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तुलसी जयंती समारोह : हिन्‍दी साहित्‍य समिति का आयोजन

23 अगस्त को मानस भवन दुर्ग मेँ,हिंदी साहित्य समिति दुर्ग के द्वारा तुलसी जयंती समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के पहले सत्र मेँ गोस्वामी तुलसीदास के व्यक्तित्व एवँ कृतित्व पर बोलते हुए मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार एवं श्रीमद् भागवत आचार्य स्वामी कृष्णा रंजन ने कहा कि तुलसी नेँ तत्कालीन परिस्थितियोँ मेँ जनता मेँ विद्रोह की ताकत पैदा करने के उद्देश्य से जनभाषा मेँ रामचरितमानस का सृजन किया। उंहोने विभिन्न भाषाओं के राम कथा एवँ रामचरितमानस पर समता मूलक व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि तुलसी ने समाज और साहित्य के लिए तब और अब दोनोँ ही काल और परिस्थितियोँ मेँ सार्थक भूमिका निभाई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष पं. दानेश्वर शर्मा ने कहा कि तुलसी जनकवि थे। उनकी रचनाएँ जन मन के लिए थी, तुलसी ने समाज के मंगल के लिए रामचरितमानस एवँ अन्य अमर रचनाओं का सृजन किया। तुलसी ने आदर्श समाज की परिकल्पना की, जिसे अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकट किया। उन्होंने बताया कि रामचरितमानस के प्रत्येक शब्द सिद्ध सम्पुट मंत्र है, जिसका लोकहित मेँ चमत्कारिक रुप से प्रयोग किया जा सकता है। विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती विद्या गुप्ता ने तुलसी साहित्य एवँ उसके सामाजिक सरोकार पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने तुलसी साहित्य के विभिन्न आयामों को विधागत कसौटी मेँ तौलते हुए तुलसी की रचनाओं का विश्लेषण किया।

कार्यक्रम के आरंभ मेँ सचिवीय प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए समिति के सचिव संजीव तिवारी ने कहा कि इस वर्ष समिति ने आठ साहित्य कार्यक्रम किए और रचनाकारोँ मेँ साहित्यिक रुचि जगाने व नव सृजन को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया। किंतु 1929 से निरंतर कार्यरत समिति मेँ इस वर्ष पांच रचनाकारों की कृतियाँ ही पुस्तकाकार रुप मेँ आ सकी। इस न्यून साहित्य विकास से पूर्णतया असंतुष्टि जताते हुए उन्होंने कहा कि, समिति का उद्देश्य एवं मेरा कार्यकाल तभी सफल माना जाएगा जब, रचनाकारोँ का परिचय उनके वरिष्ठ-कनिष्ठ होने से नहीँ बल्कि उनकी रचनाओं से होगा। कार्यक्रम मेँ स्वागत भाषण रमाकांत बराडिया ने दिया एवँ आभार प्रदर्शन समिति के अध्यक्ष डॉ संजय दानी ने किया।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि प्रदीप वर्मा एवँ विशिष्ट अतिथि बाबा निजाम दुर्गवी थे। इस सत्र के कवि सम्मेलन का संचालन समिति के सह सचिव अजहर कुरैशी ने किया। सत्र का आगाज वरिष्ठ व्यंग्यकार विनोद साव ने लघु व्यंग्य पाठ से किया। सम्मलेन में नवाचार का प्रयोग करते हुए कविताओं के बीच मेँ डॉ. रौनक जमाल ने भी अपनी लघु कथा का पाठ किया। कवियोँ ने अपने सुरमई गीतो, गजलों और कविताओं से महफिल को रंगीन बना दिया। जिनमेँ किशोर तिवारी, शमशीर शिवानी, नरेश विश्वकर्मा, भारत भूषण परगनिया, डॉ. नरेंद्र देवांगन, डॉ शीला शर्मा, नवीन तिवारी अमर्यादित, राकेश गंधर्व, महेंद्र दिल्लीवार, रतनलाल सिन्हा, ठाकुर दास सिद्ध, अरुण कुमार निगम, गिरिराज भंडारी, अरुण कसार, प्रभा सरस, सूर्यकांत गुप्ता, आर.ऐन.श्रीवास्तव, अशोक ताम्रकार, उमाशंकर मिश्र, सिरिल साइमन, शकुंतला शर्मा, संध्या श्रीवास्तव, निजाम राही, रामबरन कोरी कशिश, नासिर खोखर, कलीराम यादव, नीता कंबोज, तारा चंद शर्मा, डा.नौशाद सिद्दीकी, इंद्रजीत दादर निशाचर, जेपी अग्रवाल, प्रशांत कानस्कर, बंटी सिंह, मीता दास, निर्मल शर्मा आदि कवियोँ ने काव्य पाठ किया। बालोद से पधारे थानेदार बुद्धि सेन शर्मा ने अपने सुमधुर स्वर मेँ गीत प्रस्तुत कर सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया।

तुलसी जयंती समारोह का यह कार्यक्रम पूरे उत्साह में नव सृजन की कामना के साथ समाप्त हुआ। कार्यक्रम मेँ भारी संख्या मेँ गणमान्य एवँ साहित्यकार उपस्थित थे जिनमेँ रायपुर से पधारी शशि दुबे एवँ नगर के वरिष्ठ साहित्यकार गुलबीर सिंह भाटिया रवि श्रीवास्तव, तुंगभद्र सिंह राठौर, डॉ. निर्माण तिवारी, डॉ.के.प्रकाश, सरला शर्मा, रघुवीर अग्रवाल पथिक, बुद्धि लाल पाल, शरद कोकाश,  रजनीश उमरे, राजाराम रसिक, रामधीन श्रमिक, सुदर्शन राय, रवि आनंदानी, आलोक शर्मा, लल्ला जी साहू, भुवन लाल कोसरिया आदि उपस्थित थे।

वसुंधरा सम्मान से नवाजे गए गिरिजा शंकर


विगत 14 अगस्‍त को लोक जागरण के लिए वसुंधरा सम्मान से वरिष्ठ पत्रकार गिरजाशंकर व्यास को अलंकृत किया गया। लोक अस्मिता, ग्राम चेतना एवं शब्द सम्मान का पिछले दिनों 11वां आयोजन भिलाई के भिलाई निवास में सम्‍पन्‍न हुआ। वसुन्‍धरा सम्मान स्व. देवी प्रसाद चौबे की पुण्य स्मृति में दिया जाता है। इस वर्ष हुए कार्यक्रम में अतिथि के रुप में बीएसपी के मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी पंकज गौतम, महापौर निर्मला यादव, पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति सच्चिदानंद जोशी व बख्शी सृजनपीठ के अध्यक्ष रविन्द्रनाथ मिश्र उपस्थित थे। 


इस अवसर पर सम्मानित हुए वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर ने अपने उद्बोधन में कहा कि मैं अपने परिवार के बीच सम्मानित होकर काफी गौरवान्वित हूं। उन्‍होंनें आगे कहा कि राजनीति और पत्रकारिता आज संकट के दौर से गुजर रही है। उन्होंने स्‍वीकारा कि पत्रकारिता को उन्‍होंनें सदैव एक मिशन के रुप लिया। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि समाज में ‘वॉच डॉग’ के तौर पर पत्रकारिता को माना जाता है लेकिन जरूरत इस बात की है कि राजनीति और पत्रकारिता अब खुद के ‘वॉच डॉग’ बनें। अपने अंदर झांके, तब ही समाज में हम बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं। इसके लिए मर चुकी संपादक संस्था को फिर जिंदा होना होगा।आगे उन्‍होंनें कहा कि आज पत्रकारिता में मूल्यों का संकट आ गया है। पत्रकारिता का बाजारीकरण हो गया है। राजनीति और पत्रकारिता दोनों संकट के दौर से गुजर रहा है। 


कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय के कुलपति सचिदानन्द जोशी ने अपने आधार वक्‍तव्‍य में सोसल मिडिया पर बाते कहते हुए विशद रूप से ट्विटर व फेसबुक प्रयोग का विश्‍लेषण करते हुए कहा कि संदेश का प्रचार-प्रसार नेट के माध्यम दिनों दिन फैलता ही जा रहा है जो सोसल मिडिया का ही कमाल है। सोसल मिडिया प्रिंटमिडिया के लिए बड़ी चुनौती है। इस मौके पर उन्होंने सोसल मिडिया के कई उदाहरण भी दिए। फेसबुक में युवा पीढ़ी की बढ़ती दिलचस्‍पी एवं एक कमरे में बैठकर बाहर संसार से जुड़ने की मनोवैज्ञानिकता पर उन्‍होंनें प्रकाश डाला। फेसबुक या ट्विटर वाल पर लिखे अपने वाक्‍याशों पर कमेंट नहीं आने, लाईक नहीं किये जाने पर उपजे कुंठाओं पर भी उन्‍होंनें चर्चा किया। सोसल मीडिया के सहारे एक से अनेक होते विचारों और वैचारिक सहयोग से होने वाले बदलावों में उन्‍होनें विश्‍वास जताया। अपने पूरे आधार वक्‍तव्‍य को उन्‍होंनें सोशल मीडिया खासकर ट्विटर व फेसबुक पर ही केन्द्रित किया था। एक ब्‍लॉगर होने के नाते मैं उनके वक्‍तव्‍य में हिन्‍दी ब्‍लॉगगिंग के संबंध में कुछ सुनना चाह रहा था किन्‍तु उन्‍होंनें वैकल्पिक मीडिया के इस विकल्‍प पर एक शव्‍द भी नहीं बोले। सचिदानन्द जोशी जी को प्रदेश के विभिन्‍न कार्यक्रमों में सुनने का अवसर हमें प्राप्‍त होते रहा है, भविष्‍य में इस संबंध में उनके विचारों का इंतजार रहेगा।

संजीव तिवारी   

कालम व प्रतिवेदनों में उलझता आम आदमी

पिछले पोस्‍ट में हमने दुर्ग में भूमि लेकर भवन बनवाने तक एक आम आदमी को होने वाली परेशानियों का जिक्र किया था। इसी क्रम में, जिले में इस माह से कलेक्‍टर दुर्ग के द्वारा भूमि माफियाओं पर शिकंजा कसने के लिए लागू एक नये नियम के संबंध में हम यहॉं चर्चा करना चाहते हैं। 

इस नये नियम के तहत् पंजीयन कार्यालय एवं तहसीलदार व पटवारियों को प्रेषित किए गए पत्रों के अनुसार भूमि क्रय-विक्रय के लिए विक्रय पंजीयन के पूर्व विक्रीत भूमि का पटवारी से 14 बिन्‍दु प्रतिवेदन प्राप्‍त करना होगा। जिसमें श्रीमान तहसीलदार महोदय का हस्‍ताक्षर होना आवश्‍यक कर दिया गया है। जिला पंजीयक के पास उपलब्‍ध पत्र के अनुसार निर्धारित 14 बिन्‍दु प्रपत्र के फोटो पहचान पत्र पर श्रीमान तहसीलदार का हस्‍ताक्षर निर्धारित है किन्‍तु विगत दिनों कई बार बदले जा रहे इस प्रपत्र से फोटो पहचान पत्र पर श्रीमन तहसीलदार का हस्‍ताक्षर हटा दिया गया है, कलेक्‍टर द्वारा जारी निर्धारित प्रपत्र में बदलाव की अभिस्‍वीकृति श्रीमान कलेक्‍टर से ली गई है या नहीं, इस बात की यथोचित जानकारी नहीं है किन्‍तु पटवारियों के द्वारा अपने तहसीलदार के द्वारा जारी मौखिक आदेशों का पालन किया जा रहा है। 

इस नियम के तहत् विक्रेता यदि अपनी भूमि विक्रय करना चाहता है तो क्रेता और विक्रेता दोनों पटवारी के समक्ष उपस्थित होकर अनुरोध करना होगा और पटवारी समय व सहोलियत के अनुसार विक्रीत स्‍थल का निरीक्षण करेगा। भूमि के भौतिक सत्‍यापन के बाद पंचनामें जैसी कार्यवाही कई पटवारी कर रहे हैं जिसमें क्रेता व विक्रेता से स्‍थल निरीक्षण प्रपत्र पर हस्‍ताक्षर के साथ भौतिक नाप जोख के समय उपस्थित दो व्‍यक्तियों से उसमें बतौर गवाह हस्‍ताक्षर भी कराए जा रहे हैं। 

आवासीय प्‍लाटों के लिए तो यह प्रक्रिया कम समय लेने वाली है किन्‍तु बड़े व्‍यावसायिक प्‍लाटों व कृषि रकबों के स्‍थल निरीक्षण में समय लग रहा है। पटवारियों के पास वैसे भी पहले से कार्य की अधिकता है ऐसे में स्‍थल निरीक्षण के उपरांत विक्रीत भूमि की सहीं चौहद्दी लिखने की अनिवार्यता के कारण 14 बिन्‍दु प्रपत्र मिलने में देरी हो रही है। पटवारियों के पास आवेदनों की कतारे लग रही है और पंजीयन कार्यालय के कर्मचारी खाली बैठे हैं। पटवारी कार्यालयों में लगी भीड़ को पूछने से अधिकाश लोग इस नये नियम से एकबारगी खफा नजर आ रहे हैं। इस संबंध में पटवारी का कहना है कि जिन बिक्रीशुदा भूमियों के भौतिक अस्तित्‍व में समस्‍या है, आवासीय प्‍लाटों का लेआउट प्‍लान नहीं है या ऐसे कृषि भूमि जिनका बटांकन नहीं हुआ है उनकी चौहद्दी 14 बिन्‍दु प्रपत्र में लिख पाना संभव नहीं है, इसी कारण ऐसे भूमि का 14 बिन्‍दु प्रतिवेदन बनाया नहीं जा रहा है। इसके साथ ही कृषि भूमि के विक्रेताओं की दलील है कि विक्रयशुदा जमीन उनके पिता या परपिता के द्वारा अर्जित भूमि है जो उन्‍हें वारिसान में प्राप्‍त हुआ है और वे उक्‍त भूमि में बरसों से काबिज है, राजस्‍व अभिलेखों में बटांकन यदि नहीं हुआ है तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। उक्‍त भूमि के राजस्‍व अभिलेखों पर विक्रेता ही नाम लिखा हुआ है एवं उक्‍त भूमि के कब्‍जे और स्‍वत्‍व पर किसी भी प्रकार का कोई विवाद नहीं है। विक्रता के भूमि स्‍वामी हक की भूमि के मूल खसरे के यदि विभिन्‍न तुकड़े हुए है तो उन्‍हें राजस्‍व अभिलेखों में दर्ज कराने एवं नक्‍शा दुरूस्‍त कराने का दायित्‍व राजस्‍व अधिकारियों का है। जिसके वावजूद पटवारी व तलसीलदार के द्वारा 14 बिन्‍दु व फोटा परिचय में हस्‍ताक्षर नहीं किया जाना आश्‍चर्यजनक है। 

आवासीय प्‍लाटों के भौतिक अस्तित्‍व की समस्‍या तो सिद्ध है, भू माफियाओं नें आवासीय प्‍लाटों के नाम पर लूट मचाई है, एक प्‍लाट को चार-पांच लोगों को बेंचा है, फर्जी लेआउट प्‍लान बना कर पहले प्‍लाट बेंचे फिर लेआउट में दर्शाये रोड़ रास्‍ते की जमीन को भी बेंच खाए हैं, और भी बहुत सारे अवैध कार्य किए गए है। मूलत: इसी कारण यह नया नियम अस्तित्‍व में आया है किन्‍तु आधा-एक एकड़ या इससे बड़े कृषि खसरों के विक्रय में ज्‍यादातर एसी परेशानी नहीं है। एक एकड़ या इससे बड़े कृषि खसरों के विक्रय में इस 14 बिन्‍दु की अनिवार्यता उतनी नहीं नजर आती। किसानों से हो रही चर्चा में जो बात सामने आ रही है वह सही है कि ज्‍यादातर शहरी कृषि खसरों के कई कई तुकड़े हो चुके हैं किन्‍तु नक्‍शें में उनका बटांकन नहीं हुआ है, नक्‍शें में बटांकन नहीं होने के कारण पटवारी को सहीं नक्‍शा बनाने एवं भूमि की चौहद्दी लिखने में परेशानी आ रही है। यद्धपि भूमि स्‍वामी स्‍थल निरीक्षण के समय अपनी भूमि को चिन्हित कर रहा है फिर भी पटवारी नक्‍शें में बड़े रकबे के खसरे में हुए तुकड़े में विक्रता की भूमि एकदम सही कहां पर दर्ज किया जाय यह समस्‍या है। इसके साथ ही यदि नक्‍शे में विक्रता के रकबे की भूमि को नाप कर पटवारी द्वारा दर्शा भी दिया गया तो राजस्‍व विधियों के तहत उसे विधिवत राजस्‍व निरीक्षक के द्वारा लाल स्‍याही से अभिप्रमाणित किया जाता है तभी वह प्रभावी हो पाता है। तो पटवारी के नाप जोख का कोई मतलब नहीं, 14 बिन्‍दु बिना भरे लटका रहेगा और किसान पटवारी कार्यालय के चक्‍कर काटते रहेगा। ऐसे में वह निश्चित रूप से इस नये नियम को प्रशासनिक तानाशाही कह कर प्रचारित करेगा, जिसका सहारा भू-माफिया लेंगें और इसे जन आन्‍दोंलन का नाम देंगें। 

सुननें में यह आया है कि क्रय-विक्रय में इस 14 बिन्‍दु प्रपत्र की अनिवार्यता को समाप्‍त करने के लिए एक प्रतिनिधि मंडल लगातार जिले के कलेक्‍टर से विमर्श कर रहा है, और प्रतिनिधि मंडल के लोगों को पूर्ण विश्‍वास है कि कल यह नियम रद्द हो जायेगा। किन्‍तु यह 'कल' कब आयेगा यह अभी भविष्‍य के गर्त में है। प्रतिनिधि मंडल किन मुद्दों में अपना विरोध जता रही है इस बात की जानकारी एक जनता के हैसियत से मुझे नहीं है, समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार व प्राप्‍त अन्‍य सूचनाओं के आधार पर इतना ज्ञात है कि इस प्रतिनिधि मंडल में कौन कौन लोग हैं। अपुष्‍ट सूचनाओं के तहत् इसमें दुर्ग के लैंडलार्ड गुप्‍ता-अग्रवाल परिवार के सदस्‍य हैं और स्‍थानीय तथाकथित नई राजनीतिक पार्टी से जुड़े कुछ नेता हैं। एक जनता के नजरिये से यदि मैं कहूं तो लैंडलार्ड गुप्‍ता अग्रवाल परिवार के सदस्‍यों के साथ इस प्रतिनिधि मंडल में राजनीति से जुडे के लोगों का होना बार बार खटक रहा है। 

मेरे विचार से पहली बात तो यह कि, जनता के मुद्दे राजनैतिक सोंच से कदापि हल नहीं किये जा सकते। दूसरी बात यह कि लोगों का यह भी कहना है कि इस प्रतिनिधि मंडल में ऐसे लोग भी हैं जो यहां भूमि के खरीदी-बिक्री व प्‍लाटिंग का कार्य बतौर व्‍यवसाय कर रहे हैं। जो भी भूमि के धंधे से सीधे तौर पर लाभ से जुड़ा व्‍यक्ति है वह इस मसले में निष्‍पक्ष रह ही नहीं सकता। इस बात का सबसे सटीक प्रमाण है कि प्रतिनिधि मंडल 14 कालम के अतिरिक्‍त उस प्रपत्र का भी विरोध कर रहा है जिसमें प्‍लाट काट कर बेंचने वाले भू-स्‍वामी से यह लिखवाया जाता है कि शेष रोड़-रास्‍ते की भूमि को मैं विक्रय नहीं करूंगा। प्रतिनिधि मंडल यदि किसानों को रिप्रेजेंट कर रही है तो उसे इस प्रपत्र के विरोध का कोई मतलब ही नहीं है, इस प्रपत्र का विरोध तो सिद्ध करता है कि हम प्‍लाट काट कर बेंचने वाले हैं। 

ऐसी स्थिति में 14 कालम का विरोध करने वाले किसानों से उनके विरोध का सही कारण जानना होगा, पिछले पंद्रह दिनों से दुर्ग तहसील के किसानों से मेरी लगातार हो रही चर्चा में मैंने जो मूल पाया है वह मात्र इतना ही है कि उनके खसरे को नक्‍शे में चढ़ाया नहीं गया है जिसे राजस्‍व की भाषा में बटांकन कहा जाता है। बटांकन नहीं होने के कारण पटवारी 14 बिन्‍दु कालम भर नहीं रहा है और किसान पैसे के लिये भटक रहा है। मेरे संपर्क में ग्राम पोटिया का एक किसान आया जिसके पिता अपोलों में भर्ती हैं उसे रूपयों की सक्‍त आवश्‍यकता है किन्‍तु बटांकन नहीं होने के कारण उसके भूमि का विक्रय पंजीयन नहीं हो पा रहा है, और उसके जमीन का क्रेता उसे बिना विक्रय पंजीयन और राशि नहीं दे रहा है। अब यदि समय पर पैसा नहीं मिलने के कारण उसके पिता की मृत्‍यु हो जाती है तो वह उन रकमों का क्‍या करेगा। दूसरे तरफ क्रेता की दलील है कि वह पहले भी विक्रेता को काफी रकम दे चुका है शेष राशि वह विक्रय पंजीयन के बाद ही देगा। अपने दलीलों पर क्रेता और विक्रेता दोनों सही है किन्‍तु बटाकंन नहीं होने के कारण 14 बिन्‍दु प्रपत्र बनने में हो रही देरी से एक किसान बेमौत मरता है तो उसकी जिम्‍मेदारी कौन लेगा।

यद्धपि मैं सीधे तौर पर भूमि क्रय-विक्रय के लाभों से जुड़ा हुआ नहीं हूं किन्‍तु दुर्ग सहित छत्‍तीसगढ़ के भू-संपदा संबंधी आर्थिक विकास का साक्षी रहा हूं। प्रदेश के रायपुर जिले में विक्रय पंजीयन के पूर्व 14 बिन्‍दु प्रतिवेदन की अनिवार्यता विगत तीन साल से अस्तित्‍व में है वहां अब यह व्‍यवहार में आ गया है और सरलता से क्रियान्वित हो रहा है। मुझे अपने जिले में 14 बिन्‍दु कालम की उपादेयता पर कोई संदेह नहीं है किन्‍तु उसके क्रियान्‍वयन में व्‍यवहारिक परेशानियों का भी ध्‍यान दिया जाना आवश्‍यक है, तभी जन हित में इसकी पूर्ण उपादेयता सिद्ध हो सकेगी। 

हम पाठकों की सुविधा के लिए 14 बिन्‍दु प्रतिवेदन अपलोड कर रहे हैं, जिसे आप यहॉं क्लिक कर डाउनलोड कर सकते हैं।

संजीव तिवारी   

पचास साल बाद फहराया जय स्‍तंभ में तिरंगा

आजादी मिलने के उपरांत भारत के राज्‍य एवं जिला मुख्‍यालयों में स्‍वतंत्रता दिवस के प्रतीक चिन्‍ह के रूप में जय स्‍तंभ का निर्माण कराया गया था, जिसमें आजादी के बाद एवं संविधान लागू किये जाने के बाद लगातार स्‍वतंत्रता व गणतंत्र दिवस में तिरंगा झंडा फहराया जाता है। छत्‍तीसगढ़ के दुर्ग जिला मुख्‍यालय में भी सन् 1947 में जय स्‍तंभ का निर्माण कराया गया जिसमें शुरूआती दौर में चार-पांच साल तक स्‍वतंत्रता दिवस में तिरंगा झंडा फहराया गया। इसके बाद दुर्ग जिला कार्यालय भवन व जिला न्‍यायालय का विस्‍तार किया और फिर धीरे-धीरे जय स्‍तंभ को भुला दिया गया।

दुर्ग जिला अधिवक्‍ता संघ नें इस वर्ष आजादी के प्रतीक के रूप में निर्मित इस जय स्‍तंभ की सुध ली। संघ के पदाधिकारियों द्वारा जिले के जिलाधीश श्रीमती रीना कंगाले जी से अनुरोध कर इस वर्ष जय स्‍तंभ में घ्‍वजा रोहण करने की अनुमति मांगी गई। जिलाधीश महोदया नें ना केवल अनुमति दी एवं आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया कि नगर व प्रशासन के लोग जय स्‍तंभ को भूल कैसे गये।

आज प्रात: जय स्‍तंभ पर लगभग पचास साल बाद दुर्ग जिला कार्यालय परिसर में स्थित जय स्‍तंभ पर जिला अधिवक्‍ता संघ, दुर्ग नें ध्‍वजा रोहण किया। समारोह में अधिवक्‍ता संघ के पदाधिकारी व अधिवक्‍ता गण के साथ ही जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश एवं अन्‍य न्‍यायाधीशगण उपस्थित थे। इस अवसर के कुछ चित्र -














कलेक्‍टरेट में ध्‍वजारोहण

स्‍वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं सहित ...

संजीव तिवारी

आम आदमी का स्‍वप्‍न : एक बंगला बने न्‍यारा

राजधानी बनने के बाद प्रदेश में भू-संपदा का अंधा-धुध व्‍यापार आरंभ हुआ था, इस व्‍यापार में व्‍यवसायियों, उद्योगपतियों से लेकर नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के नंम्‍बर एक और दो के पैसों का निवेश आज तक अनवरत जारी है। किसानों की जमीन बिल्‍डर और भू-माफिया कम दर में खरीद कर शासन के नियमों को तक में रखते हुए शहरी क्षेत्रों के आस-पास की जमीनों में खरपतवार जैसे बहुमंजिला मकाने और कालोनियां विकसित करने में लगे हैं। भूमि के इस व्‍यापार के कारण अपने मकान का स्‍वप्‍न अब आम जनता की पहुंच से दूर हो रहा है। आम जनता के इस दर्द के पीछे भू-माफियाओं का का व्‍यावसायिक षड़यंत्र रहा है। शासन को जब तक भू-माफियाओं के इन कृत्‍यों का भान हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी और शहर के आस-पास की जमीनें किसानों के हाथ से छिन चुकी थी। खैर देर आये दुरूस्‍त आये के तर्ज पर शासन नें पिछले वर्ष से ही इसपर लगाम लगाने की मुहिम आरंभ भी की किन्‍तु भू-राजस्‍व, नगरीय प्रशास व नगर विकास के कानूनों के बीच से पेंच ढ़ूढते भू-माफिया अपने व्‍यापार में निरंतर लगे रहे।
भूमि क्रय करने के बाद प्रमाणीकरण-किसान किताब प्राप्‍त करने में 8 माह, भू-उपयोग प्रमाण पत्र प्राप्‍त करने में 3 माह, डावर्सन में 3 माह, नजूल अनापत्ति में 3 माह, नक्‍शा पास कराने में 3 माह कुल 20 माह यानी लगभग दो वर्ष इन प्रक्रियाओं में लगता है। उसके बाद आप गृह ऋण के लिए बैंकों के पास जाने की स्थिति में होते हैं। मजदूरों की समस्‍या, बढ़ते भवन निर्माण सामाग्री की कीमतों और देख-रेख के में लगातार उलझने के बाद अगले एक-दो वर्ष में कल्‍पनाओं का छत मयस्‍सर हो पाता है।
छत्‍तीसगढ़ जैसे विकासशील प्रदेश में आम आदमी जमीन खरीदकर उसमें भवन बना कर रहने आने तक के लम्‍बे और खर्चीले प्रक्रिया को महसूस कर अब बहुमंजिला भवनो में फ्लैट लेना जादा सुविधाजनक मानने लगा है इसी कारण सुविधाहीन क्षेत्रों में भी बहुमंजिला भवनो की बाढ़ आ रही है। इसके बावजूद अब भी अधिकतम लोगों का अपना छत अपनी जमीन के सोंच के कारण स्‍वयं जमीन लेकर उसमें अपनी कल्‍पनाओं का घर बनाया जा रहा है या बनाने का प्रयास किया जा रहा है। अपनी कल्‍पनाओं के घर को आकार लेने में शासन के नीतियों के तहत् जो दिक्‍कतें आ रही हैं उसके संबंध में कुछ जानकारी के संबंध में हम यहॉं चर्चा करना चाहते हैं।

भूमि के विक्रय पंजीयन के उपरांत भूमि का प्रमाणीकरण कराना होता है। राजस्‍व अभिलेखों में विक्रेता का नाम काटकर क्रेता का नाम चढ़ाए जाने की यह प्रक्रिया पटवारी के माध्‍यम से तहसीलदार के द्वारा किया जाता है, यह प्रक्रिया, पंजीकरण तिथि से पंद्रह दिन बाद और अंतरण पर किसी भी प्रकार से शिकायत या समस्‍या नजर आने पर सालो समय लेता है। प्रमाणीकरण के बाद पटवारी उक्‍त भूमि का पुस्तिका (ऋण पुस्तिका) बनाकर देता है। पिछले साल से वर्तमान तक दुर्ग तहसील में किसान पुस्तिका की लगातार किल्‍लत बनी हुई है। किसान पुस्तिका सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है किन्‍तु पिछले सालों से बहुत कम मात्रा में किसान किताब तहसील में आये हैं इस कारण पटवारियों के द्वारा किसान पुस्तिका दिया नहीं जा रहा है। मुझे दुर्ग तहसील के पटवारी कार्यालयों की जानकारी है जिसमें लगभग छ: मा‍ह से लोग किसान पुस्तिका पुस्तिका के लिए भटक रहे हैं, उनका प्रमाणीकरण हो गया है किन्‍तु किसान पुस्तिका नहीं मिल पाया है। अभी किसान पुस्तिका बनने के लिये कम से कम तीन और अधिकतम आठ माह का इंतजार करना पड़ रहा है। मकान बनवाने के उद्देश्‍य से भूमि क्रय करने के बाद सर्वप्रथम उस भूमि का कृषि से आवासीय भू-परिर्वतन कराना होता है। यदि आप आवासीय भू-उपयोग वाली भूमि क्रय करते हैं तो इसकी आवश्‍यकता नहीं पड़ती किन्‍तु बढ़ती आबादी के कारण अब ज्‍यादातर शहर के बाहरी इलाकों में मिलने वाली भूमि कृषि उपयोग की ही बच गई है इसलिये उन्‍हें आवासीय परिर्वतन कराने की आवश्‍यकता पड़ती है।

पिछले कुछ वषों से प्रदेश के दुर्ग जिले में कृषि भूमि के आवासीय भू-पविर्तन (धारा 172 भूमि का व्‍यपवर्तन – छ.ग. भू-राजस्‍व संहिता, 1959) पर रोक लगा दिया गया था। व्‍यवहार में यह देखने को आया है कि भू-माफिया और अपंजीकृत कालोनाईजर्स किसानों से कृषि भूमि का बड़ा भू-भाग क्रय कर आम मुख्तियारनामा लेते हैं और छोटा छोटा तुकड़ा बेंचते हैं, क्रेता उन छोटे छोटे तुकड़ों का आवासीय भू-पविर्तन कराते हैं। इससे भू-माफिया को संपूर्ण भू-भाग के आवासीय भू-पविर्तन का शुल्‍क नहीं देना होता बल्कि नगर निवेश से क्षेत्र का अधिकृत विन्‍यास भी पास नहीं कराना पड़ता है। आवासीय भू-पविर्तन शुल्‍क के अतिरिक्‍त इससे भू-माफिया को कालोनाईजर्स अधिनियम के तहत् निम्‍न वर्ग के लिए, उद्यान व अन्‍य आवश्‍यक सुविधाओं के लिए निर्धारित भूमि छोड़ने की भी आवश्‍यकता नहीं पड़ती। कभी किसी प्रकार से शासकीय दबाव या कार्यवाही की संभावना बनती भी है तो भू-माफिया सारी मलाई खाकर, लुटे किसान के जुम्‍मे सारी जवाबदारी डाल कर अपना पल्‍ला झाड़ लेते हैं। भू-माफिया सुविधाओं को ताक में रखकर भूमि बेचते हैं, बाद में भूमि खरीदने वाला मूलभूत सुविधाओं के लिए सरकारी कार्यालयों का चक्‍कर काटते फिरता है। जनता को यह आभास दिलाने के लिए कि ऐसे लोगों से भूमि ना क्रय करें सोंचकर ही आवासीय भू-परिवर्तन को रोक दिया गया था। पिछले वर्ष जनता की लगातार मांग के बाद दुर्ग जिले में कृषि भूमि के आवासीय भू-परिर्वतन का कार्य पुन: आरंभ किया गया किन्‍तु आवासीय भू-परिर्वतन के पूर्व प्रचलित प्रक्रिया में कुछ बदलाव लाये गये। नई प्रक्रिया के तहत् आवेदक को निर्धारित प्रारूप के आवेदन पत्र पर अपनी भूमि के संपूर्ण राजस्‍व अभिलेखों की नोटरी द्वारा अभिप्रमाणित तीन प्रतियों के साथ अनुविभागीय अधिकारी महोदय के कार्यालय में आवेदन प्रस्‍तुत करना है। अब हम आपको बताते हैं कि इसके लिये क्‍या क्‍या पापड़ बेलने पड़ेंगें और कहॉं कितना समय लगेगा।

राजस्‍व अभिलेखों के साथ ही नगर तथा ग्राम निवेश विभाग द्वारा उक्‍त भूमि का भू-उपयोग प्रमाण-पत्र भी लगाना आवश्‍यक है। नगर तथा ग्राम निवेश विभाग द्वारा भू-उपयोग प्रमाण-पत्र प्राप्‍त करना कितना मुश्किल काम है यह दुर्ग जिले में भटकते अनके लोग बता देंगें, इस प्रमाण-पत्र के लिए न्‍यूनतम शुल्‍क निर्धारित है किन्‍तु लोगों का कहना है कि इसके लिये ज्‍यादा रकम खर्च करने के बाद भी दो तीन महीने से कम नहीं लगता। दुर्ग नगर निवेश के संचालक महोदय अवैध प्‍लाटिंग एवं अपने विभागीय दायित्‍वों के प्रति संवेदनशील है एवं समय-समय पर मीडिया से भी लगातार रूबरू होते रहते हैं, उन्‍हें अपने कार्यालय में जनता को हो रहे कष्‍ट के प्रति ध्‍यान देना चाहिए।

दो-तीन महीने चप्‍पल घिसने के बाद आवेदक इस स्थिति में आता है कि अपना आवेदन अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष प्रस्‍तुत कर सके। अनुविभागीय अधिकारी महोदय विचार करेंगें एवं उन्‍हें यदि प्रतीत होता है कि आवेदक के भूमि का आवासीय भू-परिर्वतन किया जा सकता है तो वे आवेदन स्‍वीकार करेंगें। आवेदन स्‍वीकार करने के उपरांत अनुविभागीय अधिकारी महोदय द्वारा उक्‍त आवेदन के संबंध में क्रमश: नगर निवेश विभाग, नगर पालिक निगम एवं व्‍यपर्वतन शाखा- भू-अभिलेख से अभिमत मांगा जाता है। इन तीनों विभागों से अभिमत प्राप्‍त होने के बाद अनुविभागीय अधिकारी महोदय किसी कृषि भूमि का आवासीय परिवर्तन करते हैं।

इस नये प्रक्रिया की व्‍यवहारिकता पर लोग रोज प्रश्‍नचिन्‍ह लगाते हैं। इन तीनों विभागों में से नगर निवेश विभाग प्रस्‍तावित भूमि के मास्‍टर प्‍लान (नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973) के अनुसार भू-उपयोग (प्रयोजन) का उल्‍लेख करते हुए अपना प्रतिवेदन अनुविभागीय अधिकारी को प्रस्‍तुत करता है । नगर पालिक निगम के अभियंता भूमि का सर्वेक्षण कर नगर निवेश विभाग के भू-उपयोग का उल्‍लेख करते हुए अपना प्रतिवेदन प्रस्‍तुत करती है। व्‍यपर्वतन शाखा- भू-अभिलेख से राजस्‍व अधिकारी भूमि का मौका निरीक्षण करता है, चौहद्दी पंचनामा तैयार करता है और अपना लिखित अभिमत प्रकट करते हुए अनुविभागीय अधिकारी को अपना प्रतिवेदन प्रस्‍तुत करता है।

इन तीनों विभागों के प्रतिवेदनों में मात्र व्‍यपर्वतन शाखा- भू-अभिलेख के प्रतिवेदन का तथ्‍यात्‍मक अस्तित्‍व समझ में आता है बाकी के विभाग मात्र क्षेत्र के भू-उपयोग का उल्‍लेख कर अपना पल्‍ला झाड़ लेते हैं। इन तीनों विभागों से प्रतिवेदन मंगाए जाने के कारण जनता बारी बारी से इन तीनों विभागों का चक्‍कर काटता है जहां आज-कल के चलते प्रकरण महीनों चलता है अंत में जनता मजबूर होकर भ्रष्‍टाचार का साथ देता है तब जाकर उसका प्रतिवेदन अनुविभागीय अधिकारी के पास पहुचता है। इन प्रतिवेदनों के प्राप्‍त होने के बाद वहां प्रार्थी का बयान लिपिबद्ध किया जाता है और यदि भू-परिर्वतन किया जाना संभव हुआ तो प्रकरण पुन: व्‍यपर्वतन शाखा- भू-अभिलेख में प्रीमियम की गणना व चालान के द्वारा उसे पटाने हेतु जाता है, वहां से आवेदक शुल्‍क की राशि पता कर चालान के द्वारा राशि का भुगतान करता है फिर प्रकरण पुन: अनुविभागीय अधिकारी के पास आता है जहां अनुविभागीय अधिकारी भू-परिर्वतन प्रपत्र पर हस्‍ताक्षर कर प्रपत्र आवेदक को प्रदान करता है। इस प्रक्रिया में न्‍यूनतम तीन महीने लगते हैं।

मकान बनाने का सपना देखने वालों के कष्‍ट का अंत यहां नहीं हो जाता बल्कि यह पहली सीढ़ी पार करने के समान होता है और आगे की लम्‍बी सीढि़यों के लिए वह अपने आप को तैयार करता है। अगली सीढ़ी के रूप में उसे भवन का नक्‍शा किसी पंजीकृत वास्‍तुकार से बनवाना होता है जो सेवा शुल्‍क के भुगतान के साथ जल्‍दी ही हो जाता है क्‍योंकि नगर में वास्‍तुकारों की संख्‍या अधिक होने के कारण चयन की सुविधा आवेदक के पास होती है। नक्‍शा बनने के बाद शहरी क्षेत्र में भवन बनाने के लिए नगर पालिक निगम में भवन निर्माण अनुज्ञा प्राप्‍त करने के पूर्व नजूल विभाग की अनापत्ति लेनी होती है। नजूल विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना उसी तरह की लम्‍बी और झुलाउ प्रक्रिया है जैसे भू-परिर्वतन के लिए विभागों से अभिमत प्राप्‍त करना। यद्धपि आपकी भूमि नजूल भूमि नहीं है फिर भी नजूल विभाग की अनापत्ति मांगा जाना अव्‍यावहारिक है। नजूल अनापत्ति के लिये सामान्‍यतया दो महीने लगते हैं।

इन सबके बाद नगर पालिक निगम से भवन निर्माण अनुज्ञा हेतु आवेदन और चप्‍पल घिसाई आरंभ होती है, यद्धपि अब निगम क्षेत्र के कुछ वास्‍तुशिल्‍पियों को 2000 वर्ग फिट तक के भूमि के भवन निर्माण की अनुज्ञा देनें का अधिकार सौंप दिया है इससे जनता को कुछ राहत मिलने की संभावना है। निगम से नक्‍शा पास कराने में कम से कम तीन से छ: माह तक लग सकते हैं।
यह पोस्‍ट वर्तमान में दुर्ग जिले में भूमि क्रय कर मकान बनवाने में अव्‍यावहारिक प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत् आ रही दिक्‍कतों के संबंध में क्रमिक जानकारी उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से, शासन तक इसकी जानकारी देने वाले मित्रों के लिए लिखी गई है।

इस प्रकार से प्रमाणीकरण-किसान किताब में आठ माह, भू-उपयोग प्रमाण पत्र प्राप्‍त करने में तीन माह, डावर्सन में तीन माह, नजूल अनापत्ति में तीन माह, नक्‍शा पास कराने में तीन माह कुल 20 माह यानी लगभग दो वर्ष इन प्रक्रियाओं में लगता है। उसके बाद आप गृह ऋण के लिए बैंकों के पास जाने की स्थिति में होते हैं। मजदूरों की समस्‍या, बढ़ते भवन निर्माण सामाग्री की कीमतों और देख-रेख के में लगातार उलझने के बाद अगले एक-दो वर्ष में कल्‍पनाओं का छत मयस्‍सर हो पाता है।
दुर्ग कलेक्‍टर आई ए एस  श्रीमती रीना बाबा साहेब कंगाले

जिले में उर्जावान कलेक्‍टर माननीया रीना बाबा साहेब कंगाले के प्रशासनिक प्रगति व जनता के हित के लिये उठाए गए कदमों के संबंध में प्रतिदिन समाचार पत्रों में समाचार प्रमुखता से छप रहे हैं। इससे लगता है कि महोदया जनता के दर्द को कम करना चाहती है। उन्‍हें प्रत्‍येक विभाग में इस प्रकार से प्रकरणों को जानबूझकर लटकाने और समय लगाने की बाबू टाईप सोंच में शीघ्र ही लगाम लगानी चाहिए और जनता को मकान जैसे अहम सुविधा प्राप्‍त करने में बेवजह देरी को रोककर उनके सपनो को साकार करने में सहयोग करना चाहिए। 
संजीव तिवारी 

माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय : असमय पका सीताफल

सुबह-सुबह बंदरों की आवाजों से नींद खुली, मेरी श्रीमती और पुत्र घर से लगे 'कोलाबारी' में बंदरों की टीम को भगाने की कोशिशों में लगे थे। बंदर घर के बाउंड्रीवाल में लाईन से बैठे थे, बाउंड्रीवाल के उस पार सड़क में कुत्‍ते उन्‍हें उतरने दे नही रहे थे और इस पार हमारी सेना उन्‍हें भगाने के लिए डटी थी पर ढीठ बंदर भाग ही नहीं रहे थे। मेरे बाहर आने और हांक लगाने पर ही वे दूसरे घर के छतों से होते हुए भागे। बंदरों की इस टोली में कोई बारह-पंद्रह बंदर होंगें जो पिछले दिसम्‍बर-जनवरी से हमारे कालोनी में सात-आठ दिनों के अंतराल से लगातार आ रहे हैं। हमारी कालोनी शहर से कुछ दूर है यहां हरियाली ज्‍यादा है और कालोनी से लगे खेत भी है इस कारण बंदरों की आवाजाही होती रहती है पर लगता है पिछले महीनों से इनकी दखल घरों में बढ़ती जा रही है, हम छतो में या खुले स्‍थान में खाने का सामान नहीं रख सकते, बड़ी, आम पापड़ आदि सुखाने में ये उसे चट कर जाते हैं। मेरे घर में आम व अमरूद एवं अन्‍य फलदार पेड़ हैं जो इन बंदरों को ज्‍यादा ललचाते हैं। मेरी श्रीमती व पुत्र अपनी मेहनत से उगाए फलों को लुटते देखकर इन बंदरों को भगाने के हर जुगत लगाते हैं पर ये जब भी आते हैं डंगाल तोड़कर व बीस-पच्‍चीस फलों का नुकसान कर चले जाते हैं।


मेरे घर में एक अमरूद का पेड़ है जो साल में दो बार फल देता है, आज जब बंदर चले गए तो पेड़ के नीचे दर्जनों कच्‍चे अमरूद गिरे हुए थे, हमने पेड़ में फले अमरूद को देखा तो कुछ अमरूद पके हुए नजर आये। पके अमरूदों को तोड़ते हुए मैंनें अमरूद के पास ही एक छोटा सीताफल के पेड़ में लगे दस-बारह फल पर भी सरसरी निगाह डाला। एक सीताफल फटा हुआ नजर आया, पास जाकर उसे छूते ही वह हाथ में गिर गया, यानी वह पक गया था। एक दूसरे बड़े सीताफल को उत्‍सुकता से हल्‍के से दबाया तो वह भी दबने लगा। इसे तोड़ते हुए सतीश जायसवाल जी का पोस्‍ट याद आने लगा जिसमें उन्‍होंनें सीताफल में असमय फूल पर एक पोस्‍ट लिखा है उन्‍होंनें पोस्‍ट के अंतिम में लिखा ''...असमय के ये फूल फलेंगे नहीं। सीताफल के फलों के लिये उसके अपने ऋतुचक्र के पूरा होने तक प्रतीक्षा करनी ही होगी।'' 
यहां तो सीताफल असमय पक भी गये ... माली सींचे सौ घड़ा ...... अब भूलना पड़ेगा।

सरकारी दामांद अउ उपरी कमई : पीएमटी पेपर लीक (त्‍वरित टिप्‍पणी)

पहला पीएमटी पेपर लीक मामला अभी शांत नहीं हुआ था कि अब दूसरा मामला सामने आ गया। डाक्‍टर की पढ़ाई के लिए प्रवेश परीक्षा के रूप में प्रदेश में आयोजित इस परीक्षा पर अब सामान्‍य जनता का विश्‍वास उठ गया है। पिछले दो दिनों में रायपुर व बिलासपुर क्राईम ब्रांच के द्वारा डीबी भास्‍कर के सहयोग से किए गए खुलाशे में दर्जनों मुन्‍ना भाई पकड़े गए हैं। पीएमटी के पेपर पांच से बारह लाख तक में बेंचे गए और योजना इतनी तगड़ी बनाई गई कि पेपर खरीदने वाले किसी अन्‍य को यह बात ना बतला सके इसलिए उन्‍हें तखतपुर में लगभग बंधक बनाकर रखा गया, उनके मोबाईल ले लिये गए और परीक्षार्थियों के मूल अंकसूची जमा करा कर  लीक पेपर देकर तैयारी करवाई जा रही थी। सभी समाचार-पत्रों नें इसे विस्‍तृत रूप से कवर करते हुए छापा है जिससे आप सब वाकिफ हैं इस कारण समाचार पर विशेष प्रकाश डालने की आवश्‍यकता नहीं है। इस कांड के नेपथ्‍य से उठते विचारों पर चिंतन व विमर्श आवश्‍यक है।

पिछले दिनों किसानों की खस्‍ताहाली व छत्‍तीसगढ़ में घटते जोंत के रकबे में कमी होने पर कलम घसीटी करते हुए मुझे मेरे दिमाग में एक छत्‍तीसगढ़ी गीत पर ध्‍यान बार बार जा रहा था। 'मोर राजा दुलरवा बेटा तैं नगरिहा बन जाबे' छत्‍तीसगढ़ का लोक आदिकाल से अपने बेटों को किसान बनाने का स्‍वप्‍न देखता रहा है। लोक के इसी आकांक्षा ने अतिवृष्टि व अल्‍प वृष्टि और भीषण अकाल से जूझने के बावजूद छत्‍तीसगढ़ को धान का कटोरा बनाया था । समयानुसार धीरे धीरे लोक मानस में किसनहा बनने से ज्‍यादा सरकारी नौकरी करने की लालसा में वृद्धि होती गई। तनखा के अतिरिक्‍त 'उपरी कमई घलो हावय' की लालच नें गांव वालों को भी खेतों से दूर करना शुरू कर दिया। गांव से शहर आये और नौकरी करके बेहिसाब 'उपरी कमई' से अपने घर भरे अभिभावकों के मानस नें अपने बच्‍चों के लिए और सुनहले ख्‍वाब देखे। प्रतिभावन बच्‍चे अपनी क्षमता से बिना अभिभावकों के सहयोग से अपना रास्‍ता पा गए किन्‍तु औसत व कमजोर बच्‍चों के लिए अभिभावकों नें अपना दिमाक चलाना आरंभ कर दिया। अभिभावकों में पूत सपूत तो क्‍या धन संचय कहने वाले अभिभावक बिरले होते हैं, और ऐसे अभिभावकों के बच्‍चे भी अपना रास्‍ता स्‍वयं चुनते हैं। नौकरी करके पैसा कमाने वाले अधिकतर व्‍यक्ति अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए अपनी तरह ही सरकारी नौकरी (सरकारी दांमांद) का रास्‍ता चुनता है, वह बैठे-बिठाए कमाई के अतिरिक्‍त व्‍यवसाय या कोई उद्यम कर पैसा कमाने की सीख अपने पुत्रों को दे ही नहीं सकता वह सरलतम रास्‍ता आपने बच्‍चों को पकड़ाता है। 

ऐसे में सरकारी नौकरी के लिए लाखो रूपयों के घूस की व्‍यवस्‍था करना और रोजगार की निश्चिंतता वाले क्षेत्र डाक्‍टर या इंजीनियर बनाने के लिए पैसे खर्च करना अभिभावकों का 'दायित्‍व' होता है। इस 'दायित्‍व' को अभिभवक कर्ज की तरह आवश्‍यक मानकर निभाते हैं, अपने कमजोर बच्‍चों को मैनेजमेंट कोटे से इंजीनियरिंग/मेडिकल कालेजों में भर्ती करवाते हैं और लाखों खर्च करते हैं। पीएमटी का वर्तमान कांड भी अभिभावकों के इसी मोह का परिणाम है। एक आम आदमी अपनी पूरी उम्र बारह लाख रूपये कमाने के लिए होम कर देता है और पीएमटी के एक पेपर के लिए लोग बारह लाख नगद यूं ही दे रहे थे। ऐसे एक दो नहीं सैकड़ों लोग है जो भावी पीढ़ी को भ्रष्‍टाचार रूपी गंदी नाली का रसास्‍वादन पहली ही सीढ़ी से करवा रहे थे। ऐसे बच्‍चे आगे चलकर क्‍या अन्‍ना हजारे का साथ दे पायेंगें। इस पीएमटी कांड के लिए मूलत: अभिभावकों का मोह ही जिम्‍मेदार हैं ऐसा भास्‍कर नें अपने त्‍वरित टिप्‍पणी में भी लिखा है। अभिभावकों के साथ ही सरकार भी इस मामले में कम दोषी नहीं है, पीएमटी परीक्षा पहले भी एक बार रद्द हो चुकी थी उसके बावजूद सरकार नें इसे गंभीरता से नहीं लिया और बच्‍चों के साथ खिलवाड़ कर दिया। 

समाचार पत्रों से ही यह ज्ञात हुआ कि इस परीक्षा की जिम्‍मेदारी जिस सचिव स्‍तर के अधिकारी की थी वे व्‍यापम के अध्‍यक्ष हैं। सरकार नें इन्‍हें विशेष अनुरोध के साथ आसाम कैडर से छत्‍तीसगढ़ बुलाया और महत्‍वपूर्ण विभाग सौंपे क्‍योंकि ये एक दबंग भाजपा नेत्री के दामांद थे यानी सरकारी दामांद जी ने एक बार पेपर लीक हो जाने के बावजूद कोई विशेष सतर्कता नहीं बरती बल्कि छुट्टियों में थे। उनके निचले स्‍तर के अधिकारियों कर्मचारियों के संबंध में इसे पढ़ने के बाद कुछ कहना शेष रह ही नहीं जाता। सरकार इस कांड के बाद भले परीक्षार्थियों को आने-जाने का खर्च व रूकने का खर्च दान कर दे किन्‍तु उसकी अक्षमता के दाग धुलने वाले नहीं हैं। समाचार पत्रों ने यहां तक लिखा कि तखतपुर में जिस धर्मशाला में फर्जीवाड़ा अंजाम दिया जा रहा था उसे भाजपा के नेता ने बुक कराया था। सरकार को, खासकर मुख्‍यमंत्री को अपने इस फजीहत पर गंभीरता से सोंचना चाहिए और पार्टी के नाम पर प्रदेश में हो रहे बाहरी घुसपैठ पर ध्‍यान देना चाहिए। हमारे पास जनसंपर्क विभाग के ऐसे आंकड़े भी उपलब्‍ध है जिनमें सरकार नें भाजपा शासित प्रदेश या भाजपा के नेताओं के अनुशंसित पत्र-पत्रिकाओं को लाखों रूपये चना-मुर्रा की तरह बांटे हैं और प्रदेश में संवेदनशीलता से प्रकाशित हो रहे पत्र-पत्रिकाओं को ढेला भी नहीं दिया है। इसे बतलाने का आशय यह है कि प्रदेश में भाजपा के नाम ऐसे काम हो रहे हैं जिससे जनता दुखी है। पीएमटी कांड के मास्‍टर मांइंड व अन्‍य मुख्‍य सदस्‍य पकड़े गए हैं और आगे उनसे पूछताछ होगी, नये खुलाशे होंगें। सरकार को गंभीरता से इस कांड से सीख लेनी चाहिए।

इस कांड के बाद बार बार परीक्षा आयोजित होने से परीक्षार्थियों नें अपने मनोबल व उत्‍साह में कमी की बात कही है जिससे मैं सहमत नहीं हूं, उनके लिए तो यह और अच्‍छी बात है। उन्‍हें बार-बार अभ्‍यास का मौका मिल रहा है। इस कांड में जो परीक्षार्थी तखतपुर में पकड़े गए हैं उन्‍हें ताउम्र व्‍यापम की परीक्षा से वंचित किया जाना चाहिए एवं उनके अभिभावकों को कानूनी दायरे में लाते हुए उन पर भी कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। 

संजीव तिवारी

स्‍वप्‍नों का व्‍यवसाय : Speak Asia और उसके चम्‍मच

अभी पिछले महीनें मुझे एक पुराने मित्र नें बहुत दिनों बाद फोन किया, मैंने पिछले वर्ष उसका एक हिन्‍दी ब्‍लॉग बनाया था। हाल चाल के बाद उसने पूछा कि मेरी ब्‍लॉगिंग कैसे चल रही है। इधर-उधर की बातों के बाद वो आया कि उसने भी घर में ब्राडबैंड कनेक्‍शन ले लिया है और वो हिन्‍दी नेट व हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के प्रति उत्‍सुक है। मैंनें सहयोग के लिए हामी भरी और बात बंद करनी चाही तो उसने कहा कि पते की बात तो बताना भूल गया। मैंने जब पूछा कि ये पते की बात क्‍या है तो उसने कुछ 'झाड़-झंखाड़' से कमाई वाली कोई योजना के बारे में विस्‍तार से बतलाया। चूंकि मुझे चमत्‍कारिक रूप से प्राप्‍त धन पर विश्‍वास और भरोसा नहीं है इसलिए मैंनें अपना काम जारी रखते हुए, उसका मान रखा और उसकी बात सुनी। उसके बातों को मेरे विरोधी मन नें जो कुछ ग्रहण किया उसमें सिर्फ एक वाक्‍य था 'स्‍पीक एशिया' 'आनलाईन सर्वे'। मैंनें मित्र को 'देखते हैं', कह कर चलता किया और मोबाईल बंद कर दिया।

दूसरे दिन मित्र का पुन: फोन आया कि आपने नेट में 'स्‍पीक एशिया' 'आनलाईन सर्वे' सर्च किया क्‍या। मैंरे 'नहीं' कहने पर वह उस कम्‍पनी की पुन: बड़ाई बतलाने लगा और साथ ही उसने मेरी राय मांगी कि क्‍या उसे 11000/- रूपयों के गुणक में कुछ अंश का निवेश करना चाहिए। मैंनें मना किया तो उसने स्‍वयं इसका हल देते हुए कहा कि वापसी में कम्‍पनी 1000/- के गुणक में प्रति सप्‍ताह राशि वापस करेगी जिससे लगभग एक डेढ़ महीने में ही हमें हमारा जमा पैसा वापस मिल जायेगा, आगे की कमाई तो शुद्ध है। बस एक महीने कम्‍पनी बनी रहे। उसकी स्‍वयं की संतुष्टि पर मैंनें कहा कि भाई आपकी मर्जी, मैं उत्‍सुक नहीं हूँ, मैं पांच पैसे भी इस कम्‍पनी में निवेश नहीं करूंगा, भले ही यह मुझे लाखो रूपये देने का प्रलोभन देवे।

नेट में मैने जब स्‍पीक एशिया (Speak Asia) को खोजा तो उसका एक हिन्‍दी ब्‍लॉग स्‍पीक एशिया इंडिया आनलाईन मिला और भी बहुत सारे समान नाम वाले पोर्टल मिले। जिसमें से स्‍पीक एशिया के एक पोर्टल में इस प्रकार से लुभावने शब्‍दों का प्रयोग किया गया था ''आप आर्थिक स्वतंत्रता के लिए दिन रात मेहनत करते हैं लेकिन हासिल उतना नहीं हो पाता जितना आप उम्मीद करते हैं तो अब सिंगापुर की एक ओन लाईन सर्वे कंपनी आपको उम्मीद से बढ़ कर देने वाली है। जी हां यह कोरी कल्पना नहीं बल्कि एक हकीकत है। यह कहना है प्रिंट एण्ड इलेक्ट्रानिक नेटवर्क समूह का। हिंदी की यह पत्रिका देश की पहली ऐसी पत्रिका है जिसने आन लाईन मार्केटिंग के इस कायाकल्प की पूरी इत्मीनान से समीक्षा की है। पत्रिका के मुताबिक 90 का दशक जहां सूचना क्रांति का दशक रहा वहीं 2000 से 2010 तक का वक्त नेटवर्क मार्केटिंग के नाम रहा किंतु इस दौरान इन कंपनियों ने लोगों को सपने बेचने के सिवा कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया। लोगों को लाखों करोड़ों के ख्वाब दिखाए गए और हाथ कुछ भी नहीं आया। किंतु अब स्पीक एशिया ओन लाईन के पदार्पण से दावा किया जा सकता है कि सर्वे व नेटवर्किंग के मिश्रण से यह कंपनी लोगों को कमाई का बेहतरीन विकल्प उपलब्ध करवा रही है।''

नेट में बिखरे स्पीक एशिया के अवशेषों के अनुसार यह कम्‍पनी मई 2010 से भारत में ऑनलाइन सर्वे का काम करनें का दम भर रही है। कम्‍पनी सदस्य बनाने के लिए रू. 11,000/- लेती है, फिर कम्‍पनी महीने में कुल 8 सर्वे कराती है और इसके बदले में हर सर्वे के लिए 500 रुपए सदस्‍यों को देती है। इस प्रकार से लगभग तीन महीनें में सदस्‍य द्वारा जमा किया गया रूपया वापस प्राप्‍त हो जाता है। आनलाईन सर्वे के नाम पर यह कुछ सामान्‍य प्रश्‍नों का उत्‍तर फार्म फारमेट में पूछती है और उसके बाद पैसे का भुगतान करती है। और ... लगभग मुफ्त में प्राप्‍त होने वाले पैसे के लोभ में लोग फंसते चले जाते हैं। इस सारे खेल में एजेंटों/बिचौलियों की भूमिका अहम होती है जो स्‍पीक एशिया जैसी कम्‍पनी से भी ज्‍यादा गुनहगार हैं जो अपने बीच के लोगों को सपना दिखा कर लूटते हैं।

मैं सालों से इन स्‍वप्‍न बेंचने वाली कम्‍पनियों में फंसते मध्‍यमवर्गीय परिवार को देख रहा हूँ जो शार्टकट से पैसा कमाने के लालच में इन कम्‍पनियों के चक्‍कर में आते हैं। स्‍पीक एशिया जैसी कम्‍पनी अपनी लुभावनी बातों से लोगों के मर्म में ललक जगाती है, उनकी आकांक्षाओं में पर लगाती है, और-और की भावना को बलवती करती है और सितारा होटलों में मीटिंग कराकर ग्राहकों को फांसती है। कल्‍पतरू ब्‍लॉग में स्‍पीक एशिया के संबंध में पहले भी चेतावनी दी गई, मोलतोल में भी कहा गया था, और अक्टूबर में मनीलाईफ़ पत्रिका ने इनके व्यवसाय के बारे में आपत्ति जताई थी इसके बावजूद लोग पिल पड़े थे। आज 'स्‍पीक एशिया' 'आनलाईन सर्वे' का हाल आप सबके सामने है, कम्‍पनी नें भारत में लगभग 19 लाख सदस्य बनांए हैं और उनसे करोड़ो रूपये जमा करवाये हैं। मेरे मित्र नें भी लगभग दो लाख रूपये का चढ़ावा इस कम्‍पनी में चढ़ाया है, किन्‍तु उसे भरोसा है कि उसका पैसा उसे मिल जायेगा ... खुदा ख़ैर करे।

संजीव तिवारी

सफर में हमसफर के पदचाप की आवाज साथ है

साथियों हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के आरंभिक दौर से लेकर अभी तक छत्‍तीसगढ़ी माटी की छटा बिखेरने के उद्देश्‍य से प्रथमत: आवारा बंजारा में फिर आरंभ में आलेख प्रकाशित होते रहे हैं। हम अपनी प्रादेशिक सांस्‍कृतिक-परंम्‍पराओं व कला-साहित्‍य के संबंध में अपने ब्‍लॉग में जानकारी परोस कर स्‍वांनंदित होते रहे हैं। भारत व विश्‍व के कोने कोने के हिन्‍दी इंटरनेट पाठक जब हमारी परंपराओं के प्रति उत्‍सुकता जाहिर करते हैं तो हमारा उत्‍साह और दुगना हो जाता है। इसी उत्‍साह से हमने क्षेत्रीय लेखकों-संपादकों के पत्र-पत्रिकाओं, संग्रहों व रचनाओं के ढेरों पन्‍नों को काफी समय देते हुए यूनिकोड कनर्वट किया, टाईप किया और हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में ढेरों ब्‍लॉग पोस्‍ट दर पोस्‍ट बनाकर उसे उन्‍ही के नाम से पब्लिश किया है, जिसकी सूची काफी लम्‍बी है जिसके बावजूद हम अभी भी असंतुष्‍ट हैं। जब भाई लोग अपने पोस्‍टों की संख्‍या के संबंध में ब्‍लॉगिंग परम्‍पराओं के अनुसार पोस्‍ट लिखते हैं तब हमें भी अपने द्वारा पब्लिश पोस्‍टों की संख्‍या को भी जताने-बताने को जी चाहता है :) ..... किन्‍तु अपनी-अपनी खुशी, बड़े ब्‍लॉगर भाई लोग ऐसा करते हैं क्‍योंकि उन्‍हें इससे ब्‍लॉग उर्जा मिलती है। हमें तो ब्‍लॉगिंग की प्रेरणा अग्रज जयप्रकाश मानस से मिली है जिन्‍होंनें बिना हो हल्‍ला किए हिन्‍दी वीकि में छत्‍तीसगढ़ के पेज को समृद्ध करते हुए कई क्षेत्रीय उपन्‍यासों व संग्रहों को ब्‍लॉग के सहारे नेट प्‍लेटफार्म दिया और जनसुलभ किया है।
हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लॉगरों की संख्‍या यद्धपि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ी है किन्‍तु छत्‍तीसगढ़ के उपलब्‍ध साहित्‍य, कला व संस्‍कृति से संबंधित आलेखों व रचनाओं को लगन के साथ पोस्‍टों में प्रस्‍तुत करने वालों की गिनती सदैव कम रही है जबकि हम ऐसे पोस्‍टों की अपेक्षा निरंतर करते रहे हैं ताकि प्रादेशिक जानकारी का फैलाव हो सके। निरंतर क्षेत्रीय सामयिक चिंतन प्रस्‍तुत करने वालों में अमीर धरती गरीब लोग, अग्रदूतबिगुलसरोकार, अपनी बात अपनो से, बस्‍तर सहित बहुतों नें जहां प्रदेश की खुशबू बिखेरी है वहीं अभी हाल ही में लोगों के दिलों में छा जाने वाले सिंहावलोकन नें तथ्‍यात्‍मक प्रादेशिक जानकारी के साथ ही राष्‍ट्रीय विमर्श भी प्रस्‍तुत किया है। हमें भविष्‍य में सिंहावलोकन पर हमारी परिकल्‍पना के अनुरूप छत्‍तीसगढ की छवि प्रस्‍तुत होने का भरोसा है। हाल ही में ब्‍लॉग जगत में आये ब्‍लॉग छत्‍तीसगढ़ी गीत संगी नें तो हमारे मन की मुराद पूरी कर दी है, इसमें छत्‍तीसगढ़ी गीतों का अनमोल खजाना बूंद बूद कर भरा जा रहा है। इसी क्रम में कुछ वर्षों पूर्व प्रशांत रथ द्वारा छत्‍तीसगढ़ी बोली का एक पाडकास्‍ट भी शुरू किया गया था किन्‍तु यह ब्‍लॉग निरंतर नहीं रहा हमें छत्‍तीसगढ़ से पाडकास्‍ट ब्‍लॉग का भी इंतजार रहा है जिसे पूरा करने का भरोसा दिला रही है, संज्ञा टंडन जी अपने पाडकास्‍ट ब्‍लॉग एलएमजी पाडकास्‍ट में, जिसमें संज्ञा जी नें स्‍वयं इस जादुई माध्‍यम के संबंध में बतलाते हुए अपने ब्‍लॉग का आगाज किया है। इस ब्‍लॉग में छत्‍तीसगढ़ के प्रख्‍यात भाषाविद व रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ.रमेश चंद्र महरोत्रा की आवज में उनकी स्‍वयं की कविता भी प्रस्‍तुत है। आशा है भविष्‍य में हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में हमारी परिकल्‍पनाओं के विषय प्रस्‍तुत होते रहेंगें और हमें लम्‍बा ब्रेक मिलता रहेगा। 

ब्‍लॉग पोस्‍टों में दिव्‍यास्‍त्रों का प्रयोग और लक्ष्‍य के बीच नारी विमर्श टाईप कुछ-कुछ

दो दिन पहले की बात है, मैं अपने प्रथम तल में स्थित कार्यालय से नीचे उतरा तो मुझे होटल के स्‍वागतकक्ष में एक लड़की सफेद गमछे में मुह बांधे बैठे दिखी। मैंनें स्‍वाभाविक रूप से उससे संबोधित होते हुए कहा कि 'मैडम यहॉं तो नकाब उतार दीजिए' संभवत: अचानक मेरा अनपेक्षित कथन उसे अटपटा सा लगा किन्‍तु वह मुह में बांधे हुए गमछे को हटा लिया। तब तक मेरे मोबाईल की घंटी बजनी शुरू हो गई थी और मैं स्‍वागतकक्ष से होते हुए बाहर निकल गया।
फोन अग्रज ब्‍लॉगर की थी, मेरे द्वारा लगातार दो पोस्‍ट एक ही दिन में पब्लिश कर देने के संबंध में। बात उनके ताजा पोस्‍ट के संबंध में भी हुई और मैं अग्रज के श्रीमुख से हल्‍दी लगे पत्र का वाकया का आनंद स्‍वानुभूति के साथ लेते हुए बाहर बरांडे में घूमता रहा। इस बीच स्‍वागताध्‍यक्ष द्वार के बाहर मेरे फोन बंद होने का इंतजार करता रहा, शायद उसे मुझसे कोई बात करनी रही होगी सो मैने हाथ के इशारे से अंदर जाने को कहा कि फोन के बाद मैं आकर चर्चा करता हूं। इस बीच स्‍वगातकक्ष में बैठी लड़की (वह लड़की नहीं थी लगभग 34-36 साल की महिला थी) चक्‍के लगे लगेज के साथ एक नये स्‍कापियो के पास आई, ड्राईवर नें बैग गाड़ी में रख लिए वह वापस स्‍वागतकक्ष में चली गई। मेरा फोन चलता रहा, फोन बंद करते ही स्‍वागताध्‍यक्ष बाहर मेरे पास आ गया। मैंने पूछा क्‍यों भाई, इतनी क्‍या आवश्‍यक बात है जो बाहर आ गए।
'सर .. वो लेडी .. जिसे आपने मुह खोलने को कहा था ...' मैंनें कहा कहो यार क्‍या बात है। उसने मुझे दरवाजे से दूर ले जाते हुए जो बतलाया उसका मजमून इस प्रकार है। वह महिला पिछले पांच-छ: दिनों से हमारे होटल में है, अपने पुत्र को बी.ई. में एडमिशन दिलाने आई है। पिछले तीन रात से यह वेटर से 'बच्‍चा' मंगा रही है, तब से हम लोग इस पर निगाह रखे हुए हैं। मैं चकरा गया कि ये कौन से बच्‍चे को मंगाती है, और क्‍या बच्‍चा भी होटलों में सर्व होता है। मेरे शंका पर रिशेप्‍शनिष्‍ट नें समझाया कि यह 'बच्‍चा' क्‍या है, उसने बतलाया कि महगे शराब के एक-दो पैग जितनी मात्रा में छोटी शीशी में जो शराब मिलता है उसे बच्‍चा कहते हैं, (हमने तो अध्‍धी, पौवा सुना था :) । ... तो यह सिद्ध था कि वह रात को शराब पीती है। ... मैने बेफिक्री से कहा कि .. तो क्‍या हुआ। उसने पुन: कहा सर शराब से हमें कोई तकलीफ नहीं थी पर वो पिछली रात एक दो गेस्‍ट के रूम में नाक कर रही थी और गेस्‍ट से बातचीत कर रही थी कि कहॉं से आये है, क्‍या करते हैं, बोर हो रही हूं तो यूं ही आपको नाक कर दिया। एक गेस्‍ट ने शिकायत की और एक गेस्‍ट के साथ वो देर तक बात करते रही। वेटर ने जब उन्‍हें रूम के बजाए लाबी में जाकर बात करने को कहा तो नाराज हो गई थी। किसी तरह समझाकर उन्‍हें उनके रूम में पहुचाया गया। 
आज सबेरे हमने इनका रूम चेकआउट कर दिया यह कहते हुए कि पूरा रूम बुक है कोई रूम खाली नहीं है। दिन भर तो यह नहीं आई अभी शाम से फिर आकर बैठी है कि एक रूम दे दो प्‍लीज। मैने इसके आईडी व पता और इसके पुत्र के संबंध में पूछा, पुत्र एडमीशन के पूर्व एक दिन रूम में साथ रहा, सामने स्‍कार्पियो और ड्राईवर थे, किसी बड़े सरकारी कर्मचारी की पत्‍नी रही होगी, ... ओके। मैंनें कहा तो मुझसे क्‍या हैल्‍प चाहते हो, रिशेप्‍शनिष्‍ट नें कहा सर हो सकता है वो आपसे रिक्‍वेस्‍ट करे और आप बिना पूरा वाकया जाने रूम देने के लिए कह देगें तो हमें रूम देना होगा, और यह फिर नाटक करेगी।
अग्रज प्रो.अली जी का पोस्‍ट मानस से ओझल हुआ ही नहीं था कि यह....। एक और पोस्‍ट में प्रकाशित कहानी पिछले कुछ दिनों से मन को मथ रही है। कुछ और ख्‍यात पोस्‍टों में शब्‍द बाण संधान चालू आहे। पिछले दिनों से ब्‍लॉग पोस्‍टों में पुरूषप्रधान मन को आहत करने वाले दिव्‍यास्‍त्रों का प्रयोग और लक्ष्‍य के बीच नारी विमर्श टाईप का कुछ-कुछ भी प्रस्‍तुत हुआ है। सनातन परंपरा के विभिन्‍न महाकाव्‍यों में विवाहित स्‍त्री के परपुरूष संबंधों पर अलग-अलग ढंग से व्‍याख्‍या और आख्‍यानों का वर्णन हुआ है,  प्रेम पर ओशो नें आधुनिक सदर्भों में वृहद दर्शन परोसा है।  ... पर इन किताबों में मुह छिपाने के बजाए  मैं नारी अस्मिता, नारी विमर्श, यत्र नारी पूज्‍यंते ..... के साथ .... इन वाकयों को किसी अपवाद के साथ स्‍वीकारते हुए,  दिमागी तूफानों  को शांत करने का प्रयास कर रहा हूं .......  देव, मैं पूर्ण एकाग्रता के साथ दिनकर को पढ़ना चाहता हूं।
संजीव तिवारी

आज़ादी ... आज़ादी ... आज़ादी

आज़ादी क्या तीन थके रंगों का नाम है?
जिसे एक पहिया ढोता है?
या इसका कोई और मतलब होता है?
सुदामा पांडे 'धूमिल'
स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनांए

ब्लॉगर्स सम्मेलन और भाषा साहित्य सम्मेलन

"एक समय था जब हिन्दी साहित्य सम्मेलन भारत में आयोजित होता था तब सम्मेलन के पूर्व रैली निकाली जाती थी जिसमें भारी संख्या में हिन्दी प्रेमी ढोल बैंड बाजों के साथ आगे चलते थे और राजनीति से जुडे लोग उनका समर्थन करते हुए पीछे चलते थे. प्रशासन व जनता दोनो, उत्साह के साथ हिन्दी सम्मेलनों में अपनी व्यक्तिगत रूचि से सम्मिलित होते थे. जिसमें हिन्दी पाठकों का लेखकों के प्रति सम्मान देखते बनता था. आज के समय में यह सम्मान खो गया है. ....... "   केंद्रीय ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और वरिष्ठ कवि, अशोक वाजपेयी नें पिछले दिनो यह कहा. वे पं. रविशंकर शुक्ल व्याख्यानमाला के अंतर्गत बुधवार को कल्याण महाविद्यालय भिलाई के सभागार में आयोजित व्याख्यान "आज का समय" पर बोल रहे थे.

प्रमुख वक्ता के रूप में विचार व्यक्त करते उन्होने असम के क्षेत्रीय भाषा के एक ऐसे सम्मेलन के संबंध में बतलाया जिसमें वे असमिया के प्रसिद्ध साहित्यकारों के साथ मंच में उपस्थित थे. "गुवहाटी से 35 किलोमीटर दूर हाजो शहर में मुझे साहित्य सभा के सम्मेलन उध्दाटन करने आमंत्रित किया गया, वहां मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा पंडाल देखा. जहां डेढ़ लाख लोग मौजूद थे, उस स्थान पर मुझे काफी अचरज हुआ कि असम जैसे छोटे व अहिंदी भाषी प्रांत में माताएं बच्चों को लेकर साहित्य सम्मेलन में पहुंची थी. पूछने पर पता चला कि वहां की माताएं बच्चों को लेकर साहित्यिक आयोजन में इसलिए आती हैं ताकि वे अपने बच्चों को लेखकों से परिचय करा सकें. हमारे यहां यह बात नजर नहीं आती. यह भी कटु सत्य है कि असम में किसी बच्चे का संस्कार तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक वो अपने प्रारंभिक जीवन में अपने प्रदेश के किसी साहित्यिक अधिवेशन का हिस्सा न बनें"

वहां उन्होने प्रत्यक्ष देखा कि सम्मेलन में आई युवा महिलायें अपने बच्चों के साथ समय मिलते ही स्टेज के पास से गुजरती थी और अतिथियों की ओर उंगली से इशारे करते हुए असमिया में अपने बच्चों को कुछ बतलाती थी. लगातार हो रहे इस क्रम के कारण उन्होनें असमिया साहित्यकार से पूछा कि यह महिलायें क्या कर रही है. तो उस असमिया साहित्यकार नें बतलाया कि युवा महिलायें अपने बच्चों को स्टेज के पास ला-ला कर असमिया साहित्यकारों का पहचान करा रही हैं. क्योकि वे असमिया भाषा के साहित्य और साहित्यकारों का सम्मान करती हैं और अगली पीढी को भी इस परंपरा का संस्कार डाल रही हैं. "अहिन्दी भाषी राज्य में साहित्यकारों के प्रति इतना सम्मान हमारे हिन्दी भाषी राज्यों में कहां मिलेगा. असम जैसे अशांत राज्य में जहां कि हिंसा ज्यादा हो रही है, भाषा के प्रति अनुराग काबिले तारीफ है."

बहरहाल हिन्दी ब्लॉगरी से जुडा होने के कारण मै आशांवित हूँ कि भविष्य मे हिन्दी ब्लॉगर्स सम्मेलनो के सम्बन्ध मे भी साहित्यकारो द्वारा कुछ ना कुछ 'एतिहासिक' कहा जायेगा. इसलिये सम्मेलनो का महत्व समझते हुए जहां भी ब्लॉगर्स सम्मेलन हो भारी से भारी संख्या मे उपस्थित होकर अपने आप को हिन्दी को समृद्ध बनाये.

इस कार्यक्रम के कुछ चित्र  पिछले पोस्ट में उपलब्ध है. 

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया ......

भिलाई में इन दिनों नगर पालिक निगम द्वारा अवैध कब्‍जा हटाओ अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान में पूरी की पूरी बस्‍ती को उजाड कर करोडो की जमीन अवैध कब्‍जों से छुडाई जा रही है. लोगों से पूछो तो ज्‍यादातर का कहना है कि निगम द्वारा व्‍यवस्‍थापन कर इन्‍हें दूसरा मकान दे दिया गया है पर ये निगम द्वारा दिये गये मकान को उंची कीमत में बेंचकर यहां कब्‍जा जमाए हुए है. यह सच भी है कि भिलाई में कई ऐसे झुग्‍गी झोपडी में रहने वाले करोडपति हैं. और इन्‍हें अवैध कब्‍जा करने के जहां भी मौके मिलते हैं जमीन कब्‍जा कर लेते हैं और पहले कब्‍जा की गई जमीन को उंची दाम में बेच देते हैं. अब सही कुछ भी हो, घर से बेघर होने के कुछ चित्र मेरे मोबाईल कैमरे की नजर से ---- 

अपने टूटते घर को देखकर बिलखती एक बालिका
बेधरबार हुए एक वृद्ध महिला से टीवी वाले ने लिया साक्षात्‍कार
झपटता रहा तोडक मशीन
नगर निगम के डंडा छाप सुरक्षा कर्मचारियों के साथ
अपने अंतिम समय में वसीयत में अब क्‍या लिखवायें
पुलिस तो है प्रशासन का मौसेरा भाई
नेताओं नें भी इससे अपनी राजनीति चमकाई
और मुहल्‍ले का अंतिम घर भी टूटा
साहब का आदेश पूरा हुआ : नगर निगम के अधिकारी
अब यही होटल कम माल बनेगा यहां

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...