कल भारी बारिस के कारण रायपुर में कोई फ्लाईट नही आ पाई
जमीन से आसमान तक पानी ही पानी, हमारे संस्था प्रमुख को आज शाम को दुबई जाना था । हडबडाने लगे क्या करें, नागपुर फोन किये पता चला वहां भी देर सबेर की नौबत है समय चूके जा रहा था कल भी यही हाल रहा तो ...
चक्रधर की चकल्लस छोडो। हमने अपनी
अभिव्यक्ति प्रस्तुत की बोईंग तो अइबेच नई करी अब लालू भईया के बडे बोईंग में जाये बर पडी मुम्बई से कल उडना है आपको कल का इंतजार करते यहीं बैठे रहेगें तो नही न जा पायेंगें दुबई ।
सो हम दौडे सांसद महोदय से
रेलगाड़ी के बडका साहब को फोन करवा के टेसन की ओर टिकस का बंदोबस्त करने । टिकट का इंतजाम करने के बाद हमारे पास कुछ समय था हम इंतजार करने लगे बॉस का ।
महाशक्ति की भांति चारो तरफ नजर दौडाये कहीं कोई सुन्दरी मिल जाय और आंख तर कर ली जाय या कोई
जोगलिखी हो कोई पहचान का मिल जाये । इस बुढापे भरी जवानी में अब आंख और
अंतर्मन का ही तो सहारा रह गया है । देखा सामने एक लगभग 40-45 वर्ष की जवान कन्या अपने साजो सामान के साथ खडी थी साथ में उसका सामान था
अल्प विराम हूर के साथ लंगूर की शक्ल में उसका पति गले में पट्टा बंधे कूकूर की भांति खडा था आंखों में मोटी ग्लास का चश्मा लगाये इधर उधर कुछ सूंघता हुआ शायद कुली ढूंढ रहा था । हमने अपनी नजर दूसरी ओर कर ली लगा डर कि हमरी सूरत देख के हमें ही ऐ कुली कह कर ना बुला ले ।
उसे आश्वस्थ होकर एक जगह खडे देखा तो सोंचे ये
जोगलिखी हमारे लिये ही है पहले चोर निगाहों से सुन्दरी को फिर देखा सुन्दरी नें 40-45 वर्ष की ढलती उम्र को पीले टी शर्ट एवं नीले फुल टाईट जीन्स से जकड रखा था । गठे ठसे शरीर की कहानी स्पष्ट थी कि उसकी कोई
सृजन-गाथा नहीं है । चेहरे पर
विशेष रूप से बंजर भूमि सुधार के सारे परयोग अपनाये गये थे और धान गेहूं बोना छोडकर जैसे आजकल फूलों की खेती की जा रही है वैसे ही अंग्रेजी खादों से गुलाबों की खेती की गयी थी ।
मन बिना चोर नजर से उस
ड्रीम सुन्दरी को देखना चाहा नजरें सीधे उस पर । एक क्षण में उसने अपने
राजीव नयन में भांप लिया कि हम उसकी सुन्दरता के मुरीद हैं । उसने अनमने से अंजान भाव प्रदर्शित करते हुए पर्स से
आईना निकाला, अपनी सूरत देखने लगी, मानो हमें अनुमति दे रही हो कि देखो । उसकी
मानसिक हलचल को मैं स्पष्ट पढ रहा था । सौंदर्य का प्रदर्शन होना ही चाहिए हमारा मन
उडन तश्तरी …. बन उसके आस पास मंडराने लगा । हमारे दादा जी कहा करते थे जिसमें से
कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात हैं पर एक याद है - आप रूप भोजन, पर रूप श्रृंगार । जो रूप उसने धरा है वो दुनिया को दिखाने के लिए ही था, सौभाग्य से वहां हम
एकोऽहम् ही थे और कोई नहीं था, दो चार बूढे
निठल्ला चिन्तन कर रहे थे, सो
फुरसतिया देखने लगे,
प्रेम अनुभूतियाँ जाग उठी ।
कस्बा, बजार, मोहल्ला में यदि वो दिख जाती तो जवानों का
कांव कांव हो जाता पर यहां कोई भी
बजार पर अवैध अतिक्रमण नहीं कर सकता था ।
हमने अपनी आंखें व्यवस्थित की देखने लगे जी भर के,
मन पखेरू फ़िर उड़ चला छायावादी कवि की भांति क्योंकि हमें
हिन्द-युग्म में सौंदर्य कविता जो भेजनी है
क्या करूँ मुझे लिखना नहीं आता… इसीलिए सौंदर्य बोध कर रहा था
रचनाकार को तूलिका पकडा कर ।
अचानक उसके पति को लगा कि हम उसकी पत्नी को ताक रहे हैं ।
बेचैन सी निगाहों से हमें
अगिनखोर सा देखा । नजरें बिनती कर रही थी, भाई साहब प्लीज ऐसा मत करो उसके
अंर्तध्वनि को सुनकर हम भी अपने
लिंकित मन व निगाह को सहजता से दूसरी तरफ कर लिये ऐसा प्रदर्शित करते हुए कि हम कोई
पंगेबाज नही हैं कुली खोज रहे हैं और पास ही रखे दूसरे की लगेज के पास जा कर खडे हो गये ।
देखा एक कुआरा सजीला नौजवान पास में ताजा समाचार पत्र लेकर आ गया
आवारा बंजारा की भांति कहने लगा
हम भी हैं लाइन में हम
सौंदर्य के पुजारी हैं । हमने
बातों बातों में उसे समझाते हुए कहा बेटा मैं
एक अकेला इस शहर मे.. साहित्यकार हूं
हिन्दी व्लाग वाला चिट्ठाकार हूं,
मसिजीवी हूं पहले मैं आया हूं मुझे सौंदर्य की
अनुभूति है । पास ही एक राम भक्त यानी हनुमान रेलवे पुलिस खडा था हम लोगों का
वाद-संवाद सुन रहा था । जोर से डंडा पटका और बोला -
तुम साले अधकचरे लोग
समय नष्ट करने का एक भ्रस्ट साधन हो अभी हमारे छत्तीसगढ में हिन्दी ब्लाग लिखने वाले भाई
जयप्रकाश मानस ही
सृजन शिल्पी हैं तीसरा कोई नहीं है उन्ही को मालूम है साहित्य और सौंदर्य, चलो भागो यहां से बेफालतू में भीड बढा रहे हो तुम लोगों का मन
निर्मल आनंद नहीं है । हमने पिद्दी सिपाही से
बतंगड़ करना और
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का धौंस देना उचित नही समझा, दिल में आह भरते
नौ दो ग्यारह हो गये मन में ढंग से ना देख पाने की
वेदना व्याप्त थी ।