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जुलाई, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

एक पाती आधुनिकाओं के नाम : प्रो. अश्‍वनी केशरवानी

छत्‍तीसगढ के प्रो. अश्‍वनी केशरवानी के कृतित्‍व से आप पूर्व से परिचित हैं । उनकी तीन शोधपरक आलेख रवि रतलामी जी के चिट्ठे रचनाकार में क्रमश: रायगढ़ और राजा चक्रधरसिंह , शिवरीनारायण की रथयात्रा , गीतकार पंडित विद्याभूषण मिश्र अभी हाल ही में प्रकाशित हो चुकी हैं । हम उनका एक आलेख आज यहां प्रस्‍तुत कर रहें हैं जो आधुनिकता की अंधी दौड में भागती नारी के मन को अवश्‍य आंदोलित करेगा । आलेख : प्रो. अश्‍वनी केशरवानी देवियो जब मैं इस तरह आपको संबोधित करता हूं, तो आपको कोई बात नहीं खटकती ? आप इस सम्मान को अपना अधिकार समझती हैं। लेकिन किसी महिला को पुरूषों के प्रति 'देवता' कहते सुना है ? उसे आप देवता कहें तो वह समझेगा, आप उसे बना रही हैं। आपके पास दान देने के लिए दया है, श्रद्धा है, त्याग है, पुरूषों के पास देने के लिए क्या है ? वह अपने अधिकार के लिए संग्राम करता है, कलह करता है, हिंसा करता है,। इसलिए जब मैं देखता हूं कि उन्नत विचारों वाली देवियां उस दया, श्रद्धा और त्याग के जीवन से असंतुष्‍ट होकर कलह और हिंसा की दौड़ में शामिल हो रही हैं और समझ रही हैं कि यही मार्ग स्वर्ग का सुख है, तो

छत्तीसगढ सवेरा साप्‍ताहिक अखबार अब ब्‍लाग पर

छत्तीसगढ सवेरा भिलाई से प्रकाशित होने वाला साप्‍ताहिक फुल साईज का अखबार है यह वर्तमान में प्रत्येक शनीवार को प्रकाशित होता है । अखबार के स्‍वामी, प्रकाशक व मुद्रक क्षेत्र के तेजतर्रार पत्रकार अब्‍दुल मजीद जी हैं जो पूर्व में देश के मशहूर साप्‍ताहिक ब्लिड्ज के पत्रकार रहे हैं एवं क्षेत्र के लगभग सभी समाचार पत्रों को अपनी सेवायें दे चुकें हैं हम हमारी रूचि के कारण छत्तीसगढ सवेरा में बतौर मुक्‍त पत्रकार के रूप में उनका सहयोग कर रहे हैं । अब्‍दुल मजीद जी के अनुरोध पर उनके इस समाचार पत्र के कुछ अंश एक हिन्‍दी ब्‍लाग के रूप में यहां प्रकाशित कर रहे हैं भविष्‍य में हम इसे नियमित रखने का प्रयास करेंगें ताकि छत्‍तीसगढ से संबंधित समाचार अंतरजाल पाठकों को प्राप्‍त हो सके । देखिये अखबार के कुछ मुख्‍य समाचार छत्तीसगढ सवेरा http://cgsavera.blogspot.com/ ब्‍लाग पर हमारे नये प्रयोग को देखें एवं हमें सुझाव देवें ।

पाठकों के पत्र व्‍यंगकारों के नाम : विनोद शंकर शुक्‍ल - 3

पहला पत्र : हरिशंकर परसाई के नाम दूसरा पत्र शरद जोशी के नाम तीसरा पत्र रविन्‍द्रनाथ त्‍यागी के नाम हे व्‍यंग के ऋतुराज, आदाब ! गुस्‍ताख किस्‍म के खत के लिए माफी चाहता हूं । यों शायद मैं गुस्‍ताखी का हौसला न करता, अगरचे मरहूम शायर अब्‍दुल रहीम खानखाना मेरी हौसलाअफजाई न करते । खानखाना साहब फर्मा गये हैं --- ‘ क्षमा बडन को चाहिए छोटन को अपराध ।‘ इस शेर की रोशनी में छोटा होने के कारण मुझे गुस्‍ताख होने का हक मिल जाता है और बडे होने के कारण आपको माफ करने की सनद । जनाब, मैने आपकी कई किताबें पढी हैं । अहा, क्‍या प्‍यारी प्‍यारी फागुनी चीजें दी है आपने ? आपका हर्फ-हर्फ जायकेदार है, लाईन-लाईन सीने से लगा लेने के काबिल हैं । आप हिन्‍दी व्‍यंग की आबरू हैं, व्‍यंग के ऋतुराज हैं । अगरचे हिन्‍दी में और भी व्‍यंगकार हैं, पर आपके सामने सब फीके हैं । परसाई ग्रीष्‍म हैं, शरद वर्षा और श्रीलाल शीत । वसंत तो केवल आप हैं । मैं अक्‍सर अपने दोस्‍तों से कहता हूं, अगर तुमने त्‍यागी साहब को नहीं पढा, तो कुछ नहीं पढा, ऐसा ग्रेट राईटर सदियों में पैदा होता हैं ---- ‘हजारों साल हिन्‍दी अपनी बेनूरी पे रोती है, बडी

पाठकों के पत्र व्‍यंगकारों के नाम : विनोद शंकर शुक्‍ल 2

पहला पत्र : हरिशंकर परसाई के नाम दूसरा पत्र शरद जोशी के नाम दुष्‍ट-प्रवर, समझ में नहीं आता, मैनें तुम्‍हारा क्‍या बिगाडा है ? क्‍यों तुम हाथ धोकर मेरे पीछे पडे हो ? सीआईए जैसे किसी भी देश में गृह कलह करा देता है, वैसे ही तुमने मेरी छोटी-सी गृहस्‍थी में बवंडर उठा दिया है । तुम्‍हारे ही कारण कल मेरी पत्‍नी रूठकर मायके चली गई और मैं तब से अपने को बिलकुल अनाथ और असहाय महसूस कर रहा हूं । महाशय, मैं तुमसे व्‍यक्तिगत तौर पर बिलकुल परिचित नहीं, मैने तुम्‍हें कभी देखा नहीं, फिर तुम मेरे संबंध में सारी बातें कैसे जानते हो ? यदि जानते भी हो तो उसे अपनी रचनाओं के माध्‍यम से सार्वजनिक क्‍यों बना देते हो ? तुम्‍हें किसी के निजी जीवन में झांकने का क्‍या हक है ? शादी से पहले लिखी, मेरी प्रेमिका ( अब पत्‍नी ) की चिट्ठी जाने तुमने कहां से उडा ली और उसे जैसे का तैसा अपनी ‘पराये पत्रों की सुगंध’ रचना में प्रयुक्‍त कर लिया । क्‍या तुम्‍हारे पास अपनी अकल नहीं है ? बिलकुल यही तो शव्‍द थे मेरी प्रेमिका के ------ ‘डियर, मैं 26 को मेल से पहुंच रही हूं । उम्‍मीद है प्‍लेटफार्म पर वक्‍त से मिल जाओगे । अ

पाठकों के पत्र व्‍यंगकारों के नाम : विनोद शंकर शुक्‍ल

(अस्‍सी के दसक से आज तक व्‍यंग की दुनिया में तहलका मचाने वाले रायपुर निवासी आदरणीय विनोद शंकर शुक्‍ल जी को कौन नही जानता है उन्‍होंने अपने समकालीन व्‍यंगकारों पर भी अपनी कलम चलाई है । हम 1985 में रचित व प्रकाशित उनकी एक व्‍यंग रचना को यहां आपके लिए प्रस्‍तुत कर रहे हैं ) हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और रविन्‍द्र नाथ त्‍यागी की व्‍यंग तिकडी हिन्‍दी पाठकों के बीच अपार लोकप्रिय है । इनका अपना विशाल पाठक समूह हैं । एक समीक्षक किस्‍म के पाठक नें मुझे बताया कि परसाई को तामसिक, जोशी को सात्विक और त्‍यागी को राजसिक प्रवृत्ति के पाठक बहुत पसंद करते हैं । एक पाठक जो व्‍यंगकारों को साग-सब्‍जी समझता था, मुझसे बोला, ‘क्‍या बात है साब अपने व्‍यंगकारों की । सबके स्‍वाद अलग अलग हैं । परसाई करेला है, जोशी ककडी है और त्‍यागी खरबूजा है ।‘ उसकी बात से लगा, तीनो में से कोई भी उसे मिला तो वह कच्‍चा चबा जायेगा । हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास के मर्मज्ञ एक पाठक बोले ‘राजनीति उस समय फलती फूलती है, जब किसी चौकडी का जन्‍म होता है और साहित्‍य तब समृद्ध होता है, जब कोई तिकडी उस पर छा जाती है । प्रसाद, पंत और निराला क

दीवारों पर लिखा है

रायपुर, छत्‍तीसगढ से एक लोकप्रिय सांध्‍य दैनिक 'छत्‍तीसगढ' प्रकाशित होता है जिसके संपादक हैं वरिष्‍ठ पत्रकार सुनील कुमार जी । उनके इस समाचार पत्र के संपादकीय पन्‍ने पर प्रत्‍येक दिन दीवारों पर लिखा है नाम से कोटेशन प्रकाशित होता है । जो प्रत्‍येक दिन पाठक को बरबस अपनी ओर खींचता है एवं पढने व चिंतन करने को विवश करता है । सुन्‍दर सरल हस्‍तलिपि में लिखे गये इन शव्‍दों की कुछ कतरने आज हमारे एक दोस्‍त की डायरी के खीसे में अचानक हमें मिल गयी, हमने उसे पढा एवं हमें लगा कि इसे अपने चिट्ठे में सुरक्षित रख लिया जाए आपको कैसे लगी हमारे छत्‍तीसगढ अखबार की कतरने ।

क्‍या आपने कराया है अपने विवाह का पंजीयन

उच्‍चतम न्‍यायालय नें सीमा नामक महिला के स्‍थानांत‍रण याचिका पर विचार करते हुए विगत वर्ष विवाह पंजीकरण को आवश्‍यक करने हेतु नियम बनाने का बहुचर्चित आदेश दिया था जिस पर उस समय देश भर में काफी बहस हुआ था । कुछेक राज्‍यों नें इसे गहराई से न लेते हुए अपने तरफ से कोई सराहनीय प्रयास नहीं किया था । अब विगत सोमवार को उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायमूर्ति अरिजीत परसायत और न्‍यायमूर्ति लोकेश्‍वर सिंह पंटा की बेंच नें इसी मामले में सुनवाई करते हुए सभी राज्‍यों को इस उदासीनता पर नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है कि राज्‍य सरकारों नें विवाह पंजीयन को अनिवार्य करने हेतु कोई सार्थक कदम क्‍यों नहीं उठाया । न्‍यायमूर्ति द्वय नें राज्‍यों को इस हेतु से आठ सप्‍ताह में जवाब देने को कहा है साथ ही न्‍यायालय नें यह स्‍पष्‍ट किया है कि विवाह पंजीयन सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होने वाला होना चाहिए ताकि पूरे देश में इस अधिनियम में समरूपता आयेगी । छत्‍तीसगढ सरकार इस संबंध में बधाई का पात्र है । छत्‍तीसगढ सरकार के द्वारा सभी धर्म, जाति व मतावलंबियों के लिए विवाह का पंजीयन अनिवार्य करने के लिए कानून बनाने के सा

भिलाई स्‍पात संयंत्र में जंगरोधी रेलपांत का निर्माण

भिलाई स्‍पात संयंत्र नें पिछले कई वर्षों से लौह उत्‍पादन में एक से बढकर एक कीर्तिमान स्‍थापित कियें हैं । नेंहरू जी के स्‍वप्‍न को साकार करता यह संयंत्र रूस भारत मित्रता का सबसे बडा मिशाल है । इस संयंत्र नें पिछले कुछ वर्षों से रेलपांतों के निर्माण में भी कीर्तिमान स्‍थापित कर रहा हैं । इसी संबंध में इन दिनों क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रतिदिन समाचार प्रकाशित हो रहे हैं प्रस्‍तुत हैं एक विवरण । (रेलपांत निर्माण में प्रवीणता के यादगार के रूप में रेल चौंक का दृश्‍य) केन्‍द्र सरकार के एक महत्‍वांकांक्षी प्रोजेक्‍ट समुद्रीय तटवर्ती क्षेत्रों के लिए बेहतर केमिकल कंपोजिशन के साथ किफायती जंगरोधी रेलपांत बनाने पर भिलाई में काम शुरू हुआ है एवं प्रतिदिन इससे नित नये अनुसंधान व परीक्षण किये जा रहे हैं । संयंत्र नें पहली खेप में प्रथम स्‍वीकृत केमिकल कंपोजिशन की रेलपांत परीक्षण के लिए तैयार भी कर लिया है । इसके लिए भिलाई स्‍पात संयंत्र नें रेल टेक्‍नालाजी के क्षेत्र में अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों के अनुसार अनुसंधान के लिए पहली बार दो प्रमुख केन्‍द्रीय एजेंसियों से हांथ मिलाया है जिससे कि अब तक भिल

धांसू प्रोफाईल का सच

हम कवि एवं कविता दोनों के मर्मज्ञ हैं । हम कवि हृदय एवं आह से उपजे गान को समझते हैं । पाठक भी ऐसे अवसर को पहचानते हैं प्रेम, आह और दर्द को देखकर कविता के चिट्ठों में सात्‍वना देने जरूर जाते हैं । कहा भी गया है जो दुख में साथ निभाये वही तो साथी है, यदि बनना हो साथी तो प्रेम, आह और दर्द की कविताओं पर टिप्‍पणी कीजिये अपने प्रोफाईल में तुलसीदास जैसे महाकवि के छंदों को लिखें । कवि न होउं न बचन प्रवीणा । तो भईये ये संवाद का तकाजा है । हम तो साहित्‍य के विद्यार्थी रहे हैं हमें तो और भी मजा है मुहरटे छंदों व पदों की ऐसी झडी टिप्‍पणियों व आरकुट स्‍क्रैपों में हम फेंकते हैं कि कन्‍या तो फिदा हो ही निहायत हाउस वाईफ टाईप फिमेल भी हमारे बहुमुखी व्‍यक्तित्‍व वाले प्रोफाईल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता । हमने आरकुट और कविता के चिट्ठों को देखा तो अपने प्रोफाईल को पहले अपडेट किया क्‍योंकि जब लोग जो हैं वो नही प्रस्‍तुत करते, जो नहीं हैं उसे प्रस्‍तुत करने का नाम ही यदि प्रोफाईल है तो हम क्‍यू पीछे रहें बडे दिनों से जो भी बनने की तमन्‍ना थी उसे बारी बारी से अपने फोफाईल में अब डालना आरंभ कर दिया था

शीर्ष पर बिराजी शक्ति

दैनिक भास्कर मे कल प्रकाशित खबर नन्ही महमहिम युवा महमहिम हमारे भूतपूर्व राष्‍ट्रपति, चित्र बडा कर के देखे अलविदा डा कलाम

अपने चिट्ठे को तीन कालम वाला बनायें

चिट्ठे में कालम की आवश्‍यकता ब्‍लागर्स, वर्डप्रेस व याहू 360 में सेवा प्रदाता के द्वारा दो कालम का टेम्‍पलेट्स उपलब्‍ध कराया जा रहा है जिसमें एक बडा कालम पोस्‍ट के लिए एवं एक साईड कालम प्रोफाईल, चिट्ठे के विषय आदि अन्‍य सामाग्री के लिए होता है, पर आजकल ब्‍लाग की बढती लोकप्रियता एवं उसमें विभिन्‍न आवश्‍यक सेवाओं को एक पेज में डालने के लिए चिट्ठाकरों के द्वारा विभिन्‍न बटन, लिंक, एचटीएमएल कोड, एड सेंस आदि का प्रयोग अपने ब्‍लाग में किया जा रहा है जिसके कारण साईड कालम लगातार लम्‍बी होती जा रही है । ऐसे में चिट्ठाकार यदि कोई छोटा पोस्‍ट लिखता है तो उसके दो कालम के टेम्‍पलेट्स में साईड कालम में डाली गई जानकारी पोस्‍ट के खत्‍म हो जाने के बाद भी खत्‍म नहीं होती । कई बार तो ऐसा होता है कि जब कोई आवश्‍यक टैग जिसे हम लोगों को दिखना चाहते हैं वह पोस्‍ट के काफी नीचे होने के कारण लोग वहां तक माउस स्‍कोल करते ही नहीं । तीन कालम टेम्‍पलेट्स क्‍या है उपरोक्‍त समस्‍याओं का हल है तीन कालम का टेम्‍पलेट्स, जिसमें आजू बाजू में साईड कालम व बीच में पोस्‍ट के लिए स्‍थान होता है । इससे हमारे द्वारा दो कालम

पेंटालून बिग बाजार का छत्‍तीसगढ में पदार्पण

फ्यूचर ग्रुप के पेंटालून रिटेल इंडिया लिमिटेड नें रायपुर में हाईपर मार्केट स्‍टोर के अपने सबसे बडे रिटेल चेन बिग बाजार का आज शुभारंभ किया । 51000 वर्ग फिट में फैले सिटी माल 36 में स्थित बिग बाजार रायपुर का पहला सबसे बडा हाईपर मार्केट है । वैसे रायपुर में मझोले स्‍तर की कम्‍पनियों के रिटेल बाजार भी विगत कई वर्षों से संचालित थे पर पेंटालून के आने से अब छत्‍तीसगढियों को भी ठेठरी बासी खाकर, अपना पागी पउटका, खुमरी आदि लेने के लिए महानगर के स्‍तर का बाजार प्राप्‍त हो सकेगा ।

स्कूलो मे योग शिक्षा

छत्तीसगढ के शिक्षा विभाग ने बाबा रामदेव के सुझाओ को मानते हुए 2005 के शिक्षा सत्र से योग शिक्षा को स्कूलो मे सम्मिलित किया था, इसके आदेश के साथ ही राज्य शैक्षणिक अनुसन्धान परिषद ने 1 से 12 तक के छात्रो के लिये योगासनो की सूची जारी की थी और पूरे प्रदेश मे मास्टर ट्रेनर तैयार किये गये थे . ये मास्टर ट्रेनर प्रत्येक स्कूल के एक शिक्षक को योग पाठ्यक्रम की शिक्षा भी दिये थे तकि शिक्षक बच्चो को योग सिखा सके . इस पाठ्यक्रम को जीवन विज्ञान का नाम दिया गया जिसमे प्रार्थना सभा व कालखण्डो मे जीवन विज्ञान व योग की गतिविधियो को सिखाने का निर्देश था . पर दुर्ग जिले को छोडकर छत्तीसगढ के किसी भी जिले के स्कूलो मे यह पाठ्यक्रम शासन के निर्देशो के बावजूद लागू नही किया जा सका . दुर्ग जिले मे यह पाठ्यक्रम सही ढंग से चल रहा है इसके लिये जिले के 11 शिक्षक राजस्थान के लाडलू मे 20 दिन की विशेष प्रशिक्षण लेकर आये है . जिले मे पाठ्यक्रम के सही संचालन के लिये पोरवाल चेरिटबल ट्रस्ट व जीवन विज्ञान अकादमी दुर्ग के स्वयंसेवक सहयोग कर रहे है और जिले के स्कूलो मे अनुलोम विलोम व कपाल भांति धीरे धीरे छाने लगा है . पू

बढते घोटाले टूटती उम्‍मीदें

छत्‍तीसगढ, हरियाणा एवं दिल्‍ली से एक साथ प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र हरिभूमि के क्षेत्रीय पन्‍ने पर रविवार को “बढते घोटाले टूटती उम्‍मीदें” नाम से एक लेख छपा हैं । नवोदित राज्‍य छत्‍तीसगढ में हुए प्रमुख घोटालों पर प्रकाश डालते हुए अपने विस्‍तृत लेख में वरिष्‍ठ पत्रकार सुकांत राजपूत जी नें कहा है कि – “छत्‍तीसगढ अब देश में अपनी धाक जमाने लगा है । वह किसी भी बडे प्रदेश से पीछे नहीं हैं । अगर आप सोंच रहे हैं यह बात किसी विकास सूचकांक के आधर पर कही जा रही है तो आप गलत हैं । दरअसल यह मुल्‍यांकन उन प्रदेशों की तुलना के आधार पर है जो घोटालों में डूबे हुए हैं । एक नये प्रदेश का नीला आकास इन घोटालों की काली घटनाओं में घिर गया । देश के तमाम दूसरे राज्‍यों की तरह यहां के घोटालों की जांच अधर में अटकी है . . . ।“ “प्रदेश के अब तक के सबसे प्रमुख घोटाले - पी डब्‍लू डी का डामर घोटाला, फर्नीचर घोटाला, टाटपट्टी घोटाला, बारदाना घोटाला, नमक घोटाला, पी एच ई का पाईप घोटाला, कनकी घोटाला, राज्‍य लोक सेवा आयोग में गडबडी, सहकारी बैंक घोटाले, दलिया आबंटन में गडबडी, धान घोटाला, कम्‍प्‍यूटर घोटाला, फर्ज

चिट्ठे में मरक्‍यू या चलित शब्‍द पट्टी

आजकल हिन्‍दी चिट्ठाकारों के द्वारा अपने चिट्ठे में मरक्‍यू या चलित शब्‍द पट्टी लगाई जा रही है । जो आपके चिट्ठे का आर्कषण को बढा रहे हैं वहीं आवश्‍यक जानकारी सीमित स्‍थान में स्‍क्रोल होते हुए उपलब्‍ध हो जा रहे  हैं । कुछ साथियों के द्वारा इस संबंध में मुझसे एवं संजीत जी से जानकारी मेल के द्वारा मागी जा रही है । हालांकि हम दोनों तकनीकि जानकार नहीं हैं फिर भी हमने कुछ जुगाड तोड कर के अपने ब्‍लाग में इसका प्रयोग किया है और साथियों को इसकी जानकारी भी समय समय पर दे रहे हैं । मुझे जितनी जानकारी है उसके आधार पर मैं यहां कुछ विवरण प्रस्‍तुत कर रहा हूं । इस संबंध में श्रीश भाई ई स्‍वामी व ई पंडित भाई लोग पोस्‍ट लिखते तो हमें खुशी होती । ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिङ्गम् निर्मल भासित शोभित लिङ्गम् । जन्मजदुःख विनाशक लिङ्गम् तत् प्रणमामि सदा शिव लिङ्गम् । १ । देव मुनि प्रवरार्चित लिङ्गम् कामदहम् करुणाकर लिङ्गम् । रावण दर्प विनाशन लिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् । २ । यदि आप भी चलित शव्‍दों का प्रयोग अपने ब्‍लाग में करना चाहतें हैं तो हम आपको कुछ जानकारी दे रहे हैं जिसकी सहायता से आप च

क्‍या आप भी हिन्‍दी में हस्‍ताक्षर करते हैं ? : प्रेरणा

बात सन् 1989-90 की है मैं तब रायपुर में श्री राम होण्‍डा ग्रुप में पोर्टेबल जनसेट्स के मार्केटिंग फील्‍ड में नौकरी ज्‍वाईन कर लिया था । वहां मैं इंस्‍टीट्यूशनल सेल्‍स देखता था । उस वर्ष हमारे टीम के प्रयास से हमारे रीजन छत्‍तीसगढ-उडीसा में देश के अन्‍य रीजनों से सर्वाधिक जनसेट्स की बिक्री का रिकार्ड कायम हुआ । कम्‍पनी के द्वारा हमारे डीलर एवं हमारे टीम के प्रत्‍येक सदस्‍य को होटल मयूरा में इनाम के साथ ही प्रशश्ति-पत्र भी प्रदान किया गया । मैं इस प्रोत्‍साहन से बहुत प्रभावित हुआ । दूसरे दिन दो दिन की छुट्टी लेकर अपने गांव गया अपने उत्‍साह को मां बाप के आर्शिवाद से अक्षुण बनाने के लिए । गांव जाकर मां बाप के सामने अपने पुरस्‍कारों को रखा । मेरी मां इनाम में मिले ब्रीफकेस को देखने लगी तो मेरे पिताजी मेरे प्रशश्ति-पत्र को अपने मोटे चश्‍में से निहारने लगे । पिताजी अंग्रेजी में लिखे शव्‍दों का अक्षरश: अर्थ बताते हुए आखरी में आकर ठिठक गये । देर तक प्रशश्ति-पत्र को निहारते रहे फिर बोले “ये दू झन के दस्‍खत काबर हे जी ।“ प्रशश्ति-पत्र के नीचे में श्रीराम ग्रुप के इंडियन डायरेक्‍टर और होण्‍डा ग्र

एमबीसियस गर्ल

छोटे शहरों के सितारा होटलों में बडे बडे चोचले के साथ ही रिशेप्‍शन के अतिरिक्‍त प्रोफेशनल लेडीज स्‍टाफ रखने का चलन अब बढता जा रहा है खासकर हाउसकीपिंग व किचन डिपार्टमेंटों में जहां अब तक एक्‍का दुक्‍का ही महिला स्‍टाफ रहते थे वहां इनकी संख्‍या में इजाफा होते जा रही है । वो इसलिए कि अब प्रदेश स्‍तर पर भी होटल व रेस्‍टारेंट के प्रशिक्षण संस्‍थान खुलते जा रहे हैं जहां से नयी नयी एम्‍बीसि‍यस विथ स्‍मार्ट गर्ल्‍स ट्रेनिंग लेती हैं और लोकल लेबल पर इन होटलों में ज्‍वाईन कर लेती हैं । कभी कभी एकाध माह दिल्‍ली मुम्‍बई के होटलों में काम कर के भी लडकियां वापस आ जाती हैं और लोकल लेबल पर ज्‍वाईन कर लेती हैं । अब ऐसी दिल्‍ली मुम्‍बई रिटर्न लडकी और उसका एम्‍बीसि‍यस होना हमें बहुत सालता है । धीरूभाई हैं कि रोज आते हैं और कहते हैं फलाना जी मिस ढेकाने को ढंग से काम सिखाईये ये वेलकम ग्रुप में काम कर चुकी हैं और ली मेरेडियन ज्‍वाईन करने वाली थी हमने रिक्‍वेस्‍ट कर के इन्‍हे ज्‍वाईन करवाया है । कहते तो ऐसे हैं जैसे हमें ही कह रहे हों कि आप ही सीखें ये तो सीखी पढी है । दिखने में भी वैसेईच लगती है । हम ठहरे ठ

One million pounds sterling की लाटरी

सथियों कल हमें एक मेल आया था जिसमें मुझे किसी डाक्‍टर साहब नें लिखा है कि मुझे ब्रिटेन की One million pounds sterling की लाटरी लगी है वो भी कैसे तो रेंडमली सलेक्‍टेड ई मेल एड्रेस के द्वारा । हम मेल के पढते ही जान गये कि ये कंटिया है पर दिल तो पागल है मानता ही नहीं है । सोंचता है हो सकता है ये मेल सही हो, पिछले तीन सप्‍ताह से सवा लाख की लाटरी वाला आशावादी गीत सुन रहा हूं, भगवान नें हमारी सुन ली हो और लग गई लाटरी । दरअसल मेरे आई पाड में मेरे पुत्र नें श्री सूक्‍त लोड करते करते सवा लाख की लाटरी वाला गाना भी लोड कर दिया है अब जैसे ही श्री सूक्‍त खत्‍म होता है ये सवा लाख की लाटरी वाला गाना चलने लगता है । हमने अपने बेटे को कह दिया है आज के जमाने में सवा लाख से कुछ नहीं होता मागना है तो सवा करोड मांगों । ये क्‍या सवा लाख – डेढ लाख भगवान से मांगना । हटा दो मेरे आई पाड से ये गाना मैं अपने श्री सूक्‍त और शिव सूक्‍तों से खुश हूं जहां मांग की कोई सीमा नहीं है । पर ना तो वो हटा रहा है ना ही हम हटा पाये हैं इस सवा लाख के लालच को । ... और देखों ईश्‍वर की माया छप्‍पर फाड के दिया है One million pou

हजार बार देखो, देखने की चीज है (ब्‍लागर्स पैरोडी टाईप गद्य)

कल भारी बारिस के कारण रायपुर में कोई फ्लाईट नही आ पाई जमीन से आसमान तक पानी ही पानी, हमारे संस्‍था प्रमुख को आज शाम को दुबई जाना था । हडबडाने लगे क्‍या करें, नागपुर फोन किये पता चला वहां भी देर सबेर की नौबत है समय चूके जा रहा था कल भी यही हाल रहा तो ... चक्रधर की चकल्लस छोडो। हमने अपनी अभिव्यक्ति प्रस्‍तुत की बोईंग तो अइबेच नई करी अब लालू भईया के बडे बोईंग में जाये बर पडी मुम्‍बई से कल उडना है आपको कल का इंतजार करते यहीं बैठे रहेगें तो नही न जा पायेंगें दुबई । सो हम दौडे सांसद महोदय से रेलगाड़ी के बडका साहब को फोन करवा के टेसन की ओर टिकस का बंदोबस्‍त करने । टिकट का इंतजाम करने के बाद हमारे पास कुछ समय था हम इंतजार करने लगे बॉस का । महाशक्ति की भांति चारो तरफ नजर दौडाये कहीं कोई सुन्‍दरी मिल जाय और आंख तर कर ली जाय या कोई जोगलिखी हो कोई पहचान का मिल जाये । इस बुढापे भरी जवानी में अब आंख और अंतर्मन का ही तो सहारा रह गया है । देखा सामने एक लगभग 40-45 वर्ष की जवान कन्‍या अपने साजो सामान के साथ खडी थी साथ में उसका सामान था अल्प विराम हूर के साथ लंगूर की शक्‍ल में उसका पति गले में