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छत्तीसगढ़ी लोक कथा

छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस के दिन छत्तीसगढ़ी लोकभाषा मंच के कार्यक्रम में वरिष्ठ लोककलाकार और संस्कृतिधर्मी राकेश तिवारी ने बहुत रोचक छत्तीसगढ़ी लोककथा सुनाया। इसे उनकी दादी ने उन्हें सुनाया था। जो लोग इस लोककथा को उनके मुख से, रोचक अंदाज में सुन नहीं पाए हैं उनके लिए हम उसे प्रस्तुत कर रहे हैं-

एक गाँव मे एक भड्डरी और भड्डरिन दम्पत्ति रहते थे। वे बहुत गरीब थे और भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करते थे। भड्डरिन गर्भवती थी, उसे एक दिन डूमर फल खाने का शौक हुआ। वह अपने पति से बोली कि मुझे डूमर का फल खाना है, तब उसके पति ने कहा कि मैं गांव में भिक्षा मांगने के लिए जा ही रहा हूं, तुम भी मेरे साथ चलो, रास्ते में जो डूमर का पेड़ है उसमें से तुम डूमर तोड़ कर खा लेना। मैं भिक्षाटन के लिए आगे चले जाऊंगा और वापस आकर फिर हम साथ अपने घर वापस आ जाएंगे।
दूसरे दिन ऐसा ही हुआ, भड्डरिन भड्डरी के साथ घर से निकली और रास्ते में पड़ने वाले डूमर के पेड़ के नीचे रुक गई। भड्डरी भिक्षाटन के लिए चला गया।
इधर भड्डरिन उस डूमर के पेड़ में चढ़ी और पका फल तोड़ कर खाने लगी। जब वह उतर रही थी तो उसका पेट एक सूखे डंगाल के टूटे हिस्से पर पड़ा और फट गया, वह नीचे गिर गई।
इधर शाम को जब भड्डरी भिक्षाटन कर वापस उस पेड़ के पास पहुंचा। वहाँ उसने देखा, उसकी पत्नी पेड़ के नीचे मरी पड़ी थी उसका पेट फूटा हुआ था। पास में ही एक नवजात बच्ची और एक बकरी का नर मेमना था। भड्डरी ने उस मेमने और लड़की को घर लाया और गांव वालों को बुलाकर अपनी पत्नी का क्रियाकर्म कर दिया।
समयानुसार बच्ची और मेमना बढ़ने लगे। मेमना जल्दी ही बकरा बन गया किन्तु बच्ची अभी छोटी ही थी। दोनों भाई बहन खेलते हुए बढ़ने लगे। गांव वालों ने भड्डरी से कहा कि भड्डरी तुम इन बच्चों की देखरेख के लिए दूसरा विवाह कर लो। पहले तो भड्डरी ने मना किया उसके बाद उसने दूसरी शादी कर ली।
कुछ दिन बाद भड्डरी की दूसरी पत्नी से भी एक लड़की पैदा हुई। अब तीनों साथ साथ बढ़ने लगे। भड्डरी की दूसरी पत्नी के मन में अपने सौतेली बेटी और बकरे पर हमेशा क्रोध आता था। वह उनके प्रति बुरा व्यवहार करती थी, वह सौतेली बेटी को खाना नहीं देती थी और वह भूखी रहती थी। बकरा इधर उधर चारा चर लेता था।
एक दिन वह लड़की अपने भाई बकरे को चराने के लिए जंगल की ओर गई। लड़की बहुत उदास थी, उसके भाई बकरे ने पूछा की बहन तुम क्यों उदास हो? उसकी बहन ने कहा कि मुझे मेरी सौतेली मां खाना नहीं देती है। मैं कई दिनों से पेटभर खाना नहीं खाई हूं। बकरे ने कहा कि बहन तुम फिक्र मत करो, तुम मेरे सिर पर मुक्के से वार करो और जो चाहती हो वह मांगो। बच्ची हंसी मजाक में ही उसके सिर को मुक्के से मारकर बोली 'लडुवा बतासा! बकरे के मुंह से ढेर सारा लडुवा बतासा टपक गया। बच्ची उसे तृप्त होने तक खाई।
इसी तरह दिन गुजरते गए, लड़की को जो भी खाने का मन होता वह बकरे के सिर में मुष्टिक प्रहार से पा जाती। घर में उसकी सौतेली मां उसे खाने को नहीं देती थी किंतु वह बकरे के सिर को मारकर रोज लडुआ-पपची, खीर-सोहारी, हलवा-पूड़ी खाती थी। ऐसा करते-करते वह काफी मोटी ताजी हो गयी। इधर उसकी सौतेली मां की लड़की खाना कम होने के कारण पतली ही रह गई।
सौतेली मां विचारने लगी कि उसकी जन्माई पुत्री बहुत कमजोर है और यह लड़की काफी हष्ट पुष्ट है जबकि मैं इसे खाना कम देती हूं। उसने इसका कारण पता लगाने के लिए अपनी पुत्री से कहा कि तुम आज उसका पीछा करो। पता लगाओ की यह क्या खाती है जिसके कारण वह काफी तंदुरुस्त है और तुम कृशकाय हो।
सौतेली मां की पुत्री उस दिन लड़की और बकरे के पीछे लग गई। उसे पता चला कि दोनों एक पेड़ के नीचे रोज जाते हैं। दूसरे दिन उनके आने के पहले ही वह उस पेड़ के ऊपर चढ़ गई। लड़की और उसका भाई बकरा जैसे ही उस पेड़ के नीचे पहुंचे, लड़की ने उस बकरे के सिर पर मुक्का मारा। कहा 'हलवा पूड़ी!' बकरे के मुंह से ताजा-ताजा हलवा पूड़ी बरसने लगा। लड़की हलवा पूड़ी खाने लगी। पेड़ के ऊपर चढ़ी हुई लड़की उनके चले जाने के बाद नीचे उतरी और घर जाकर अपनी मां को इस वाकये को सुनाया।
सौतेली पत्नी ने सोचा इस बकरे को मार देने से लड़की को भोजन मिलने का आधार भी खत्म हो जाएगा और मैं उसे फिर से परेशान कर सकूंगी। उसने अपने पति से कहा कि इस बकरे की बलि देना बहुत आवश्यक है। पति ने कारण पूछा तो वह कुछ भी बहाना बना दी। पति जानता था कि बकरा उसका पुत्र है, वह उसको मारना नहीं चाहता था, किंतु त्रियाहठ के कारण उसे विवश होकर उस बकरे की बलि देने के लिए हां कहना पड़ा। दूसरे दिन बकरा और लड़की जंगल गए,  लड़की ने बताया कि भाई मेरी सौतेली मां तुम्हारा बलि देना चाहती है। बकरा बोला तुम चिंता ना करो बहन, बकरे का हश्र यही होता है। मेरी बलि लेने के बाद तुम मेरी हड्डी को तालाब में फेंक देना, फिर मैं तुम्हारी भोजन की व्यवस्था लगातार करते रहूंगा। लड़की ने ऐसा ही किया।
लड़की ने बकरे की बलि के बाद उसकी हड्डी को तालाब में फेंक दिया। देखते ही देखते वह बगुला (कोकड़ा) बन गया। वह बगुला तालाब से मछलियां निकाल-निकाल कर उस लड़की को देने लगा। लड़की उस मछली को आग में भून कर खाने लगी। इसी तरह रोज उसे मछली मिलने लगा, वह और तंदरुस्त रहने लगी। सौतेली मां को फिर शंका हुई उसने अपनी लड़की को पुनः बोला कि जाकर देखो ये लड़की रोज क्या खाती है?
सौतेली मां की लड़की तालाब के एक पेड़ पर चढ़ गई। उसकी सौतेली बहन जैसे ही तालाब के पार में पहुंची,  अपने बकरे भाई का नाम लेकर आवाज दी। एक बगुला उड़ते हुए आया और तालाब से मछलियां निकाल-निकाल कर उस बच्ची को देने लगा जिसे वह भून-भून कर खाने लगी। पेट भर जाने पर वह वहाँ से चली गई। सौतेली मां की बेटी पेड़ से उतरी और अपनी मां को यह बात जाकर बताई। सौतेली मां ने पुनः त्रियाचरित्र किया और उस बगुले को मारने का आदेश दे दिया। दूसरे दिन लड़की ने बगुला को बताया कि भाई तुम्हें आज मारने वाले हैं। तब उस बगुले ने कहा कि बहन तुम फिक्र न करो, मेरे मरने के बाद मेरी हड्डियों को तुम तालाब के पार में गड़ा देना। लड़की ने उसकी हड्डियां तालाब के पार में दबा आई। तालाब के पार में एक बड़ा आम का पेड़ उग गया। लड़की उस पेड़ के नीचे जाकर भाई से आम मांगती तो टप से बड़ा सा पका आम टपक पड़ता। लड़की फिर मोटाने लगी, सौतेली माँ को फिर तकलीफ हुई। उन्होंने भड्डरी से जिद करके उस आम के पेड़ को कटवा दिया। आम ने कटने से पहले लड़की से कहा कि मेरी कुछ लकड़ियों को राजा के बाग में दबा देना। लड़की ने कहा भाई इसी तरह हर बार मेरी सौतेली माँ तुमको मरवाते रहेगी, इसका कोई स्थायी हल निकालो। आम ने लड़की के कान में जुगत बताई। लड़की के द्वारा आम की लकड़ियों को राजा के बाग में दबाने के कुछ दिन बाद वहाँ लाल भाजी उग आया। राजा के बाग की लाल भाजी को देखकर रानी को उसकी सब्जी खाने का मन हुआ। उस लालभाजी को खाकर रानी गर्भवती हो गई। उसका एक पुत्र हुआ, कुछ दिनों बाद एक दिन बच्चा लगातार रोने लगा। किसी के भी चुप कराने से वह चुप नहीं हो रहा था। राजा-रानी परेशान हो गए। राजा ने पूरे प्रदेश में मुनादी कराया कि जो इस बच्चे को चुप करा देगा उसे उचित इनाम दिया जाएगा। लड़की को बगुले ने कान में बताया था कि मेरे हड्डी को राजा के बाग में दबाने पर उस से पैदा हुए लाल भाजी को रानी खाएगी तो गर्भवती होगी और उसका एक बच्चा होगा। कुछ दिनों बाद वह बच्चा रोएगा, वह बच्चा मैं ही रहूंगा। मैं तभी चुप होऊंगा जब तुम मुझे चुप कराओगी। लड़की यह बात जानती थी। मुनादी सुनने के बाद सारे देश के लोग आए सभी ने उस बच्चे को चुप कराने का प्रयास किया किंतु वह बच्चा किसी से चुप नहीं हुआ। तब वह लड़की राजमहल में गई और बच्चे से बोली-
बोकरा ले कोकड़ा होए भईया
कोकड़ा ले आमा रुख
आमा ले लाल भाजी होए भईया
चुप होजा मोर भईया
चुप होजा ना
इसे सुनने के बाद बच्चा खिलखिलाने लगा। राजा खुश हुआ,  राजा ने कहा कि आज से तुम इस राज्य की राजकुमारी हो और यह तुम्हारा भाई है। इस प्रकार से लड़की अपने भाई के साथ सुख से रहने लगी। कुछ समय के बाद राजकुमार की शादी हुई। नगर में भंडारा खुला  देश भर के लोग आए और छक कर भोजन किया। बारात धूमधाम के साथ निकली। भड्डरी के दरवाजे से बारात निकली तो लड़की ने देखा, लोग मालपुआ खा रहे थे और भड्डरी-भड्डरिन पतरी चांट रहे थे।
(श्री राकेश तिवारी के वक्तव्य के अनुसार संजीव तिवारी ने रूपांतरित किया)

सलाम बंडू, कुकूर!!

बात सन 1983 के किसी जड़काले की है, मध्य प्रदेश माध्यमिक परीक्षा मंडल की अंतिम मैट्रिक परीक्षा की अंकसूची में छपे शब्दों में बसी खुशबू बरकार थी। भिलाई स्टील प्लांट में श्रमिकों की भर्ती के लिए जिला रोजगार कार्यालय दुर्ग द्वारा समय वरीयता के अनुसार समय-समय पर बुलावा पत्र गांवो के लड़कों को मिल रहे थे। इसके लिए न्यूनतम योग्यता मैट्रिक थी और रोजगार कार्यालय में जीवित पंजीयन आवश्यक था।
अंकसूची मिलने के बाद उसकी दस-बारह फ़ोटो कापी निकलवा कर कोनी बिलासपुर में फिटर आईआईटी और बेमेतरा में बी.काम. के लिए फार्म भरने और दोनों जगह प्रवेश मिल जाने के बाद ऊहापोह में मैं, बी.काम. में प्रवेश ले चुका था।
दीपावली की लम्बी छुट्टी के बाद गांव में ही लल्लू दाऊ ने दुर्ग जाकर रोजगार कार्यालय में पंजीयन करा लेने का प्लान बनाया। हम सरकारी रूप से बेरोजगार दर्ज होने के लिये सुबह घी में बोरकर अंगाकर पताल धनिया मिर्च धड़के और सायकल से दुर्ग के लिए निकल पड़े। हमारा गांव शिवनाथ नदी के किनारे पर बसा हुआ है। 
हमारे गांव से लगभग दो किलोमीटर दक्षिण पूर्व में खारुन और शिवनाथ का संगम है। शिवनाथ यहां दक्षिण पश्चिम से बहती हुई आती है, जिसके तट पर किरितपुर नाम का गांव है। खेत के मेढ़ों से होकर जाने से किरितपुर भी हमारे गांव से लगभग दो किलोमीटर दूर है। धान के कट जाने के बाद खेतों के बीच मेढ़ काटकर बनाये गए गाड़ा रावन से सायकल उचकते हुए निकलती है। सुविधाजनक पहुँच मार्ग नही होने के बावजूद इन दोनों गांवो के बीच यही सुगम मार्ग है। इससे होते हुए हमने शिवनाथ पार में पहुचे। नदी में पानी घुटनें भर रही होगी, हमने सायकल रोककर लफ़र्रा बेलबॉटम को मोड़कर जांघ तक चढ़ाया। जैसे ही हमने सायकल के स्टैंड को हटाया, कूँ-कूँ की आवाज पर हमने पीछे देखा। हमारे गांव का बंडू कुकूर पूछ हिलाते खड़ा था।
हँसी के साथ हमने उसे गाली दिया- 'तैं कहाँ इँहा घुमरत हस साले।'
वह पूँछ हिलाते हुए सायकल के चक्के पर लोटने लगा।
लल्लू ने फिर गाली दिया- 'भाग भोसडी के, हमर पीछू कहाँ आबे।'
वह गुर्राने लगा। हम उसे नजरअंदाज कर पानी मे उतर गए, बेडौल बिच्छल पत्थरो और तेज बहाव में कभी सायकल तो कभी जाँघ तक चढ़े पैंट को बचाते हमने नदी पार कर लिया। पानी के बाद उस पार के ऊंचे करार तक रेत फैली हुई थी। रेत में सायकल को ठेलते हुए आगे ले जाना मेहनत का काम है, करार तक पहुँचते-पहुँचते अंगाकर रोटी पच गया। ऊँचे करार पर सायकल चढ़ाने के पहले हम शक्ति संचय के लिए वहां रुक गए। पीछे मुड़ कर देखा कितना सफर तय हुआ। बंडू कुकूर पानी-पत्थर-बूटा कूदता हुआ फिर हमारी ओर दौड़ता हुआ आ रहा है।
लल्लू ने फिर गाली देते हुए कहा- 'ये हमन ल पदोही तइसे लागथे दाऊ।' 
अब उसने गोंटा उठाकर उसकी ओर उछाल दिया- 'भाग साले।' 
गोंटा से बचते हुए वह कूँईं करता फिर हमारे पास। हमने उसे खूब गाली दिया, समझाया भी कि हम दुर्ग जा रहे हैं, डेढ़ सौ किलोमीटर दूर। उसने सुना, पर वह ठान के बैठा था, चलेगा हमारे साथ।
सरदा आ गया, कबीरपंथी चौका आरती की आवाज लाऊड स्पीकर में गूंजने लगी। बस्ती में हम जैसे ही घुसे भौ-भौं करते कुत्तों का दल हमारी ओर दौड़ने लगा। हमे ब्रेक लगाना पड़ा, बंडू कुकूर हम दोनों के सायकल के बीच पूछ दुबकाये बैठ गया। लल्लू ने फिर गाली दिया- 'मर भोसडी के, हमू मन ल मारबे।'
हमारे हात हूत से गांव के कुत्ते दूर में ही गुर्राते रुक गए पर भागे नहीं। सरदा से हमे डामर वाली सड़क मिल गई थी। उन दिनों ट्रफिक कम थी, हम दोनों के सायकल के बीच मे वह सुरक्षित आगे दौड़ने लगा। शाम तक हम कुसमी पहुँच गए, साथ मे बंडू भी था।
पूरे रास्ते मे घेरी-बेरी रुक-रुक कर बंडू कुकूर को वापस गांव खेदारते रहने के कारण हम देर से कुसमी पहुँचे। सामान्य अवस्था मे हम अब तक दुर्ग पहुँच गए होते। शाम को अनजान शहर में जाने के बजाय लल्लू दाऊ ने सुझाव दिया कि रात कुसमी में ही रुका जाय और दूसरे दिन सुबह से दुर्ग के लिए निकला जाय।
उन दिनों हमारे चाचा का बेटा राजू, कुसमी में अपने नाना के घर मे रह कर कर पढ़ाई कर रहा था। कुसमी में हमारा आना जाना लगा रहता था और हम वहां कुछ दिन बिलमते भी थे।
मैंने भी सोचा कि इसी बहाने इस बंडू कुकूर से पीछा छूटेगा। सुबह इसे चकमा देकर दुर्ग के लिए निकल लेंगें। वापसी में इसे लेते हुये गांव आ जाएंगे।
रात कुसमी में रुके, सुबह उठ कर तरिया में नहाने गए, बंडू भी गया। मैने लल्लू से कहा- 'येला कइसे चूतिया बनाबों दाऊ, ये साले हमर पीछा नई छोड़य।' 
बंडू मुझे बोटबोट से निहार रहा था जैसे उसने मेरी बात सुनी ही नहीं।
कटकटात जाड़ में दु डुबकी मार के घर पहुँचे, घर मे थोड़ा बहुत बिलमें ताकि बंडू भुला जाए। जब वह सुनहरी घाम में घर से लगे कोठार में फैले धान के पैर में मस्तियाने लगा। हम सायकल उठाये और दुर्ग की ओर भागे।
बेरला के पहले किटप्लाई वाले परसरामपुरिया के फार्म के पास पहुँचे ही थे कि बंडू हँफरते, जीभ निकाले पहुँच गया।
'जौहर होंगे रे।'
लल्लू ने चिल्लाया।
अब वह साथ छोड़ेगा नही और उसे झेलना पड़ेगा। नए शहर में जाने की उत्सुकता, मोटर, गाड़ी, ट्रेन, सेक्टर, फैक्ट्री, मैत्री बाग, रंग-रंग के टुरी की बातें सब सटक गया था। दिल दिमाग मे बंडू कुकूर था, इसे कैसे बचाएंगे, कहाँ कैसे रखेंगे।
वह हमारी चिंता से बेखबर हमारे पीछे दौड़ता रहा, कभी कभी रोड के चढ़ाव में वह हमसे आगे बढ़ जाता और हमारे आते तक सड़क में पसर जाता, हमे देखता, यूँ कह रहा हो अड़बड़ धिरन्त हव जी तुमन।
रास्ता पूछते-पूछते अहिवारा, जामुल, भिलाई से दुर्ग पहुँचते तक हमने रोजगार पंजीयन के संबंध में दो-चार बार ही बातें की बाकी बंडू कुकूर दिल दिमाग मे छाया रहा।
स्टेडियम में सुबह सात बजे से लाइन लगी है हम यहां नौ बजे पहुँचे हैं, साढ़े दस बजे काउंटर खुलेगा जहाँ फार्म मिलेगा। उसे भरकर अंकसूची के फोटोकॉपी के साथ दूसरे काउंटर में जमा करना है। ढाई बजे दूसरा काउंटर खुलेगा। शाम पांच बजे कार्ड बनकर मिलने लगेगा। यदि सब काम फटा फट हुआ तो पहट बेरा तक हम लहुट जाएंगे। रात में सर-सर सर-सर सायकल चलाते दस-ग्यारा बजे तक गांव।
'शहर में सायकल को बने चेत करके रखना बेटा।'
निकलते वक्त मां ने कहा था। कहाँ रखें, यहाँ तो सायकलों की भीड़ है। स्टेडियम के गेट के सामने सायकलों के बीच मे हमने अपनी सायकलों को घुसाया, ताला लगाया, हैंडल में टंगे झोले को निकाल कर लाइन में लग गए। बंडू कुकूर को शायद पता था, हम देर से लौटेंगे और सायकल के बिना कहीं नही जाएंगे, सो वह वहीँ पसर गया। तुमन आवव जी मैं इही जघा अगोरत हँव।
हम लाइन पे लाईन लगते गए शाम साढ़े पांच बज गए, बाबू ने एलान किया कि बचें हुए लोगों का रोजगार कार्ड कल मिलेगा।
'हम अड़बड़ दुरिहा ले आये हवन सर, पिलीज हमर कारड ल दे दव!' 
रुवांसी होकर मैन कहा था।
'क्या नाम है?'
'संजीव तिवारी'
'त्रिविध नारायण दुबे'
हमने संयुक्त रूप से कहा।
थोड़ी देर वह फाइलों-कागजों को तमडता रहा फिर कहा- 'नहीं, कल ही मिलेगा।'
सूरज ढल चुका था, पीले रौशनी वाले बल्ब जल गए थे। हमने एक दूसरे के ओथराये मुह को देखा और झोला कंधे में लटकाए भीड़ से बाहर निकलने का उदीम करने लगे। हमारे जैसे बहुत सारे लोग थे जिनको कार्ड मिल नहीं पाया था।
'अब कइसे करबो दाऊ'
लल्लू ने पूछा, मेरे पास कोई जवाब नहीं था। दो बच्चों ने कहा कि चलो रेलवे टेंसन वहीँ रात में रुकेंगे, यहां से पास में ही है।
हम सायकल के पास आए, वहां अंधेरे में ईक्का-दुक्का सायकलें ही बची थीं, बंडू हमारे पहुँचते ही कूँ-कूँ करते हुए मस्तियाने लगा। लल्लू ने एक भरपूर लात उसे मारी।
'भोसड़ा के तोरे कारन फदग गेन।'
कायँ-कायँ चिल्लाते हुए वह कातर निगाहों से हमे देखने लगा। उसके पूछ लगातार हिल रहे थे।
हम रेलवे स्टेशन के सायकल स्टैण्ड में घुसे ही थे कि शहरी मुस्टंड कुत्तों के झुंड नें बंडू को घेर लिया। हम सायकल से उतरे उन्हें भगाने की कोशिश भी किया, पर वे उसे नहीं छोड़े। उस ग्रुप के मजबूत कुत्ते ने सिर हिला हिला कर बंडू को काटा। एकाध मिनट के बाद वह उनके चुंगुल से बचकर हमारी ओर भागा, उसके जख्मो से खून बहने लगे थे।
कुत्तों ने बंडू को कई जगह से काटा था, वह लड़खड़ा रहा था, अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा था। लल्लू के निग़ाहों में भी करुणा और पीड़ा तैर गई। गांव में होते तो दु हत्था लठ्ठ लेकर उन कुत्तों को कुदा-कुदा कर मारते, यहां सायकल के हैंडल के मूठ को मुट्ठियों में जोरदार दबाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था।
रात घिर आई थी और हमे रेलवे स्टेशन में रुकने का इंतजाम देखना था, हम जानते नहीं थे कि स्टेशन में कहां रुक कर सोया जा सकता है। बंडू को इस हालत में छोड़ा नहीं जा सकता था, मैं खामोशी से उसे अपने चोटों को जीभ से चाटते देख रहा था।
'चल छोड़ दाऊ, अब येला एकर किस्मत म छोड़।'
लल्लू ने कहा था, लल्लू मेरा भतीजा था किंतु मेरे से उम्र में बड़ा था। मुझमे अपनी उम्र के हिसाब से आवश्यक परिपक्वता नहीं थी, मेरी सुई बंडू पर ही अटकी हुई थी।
हम कहाँ अपनी सायकल रखे, कहाँ, कैसे सोये, मुझे कुछ पता नहीं। प्लेटफार्म पर बेमेतरा, बेरला, नवागढ़ के बहुत सारे लड़के थे जिनका रोजगार पंजीयन हो नहीं पाया था। सब अपनी-अपनी जगह पोगरा कर पंछा जठा कर लेटे थे। 50-60 किलोमीटर सायकल ओटने के कारण हम पर थकावट हावी हो रही थी। लल्लू मुझे प्लेटफार्म पर बिठा कर होटल से चार समोसा लाया, हम खाये, प्लेटफार्म के नल से ससन भर पानी पिया। आंखों में बंडू लिए सो गए, ट्रेन जब गुजरती तब बंडू फिर दिमाग मे आता पर थकावट नींद को पोटारे रहती।
सुबह बंडू कहीं नजर नहीं आया।
'छोड़ दाऊ, चल जल्दी दतवन कर।'
लल्लू मुझे स्टेशन के सामने घूमते देखकर कहा, उसके हाथ मे बंबूल के दो दातून थे जिसे वह गाँव से ही अपने झोले में ले आया था।
हम फिर स्टेडियम पहुँचे, बेरोजगारों के भीड़ में उबुक चुबुक होते, आखिर लगभग बारा बजे हमें नीले रंग का पोस्टकार्ड साइज रोजगार पंजीयन कार्ड मिल गया।
लल्लू ने कहा कि अभी समय है मैत्री गार्डन घूम लेते हैं। मैं बिना प्रतिरोध उसके साथ मैत्री गार्डन की ओर बढ़ गया। पूछते-पूछ्ते हम वहाँ पहुचे। लल्लू धारी दार बाघ और बब्बर शेर सहित सभी जानवर को उत्सुकता से और देर तक रुक कर देखता था। मुझे असकट लग जाता, मुझे सब जानवर बंडू जैसे लगते।
'चल दाऊ अड़बड़ भूख लागत हे, गाँव जाए बर तको मंझन होही।'
मेरे उकताहट को समझते हुए लल्लू अब जल्दी जल्दी जानवरों पर नजर मारते बाहर निकल आया। बाहर ठेले में दो प्लेट चना चरपटी दहेल के जो पैडिल पे पांव धरे कि दिया बत्ती तक अपने गाँव।
समय के साथ साथ बंडू वाला वाकया मैं भूल गया। बेमेतरा से 1986 में बी.कॉम. किया और साइंस कॉलेज व सुराना कालेज दुर्ग से 1988 में एम.कॉम.। इस बीच दोस्त बताते कि पांच हजार खर्च करने पर रोजगार कार्यालय से बीएसपी के लिए काल लेटर निकल जाता है फिर नौकरी पक्की। पांच हजार इहि जघा हे जी, चलो सकेलता हूँ। 
इस सकेलने के जद्दोजहद में रोजगार पंजीयन कार्ड धूमलहा हो गया, कई कई बार फ़ोटो कापी कराने, धरने निकालने में फट भी गया पर रोजगार नहीं मिला। 
पिछले अठ्ठाइस सालों से मैं दुर्ग में रहता हूँ,  आज सोचता हूँ कि बंडू मेरे साथ गाँव से यहाँ क्यूँ चला आया था? जबकि गाँव मे वह मेरे साथ इतना घुला-मिला भी नहीं था। वह स्कूल जाते समय सिमगा के पुल तक हमारे साथ भी नही जाता था। यदि वह जाता तो झोले से रोटी निकाल कर खाते हुए हम कुछ टुकड़े उसकी ओर उछाले भी रहते जिसके नमक के चलते वह हमारे साथ चलता। गाँव की थोड़ी बहुत जान पहचान बस।
शायद वह तैंतीस साल पहले बता देना चाहता था कि यहीं लड़ना है तुम्हे, बेरोजगारी से, भूख से, ताकि शहरी लोगों का झुंड तुम्हे हटक न सके।
सलाम बंडू, कुकूर!!
-संजीव तिवारी

दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : वागार्थ में प्रकाशित कैलाश बनवासी की कहानी

वर्तमान कथा साहित्‍य में कैलाश बनवासी जाने पहचाने कथाकर हैं जो विविधआयामी परिदृश्‍यों को रचते हुए आम जन की कथा लिखते हैं। कैलाश भाई मेरे नगर के हैं और मेरा सौभाग्‍य है कि मैं कुछ वर्षों तक उनके पड़ोस में ही रहा हूं और कथाकार मनोज रूपड़ा जी के दुकान तक की दौड़ लगाते रहा हूं. कैलाश बनवासी जी की 'लक्ष्य तथा अन्य कहानियां' व 'बाज़ार में रामधन' कहानी-संग्रहों के अलावा समसामयिक विषयों पर कई लेख व समीक्षाएं प्रकाशित हैं तथा वे कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं। कहानी संग्रह 'बाजार में रामधन' यहां मेरी गूगल बुक्‍स लाईब्रेरी में उपलब्‍ध है। इसी शीर्षक से संग्रह की पहली कहानी रचनाकार में यहां प्रकाशित है। 'दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़' कहानी वागार्थ के मार्च 2011 अंक में प्रकाशित है, यह कहानी कैलाश जी के उपन्‍यास का कथा रूप है। हम अपने पाठकों के लिए 'दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़' यहां प्रस्‍तुत कर रहे हैं - 

'दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़'

अजीब-सा स्वाद लगा था पानी का ।

कहावत है- कोस-कोस में बदले पानी, सात कोस में बानी, फिर मैं तो भूल ही चुका था, हम घर से कितना आगे आ चुके हैं । ...शायद हजार से भी ज्यादा । और यह हिसाबने का कोई तुक नहीं था, फिलहाल । मैं प्लेटफार्म के अपेक्षाकृत कुछ दूर के नलके में हाथ-मुँह धो रहा था, स्टेशन के टॉयलेट से निवृत्त होने के बाद । यह सुबह के साढ़े पाँच-छह के बीच का समय था, झीने और कोमल सफेद उजास का समय । मेरे ऊपर आकाश था, गहरा नीला, जिसमें कहीं-कहीं तारे टिमक रहे थे । और चाँद था, निस्तेज, किसी पुरानी किताब के पीले पड़ गए कागज-सा ।

यह दिल्ली का आकाश था । निजामुद्दीन ।

गौरी ने कुछ देर पहले जब मुझे जगाया था, मैं बहुत गहरी नींद में था । उठकर मैं भकुआया-सा कुछ देर देखता रहा था अपने ईद-गिर्द जहाँ कुछ लोग बेसुध सो रहे थे स्टेशन के लाउंज के फर्श पर, हमारी ही तरह । एक पल को तो समझ में मनहीं आया मैं कहाँ हूँ । जब समझ में आया तो अपनी घड़ी देखी, क्या समय हुआ है । सवा पाँच ही बजे थे । मुझे गौरी पर खीज हुई, क्यों उठा दिया इतनी जल्दी । गौरी की बहुत सी बातों पर मैं अक्सर खीज जाता हूँ, बहुत जल्दी । आदतन । मैं उस पर ऐसे खीजता हूँ मानों यह मेरा अधिकार हो ! और वह भी जैसे इसे स्वीकार कर चुकी है कि भाई जो करेगा, सही करेगा, क्योंकि मैं उसका एक जिम्मेदार भाई हूँ । एक गार्जियन । उससे उमर में दो बरस छोटा होने के बावजूद । ...और यह अभिभावकपन कब मेरे भीतर दाखिल हुआ और कब अपनी जड़ें जमा लिया, मुझे नहीं मालूम ।

इस सुबह यहाँ मैं अकेला था । और बहुत शान्ति । सुबह की नम हवा में भीगी शान्ति । और एक साफ-सुथरापन । एक सूनापन । सब कुछ भला-भला-सा । प्लेटफार्म की जलती हुई बत्तियाँ भी इस समय आँखों को नहीं चुभ रही थीं । अभी वह गहमा-गहमी कहीं नहीं थी, न ही वैसी भाग-दौड़, जब कल रात आठ के आसपास यहाँ पहुँचे थे ।

प्लेटफार्म के स्वीपर आ चुके थे । मार्निंग शिफ्ट के स्वीपर । लम्बे डण्डे वाली झाड़ू से बुहार रहे हैं । इन्हें देखकर रात की घटना की कड़वाहट मन में एक बार फिर तिर आई... ।

हम स्टेशन के टिकटघर से कुछ हट के सो गए थे । असल में किसी होटल में रात रुकने की बात हम सोच ही नहीं सकते थे । यह हमारे लिए महँगा सौदा था । फिर एक रात की ही तो बात है । काट लेंगे कैसे भी ! कितने सारे लोग तो सोते हैं प्लेटफार्म पर । फिर हमारे साथ जनरल डिब्बे में आये बिरेभाट गाँव के छह लोग भी थे, वे भी यहीं सो रहे थे । इसलिए चिंता की कोई बात नहीं थी । पर रात में दो स्वीपरों ने हमें उठा दिया था, अपने झाड़ूवाले डण्डे से हमें कोंचते हुए, ``उठो-उठो, ये तुम्हारे सोने की जगह नहीं है ! बाहर जा के सोओ ! टिकट खिड़की के सामने सो गए हैं साले देहाती !''

मुझे उनके चेहरे याद नहीं हैं, याद है उनकी आवाजें... जो असामान्य रूप से गहरी चिढ़ और नफरत से भरी थीं । अगर आवाज का रंग होता तो ये गहरे काले रंग की चमकदार आवाजें थीं, और जिन्हें अपने ऐसा होने का कोई अफसोस नहीं था, दूर-दूर तक । उनके लिए यह रोज की बात रही होगी, बहुत सामान्य । और गाँव से आए लोगों के लिए भी ये लगभग उतनी ही सामान्य बात थी । उन्हें हर साल ऐसे ही पलायन करना होता है कमाने-खाने के लिए । ऐसे अपमानों का उन्हें काफी अभ्यास है- सहने का भी और भूलने का भी । थोड़ा कुनमुनाकर हम वहाँ से उठ गए थे और कोने की एक खाली जगह में चले गए थे अपना बोरिया-बिस्तर लेकर । और फिर वहाँ सो भी गए थे, बावजूद इसके कि वहाँ ठंडी हवा सीधी आ रही थी, बावजूद इस भय के कि फिर कोई और आकर हमें यहाँ से खदेड़ देगा... । और हम यहाँ से

भी उठकर किसी और जगह चले जाएँगे... ।

प्लेटफार्म के नीचे पटरियाँ दूर तक चली गई हैं, भोर के सफेद उजास में चमकती हुइंर्, काले साँपों की मानिंद... । इस भली-भली-सी शान्त सुबह में तौलिए से अपने हाथ-मुँह पोंछता मैं वहाँ आ रहा हूँ जहाँ दीदी बैठी है, हमारे सामान के साथ । एक सूटकेस और दो सफारी बैग ।

हम पहली बार घर से इतनी दूर आए हैं वह भी दिल्ली ! दीदी गौरी का इण्टरव्यू है फरीदाबाद में । हमें ट्रेन में मुसाफिरों से ही पता चला था कि फरीदाबाद जाने के लिए नई दिल्ली नहीं, बल्कि निजामुद्दीन उतरना पड़ेगा । इसलिए कल रात आठ बजे हम अपनी ट्रेन `छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस' के यहाँ रुकते ही उतर गए थे । हमारे साथ बिरेभाट गाँव वाले यात्री भी उतर गए थे जो दुर्ग से चढ़े थे । उन्हें नोएडा जाना है, जो शायद यहाँ से पास पड़ता है ।
मैं पच्चीस बरस का हूँ, बी.एससी. तक पढ़ा । दो साल से सरकारी नौकरी में हूँ- वन विभाग में क्लर्क की नौकरी । इसके बावजूद बड़े शहर का डर खत्म नहीं हुआ था । वह बना हुआ था । यह गहरा था और बहुत चमकीला । पता नहीं कब से हमारे भीतर अपनी जड़ें जमाए हुए । एक अविश्वास... और ठग लिए जाने का भय... । ठगे जाने का भय अपने सचमुच के ठग लिए जाने से बहुत बड़ा था । हालाँकि अपने शिक्षित होने का एक दंभ मैं इस सफर में अपने साथ रखे था- किसी जरूरी और उपयोगी औजार की तरह, पर वह सचमुच कोई खास काम नहीं दे रहा था । मैं यहाँ भी उतना ही कमजोर था । बल्कि गौरी मुझसे ज्यादा सहज थी यहाँ । क्या यह मेरी अतिरिक्त सजगता थी, जो मुझे और नर्वस कर रही थी ? इसका आभास मुझे सारे रास्ते इन देहातियों को देखकर भी होता था जो मुझसे कहीं ज्यादा निश्चिन्त लगते थे, मेरी किताबी पढ़ाई को कमतर सिद्ध करते हुए । जबकि मैं उन्हें देहाती और गँवार ही मान रहा था, अपने से हर हाल में पिछड़ा, पर मैं गलत था; क्योंकि उनके पैंतीस-चालीस उम्र के चेहरों में कुछ था जो मेरे नौसिखिएपन पर भारी था । मैं ठीक-ठीक समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या था ? उनका अनुभव ? दु:ख और कष्टों से जूझने का लम्बा और लगातार अनुभव, जिसे कोई किताब नहीं, सिर्फ और सिर्फ जीवन सिखाता है ।
कल रात खाने के लिए मैं स्टेशन के बाहर के एक ठेले से ब्रेड-आमलेट ले आया था । वे छह लोग गाँव से अपने साथ लाए एक मोटरे से अंगाकर रोटी निकालकर गुड़ के साथ खा रहे थे, बहुत तृप्त भाव से । उनके खाने में एक सुख था । साझा सुख । दो पुरुष, उनकी पत्नियाँ, उनकी अधेड़ माँ और छह-सात साल की उनकी एक बेटी का साझा सुख । मैं पा रहा था उनके इस साझे सुख को तोड़ पाना बहुत कठिन है ! ये अपना गाँव छोड़ आए हैं, यहाँ से कुछ कमाकर लौट जाने के लिए । और एक दिन यहाँ से लौटकर जाने का इनका विश्वास कितना सहज और गहरा है! और कितना मजबूत ! जैसे बरसों से इनके जीवन में यही होता आ रहा हो... ।
और मुझे देखो, इनसे आर्थिक रूप से अधिक सक्षम होने के बाद भी मेरे भीतर वैसा विश्वास नहीं !
बरामदे के उस कोने में जब मैं पहुँचा, दीदी तैयार बैठी थी, मानों अभी ही उसका इण्टरव्यू लिया जाना हो ! वह हल्के आसमानी रंग की साड़ी पहने थी, जिस पर गहरे नीले रंग का कंट्नस्ट बार्डर था । चेहरे से सफर की थकान उतर चुकी थी, और नई जगह जाने का उत्साह दिखता था । मैंने पाया, आज गौरी अच्छी लग रही है, बावजूद अपने चेहरे पर हमेशा नजर आने वाले एक बचपने के ।
``अरे, तुम तैयार हो गई, इतनी जल्दी ?''
``तू भी तैयार हो जा जल्दी । हमको दस बजे तक वहाँ पहुँचना है ।'' गौरी मुझसे कहती है । छत्तीसगढ़ी में । हम छत्तीसगढ़ी में ही बात करते हैं, घर हो या बाहर ।
``मेरा क्या है, अभी हो जाता हूँ ।'' मेरा थोड़ा लापरवाह जवाब, जिसमें निहित है कि तुमको मेरे बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं, मुझको पता है कि कब क्या करना है ।
``टिकिट कटा लिया ?'' वह पूछती है ।
``नहीं । कटा लूँगा । अभी टिकिट-खिड़की कहाँ खुली है ?''
``जल्दी कटा लेना । यहाँ तो हर काम में बहुत भीड़ है ।''
``हाँ, कटा लूँगा ।'' मैं उसे आश्वस्त करना चाहता हूँ, क्योंकि देख रहा हूँ, उसका विश्वास, आत्म- विश्वास दोनों गड़बड़ा रहे हैं । ऐसा होने पर वह कुछ ज्यादा ही पूछने या सवाल करने लग जाती है । तब उसे यह बोध नहीं रहता कि कुछ सवाल अपने लिए भी होते हैं जिनके उत्तर जरा सा सोचने पर मिल जाते हैं । पर नहीं, वह फिर पूछेगी, क्योंकि पूछे बिना उसे चैन नहीं मिलता । सत्ताइस बरस की अबोधनुमा लड़की... मानो किसी कारण से चौदह-पन्द्रह की मानसिक दशा में ही अटक गई हो... ।
हमारे ग्रामीण सहयात्री अपना सामान समेट रहे हैं । सामान क्या, पूरी गृहस्थी ! उनके इतने सारे सामानों के कारण मेरे भीतर उनके प्रति एक चिढ़ बैठ गई है... कि ये कौन-सा तरीका है सफर करने का ? पूरा घर लादे लिए जा रहे हो ! दूसरों को कितनी दिक्कत होती है, इसकी बिल्कुल भी चिंता नहीं ! पूरे रास्ते मुझे यह खलता रहा है, और अपनी चिढ़ को मैंने प्रकट भी किया है । पर इससे कुछ होना-जाना नहीं । वे अपना मामला अपने हिसाब से तय करेंगे ।
... प्लास्टिक की खादवाली चार सफेद बोरियाँ, जिनमें दो में चावाल हैं, बाकी दो में उनकी गृहस्थी का सामान... गंज, कड़ाही, थालियाँ, लोटा, गिलास आदि से लेकर एक स्टोव और मिट्टी तेल की एक प्लास्टिक केन । दो पुराने टिन के बक्से हैं, जिन पर पेंट किए चटखीले फूल बदरंग होकर जंग खाए धूसर रंग में घुल-मिल गए हैं । एक बक्से में ताला लगा है जबकि दूसरे की कुंडी में तार का टुकड़ा बँधा है । इनमें शायद इनके कपड़े-लत्ते होंगे । यही है इनकी छोटी, बेपर्द गृहस्थी । मोबाइल गृहस्थी । जगह-जगह इनके साथ घूमती-भटकती गृहस्थी । कभी लखनऊ, कभी आगरा, कभी दिल्ली, कभी होशियारपुर... ।
छत्तीसगढ़ के हर बड़े स्टेशन में इन्हें देखा जा सकता है, अपने ऐसे ही माल-असबाब के साथ, हर साल... । बाढ़ या अकाल के साल इनकी संख्या बहुत बढ़ जाती है... टिडि्डयों की मानिंद दिखने लगते हैं ये... । साल के छह महीने खेती कमाने के बाद ये निकल जाते हैं, जहाँ इन्हें काम मिल जाए... कुछ महीने मजदूरी के बाद रुपये कमाकर ये अपने गाँव लौट आएँगे, प्रवासी पक्षियों की तरह... ।
``तुम लोग नोएडा कैसे जाओगे ?'' मैं पूछता हूँ ।
``टेम्पो करके जाएँगे, बाबू ।'' साँवला अधेड़ मुस्कराकर कहता है । वह इस समय अपना कड़े रेशे वाला काला कम्बल तहा रहा है ।
``बड़ दूरिहा हे बेटा, इही पायके टेम्पो करत हन, नहीं त हम मन रेंगत चल देतेन !'' उसकी बुढ़िया माँ कह रही है हँस के । ...सच कह रही है वो, कि हम तो पैदल ही चले जाते । इनका वश चले तो सारा जहान ही पैदल घूम लें ! दूरी इनके लिए मायने नहीं रखती, पैसा मायने रखता है जो ये मुश्किल से हासिल कर पाते हैं । उनका सामान बँध गया । वे अब हमसे विदा ले रहे हैं ।
वह बूढ़ी माँ और उनकी दोनों बहुएँ दीदी से बहुत घुल-मिल गए थे । खुद गौरी भी । वे कह रही हैं दीदी से, बहुत आत्मीयता से- ``जाथन बेटी ! दुरुग आबे त हमर गाँव आबे ! दया-मया धरे रहिबे !''
परिवार के पुरुष मुझसे यही कह रहे हैं, हँसकर । अपनी गँवई सरलता में ।
``हौ, तुहू मन आहू हमर घर दुरुग में ।'' दीदी भी उनसे हँसकर वैसी ही सरलता से कह रही है । इस बात को बिल्कुल भूले हुए कि अभी कुछ ही देर में ये दुनिया की बड़ी भीड़ में न जाने कहाँ खो जाएँगे... शायद हमेशा-हमेशा के लिए । फिर कभी नहीं मिलने के लिए, सिर्फ भूले-भटके कभी याद आ जाने के लिए ।
अब मुझे लगा, छत्तीसगढ़ हमसे बिछड़ रहा है... । छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से हमारे साथ आया एक गाँव,
उसकी सहज-सरल गँवई संस्कृति हमसे बिछड़ रही है... अपनी आत्मीयता से हमें विभोर किए हुए... ।
मैंने दीदी को देखा, वह उन्हें तब तक देखती रही जब तक वे गेट के बाहर नहीं चले गए । उसकी मुस्कुराहट में एक उदासी और अजीब-सा खोया-खोयापन था । दिल्ली को वह बिल्कुल भूल चुकी थी इस समय ।
एक पल के लिए मुझे सूझा कि उसे याद दिलाऊँ कि वह दिल्ली में है... पर लगा, दिल्ली की याद दिलाना अभी उसको आहत करना होगा, एक अन्याय होगा । ऐसे समय में दिल्ली को दूर रखना ही ठीक है । दिल्ली को हर समय अपने साथ रखना एक बड़ी बीमारी है... कई छोटी-बड़ी बीमारियों से मिलकर बनी एक बड़ी और खतरनाक बीमारी, जिसका ठीक होना मुश्किल होता है... ।
ये लड़की दिल्ली में रहेगी ?
मैंने शायद सौवीं बार यह सोचा होगा... या शायद हजारवीं बार ! मैं बहुत अविश्वास से अपने सामने की सीट पर बैठी गौरी को देख रहा था, जो ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रही थी, और ऐसे खोई हुई देख रही थी जैसे उसे अभी देर तक सिर्फ यही करना हो ! सुबह साढ़े छह की `शटल' इस समय अपनी पूरी स्पीड में भाग रही थी । खिड़की के शीशे गिरे हुए थे, फिर भी ठंडी हवा नीचे से सेंध लगाकर घुसी आ रही थी । ट्रेन उसी दिशा की ओर जा रही थी जिधर से हम आए थे । एक पल के लिए मुझे लगा, हम लौट रहे हैं... ।
फरीदाबाद, ओल्ड । हम वहीं जा रहे थे ।
``दो टिकट फरीदाबाद !'' मैंने भरपूर आत्म-विश्वास का प्रदर्शन करते हुए टिकट काउण्टर पर बैठे क्लर्क से कहा था । लेकिन उस फ्रेंच-कट दाढ़ी वाले गोरे क्लर्क ने अपने चश्मे के भीतर से मुझे एक पल घूरकर पूछा था- ``फरीदाबाद ओल्ड कि न्यू ?'' मैं इस पर चकरा गया था । ओल्ड कि न्यू ? मुझे इसका कोई आइडिया नहीं था । हमें जाना है सेक्टर-१७ । अब यह ओल्ड है या न्यू, नहीं पता । मैंने दसियों बार गैरी के कॉल-लेटर में संस्था का एड्रेस पढ़ा था, उसमें कहीं ओल्ड या न्यू नहीं लिखा है, फिर ये क्या चक्कर है ? इधर क्लर्क के घूरने में मेरे प्रति चिढ़ बढ़ती जा रही थी, सो मैंने बिना सोचे कह दिया, ``ओल्ड ।'' क्लर्क ने टिकट बना दिए । इससे ज्यादा वह मेरी कोई सहायता करने का इच्छुक नहीं था । मुझे लगा, टिकट देने के बाद जैसे उसने मुक्ति की साँस ली है, मुझसे पीछा तो छूटा !
ट्रेन में मुझे आश्चर्य था कि अपेक्षित भीड़ नहीं है । भीड़ क्या, पूरी सीटें लगभग खाली हैं । शायद इतनी सुबह के कारण । और बगैर भीड़ और धक्का-मुक्की के दिल्ली के ट्रेन की कल्पना करना मेरे लिए मुश्किल था । हमारे डिब्बे में मुश्किल से आठ-दस आदमी रहे होंगे । मेरे दाएँ कोने की सीट पर एक अधेड़ पुलिसवाला आराम से सो रहा था, अपना मोटा भूरा कोट पहने । शायद जी.आर.पी. का कर्मचारी हो, रात पाली ड्यूटी से घर लौटता हुआ । मुझे सोया हुआ पुलिसवाला एक जागे हुए पुलिसवाले से ज्यादा अच्छा लग रहा था । लगता था, अगर वह जाग गया तो उसके जागने के साथ ही उसका `पुलिस-मैन' भी जाग जाएगा, उसके सिरहाने पड़ी बेंत भी जाग जाएगी, समूचा थाना जाग जाएगा, और वह ऐसा शान्त और निर्विकार नहीं नजर आएगा । तुम्हारे सामने कोई पुलिसवाला सोया हो, तो तुम भी वही शान्ति महसूस कर सकते हो जो मैं महसूस कर रहा था ।
हवा में जनवरी के अन्तिम सप्ताह की ठंडकता थी । बहुत । जब छू जाती तो हम सिहर उठते । दिल्ली की ठंड के बारे में हमने अभी तक केवल सुना था, अब महसूस कर रहे थे । फिर भी लगा, हम किस्मत वाले हैं जो शीतलहर नहीं चल रही है । हमारा बचाव अपने साधारण गर्म कपड़े में हो जा रहा है । दीदी ने कत्थई शॉल कस के लपेट रखा है, और मैं पूरी बाँह का स्वेटर पहने हूँ, हल्के आसमानी रंग का । यह हमने यहाँ आने के पहले ही खरीदा है- दिल्ली की ठंड से मुकाबले के लिए ।
मेरा ध्यान हमारे यहाँ आने के मकसद पर आया । गौरी का इण्टरव्यू । सुबह के दस बजे का समय दिया है । दीदी का इण्टरव्यू-लेटर मेरे पैंट की जेब में पड़ा है । मटमैले भूरे रंग के लिफाफे के भीतर का वह कागज, जिसका उसे पिछले तीन महीने से इन्तजार था । यह एक प्रतिष्ठित स्वयं-सेवी संस्था का इण्टरव्यूलेटर है, जो अनाथ बच्चों के लिए काम करती है । मैं ट्रेन में इस समय दीदी के चेहरे पर अपने साक्षात्कार को लेकर थोड़ी चिंता या गंभीरता देखना चाहता था, जिसके लिए हम इतनी दूर आए हैं । पर यह नदारद ।
गौरी खिड़की के बाहर के दृश्यों में ही इतना रमी थी मानों भूल गई हो, कहाँ आई है और किसलिए । मुझे यह देखकर पहले थोड़ी चिंता हुई, फिर गुस्सा आने लगा । मैंने उसका ध्यान हटाने के लिए पूछा, ``गौरी, तुम्हारी तैयारी है न पूरी ?''
``हाँ, कर ली हूँ,'' उसका संक्षिप्त जवाब ।
अब मैं नया प्रश्न ढूँढ़ने लगा । और झल्लाया मन ही मन- बेवकूफ लड़की ! इसका कुछ नहीं हो सकता । वह अभी भी बाहर के दृश्यों को बच्चों की उत्सुकता से देख रही थी, और अब उसके चेहरे पर मौजूद यह भोलापन मुझे चुभने लगा था । ...तो हमारा इतनी दूर आना व्यर्थ हो जाएगा ? भूल गई कि उसे नौकरी की कितनी सख्त आवश्यकता है ? और खुद भी तो बाबू से लड़कर यहाँ आई है ! बाबू, जाने क्यों, नहीं चाहते थे कि दीदी इतनी दूर जाकर काम करे- ``अभी यहाँ एक स्कूल में पढ़ा तो रही है, फिर क्या जरूरत है दिल्ली जाने की !'' लेकिन बाबू भूल रहे थे कि एक छोटे से प्राइवेट स्कूल की अस्थायी और बहुत कम वेतन वाली नौकरी के भरोसे जीवन नहीं काटा जा सकता । गौरी और मैं दोनों ही समझ रहे थे कि यह अच्छा अवसर है, नियुक्ति शायद आगे चलकर स्थायी हो जाएगी । और मैं पा रहा था, यह काम गौरी के स्वभाव और योग्यता के हिसाब से भी ठीक है... ।
अब मैं यहाँ की प्रतिस्पर्धा के बारे में सोच रहा था, जिसका कोई ठोस और निर्धारित रूप मेरे सामने नहीं था । मुझे पता है कि यह दिल्ली है । देश की राजधानी । देश भर के प्रतियोगी आए होंगे । उनसे मुकाबला । और हमेशा लगता कि दूसरे निश्चय ही हमसे ज्यादा अच्छे हैं- रंग-रूप में ही नहीं, शिक्षा- दीक्षा, परवरिश, ज्ञान और व्यवहार में भी, ...कि हममें ढेर सारी कमियाँ हैं... कि हम एक बहुत पिछड़े परिवार से हैं... आर्थिक और मानसिक दोनों स्तर पर । पता नहीं क्या और कैसे होगा!... गौरी इण्टरव्यू बोर्ड में बैठे अधिकारियों को प्रभावित कर सकेगी, सचमुच?
मुझे इण्टरव्यू के लिए प्रतियोगी पत्र-पत्रिकाओं की ढेर सारी बातें याद आने लगीं जो वे इण्टरव्यू में सफलता के लिए बताते हैं, जिन्हें अपनी बेरोजगारी के दिनों में पब्लिक-लाइब्रेरी में बैठकर मैं पढ़ता रहता था । ये सफलता के कुछ नुस्खे बताते, आपका आत्म-विश्वास बढ़ाते । मसलन ये बताते कि इण्टरव्यू कक्षा में आपको कैसे प्रवेश करना है, कि आपके जूते खट-खट की आवाज करने वाले न हों, आपकी हेयर स्टाइल कैसी हो, आपके चेहरे पर बोर्ड-मेम्बर को नमस्कार करते वक्त कितने सेंटीमीटर की मुस्कान होनी चाहिए, कि आपके शर्ट और पैण्ट के रंग बहुत सौम्य होने चाहिए, कि आप उनके सामने सर झुकाकर या आँखें चुराकर बात ना करें, खुद को बहुत आत्म-विश्वास और स्पष्टता से प्रस्तुत करें, मेज पर अपनी उँगलियाँ न बजाएँ, आपके बातचीत का लहजा संतुलित, सहज और आत्मीय होना चाहिए एक गरिमामय ढंग से... । जिन सवालों के जवाब आपको नहीं आते हों, स्पष्ट बता कर क्षमा माँग
लें, यह आपके गोल-मोल या अस्पष्ट जवाब की तुलना में ज्यादा प्रभावी होगा । और इण्टरव्यू समाप्त होने के बाद सभी महानुभावों का मुस्कराकर धन्यवाद देते हुए आपको बाहर निकलना है... ।
लगभग ऐसी ही बातें होती थीं हर प्रतियोगी पत्र-पत्रिकाओं में । पढ़ते हुए मैं कल्पना में खुद को अत्यन्त मेधावी, शालीन और व्यवहार-कुशल उम्मीदवार के रूप में पाया करता था, और किसी काल्पनिक इण्टरव्यू में पाता कि बोर्ड के अधिकारी मेरी योग्यता से बहुत प्रसन्न हैं और मेरा चयन हो गया है... ।
मेरा सपना तब टूटता था, जब म्युनिसिपल लाइब्रेरी का चपरासी मनबोधी लाइब्रेरी बन्द होने के आठ बजे के नियत समय के पहले ही ``चलो, टाइम हो गया'' कहते हुए पत्र-पत्रिकाओं को सहेजना शुरू कर देता और छत पर धीरे-धीरे घूमते बाबा आदम जमाने के पंखों का स्विच ऑफ कर देता । इस समय मनबोधी का चेहरा अजब ढंग से मनहूसी और कड़वाहट से भरा लगता था, और वक्र । मानों यहाँ आनेवाले लोग एकदम निठल्ले और फालतू हैं जो यहाँ अपना टाइम-पास करते बैठे हैं! और कड़के इतने कि कभी कोई एक कप चाय के लिए भी नहीं पूछता !
...मैं नहीं जान पा रहा था, इस समय गौरी के मन में क्या चल रहा है । सोचा, उसे अपने पढ़े हुए को बताऊँ... । पर मेरे ज्ञान बघारने से वो कहीं और नर्वस न हो जाए? उसे घर में ऐसी बातें कहता ही रहता हूँ कि वह अपना आत्म-विश्वास बढ़ाए, खुद को ज्यादा मजबूत बनाए... । तब अभी ये सब कहने का क्या तुक? मैं सहसा मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा कि इसका भला हो जाए, हालाँकि भगवान जैसी किसी चीज पर मेरा विश्वास बिल्कुल नहीं है, इसके बावजूद यह हो रहा था, अपने-आप ।
`शटल' बहुत तेजी से दौड़ रही है... ।
धड़-धड़-धड़-धड़...धड़-धड़-धड़-धड़... ।

कैलाश बनवासी 
४१, मुखर्जी नगर, सिकोला भाठा, दुर्ग-४९१००१ (छत्तीसगढ़) मो. ०९८२७९९३९२०

बया में प्रकाशित कैलाश वानखेड़े की कहानी - घंटी

घंटी
काका थकते नही कभी. थकान को काका के चेहरे पर कभी सवार होते हुए नहीं देखा. किसी ने भी. बरसों बीत गए इस तरह हंसता मुस्कुराता चेहरा देखते हुए. मान लिया गया कि तकलीफ नहीं है काका को. भरा - पूरा परिवार और बच्चों की नौकरी के बाद बचता क्या है जीवन में. सुन सुनकर सच ही मान लिया इसे काका ने. लेकिन जीवन में सुबह आज उस वक्त नहीं आई जिस वक्त रोज आती है. नींद खुलती है और सुबह खड़ी दिखती है. आज रोशनी नहीं दिखी, दिखा अंधियारा. आज 26 जनवरी है. झण्डा फहराने का दिन. आज काका को पूरी नींद चाहिए लेकिन नहीं मिली. सुबह मिले नी मिले, नौकरी तो करनी है के साथ ही बिस्तर छोड़ा और सफेद कपडों पर इस्तरी करवाने धोबी के घर चल पडे़, मुंह धोये बिना. कपड़ों की इस्तरी करवाने के इरादे पर थकान सवार होने लगी. सचमुच आज थक गये काका लेकिन मानने को तैयार नहीं. इस तरह तो काका हमेशा ही काम करते है, हॅंसते हुए, बतियाते हुए लेकिन कल हंसी नहीं थी. काम था. बोझ भरे बोल थे जो पूरे शरीर को छलनी कर गये.

थकान भरे मन से उसी शरीर को घर से लेकर दफ्तर आये. सफाई की और पानी हैण्डपम्प से निकालते-निकालते आखिरकर चेहरे की रौनक निकल गई. आज ही जानी थी रौनक ?

बचा था तिरंगे को बांधने का काम इसलिए पानी लेकर बैरोनक आए. तिरंगा काका ही बांधते आ रहे है. आजाद चौक का तिरंगा बांधने के बाद दफ्तर पर तिरंगा, छत चढकर बांधना पड़ता है. तिरंगे तक पहुंचने के लिए सीढ़ी नहीं है. बबूल के कॅंटीले झाड़ पर चढ़ने के बाद छज्जे पर फिर दोनों हाथों से ताकत लगाकर जंप करना पड़ता है. फिर छत आती है. छत पर फ्लेग स्टेण्ड है. उस पर चढती है रस्सी. रस्सी पर होता है तिरंगा, जो इस तरह से मुड़ा हुआ होता है कि नीचे खड़े साब जब रस्सी को झटका देते है तो गॉंठ खुलती हैं. साब हमेशा झटका देता है. झटका शब्द दफ्तर के अलावा उस दुकान के सामने बोर्ड पर लिखा मिलता है, जहां मटन बिकता है. झटका ....... झटका लगा था काका को. अब झंडे की बारी है. गांठ बॉंधने की कला में माहिर हैं काका, सभी कहते है. काका और तिरंगा एक दूसरे से जुडे हुए हैं. काका न हो तो तिरंगा कौन बांधेगा ? यह सवाल इस बरस काका के कान ने सुना. काका तिरंगे के भीतर गुलाब के फूल की पंखुडिया और गुलाल रख रहे तब, तब गुलाब की खुशबु आ रही तभी काका की जगह कौन लेगा ? सुना, सुनकर अचकचा गए और फिर अपना ध्यान केन्द्रित किया. हडबडाहट में गलती न हो. वरना निपट जाओगे, यही कहा था साब ने. अभी तक इस तरह के शब्द नहीं सुने थे. क्यों निपट जाउंगा ? जब गलती ही नहीं करूंगा तो ................

तो भी निपट जाओगे ........ इतना मुंह मत चलाओ
कुछ भी ............ कुछ भी समझ नहीं पाए थे काका. साब के कहने के बाद.

समझ में तो अभी भी कुछ नहीं आ रहा. गुलाब की पंखुरियॉं का स्पर्श सुकून नहीं दर्द दे रहा. तिरंगा का कपड़ा कुछ ज्यादा ही खुरदरा लगने लगा. जबकि काका जानते है खादी खुरदरी ही होती है. फूल और गुलाल की मनाही के बावजूद फूल और गुलाल, झण्डे के भीतर रखे जा रहे हैं. नियम कायदों का पालन क्यों नहीं करते .......... क्यों नहीं पालन करते तमीज से बात करने का ..... निपट जाउंगा .... ? मैं तो निपटूंगा लेकिन तुम भी नहीं बच पाओंगे मिश्रा साब. जेल हो जाएगी जेल. मेरा क्या ? इस बुढ़ापे में अब बचा ही क्या ? लगातार गांठ बंध रही, झंडे के लिए, काका के लिए.

दफ्तर के झंडे की तमाम गांठे बांधने के बाद पुलिस लाईन वाला झण्डा बचा था. पुलिस लाईन पर जिले का सबसे बडा कार्यक्रम होता है. मंत्रीजी आते हैं. रात को सोते हैं और सुबह सलामी लेते हैं. यहां पर भी उतना ही चौकस रहना जरूरी हैं. मेरे बाद कौन ? सवाल के साथ निपट जाओगे, का प्रहार लगातार झेलते हुए पुलिस लाईन की तरफ जा रहे है काका. रोड पर बच्चे है. बच्चों के हाथ में प्लास्टिक के झण्डे हैं. पुलिस लाईन की तरफ जाते हुए हॅंसते खिलखिलाते, उमंग और जोश के साथ. बच्चों को देखकर ही आई मुस्कुराहट. मुस्कुराते हुए कदमों ने गति बढा ली.

यहां मंच पर झण्डा बांधने के लिए पुलिस के जवान भी है.
‘‘क्यों काका देर कर दी ?‘‘ अपनत्व से भरे अल्फाज वर्दी से निकले.
‘‘हॉं, हो गई थोडी देर, पर हो जायेगा.‘‘
‘‘काका हो, तो किसे फिकर ?‘‘ हंसी निकली भरोसे और सुकून से भरी हुई वर्दी से और उसकी चमक काका के सफेद कपडों पर आ गई.
फिकर की बात से याद आया, झगडिया कह रहा था झण्डा बडा रिस्की चीज है. कटा-फटा, उलटा लग गया तो नौकरी पे आ जाती है. तो भई इससे दूर ही रहना भला है‘‘
‘‘तू तो हर काम से दूर रहता है.‘‘ काका ने कहा था.
‘‘दूर रहने का जमाना है. फंस जाओ तो कोई हथेली नी लगाता. उल्टे फंसवा देते है.‘‘
‘‘ऐसा काम करना ही नहीं चाहिए.‘‘
कौन भडवा करता है. खुद हो जाये तब की बात के रहा हूं.‘‘
‘‘साब लोग है न.‘‘
‘‘ये साब, साब मेरे सामने मत किया कर. कितनी भाग दौड करता है तूझे. स्वर्ग मिलेगा ....... ? उतना ही दौड़ाकर जितनी उमर है. ज्यादा टेंशन पालेगा, नरक भी नी मिलेगा. तेरी उमर नहीं रही अब, कुछ तो सीख, कितना बदल गया जमाना. तू नी बदला. अब बदल जा वरना खटिया पर खांसते-खांसते तेरा टे हो जायेगा.‘‘ झगड़िया बोलता है तो एक सांस में बोलता है वरना चुप ही रहता.
‘‘फिकर करनी चाहिए साब लोगों की. उनकी कलम से ही घर चलता. रोजी रोटी देते है.‘‘ संतन काका कह रहे थे लेकिन कोई समझना नहीं चाह रहा था.
‘‘साब है कोई भगवान तो नहीं. साब की तो ऐसी की तैसी........ उसके घर से पगार देता है क्या ? वो भी सरकार का नौकर हम भी सरकार के नौकर. वो बड़ा नौकर हम छोटे नौकर. क्या फरक हैं उसमें - हम्मे. वो अंदर बैठता. हम बाहर. वो भी इंसान हम भी इंसान ?‘‘
‘‘तो भी बहुत अंतर है‘‘ काका का अंतिम तर्क था.
‘‘तेरे दिमाग में है. दिमाग मैं. तेरे दिमाग में वो गांव वाली बात है न साली. वही घुसी है. बडे लोगे छोटे लोग वाली. बड़े लोग जैसी बात है साली. ना वो बदलना नहीं चाहते है और न बदलने देते है. उस पर तुम जैसे मिल जाते हो जो बदलना ही नहीं चाहते.‘‘झगडिया उतर आया था मैदान में. कुछ नहीं बोल पा रहे थे संतन काका. सिर्फ बोलने के लिये बोला,‘‘ तू बदल गया न वहीं बहुत है.‘‘
‘‘तू तो बिल्कुल नी बदला ..... तू तो वैसा ही है ............ फिर भले ही इनाम मिले नी मिले.‘‘ झगड़िया ने दुखती रग पर हाथ रख दिया था. बोलती बंद कर दी थी काका की अप्रैल में कहे हुए शब्दों ने.

काका हर साल उम्मीद बटोरते, पालते और 26 जनवरी के दो एक हफ्ते पहले ही उन उम्मीदों के बिखरने का वक्त आ जाता. उत्कृष्ट कार्य के लिए चतुर्थ श्रेणी से एक कर्मचारी का चयन किया जाता और मंत्रीजी के हाथों पुरस्कार दिया जाता है. उस पुरस्कार को पाने की लालसा अभी भी उतनी ही जवान है, जितनी नौकरी के पहले साल भर थी. हर साल की तरह साल भर दफ्तर के गलियारे और होटल गुमटी के भीतर वह सुनता. लोग सुनते. सब कहते सबसे मेहनती और हर समय हाजिर होशियार अगर कोई है तो वह काका. सुनकर काका की खुशी पूरे शरीर के भीतर दौड़ लगाती.पूरा शरीर महसूस करता. उत्साह उतना ही बढ़ जाता. पूरी मेहनत, जी-जान से घर वाली की परवाह किये बिना काम करते. कहते है लोग तिरंगे का काम काका के अलावा कोई कर भी नहीं सकता. कोई करना भी नहीं चाहता. जोखिम का काम है. कोई साहस नहीं करता. न अफसर न चपरासी. सिद्धहस्त, काबिल भरोसे लायक कोई है तो बस काका. काका को लगता सौ बका और एक लिखा होता है. इसीलिए चाहता है प्रमाण-पत्र.

इसी उम्मीद में ही काका ने कोई जवाब नहीं दिया था झगड़िया को. बात से बढे़गी बात और ये अच्छी बात नहीं है. वही खडा था रामनाथ. साब के कान भरेगा रामनाथ. चुगल खोर. सुबह शाम साब के घर हाजरी लगाता. छोटे मोटे काम बाजार के करता फिर इधर-उधर भटकता, सट्टा लगाता, लगवाता, इसे ही मिला इस साल का उत्कृष्ट कार्य का पुरूस्कार. पता नहीं क्या देखते है साब लोग. साहब लोग तो अच्छे होते है ...... इसी विचार को फिर पकड़ते है काका. सोचते, अब साब की क्या गलती ? जब ठण्ड बहुत थी कितनी मेहनत की थी रामनाथ ने. साब के घर की रखवाली. सब्जी लाना. बच्चों को स्कूल छोड़ना. किराना सामान लाना. क्या नहीं किया था रामनाथ ने ? दफ्तर के काम के अलावा. रामनाथ के पास लूना है. पुरानी ही सही लेकिन काम तो करती है और उसी के कारण झटपट काम कर लेता. वहीं काका को साईकिल चलानी भी नहीं आती. हालांकि साब के घर के लिए पहले काका का ही नाम रखा गया था सामने. बडे़ बाबू ने बोला था काका को यह जानते हुए कि ताउम्र नहीं किया काका ने बंगले पे काम, अब भी नहीं करेगा. लेकिन काका ने एक सिरे से नकार दिया.‘‘ बंगले पे काम नहीं करूं. चाहे जितना काम बताना हो. यहां, वो बता देना. घण्टी पे बैठना, डाक देने जाना, पानी पिलाना सब कर लूंगा लेकिन बंगले पे काम नी करूं.‘‘ बड़े बाबू को ताज्जुब के साथ अपमान लगा. चार घण्टे बंगले पर काम होता है. यहां काका सुबह 9 से शाम 6-7 बजे तक काम करता है लेकिन बड़े बाबू की इतनी सी बात नहीं मानता. कौन से अपने घर का काम करवाने का कह रहा हूं. एक मामूली से चपरासी की ये औकात ? इतनी हेकड़ी ? दिमाग के भीतर विचारों ने दिमाग में ही किसी कोने में न जाने क्या क्या कब से रखा था. उन सबको जगा दिया. लेकिन बडे़ बाबू ने जुबान से मिठास से कहा.‘‘ ठीक है काका.‘‘ काका को बडे़ बाबू ने रवाना किया और खुद को साब के कमरे के भीतर.

‘‘बंगले के लिए काका को बोला. लेकिन वो गुस्से में बोला, साब कौन होते है मुझे बंगले पर काम बताने वाले ...... मैंने समझाया उसे. बंगले का झाडू लगाना, पौंछा और दो घण्टे का काम दिन भर आराम लेकिन काका बात समझने को तैयार नहीं. वो तो बोला, चाहे नौकरी ले लो लेकिन इस साब के बंगले का काम नी करूं ...... फिर समझाउंगा काका को .......‘‘उतार चढाव में अपनी बात सरका दी बड़े बाबू ने चश्में को नीचे सरकाकर गर्दन झुकाते हुए साब के कान से दिमाग के भीतर.

‘‘कोई जरूरत नहीं समझाने की.‘‘

पांचवा दिन था साहब का, यहां ज्वाईन करने के बाद घर पर चपरासी की नितांत आवश्यकता थी और जरूरत यह भी कि आते से ही रौब जमा लिया जाय. लेकिन ये अपमान लगा था. भीतर तक लगा.

‘‘क्या नाम है उसका ?‘‘
‘‘जी काका कहते है सभी‘‘
‘‘काका .... नाम तो होगा उस चपरासी का ?‘‘

काका ..... चौहान काका भी कहते है उसे ?‘ बड़े बाबू भूल चुके थे नाम. मिश्राजी को बड़ा अजीब लगा. इतने बरस होने के बाद भी बडे़ बाबू को चपरासी का नाम तक नहीं मालूम, नाम नहीं मालूम, लगातार प्रश्नों के सीसे उलझन की आग में गरम होने लगे. सम्भाला, संयत किया और मिश्राजी ने फिर किया सवाल.

राजपूत है ?‘‘
‘‘अरे नहीं सर, मांगीलाल राजपूत में नहीं होते, मांगीलाल, हॉं मांगीलाल नाम है उसका‘‘

याद आने पर खुश हुए बडे बाबू मोगाम्बों की तरह और तप गए मिश्रा जी. सिर के ऊपर गरम सीसा, परत की तरह चेहरे पर गिरने लगा, पूरे चेहरे पर गरम सीसा छा गया था.

‘‘बुलाना उसे ?‘‘
‘‘मांगीलाल .....? मिश्राजी ने चेहरे पर क्रूरता से भरी मुस्कुराहट आ गई. ‘‘मांगीलाल का मतलब क्या होता है बड़े बाबू ?‘‘ जानते हुए पूछते है मिश्राजी.
‘‘मांगने वाला............ मंगता...... मांग मांग कर खाने वाला......... मना करता है झाडू लगाने से‘‘
यह भी गजब है बडे बाबू, हम जमाने को कहते है कि हम ही है मंगते, मांग कर खाने वाले, वो तो और गजब है, भीख को हम भिक्षा कहते, कहते है दान.‘‘
‘‘सर ये मांगीलाल तो सरकारी दामाद है, सरकारी कोटे वाला.‘‘
हम भगवान के दामाद है. धार्मिक कोटा .............है ना बडे़ बाबू.
सर ................. भक्त है, पुजारी है सर
पुजारी ? ............. भक्त .............. क्या मजाक करते हो ? अपनों से ही ............


बुलाया गया, काका हाजिर हुए.
‘‘क्या नाम है रे तेरा ?‘‘ तू तड़ाक कर मिश्रा बोले.
‘‘साब जी............‘‘
समझ ही नहीं पाए काका. जवाब सुझा ही नहीं.
नाम पूछा है नाम ............ क्या नाम है तेरा ?”
‘‘काका ? ये नाम है या सरनेम है तेरा ?” तल्ख अंदाज था.
‘‘मांगीलाल चौहान‘‘
क्या समझता है खुद को ?
‘‘कुछ नी‘‘
‘‘तो ज्यादा समझ में आ रही है ?‘‘
‘‘नी साब‘‘ हॅंसता हुआ चेहरा खो गया था.
‘‘ये दांत क्यों दिखा रहा है ?‘‘

कुछ नहीं बोले काका. लगा कुछ गड़बड़ हो गई. अंदाज लगाया बडे़ बाबू को मना करने का नतीजा ही है. सिर झुकाये हाथ बांधकर खड़े थे काका. सफेद झक दांत को अंदर बिठा दिया.

‘‘क्यों खड़ा है .......... चल काम कर अपना‘‘ ऑंखे दिखाई थी साब ने. चश्में के भीतर से बाहर आ गई, बड़ी बड़ी ऑंखे. मेरी उम्र का तो लिहाज करना चाहिए, सोचा और बाहर चल दिए काका.

आप फिक्र न करें सर. मैं देखता हूं. बड़े बाबू ने अपने आदेश की अवहेलना करने वाले को दे दी सजा. निशाना सही जगह बैठा था. अभी जुलाई बीत रहा था. एक बारिश के बाद फसलों को खुद के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया था मौसम ने. काका को साब ने. कहते है लोग कि अगर अगले दो चार दिन में बारिश नहीं हुई तो मर जायेगी फसल. फसल की चिंता, नहीं दिखती अखबार में, समाचार में. सोने के भाव, शेयरों की चढ़ाई, नये मॉल खुलने की बातों के बीच काका धॅंस गए किसी खेत की मेढ़ पर.

काका ने दफ्तर की याद, मरती हुई फसल और खेत की मेढ़ से निकलते हुए पुलिस लाईन के तिरंगे को आखरी गॉंठ बॉंधी और उदासी बिखर गई काका के भीतर. मैदान में स्कूली ड्रेस में बैठे और खड़े बच्चों के कदमों तले, जहां धूल थी, कंकड़ थे वहां आम जनता नहीं है. नहीं आती आम जनता, न बुद्धिजीवी, वहां उपस्थित है बच्चे और अपमानित होता हुआ काका का मन.

‘‘बंध गई गॉंठ अच्छी तरह से ? ‘‘ वर्दी ने आश्वस्ती चाही और खेत और दफ्तर से बाहर हुए काका के मन के भीतर हजारों गॉंठ बॅंध चुकी थी. एक दिन में गॉंठे कितनी भारी हो गई. नहीं उठा पा रहे है काका. ऑंखों में नमी और जबान में भारी पन के साथ कहॉं‘‘ हां बंध गई ...... मजबूत है.‘‘

‘‘कोई बात हो गई काका ?‘‘

‘‘नहीं कुछ नी‘‘ हंसी की गॉंठ खोलनी चाही. झटके मार मारकर लेकिन नहीं खुल सका मन. नहीं रूकना चाहा. लेकिन रूक गए कदम. जब तक झण्ड़ा फहराया नहीं जाता तब तक सफेद टोपी पहनकर ही खडा रहना पडे़गा. झण्डे़ के पीछे, लोगों के पीछे. इतना पीछे कि सामने क्या हो रहा है दिखता नहीं. फिर झण्ड़े को ही देखना पड़ता है. लोगों को नहीं. गरदन उठाकर इत्मीनान होता है कि तिरंगा बॉंध दिया है मजबूती से.

अगले दिन दफ्तर खुला. खुले स्मृति दिन बडे़ बाबू के, मिश्राजी के. मिश्राजी ने कहा ‘‘जगत के काका को, मांगीलाल बनाओ भई‘‘ बडे़ बाबू ने सुना, मुस्कुराहट लाई और चल दिए बडे़ बाबू होटल की तरफ. पीछे से रामनाथ ने आवाज लगाई ‘‘ साब ने बोला कल साढे़ दस बजे रजिस्टर पे अपसेंट की क्रास लगाना.‘‘ सुना और तत्काल लौटे बडे़ बाबू साहब के कमरे में.

‘‘काका सुबह नौ बजे आकर पूरे दफ्तर में झाडू लगाता है. फिर हैण्डपम्प से पानी तीन मटकों में भरता है और रात होने पर ही घर जाता है. इसलिये हाजरी के लफडे़ में मत पड़िए सर.‘‘ कुर्सी पर नहीं बैठे बडे़ बाबू. खडे है. पूरे सम्मान के साथ और अदब के साथ धीरे से बोले.

‘‘है क्या ये ?‘‘ सवाल को समझ कर नहीं समझे बडे़ बाबू.
‘‘उसको निपटाने के लिए दूसरा तरीका अपनाना पडे़गा सर.‘‘

‘‘अच्छों अच्छों को निपटाया है मैंने. ये है क्या ....? क्या औकात है‘‘ मिश्राजी तैश में आ गए. बडे़ बाबू ने अपने अनुभव देते हुए किसी और तरीके से फंसाने के तरीकों पर चर्चा की. जिसे रणनीति बताया जाता है. काका का चाल चलन, व्यवहार, शौक सोहबत के साथ तमाम कमजोरियों को एक एक कर ढूंढा गया. विश्लेषित किया गया लेकिन सफलता नहीं मिली. सिविल सेवा आचरण नियम में दर्ज कदाचरण के तहत क्या-क्या आ सकता है और उसे कैसे लागू किया जा सकता है, सोचने के बाद निर्ष्कष ने शून्य का साथ दिया तब रामनाथ को बुलाया गया. बडे़ बाबू ने मिश्राजी को कहा ‘‘अपने वाला है, भरोसेमंद‘‘

‘‘जानता हूं बडे़ बाबू. विचित्र किस्म की हंसी आई मिश्राजी के चेहरे पर फिर बोले, “सबसे पहले इसी बात की खोज करता हॅं.‘‘

नमस्कार कर एक कोने में खड़े होने के बाद रामनाथ से पूछा गया‘‘ काका कभी तो पीता होगा.‘‘
‘‘अभी तक तो नी सुना.‘‘

‘‘तुम्हारे साथ है. तुम अच्छी तरह से जानते होंगे. उसकी कमजोरियां. डाक लाने में लेतलाली करता है. बुरा बोलता है. कुछ तो गड़बड़ होगी उसमें.‘‘ मिश्रा साब बेबस थे, कैसे समझाये कि कुछ तो बोले... सच नहीं बोल सके तो ये झूठ बोले. झूठ. लेकिन बेवकूफ टाइप का लगा रामनाथ. जिसे बोलने का मौका मिलता है, वह झूठ को सच में मिला देता है. झूठ से भरी किवदंती मिथक में तब्दील होती हुई इतिहास बन जाती है. ये स्साला अपना वाला होकर इतना भी नहीं जानता है कि झूठ बोलना कितना जरूरी है. बेवकूफ........... इस तरह के लोगों के कारण ये दिन देखने पड रहे है.

रामनाथ तमाम विरोध और काका से जम न पाने की पीडा के बावजूद कुछ नहीं बता पाया तो बोले मिश्रा जी, ‘‘वह इतना दूध का धूला है या तुम्हारी ऑंख दिमाग समझ नहीं है ? समझ में नहीं आ रहा कि क्या चाह रहा हूं ?”

दिनभर की मेहनत भाड में चली गई. ऐसा कोई आरोप ऐसा कोई बात जिसके कारण काका को निपटाये, सूझ नहीं पड़ रहा. जांच दण्ड तो बहुत की और करवाई. मिश्राजी ने सैकड़ों को पटरी पर लाया. बीस साल की नौकरी में जब जी चाहा उसको छोटी सी बात पर निपटा दिया. कांपते थे कर्मचारी, पता नहीं किस बात पर रगड़ दे और यहां पर एक अदने से चपरासी को निपटाना मुश्किल पड रहा. ये हार है अपमान है या पद को चुनौती. खुद को या कुर्सी को. मिश्राजी ने जाना ये दोनों को चुनौती दी गई है. ये दोनों का अपमान है. आदेश की अवहेलना हैं. इतनी लम्बी नौकरी में चपरासी की ये मजाल जो घर का काम करने से इंकार कर दे. हमारे घर का, जहां इस तरह के आदमी के कदम तो क्या गंध भी वर्जित है, वहां झाडू लगाने से मना कर दे ? सोचते-झुंझलाते परेशान होते रहे मिश्राजी. उससे ज्यादा झटका लगा कि रामनाथ समझ नहीं पा रहा है. समझा नहीं पाएंगे रामनाथ को. मिश्राजी की उम्र 50 पार हो गई और बाल सफेद होने लगे जिसे डाई से काला करवाते है. मूंछ को भी काली करवाते है. तोंद के नीचे बेल्ट कुछ ज्यादा टाइटलगने लगा. तोंद बढ़ी नहीं फिर टाइट कैसे? ऐसे वक्त में मिश्रा जी का हाथ न मूंछ की तरफ जा रहा न बेल्ट की तरफ. वे टेबल पर रखे पेपरवेट को उछालने लगे. उन्हें लगने लगा, चपरासी जिसे सभी काकाकहते है वो सामने आ जाए तो उसका सिर फोड़ दें. मांगीलाल का खून बहा दे. दिल को सुकून मिलने के वे तमाम तरीकों पर सोचते रहे और परेशान होते रहे. ये उसकी मजाल ? उसकी दो टके का आदमी.

शाम ढली तो बडे़ बाबू फिर आ गये साहब के सामने. मूड़ बदल गया होगा, के साथ. वे सीधे कुर्सी पर बैठ गए. रामनाथ को पहले ही चाय का बोल दिया था. कुछ कहते उसके पहले रामनाथ चाय के साथ हाजिर हो गया. नये कप में आई चाय. ओंठ से लगाया कप और जबान के उपर चढ़ा दी चाय कि रख दिया कप और बोले मिश्रा जी ‘‘ये चाय है या ................... इतनी भी अक्ल नहीं है.‘‘

‘‘क्यों छन्नू की दुकान से नहीं लाया था.‘‘ बड़े बाबू ने तत्काल कमान सम्भाल ली. तो काका को बोल अच्छी चाय बनवा के लाये.‘‘ बडे़ बाबू ने गुस्सा तोडना ही चाहा लेकिन दांव उल्टा हो गया. ‘‘उसको क्यों भेज रहे हो, ये जायेगा, लायेगा.‘‘
‘‘फिर आप नाराज होगें. ........ ‘‘बडे़ बाबू कमरे से उठकर बाहर आये. अजीब आदमी से पाला पड़ा है, खुद से कहा.

कैलेण्डर न होता तो पता ही नहीं चलता कि दिन बदल गये. महिना बदल गया. लेकिन मिश्राजी नहीं बदले. बदले तो इस तरह कि अब काका का हॅंसता चेहरा, याद कर सोचते, काश मैं भी इतना हॅंसमुख होता. इतनी उमर में बाल सफेद न होते, न निकलवाना पड़ती दाड़, दांत पीले न पड़ते, होते काले बाल काका की तरह तो कितना अच्छा होता. इस उम्र में भी कितना टनहै ये काका, पता नहीं क्या क्या खाता है साला. दिल भी हुआ कि पूछे कि क्यों रहता है इतना खुश ? क्या राज है ? क्या खाता पीता है ? पूछने में क्या बुराई है ? मिश्राजी के अन्दर से किसी आदमी ने कहा, वे सोचते उसके पहले ही दूसरे ने कहा, उससे पूछोगे ? उससे ? उसकी क्या औकात है, करोगे बात मांगीलाल से ..................? करोंगे ...... कि क्या खाता है क्या पीता है. खाने पीने की बात करोगे उससे .......... ?

जवाब आया तो लहुलुहान होकर. बैचेन हो गए मिश्राजी. बैचेनी बढ़ गई तो बडे़ बाबू को बुला लिया. चाय पीने के लिए. ऐसा अक्सर होता. मिश्राजी का जब मूड़ गड़बड़ होता तो वो बडे़ बाबू को ही बुलाते. बडे़ बाबू किचन तक जाते. बडे़ बाबू बेडरूम में घुस सकते. बडे़ बाबू के भरोसे ही रहता पूरा घर. बहुत खुल गये मिश्राजी. यहां दफ्तर में बडे़ बाबू के अलावा कोई और है नहीं. जिससे बात की जा सके. बात करने के लिए भी दस जरूरत होती है. बड़े बाबू अपने वाले है. नर्मदा के पार वाले. नर्मदा नदी पावन नदी है. दर्शन मात्र से पाप धुल जाते. नर्मदा स्नान के लिए सपरिवार गये थे मिश्राजी, बडे़ बाबू के परिवार के साथ. महेश्वर घाट इतनी भीड़ में नहाने के लिए न चाहते हुए उतर गए और ऑंखों में जलन हुई कि मंत्र पूरे बोले उसके पहले ही बाहर निकले. निकल गई गालियां, हरामियों के कारण कितनी गंदगी बढ़ गई. पूरे बदन में खुजली हो रही. ऑंख जल रही. पता नहीं कौन-कौन आ जाते है नहाने. ‘‘नर्मदा नदी में इतनी गंदगी ? जब दर्शन से ही पुण्य मिल जाता है, तो साला नदी में जाने की क्या जरूरत थी ? ये तो मूर्खता है, साली मूर्खता ............ और ये साले गंवार, न जाने कहां कहां से चले आते हैं और नदी में डुबकी लगा देते है ............ गंदे स्साले सारी गंदगी इनकी ही है, पता नहीं कब से नहीं नहाते है-गंदे................. ये सारा इन्ही का किया धरा है, सारी आबादी तो इन्हीं की है. हम है ही कितने ? सोचते है पुण्य मिलेगा, स्वर्ग मिलेगा ........ नरक बना रखा है ... पूरा देश ही नरक बन गया ............. वो जमाना भी क्या जमाना था ........... सतयुग जब इनकी छाया भी हम पर नहीं पड़ती थी...... अब कलयुग आ गया .......... कलयुग.......... महेश्वर घाट की घटना अचानक ही याद आ आई. आये नहीं अब तक बडे़ बाबू.

अब दफ्तर में ही बनती है चाय. रामनाथ के हाथ बनती है चाय. घर से आता है चाय के लिए पानी. दूध का पैकेट सॉंची कार्नर से आता है, आधा लीटर, सांची गोल्ड. सुकून मिलता है चाय पीने में. अपने घर का पानी, अपनों के हाथ से बनी चाय दुगुना स्वाद देती है. उसी स्वाद में डूबे डूबे पूछा ‘‘उस चपरासी की उमर कितनी होगी ?‘‘

‘‘इसी साल रिटायरमेंट है.‘‘
‘‘ये बताओ, मेरी उम्र कितनी होगी ?‘‘
‘‘मुझसे दो तीन साल बडे़ होंगे.‘‘

बडे़ बाबू न होते तो थूक देते बोलने वाले के मुंह पर मिश्राजी. इतना गुस्सा आया. मिश्राजी बडे़ बाबू को 55-56 साल के आसपास का समझते है और खुद 50 साल के होकर भी 40 के खुद को लगते है. मिश्राजी उम्मीद कर रहे थे कि ये 40 के आसपास लग रहे है, ऐसा कहेगा मगर इस हरामी ने तो बूढ़ा बना दिया. साला 50 ही बोल देता. जो है उतना ही बोलता. क्या इसने मेरी सेवा पुस्तिका नहीं देखी ? बोलना ही था तो अपने से छोटा बोलता. झुर्रियों से भरा दिखा बडे़ बाबू का चेहरा. बालों को डाई लगाने से उम्र छोटी नहीं होती. सिंग काटने से ढ़ोर बछड़ा नहीं बन जाता. चाय अधूरी ही छोड़ी और छोड़ दिये बोल-‘‘बडे़ बाबू तुम हमसे बहुत बडे़ हो, उमर में, आईने को भले ही धोखा देना. मुझे कोई धोखा नहीं दे सकता.‘‘

‘‘मैं तो यूं ही अन्दाजन ....................‘‘
‘‘अरे ये कोई अन्दाज है ............. छोडो, ऑडिट पार्टी की व्यवस्था बराबर हो गई है ?‘‘

बडे़ बाबू के लिए अनपेक्षित था. जो लगा वो बोल दिया. इतना खुलने के बाद तो समझना चाहिए. बडे़ बाबू भूल गये कि अफसर अपनी उम्र कम, अनुभव और बुद्धि दूसरों से ज्यादा समझते है. अब दस बाते और सामने आ गई बडे़ बाबू के. मिश्राजी का टोन, बोल, बर्ताव बेहद घटिया है और तो और आता जाता कुछ नहीं. बस जोर से बोलते है. जोर से बोलने से कोई बुद्धिमान नहीं होता. अपने आप को पता नहीं क्या समझते हैं ? बड़े बाबू समझ गये कि पहले वालों की तरह ये भी चापलूसी ही पसन्द करता है. इतनी सी देर में कितना विश्लेषण कर डाला बड़े बाबू ने मन ही मन में और उन विचारों को हटाकर बोले- ‘‘सर आपके आर्शीवाद से सब ठीक है. आप चिन्ता न करें.‘‘

मिश्रा जी को चिन्ता तो थी लेकिन वह पीड़ा देकर आनंद लेने की. वह नहीं मिल रही. काका को कभी इन्दौर तो कभी भोपाल की डाक लेकर भेजा जाने लगा. शाम ढलने के इंतजार में डाक रोके रखते है और जब दफ्तर बंद होने लगता है तब लिफाफा पकड़ाया जाता है. ‘‘कल सुबह इस डाक को लगा देना. हॉं, पावती जरूर लेना. अब काका तुमसे ज्यादा भरोसेमंद कोई नहीं. कोई नहीं भरोसेलायक.‘‘ बड़े बाबू समझाते है. काका सोचते है मीठे बोल बहुत अच्छे लगते थे पहले. उनमें अब कीडे नजर आने लगे. इतना मेहनती हूं भरोसेमंद हूं तो फिर क्यों नहीं देते प्रमाणपत्र ? क्यों दौड़ाते समय असमय. काका जानते है इस मुस्कुराइट, समझाईश को. सुन्दर आकर्षक पैकिंग के भीतर जमा किये हुए षड़यंत्र को. परेशान करने की नियत को. लेकिन कुछ नहीं कहते है इस बारे में काका. मुस्कुराते है अपनी सदाबहार खुशी के साथ. हंसते हुए ही कहते है काका, ‘‘कोई बात नहीं. अभी सीधे निकल जाता हूं. सात वाली बस खडी होगी. आखिरी बस है, उसी से निकल जाता हूं. सुबह डाक लगा दूंगा.‘‘

इंकार नहीं. विवशता नहीं. परेशानी नहीं. समस्या नहीं.. कुछ नहीं झंझट. घर की चिंता नहीं. खुद की चिंता नहीं. बताते है बडे़ बाबू तो परेशान हो जाते है मिश्राजी. ‘‘ये आदमी है या कुछ और. पैसा, भूख, सोना, हगना ....... कुछ भी नहीं सोचता ये आदमी?‘‘ कहते हुए परेशान हो जाते है मिश्राजी. परेशानी पूरे कमरे में फैल गई. काका, मटमैला धुंआ, जिनके विषैले कण छा गये. पूरे कमरे में भर गए. कुछ नहीं दिख रहा है, कुछ नहीं सूझ रहा है मिश्राजी को. वे सोचते है ये परेशान क्यों नहीं हो रहा है. कितनी जगह टाईम बेटाईम दौड़ाया जाता है इसे, दौड़ जाता है. कहता नहीं कुछ भी. नहीं मांगता मदद. नहीं जोड़ता हाथ. नहीं झुकता. जैसे कि कोई मशीन हो कि बटन दबाया और चल दी. हर बार. हर बार मुस्कुराते हुए जाता है और लौट आता है. कब खाना खाता, कितना वक्त घर पर रहता. हर दम इतना तरोताजा कैसे रहता है. खिला हुआ फूल. इस उम्र में भी ? मुझसे कम से कम दस साल बड़ा होगा. बल्कि ज्यादा. रिटायरमेंट के करीब है. सेवा पुस्तिका में व्यक्तिगत जानकारी पढ़ने के बाद ही जाना और जानकर दुःख के अलावा कुछ भी नहीं मिला. काका के परेशान न होने और खुश होने से जन्म लेती है मिश्राजी की पीड़ा और फिर बढ़ती जाती है.

पूनम के चांद ने अंधेरे के अहसास को कम किया लेकिन काका की भूख ने मजबूर किया कि घर जाये. घर जाने में दिक्कत है. साहब अभी बैठे है. दफ्तर के आडिट के चक्कर में सब बैठे रहते. मैं बैठा हूं तो कुछ अलग नहीं हूं. ठीक है सुबह से कुछ नहीं खाया. एक दिन न खाये तो मर तो नहीं जाता आदमी और आड़े वक्त काम न आये तो फिर काहे की नौकरी. चाय-पानी का वक्त नहीं काका के पास. साब के कमरे में भजिये थे. काका तब स्टोर रूम में थे. अंधेंरे कमरे में सालों पुरानी चीजों की सफाई करते हुए. तभी पुकार लगी थी और वैसे ही अंधेरे से निकले तो बल्व की रोशनी ने ऑंखों में मिर्ची सी रोशनी का झोंका दे दिया. अंधेरा रोशनी के साथ ऑंखों के भीतर आ गया. गलियारे से साब के कमरे में दाखिल हुआ.

‘‘अभी तक काम खत्म नहीं हुआ ?‘‘ सवाल है साब का.
‘‘जी करता हूं.‘‘

‘‘तुम लोग कामचोरी कब बंद करोंगे ? दो दिन से दो कमरे साफ नहीं हो रहे. मक्कारी मत करो, दो घण्टे में पूरी सफाई चाहिए मुझे ..................... अब खडे़ खडे़ हमें खायेगा क्या ? ............. काम कर काम‘‘ बदन को लहुलुहान करते शब्दों में मिर्ची है, खुले हुए घाव पर ड़ाले जाने वाली मिर्ची के अलावा कुछ नहीं. पूरे तनमन को काटकर मिर्ची रखी गई. अब सूझ नहीं पडे. क्या जवाब दे. नौकरी में ये पहला मौका है. काका को ड़ॉंट कभी नहीं पड़ी थी. ये डांट नहीं थी. ये तो मान मर्दन था. कितना काटा. अबोध बच्चे को कुत्ते इसी तरह काटते है. अस्पताल के पीछे कुत्ते और सूअरों को देखा है जो भ्रुण को काटते खाते है. कुत्ता ही है साब, खूंखार कुत्ता. यही सोचते हुए काका ने भरपूर थूक इकट्ठा किया, और कमरे के पास बहते हुए गंदे पानी में थूंक दिया. थू .................. थू.................... थू............... इतनी तीखी आवाज थू-थू की थी कि साब के कमरे में चली गई.

‘‘कौन मादर .................... थूक रहा है.................... चीखे साब. चीख को सुना काका ने और जोर से थू दिया ............... थू.......... खांसी चढ़ आई. खांसी ने लाल रंग, मिर्ची वाला ऑंखों में चढ़ा दिया. बदन में दौड़ा दिया. न बैठते बने न खड़े रहते. खांसी का दौर शुरू हुआ. लगातार खांसते रहे और लगातार बजती रही घंटी ........... घंटी पर रामनाथ की ड्यूटी है. रामनाथ नहीं दिखता घंटी पर. रामनाथ के ही जिम्मे है साहब की चाय-पानी और नाश्ता. रामनाथ के अलावा कोई चाय या पानी नहीं ले जाता. काका का काम दफ्तर खोलना बंद करना, पानी भरना, सफाई करना और डाक बांटना है. डाक का काम झगड़िया भी करता लेकिन उसे लापरवाह मानकर काम नहीं दिया जाता. न उससे दूसरा काम लिया जाता. एक तिवारी था उसने अपना तबादला ससुराल करवा लिया. वह साहब के बंगले का चपरासी था. कभी कभार दफ्तर आता था. घूमने-फिरने. सबके काम बंटे हुए थे. काका का मन घंटी की आवाज के साथ भटकने और घूमने लगा.

काका ने खांसी रोकी और फिर पानी पेड़ की जड़ पर चढ़ा दिया.
‘‘दीवाले तुड़वायेगा तू. इनको पानी दे दे के.‘‘ रामनाथ ने प्रकट होकर कहा.
‘‘इसकी छाया में एक दिन बैठेगा तब समझ में आयेगी.‘‘
‘‘तब तक दुनिया में कौन रहता है भगवान जाने. बेमतलब अपना दिल नहीं लगाना चाहिए काका, कुछ समझ में आया.‘‘
‘‘इसकी तो समझ में नी आये. बच्चे को नौकरी लग जाने के बाद भी दिन रात यही काम करता है. काका का बेटा यहां भी आता है और रिटायरमेंट लेने का कहता है. लेकिन ये किसी की भी न माने. भगवान जाने इसकी आत्मा यहीं हो.‘‘ झगड़िया आ चुका था घर जाने के लिए.
‘‘लोग बाग अच्छे बच्चों के लिए तरसते है. ये बच्चों को तरसाता है. कितना कहते हैं रिटायरमेंट ले लो लेकिन इस भोले भण्ड़ारी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता.‘‘
‘‘काका को दफ्तर का नशा है नशा. दफ्तर के बिना चैन नहीं पड़ता काका को. छुट्टी के दिन भी कमरों की सफाई करके ही आत्मा को शांति मिलती है‘‘
‘‘काका की तो यहीं कब्र खोदनी पडे़गी.‘‘ रामनाथ बोला.

झगड़िया ने हंसते हुए कहा, ‘‘इसे गाड़ना नी रे, नहीं तो उठ उठ के देखेगा-सफाई हुई की नहीं, मटके में पानी डाला की नहीं, डाक बंटी की नहीं, इसलिए जलाना पडे़गा काका को. ‘‘रामनाथ चाह रहा था काका कुछ कहे लेकिन काका ने खामोशी ओढ़ी और स्टोर के दरवाजों पर ताले जडे़. अपने अपने घरों की तरफ चल पडे़.

काका बैठते है जब थोड़ी मिलती है फुरसत, तो बात करते है अहिरवार बाबू और काम्बले बाबू के साथ. 26 दिसम्बर था दिन. उसी दिन बोल रहे थे बड़े बाबू ‘‘एक महिना रह गया 26 जनवरी को. ‘‘नया झण्ड़ा लाने के लिए मिले थे रूपये. तब आकाश में सूरज छिपा हुआ था और काले बादल थे. उत्तर भारत की शीत लहर का असर था. धूप के लिए खड़े थे और बात हो रही थी ‘‘सबके लिए पानी‘‘ कार्यक्रम के पंड़ाल से बाहर खड़े खडे़.

‘‘तो काका जिस पानी को मटके में भरते हो, उस पानी लिए लडे़ थे बाबा. बाबा साहब ने 26 दिसम्बर को चवदार तालाब से पानी के लिए आन्दोलन चलाया था. पानी सबके लिए होना चाहिए. अरे और तो और देश के आजाद होने के बाद संविधान में लिखना पड़ा सबके लिए एक जैसा होगा. लेकिन आज भी उतना फरक नहीं पड़ा जितना होना चाहिए. ‘‘बोले अहिरवार बाबूजी. ‘‘लडाई लड़ी तब मिला पानी का हक.‘‘

‘‘क्रांति तो हुई थी लेकिन अधूरी. आज भी कई हरामियो के पिल्लों को नहीं पच पाता. अभी भी पानी नहीं मिलता सबको. आज भी कई गांवों में सभी के लिए नहीं है सभी कुएं, सभी हैंडपम्प. अब तो बांट दिए पानी के लिए और तो और अब बोतल बंद पानी का जमाना आ गया. इसे हम जैसे पी नहीं सकते है तब बाबा साहब पानी के लिए लड़े थे आज भी हालात नहीं बदले है. वे ही लोग है, उन्हीं लोगों से लड़ना है. वे ही नहीं चाहते सबको मिले साफ पानी. पानी के लिए फिर लड़ना होगा. पानी के लिए अब नये अम्बेड़कर को आगे आना पड़ेगा. ‘‘अहिरवार बाबूजी गुस्से में बोलते बोलते रूके.

‘‘काका, सारे दफ्तर के लोग पानी पीते है तुम्हारा भरा हुआ लेकिन तुम्हारे साब और बडे़ बाबू क्यों नहीं पीते. ‘‘काम्बले बाबूजी ने पूछा.
‘‘वो घर का लाते इस कारण.‘‘ काका ने कहा.
‘‘गिलास में तो यहीं पे भरते है.‘‘
‘‘कौन भरता है गिलास में पानी ?‘‘ जानते हुए पूछते है काम्बले.
‘‘जिस की ड्यूटी हो वो ----- वो रामनाथ.‘‘ काका ने सहज उत्तर दिया.
‘‘इसके पहले कौन पिलाता था पानी ?‘‘ अहिरवार बाबूजी ने जिज्ञासा जगाने के लिए पूछा.
‘‘तिवारी. फिर उसके पहले पंड़ित जी-------बस.‘‘

काका सोचते गए बोलते बोलते.

‘‘तुम क्यों नहीं ?‘‘ अहिरवार बाबूजी में यही खराबी मानी जाती. वे आक्रमण करते.
‘‘क्योंकि मेरी ड्यूटी नहीं.‘‘
‘‘क्यों नहीं ?‘‘
‘‘साब की मर्जी‘‘ काका ने कहा और चल दिए थे.

मैं क्यों नहीं ? यह सवाल काका के आगे आगे घर से दफ्तर तक चलता रहा. स्टोर में ताले लगे थे और दिमाग में खुल रहे. कुछ मौके आये थे जब घंटी पर रामनाथ या तिवारी नहीं होता तो काका पानी पीला देते. कितनी बार पिलाया होगा ? तो कुल जमा पूरे चालीस साल की नौकरी में चार-छः बार. वे गिनते है वक्त और साब और सुनते है घंटी की आवाज. कर्कश. साब के पास बड़े बाबू है. दोनों फाईलों में डूबे हुए. ऑडिट का जवाब बनवाते हुए. यह जानते हुए कि साब दफ्तर का पानी नहीं पीते यह समझते हुए कि पानी पिलाने की ड्यूटी रामनाथ की है. काका को नहीं दिखा रामनाथ. याद आये काम्बले तो पानी के लिए बढे़ काका. काका को पानी पिलाना पुण्य काम लगता. वह हर किसी को पानी पिलाते. पीने वाले आदमी का चेहरा असीम तृप्ति दे जाता. पानी इतना महत्वपूर्ण है.

‘‘कोई रेलगाड़ी छुट रही या लाड़ी मर रही जो भागे जा रहा है.‘‘ झगड़िया ने ताना मारा.
‘‘ऐसा कुछ नी ......................... तू रहने दे‘‘
‘‘अरे साब तो निकला बाहर, वो देख‘‘
‘‘शायद दौरे पे जा रहे हो. ऑड़िट है ही साला खराब. दिन रात जान लेने पे तुला है. छोड़ तू‘‘

पानी का गिलास लेकर आये काका यह जानते हुए भी कि कुर्सी से उठ गये साब. लेकिन जीप की आवाज आने से आशा थी कि अभी गाड़ी रवाना नहीं हुई. मतलब साहब नहीं गये. पानी पिला दूं. बहुत प्यास लगी होगी. कल थूक ही निकाला था, मन तो वैसा ही था काका का, उसी मन में खयाल आया पता नहीं किस गांव जा रहे ? वहां का पानी कैसा क्या होगा ? गांव के लोग तो बिना देखे परखे सोचे समझे पीते है पानी. कितना गन्दा होता है गांव का पानी. यह काका ने दफ्तर के कांच के गिलास में साफ पानी को देखने के बाद ही जाना था. अब साब जिस गांव जा रहे वहां हैण्डपम्प होगा ? पता नहीं कब लौटे ? इतनी तेजी से आये सवाल- चिन्ता और यादे जो कदमों से सौ गुनी तेज होगी. सोचा और धोकर गिलास, भरा पानी. कांच के गिलास में भरे स्वच्छ पानी को देखा, स्वच्छ मन से. कहीं कोई गंदगी या कचरे का अंश तो नहीं ? लेकर गिलास साहब के कक्ष की तरफ चल दिए कि सामने से बड़े बाबू आये. बड़े बाबू ने पानी मांगा. बड़े बाबू को कभी नहीं पिलाया पानी. बडे़ बाबू के मुंह में पान हमेशा रहता. बड़े बाबू ने पान थूक दिया गलियारे में. ‘‘इतने साल हो गए मगर ये स्साला. समझ नहीं आती. चूना तेज कर दिया भो ------ वाले ने.‘‘ पानी से निकाला पान. जबान से निकाली गाली और इतने में दिल नहीं माना तो कहा- ‘‘ये साहब भी ------ पता नहीं क्यों नहीं समझते. छोटी छोटी बातों के जवाब में दिन भर लगा देते. न खुद चैन लेते न लेने देते. बड़े़ बाबू चूने के असर को खत्म करने के लिए लगातार पानी मुंह में लेकर थूकते और बड़बड़ाते रहे. काका के दिमाग में मुस्कुराहट की नस दौड़ने लगती है जिसे चेहरे पर आने से रोकते है. खाली गिलास में उतार देते है मुस्कुराहट. उसे लेकर फिर जाते है मटके के पास.

घण्टी बजती है फिर लगातार. भुनभुनाते है मिश्राजी. उतारते है बडे़ बाबू पर. ‘‘इतनी छोटी सी बात आपके भेजे में नहीं आती. ‘‘कागज फेंकते है मिश्राजी और उठते है कुर्सी से.‘‘ पानी, पानी कब से कर रहा हूं. कोई सुनता ही नहीं. स्साले जाहिल कहीं के. कहां चला गया रामनाथ का बच्चा. ‘‘बोलते-चिखते हुए मिश्राजी कक्ष से बाहर आ गये. टकराते हुए बचे काका. छलक गया पानी.

‘‘सर, पानी‘‘ नम्रता से ही कहा काका ने, जो इतनी मासूम थी कि चीख, गुस्सा और गाली से टकराकर नीचे गिरी और पानी की बूंद में मिल गई. मिश्राजी ने गिलास हाथ में लिया.

‘‘तू क्यों लाया रे पानी ? तेरी ड्यूटी है ? बेवकूफ ........... मक्कार अपना काम तो करता नहीं और चला आता है ---- चल भाग, यहां से ...............गिलास फैंक दिया. कांच का गिलास सैकडों टुकड़ों में पानी से बिछड़ कर बिखर गया. कांच के टुकड़े प्यासे हो गए या मासूम पानी की बूंदे. कुछ भी समझ नहीं पाये काका, इस तरह से चार लोगों के बीच अपमानित किया. क्या गलती की काका ने, काका सहित कोई भी समझ नहीं पाया. कई महिनो से प्रताड़ित हो रहे काका. ऐन 26 जनवरी के पहले दफ्तर के सारे कमरों की सफाई करवाने के बाद भी चैन नहीं पड़ा कि स्टोर की सफाई का हुकूम दे डाला था. डाक के लिए दौड़ाना ठीक था. लेकिन बेटाईम ? सिर चकराने लगा. प्रतिवाद करना चाहा लेकिन शब्द नहीं मिले, निर्जिव हो गए काका.

आज आठवा दिन है. नहीं गए दफ्तर काका. दिन रात घर पर ही पडे़ रहे. तबियत बिगड़ गई. दवा और डाक्टर से दूर रहे काका. उनकी जरूरत ही नहीं पड़ी. अब क्यों जाऊं डाक्टर के पास ? सनकी कहते है काका को. एक बार ठान ले तो ठान ले. फिर कोई संशोधन, परिवर्तन नहीं होता. सनक सवार हो गई, डॉक्टर को न दिखाने की.

‘‘नहीं देखी साहब ने एपलीकेशन. बोले चपरासी है कोई तोपचंद तो नहीं. लिखे तो आ भी सके. पैर तो नी टूटा.‘‘ रूआंसी हो गई काका की पत्नि. बुढ़ापा आ गया लेकिन कभी नहीं गई थी दफ्तर. जिन्दगी में पहली दफा गई. गुस्सा किया काका ने. मर जाऊं तब जाना दफ्तर. ऐसा बोलने के बाद झगड़िया के साथ आई थी और ये सुनने को मिला. नहीं सुनाया काका को और बुला लिया बेटे को. बेटा सेकंड क्लास अफसर है. बडे़ पद पर है. बहुत मानते है काका इस बेटे को. इसकी बात नहीं टालते है. दो दिन बाद आया बेटा.

‘‘डॉक्टर को दिखाते है बाबा.‘‘ बेटा ने कहा.
‘‘क्या हुआ है मुझे ? कौन सा रोग हुआ जो डॉक्टर के पास जाऊं ? तू तो ये एपलीकेशन दे आ फिर बात करते हैं.‘‘ काका संयत होकर बोल रहे. खुद को तौल रहे.
‘‘दे आऊंगा, मत करो फिकर उसकी. कुछ नी होता.‘‘
‘‘जानता हूं लेकिन कुछ ऐसा वैसा कर दिया तो बुढ़ापे में बदनामी नहीं झेल पाऊंगा. ये गई थी एपलीकेशन देने लेकिन नहीं ली. फेंक दी और गरियाने लगा. ये ना बोले लेकिन ऐसा ही हुआ होगा.‘‘ पत्नी की तरफ देखते हुए कहा काका ने. कुछ गुस्सा था, कुछ दर्द, कुछ अपमान, कुछ चिंता सभी को लेकर बेटा दफ्तर पहुंचा, उसी दिन शीत लहर फिर आई. फरवरी में बेमौसम ओले पडे़ और तेज आंधी में मजबूत पेड़ भी उखड़ गये, जो बचे वे लचीले थे. लचीला ही है बेटा. कर लेता है एडजस्ट. इस सर्दी में कांपते हुए बदन के साथ पहुंचा मिश्राजी के पास.

मैं मांगीलाल जी चौहान का बेटा हूं.‘‘ दफ्तर में पहुंचने पर भी पिता के साथ हुए बर्ताव को भुला नहीं पा रहा काका का बेटा.
‘‘कौन मांगीलाल ?” उपहासात्मक रूप में ही कहा मिश्राजी ने, जानते हुए.
‘‘आपके कार्यालय के भृत्य, काका कहते है सब.‘‘
‘‘तो‘‘
‘‘ये एपलीकेशन है‘‘
‘‘तो‘‘
‘‘तो रखिए‘‘
‘‘वह तो बिना बोले बताये भाग गया. उसकी तो डी ई स्टार्ट हो गई.‘‘
‘‘एपलीकेशन लीजिए आप.‘‘ जिन शब्दों का उपयोग चबा चबाकर कर रहे है. मिश्राजी वे नागवार लग रहे. पिता, पिता होता है. उनके बारे में इस लहजे में बात सुन नहीं पा रहा बेटा. तो भी संयत रहा.
‘‘इसकी कोई जरूरत नहीं. अपसेंट लग रही है.‘‘
‘‘एपलीकेशन लेने में क्या दिक्कत हो रही है आपको ? आप चाहे नामंजूर कर दे.‘‘
‘‘नामंजूर तो पहले ही हो गई ?‘‘
‘‘बिना एपलीकेशन ?‘‘
‘‘इसमें मेडिकल कहां लगा है ?‘‘
‘‘बाद में लगायेंगे ?‘‘
‘‘वो तो कल मार्केट में मटरगश्ती कर रहा था.‘‘
‘‘माइन्ड योर लैंग्वेज सर वो मेरे पिता हैं.‘‘
‘‘वो बीमार कहां है ?‘‘
‘‘वो वास्तव में बीमार है‘‘
‘‘तो बिस्तर पकडे़. बाजार में ----------.‘‘
‘‘आप खाम खां सलाह दे रहे है.‘‘
‘‘आप मेरा समय बर्बाद कर रहे है.‘‘
‘‘आप नियमों के तहत काम नहीं कर रहे है.‘‘
‘‘आप कौन होते है सिखाने वाले.
‘‘आपको एपलीकेशन तो रखनी ही पडे़गी.‘‘
‘‘ये आपका हुकुम है या आपके बाप का.‘‘
‘‘हम सबके बाप का. ये रही एपलीकेशन अब जो बने सो कर लेना.‘‘

‘‘धमकी दे रहा है तू, मेरे दफ्तर में, मेरे दफ्तर में तू धौंस दे रहा है ........ तू मुझे जान से मारेगा. सरकारी काम में बाधा डाल रहा है. कोई पुलिस को बुलाओ.‘‘ मिश्राजी की आवाज गलियारे में आ रही है. सब सुन रहे है. सुन रहे काका जो बेटे के पीछे पीछे चले आए दफ्तर. काका सुन रहे और बेटे के साथ हो रहे बर्ताव को झेल रहे, मेरे बेटे को ............ मेरे बेटे के साथ ऐसी बातें ......... धमकी......... काका के कदम मिश्राजी के कक्ष के भीतर पहुंचे.

घंटी लगातार बजती रही. मिश्राजी बजाते रहे घण्टी और चिल्लाते रहे. कर्कश घंटी के बीच मिश्राजी के गाल पर पडे़ चांटे से सुर निकल रहे.

कैलाश वानखेड़े
संयुक्त कलेक्टर
जिला नीमच (म.प्र.)
मोबाईल नं. 09425101644

युवा कथाकार कैलाश वानखेड़े जी वर्तमान में नीमच में संयुक्त कलेक्टर  हैं. इनकी तीन कहानियॉं पूर्व में प्रकाशित हुई हैं, जिसमे से एक "अंतर्देशीय पत्र" को अखिल भारतीय कथादेश कहानी प्रतियोगिता में तीसरा स्थान मिला. इस कहानी पर कथादेश के अंकों में चर्चा भी हुई और ढ़ेरों प्रतिक्रिया भी प्राप्‍त हुई. कैलाश जी का जन्म मध्‍य प्रदेश के इंदौर नगर में 11 जनवरी 1970 को हुआ था. इन्‍होंनें समाजशास्‍त्र में एम.ए.किया एवं राज्‍य प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए. दायित्‍वपूर्ण प्रशासनिक कार्यों में अतिव्‍यस्‍त होते हुए भी कैलाश जी लेखन के लिए समय निकालते हैं, वे अपनी भावनाओं को कहानियों के माध्‍यम से अभिव्‍यक्त करना चाहते हैं. जीवनानुभव, भावनाओं एवं विचारों को शब्‍द देती उनकी रचना धर्मिता पाठक को चिंतन के लिए विवश करती है. इस माह हिन्‍दी साहित्‍य जगत में आई दो पत्रिकाओं में कैलाश जी की कहानी प्रकाशित हुई है. कथादेश के दिसंबर' 2010 अंक में प्रकाशित "कितने बुश कितने मनु" को हमने पिछले दिनों यहां पब्लिश किया था। बया के जुलाई-सितम्‍बर' 2010 में प्रकाशित कहानी ''घंटी '' को हम अपने पाठकों के लिए यहॉं प्रस्‍तुत किया है।

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