हजारों लाखों लोगों नें चंडीगढ के राक गार्डन को देखा होगा और सबने उसे सराहा होगा किन्तु राक गार्डन बनाने वाले पद्मश्री सम्मान से सम्मानित नेक चंद सैणी की सृजनशील मानस जैसा चिंतन और उनके पदचिन्हों पर चलते हुए उसे साकार करने का प्रयास बिरले लोगों नें किया होगा। इन्हीं में से एक हैं नगर पालिक निगम दुर्ग के आयुक्त, राज्य प्रशासनिक अधिकारी श्री एस.के.सुन्दरानी की धर्मपत्नी श्रीमती रश्मि सुन्दरानी। राक गार्डन की कला नें उन्हें इतना प्रभावित किया कि उनकी कल्पनाशील मन नें न केवल राक गार्डन में लगाए गए कलाकृतियों के सौंदर्य और उनकी कलागत बारीकियों को आत्मसाध किया वरण उससे कुछ अलग हटकर काम करने का जजबा मन में पाला ओर एक संसार रच डाला।
कल्पनाओं को साकार स्वरूप देने का जजबा लिये पर्यावरण अभियांत्रिकी में स्नातकोत्तर श्रीमती रश्मि सुन्दरानी नें जब दुर्ग नगर निगम में अपने आयुक्त पति के साथ कदम रखा तो नगर पालिक निगम के स्टोर्स में पुराने रिक्शों, कचरा ढोने वाले हाथ ठेलों, मोटर बाईकों और गाडियों के टायरों, रिंगों का कबाड अंबार के रूप में भरा देखा। नगर पालिक निगम दुर्ग विभागीय नियमों के कारण बरसों से इन कबाडों को सहेज कर रखने और इसके लिए उपयुक्त स्थान सुलभ कराने के लिए विवश थी साथ ही इन सामानों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा कर्मचारी की भी व्यवस्था करनी पड रही थी।
श्रीमती सुन्दरानी नें अपने पति को इस समस्या से दो चार होते देखकर राक गार्डन में देखे और उन कलाकृतियों को हृदय में समाये अपने अनुभवों को इन कबाडों से आकार देने की सोंची। उनके मन में इन कबाड से आकृतियां उभर कर सामने आने लगी किन्तु इसे साकार करने के लिए सबसे बडी समस्या थी इन सामानों को वेल्ड कर एक दूसरे से जोडने की। श्रीमती सुन्दरानी नें मन में घुमड रही आकृतियों का रफ स्कैच बनाया और एक वेल्डर की व्यवस्था कर उसे आकार दिलवाने लगी। लौह खण्डों/टिनों को आकार देने के लिए वेल्डिंग करते वेल्डर को समझाना रश्मि के लिए कठिन काम था, उनके मन में उभरे आकृतियों को आकार देने वेल्डर को समझाने में रश्मि को बहुत मशक्कत करनी पडती थी पर उन्होंनें हार नहीं मानी और एक दो वेल्डर बदलने के बाद परेशानी कुछ कम होती गई।
कुछ ही प्रयासों के बाद जो आकृतियां उभर कर आई वह क्लासिकल आर्ट के नमूने की भंति नायाब नजर आने लगी। लोगो की नजर में आते ही श्रीमती सुन्दरानी को प्रोत्साहन मिलने लगे और वह अपने काम में जुट गई। एक के बाद एक कला के नमूने सामने आने लगे, श्रीमती सुन्दरानी के मानस में गजब की इमेजिनेशन पलती है उन्होंनें गाडियों के बेरिंग, सायकल रिक्शों के छर्रा-कटोरी, दांतेदार बेरिंगों, पायडलों को जोड जोड कर एक विशालकाय डायनासोर का निर्माण किया जो दुर्ग के गौरव पथ में कला और कला की अनुभूति के गौरव की कहानी स्वयं कहता है। इसके साथ ही गौरव पथ के दोनों तरफ रश्मि जी की बनाई गई कलाकृतियां साकार होकर नृत्य करती प्रतीत होने लगी। छत्तीसगढ की संस्कृति व लोककला को प्रदर्शित करती इन कलाकृतियों में बीनवादक, मृदंगवादक, मोर, कछुआ, मकडी आदि की अद्भुत कृतियां मुस्कुराने लगी। जिसे देखकर दर्शक सहसा ठहर सा जाता है और पूरे शिद्दत के साथ कबाड से बने इन कृतियों को निहारता है।
श्रीमती सुन्दरानी का निवास ऐसी कलाकृतियों का खजाना है वहां दिन भर एक से एक कृतियां आकार ले रही हैं एक वेल्डर एक हैल्पर के साथ रश्मि जी के निर्देशन में उनकी अनुभूतियों को आकार देने कबाड और अनुपयोगी निर्जीव लौह खण्डों में भी भाव-भंगिमाओं से उनमें जान डालने हेतु प्रयासरत है। उनका कला के पगति समर्णण, निष्ठा एवं श्रम एक मिशाल है, उनका गार्डन मोर, बतख, मकडी, विभिन्न प्रकार के पारंपरिक वस्त्रों से सजे बादक के साथ ही टेबल, बंदवार, द्वार सबकुछ अनुपयोगी वस्तुओं से निर्मित है जिनकी सुन्दरता देखते बनती है।
अपने इन प्रयासों के संबंध में रश्मि सुन्दरानी कहती है कि जब श्री सुन्दरानी रायगढ नगर पालिक निगम में आयुक्त थे तब उन्होंनें इस पर प्रयास किया था और एक दो कलाकृतियों का निर्माण किया था जिसे लोगों नें सराहा और रायगढ के कुछ चौराहों पर सौंदर्यीकरण की दृष्टि से उन्हें लगाया गया उसके बाद उन्हें लगने लगा कि इस पर और प्रयास करना चाहिए। इसके बाद श्री सुन्दरानी का स्थानांतरण दुर्ग नगर पालिक निगम में बतौर आयुक्त हो गया जहां श्रीमती सुन्दरानी के कल्पनाओं नें एक नई उडान भरी। और इनके कला के योगदान की महक फूलों के सुगंध की तरह चहुओर फैलने लगी।
हर व्यक्ति के हृदय में एक कलाकार बसता है, एक सर्जक बसता है, मन में आकार लेती अपनी कल्पनाओं को अभिव्यक्त करने की अपन-अपनी शैली भी होती है। धीरे-धीरे वेल्ड होते लोहे के तुकडे जब श्रीमति सुन्दरानी के निर्देशन से उनके मानस पटल से उभर कर भौतिक स्वरूप धरते हैं तब इन निर्जीव कृतियों में जान आ जाती है। रश्मि की कलाकृतियां उनकी कलात्मक सौंदर्य व परिकल्पना की अधुनातन जुगलबंदी है। हर तरफ से मिल रहे प्रशंसा एवं नगर निगम के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी की धर्मपत्नी होने के बावजूद रश्मि में सादगी और सहजता की अद्भुत पूंजी है जो उनके भीतर छुपे कलाकार को और दमक व आभा प्रदान करता है.चित्र तो बहुत हैं कभी दुर्ग आयें तो स्वयं इस अनोखे कलासौंदर्य का प्रत्यक्ष अवलोकन करें.
संजीव तिवारी






