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फ़रवरी, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

राजिम मेला और हमारी आस्था - कुछ बदलते सन्दर्भ में : शहरनामा

राजिम मेला के संबंध में पूर्व में संजीत त्रिपाठी जी चित्रमय विवरण प्रस्तुत कर चुके हैं । हम अपने पाठकों को एक व्यंगकार के नजरिये से इस मेला को दिखाने का प्रयास कर रहे हैं । चित्रों के लिए संजीत त्रिपाठी जी के पोस्ट एवं इस वेब साईट 1 व 2 , एवं विकीपीडिया , व तपेश जैन जी के ब्‍लाग का अवलोकन करें । राजिम मेला और हमारी आस्था - कुछ बदलते सन्दर्भ में विनोद साव यह सही है कि छत्तीसगढ़ में राजिम मेला का जो वैभवपूर्ण इतिहास रहा है वह किसी दूसरे मेले का नहीं रहा। माघी पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक रोज रोज भरे जाने की जो एक मैराथन पारी इस मेले में संपन्न होती थी इसका कोई दूसरा जोड़ न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि इसके पड़ोसी राज्यों में भी देखने में नहीं आता था। राजिम का अपना पौराणिक इतिहास तो है ही लेकिन यहां भरा जाने वाला मेला अपनी विशालता के कारण विशिष्ट रहा है। महानदी की फैली पसरी रेत पर नदी के बीचोंबीच भरने वाला यह मेला अपनी कई विशेषताओं के कारण लोक में सबसे अधिक मान्य रहा है। बरसों तक राजिम मेला देखने जाना एक उपलब्धि मानी जाती रही है। राजिम के आसपास रहने वाले जन भी अपने रिश्तेदारों

क्या वट की जड और विदारीकन्द का तिलक किसी को वशीभूत कर सकता है?

9. हमारे विश्वास , आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक , कितने अन्ध-विश्वास ? - पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय क्या वट की जड और विदारीकन्द का तिलक किसी को वशीभूत कर सकता है ? ' वशीकरण ' शब्द सदा ही से मुझे आकर्षित करता रहा है। कौन नही चाहेगा कि कुछ उपाय अपनाकर मनचाहे व्यक्ति को वश मे कर ले। तंत्र से सम्बन्धित बहुत सी पुस्तको मे मैने यह लिखा पाया कि वट की जड और विदारीकन्द को बराबर मात्रा के पीसकर तिलक के रूप मे इसे माथे पर लगाकर बाहर निकले तो जो देखेगा वही वशीभूत हो जायेगा। कौतूहलवश मैने इसे आजमाया। वट की जड तो आसानी से मिल गयी पर विदारीकन्द के लिये काफी मशक्कत करनी पडी। तिलक का कोई असर नही दिखा। मैने जब ख्यातिलब्ध तांत्रिको से यह चर्चा की तो उन्होने बताया कि सस्ते साहित्य मे आधी-अधूरी जानकारी होती है यदि आपको इन वनस्पतियो का महत्व जानना है तो आप महंगे साहित्य पढे। मैने हजारो रुपये खर्च कर मूल ग्रंथ खरीदे पर फिर भी पूरी जानकारी नही मिली। इन ग्रंथो मे भी बडे-बडे दावे थे पर इनका कोई वैज्ञानिक आधार न

प्रभात मर्मज्ञ : मंगत रविन्द्र

छत्तीसगढ के साहित्यकार - 1 छत्तीसगढ के चर्चित कहानीकार, लेखक श्री मंगत रविन्द्र का जीवन परिचय आलेख- संजीव चंदेल नाम मंगत रवीन्द्र है, ग्राम गिधौरी वास । थाना उरगा जिला कोरबा, ग्राम भैसमा पास ।। सरिता की प्रवाहित धारा, समीर की निरंतरता, उदित रवि किरण, शशि की मनोहारी पुंज, इन्द्रधनुष की अनुपम छटा, ललना की ललक नारी की श्रद्धा एवं लज्जा, पुष्प की पावन परिमल, को कोई रोक नहीं सकता ऐसे ही एक साहित्यकार की साहित्यिक प्रतिभा, कलाकार की कला, चित्रकार की उदगम्य भावना, मुकुलित पुष्‍प की तरह विकसित होती है । आदरणीय श्रीयुत रवीन्द्र की प्रतिभा कली को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है । किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व एक दर्पण के समान होता है अंतर इतना है कि व्यक्ति दर्पण के सामने खडा होता है और वह हमारे सामने....... । हम अपना स्वरूप उस दर्पण में झांकते है जबकि उस दर्पण के सामने उसका व्यक्तित्व दिखाई देता है । आइए छत्तीसगढी भाषा के धनी श्रद्धेय श्रीयुक्त मंगत रवीन्द्र जी के जीवन दर्शन का संक्षिप्त अवलोकन करें । कहा गया है कि अब हम अपने बारे में सहीं-सहीं बतलाने में असमर्थ होते हैं तो क्या अन

जगार : हल्बी महागाथा

जगार : हल्बी महागाथा छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर के मोतीबाग में विगत कई वर्षों से जगार उत्सव का आयोजन किया जाता है । जिसमें उपस्थित होने के सुअवसर भी प्राप्त हुए, विगत रविवार को टैक्नोक्रेट रवि रतलामी जी एवं संजीत त्रिपाठी जी से मुलाकात में चर्चा के दौरान जगार उत्सव की महक को हमने महसूस भी किया । जगार बस्तर के हल्बी बोली बोलने वाले अधिसंख्यक आदिवासियों का उत्सव है । यह सामूहिक रूप से मनाया जाने वाला बस्तर का सांस्कृतिक आयोजन है । इसका आयोजन आदिवासी ग्रामवासी मजरा-टोला के सभी लोग जुर-मिल कर करते हैं । कहीं कहीं तो दो-चार गांव के लोग सामूहिक रूप से बीच वाले किसी गांव के गुडी-चौपाल में जगार गान आयोजित करते हैं, इसके लिए जगार गीत गाने वाली हल्बी गुरूमाय को नरियर देकर आमंत्रित किया जाता है । जगार स्थल को पारंपरिक भित्तिचित्रों व बंदनवारों से सजाया जाता है । देव प्रतिष्ठा एवं माता दंतेश्वरी का आवाहन पूजन अनुष्ठान किया जाता है । इस आयोजन का प्राण जगार गान होता है जिसे गुरू माय धनकुल वाद्ययंत्र के सुमधु‍र संगीत के साथ प्रस्तुत करती है । धनकुल वाद्य यंत्र मटकी, सूपा एवं धनुष के सम्मिलित

क्या सफेद फूलो वाले कंटकारी (भटकटैया) के नीचे गडा खजाना होता है?

8 . हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास? - पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय क्या सफेद फूलो वाले कंटकारी (भटकटैया) के नीचे गडा खजाना होता है? बैगनी फूलो वाले कंटकारी या भटकटैया को हम सभी अपने घरो के आस-पास या बेकार जमीन मे उगते देखते है पर सफेद फूलो वाले भटकटैया को हम सबने कभी ही देखा हो। मै अपने छात्र जीवन से इस दुर्लभ वनस्पति के विषय मे तरह-तरह की बात सुनता आ रहा हूँ। बाद मे वनस्पतियो पर शोध आरम्भ करने पर मैने पहले इसके अस्तित्व की पुष्टि के लिये पारम्परिक चिकित्सको से चर्चा की। यह पता चला कि ऐसी वनस्पति है पर बहुत मुश्किल से मिलती है। तंत्र क्रियाओ से सम्बन्धित साहित्यो मे भी इसके विषय मे पढा। सभी जगह इसे बहुत महत्व का बताया गया है। सबसे रोचक बात यह लगी कि बहुत से लोग इसके नीचे खजाना गडे होने की बात पर यकीन करते है। आमतौर पर भटकटैया को खरपतवार का दर्जा दिया जाता है पर प्राचीन ग्रंथो मे इसके सभी भागो मे औषधीय गुणो का विस्तार से वर्णन मिलता है। आधुनिक विज्ञ

छत्तीसगढ गौरव : रवि रतलामी

छत्तीसगढ, दिल्ली व हरियाणा से एक साथ प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र 'हरिभूमि' में 13 फरवरी 2008 को सम्पादकीय पन्ने पर यह आलेख प्रकाशित हुआ है जिसकी फोटो प्रति व मूल आलेख हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं :- “जन्म से छत्तीसगढ़िया, कर्म से रतलामी. बीस साल तक विद्युत मंडल में सरकारी टेक्नोक्रेट के रुप में विशाल ट्रांसफ़ॉर्मरों में असफल लोड बैलेंसिंग और क्षेत्र में सफल वृहत् लोड शेडिंग करते रहने के दौरान किसी पल छुद्र अनुभूति हुई कि कुछ असरकारी काम किया जाए तो अपने आप को एक दिन कम्प्यूटर टर्मिनल के सामने फ्रीलांस तकनीकी-सलाहकार-लेखक और अनुवादक के ट्रांसफ़ॉर्म्ड रूप में पाया. इस बीच कंप्यूटर मॉनीटर के सामने ऊंघते रहने के अलावा यूँ कोई खास काम मैंने किया हो यह भान तो नहीं लेकिन जब डिजिट पत्रिका में पढ़ा कि केडीई, गनोम, एक्सएफ़सीई इत्यादि समेत लिनक्स तंत्र के सैकड़ों कम्प्यूटर अनुप्रयोगों के हिन्दी अनुवाद मैंने किए हैं तो घोर आश्चर्य से सोचता हूँ कि जब मैंने ऊँधते हुए इतना कुछ कर डाला तो मैं जागता होता तो पता नहीं क्या-क्या कर सकता था?” यह शब्द हैं छत्तीसगढ के राजनांदगांव में 5 अगस्‍त 1958 को

कौन नामवर सिंह ?

स्‍थानीय दैनिक छत्तीसगढ द्वारा समसामयिक स्वतंत्र साप्ताहिक लघु पत्रिका इतवारी अखबार के 10 फरवरी के अंक में मेरी एक छत्तीसगढी लघु कथा प्रकाशित हुई है यहॉं मेरे इसी ब्लाग में . हमारे ब्लाग पाठक साथियों के लिए हम यहां मूल प्रकाशन व साथ ही हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत कर रहे हैं :- पूर्णिमा के दिन मेरे घर में भगवान सत्यनारायण कथा-पूजा का आयोजन किया गया । इस पूजा में मेरा पडोसी आमत्रण देने के बाद भी नहीं आया । उसके बाद भी मेरी पत्नी पडोसन सहेली के प्रेम में मग्न कथा समाप्ति के बाद सबको प्रसाद देकर प्रसाद को मेरे टेबल में रखे कागज से सुन्दर पुडिया बनाकर कामवाली बाई के हाथ पडोसन के घर भिजवाई । कथा पूजा के बाद मैं फुरसद से कथावाचक ब्राह्मण को भोजन-दान-दक्षिणा दे पूर्ण संतुष्ट करा कर आत्म प्रसंशा में मग्न अपने आप को *बकिया तिवारी एवं वेदपाठी ब्राह्मण बतलाते हुए कथावाचक के चेहरे में अपने आप को उससे ब्राह्मणत्व में एक अंगुल उंचे बैठाता हुआ, भावों को उसके चेहरे पर पढता हुआ अपने टेबल–कुर्सी में बैठा । मेरे होश उड गये ! मेरे समस्त प्रकाशित रचनाओं को मेरी पत्नी पहले ही नदी में प्रवाहित कर चुकी थी, पर

दुर्ग में वकालत की थी बाबा आमटे नें

हिंगनघाट, महाराष्‍ट्र के एक जमीदार परिवार में जन्‍में बाबा आमटे के समाजसेवा के कार्यों को संपूर्ण विश्‍व पहचानता है । उनके पावन पदचरण हमारे छत्‍तीसगढ के दुर्ग में भी पडे थे । बाबा दुर्ग जिला न्‍यायालय में दो वर्ष एवं दुर्ग के ही तहसील न्‍यायालय बेमेतरा में एक वर्ष तक वकालत कर चुके हैं । बाबा आमटे सन् 1936 में नागपुर से बेमेतरा आए तब उनकी उम्र 22 वर्ष थी । सहज सरल और सादगी के धनी बाबा का नगर में काफी सम्‍मान था । यहां रहकर न सिर्फ उन्‍होंने वकालत की बल्कि समाजसेवा में भी पूरे तीन साल गुजारे । आज जब इस समाचार को भिलाई भास्‍कर नें प्रमुखता से प्रकाशित किया तो चारो तरफ यह चर्चा होती रही, बार एसोसियेशन नें आज महाकवि निराला की याद एवं बसंत पंचमी के अवसर पर एक कार्यक्रम रखा था वहां भी बाबा को याद किया गया एवं भावभीनि श्रद्धांजली दी गई । वरिष्‍ठ व बुजुर्ग अधिवक्‍ता मित्रों से हमने जब इस संबंध में पूछा तो वे बाबा के संबंध में अपने-अपने अनुभव बताये । यहां के कई अधिवक्‍ता बाबा से मिलने यदा कदा उनके आश्रम जाते रहते थे तब वे यहां के अधिवक्‍ताओं एवं अन्‍य व्‍यक्तियों के संबंध में कुशलक्षेम

क्या पीले पुष्प वाले पलाश से सोना बनाया जा सकता है?

7. हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास? - पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय क्या पीले पुष्प वाले पलाश से सोना बनाया जा सकता है? पलाश (परसा, ढाक, टेसू या किंशुक) को हम सभी जानते है। इसके आकर्षक फूलो के कारण इसे ‘ जंगल की आग ’ भी कहा जाता है। प्राचीन काल ही से होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है। अब पलाश के वृक्षो मे पुष्पन आरम्भ हो रहा है। देश भर मे इसे जाना जाता है। लाल फूलो वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। पहले मै एक ही प्रकार के पलाश से परिचित था। बाद मे वानस्पतिक सर्वेक्षण के दौरान मुझे लता पलाश देखने और उसके गुणो को जानने का अवसर मिला। लता पलाश भी दो प्रकार का होता है। एक तो लाल पुष्पो वाला और दूसरा सफेद पुष्पो वाला। सफेद पुष्पो वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेजो मे दोनो ही प्रकार के लता पलाश का वर्णन मिलता है। सफेद फूलो वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है जबकि लाल फूलो व

छत्तीसगढी ‘नाचा’ के जनक : दाउ मंदराजी

स्‍वर्गीय दुलार सिंह दाउ जी के मंदराजी नाम पर एक कहानी है । बचपन में बडे पेट वाला एक स्‍वस्‍थ बालक दुलारसिंह आंगन में खेल रहा था । आंगन के ही तुलसी चौंरा में मद्रासी की एक मूर्ति रखी थी । मंदराजी के नानाजी नें अपने हंसमुख स्‍वभाव के कारण बालक दुलार सिंह को मद्रासी कह दिया था और यही नाम प्रचलन में आकर बिगडते-बिगडते मद्रासी से मंदराजी हो गया । दाउजी का जन्‍म जन्‍म 1 अप्रैल 1911 को राजनांदगांव से 7 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम रवेली के सम्‍पन्‍न मालगुजार परिवार में हुआ था । उन्‍होंनें अपनी प्राथमिक शिक्षा सन 1922 में पूरी कर ली थी । गांव में कुछ लोक कलाकार थे उन्‍हीं के निकट रहकर ये चिकारा और तबला सीख गये थे । वे गांव के समस्‍त धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों भे भाग लेते रहे थे । जहां कहीं भी ऐसे कार्यक्रम होते थे तो वे अपने पिताजी के विरोध के बावजूद भी रात्रि में होने वाले नाचा आदि के कार्यक्रमों में अत्‍यधिक रूचि लेते थे । इनके पिता स्‍व.रामाधीन दाउजी को दुलारसिंह की ये रूचि बिल्‍कुल पसंद नहीं थी इसलिए हमेंशा अपने पिताजी की प्रतारणा का सामना भी करना पडता था । चूंकि इनके पिताजी को इनकी

डॉ. रमन का सम्‍मान, मानवीय मूल्‍यों का सम्‍मान है

छत्‍तीसगढ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह को भारत अस्मिता श्रेष्ठ सम्मान से अलंकृत किया जाना उनके लोकतंत्र के लिए दिये जाने वाले योगदान का सम्मान है । यह सम्मान डॉ.रमन सिंह को महारा्‍ट्र तकनीकी संस्थान नें लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए उनके प्रयासों के प्रतिफल के रूप में दिया/किया है । देश में सम्मानों की एक परम्परा रही है और समूची दुनिया में व्यक्ति विशेष के किसी क्षेत्र में किये जा रहे योगदान के लिए सम्मान किया जाता रहा है । हालांकि इधर भारत में सम्मानों को लेकर एक विवाद सा पैदा हो गया है, जिसकी प्रतिध्व‍वनि आपने हिन्दी ब्लागजगत में भी देखा था लेकिन यदि सम्मानित करने वाली संस्था के कद और उसकी सोंच को नजर अंदाज कर दिया जाए तो किसी व्यक्ति विशेष के कार्यों के सम्मान का सीधा मतलब तो यही होता है कि समाज उसके कार्यों का अनुकरण करे और समाज में मानवीय मूल्यों की स्थापना हो सके । आज समाज में जिस तरह से मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है, इसे बचाए रखने के लिए लोकतंत्र एक कारगर हथियार है क्योंकि वोटों की राजनीति से ही अपनी बात को रखा जा सकता है, लेकिन यह भी सच है कि लोकतंत्र को बचाए रख

महर्षि महेश योगी चिर समाधि में लीन

छत्तीसगढ में रायपुर जिले के पाण्डुका गांव में जन्में योग और ध्यान को दुनिया के कई देशों तक पहुंचाने वाले आध्यात्मिक गुरू महर्षि महेश योगी आज नीदरलैण्ड में चिरनिद्रा में लीन हो गए । दुनियां में योग और आध्यात्‍म को नई बुलंदियों में पहुंचाने वाले महर्षि महेश योगी का असली नाम महेश प्रसाद वर्मा था । उनका जन्‍म 12 जनवरी 1917 को छत्तीसगढ के एक छोटे से गांव में हुआ था । महर्षि योगी नें आरंभिक पढाई छत्तीसगढ में एवं आगे की पढाई जबलपुर में की फिर उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि इलाहाबाद से प्राप्‍त किया । भारतीय वैदिक दर्शन नें उन्हें काफी प्रभावित किया और योग एवं वेद को उन्होंनें अपने जीवन में उतार लिया । साठ के दसक में मशहूर रॉक बैंड बीटल्स के सदस्यों के साथ ही वे कई बडी हस्तियों के आध्यात्मिक गुरू हुए और दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गए । पश्चिम में जब हिप्पी संस्कृति का बोलबाला था, तब महर्षि महेश योगी नें भावातीत ध्यान के जरिये दुनिया भर में अपने लाखों अनुयायी बनाए । 40 व 50 के दशक में उन्होंने हिमालय में अपने गुरू से ध्यान और योग की शिक्षा लिया, अपने इसी ज्ञान के द्वारा महर्षि मह

चना के दार राजा : बैतल राम साहू

ददरिया छत्तीसगढ के लोकप्रिय ददरिया से हम आपको छत्तीसगढी व हिन्‍दी में परिचय करा रहे है । पढिये सुनिये एवं आनंद लीजिये छत्तीसगढी लोकगीत का :- बटकी म बासी अउ चुटकी म नून मैं गावत हौं ददरिया तें कान देके सुन । चना के दार राजा चना के दार रानी चना के दार गोंदली कडकत हे, टूरा हे परबुधिया होटल म भजिया धडकत हे । बागे बगैचा दिखेल हरियर मोटरवाला नई दिखे बदेहंव नरियर । वो चना के दार .... तरी पतोई उपर कुरता रहि रहि के छकाथे तोरेच सुरता । वो चना के दार .... नवा सडकिया रेंगेला मैना दू दिन के अवईया लगाए महीना । वो चना के दार .... चांदी के मुंदरी किनारी कर ले वो मैं रहिथौं नवापारा चिन्‍हारी कर ले । वो चना के दार . कांदा ये कांदा केवंट कांदा ओ ये ददरिया गवईया के नाम जादा । वो चना के दार .... चना के दार राजा चना के दार रानी चना के दार गोंदली कडकत हे, टूरा हे परबुधिया होटल म भजिया धडकत हे । बटकी में बासी (पके चांवल को डुबोने से बने) और चुटकी में नमक लेके मैं ददरिया गा रहा हूं तुम कान लगाकर सुनो ! चना का दाल है राजा, चना का दाल है रानी, चना के दाल एवं प्याज से बना हुआ भजिया तला

नीम के पुराने वृक्ष से रिसने वाला रस एक चमत्कारिक घटना है या नही?

6 . हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास? -पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय नीम के पुराने वृक्ष से रिसने वाला रस एक चमत्कारिक घटना है या नही? कुछ वर्षो पहले मुझे इटारसी की एक सामाजिक कार्यकर्ता ने फोन किया कि पास के एक गाँव मे नीम के पुराने वृक्ष से पानी जैसा रस टपक़ रहा है और दूर-दूर से लोग एकत्र हो रहे है। मेला जैसा लगा है। पूजा शुरु हो गयी है। कुछ लोग बर्तनो मे इस पानी को भर कर ले जा रहे है। आप वनस्पति विशेषज्ञ है इस लिये इस पर कुछ टिप्पणी कीजिये। मैने अपने वैज्ञानिक मित्रो और दूसरे विशेषज्ञो से सलाह ली तो अपने-अपने विषय के आधार पर सबने अपने-अपने ढंग़ से इसकी व्याख्या की। पर सभी ने अपने जीवन मे यह घटना देखी थी। मैने अपने डेटाबेस का अध्ययन किया तो उससे भी रोचक जानकारी मिली। प्राचीन चिकित्सा प्रणालियो मे इसका वर्णन मिला। प्राचीन सन्दर्भ साहित्यो के अनुसार इसे ‘ नीम का मद ’ कहते है। यह लिखा गया है कि जिस तरह मदमस्त हाथी के मस्तक से मद निकलता है उसी तरह नीम से भी मद निकलता

परम्‍परा और नवीनता का संगम : नाचा 3

परम्‍परा और नवीनता का संगम : नाचा 1 परम्‍परा और नवीनता का संगम : नाचा 2 हिरमा की अमर कहानी : हिरमा की अमर कहानी में लेखक, निर्देशक हबीब तनवीर ने एक साथ अनेक मूल्‍यों के निर्वाह का प्रयत्‍न किया है । आदिवासियों की परम्‍परागत जीवन शैली और को ईश्‍वर मानने की अवधारणा का रेखांकन है । स्‍वयं राजा भी उसी प्रकार का मानवेत्‍तर व्‍यवहार प्रदर्शित करता है । हिरमादेव सिंह स्‍वतंत्र भारत में भी अपनी रियासत का अलग अस्तित्‍व अलग बनाए रखने के लिए कृत संकल्‍प है । यही कारण है कि वे उच्‍च अधिकारियों के समझाने या उनके अधिकारों को नजरअंदाज करने की हिम्‍मत दिखाते हैं । उनकी हठधर्मिता यहां तक बढती है कि वे राष्‍ट्पति से भी मिलने से इन्‍कार कर देते हैं । आदिवासी जनता की अपने राजा के प्रति आस्‍था प्राचीन मूल्‍यों के अनुरूप है । इसलिए राजा के साथ ही साथ उनके हजारों अनुयायी अपना ब‍लीदान देते हैं । नवीन दृष्टिकोण के रूप में आजादी के बाद हिरमादेव शासकीय नियमों के अनुसार स्‍थापित करने के लिए राजनेता, बडे अधिकारियों को दमन की खुली छूट देते हैं । जिसका परिणाम राजशाही के अंत के रूप में दिखाई देता है । प्रजातंत्र

परम्‍परा और नवीनता का संगम : नाचा 2

परम्‍परा और नवीनता का संगम : नाचा 1 कारी : रामहृदय तिवारी के निर्देशन में प्रस्‍तुत कारी इस श्रृंखला की एक महत्‍वपूर्ण प्रस्‍तुति है । प्रारंभ में परम्‍परागत छत्‍तीसगढी परिवार के रूप में विशेसर और कारी के सुखी दाम्‍पत्‍य जीवन की सुन्‍दर झांकी है । संतान विहीन दम्‍पत्ति की मानसिक पीडा, हास्‍य, परिहास का मनोहारी पुट, ग्रामीण जीवन में रामलीला या अन्‍य आयोजनों का महत्‍व, सभी कुछ लोकनाटय के अनुरूप है । पत्‍नी (कारी) के चरित्र पर आरोप लगने पर बिशेसर का विरोघ तथा अपने घरेलु जीवन में खुलापन सब कुछ छत्‍तीसगढ की संस्‍कृति के अनुरूप है । विशेसर की मृत्‍यु के पश्‍चातृ नाटक में आया मोड सर्वथा नवीन है । छत्‍तीसगढ अंचल में पति की मृत्‍यु के बाद छत्‍तीसगढी युवती का चूडी पहनकर दूसरा विवाह कर लेना सामान्‍य बात है । इसके विपरीत कारी का अपने सास और देवर के लिये त्‍याग सर्वथा नवीन प्रयोग है । अपने बच्‍चे की तरह देवर का पालन पोषण करने वाली कारी का गांव के अध्‍यापक मास्‍टर भैयया से न केवल मेलजोल वरन् पारिवारिक संबंध भी लोकापवाद की श्रेणी में आता है । यद्यपि ग्रामीण जीवन में एक बाहरी अध्‍यापक किसी विधवा यु

परम्‍परा और नवीनता का संगम : नाचा 1

छत्‍तीसगढ के नाचा के संबंध में अपने शोध ग्रंथ ‘छत्‍तीसगढी लोकनाट्य : नाचा’ को प्रस्‍तुत करते हुए डॉ.महावीर अग्रवाल नें नाचा के हर पहलू को छुआ है । प्रथम पेज से लेकर अंतिम पेज तक यह ग्रंथ छत्‍तीसगढ के नाचा का विस्‍तृत व्‍याख्‍या प्रस्‍तुत करता है । इसी शोध-ग्रंथ के कुछ अंशों को हम यहां डॉ.महावीर अग्रवाल जी से साभार सहित प्रस्‍तुत कर रहे हैं जिसमें छत्‍तीसगढ में पारंपरिक नाचा पर आधुनिक प्रयोग हुए हैं जो छत्‍तीसगढ की कालजयी प्रस्‍तुतियां हैं, जिसका नाम आज भी छत्‍तीसगढ के जन-मन में रचा-बसा है । ‘..... आज परिस्थितियां बदल गई हैं । आधुनिक छत्‍तीसगढी लोकनाट्य का अभिप्राय विसंगतियों या कुरीतियों को उजागर करना तो है ही परन्‍तु इसके साथ ही साथ उनका समाधान प्रस्‍तुत करने का प्रयास भी किया जाता है । समस्‍याऍं अब बहुत व्‍यापक हो गईं । गरीबी अत्‍याचार या धार्मिक आडम्‍बरों से आगे बढकर कलाकार और निर्देशक अब अशिक्षा नारी उत्‍थान वृक्षारोपण, सामाजिक समरसता तथा कृषि एवं औद्योगिक प्रगति से जुडने की आवश्‍यकता महसुस करने लगा है । वह समाज को संगठन और सहकारिता का महत्‍व समझाना चाहता है । लोक कथाओं को आधार ब