कब तक सोता रहेगा मेरा मन
इन झूठे मायावी अइयासी के आवरणों को ओढ
आखिर कब तक जो कभी जागता था
भगत सुभाष आजाद बन कर .. ?

संजीव तिवारी

कविता : छ.ग.के पुलिस प्रमुख के नाम एक खत

विश्‍वरंजन !
नहीं जानना चाहते हम
कि तुम कवि हो,
नहीं आत्‍मसाध होते
भारी भरकम संवेदनाओं के गीत
साहित्‍य में आपकी उंचाई कितनी है
यह भी हम नहीं जानना चाहते
जानना चाहते हैं तो बस
एक सिपाही के रूप में आपकी उंचाई कितनी है


नहीं जानना चाहते हम
कि तुमने कितनी संवेदना बटोरी है
हमारे लिए, अपनी कविताओं में
हम जानना चाहते हैं कि तुमने
कितनी संवेदना बिखेरी है बस्‍तर में


नहीं जानना चाहते हम कि तुम्‍हारी
दर्जनों किताबें छप चुकी हैं, कविताओं की
हम जानना चाहते हैं कि तुमने कितने
सिपाहियों के दिलों पर
परित्राणाय साधुनाम् का ध्‍येय वाक्‍य
अंकित कराया है


हम नहीं जानना चाहते कि तुम
किस कुल या वंशज से हो
हम जानना चाहते हैं कि तुम
मानवता के परिवार में संविधान के सच्‍चे पालक हो


हम नहीं जानना चाहते कि तुम्‍हारे
गीत कितनों नें गाया है
हम नहीं जानना चाहते कि आप समकालीन
या पूर्वकालीन कविता के बडे हस्‍ताक्षर हो
हम जानना चाहते हैं कि तुमने
ऐसी कोई कविता लिखी है जिसे बस्‍तर के जनमन नें गाया है


हम यह भी नहीं जानना चाहते
कि तुम्‍हारा बोरिया बिस्‍तर पल भर में
यहां से जाने के लिए बंध जायेगा
हम जानना चाहते हैं कि यदि ऐसा हुआ भी
तो क्‍या तुम तब भी वैसा ही हमारे लिए सोंचोगे
जो बरसों पहले बस्‍तर में एसपी होते हुए सोंचा था


मेरे मित्र, मेरे हितैषी
हम सदैव तुम्‍हारे छत्र में पनाह चाहेंगें
और तुम्‍हें संविधान के सच्‍चे रक्षक
गांधी के पक्‍के अनुयायी
आदिवासियों की रक्षा में आक्रामक
अविचल सिपाही के रूप में
तने खडे, देखना चाहेंगें
विश्‍वरंजन !
हम तुम्‍हें एक कवि के रूप में नहीं
एक सिपाही के रूप में ही अपनाना चाहेंगें


(आदरणीय श्री विश्‍वरंजन जी, शव्‍दों में संबोधन की गरिमा में हुई भावनागत त्रुटी पर क्षमा करेंगें, यह नितांत रूप से मेरे दिल की बात है हो सकता है लोग इससे सहमत न हों)


संजीव तिवारी

अट्ठन्‍नी चवन्नी तैं गिनत रहिबे गोई, एड सेंस के पईसा नई मिलै फटा फट

कोहा पथरा झन मारबे रे टूरा

मोर बारी के आमा ह फरे लटा लट ।


गरमी के भभका म जम्‍मो सागे नंदा गे

आमा अथान संग, बासी तिरो सटा सट ।


हमर भाखा के मेछा टेंवा गे, अब

छत्‍तीसगढी म चेटिंग तुम करौ फटा फट ।


अक्‍कल के पइदल मैं निकल गेंव सडक म

तिपै भोंमरा रे तरूआ जरै चटा चट ।


अट्ठन्‍नी चवन्‍नी तैं गिनत रहिबे गोई

एड सेंस के पईसा नई मिलै फटा फट ।


पेट बिकाली के चिंता म संगी

बिलाग लिखई तो बंद होही कटा कट ।


पागा बांधे बांधे टूरा मन निंगे, मूडी ढांके ढांके टूरी ।

कईसे मैं लिखौं नवां पोस्‍ट गोरी, इही हे मोर मजबूरी ।।


(टोटल ठट्ठा है, लईका मन गर्मी के छुट्टी में धर में सकलाया है, ताश में रूपिया पइसा अउ चींपो गदही खेल रहा है, संगे संग रंग रंग के गाना बना रहा है, मोला कम्पोटर में बईठे देख कर । हा हा हा ..............)


गिरधर जी.बरनवा के हाइकू

कथ्‍य और शिल्‍प की दृष्टि से हाइकू गागर में सागर भरने की काव्‍य विधा है । हाइकू पांच, सात, पांच अर्थात सत्रह सत्रह अनुशासन में निबद्ध विलक्षण विधा है । जापान में बौद्धमत में आये विसंगतियों को उजागर कर दुरूस्‍त करने हेतु सूत्रों में, कम शव्‍दों में अपनी बात कहने के लिए इस विधा का उद्भव हुआ । हाइकू की विषयवस्‍तु है प्रकृति । सेनरेय की तकनीक (पांच, सात, पांच अर्थात सत्रह अक्षरानुशासन) ही हाइकू के विकास की पृष्‍टभूमि मानी जा सकती है । आज दुनिया में तमाम मुल्‍कों में विभिन्‍न भाषाओं में हाइकू लेखन जारी है । हिन्‍दी में अज्ञेय, डॉ.सुधा गुप्‍ता, डॉ.महावीर, शंभूशरण द्विवेदी, डॉ.भगवत शरण अग्रवाल, रामनिवास पंथी, मदन मोहन उपेन्‍द्र, उर्मिला कौल, सूर्य देव पराग, राजेन्‍द्र परदेशी, कु.नीलिमा शर्मा, सूर्यदेव पाठक आदि सशक्‍त हस्‍ताक्षर हैं । फिलहाल मनुष्‍य भी तो प्रकृति का अहम हिस्‍सा है उसके हाव-भाव, क्रिया कलाप अलग नहीं हैं और इसीलिये सेनरेय और हाइकू की स्‍पष्‍ट लकीर खींची नहीं जा सकती हो सकता है भावी लेखनी में दोनो अलग अलग रूप में साहित्‍य में अपना स्‍थान बना लें । इस पर मैं खुलकर बहस करना चाहता हूं आप यदि इस विधा पर मुझसे चर्चा करना चाहते हैं तो मुझसे मेरे मोबाईल नम्‍बर पर संपर्क कर सकते हैं क्‍योंकि इस विधा के विकास के लिए बहस की आवश्‍यकता है आप मेरे चंद हाइकू पढे और पसंद आये तो आर्शिवाद देवें -


दाढ में खूंन
जनतंत्र में घुन
नेता के गुन ।

दिल दीवाना
ढाई आखर प्रेम
चल मस्तापना ।

जला रावण
साल में एक दिन
फिर अमर ।

आदमी तो है
आदमीयत नहीं
ढूढे हाइकू ।

खोना ही पाना
देखिये खोकर
अपने आप ।

बिकी कलायें
बिग-बी बेंचे तेल
पूंजी का खेल ।

रजनीगंधा
लुटी अंधियारे में
सुबह रोई ।

चंपा-चमेली
लिपटी वृक्ष तने
खुश नसीब ।

ओ रातरानी
महकाती रातभर
भोर उदास ।

ये ढूंठ पेड
फल, पुष्पे न छाया
ये अवधूत ।

जीवन परिचय

पूरा नाम : अनवर गिरधर सिंह बरनवा
लेखन नाम : गिरधर जी.बरनवा
जन्‍म तिथि : 9 अप्रैल, 1948
जन्‍म स्‍थान : कस्‍तूरी, जिला शहडोल, म.प्र.
शिक्षा : एम.ए. (राजनीतिशास्‍त्र, इतिहास), बी.एड. सागर विश्‍वविद्यालय
लेखन : प्राथमिक विद्यालय के मायूस विद्यार्थी से लेकर अबतक
विधायें : गीत, जनगीत, गजल, मुक्‍तक, दोहे, शेर, हाइकू,नुक्‍कड नाटक, ललित निबंध, लघु कथा, क्षणिकायें समीक्षा
आलोचना : विभिन्‍न रचनाओं व कृतियों की समीक्षायें प्रकाशित । रंगकर्म - निर्देशन : छत्‍तीसगढी फिल्‍म ‘शहीद वीर नारायण सिंह’, जनगीत, लोकगीत, नाटक, नुक्‍कड नाटक अभिनय : छत्‍तीसगढी फिल्‍मों, नाटकों एवं लोककला प्रदर्शन कार्यक्रमों में
प्रकाशन : देश के विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का अनवरत प्रकाशन, देश भर में कवि सम्‍मेलनों में शिरकत
संस्‍थागत : जनवादी लेखक संघ का संस्‍थापक सदस्‍य, छत्‍तीसगढ राज्‍य समिति का सदस्‍य
शीध्र प्रकाश्‍य कृतियां – प्रेरण तुझे सलाम (जनगीत संग्रह), मधुमय है यह प्रीत की बानी (गजल संग्रह), ढूंढो वही पानी (आधुनिक कविता संग्रह), ले मशाल चले चलो ... (मुक्‍तक संग्रह), हाइकू मंगल (हाइकू)
संपर्क : फ्लैट नं. 4, रेड्डी बाडा, नवदुर्गा चौक, पुजारी स्‍कूल के पीछे, रविनगर, राजातालाब, रायपुर (छ.ग.) मोबाईल : 09425517501


एकता भेष
अनेकता में बसा
भारत देश ।

बोल री बोल
न सह जुल्म मौन
कहती मैना ।

पूजते शिला
हरि मिले पर्वत
पूजो कबीर ।

चिढाता मुंह
कैकटस के फूल
रेस्त्रां के बीच ।

दीप शिखा में
जल जायेगा शलभ
दीवाना पन ।

आम बौराया
बागों कूजे कोकिल
बसंत आया ।

मरा गरीब
दंगों में हरबार है
न अजीब ।

श्राद्ध दिवस
साल में एक दिन
बुलाते काक ।

कुत्ते का कद
आदमियों से भी उंचा
बुश की दृष्टि ।

गोली जाने
न राम-रहीम भक्त
चलती जब ।

बहती हवा
भूमें कंचन बौर
फागुन आया ।

फूलों के कान
कह आई तितली
भ्रमर आये ।

पीली सरसों
ले बासंती चूनर
ली अंगडाई ।

चुगती दाना
समझाये गौरया
माँ की ममता ।

उतारा पैंट
पहचान के बाद
मार दी गोली ।

लोक मंगल
निस्रित अविरल
सृजन जल ।

चले आंधियॉं
आशा के दीप जले
बुझ न पाये ।

दर्द दिल में
लेकर ‘गिरधर’
लिखे हाइकू ।

भर उजास
फूटे रवि किरणें
लघु प्रयास ।

गिरधर जी.बरनवा

आज चाँद बहुत उदास है


छटते ही नहीं बादल
किरणों को देते नहीं रास्ता
उमड़ घुमड़ कर
गरज बरस कर
सोख लेते ध्वनि सारी

बजती ही नहीं पायल
स्मृति का देती नहीं वास्ता
सिसक झिझक कर
कसक तड़फ कर
रोक लेती चीख सारी

दिल ही नहीं कायल
खुशबू ऐसी फैली वातायन में
निरख परख कर
बहक महक कर
टोक देती रीत सारी

दिखता ही नहीं काजल
चाँदनी ऐसी बिखरी उपवन में
घूम घूम कर
चूम चूम कर
रो लेती नींद सारी

तुम नहीं हो पास
आज चाँद बहुत उदास है

- अशोक सिंघई -

मॉं : एक कविता



मॉं तुम्‍हारी गोद, तुम्‍हारा ऑंचल
कितना सुकून देता था
मेरा जिद, रोना, वह दुलार, वह क्रोध
वह निश्‍छल प्रेम, तुम पर वह सर्वस्‍व अधिकार,
मेरा फूट फूट कर तेरे आंचल को पकडकर रोना ।


आज जब मैं भी एक पिता हूँ
तुम्‍हारी अंतिम सत्‍य का सामना करते हुए
मेरे मानस में वही
दायित्‍वहीन बचपन कौंध रहे हैं
जब तुम मुझे छोडकर चली गई थी
और मैं पहली बार तुम्‍हें न पाके
फूट फूट कर रोया था
आज वही आंसु फूट पडते हैं
रूकते ही नहीं क्‍यों चली गई मां
मुझे छोडकर
तेरे न होने का अर्थ दु:सह है ।



मैं जीना चाहता हूँ उसी तरह
जिस तरह से मेरा बचपन था
तुम थी और तुम्‍हारा प्रेम था
सबसे सुरक्षित स्‍थान
तेरी गोद ।



तेरी बातें, वो लोरी
वो कहानी सुनाते हुए मुझे सुलाना
सब मुझे याद आ रहे हैं
तेरी नश्‍वर काया के साथ साथ
पंडित के उच्‍चारित गीता की पंक्तियां
मुझे लोरी सी लग रही है
सो जाना चाहता हूँ मॉं
तुम्‍हारी गोद में
अनंत के आगोश में ।


संजीव तिवारी
(13.12.2001)

दिल्‍ली सुख से सोई है नरम रजाई में : दिनकर



मेरे पास उपलव्‍ध 1967 की एक कविता संग्रह से मैं दिनकर जी की यह कविता उपलव्‍ध करा रहा हूं, इसके पन्‍ने फटे हुए थे इसलिए कविता जो अंश अस्‍पष्‍ट थे उसे मैं यहां प्रस्‍तुत नहीं कर पाया । यह कविता तत्‍कालीन परिस्थिति में लिखा गया था, दिल्‍ली वालों से क्षमा सहित प्रस्‍तुत है :-

भारत का यह रेशमी नगर – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

XXX XXX XXX

दिल्‍ली फूलों में बसी, ओस कणों से भींगी,
दिल्‍ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है ।
प्रेमिका कंठ में पडी मालती की माला,
दिल्‍ली सपनो की सेज मधुर रस-भीनी है ।


XXX XXX XXX

रेशम के कोमल तार, क्रांतियों के धागे,
हैं बंधे उन्‍हीं से अंग यहां आजादी के ।
दिल्‍ली वाले गा रहे बैठ निश्‍चेत मगन,
रेशमी महल में गीत खुरदुरी खादी के ।

XXX XXX XXX


भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला,
भारत अब भी व्‍याकुल विपत्ति के घेरे में ।
दिल्‍ली में तो है खूब ज्‍योति की चहल पहल
पर, भटक रहा है सारा देश अंधेरे में ।


रेशमी कलम से भाग्‍य – लेख लिखने वालों,
तुम भी अभाव से कभी ग्रस्‍त हो रोये हो ?
बीमार किसी बच्‍चे की दवा जुटाने में,
तुम भी क्‍या घर भर पेट बांध कर सोये हो ?

असहाय किसानों की किस्‍मत को खेतों में,
क्‍या अनायास जल में बह जाते देखा है ?
क्‍या खायेंगें यह सोंच निराशा से पागल,
बेचारों को चीख रह जाते देखा है ?

देखा है ग्रामों की अनेक रेभाओं को,
जिनकी आभा पर धूल अभी तक छायी है ?
रेशमी देह पर जिन अभागिनों की अब तक,
रेशम क्‍या साडी सही नहीं चढ पायी है ।


पर, तुम नगरों के लाल, अमीरी के पुतले,
क्‍यों व्‍यथा भगय-हीन की मन में लाओगे ?
जलता हो सारा देश, किन्‍तु होकर अधीर,
तुम दौड दौड कर क्‍यों आग बुझाओगे ।

चिंता हो भी क्‍यों तुम्‍हें गांव के जलने से ?
दिल्‍ली में तो रोटिंयां नहीं कम होती है ।
धुलता न अश्रु-बूंदों से आंखें का काजल,
गालों पर की धूलियां नहीं नम होती है ।

जलते हैं तो ये गांव देश के जला करें,
आराम नई दिल्‍ली अपना कब छोडेगी ?

XXX XXX XXX

चल रहे ग्राम-कुंजों में पछिया के झकोर,
दिल्‍ली, लेकिन, ले रही लहर पुरवाई में ।
है विकल देश सारा अभाव के तापों से,
दिल्‍ली सुख से सोई है नरम रजाई में ।

XXX XXX XXX

प्रथम प्रेम पत्र

मैं तरस रहा था
तू देखे मेरी तरफ
और मुस्‍कुरा दे, हौले से
मैं तेरी इच्‍छा पे नही जाता
कि, तुमने क्‍यू मुस्‍कुराया है ?
पर, इतना जरूर जानता हूं
कि, तुमने मुस्‍कुराया तो है ।




तेरी ये शोख अदा,
इठलाना बुत सा खडे होना,
दांतो में उंगली चबाना
नजरों की चपलता मैं हैरान हूं,
ये मामूली है या गैर मामूली ?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
तेरी आंखों में कुछ तो है
आंखों के सिवा ।

आकांक्षाओं का विशाल समुद्र
किनारों से अठखेलियां करता हुआ
या मैं,
तेरी ओर ताकता हुआ ?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
तुमने मुझे देखा है ।

पहली कविता नही है यह
ऐसे कई लिख चुका हूं,
तुम्‍हारे खातिर
पेश है एक पुष्‍प मेरी बगिया का
तुम्‍हे ये पसंद आया,
या नही आया?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
तुम किसी से मेरा शिकायत नही करोगी ।

कुछ लिखने की तमन्‍ना हो तो ठीक
नही तो सिर्फ अपना पता लिखा
खाली लिफाफा ही सहीं
पत्र का इंतजार रहेगा मुझे
तुम प्रेषक बनोगी या नहीं ?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
मैने ये तुम्‍हारे लिए ही लिखा है ।

संजीव तिवारी




कुछ हल्‍का फुल्‍का :-
मैनें यह प्रेम पत्र 1995 में मेरी एक संभावित प्रेमिका को लिखा था। संभावित इसलिये क्‍योंकि उन दिनों नौकरी के आवेदन बनाने के साथ साथ यह प्रयास भी एकाध दो जगह कर चुका था। तो हां उस संभावित प्रेमिका को बहुत हिम्‍मत कर के इसे दिया था। उसके एक घंटे बाद ही उसके भाई नें मुझे चौंक में पकडा और अपने घर ले गया, हम घबराते हुए उसके घर गये कि अब तो पडेगें डंडे। वहां मेरी भावी प्रेमिका के पिता नें मामला सम्‍हाला, मेरा नाम गांव पता सब नोट कर डाला। सकपकाते हुए हम जल्‍दी से जल्‍दी सलट लिये, जान बची लाखो पाये।

इस वाकये के एक महीने बाद ही हमारी उक्‍त भावी प्रेमिका, पत्‍नी बन गयी। हमें न तो पत्र का जवाब मिला ना ही, कुछ और पल, हमने ‘एज ए लवर’ गुजार सके, ना ही लव को एन्‍ज्‍वाय कर पाये। अब लोग हमसे पूछते हैं, भईया आपने तो लव मैरिज किया है ना.. तो हम अपसेट तो हो ही जाते है। आज श्रीमती के निजी सामानों के बक्‍से से यह पत्र मिला तो आंखों में चमक उभर आई . . . सचमुच हमने भी प्‍यार किया है।




हजार बार देखो, देखने की चीज है (ब्‍लागर्स पैरोडी टाईप गद्य)

कल भारी बारिस के कारण रायपुर में कोई फ्लाईट नही आ पाई जमीन से आसमान तक पानी ही पानी, हमारे संस्‍था प्रमुख को आज शाम को दुबई जाना था । हडबडाने लगे क्‍या करें, नागपुर फोन किये पता चला वहां भी देर सबेर की नौबत है समय चूके जा रहा था कल भी यही हाल रहा तो ... चक्रधर की चकल्लस छोडो। हमने अपनी अभिव्यक्ति प्रस्‍तुत की बोईंग तो अइबेच नई करी अब लालू भईया के बडे बोईंग में जाये बर पडी मुम्‍बई से कल उडना है आपको कल का इंतजार करते यहीं बैठे रहेगें तो नही न जा पायेंगें दुबई ।



सो हम दौडे सांसद महोदय से रेलगाड़ी के बडका साहब को फोन करवा के टेसन की ओर टिकस का बंदोबस्‍त करने । टिकट का इंतजाम करने के बाद हमारे पास कुछ समय था हम इंतजार करने लगे बॉस का । महाशक्ति की भांति चारो तरफ नजर दौडाये कहीं कोई सुन्‍दरी मिल जाय और आंख तर कर ली जाय या कोई जोगलिखी हो कोई पहचान का मिल जाये । इस बुढापे भरी जवानी में अब आंख और अंतर्मन का ही तो सहारा रह गया है । देखा सामने एक लगभग 40-45 वर्ष की जवान कन्‍या अपने साजो सामान के साथ खडी थी साथ में उसका सामान था अल्प विराम हूर के साथ लंगूर की शक्‍ल में उसका पति गले में पट्टा बंधे कूकूर की भांति खडा था आंखों में मोटी ग्‍लास का चश्‍मा लगाये इधर उधर कुछ सूंघता हुआ शायद कुली ढूंढ रहा था । हमने अपनी नजर दूसरी ओर कर ली लगा डर कि हमरी सूरत देख के हमें ही ऐ कुली कह कर ना बुला ले ।



उसे आश्‍वस्‍थ होकर एक जगह खडे देखा तो सोंचे ये जोगलिखी हमारे लिये ही है पहले चोर निगाहों से सुन्‍दरी को फिर देखा सुन्‍दरी नें 40-45 वर्ष की ढलती उम्र को पीले टी शर्ट एवं नीले फुल टाईट जीन्‍स से जकड रखा था । गठे ठसे शरीर की कहानी स्‍पष्‍ट थी कि उसकी कोई सृजन-गाथा नहीं है । चेहरे पर विशेष रूप से बंजर भूमि सुधार के सारे परयोग अपनाये गये थे और धान गेहूं बोना छोडकर जैसे आजकल फूलों की खेती की जा रही है वैसे ही अंग्रेजी खादों से गुलाबों की खेती की गयी थी ।



मन बिना चोर नजर से उस ड्रीम सुन्‍दरी को देखना चाहा नजरें सीधे उस पर । एक क्षण में उसने अपने राजीव नयन में भांप लिया कि हम उसकी सुन्‍दरता के मुरीद हैं । उसने अनमने से अंजान भाव प्रदर्शित करते हुए पर्स से आईना निकाला, अपनी सूरत देखने लगी, मानो हमें अनुमति दे रही हो कि देखो । उसकी मानसिक हलचल को मैं स्‍पष्‍ट पढ रहा था । सौंदर्य का प्रदर्शन होना ही चाहिए हमारा मन उडन तश्तरी …. बन उसके आस पास मंडराने लगा । हमारे दादा जी कहा करते थे जिसमें से कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात हैं पर एक याद है - आप रूप भोजन, पर रूप श्रृंगार । जो रूप उसने धरा है वो दुनिया को दिखाने के लिए ही था, सौभाग्‍य से वहां हम एकोऽहम् ही थे और कोई नहीं था, दो चार बूढे निठल्ला चिन्तन कर रहे थे, सो फुरसतिया देखने लगे, प्रेम अनुभूतियाँ जाग उठी । कस्‍बा, बजार, मोहल्ला में यदि वो दिख जाती तो जवानों का कांव कांव हो जाता पर यहां कोई भी बजार पर अवैध अतिक्रमण नहीं कर सकता था ।



हमने अपनी आंखें व्‍यवस्थित की देखने लगे जी भर के, मन पखेरू फ़िर उड़ चला छायावादी कवि की भांति क्‍योंकि हमें हिन्द-युग्म में सौंदर्य कविता जो भेजनी है क्या करूँ मुझे लिखना नहीं आता… इसीलिए सौंदर्य बोध कर रहा था रचनाकार को तूलिका पकडा कर ।


अचानक उसके पति को लगा कि हम उसकी पत्‍नी को ताक रहे हैं । बेचैन सी निगाहों से हमें अगिनखोर सा देखा । नजरें बिनती कर रही थी, भाई साहब प्‍लीज ऐसा मत करो उसके अंर्तध्‍वनि को सुनकर हम भी अपने लिंकित मन व निगाह को सहजता से दूसरी तरफ कर लिये ऐसा प्रदर्शित करते हुए कि हम कोई पंगेबाज नही हैं कुली खोज रहे हैं और पास ही रखे दूसरे की लगेज के पास जा कर खडे हो गये ।



देखा एक कुआरा सजीला नौजवान पास में ताजा समाचार पत्र लेकर आ गया आवारा बंजारा की भांति कहने लगा हम भी हैं लाइन में हम सौंदर्य के पुजारी हैं । हमने बातों बातों में उसे समझाते हुए कहा बेटा मैं एक अकेला इस शहर मे.. साहित्‍यकार हूं हिन्‍दी व्‍लाग वाला चिट्ठाकार हूं, मसिजीवी हूं पहले मैं आया हूं मुझे सौंदर्य की अनुभूति है । पास ही एक राम भक्‍त यानी हनुमान रेलवे पुलिस खडा था हम लोगों का वाद-संवाद सुन रहा था । जोर से डंडा पटका और बोला -



तुम साले अधकचरे लोग समय नष्‍ट करने का एक भ्रस्‍ट साधन हो अभी हमारे छत्‍तीसगढ में हिन्‍दी ब्‍लाग लिखने वाले भाई जयप्रकाश मानस ही सृजन शिल्पी हैं तीसरा कोई नहीं है उन्‍ही को मालूम है साहित्‍य और सौंदर्य, चलो भागो यहां से बेफालतू में भीड बढा रहे हो तुम लोगों का मन निर्मल आनंद नहीं है । हमने पिद्दी सिपाही से बतंगड़ करना और ज्ञानदत्‍त पाण्‍डेय जी का धौंस देना उचित नही समझा, दिल में आह भरते नौ दो ग्यारह हो गये मन में ढंग से ना देख पाने की वेदना व्‍याप्‍त थी ।

नर नारी . . समाधि-सुख के . . शिखर पर : उर्वशी


महाकवि रामधारी सिंह दिनकर की उर्वशी के कुछ अंश कवि चिट्ठाकारों के मन में जोश व उत्साह लाने के उद्देश्य से प्रस्तुत कर रहा हूं, मैं ये नहीं जानता कि इससे कापीराईट कानून का उलंघन होता है कि नहीं किन्तु उर्वशी को बार बार पढने का मन होता है, नेट पर यह उपलब्ध नही है अस्तु :-

नर के वश की बात, देवता बने कि नर रह जाये
रूके गंध पर या बढकर फूलों को गले लगावे ।


सहधर्मिणी गेह में आती कुल पोषण करने को,
पति को नही नित्य नूतन मादकता से भरने को ।
किन्तु पुरूष चाहता भींगना मधु के नये कणों से
नित्य चूमना एक पुष्प अभिसिंचित ओसकणों से ।


हाय मरण तक जीकर मुझको हालाहल पीना है
जाने इस गणिका का मैनें कब क्या सुख छीन लिया था
जिसके कारण भ्रमा हमारे महाराज की मति को,
छीन ले गयी अधम पापिनी मुझसे मेरे पति को ।


ये प्रवंचिकाएं जाने, क्यों तरस नहीं खाती हैं,
निज विनोद के हित कुल वामाओं को तडफाती हैं ।

जाल फेंकती फिरती अपने रूप और यौवन को,
हंसी हंसी में करती हैं आखेट नरों के मन का ।

किन्तु बाण इन व्याधिनियों के किसे कष्ट देते हैं,
पुरूषों को दे मोद, प्राण वधुओं के लेते हैं ।

इसमें क्या आश्चर्य प्रीति जब प्रथम प्रथम जगती है,
दुर्लभ स्वप्न समान रम्य नारी नर को लगती है ।

कौन कहे यह प्रेम हृदय की बहुत बडी उलझन है
जो अलभ्य, जो दूर उसी को अधिक चाहता मन है ।

जब तक यह रस दृष्टि, तभी तक रसोद्वेग जीवन में
आलिंगन में पुलक और सिहरन सजीव चुंबन में ।
विरस दृष्टि जब हुई स्वाद चुंबन का खो जाता है
दारू स्पर्श वत सारहीन आलिंगन हो जाता है ।

पर नर के मन को सदैव वश में रखना दुष्कर है
फूलों से यह मही पूर्ण है और चपल मधुकर है ।
जितना ही हो जलधि रत्न पूरित, विक्रांत अगम है
उसकी वाडाग्नि उतनी ही अविश्रान्त, दुर्गम है ।
बंधन को मानते वही जो नद नाले सोते हैं
किन्तु महानद तो, स्वभाव से ही, प्रचण्ड होते हैं ।


चूमता हूं दूब को, जल को, प्रसूनों, पल्लवों को,
वल्लरी को बांह भर उर से लगाता हूं,
बालकों सा मैं तुम्हारे वक्ष में मुंह को छिपाकर,
नींद की निस्तब्धता में डूब जाता हूं ।

सिंधु सा उद्दाम, अपरंपार मेरा बल कहां है
गूंजता जिस शक्ति का सर्वत्र जयजयकार
उस अटल संकल्प का संबल कहां है
यह शिला सा वक्ष, ये चट्टान सी मेरी भुजाएं
सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल
मेरे प्राणों का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है ।
सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं
कांपता है कुंडली मारे समय का व्याल
मेरी बाहों में मारूत, गरूड, गजराज का बल है ।
मर्त्य मानव की विजय का सूर्य हूं मैं
उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूं
बादलों के शीश पर स्यंदन चलाता हूं
पर न जाने क्या बात है !

इंद्र का आयुध पुरूष जो झेल सकता है
सिंह से बाहें मिला कर खेल सकता है
फूल के आगे वही असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुए निरूपाय हो जाता
विध्द हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से ।

नारी जब देखती पुरूष को इच्छा भरे नयन से
नही जगाती है केवल उद्वेलन, अनल रूधिर में
मन में किसी कांन्त कवि को भी जन्म दिया करती है ।


कसे रहो, बस इसी भांति उरपीडक आंलिंगन से
और जलाते रहो अधर पुट को कठोर चुम्बन से ।

जब भी तन की परिधि पार कर मन के उच्च निलय में
नर नारी मिलते समाधि सुख के निश्चेतक शिखर पर,
तब प्रहर्ष की अति से यों ही प्रकृति कांप उठती है
और फूल यों ही प्रसन्न होकर हंसने लगते हैं ।


जिसके भी भीतर पवित्रता जीवित है शिशुता की
उस अदोष नर के हांथों में कोई मैल नहीं है ।

शुभे ! त्रिया का जन्म ग्रहण करने में बडा सुयश है
चंद्राहत कर विजय प्राप्त कर लेना वीर नरों का
बडी शक्ति है शुचिस्मिते ! वीरता इसे कहता हूं ।

कितनी सह यातना पालती त्रिया भविष्य जगत का
कह सकता है कौन पूर्ण महिमा इस तपश्चरण की ।

मेरी फटी पुरानी डायरी के शेष पन्नों से मेरी प्रकाशित छत्तीसगढी कवितायें

दाई मोला सुरता आथे - संजीव तिवारी

खदर के छांधी
अउ झिपरा के ओधा म
तिंवरा के दार संग गुरमटिया चाउंर के भात
जेमा सुकसी चिंगरी के साग
अउ उहू म नून मिरचा कम डारे हस कहि के
तोर संग लडई
दाई मोला सुरता आथे

इंहां रहत हंव रोजी बर
कभू बापो पुरखा नई देखे रेहेंव
तइसनेहे बिल्डिगं के तिपत कुरिया म
गिलगोटहा भात के बोरे तहां बासी
अउ उहू म सुख्खा मिरचा के भुरका संग
तिबासी खात
रात कन भभकत कुरिया म
पसीना संग आंसू ह मिल के
तिबासी म जब टप ले टपकथे
दाई मोला सुरता आथे

आघू बाघू रेंगत मोर उदंत भंईसा
पाडू म पटकू भर पहिरे
भंईसा कस तने देंह के मोर ददा
जेखर खांध म नांगर
अउ ओखर पाछू म मोर पढई बर गहना धरे
लहलहावत हमर खेत के पीक
दाई मोला सुरता आथे

मोर घर के ओदरत भिथिया
ददा के माखुर बर पईसा मंगई
गौंटिया घर के देहे
तोर चिरहा अंडी के लुगरा
अउ उहु म तोर सूंता पहुची पहिरे के सौंउख
दाई मोला सुरता आथे

होत बिहिनिया रांध खा के
सेठ के दुकान म बहिरी मारथौं
त सेठ के गोड के धुर्रा संग
मोर जम्मों पढई ह उडा जथे
सं कर बे ! ओ कर बे !
इंहां जा बे ! उहां जा बे !
अउ उहू म सेठ अपन चाय पिये
जूठा कप ल जब धोवाथे
दाई मोला सुरता आथे
अउ सुते के टेम कथरी ह आंसू म फिल जाथे
कि येखरे खातिर मोला करजा लेके पढाये रेहेव

(१९९० किसी स्थानीय पत्र के अभरते स्वर नामक स्तंभ में प्रकाशित)


चिनहा - संजीव तिवारी

कईसे करलाई जथे मोर अंतस हा
बारूद के समरथ ले उडाय
चारो मुडा छरियाय
बोकरा के टूसा कस दिखत
मईनखे के लाश ला देख के
माछी भिनकत लाश के कूटा मन
चारो मुडा सकलाय
मईनखे के दुरगति ला देखत
मनखे मन ला कहिथे
झिन आव झिन आव
आज नही त काल तुहूं ला
मईनखे बर मईनखे के दुश्मनी के खतिर
बनाये बारूद के समरथ ले उडाई जाना हे

हाथ मलत अउ सिर धुनत
माछी कस भनकत
पुलिस घलो कहिथे
झिन आव झिन आव
अपराधी के पनही के चिनहा मेटर जाही

फेर में हा खडे खडे सोंचथौं
जउन हा अनियाव के फौजी
पनही तरी पिसाई गे हे
तेखर चिनहा ला कोन मेटार देथे ?
मईनखे बर मईनखे के स्वारथ खातिर

(१९९३ के बंबई बम कांड के दूसरे दिन दैनिक भास्कर के मुख्य पृष्ट पर प्रकाशित)


सुरहुत्ती - संजीव तिवारी

कहां ले बरही मनटोरा
तोर तेल बिन दिया ह
सुरहुत्ती के दिया ह दाउ मन बर ये
मोर करम म त सिरिफ
मोर मेहनत के चूहे तेल
अउ महाजन के कर्जा देहे दाना के बाती हे
जउन हा पेट के करिया रात ला
बुग बुग बर के अजोरत हे
अउ उही अंजोर म
मोर लछमी बूढी दाई
चूरी पहूंचा पहिरे
दुवारी दुवारी
कांसा के पुरखौती थारी मा
दीया सजाये
कभू ढाबा त कभू कोठी
त कभू कोठार म
दीया बांटत दिखत हे

(दीपावली विशेषांक विवरण उपलब्ध नही में प्रकाशित)

लेबल

संजीव तिवारी की कलम घसीटी समसामयिक लेख अतिथि कलम जीवन परिचय छत्तीसगढ की सांस्कृतिक विरासत - मेरी नजरों में पुस्तकें-पत्रिकायें छत्तीसगढ़ी शब्द Chhattisgarhi Phrase Chhattisgarhi Word विनोद साव कहानी पंकज अवधिया सुनील कुमार आस्‍था परम्‍परा विश्‍वास अंध विश्‍वास गीत-गजल-कविता Bastar Naxal समसामयिक अश्विनी केशरवानी नाचा परदेशीराम वर्मा विवेकराज सिंह अरूण कुमार निगम व्यंग कोदूराम दलित रामहृदय तिवारी अंर्तकथा कुबेर पंडवानी Chandaini Gonda पीसीलाल यादव भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष Ramchandra Deshmukh गजानन माधव मुक्तिबोध ग्रीन हण्‍ट छत्‍तीसगढ़ी छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म पीपली लाईव बस्‍तर ब्लाग तकनीक Android Chhattisgarhi Gazal ओंकार दास नत्‍था प्रेम साईमन ब्‍लॉगर मिलन रामेश्वर वैष्णव रायपुर साहित्य महोत्सव सरला शर्मा हबीब तनवीर Binayak Sen Dandi Yatra IPTA Love Latter Raypur Sahitya Mahotsav facebook venkatesh shukla अकलतरा अनुवाद अशोक तिवारी आभासी दुनिया आभासी यात्रा वृत्तांत कतरन कनक तिवारी कैलाश वानखेड़े खुमान लाल साव गुरतुर गोठ गूगल रीडर गोपाल मिश्र घनश्याम सिंह गुप्त चिंतलनार छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ वंशी छत्‍तीसगढ़ का इतिहास छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास जयप्रकाश जस गीत दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति धरोहर पं. सुन्‍दर लाल शर्मा प्रतिक्रिया प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट फाग बिनायक सेन ब्लॉग मीट मानवाधिकार रंगशिल्‍पी रमाकान्‍त श्रीवास्‍तव राजेश सिंह राममनोहर लोहिया विजय वर्तमान विश्वरंजन वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह वेंकटेश शुक्ल श्रीलाल शुक्‍ल संतोष झांझी सुशील भोले हिन्‍दी ब्‍लाग से कमाई Adsense Anup Ranjan Pandey Banjare Barle Bastar Band Bastar Painting CP & Berar Chhattisgarh Food Chhattisgarh Rajbhasha Aayog Chhattisgarhi Chhattisgarhi Film Daud Khan Deo Aanand Dev Baloda Dr. Narayan Bhaskar Khare Dr.Sudhir Pathak Dwarika Prasad Mishra Fida Bai Geet Ghar Dwar Google app Govind Ram Nirmalkar Hindi Input Jaiprakash Jhaduram Devangan Justice Yatindra Singh Khem Vaishnav Kondagaon Lal Kitab Latika Vaishnav Mayank verma Nai Kahani Narendra Dev Verma Pandwani Panthi Punaram Nishad R.V. Russell Rajesh Khanna Rajyageet Ravindra Ginnore Ravishankar Shukla Sabal Singh Chouhan Sarguja Sargujiha Boli Sirpur Teejan Bai Telangana Tijan Bai Vedmati Vidya Bhushan Mishra chhattisgarhi upanyas fb feedburner kapalik romancing with life sanskrit ssie अगरिया अजय तिवारी अधबीच अनिल पुसदकर अनुज शर्मा अमरेन्‍द्र नाथ त्रिपाठी अमिताभ अलबेला खत्री अली सैयद अशोक वाजपेयी अशोक सिंघई असम आईसीएस आशा शुक्‍ला ई—स्टाम्प उडि़या साहित्य उपन्‍यास एडसेंस एड्स एयरसेल कंगला मांझी कचना धुरवा कपिलनाथ कश्यप कबीर कार्टून किस्मत बाई देवार कृतिदेव कैलाश बनवासी कोयल गणेश शंकर विद्यार्थी गम्मत गांधीवाद गिरिजेश राव गिरीश पंकज गिरौदपुरी गुलशेर अहमद खॉं ‘शानी’ गोविन्‍द राम निर्मलकर घर द्वार चंदैनी गोंदा छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय छत्‍तीसगढ़ पर्यटन छत्‍तीसगढ़ राज्‍य अलंकरण छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंजन जतिन दास जन संस्‍कृति मंच जय गंगान जयंत साहू जया जादवानी जिंदल स्टील एण्ड पावर लिमिटेड जुन्‍नाडीह जे.के.लक्ष्मी सीमेंट जैत खांब टेंगनाही माता टेम्पलेट डिजाइनर ठेठरी-खुरमी ठोस अपशिष्ट् (प्रबंधन और हथालन) उप-विधियॉं डॉ. अतुल कुमार डॉ. इन्‍द्रजीत सिंह डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव डॉ. गोरेलाल चंदेल डॉ. निर्मल साहू डॉ. राजेन्‍द्र मिश्र डॉ. विनय कुमार पाठक डॉ. श्रद्धा चंद्राकर डॉ. संजय दानी डॉ. हंसा शुक्ला डॉ.ऋतु दुबे डॉ.पी.आर. कोसरिया डॉ.राजेन्‍द्र प्रसाद डॉ.संजय अलंग तमंचा रायपुरी दंतेवाडा दलित चेतना दाउद खॉंन दारा सिंह दिनकर दीपक शर्मा देसी दारू धनश्‍याम सिंह गुप्‍त नथमल झँवर नया थियेटर नवीन जिंदल नाम निदा फ़ाज़ली नोकिया 5233 पं. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकार परिकल्‍पना सम्‍मान पवन दीवान पाबला वर्सेस अनूप पूनम प्रशांत भूषण प्रादेशिक सम्मलेन प्रेम दिवस बलौदा बसदेवा बस्‍तर बैंड बहादुर कलारिन बहुमत सम्मान बिलासा ब्लागरों की चिंतन बैठक भरथरी भिलाई स्टील प्लांट भुनेश्वर कश्यप भूमि अर्जन भेंट-मुलाकात मकबूल फिदा हुसैन मधुबाला महाभारत महावीर अग्रवाल महुदा माटी तिहार माननीय श्री न्यायमूर्ति यतीन्द्र सिंह मीरा बाई मेधा पाटकर मोहम्मद हिदायतउल्ला योगेंद्र ठाकुर रघुवीर अग्रवाल 'पथिक' रवि श्रीवास्तव रश्मि सुन्‍दरानी राजकुमार सोनी राजमाता फुलवादेवी राजीव रंजन राजेश खन्ना राम पटवा रामधारी सिंह 'दिनकर’ राय बहादुर डॉ. हीरालाल रेखादेवी जलक्षत्री रेमिंगटन लक्ष्मण प्रसाद दुबे लाईनेक्स लाला जगदलपुरी लेह लोक साहित्‍य वामपंथ विद्याभूषण मिश्र विनोद डोंगरे वीरेन्द्र कुर्रे वीरेन्‍द्र कुमार सोनी वैरियर एल्विन शबरी शरद कोकाश शरद पुर्णिमा शहरोज़ शिरीष डामरे शिव मंदिर शुभदा मिश्र श्यामलाल चतुर्वेदी श्रद्धा थवाईत संजीत त्रिपाठी संजीव ठाकुर संतोष जैन संदीप पांडे संस्कृत संस्‍कृति संस्‍कृति विभाग सतनाम सतीश कुमार चौहान सत्‍येन्‍द्र समाजरत्न पतिराम साव सम्मान सरला दास साक्षात्‍कार सामूहिक ब्‍लॉग साहित्तिक हलचल सुभाष चंद्र बोस सुमित्रा नंदन पंत सूचक सूचना सृजन गाथा स्टाम्प शुल्क स्वच्छ भारत मिशन हंस हनुमंत नायडू हरिठाकुर हरिभूमि हास-परिहास हिन्‍दी टूल हिमांशु कुमार हिमांशु द्विवेदी हेमंत वैष्‍णव है बातों में दम

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...