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एक मुलाकात : दाऊ रामचंद्र देशमुख से


सन् 1984-85 के जड़काले के किसी दिन हम (जितेंद्र जैन और दो अन्य मित्रों के साथ) सिमगा से ट्रकों में लिफ्ट लेते हुए, दुर्ग आ गए। वहां से पूछते-पुछाते पैदल बघेरा आ गए। सड़क से थोडा अंदर एक बड़े से बाड़े के सामने जब हम थिराये, तब हाथ-पैर और कपड़ों पर नजर गई। धूल-धूसरित पैर और मुरकुटाये कपड़े में हम फुल गवईहां नजर आ रहे थे। तब तक, बाड़े के दरोगा तक नौकरों ने खबर पंहुचा दी थी और अब दरोगा, दरवाजे पर खड़ा हमें नजरों से तौल रहा था। हमने, झेंपते हुए बताया कि हम सिमगा से आये हैं और दाऊ रामचंद्र देशमुख जी से मिलना चाहते हैं। क्यों ? का उत्तर हम शब्दों में ढंग से दे नहीं पाये किन्तु लगा कि, दरोगा समझ गया। उसने अंदर बुलाया और बाजवट पर बैठा दिया, थोड़ी देर बाद हाथ-पांव धोने का आदेश दिया। उसके कुछ समय के बाद हमारे लिए खाने की थाली लग गई। हमने एक दूसरे का मुह देखा, सब अप्रत्याशित हो रहा था। हालांकि हम दोपहर को यहाँ पहुचे थे और हमें भूख भी जोरों की लगी थी फिर भी हमने सोचा नहीं था कि हमें यहाँ खाना भी मिलेगा। मैंने मौन तोडा और दरोगा जी से कहा कि भैया हमें दाऊ जी से मिला दो, खान-वाना रहने दो। भूख तो लग रही थी, शरीर भोजन मांग रहा था और मन मांग को दरकिनार करते हुए, चंदैनी गोंदा के सर्जक से मिलना चाह रहा था।

दरोगा ने कहा कि अभी दाऊ जी सोये हैं, खाना खा लो तब तक दाऊ जी उठ जायेंगे फिर मिल लेना। ररूहा सपनाये दार-भात जैसे हमने भोजन किया, तृप्त हो गए। दीवारों के पार से छत्तीसगढ़ी संगीत की स्वर लहरियां गूंजने लगी, गीतों में थिरकते पांवों के घुंघरू बजने लगे। पं. रविशंकर शुक्ल, लक्षमण मस्तुरिया और संगीता चौबे, साधना, जयंती को गाते, खुमान लाल साव, गिरजा सिन्हां, केदार यादव को बजाते, पद्मा, बसंती, माया देवारों को नाचते, कई जाने अनजाने कलाकार हमारी स्मृतियों के बाड़े में जीवंत हो गए। हम चारों ने फिर एक-दूसरे की नजरों में देखा, सब वही देख-सुन रहे थे, झपकी आ गयी थी। लगभग एक घंटे बाद दरोगा ने हूंत करा कर उठाया और कोठार तरफ ले गया। वहां एक सफ़ेद रंग की अम्बेसडर खड़ी थी, ड्राइवर अपने सीट पर गाड़ी स्टार्ट करने के लिए तैयार बैठा था।

हम चारो दरोगा के साथ वहां खड़े हो गए। सफ़ेद धोती कुर्ते में एक बुजुर्ग, छड़ी पकडे गाड़ी की ओर आ रहे थे। उनका कपड़ा और उनका चेहरा दमक रहा था। उनके व्यक्तित्व से एक अदृश्य आभा निकल रही थी जिससे हम महसूस कर पा रहे थे कि यही दाऊ रामचंद्र देशमुख हैं। जब वे कार के पास आ गए तब हमने उनका चरण स्पर्श किया। उन्होंने क्रमशः हमारा नाम, गांव, पिता का नाम और पढाई के सम्बन्ध में प्रश्न किया, हमने सहमते हुए उत्तर दिया। अपनी जिंदगी में पहली बार हम किसी ऐसे शख्सियत से मिल रहे थे जिनसे मिलने का सपना हमने होश सम्हालते ही देखा था। वे सामने खड़े थे और हमारा बक्का नहीं फूट रहा था। लगभग 150 किलो मीटर दूर से मिलने के लिए इस तरह आने की हमारी उत्सुकता के सम्बन्ध में संक्षिप्त बात हुई। फिर उन्होंने कहा, गाड़ी में बैठो साथ में चलते हुए बात करेंगे। हम सब बैठ गए और कार सामने रेलवे क्रासिंग को पार करती हुई आगे बढ़ने लगी।

दिमाग में बहुत सारे प्रश्न कुलबुला रहे थे किन्तु वे प्रश्न का रूप धर, अभिव्यक्त नहीं हो पा रहे थे। हमने उनके साथ लगभग डेढ़ घंटे बिताये, हमने क्या पूछा और उन्होंने क्या बताया, अब याद नहीं है। उनकी कही एक बात याद है, उन्होंने वापस लौटते वक्त कहा था कि ‘एक सिद्ध निर्देशक की अस्वाभाविक कल्पनाशीलता ही कला के असल रूप को सामने ला पाती है।‘ यह कहते हुए उन्होंने कार रुकवाई थी, हम किसी बहुत बड़े फार्म हॉउस में थे। दूर तक फसलों की हरियाली बिखरी थी, आंतरिक सड़क के आजू-बाजू क्यारियों में कतार से गुलाब और अन्य प्रजाति के रंग बिरंगे फूल खिले थे। वे उतर कर एक गुलाब के पौधे तक गए, हम भी पीछे-पीछे पहुंचे। उन्होंने एक गुलाब फूल को दिखाया, और पूछा कैसे लग रहा है। हम चारों ने चलताऊ उत्तर दिया ‘सुन्दर’, ‘बहुत सुन्दर’, सुप्पर, ‘ब्यूटीफुल!’ उन्होंने कहा कि ‘मान लो यह फूल गंवई लोक कला है, कई फोटोग्राफर इस सुन्दर फूल का अलग-अलग एगंलों से फोटो खींचते हैं। सभी के फोटो सुन्दर ही होते हैं किन्तु कोई एक फोटोग्राफर इस फूल का फोटो कुछ इस तरह से खींचता है कि इसकी सुन्दरता सौ गुना बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए होता है कि उस फोटोग्राफर का इमेजिनेशन, अन्य फोटोग्राफरों से अलग होता है। वह इस फूल को उस प्रकार से नहीं देखता जैसे हम-आप देख रहे हैं, इस फूल का प्रतिबिम्ब उसके मस्तिष्क में उसी तरह से बनता है जैसा कि फोटो में आयेगा या, जैसा कि वह दिखाना चाहता है।‘ हम सब मंत्रमुग्ध होकर उनकी बातों को सुनते रहे। कुछ बातें समझ में आई कुछ नहीं आई, हम बमुश्किल सत्रह-अट्ठारह साल के थे। लगभग आधा घंटा फार्म हाउस में और रूककर दाऊ जी और हम वापस बाड़ा की ओर निकल गए। शाम हो चली थी, पक्षियों का कलरव बढ़ गया था।

वह दौर पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी की कहानी ‘कारी’ के लगातार मंचन का था। हम जिस दिन पहुचे थे उसके तीसरे दिन कहीं कार्यक्रम होने वाला था और दूसरे दिन रिहल्सल के लिए तय था। दाऊ जी से मिलने वालों की भीड़ बाड़े में बढ़ने लगी थी। दाऊ जी कार से उतर कर बैठक की ओर आगे बढ़ गए, दरोगा हमें बाड़े के बड़े से हाल में ले आया जहां बहुत सारे बाजवट बिछे हुए थे। तब तक रात भी हो गई, हम बिना कोई पूर्व कार्यक्रम के यूं ही दुर्ग चले आए थे, रात रूकना हमारी मजबूरी थी। वहां कुछ देर रूककर जब हम बाहर टहलने निकले, बाहर दाऊ जी से मिलने वालों की सायकलें, मोटर सायकलें और एक-दो कार खड़ी थी। बाहर बैठे गांव के लोगों नें बताया कि अंदर राम हृदय तिवारी, परदेशीराम वर्मा, मुकुन्द कौशल हैं। हम उत्सुकतावश वहीं जमें रहे, जब वे बाहर निकले तो जी भर के देखा, कुछ इस तरह कि उन्हें हाथों में छूकर टटोल रहे हों।

हम चारों नें अलग-अलग जगहों में चंदैनी गोंदा और कारी देखी थी, हमारे एक साथी नें देवार डेरा भी देखा था। उस समय चंदैनी गोंदा जैसे कई लोक सांस्कृंतिक कार्यक्रम उभर कर सामनें आ रहे थे उनमें से कईयों को हमने साथ में ही देखा था। तब मैं गांव की राम-लीला और धार्मिक नाटकों में विभिन्न किरदार निभाता था। नाचा में काम करने से मॉं-बाबूजी रोकते थे किन्तु देखने की छूट मिल जाती थी। हम कभी-कभी गांव में लीला के दौरान ही हबीब तनवीर के नाटक चरणदास चोर और पोंगवा पंडि़त भी करते थे। मैंनें रायपुर में इन दोनों नाटकों को देखा था, तब हमारी कला की पारखी नजर नहीं थी, सिर्फ उत्सुकता थी और इन महान लोक कलाकारों से मिलनें का उद्देश्यी मित्रों में रौब गांठना ही था। उस दिन हम, बघेरा में रात भर चंदैनी गोंदा, डेवार डेरा और कारी के मंचन को देखने के अपने अनुभव के संबंध में गोठियाते रहे, खुमान-गिरजा के संगीतबद्ध गीतों को गुनगुनाते रहे। सुबह बिना नहाये-धोये सिमगा की ओर निकल चले, जाते जाते दाऊ जी से मिलने का भी हमारा ध्यान नहीं आया। आज जब दाऊ जी से मुलाकात के इस अभूतपूर्व अनुभव को महसूसता हूं तो रोमांचित हो जाता हूं। काश छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के नागरी प्रदर्शन के वे स्वर्णिम दिन फिर लौट कर आ जाते। किन्तु यही सांस्कृतिक प्रगति का तकाजा है, इस निरंतर प्रवाहमान नद को रोका नहीं जा सकता।
- संजीव तिवारी

सिर्फ एक गांव में गाई जाती है छत्‍तीसगढ़ी में महामाई की आरती ??

छत्तीसगढ़ के प्राय: हर गांव में देवी शक्ति के प्रतीक के रूप में महामाई के लिए एक स्‍थल निश्चित होता है. जहां प्रत्येक नवरात में ज्योति जलाई जाती है एवं जेंवारा बोया जाता है. सभी गांवों में नवरात्रि के समय संध्या आरती होती है. ज्यादातर गांवों में यह आरती हिन्दी की प्रचलित देवी आरती होती है या कहीं कहीं स्थानीय देवी के लिए बनाई गई आरती गाई जाती है. मेरी जानकारी के अनुसार एक गांव को छोड़ कर कहीं अन्‍य मैदानी छत्‍तीसगढ़ के गांव में छत्‍तीसगढ़ी भाषा में महामाई की आरती नहीं गाई जाती. जिस गांव में छत्‍तीसगढ़ी में महामाई की आरती गाई जाती है वह गांव है बेमेतरा जिला के बेरला तहसील के शिवनाथ के किनारे बसा गांव खम्‍हरिया जो खारून और शिवनाथ संगम स्‍थल सोमनाथ के पास स्थित है.

इसके दस्‍तावेजी साक्ष्‍य एवं स्‍थापना के लिए यद्यपि मैं योग्‍य नहीं हूं किन्‍तु वयोवृद्ध निवासियों से चर्चा से यह सिद्ध होता है कि यह परम्‍परा बहुत पुरानी है. वाचिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी गाए जा रहे इस महामाई की आरती का जो ज्ञात प्रवाह है उसके अनुसार लगभग 500 वर्ष से यह इसी तरह से गाई जा रही है. यह आरती कब से गाई जा रही है पूछने पर गांव वाले बतलाते हैं कि लगभग चार पांच सौ साल पहले से यानी चार पांच पीढ़ी से लगातार यह परम्‍परा चली आ रही हो, इसके अनुसार इसे पांच सौ वर्ष से निरंतर माना जा सकता है यह भी हो सकता है कि यह उससे भी पहले चली आ रही गायन परम्परा हो.

खम्हरिया में गाई जाने वाली आरती में यद्धपि बीच के बोल आरती से नहीं लगते क्योंकि इसमें देवी के गुणगान का बखान नहीं दिखता और ना ही प्रार्थना के भाव प्रत्यक्षत: नजर आते सिवा बार बार के टेक ‘महामाई ले लो आरती हो माय’ को ठोड़ दें तो. किन्‍तु पारंपरिकता एवं देसज भाव इस आरती के महत्व को प्रतिपादित करती है. इस आरती में निहित शब्दों और उनके अर्थों में तारतम्यता भी नहीं नजर आती. इस गांव में गाई जाने वाली आरती में पांच पद हैं जो सभी एक दूसरे से अलग अलग प्रतीत होते हैं.  खम्‍हरिया गांव में गाई जाने वाली छत्‍तीसगढ़ी महामाई की आरती इस प्रकार है -

महामाई ले लो आरती हो माय

गढ़ हिंगलाज में गड़े हिंडोला
लख आये लख जाए
लख आये लख जाए
माता लख आए लख जाए
एक नइ आवय लाल लगुंरवा
जियरा के परान अधार
महामाई ले लो आरती हो माय
महामाई ले लो आरती हो माय

गढ़ हिंगलाज म उतरे बराईन
आस पास नरियर के बारी
झोफ्फा झोफ्फा फरे सुपारी
दाख दरूहन केकती केंवरा
मोगरा के गजब सुवास
महामाई ले लो आरती हो माय

बाजत आवय बांसुरी अउ
उड़त आवय घूर
माता उड़त आवय घूर
नाचत आवय नन्द कन्हैंया
सुरही कमल कर फूल
महामाई ले लो आरती हो माय

डहक डहक तोर डमरू बाजे
हाथ धरे तिरसूल बिराजे
रावन मारे असुर संहारे
दस जोड़ी मुंदरी पदुम बिराजे
महामाई ले लो आरती हो माय

अन म जेठी कोदई अउ
धन म जेठी गाय
माता धन म जेठी गाय
ओढ़ना म जेठी कारी कमरिया
ना धोबियन घर जाए
माता ना धोबियन घर जाए
महामाई ले लो आरती हो माय

आईये इस बिरले आरती को विश्‍लेषित करते हैं, आरती के पहले पद में हिंगलाज गढ़ में माता के पालने में झूलने और माता के दर्शन हेतु लाखों लोगों के आने जाने का उल्लेख आता है. लोक लंगुरे के नहीं आने से चिंतित है क्योंकि लंगूर माता के जियरा के प्राण का आधार है यानी प्रिय है. दूसरे पद में गढ़ हिंगलाज की सुन्दरता का वर्णन मिलता है जिसमें नारियल के बाग, सुपाड़ी के पेंड़, दाख, दारू, केकती, केंवड़ा के फूल के साथ ही मोंगरा के फूलों के सुवास का वर्णन है ऐसे स्थान पर बराईन के उतरने का उल्लेख लोक करता है. पारंपरिक छत्तीसगढ़ी जस गीतों में बराईन पान बेंचने वाली का उल्लेख कई बार आता है. जिसके आधार पर यह प्रतीत होता है कि बराईन एक महिला तांत्रिक है किन्तु देवी उपासक है उसकी झड़प यदा कदा लंगुरे से, जो 21 बहिनी के भईया लंगुरवा है, से होते रही है. यह महिला तांत्रिक उस गढ़ हिंगलाज में उतरती है. तीसरे पद में लोक कृष्ण को पद में पिरोता है कि वह बांसुरी बजाते हुए नाचते हुए जब आता है तो उसके नाचने से धूल उड़ती है और वह हाथ में कमल का फूल लिए आता है. चौंथे पद में संगीत का चढ़ाव तेज हो जाता है और गायन में भी तेजी आ जाती है इसमें देवी के रूप का वर्णन आता है डहक डहक डमरू बज रहा है, तुम्हारे हाथ में त्रिशूल है, तुमने रावण को मारा है और असुरों का संहार किया है. तुम्हारी अंगुलियों में दस जोड़ी अंगूठी है. तुम कमल के आसन में विराजमान हो. पांचवे पद में लोक शायद माता को अर्पित करने योग्य वस्तु का वर्णन करते हुए संदेश देना चाहता है वह कहता है कि अन्न में मुख्य कोदो है जो छत्तीसगढ़ के बहुसंख्यक गरीब जनता का अन्न है. धन में वह गाय को प्रमुख स्थान देता है, कपड़े मे प्रमुख स्थान वह भेड़ों के रोंए से बने काले कम्बल को देता है क्योंकि वह धोबी के घर कभी धुलने के लिए नहीं जाता यानी इसे धोने की आवश्यकता ही नहीं.

इन पांचों पदों को जोड़ने का प्रयास मैं बचपन से करते रहा हूं, पहले पद में हिंगलाज माता का वर्णन दूसरे में गढ़ हिंगलाज का वर्णन, तीसरे पद में कृष्ण का वर्णन, चौंथे में माता का स्वरूप वर्णन और अंतिम में चढ़ावा हेतु वस्तु का वर्णन आता है जिसमें कृपा के पद को हटा दें तो तारतम्यता बनती नजर आती है, यह भी हो सकता है कि इस आरती में पहले और पर रहे होंगें जो हटा दिए गए होंगें या भुला दिए गए हों.

गांव वालों का कहना है कि ये आरती रतनपुर के महामाई की आरती है, उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण जीवन यापन हेतु पहले रतनपुर राज्य आए फिर अन्य गढ़ों में फैलते गए, गढ़पतियों के द्वारा पहले से बसे गांव ब्राह्मणों को दान में दिए गए तो कुछ ब्राह्मण उपयुक्त स्थल में अपना स्वयं का गांव बसा लिया. इसी क्रम में रांका राज के अधीन इस गांव को बसाने वाले कुछ ब्राह्मण अपने सेवकों के साथ यहां आये और शिवनाथ नदी के तट का उपयुक्त उपजाउ जमीन को चुनकर अपना डेरा डाल लिया. तब रतनपुर की देवी महामाया ही उनके स्मृति में थी उन्होनें ही नदी के किनारे देवी का स्थापना किया और तब से यही आरती गाई जा रही है. बाद के दिनों में शिवरीनारायण होते हुए उड़ीसा के मांझी लोग नदी के तट पर आकर बस गए धीरे धीरे गांव स्वरूप लेने लगा और आज लगभग 1500 की जनसंख्या वाला यह गांव, बेमेतरा जिले का आखरी गांव है.

संजीव तिवारी

फसलों, पशुओं और दीपों के साथ उत्साह का पर्व दीपावली

भारतीय सनातन परम्परा के अनुसार कार्तिक महीने में दीपों के उत्सव का त्यौहार दीपावली संपूर्ण भारत में मनाई जाती है. पत्र—पत्रिकायें, शुभकामना संदेश दीप और लक्ष्मी के तत्सम तद्भव शब्दों के लच्छेदार वाक्यांशों से भर जाते है. आखिर ऐसा हो भी क्यों ना, क्योंकि यह हमारा महत्वपूर्ण त्यौहार जो है. अलग अलग स्थानों और आख्यानों में इसे मनाने के पीछे कारण जो भी रहे हों किन्तु सभी का केन्द्र धन, आनन्द और दीप से है. परम्पराओं में जन के लिए धन का मूल अर्थ धान्य से है जो हमारे देश का मूल है. लम्बे इंतजार और कठिन श्रम के उपरांत धान्य जब हमारे घर में आये तो उत्साह तो निश्चित है, उसके स्वागत में दीप जलाना हमारी परम्परा है. इस त्यौहार की परिकल्पना इसी से आगे बढ़ती है, कल्पना कीजिये ऐसे समय की जब रौशनी का माध्यम सिर्फ दीप रहा होगा. अमावस की रात को अनगिनत दीप जब जल उठे होंगें, जन स्वाभाविक रूप से नाच उठा होगा.

श्रम के धान्य स्वरूप से परे दीपों के इस पर्व का छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में सीधा संबंध कृष्ण से भी है जो असल मायनों में धुर विद्रोही रहे हैं, वर्तमान परिवेश में वामपंथी. चाहे उनका जन शिक्षण का उद्देश्य इंद्र की पराधीनता के विरूद्ध हो या कंस के अराजकता के विरूद्ध. जननायक कृष्ण के वंशज यादवों के लिए वैचारिक जीत के उत्साह का यह पर्व छत्तीसगढ़ में इनके दोहों, गुडदुम बाजों और नृत्य से आरम्भ होता है.

कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण पशुओं के महत्व को नकारा नहीं जा सकता और इन पशुओं के पालक होने के कारण यादवों के सामाजिक महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता. इन्हीं के आगाज से आरंभ देवारी सुरहुत्ती यानी घनतेरस से शुरू होकर जेठउनी यानी देव उठनी तक चलने वाला लम्बा त्यौहार है. यही वो समय है जब किसानों की फसलें खलिहान या घर पर होती है, किसानों के श्रम का फल उसे मिलता है और धन के रूप में धान्य उसके घर में होता है. इसी धान्य लक्ष्मी के स्वागत में हम दीप जलाते हैं एवं खुशियां मनाते हैं. दीप और धान्य के अंतरसंबंधों को आप इस बात से समझ सकते हैं कि दीपावली के पहले या बाद में भी जब धान को मींज कर उसे साफ कर खलिहान में एक जगह जब इकट्ठा किया जाता है जिसे रास कहा जाता है उसके उपर शंकु पर दीपक रखा जाता है फिर पूजा के बाद धान की नपाई होती है. यानी दीप का स्थान सर्वोच्च है अन्न से उपर क्योंकि दीप प्रतीक है, राह दिखाता है.

प्राकृतिक कारणों से स्वाभाविक रूप से बरसात में घर के दीवार खराब हो जाते हैं उन्हें साफ करके उसमें नया रंग रोंगन की आवश्यकता पड़ती है. बरसाती प्रभाव व आद्रता एवं संक्रामक बीमारियों से लड़ते मनुष्य और कृषि कार्य में लगे पशुओं के लिए भी यह मौसम उनमें नई उर्जा का संचार करने एवं रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास करने में सहायक होता है. पशुओं के कोठे लीपे पोते जाते हैं, उन्हें सोहई बांधा जाता है, उनका श्रृंगार किया जाता है. कोठा सहित पूरे डीह डोंगर यानी गांव के हर जगह दीपक जलाया जाता है.

छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों के साथ ही बस्तर के आदिवासी के लिए यह ‘दियारी’ खेतों में खड़ी फसल के पूजन का त्यौहार हैं जो कार्तिक माह में ही तीन दिन का होता है. परंपरानुसार पहले दिन खेतों में खड़ी फसल की बालियों का नारायण राजा के साथ विवाह तथा चरवाहे पशुपालकों के यहां जाकर गौशाला में बैल और गायों के गले में पवित्र धागा बांधकर भेंट प्राप्त किया जाता हैं, पशुपालकों के द्वारा चरवाहों को धान भेंट में दिया जाता है. दूसरे दिन बैलों को लाल टीका लगाकर खिचड़ी खिलाई जाती है, तीसरे दिन गोठान पूजा जात्रा किया है जिसमें बैलों को सजा कर सींगों पर लाल कपड़ा बांध कर दौड़ाया जाता है. बाद में घर की महिलायें चरवाहों को सूपा भर अनाज दान में देती है. फलस, अन्न और पशु इन तीनों के संयोंग से प्राप्त एश्वर्य खुशहाली का नाम ही दियारी या देवारी है. इसी दियारी में बनाये जाने वाले धान के बालियों से निर्मित झालर के संबंध में लाला जगदलपुरी की एक हल्‍बी गीत ‘उडी गला चेडे’ प्रासंगिक है – ‘राजे दिना/धन धन हयं/उछी उडी करी आयते रला/बसी-बसी करी खयते रला/सेस्‍ता धान के पायते रला/केडे सुन्‍दर/चटेया चेडे/सरी गला धान/भारी गला चेडे/एबर चेडे केबे ना आसे/ना टाक सेला/कमता करबिस/एबर तुय तो ‘खड’ होयलिस/एबर तोके फींगीं देयबाय/गाय खयसी/चेडे गला/आउरी गोटे ‘सेला’ उगर ।‘

लटक झूल रहा था नीचे धान की बालियों का एक झालर । टंगा हुआ था ‘सेला’ दरवाजे के चौंखट पर । अपनी शुभ शोभा छिटकाये दर्शनीय । एक दिन एक सुन्‍दर गौरैया आई, और उसने दोस्‍ती गांठ ली ‘सेला’ से । रोज रोज वह उड उड कर बार बार आती रही थी । बैठ कर सेला धान को खाती रही थी । भूख बुझाती रही थी । एक सुन्‍दर गौरैया । धीरे धीरे कम होते गये सेला के लटकते झूलते दाने । और एक दिन ऐसा आया कि सेला के पास शेष नहीं रह गया एक भी दाना । चिडिया उड गई । ‘चिडिया अब कभी नहीं आएगी रास्‍ता मत देख सेला ‘ सेला से उसकी आत्‍मा कह रही थी ‘अब तो तू रह गया है केवल घांस गौरैया के लिए अब रखा क्‍या है तेरे पास तेरे इस अवशिष्‍ट भाग से गौरैया को क्‍या लेना देना उसे चाहिए दाने गौरैया की दोस्‍ती तुझसे नहीं तेरे दानों से थी अब तुझे चौखट से उतार कर बाहर फेंक देंगें गइया खा जायेगी गौरैया गई एक नए ‘सेला’ की खोज में।

उत्सव के उत्साह को निरंतर रखने की जन सोंच भी गजब की है वह देवारी के बाद होरी के इंतजार में आनंदित होता है. दूसरे सेला के लिए उड चलता है. यादवों के बीच प्रचलित एक लोक दोहा देखें आवत देवारी लहुर लईया, जावत देवारी बड़ दूर/ जा जा देवारी अपन घर, फागुन उड़ावे धूर. यानी दिवाली के त्यौहार का महत्व बहुत है, उसके लिए हम उतावले रहते हैं और यह कब आके चली जाती है पता ही नहीं चलता, हम साल भर इसका इंतजार करते हैं. दीपावली अब तुम विदा लो क्योंकि अब हमारी स्मृत्तियों में फागुन को धूल उडाने दो. फिर अगले साल आयेगी दीपावली और हम अपनी प्राणदायी फसलों, पशुओं और दीपों की कल्पना कागजों में करेंगें.

संजीव तिवारी

चारण भाटों की परम्परा और छत्तीसगढ़ के बसदेवा

आज सुबह समाचार पत्र पढ़ते हुए कानों में बरसों पहले सुनी स्वर लहरियॉं पड़ी.ध्यान स्वर की ओर केन्द्रित किया, बचपन में गांव के दिन याद आ गए. धान कटने के बाद गांवों में खुशनुमा ठंड पसर जाती है और सुबह ‘गोरसी’ की गरमी के सहारे बच्‍चे ठंड का सामना करते हैं. ऐसे ही मौसमों में सूर्य की पहली किरण के साथ गली से आती कभी एकल तो कभी दो तीन व्यक्तियों के कर्णप्रिय कोरस गान की ओर कान खड़े हो जाते. ‘गोरसी’ से उठकर दरवाजे तक जाने पर घुंघरू लगे करताल या खंझरी के मिश्रित सुर से साक्षात्‍कार होता. घर के द्वार पर सर्वांग धवल श्वेत वस्त्र में शोभित एक बुजुर्ग व्‍यक्ति उसके साथ दो युवा नजर आते. बुजुर्ग के सिर पर पीतल का मुकुट भगवान जगन्नाथ मंदिर की छोटी प्रतिकृति के रूप में हिलता रहता. वे कृष्‍ण जन्‍म से लेकर कंस वध तक के विभिन्‍न प्रसंगों को गीतों में बड़े रोचक ढ़ंग से गाते और खंझरी पर ताल देते, एक के अंतिम छूटी पंक्तियों को दूसरा तत्‍काल उठा लेता फिर कोरस में गान चलता. कथा के पूर्ण होते तक हम दरवाजे पर उन्‍हें देखते व सुनते खड़े रहते. इस बीच घर से नये फसल का धान सूपे में डाल कर उन्‍हें दान में दिया जाता और वे आशीष देते हुए दूसरे घर की ओर प्रस्‍थान करते. स्‍मृतियों को विराम देते हुए बाहर निकल कर देखा, बाजू वाले घर मे एक युवा वही जय गंगान गा रहा था, बुलंद आवाज पूरे कालोनी के सड़कों में गूंज रही थी. उसके वस्त्र ‘रिंगी चिंगी’ थे, किन्तु स्वर और आलाप बचपन में सुने उसी जय गंगान के थे. मन प्रफुल्लित होने लगा, और वह भिक्षा प्राप्त कर मेरे दरवाजे पर आ गया.

श्री कृष्ण मुरारी के जयकारे के साथ उसने अपना गान आरंभ कर दिया. वही कृष्ण जन्म, देवकी, वासुदेव, मथुरा, कंस किन्तु छत्तीसगढ़ी में सुने इस गाथा में जो लय बद्धता रहती है ऐसी अनुभूति नहीं हो रही थी. फिर भी खुशी हुई कि इस परम्परा को कोई तो है जिसने जीवित रखा है क्योंकि अब गांवों में भी जय गंगान गाने वाले नहीं आते.

किताबों के अनुसार एवं इनकी परम्‍पराओं को देखते हुए ये चारण व भाट हैं. छत्‍तीसगढ़ में इन्‍हें बसदेवा या भटरी या राव भाट कहा जाता है, इनमें से कुछ लोग अपने आप को ब्रम्‍ह भट्ट कहते हैं एवं कविवर चंदबरदाई को अपना पूर्वज मानते हैं. चारण परम्‍परा के संबंध में ब्रह्मपुराण का प्रसंग तो स्पष्ट करता है कि चारणों को भूमि पर बसानेवाले महाराज पृथु थे। उन्होंने चारणों को तैलंग देश में स्थापित किया और तभी से वे देवताओं की स्तुति छोड़ राजपुत्रों और राजवंश की स्तुति करने लगे (ब्रह्म पु. भूमिखंड, 28.88)। यहीं से चारण सब जगह फैले। महाभारत के बाद भारत में कई स्थानों पर चारण वंश नष्ट हो गया। केवल राजस्थान, गुजरात, कच्छ तथा मालवे में बच रहे। इस प्रकार महाराज पृथु ने देवता चारणों को "मानुष चारण" बना दिया। इसी प्रकार भाटों के संबंध में जनश्रुतियों में भाटों के संबंध में कई प्रचलित बातें कही जाती हैं। इनकी उत्पत्ति क्षत्रिय पिता और विधवा ब्राह्मणी माता से हुई बताई जाती है। ..... वस्तुत: यह एक याचकवर्ग है जो दान लेता था। ..... कहते हैं, चारण तो कच्छ में ही हैं पर भाट सर्वत्र पाए जाते हैं .... चारण तो केवल राजपूतों के ही दानपात्र होते हैं, पर भाट सब जातियों से दान लेते हैं। ..... कविराज राव रघुबरप्रसाद द्वारा लिखित और प्रकाशित भट्टाख्यानम् नामक छोटी सी पुस्तक में कवि ने खींचतानी से प्रमाण जुटाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भाट शब्द ब्रह्मभट्ट से बना है, उसे ब्रह्मराव भी कहा गया है। भट्ट जाति की उत्पत्ति का प्रतीक पुरुष ब्रह्मराव था जिसे ब्रह्मा ने यज्ञकुंड से उत्पन्न किया था। भाट स्वयं को कभी सूत, मागध और वंदीजन कहकर अपने को सरस्वतीपुत्र कहने लगते हैं और कभी अग्निकुंड से उद्भूत बताते हैं। (विकिपीडिया)

छत्‍तीसगढ़ के राव भाटों के संबंध में उपरोक्‍त पंक्तियों का जोड़ तोड़ फिट ही नहीं खाता. छत्‍तीसगढ़ से इतर राव भाट वंशावली संकलक व वंशावली गायक के रूप में स्‍थापित हैं और वे इसके एवज में दान प्राप्‍त करते रहे हैं. छत्‍तीसगढ़ के बसदेवा या राव भाट वंशावली गायन नहीं करते थे वरण श्री कृष्‍ण का ही जयगान करते थे. इनके सिर में भगवान जगन्‍नाथ मंदिर पुरी की प्रतिकृति लगी होती है जो इन्‍हें कृष्‍ण भक्‍त सिद्ध करता है. वैसे छत्‍तीसगढ़ की सांस्‍कृतिक परम्‍पराओं में पुरी के जगन्‍नाथ मंदिर का अहम स्‍थान रहा है इस कारण हो सकता है कि इन्‍होंनें भी इसे अहम आराध्‍य के रूप में सिर में धारण कर लिया हो. छत्‍तीसगढ़ में इन्‍हें बसदेवा कहा जाता है जो मेरी मति के अनुसार 'वासुदेव' का अपभ्रंश हो सकता है. गांवों में इसी समाज के कुछ व्‍यक्ति ज्‍योतिषी के रूप में दान प्राप्‍त करते देखे जाते हैं जिन्‍हें भड्डरी कहा जाता है. छत्‍तीसगढ़ में इनका सम्‍मान महराज के उद्बोधन से ही होता है, यानी स्‍थान ब्राह्मण के बराबर है. छत्‍तीसगढ़ के राव भाटों का मुख्‍य रोजगार चूंकि कृषि है इसलिये उनके द्वारा वेद शास्‍त्रों के अध्‍ययन पर विशेष ध्‍यान नहीं दिया गया होगा और वे सिर्फ पारंपरिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी वाचिक रूप से भजन गायन व भिक्षा वृत्ति को अपनी उपजीविका बना लिए होंगें. छत्‍तीसगढ़ी की एक लोक कथा ‘देही तो कपाल का करही गोपाल’ में राव का उल्‍लेख आता है. जिसमें राव के द्वारा दान आश्रित होने एवं ब्राह्मण के भाग्‍यवादी होने का उल्‍लेख आता है.

गांवों में जय गंगान गाने वालों के संबंध में जो जानकारी मिलती हैं वह यह है कि यह परम्परा अब छत्तीसगढ़ में लगभग विलुप्ति के कगार पर है, अब पारंपरिक जय गंगान गाकर भिक्षा मांगने वाले बसदेवा इसे छोड़ चुके हैं. समाज के उत्तरोत्तर विकास के साथ भिक्षा को वृत्ति या उपवृत्ति बनाना कतई सही नहीं है किन्तु सांस्कृतिक परम्पराओं में जय गंगान की विलुप्ति चिंता का कारण है. अब यह समुदाय जय गंगान गाकर भिक्षा मांगने का कार्य छोड़ चुका है. पहले इस समुदाय के लोग धान की फसल काट मींज कर घर में लाने के बाद इनका पूरा परिवार छकड़ा गाड़ी में निकल पड़ते थे गांव गांव और अपना डेरा शाम को किसी गांव में जमा लेते थे. मिट्टी को खोदकर चूल्हा बनाया जाता था और भोजन व रात्रि विश्राम के बाद अल सुबह परिवार के पुरूष निकल पड़ते थे जय गंगान गाते हुए गांव के द्वार द्वार. मेरे गांव के आस पास के राव भाटों की बस्ती के संबंध में जो जानकारी मुझे है उसमें चौरेंगा बछेरा (तह. सिमगा, जिला रायपुर) में इनकी बहुतायत है.

पारंपरिक भाटों के गीतों में कृष्‍ण कथा, मोरध्‍वज कथा आदि भक्तिगाथा के साथ ही ‘एक ठन छेरी के दू ठन कान बड़े बिहनिया मांगें दान’ जैसे हास्य पैदा करने वाले पदों का भी प्रयोग होता था. समयानुसार अन्‍य पात्रों नें इसमें प्रवेश किया, प्रदेश के ख्‍यातिनाम कथाकार व उपन्‍यासकार डॉ.परदेशीराम वर्मा जी के चर्चित उपन्‍यास ‘आवा’ में भी एक जय गंगान गीत का उल्‍लेख आया है -
जय हो गांधी जय हो तोर,
जग म होवय तोरे सोर । जय गंगान ....
धन्न धन्न भारत के भाग,
अवतारे गांधी भगवान । जय गंगान .....

मेरे शहर के दरवाजे पर जय गंगान गाने वाले व्‍यक्ति का जब मैं परिचय लिया तो मुझे आश्‍चर्य हुआ. उसका और उसके परिवार का दूर दूर तक छत्‍तीसगढ़ से कोई संबंध नहीं था. उसकी पीढ़ी जय गंगान गाने वाले भी नहीं है वे मूलत: कृषक हैं. वह भिक्षा मांगते हुए ऐसे मराठी भाईयों के संपर्क में आया जो छत्‍तीसगढ़ में भिक्षा मांगने आते थे और कृष्‍ण भक्ति के गीत गाते थे. उनमें से किसी एक नें जय गंगान सुना फिर धीरे धीरे अपने साथियों को इसमें प्रवीण बनाया. अब वे साल में दो तीन बार छत्‍तीसगढ़ के शहरों में आते हैं और कुछ दिन रहकर वापस अपने गांव चले जाते हैं. मेरे घर आया व्‍यक्ति का नाम राजू है उसका गांव खापरी तहसील कारंजा, जिला वर्धा महाराष्‍ट्र है. इनके पांच सदस्यों की टोली समयांतर में दुर्ग आती हैं और उरला मंदिर में डेरा डालती हैं.

राजू के गाए जय गंगान सुने ......


संजीव तिवारी

वैवाहिक परम्‍पराओं में आनंदित मन और बैलगाड़ी की सवारी

अक्षय तृतिया के गुड्डा-गुड्डी
अक्षय तृतिया के दिन से गर्मी में बढ़त के साथ ही छत्तीसगढ़ में विवाह का मौसम छाया हुआ है। पिछले महीने लगातार सड़कों में आते-जाते हुए बजते बैंड और थिरकते टोली से दो-चार आप भी हुए होंगें। इन दिनों आप भी वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हुए होंगें और अपनी भूली-बिसरी परम्पराओं को याद भी किए होगे। छत्तीसगढ़ में विवाह लड़का-लड़की देखने जाने से लेकर विदा कराने तक का मंगल गीतों से परिपूर्ण, कई दिनों तक चलने वाला आयोजन है। जिसमें गारी-हंसी-ठिठोली एवं करूणमय विवाह गीतों से लोक मानस के उत्साह को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। वैवाहिक मेहमान महीनों से विवाह वाले घरों में आकर जमे रहते हैं, बचपन में हम भी मामा गांव और अन्‍य रिश्‍तेदारों के घरों की शादी में महीनों 'सगाही' जाते रहे हैं।

जनगीतकार लक्ष्‍मण मस्‍तूरिहा की पुत्री शुभा का विवाह 12 मई 2011
छत्तीसगढ़ की पुरानी परम्परा में बाल-विवाह की परम्परा रही है, तब वर-वधु को 'पर्रा' में बैठाकर 'भांवर गिंजारा' जाता था और दोनों अबोध जनम-जनम के लिए एक-दूसरे के डोर में बंध जाते थे। सामाजिक मान्यता उस डोर के बंधन को सशक्त करती थी और वे इस अदृश्य बंधन के सहारे पूरी उम्र साथ-साथ काटते थे। शिक्षा के प्रसार के साथ ही कुछ बढ़ी उम्र में शादियां होने लगी किन्तु संवैधानिक उम्र के पूर्व ही। इतना अवश्य हुआ कि लड़के-लड़कियॉं विवाह का मतलब भले ना जाने किन्तु अपने पांवों से फेरे लेने लगे। लगभग इसी अवधि की बात बतलाते हुए हमारे पिता जी बतलाते थे कि हमारी मॉं को देखने और विवाह पक्का करने गांव के ठाकुर (नाई) और बरेठ (धोबी) गए थे। दादाजी एवं पिताजी नें मेरी मॉं को देखा नहीं था। मेरी मॉं बिलासपुर गनियारी के पास चोरभट्ठी में अपने भाई-बहनों के साथ उसी स्कूल में पढ़ रही थी जहॉं मेरे नाना प्रधान पाठक थे।
मेरे भांजें की शादी 
उन दिनों 'पउनी-पसारी' के द्वारा चयनित वर-वधु का विवाह अभिभावक सहर्ष तय कर स्वीकार करते थे। गावों में नाई, रावत और धोबी घर के कामों में इस तरह रमें होते हैं कि वे परिवार के एक अंग बन जाते हैं। वे अपने ठाकुर (मालिक) के बच्चों से एवं अपने ठाकुर की परिस्थितियों से भी परिचित होते हैं उन्हें पता होता है कि मालिक ठाकुर के कौन बच्चे के लिए कैसी लड़की या लड़का चाहिए। मालिक ठाकुर को भी अपने 'पौनी-पसारी' पर भरपूर भरोसा होता था, शायद इसी विश्वास के कारण यह परम्परा चल निकली होगी। 

डीजे के कर्कश संगीत में थिरकते युवा
योग्य वर या वधु के चयन के बाद 'लगिन धराने' के दिन अभिभावक वधु के घर जाता है। इस दिन अभिभावक और उसके पुरूष संबंधी वधु के घर में जाकर विधिवत पूजा के साथ विवाह का मुहुर्त तय करते हैं और लग्न पत्रिका का आदान प्रदान होता है। वधु के हाथ से 'जेवन' बनवाया जाता है और वर के अभिभावक और संबंधी को वधु के द्वारा ही परोसा जाता है। वर के अभिभावक और उसके पुरूष संबंधी वधु को 'जेवन' करने के बाद 'रूपिया धराते' हैं और वधु उनका चरण स्पर्श कर आर्शिवाद लेती है। आजकल यह परम्परा अब होटलों में निभाई जा रही है जहॉं वधु के पाक कला प्रवीणता की परीक्षा नहीं हो पाती। वैसे भी आधुनिक समाज में नारी का इस प्रकार परीक्षण परीक्षा उचित भी नहीं है। 
व्‍यंग्‍यकार विनोद साव की पुत्री शैली का विवाह 07 मई 2011
'लगिन धराने' के बाद दोनों पक्षों के घरों में मांगलिक कार्यक्रम आरंभ हो जाते हैं। अचार, बरी, बिजौरी बनने लगता है, जुन्ना धान 'कोठी-ढ़ाबा' से निकाल कर 'कुटवाने' 'धनकुट्टी' भेजा जाता है, गेहूं की पिसाई और अरहर की दराई में घर का 'जतवा घरर-घरर नरियाने' लगता है। सोन-चांदी और कपड़ों की खरीददारी में महिलायें 'बिपतिया' जाती हैं। विवाह और लगिन के बीच किसी दिन लड़के वाले के तरफ से एवं लड़की वाले के तरफ से एक दूसरे के श्रृंगार प्रसाधन, कपड़े व संबंधियों के कपड़े लिये व दिये जाते हैं। परम्परा में इसे 'फलदान' का नाम दिया गया है क्योंकि कपड़ों के साथ ही फलों की टोकरियॉं भी भेजी जाती है। छत्तीसगढ़ में फलदान वर या वधु के घर का स्टै‍टस बताने-जताने का तरीका है। फलदान आने के बाद उसे घर के आंगन या ओसारे में फैलाकर गांव वालों को दिखाया जाता है। इसके बाद विवाह के लिए 'मडवा' की तैयारी शुरू हो जाती है। 

विनोद साव जी
इसके आगे छत्तीसगढ़ी वैवाहिक परम्परा के संबंध में सीजी गीत संगी में राजेश चंद्राकर जी नें छत्तीसगढ़ के वैवाहिक गीतों के साथ इन्हें बहुत सुन्दर ढ़ंग से प्रस्तुत किया है। उनके पोस्टों में यहॉं के वैवाहिक गीतों एवं परम्पराओं का आनंद लिया जा सकता है। पिछले माह लगातार 'बिहाव के लाडू झड़कते' हुए कुछ एैसे सगे - संबंधियों और मित्रों के पुत्र-पुत्रियों के विवाह में जाने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ जहॉं लेखन विधा से जुड़े लोगों से मेल-मुलाकात हुई। विवाह वर-वधु एवं उनके पारिवारिक संबंधियों के साथ-साथ समाज को आपस में मिलाता है। वैवाहिक कार्यक्रमों में शामिल होना मन को आनंदित करता है, हम आपस में बातचीत करते हैं खुशियां बांटते हैं और ऐसे कार्यक्रम में जहां डीजे और कर्कश संगीत ना हो वहां आप खुलकर बातें भी कर सकते हैं और दूसरों की बातें सुन भी सकते हैं। ऐसा ही एक वैवाहिक कार्यक्रम व्यंग्यकार, कथाकार, उपन्‍यासकार विनोद साव जी की पुत्री के विवाह में देखने को मिला। विनोद साव जी की बिटिया के भव्य वैवाहिक कार्यक्रम में डीजे और कर्कश संगीत गायब था। आजकल के ज्यादातर वैवाहिक कार्यक्रम में डीजे के तेज आवाज के कारण हम आपस में बात ही नहीं कर पाते, मुझे विनोद जी का यह प्रयोग बहुत अच्छा लगा। पिछले ही महीनें छत्तीसगढ़ के जनकवि लक्ष्मण मस्तूरिहा जी की पुत्री का भी विवाह था और हम यहॉं भी आमंत्रित थे।
बैलगाड़ी में कोट पहने अपनी श्रीमती जी के साथ घर की ओर जाती हमारी पारंपरिक सवारी 
बिहाव नेवता मानते हुए अपनी शादी के दिन की यादें भी साथ चलती हैं, अपने इन विशेष दिवस को कोई नहीं भूल सकता, इन शब्दों के बहाने और सही कहें तो 'पोस्‍ट ठेलने के लिए' हमने भी अपने बीते दिनों को याद किया। 'धरनहा' पेटी से फोटो एल्बम निकलवाया और घंटो बांचते रहे। हॉं जी देखना क्या बांचना ही तो है अपने विवाह के चित्रों को। इन्हीं मे से एक दो ऐतिहासिक चित्रों को आप लोगों के साथ बांट रहा हूँ।  कार में बारात जाने की परम्परा नई है, इस नई परम्परा का निर्वहन हमनें भी किया। विवाह के बाद अपनी पत्नी के साथ कच्चे रास्ते में धूल उडाते हुए पाल के एनई से धुर गांव के महामाई मंदिर में आये। गांव की परम्परा के अनुसार वर-वधु को पहले ग्राम देवी से आर्शिवाद लेना होता है फिर लगभग आधे किमी दूर घर जाना होता है। मंदिर में पूजा कर जब हम बाहर निकले तब तक मेरे साथ आई सभी गाडि़यों को मेरे पिताजी मेरे घर के पास पार्क करवा आये। हमारे स्वागत में बैल गाड़ी के साथ हमारा पुराना 'कमइया' हाथ जोड़े खड़ा मिला। मेरे गुस्साने पर वह मुझे समझाने लगा ‘बड़े दाउ के संउख ये संजू दाउ झन रिसा।’ पिता के मन की उपज थी यह, उनका किसान मन चाहता था कि अपनी बैलगाड़ी में बहु घर आये। मैं कुढ़ता रहा, और सामान के साथ हम बैल गाड़ी पर लद गए। इस चित्र का वाकया मेरे 14 वर्षीय पुत्र के लिए ‘अटपटा और मूर्खतापूर्ण’ है, किन्तु मेरे पिता के लिए यह आवश्यक था। छत्‍तीसगढ़ की वैवाहिक परम्‍परा पर पुन: कभी लिखूंगा, अभी तो ये चित्र देखिये -


लो आ गई सवारी घर तक
संजीव तिवारी

सुआ गीत : नारी हृदय की धड़कन

आज छत्‍तीसगढ़ के दुर्ग नगर में एक अद्भुत आयोजन हुआ जिसमें परम्‍पराओं को सहेजने की मिसाल कायम की गई, पारंपरिक छत्‍तीसगढ़ी संस्‍कृति से लुप्‍त होती विधा 'सुआ गीत व नाच' का प्रादेशिक आयोजन आज दुर्ग की धरती पर किया गया जिसमें पूरे प्रदेश के कई सुवा नर्तक दलों नें अपना मोहक नृत्‍य प्रस्‍तुत किया। इस आयोजन में एक दर्शक व श्रोता के रूप में देर रात तक उपस्थित रह कर मेरे पारंपरिक मन को अपूर्व आनंद आया। मेरे पाठकों के लिए इस आयोजन के चित्रों के साथ सुआ गीत पर मेरे पूर्वप्रकाशित (प्रिंट मीडिया में, ब्‍लॉग में नहीं) आलेख के मुख्‍य अंशों को यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं -

सुआ गीत : नारी हृदय की धडकन
छत्तीसगढ़ में परम्पराओं की महकती बगिया है जहां लोकगीतों की अजस्र रसधार बहती है। लोकगीतों की इसी पावन गंगा में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की स्प्ष्ट झलक दृष्टिगत होती है। छत्तीतसगढ़ में लोकगीतों की समृद्ध परम्परा कालांतर से लोक मानस के कंठ कंठ में तरंगित रहा है जिसमें भोजली, गौरा, सुआ व जस गीत जैसे त्यौहारों में गाये जाने वाले लोकगीतों के साथ ही करमा, ददरिया, बांस, पंडवानी जैसे सदाबहार लोकगीत छत्तीसगढ़ के कोने कोने से गुंजायमान होती है। इन गीतों में यहां के सामाजिक जीवन व परम्पराओं को भी परखा जा सकता है। ऐसे ही जीवन रस से ओतप्रोत छत्तीसगढ़ी लोकगीत है 'सुआ गीत' जिसे वाचिक परम्परा के रूप में सदियों से पीढी दर पीढी यहां की नारियां गाती रही हैं।
पारम्‍परिक भारतीय संस्कृत-हिन्दी साहित्य में प्रेमी-प्रेमिका के बीच संदेश लाने ले जाने वाले वाहक के रूप में सुक का मुख्य स्थान रहा है। मानवों की बोलियों का हूबहू नकल करने के गुण के कारण एवं सदियों से घर में पाले जाने व खासकर कन्याओं के प्रिय होने के कारण शुक नारियों का भी प्रिय रहा है। मनुष्य की बोली की नकल उतारने में सिद्धस्थ इस पक्षी को साक्षी मानकर उसे अपने दिल की बात ‘तरी नरी नहा ना री नहना, रे सुवा ना, कहि आते पिया ला संदेस’ कहकर वियोगिनी नारी यह संतोष करती रही कि उनका संदेशा उनके पति-प्रेमी तक पहुच रही है। कालांन्तर में सुआ के माध्यम से नारियों की पुकार और संदेश गीतों के रूप में गाये जाने लगे और प्रतीकात्मक रूप में सुआ का रूप मिट्टी से निर्मित हरे रंग के तोते नें ले लिया, भाव कुछ इस कदर फूटते गये कि इसकी लयात्मकता के साथ नृत्य भी जुड गया।
सुआ गीत मूलत: गोंड आदिवासी नारियों का नृत्य गीत है जिसे सिर्फ स्त्रियां ही गाती हैं । यह संपूर्ण छत्तीसगढ़ में दीपावली के पूर्व से गाई जाती है जो देवोत्थान (जेठउनी) एकादशी तक अलग-अलग परम्पराओं के अनुसार चलती है। सुवा गीत गाने की यह अवधि धान के फसल के खलिहानों में आ जाने से लेकर उन्हारी फसलों के परिपक्वता के बीच का ऐसा समय होता है जहां कृषि कार्य से कृषि प्रधान प्रदेश की जनता को किंचित विश्राम मिलता है।
सुआ सामूहिक गीत नृत्य है इसमें छत्तीसगढ़ की नारियां मिट्टी से निर्मित सुआ को एक टोकरी के बीच में रख कर वृत्ताकार रूप में खडी होती हैं। महिलायें सुआ की ओर ताकते हुए झुक-झुक कर चक्राकार चक्कर लगाते, ताली पीटते हुए नृत्य करते हुए गाती हैं। ताली एक बार दायें तथा एक बार बायें झुकते हुए बजाती हैं, उसी क्रम में पैरों को बढाते हुए शरीर में लोच भरती हैं।
गीत का आरम्भ ‘तरी नरी नहा ना री नहना, रे सुवा ना ....’ से एक दो नारियां करती हैं जिसे गीत उठाना कहते हैं । उनके द्वारा पदों को गाने के तुरन्त, बाद पूरी टोली उस पद को दुहराती हैं। तालियों के थप थप एवं गीतों के मधुर संयोजन इतना कर्णप्रिय होता है कि किसी भी वाद्य यंत्र की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती। संयुक्त स्वर लहरियां दूर तक कानों में रूनझुन करती मीठे रस घोलती है।
गीतों में विरह के मूल भाव के साथ ही दाम्पत्य बोध, प्रश्नोत्तनर, कथोपकथन, मान्यताओं को स्वींकारने का सहज भाव पिरोया जाता है जिसमें कि नारियों के बीच परस्पर परंम्‍परा व मान्यताओं की शिक्षा का आदान प्रदान सहज रूप में गीतों के द्वारा पहुचाई जा सके। अपने स्व‍प्न प्रेमी के प्रेम में खोई अविवाहित बालायें, नवव्याही वधुयें, व्यापार के लिए विदेश गए पति का इंतजार करती व्याहता स्त्रियों के साथ जीवन के अनुभव से परिपूर्ण वयस्क महिलायें, सभी वय की नारियां सुवा गीतों को गाने और नाचने को सदैव उत्सुक रहती हैं । इसमें सम्मिलित होने किशोरवय छत्तीसगढी कन्या अपने संगी-सहेलियों को सुवा नृत्य हेतु जाते देखकर अपनी मां से अनुनय करती है कि उसे भी सुवा नाचने जाना है इसलिए वह मां से उसके श्रृंगार की वस्तुएं मांगती है। ‘देतो दाई देतो तोर गोड के पैरी, सुवा नांचे बर जाहूं’ यह गीत प्रदर्शित करता है कि सुवा गीत-नृत्य में नारियां संपूर्ण श्रृंगार के साथ प्रस्तुत होती थीं।
संपूर्ण भारत में अलग अलग रूपों में प्रस्तुंत विभिन्न क्षेत्रों के लोकगीतों में एक जन गीत जिसमें नवविवाहित कन्यां विवाह के बाद अपने बाबुल के घर से अपने सभी नातेदारों के लिवाने आने पर भी नहीं जाने की बात कहती है किन्तु पति के लिवाने आने पर सहर्ष तैयार होती है। इसी गीत का निराला रूप यहां के सुआ गीतों में सुनने को मिलता है। यहां की परम्परा एवं नारी प्रधान गीत होने के कारण छत्तीसगढी सुवा गीतों में सास के लेने आने पर वह नवव्याही कन्या जाने को तैयार होती है क्योंकि सास ससुराल के रास्ते में अक्ल बतलाती है, परिवार समाज में रहने व चलने की रीति सिखाती है -
अरसी फूले सुनुक झुनुक गोंदा फुले छतनार, 
रे सुआना कि गोंदा फुले छतनार 
वोहू गोंदा ला खोंचे नई पायेंव, 
आगे ससुर लेनहार ...... 
ससुरे के संग में नि जाओं ओ दाई, 
कि रद्दा म आंखी बताथे 
ओहू गोंदा ल खोंचे नि पायेंव, 
कि आगे देवर लेनहार 
देवर संग में नी जाओं दाई, 
कि रद्दा म ठठ्ठा मढाथे 
ओहू गोंदा ल खोंचे नि पायेंव, 
कि आगे सैंया लेनहार
सैंया संग में नी जाओं वो दाई, 
कि रद्दा म सोंटा जमाथे
ओहू गोंदा ल खोंचे नि पायेंव, 
कि आगे सास लेनहार 
सासे संग में तो जाहूं ओ दाई, 
कि रद्दा म अक्काल बताथे 
रे सुआ ना कि रद्दा म अक्काल बताथे .........
पुरूष प्रधान समाज में बेटी होने का दुख साथ ही कम वय में विवाह कर पति के घर भेज देने का दुख, बालिका को असह होता है। ससुराल में उसे घर के सारे काम करने पडते हैं, ताने सुनने पडते हैं। बेटी को पराई समझने की परम्परा पर प्रहार करती यहां की बेटियां अपना दुख इन्हीं गीतों में पिराते हुए कहती हैं कि मुझे नारी होने की सजा मिली है जो बाबुल नें मुझे विदेश दे दिया और भाई को दुमंजिला रंगमहल । छत्तीसगढी लोक गीतों में बहुत बार उपयोग में लिया गया और समस समय पर बारंबार संदर्भित बहुप्रचलित एक गीत है जिसमें नारी होने की कलपना दर्शित है -
पइयां परत हौं मैं चंदा सुरूज के, 
रे सुवना तिरिया जनम झनि देय 
तिरिया जनम मोर अति रे कलपना, 
रे सुवना जहंवा पठई तहं जाए 
अंगठी मोरी मोरी, घर लिपवावै, रे सुवना 
फेर ननंद के मन नहीं आए 
बांह पकरि के सैंया घर लाये, 
रे सुवना ससुर ह सटका बताय 
भाई ल देहे रंगमहलवा दुमंजला, 
रे सुवना हमला तो देहे बिदेस
ससुराल में पति व उसके परिवार वालों की सेवा करते हुए दुख झेलती नारी को अपने बाबुल का आसरा सदैव रहता है वह अपने बचपन की सुखमई यादों के सहारे जीवन जीती है व सदैव परिश्रम से किंचित विश्राम पाने अपने मायके जाने के लिए उद्धत रहती है। ऐसे में जब उसे पता चलता है कि उसका भाई उसे लेने आया है तब वह अपने ससुराल वालों से विनती करती है कि ‘उठव उठव ससुर भोजन जेवन बर, मोर बंधु आये लेनहार’ किन्तु उसे घर का सारा काम काज निबटाने के बाद ही मायके जाने की अनुमति मिलती है। कोयल की सुमधुर बोली भी करकस लग रही है क्योंकि नायिका अपने भाई के पास जाना चाहती है। उसने पत्र लिख लिख कर भाई को भेजे हैं कि भाई मुझे लेने आ जाओ। सारी बस्ती सो रही है किन्तु भाई भी अपनी प्यारी बहन के याद में सो नहीं पा रहा है -
करर करर करे कारी कोइलिया 
रे सुवना कि मिरगा बोले आधी रात 
मिरगा के बोली मोला बड सुख लागै 
रे सुवना कि सुख सोवे बसती के लोग 
एक नई सोवे मोर गांव के गरडिया 
रे सुवना कि जेखर बहिनी गए परदेश 
चिठी लिख लिख बहिनी भेजत हे 
रे सुवना कि मोरे बंधु आये लेनहार
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीतों में पुरूष को व्यापार करने हेतु दूर देश जाने का उल्लेख बार बार आता है। अकेली विरहाग्नि में जलती नारी अपने यौवन धर्म की रक्षा बहु विधि कर रही है किन्तु मादक यौवन सारे बंद तोडने को आतुर है ‘डहत भुजावत, जीव ला जुडावत, रे सुवना कि चोलिया के बंद कसाय’। ऐसे में पति के बिना नारी का आंगन सूना है, महीनों बीत गए पर पति आ नहीं रहा है। वह निरमोही बन गया है उसे किसी बैरी नें रोक रखा है, अपने मोह पाश में जकड रखा है । इधर नारी बीड़ी की भांति जल जल कर राख हो रही है । पिया के वापसी के इंतजार में निहारती पलके थक गई हैं। आसरा अब टूट चुका है, विछोह की यह तड़फ जान देने तक बढ गई है ‘एक अठोरिया में कहूं नई अइहव, रे सुवना कि सार कटारी मर जांव’ कहती हुई वह अब दुख की सीमा निर्धारित कर रही है।
दिल्ली छै में सुवासित छत्तीसगढ़ी लोक गीत के भाव सुवा गीतों में भी देखने को मिलता है जिसमें विवाह के बाद पहली गौने से आकर ससुराल में बैठी बहु अपने पिया से सुवा के माध्यम से संदेशा भेजती है कि आप तो मुझे अकेली छोडकर व्यापार करने दूर देश चले गये हो। मैं किसके साथ खेलूंगी-खाउंगी, सखियां कहती हैं कि घर के आंगन में तुलसी का बिरवा लगा लो वही तुम्हारी रक्षा करेगा और वही तुम्हारा सहारा होगा –
पहिली गवन के मोर देहरी बैठारे, 
वो सुवना छाडि पिया गये बनिज बैपार 
काखर संग खेलिहौं काखर संग खइहौं, 
कि सुवना सुरता आवत है तुहांर 
अंगना लगा ले तैं तुलसी के बिरवा, 
रे सुवना राखही पत ला तुम्हार
देवर भाभी के बीच की चुहल व देवर को नंदलाल की उपमा देकर अद्भुत प्रेम रस बरसाने वाली छत्तीसगढ़ की नारियां देवर की उत्सुकता का सहज उत्तर देते हुए छोटे देवर को अपने बिस्तर में नहीं सोने देने के कारणों का मजाकिया बखान करते हुए कहती है कि मेरे पलंग में काली नाग है, छुरी कटारी है । तुम अपने भईया के पलंग में सोओं। देवर के इस प्रश्न पर कि तुम्हारे पलंग में काली नाग है तो भईया कैसे बच जाते हैं तो भाभी कहती है कि तुम्हारे भईया नाग नाथने वाले हैं इसलिए उनके प्राण बचते हैं –
तरी हरी नाना न नाना सुआ ना, 
तरी हरि नाह ना रे ना 
अंगरी ला मोरी मोरी देवता जगायेंव 
रे तरि हरि नाह ना रे ना 
दुर रे कुकुरवा, दुर रे बिलईया, 
कोन पापी हेरथे कपाट 
नों हंव कुकुरवा में नों हंव बिलईया, 
तोर छोटका देवर नंदलाल 
आये बर अइहौ बाबू मोर घर मा, 
फेर सुति जइहौ भईया के साथ 
भईया के पलंग भउजी भुसडी चाबत हैं, 
तोरे पलंग सुख के नींद 
मोरे पलंग बाबू छूरी कटारी, 
सुन ले देवर नंदलाल 
हमरे पलंग बाबू कारी नागिन रे, 
फेर डसि डसि जिवरा लेवाय 
तुंहरे पलंग भउजी कारी रे नांगिन, 
फेर भईया ल कईसे बंचाय 
तुंहरे भईया बाबू बड नंगमतिया, 
फेर अपने जियरा ला लेथे बंचाय ....
छत्तीसगढ़ में दो-तीन ऐसे सुआ गीत पारंपरिक रूप से प्रचलित हैं जिनमें इस काली नाग के संबंध में विवरण आता है। यह वही काली नाग है जो व्यापार के लिए दूर देश गए पिया के बिना अकेली नारी की रक्षा करती है। यह काली नागिन उसका विश्वास है, उसके अंतरमन की शक्ति है -
छोटका देवर मोर बडा नटकुटिया, 
रे सुवना छेंकत है मोर दुवार 
सोवा परे म फरिका ला पेलै, 
रे सुवना बांचिहै कइसे धरम हमार 
कारी नागिन मोर मितानिन, 
रे सुवना रात रहे संग आय
कातिक लगे तोर अइहैं सजनवा, 
रे सुवना जलहि जोत बिसाल
स्त्री सुलभ भाउकता से ओतप्रोत ऐसे ही कई सुवा गीत छत्तीसगढ़ में प्रचलित है, जिनको संकलित करने का प्रयास हेमनाथ यदु व कुछेक अन्य लोककला के पुरोधा पुरूषों नें किया है। इन गीतों का वास्तविक आनंद इनकी मौलिकता व स्वाभाविकता में है जो छत्तीगढ़ के गांवों में देखने को मिलता है।
रंग बिरंगी – रिंगी चीगी वस्त्रों से सजी धजी नारियां जब सुवा गीतों में विरह व दुख गाते हुए अपने दुखों को बिसरा कर नाचती हैं तो संपूर्ण वातावरण सुरमई हो जाता है। गीतों की स्वाभाविक सहजता व सुर मन को मोह लेता है और मन कल्पना लोक में इन मनभावन ललनाओं के प्रिय सुवा बनकर घंटों इनका नृत्य देखने को जी करता है। इस भाग-दौड व व्यस्त‍ जिन्दगी में अपने परिवेश से जोडती इन जड़ों में जड़वत होकर कल कल बहती लोकरंजन गीतों की नदियों का जल अपने रगो में भरने को जी चाहता है। क्योंकि समय के साथ साथ सरकती सभ्यता और संस्कृति में आदिम जीवन की झलक ऐसे ही लोकगीतों में दिखाई देती है ।

संजीव तिवारी

छत्‍त‍ीसगढी भाषा में शौर्य गान का नाम है जस गीत

शहरों में नवरात्रि की धूम चारों ओर है, मंदिरों और माता के दरबार में आरती के बाद जस गीत व सेवागीत गाए जा रहे हैं। शीतला मंदिर, चंडी मंदिर, महामाया, दंतेश्वरी, दुर्गा मंदिर, सहित ग्रामीण क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों में दिन रात माता सेवा में भक्त लीन हैं। पुरुषों एवं महिलाओं सहित बच्चों की सेवा मंडली दूर-दूर से आकर अपनी प्रस्तुति दे रही है। हर गली-मोहल्ले में जसगीत व सेवागीत गाये जा रहे हैं, लाउड स्पीकरों में भी यही गीत बज रहे हैं। वहीं गांवों में शीतला मंदिर, महामाय व कुछ घरों में ज्योति जंवारा स्थापित कर माता सेवा का अनुष्ठान किया जा रहा है। गांव की सेवा मंडली रोजाना शाम को इन स्थानों में पहुंचकर सेवागीत प्रस्तुत कर रही हैं। मैं भी इन सेवा एवं जस गीत मंडली का बरसों बरस सदस्‍य रहा हूं और रात-रात भर जस गीत गाते रहा हूँ .
पिछले दिनों छत्‍तीसगढ के नवरात्री मे गाये जाने वाले माता का एक जसगीत ललित शर्मा जी नें प्रस्‍तुत किया उसके बाद उन्‍होंनें जस गीत के आडियो भी प्रस्‍तुत किए. आजकल सीडी दुकानों में सहजता से जस गीत उपलब्‍ध हैं किन्‍तु इन बाजारू सीडीयो में हमारा पारंपरिक जसगीत कहीं खो गया है. मैनें ललित भाई को इस प्रयास के लिए यद्यपि बधाई दिया कि हमारी भाषा एवं संस्‍कृति का कुछ अंश उन्‍होंनें लोगों के बीच लाने का प्रयास किया किन्‍तु आजकल जो गीत सीडी में बाजार में प्रस्‍तुत हो रहे हैं उन्‍हें मैं जस गीत के नाम पर प्रपंच मानता हूं, ऐसे गीत पारंपरिक जस गीत है ही नहीं बल्कि पारंपरिक गीत व धुन एवं लय के विपरीत हैं. पारंपरिक गीत के सीडी मार्केट में उपलब्‍ध हैं कि नहीं हैं मै नहीं जानता, मैं तो मांदर और झांझ-मजीरे के संगीत के साथ गाये जाने वाले छत्‍त‍ीसगढी भाषा के शौर्य गान को जस गीत मानता हूँ जिसके पारंपरिक लय व ताल के नियम हैं. गांवों में रात-रात भर गाये जाने वाले जस गीत टीम में इन नियमों को तोडने पर एक नरियर का डांड भी देना पडता है यानी सजा की व्‍यवस्‍था है. पर शहरी माहौल में यह सब खो गया है.
मैं ललित शर्मा जी से क्षमा चाहता हँ, उनका उत्साह इसी प्रकार बना रहे. और पाठकों को अपनी वास्‍तविक परंपराओं से अवगत कराना चाहता हँ. आज भी यदि आप खोजें तो पारंपरिक गायन वाले मिल जायेंगें, जस गीत के संकलन पर इस प्रदेश में बहुज काम हुआ है, जसगीत के कई संकलन प्रकाशित हुए हैं किन्‍तु सीडी बेंचने वाले लोग इन पारंपरिक गानों के स्‍थान पर नये गीत प्रस्‍तुत किए हैं. इन नये गीतों का भी हम स्‍वागत करते हैं किन्‍तु हमें अपनी परंपराओं पर गर्व है. हमने छत्‍तीसगढ के जस गीत पर एक पोस्‍ट लिखा है जो स्‍थानीय विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुआ है जिसका अवलोकन करने से छत्‍तीसगढ़ के जस गीत को जाना पहचाना जा सकता है. जस गीत संबंधी लेख की कडी है -

http://aarambha.blogspot.com/2007/10/chhattisgarhi-folk-jasgeet.html

बोलो हिंगलाज मईया की जय !

संजीव तिवारी

ललित भाई नें आज जसगीत अपने ब्‍लाग 'शिल्‍पकार के मुख से' में लगयाया है. 

पंडवानी की पुरखिन दाई श्रीमती लक्ष्मी बाई


छत्तीसगढ़ की मंचीय कला के विविध रूपों से आज हम सब खूब परिचित है। भरथरी की विख्यात गायिका सुरूजबाई खांडे, पंथी के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकार देवदास बंजारे तथा पंडवानी के चमकते सितारों में पद्मभूषण तीजनबाई, श्रीमती ऋतु वर्मा ने खूब यश प्राप्त किया है। इनसे छत्तीसगढ़ की कीर्ति बढ़ी है। पंडवानी विधा के कलाकार दुर्ग जिले में विशेष रूप से पनपे। पंथी के शीर्ष कलाकार देवदास बंजारे भी इसी जिले के धनोरा ग्राम के निवासी है। लेकिन पंडवानी के प्रथम यशस्वी पुरूष कलाकार स्व. झाडूराम देवांगन और प्रथम चर्चित पंडवानी गायिका श्रीमती लक्ष्मीबाई ने इस जिले का गौरव पहले पहल बढ़ाया।

झाडूराम देवांगन की प्रस्तुति देखकर पूनाराम निषाद आगे बढ़े। ठीक उसी तरह 60 वर्षीय लक्ष्मीबाई का प्रभाव महिला कलाकारों पर रहा। जब लक्ष्मीबाई कीर्ति के शिखर पर थीं तब तीजनबाई मात्र आठ नौ वर्ष की रही होगी। अपने कई साक्षात्कार में पद्मभूषण तीजनबाई ने इस तथ्य को स्वीकारा है कि लक्ष्मीबाई से उन्हे भी प्रेरणा मिली। लेकिन लक्ष्मीबाई मंच की पहली पंडवानी गायिका नहीं है। उनसे पहले सुखियाबाई पंडवानी गाती थी। रायपुर के पास स्थित 'मुनगी’ गांव की सुखियाबाई मर्दों के वेश में मंच पर आती थी। तब पंडवानी के विख्यात कलाकार रावनझीपन वाले मामा-भांजे ही चर्चा में आये थे। सुखियाबाई को लगा होगा कि यह महाभारत की लड़ाई का किस्सा है इसलिए यह मर्दाना विधा है। इसीलिए वे मर्दों के वेश में मंच पर आती थीं। श्रीमती लक्ष्मीबाई पहली ऐसी साधिका हैं जिहोंने स्त्री के रूप में ही महासंग्राम की कथा का गायन मंच पर किया।

श्रीमती लक्ष्मी का बंजारे के गुरू उनके कलावंत पिता दयाराम बंजारे ही थे। एक अप्रैल 1944 को ग्राम कातुलबोड़ में जन्मी लक्ष्मीबाई का जन्म लक्ष्मी पूजा के दिन हुआ इसलिए उनका नाम लक्ष्मी रखा गया। जीवन भर लक्ष्मी के अभाव में साधनों के लिए संघर्ष करती हुई लक्ष्मीबाई आज अब 60 पार कर चुकी हैं। उन्हे दस वर्ष पहले गले का कैंसर भी हो गया था। लेकिन जीवट की गायिका लक्ष्मीबाई अब कैंसर को पछाड़कर पुन: पूर्ण स्वस्थ हो मंचों पर आ गई है। दयाराम बंजारे के 11 बेटे और दो बेटियों में मात्र लक्ष्मीबाई ही बच पाई। शेष सब सत्यलोकगामी हो गये। मां फुलकुंवर ने इकलौती बेटी को खूब दुलार दिया। लक्ष्मीबाई ही इस दंपत्ति के लिए बेटी थी और वही बेटा भी। इसीलिए लक्ष्मीबाई के पति 'राजीव नयन’ घरजियां अर्थात घरज भाई हैं। 'राजीव नयन’ दाढ़ीधारी पत्नीभक्त, कलावंत पति है। लक्ष्मीबाई के दल में वे शामिल रहते हैं। उन्हे अपनी प्रतिभा संपन्न पत्नी की सेवा करने में गर्व का अनुभव होता है। मैंने उनकी भक्ति पर टिप्पणी करते हुए जब कहा...

'मंगनी के बइला, घरजियां दमान्द,
मरे ते बांचय, जोते से काम।’

तो वे दाढ़ी लहराकर खूब हंसे। बच्चो की तरह नि:श्छल राजीवनयन जी झुमका, मजीरा बजाते हैं। कलाकारों के दलों में दाढ़ीधारी सदस्य प्राय: होते हैं। ऋतु वर्मा के पिता की दाढ़ी है तो लक्ष्मीबाई के पति की। पद्मभूषण तीजनबाई के पूर्व हरमुनिया मास्टर तुलसीराम की भी युवकोचित दाढ़ी थी। राजीवनयन 'दढिय़ारा’ भी जब मंच पर लक्ष्मीबाई के साथ बैठते हैं तो शोभा देखते ही बनती है।

लक्ष्मीबाई ने लगभग पंद्रह वर्ष की उम्र में गायन प्रारंभ किया। मशाल नाच के प्रख्यात कलाकार अपने पिता दयाराम बंजारे से उन्होने गायन सीखा। विगत 45 वर्षों से वे गायन कर रही है। खड़े साज में चिकारा बजाने वाले पिता दयाराम से उन्होने भरथरी गायन, गोपीचंदा कथा गायन तथा पंडवानी गायन की कला को प्राप्त किया। खड़े होकर पंडवानी गायन करने की कला कापालिक शैली कहलाती है। भिन्न- भिन्न मुद्रा में कलाकार मंच पर नाच गाकर गायन करते हैं। लेकिन बैठकर गायन की शैली की साधिका है। लक्ष्मीबाई के बाद श्रीमती रितु वर्मा ने ही वेदमती शैली का अनुगमन किया है। शैली कोई भी हो, कला की सिद्धि किसी कलाकार को यश देती है, यह इन भिन्न-भिन्न शैलियों की साधिकाओं की कीर्ति से सिद्ध हुआ है। टोने-टोटके, लटके-झटके और पहुंच पहचान की अपनी सीमायें हैं। प्रतिभा की शक्ति सारी सीमाओं का लंखन कर कलाकार अपने दम पर ही आगे बढ़ता है। लक्ष्मीबाई को भी अपनी साधना के दम पर मंजिल मिली। वे आकाशवाणी की प्रथम पंडवानी गायिका है। 1972 से वे आकाशवाणी पर पंडवानी प्रस्तुत कर रही है। श्रीमती लक्ष्मीबाई ने मोतीबाग, महाराष्ट्र मंडल, आदिवासी लोक कला परिषद के द्वारा प्रदत्त मंच तथा उदयाचल के आयोजनों में शामिल होकर पंडवानी गायन से श्रोताओं को मंत्रमुद्ध किया है।

चौथी कक्षा उत्तीर्ण लक्ष्मीबाई महाभारत ग्रंथ का पारायण किया और कथा के मूल सूत्रो को पकड़ा। वे 18 दिन तक पंडवानी गाती है। तभी पर्वों का उन्हे भरपूर ज्ञान है। वे महिला कलाकारों में वरिष्ठतम ही नहीं है, प्रथम साक्षर महिला कलाकार भी है। रामायण गायन की कला में भी वे सिद्ध है। प्रसिद्ध गायक झाडूराम का गांव बासिंग श्रीमती लक्ष्मीबाई का ननिहाल है। झाडूराम जी को वे मामा मानती थी। इसलिए जब तक बासिंग जाकर मामा झाडूराम से भी पंडवानी पर खूब चर्चा करने की सुविधा उन्हे मिली। गिरौदपुरी धाम में इस प्रख्यात कलाकार को स्वर्ण-पदक से सम्मानित किया गया। श्रीमती लक्ष्मीबाई अपनी इन दिनों हो रही उपेक्षा पर हंस कर टिप्पणी करती है। 'रंगरूप म राजा मोहे, चटक-मटक दारी, भाव भजन म साधू मोहे, पंडित करौ बिचारी।’ उन्हे अपनी उपेक्षा स्वाभाविक लगती है। वे कहती है कि सबका अपना युग होता है। काम रह जाता है। काम की कीमत सदा होती है। प्रचार से कुछ हलचल तो मचाई जा सकती है लेकिन सच्चा सम्मान नहीं प्राप्त किया जा सकता...

'सोना तो बाजय नहीं, कांच पीतल झन्नाय,
साधू तो बोलय नहीं, मूरख रहे चिल्लाय।’
'धरे हंव ध्यान तुम्हारा मैं रघुबर’

यह गीत तन्मय होकर गाती है लक्ष्मीबाई तो न केवल वे रो पड़ती है बल्कि श्रोता भी विलाप कर उठते हैं। हबीब तनवीर के दल के साथ लक्ष्मीबाई को भी विदेश जाना था। लेकिन उन्ही दिनों इन्हे कैंसर ने घेर लिया। जबलपुर रायपुर आदि में लगातार इलाज करवा कर अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के बल पर वे पुन: स्वस्थ हो सकी है। चार वर्ष पहले छत्तीसगढ़ लोक कला महोत्सव के विराट मंच पर गुरू परंपरा के लोक कलाकारों का सम्मान हुआ। पंडवानी विधा में गुरू के रूप में पूजित श्रीमती लक्ष्मीबाई का सम्मान हुआ। वे अपने अवदान और बदले में मिले सम्मान से पूर्ण संतुष्ट है। उन्हे कलाकार पंडवानी कला की पुरखिन दाई कहकर जब प्रणाम करते हैं तो लक्ष्मीबाई को लगता है जैसे भारत रत्न मिल गया हो। छत्तीसगढ़ की पहचान कलाकारों के कारण कुछ अलग ढंग की बनी है। श्रीमती लक्ष्मीबाई परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कलाकारों को जी भर आशीष देकर कहती है...

'आया है सो जायेगा, राजा रंक फकीर,
एक सिंहासन चढि़ चले, एक बंधे जंजीर।’

डॉ. परदेशीराम वर्मा
एल.आई.जी.18 हुडको, भिलाई (छ.ग.) मोबा. नं. 9827993494

प्रख्यात पंडवानी गायिका रितु वर्मा छुटपन में कीर्तिमान

10 जून 1979 को भिलाई की श्रमिक रूआबांधा में जन्मी कु. रितु वर्मा ने अगस्त 1989 में विदेशी मंच पर अपना पहला कार्यक्रम दिया। मात्र दस वर्ष की उम्र में जापान में अपना कार्यक्रम देकर रितु ने वह गौरव हासिल किया जो बिरले कलाकारों को मिलता है। रितु छतीसगढ़ की पहली ऐसी प्रतिभा संपन्न कलाकार है जिसने इतनी छोटी उम्र में ऐसा विलक्षण प्रदर्शन दिया। घुटनों के बल बैठकर और एक हाथ में तंमूरा लेकर रितु ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कार्यक्रम दिया। कार्यक्रम में आये जापानी दर्शक गोरी चिट्टी छुई हुई सी लगने वाली इस पंडवानी विधा की गुडिय़ा के प्रदर्शन पर देर तक तालियां बजाते रहे। संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली द्वारा महोत्सव के लिए जापान प्रवास का यह सुअवसर रितु को लगा। तब से वह लगातार विदेश जा रही है। 1991 में आदिवासी लोक कला परिषद भोपाल ने उसे जर्मनी एवं इंग्लैंड भेजा। तब तक रितु की कला और निखर चुकी थी। वहां उसे खूब वाहवाही मिली।
1995 में जुलाई माह में रितु को पुन: परिषद की पहल पर इंग़्लैंड जाने का अवसर लगा। अक्टुबर 1996 में वह बंगलौर एशिया सोसायटी की ओर से 50वीं स्वर्ण जयंती समारोह में अमरीका गई। जुलाई 2003 में वह पुन: एक माह के लिए इंग़्लैंड गई। पंडवानी विधा में दो शैलियां प्रचलित है। एक मंच पर बैठकर गाने की शैली। इसे वेदमती शैली कहते हैं। इस शैली में ही पंडवानी के पुरोधा दुलारसिंह साव मदराजी सम्मान प्राप्त स्व. झाडूराम देवांगन से लेकर तमाम पुरूष कलाकार गायन करते हैं। पुनाराम निषाद, चेतन देवांगन आदि इसी विधा के कलाकार है। महिलाओं में पंडवानी की सबसे वरिष्ठ कलाकार श्रीमती लक्ष्मीबाई - कातुलबोर्ड वाली इस विधा की साधिका रहीं। लक्ष्मीबाई ने ही पहले पहल पुरुष पोषित पंडवानी विधा में धमाकेदार प्रदर्शन किया। वे आज सत्तर की उम्र में भी प्रदर्शन देती है। कैंसर से लडक़र जीत जाने वाली इस जीवट कलाकार के बाद रितु ने ही वेदमती शैली में गायन का अभ्यास किया। शेष चर्चित पंडवानी गायिकाओं में विश्वविख्यात पद्मभूषण डॉ. तीजनबाई सहित श्रीमती शांतिबाई चेलक, श्रीमती मीना साहू, श्रीमती प्रतिमा, श्रीमती उषा बारले, श्रीमती सोमेशात्री, श्रीमती टोमिनबाई निषाद सबने कापालिक शैली को साधा। कापालिक शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय सहित मंच पर कला का जौहर दिखाता है। यह शैली महिलाओं के लिए अनुकूल और प्रभावशाली सिद्ध हुई। रितु ने छुटपन से एक पांव के घुटने पर बल देकर पंडवानी कहने की कला को साधा। आज रितु श्रीमती रितु नोमुलवार हो गई है। उसका एक बेटा भी है। समय- समय पर उससे भी खड़े होकर कापालिक शैली में गायन करने का आग्रह किया गया लेकिन रितु ने अपना ढंग नहीं बदला। अपनी शर्तों पर जीने वाली रितु ने इस शैली की साधना से विश्व में नाम किया। वह उत्तरोत्तर यश के शिखरों का स्पर्श कर रही है। अंधेरी बस्ती में स्वर का उजास पाटन क्षेत्र के गांव सोरम से एक श्रमिक परिवार आज से तीस वर्ष पहले भिलाई आया। उसे रूआबांधा में आसरा मिला। सोरम गांव के श्री लखनलाल वर्मा अच्छे बढ़ई थे। यहां अपनी दक्षता का लोहा मनवाने में लखनलाल को अधिक समय नहीं लगा। उनका काम चल निकला। यहीं 10 जून 1979 को रितु का जन्म हुआ। रितु जब पांच वर्ष की थी तब उसे खेलने के लिए एक तंबूरानुमा खिलौना पिता ने दे दिया। इस बीच कुछ पंडवानी के कार्यक्रमों में भी देखने-सुनने के लिए रितु पिता की गोद में बैठकर आती जाती रही। वहां से लौटकर वह कुछ गुनगुनाने का प्रयत्न करती। कभी खिलौने को टूनटुनाती। उसके इस प्रयास को रूआबांधा के गुलाबदास मानिकुरी ने देखा। उन्हे पंडवानी गायन की थोड़ी सिद्धि थी। वे भी श्रमिक थे। पिता लखनलाल ने भी प्रोत्साहित किया। कुछ दिनों के बाद एक छोटा ढंग का तंबूरा भी लखनलाल ने बना दिया और रितु का अभ्यास शुरू हो गया। शाम को अपने घर के आगे बोरे में बैठकर रितु पंडवानी गाती। काम से थके रूआबांधा बस्ती के बूढ़े जवान वहां आ जुटते। लालटेन और चिमनी की रोशनी में रितु का गायन होता।
'जैता म पण्डो मन जनम लीन भैया’ प्राय: पंडवानी गायन की शुरुवात में यही वाक्य कलाकार उमचाता है। जयता पाण्डवों की नगरी और हसना कौरवों का नगर। पारंपरिक पंडवानी में कौरव पाण्डवों को पशुपालक के रूप में र्वणित किया जाता था। बजनी वन, उसमें चरती आठ लाख गायें, बकरियां, हाथी, सब साथ में विचरते। इस तरह की ग्रामीण कथायें प्राय: भिन्न-भिन्न जातीय संस्कारों से जुड़े कलाकार गाते हैं। लेकिन मानक के तौर पर सबलसिंह चौहान लिखित कथा को साधा। उन्होने तुलसी के दोहों, संस्कृत के श्लोकों और कबीर के वचनों का भी प्रभावी प्रयोग किया। वे पहले गायक थे जिन्होने लिखित कथा को हृदयंगम कर उसे छत्तीसगढ़ी रूप दिया।
रितु के मन पर झाडूराम देवांगन का गहरा प्रभाव पड़ा। पिता लखनलाल भी पोथी उठा लाये। वे कथा रटाते और गुलाबदास कथा को सुर में ढालने का गुर सिखाते। इस तरह रितु ने पहला पाठ अपने इन दो गुरुओं से सीखा। रितु पारंपरिक शैली की साधिका है। वही अकेली महिला गायिका है जो पंडवानी की वेदमती शैली में शुरू की उठानवाली पंक्तियों को यथावत गाती हैं...
'रामे रामे रामे रामे गा रामे भइया जी,
रामे रामे रामे रामे ग रामे भाई,
राजा जनमेजय पूछन लागे भैया,
बइसमपायेन कहन लागे भाई।‘
रितु इस तरह कथा की शुरुवात करती है। अन्य महिला, कलाकार कका ममा जैसे संबोधनों के सहारे आगे बढ़ती है लेकिन रितु की ठेही 'भइया’ है। छोटी सी रितु ने जब थोड़ा सा अभ्यास कर लिया तब रूआबांधा के बबला यादव के घर के सामने उसका पहला कार्यक्रम हुआ। पहले कार्यक्रम में ही रितु की प्रतिभा का लोहा बस्ती वालों ने स्वीकार कर लिया। फिर उसे प्रोत्साहन के लिए कुछ कार्यक्रम और मिले। धीरे-धीरे गांवों में उसकी धूम मचने लगी। लखनलाल जी ने कुछ साजिंदों को जोडक़र एक दल बना लिया। 'रितु वर्मा पंडवानी दल’ चल निकला। रूआबांधा बस्ती का नाम भी चमक उठा। फिर पहला बड़ा ब्रेक रितु को भिलाई इस्पात संयंत्र के लोकरंगी आयोजन में मिला। प्रदर्शन देखकर बीस हजार दर्शक ठगे से रह गये। एक आठ बरस की दुबली पतली लडक़ी ने जिस आत्मविश्वास के साथ पंडवानी कथा का गायन किया उसे देखकर आयोजक भी दंग रह गए। यहां से रितु के प्रभामंडल का विस्तार होने लगा। और दस बरस की रितु उड़ चली, गुडिय़ों के देश जापान की ओर। कैसा अजब संयोग था कि हिरोशिमा और नागासाकी का प्रलंयकारी विभीषिका से थर्राये हुए जापान में भारत की इस नन्ही सी कलाकार बेटी को महासंग्राम की कथा की प्रस्तुति के लिए बुलाया गया। बहुत प्रयत्न करने पर भी कृष्ण जैसे जगतगुरू से लड़ाई टाली न जा सकी और अंधे धृतराष्ट्र तथा आंखों पर पट्टी बांधकर जीने को प्रतिबद्ध माता गांधारी के सभी बेटे उसके सामने युद्धक्षेत्र में खेत रहे।
जापान में एक भीषण लड़ाई और उसके दुष्परिणाम की कथा रितु कह आई। उसे जापान में बेहद .यार मिला। तब उसके पिता उसे सहारा देकर हवाई जहाज की सीट पर बिठाते थे, आज पिता जीवन की संध्‍या में थके थके से दिखते हैं। रितु उन्हे सहारा देकर उल्लास से भरा जीवन जीने की प्रेरणा दे रही है। स्वयंवर का आदर्श रितु ने रूआबांधा बस्ती के हमजोली युवक मंगेश नोमुलवार से प्रेम विवाह किया। 20 दिसंबर 2000 को हुई यह शादी। छत्तीसगढ़ राज्य बनते ही रितु ने शादी कर ली। छत्तीसगढ़ी कलाकारों मे रितु ने यह भी यादगार कीर्तिमान रच दिया। यह बेहद धमाकेदार शादी थी। पिता लखनलाल आपे से बाहर हो गये। वे श्री बदरूद्दीन कुरैशी राज्य मंत्री से गुहार भी कर आये। मेरा भी उस परिवार से घरोबा है। मैं स्वयं चलकर लखनलाल जी के पास गया। वे व्यथित थे और लगभग टूट से गये थे। लंबी दाढ़ी और झूलते लंबे लटों से लखनलाल सहसा विराग साधक बाबा की तरह लगते हैं। वे गेरुवा वस्त्र ही धारण करते हैं और गले में लगभग दस तरह की छोटी बड़ी मालायें लटकाते हैं। उन्हे गुस्से में देखकर मुझे माखनलाल चतुर्वेदी की पंक्ति याद हो आई... 'अगम नगाधिराज मत रोको, बिटिया अब ससुराल चली।‘ प्रगट में मैंने कहा कि लखनलाल जी रितु पंडवानी की साधिका है। विश्व में कई देशों में धूम आई है। अपने मन के वर का वरण करना उसका अधिकार है। सुभद्रा, रूकमणी की प्रणय कथाओं के सुखद अंत की कथा कहती हुई वह जवान हुई है। आप आशीष भर दीजिये। कुछ दिनों में सब यथावत हो जायेगा। और वाकई तात्कालिक धमाके शीघ्र ही शांत भी हो गये। लखनलाल जी पुन: बिटिया के दल के साथ आ जा रहे हैं। मंगेश उनका होनहार दामाद है और रितु यश देनेवाली प्रिय बिटिया। अक्षर की रोशनी आज भी पंडवानी के सिवाय रितु का दूसरा कोई शगल नहीं है। उसे अपनी जन्म तारीख भी याद नहीं रहता।
मंगेश ही सब कुछ सम्हालते हैं। कार्यक्रम की तिथियों से लेकर सिंगार की सभी सामग्री, सुंडरा, ककनी, पुतरी से लेकर टिकली फुंदरी तक की सार सम्हाल करते हैं मंगेश। रितु अब पांचवीं की परीक्षा दे चुकी है। वह अब केवल हस्ताक्षर ही नहीं करती, बाकायदा अखबार बांच लेती है। रितु ने साक्षरता अभियान के तहत अक्षर ज्ञान प्राप्त किया। भिलाई नगर परियोजना की कक्षायें रूआबांधा में भी चलीं। रूआबांधा के अक्षर सैनिकों ने उसे पढऩा लिखना सिखाया।

डॉ.परदेशीराम वर्मा
संपर्क: एल.आई.जी. 18, आमदीनगर,
हुडको, भिलाई नगर 490009 छत्तीसगढ़

" बने करे राम मोला अन्धरा बनाये " यह गीत छत्तीसगढ से ट्रेन से गुजरते हुए आपने भी सुना होगा

कल के मेरे पोस्ट पर शरद कोकाश भैया की टिप्पणी प्राप्त हुई कि रामेश्वर जी से सम्पर्क करो और उनकी कविता " बने करे राम मोला अन्धरा बनाय " की रचना की प्रष्ठ्भूमि सहित प्रस्तुत करो .. उनसे पूछना ज़ोरदार किस्सा सुनयेंगे । तो हम रामेश्वर वैष्णव जी की वही कविता आडियो सहित यहॉं प्रस्तुत कर रहे है -
भूमिका इस प्रकार है कि एक बार रामेश्वर वैष्णव जी रेल में रायपुर से बिलासपुर की ओर यात्रा कर रहे थे तो रेल में एक अंधा भिखारी उन्हे गीत गाते भीख मांगते हुए मिला. वह अंधा भिखारी रामेश्वर वैष्णव जी द्वारा लिखित 'कोन जनी काय पाप करे रेहेन' गीत गा रहा था; रामेश्वर वैष्णव जी को आश्चर्य हुआ और उन्होनें उस अंधे भिखारी को अपने पास बुलाकर बतलाया कि जिस गीत को तुम गा रहे हो उसे मैनें लिखा है यह मेरा साहित्तिक गीत है इसे गाकर तुम भीख मत मांगो भईया. पहले तो अंधे भिखारी को खुशी हुई कि तुम ही रामेश्वर वैष्णव हो. फिर भिखारी नें कहा कि इस गीत को गाते हुए बहुत दिन हो गए है और वैसे भी अब इस गीत से ज्यादा पैसे नहीं मिलते इसलिए आप मेरे लिए कोई दूसरा गीत लिख दीजिये.
अंधे भिखारी नें गीत में चार आवश्यक तत्वो को समावेश करने का भी अनुरोध किया. पहला - गीत में हास्य व्यंग्य होना चाहिए यानि हमारे देश का भिखारी भी हास्य व्यंग्य समझता है. दूसरा - देश दुनिया में जो हो रहा है उसे लिखें. तीसरा - गाना ऐसा लिखें कि सुनने वाला फटाक से पैसा निकाल कर मुझे धरा दें यानी करूणा होनी चाहिए. चौंथा - मेरा नाम बाबूलाल है उसे जोडियेगा. रामेश्वर वैष्णव जी छत्तीसगढी गीतों के लिए जाने माने नाम हैं ऐसे में उन्होनें उस भिखारी के अनुरोध को स्वीकार किया और गीत मुखरित हुई जिसे आप लोग भी सुने. हो सकता है कि छत्तीसगढ से ट्रेन से गुजरते हुए रायपुर से बिलासपुर की यात्रा के दौरान आपने भी इस अन्धे भिखारी को देखा होगा और यह गीत सुना होगा. यह गीत सरल छत्तीसगढी भाषा में है इसकी अनुवाद करने की आवश्यकता नहीं है, इसे आप सुने गीत आपको समझ में भी आयेगी और व्यवस्था पर चोट करती रामेश्वर वैष्णव जी की बानगी आपको गुदगुदायेगी.


संजीव तिवारी

रामेश्वर वैष्णव की अनुवादित हास्य कविता मूल आडियो सहित

रामेश्वर वैष्णव जी  छत्तीसगढ के जानेमाने गीत कवि है, इन्होने हिन्दी एव छत्तीसगढी मे कई लोकप्रिय गीत लिखे है. कवि सम्मेलनों मे मधुर स्वर मे वैष्णव जी के गीतो को सुनने में अपूर्व आनन्द आता है. वैष्णव जी का जन्म 1 फरवरी 1946 को खरसिया मे हुआ था. इन्होने अंग्रेजी मे एम.ए. किया है और डाक तार विभाग से सेवानिवृत है. इनकी प्रकाशित कृतियो मे पत्थर की बस्तिया, अस्पताल बीमार है, जंगल मे मंत्री, गिरगिट के रिश्तेदार, शहर का शेर, बाल्टी भर आंसू, खुशी की नदी, नोनी बेन्दरी, छत्तीसगढी महतारी महिमा, छत्तीसगढी गीत आदि है. 
मयारु भौजी, झन भूलो मा बाप ला, सच होवत सपना, गजब दिन भइ गे सहित कई छत्तीसगढी फिल्मो का इन्होने लेखन किया है. वैष्णव जी छत्तीसगढ के कई सांसकृतिक संस्थाओ से भी सम्बध है. इनकी छत्तीसगढी हास्य कविताओं के लगभग 20 कैसेट्स रिलीज हो चुके है . आज भी रामेश्वर वैष्णव जी निरंतर लेखन कर रहे है.  इन्हे मध्यप्रदेश लोकनाट्य पुरस्कार, मुस्तफ़ा हुसैन अवार्ड 2001, श्रेष्ठ गीतकार अवार्ड और अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके है. 
वैष्णव जी की एक छत्तीसगढी हास्य कविता का आडियो अनुवाद सहित हम यहा प्रस्तुत कर रहे है, मूल गीत गुरतुर गोठ में उपलब्‍ध है. भविष्य मे हम इनकी हिन्दी कविताओ को भी प्रस्तुत करेंगे -
पैरोडी - तुम तो ठहरे परदेशी साथ क्‍या निभाओगे (अलताफ़ राजा)

बस मे मैं कब से खडा हूँ मुझे बैठने की जगह दे दो
ले दे के घुस पाया हूँ मुझे निकलने के लिये जगह दे दो
भीड मे मै दबा हूँ सास लेने के लिये तो जगह दो
मै तो सास लेने का प्रयाश कर रहा हूँ
तुम कितना धक्का दे रहो हो
मै भीड मे दबा हूँ सास लेने के लिये तो जगह दे दो
भेड बकरियो की तरह आदमियो को बस मे भर डाले हो
ये समधी जात भाई मेरी लडकी के लिये 
लडका भले तुम ना दो पर मुझे सीट तो दे दो 
बस मे खडा यह लडका मिर्च का भजिया खाया है, 
इसका पेट खराब है, इसका कोई भरोसा नही है, 
दौड कर जावो, जल्दी इसे दवा तो दे दो

रामेश्वर वैष्णव

बसंत में बिरह - छत्तीसगढी कविता आडियो हिन्दी भावानुवाद सहित

भाई किशोर तिवारी के इस छत्तीसगढी कविता का हिन्दी भावानुवाद हम आप लोगो के लिये प्रस्तुत कर रहे हैं -
मै तुम्हारी चाल को जान गया रे कोयलिया
पहले तू फुदक फुदक कर डंगाल डंगाल मे कूदती रही
और अमरैया मे जा के सभी को निमंत्रित कर आयी
आम के पेडों का चक्कर लगाकर तू सबको बुला लाई
और भंवरा के गुंजन के साथ गीत गुनगुनाने लगी
फिर भी मुझे तुमने नही पूछा कि मेरा क्या हाल है
मै तुम्हारी चाल को जान गया रे कोयलिया
कितना कष्ट दे रहा है मित्र से ना मिल पाने का दर्द
कैसे जी रहा हूँ मै बिना प्रेमिका के
मेरे पल पल युग जैसे बीत रहे है
ऑंखों मे दुख के ऑंसु सरोवर जैसे लबालब भरे है
जिन्दगी की खेती मे अकाल पड गया है
मै तुम्हारी चाल को जान गया रे कोयलिया
बासंती पुरवाही के साथ उसकी याद भी बह रही है
ऑंखों  मे उसकी सूरत झूल रही है
आखिर तू क्या जाने प्रेम का मरम
तू क्या जाने अपने प्रेमी का बिरह
ये प्रेम तो जीवन मे मौत का खेल है
मै तुम्हारी चाल को जान गया रे कोयलिया
मौर आये आम के पेडों को देख कर मेरा मन भरम जाता है
महमहाते बगिया मुझे डोली जैसे लगते है
उपर से तेरा कूकना मेरे हृदय को चीर देती है
अरी तितली अभी रुक जा तू भी मुझे ताना मत दे
मुझे इठलाते चिढाते हुए टेसू लाल हो गये है
मै तुम्हारी चाल को जान गया रे कोयलिया भावानुवाद - संजीव तिवारी 

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