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मई, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

मशहूर छत्तीसगढी लोकगीत : टूरा नई जाने रे . . .

अपनी मदमाती आवाज से सुपर हिट छत्तीसगढी लोकगीत “टूरा नई जाने रे, ठोली बोली मया के ...” के जरिये लाखों लोकसंगीत प्रेमियों के दिलों में जगह बनाने वाली मशहूर छत्तीसगढी लोक गायिका सीमा कौशिक नें ख्वाब में भी नही सोंचा था कि जिस गीत को वे सचमुच में बोली ठोली करने लिख रही हैं, वही गाना उन्हे एक दिन लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा देगा । अपनी मदमाती आवाज से सुपर हिट छत्तीसगढी लोकगीत “टूरा नई जाने रे, ठोली बोली मया के ...” के जरिये लाखों लोकसंगीत प्रेमियों के दिलों में जगह बनाने वाली यह लोक कलाकार भरथरी गायन के विधा से छत्तीसगढी लोकगीतों की दुनियां में आयी, दूधमोंगरा से जुडी और फिर हिट पे हिट छत्तीसगढी गीत संगीत देते हुए अभी छत्तीसगढ की लता मंगेशकर बन चुकी हैं प्रेम गीतों (जिन्हे छत्तीसगढ में ददरिया के रूप में जाना जाता है) की प्रस्तुति में उनका स्वर जादू चलाता है । जो लोग बीच के वर्षों में फूहड गीतों के चलते ददरिया से विमुख हो चुके थे वे भी फिर से सीमा के गाने के दीवाने हो चुके हैं । ग्राम इंदौरी दुर्ग की मूल निवासी ३६ वर्षीय सीमा के पिता एक किसान थे दसवीं तक पढी सीमा ट्रासपोर्टर पति के साथ छत्

वृष को तरनि तेज सहसा किरन करि . . . . नवतपा शुरु

जेष्ठ माह में जब सूर्य सबसे ठंडा ग्रह चंद्र के नक्षत्र रोहिणी ( ईस पर सूर्य का भी अधिकार है ) वृष राशि मे प्रवेश करता है तभी नवतपा शुरु होता है । आज शाम सूर्य रोहिणी में प्रवेश करेगा उसी समय से नवतपा शुरू हो जायेगा जो ९ दिन चलेगा। २५ मई से ही बुध वृष राशि से मिथुन राशि मे प्रवेश करेगा। ज्यादतर देखा गया कि जब बुध सूर्य से आगे चला जाता है तभी पानी गिरता है।२५ मई शाम को चंद्र भी सिंह राषि में प्रवेश करेगा यानि स्वगृही बुध चंद्र से एकादस स्थान में चला जायेगा जो गर्मी से राहत दिलायेगा । उस समय नीच चंद्र के उपर सूर्य की दृष्टि भी रहेगी । २५ मई को ही मंगल मीन राषि, गुरु वृष्चिक राशि, राहु कुम्भ राषि व शनि कर्क, शुक्र मिथुन, राषि मे रहेगा । ईसी स्थितियों के कारण नवतपा में बीच बीच मे पानी भी गिरते रहेगा व लू का असर भी कम होगा । ये तो रही खगोलीय स्थिति ईस नवतपा के सम्बन्ध मे हमारे साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि सेनापति ने जो लिखा है वो आज मन बार बार गुनगुना रहा है आप लोगो को अर्ज करता हू (कही गलती होगी तो सुधार लिजियेगा 1982 मे याद किया था भूल हो सकती है) वृष को तरनि तेज सहसा किरन करि ज्वालन के ज

नारद कुछ तो है पर सबकुछ नही है

हिन्दी चिट्ठाकारों की फौज कुल जमा 1000 जिसमें से सक्रिय चिट्ठे 500, पाठक इन्ही मे से संख्या अंजान, जिनके सहारे पूरा हिन्दी अंतरजाल संसार टिका है । विगत दिनो हिन्दी चिठ्ठो को बढाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ मे मेरे द्वारा जो आंशिक प्रयाश किये गये उसमे यह बात खुल कर आयी कि भारतीय आग्ल चिठ्ठाकार यह सोचता है कि हम हिन्दी चिठ्ठाकार अपनी लेखनी को पढवाने के लिये हिन्दी व हिन्दी चिठ्ठाजगत की बात करते है क्योकि उनका चिंतन है हिन्दी चिठ्ठो के पाठक कम है और जो हिन्दी चिठ्ठा लिखेगा वो दूसरो के चिठ्ठो को पढेगा ही यदि उनकी बातो को माने तो हमारे पाठक सक्रिय चिट्ठे 500 के चिट्ठाकार ही है जो एक दूसरे के चिठ्ठो को पढते है यानी चटका लगाते है । हमारी जानकारी के अनुसार हिन्दी चिट्ठाकारों के मानक फीड एग्रगेटर दो हैं नारद महाराज व हिन्दी ब्लाग डाट काम इनके सहारे ही 500 ब्लाग के धमनियों में रक्त का प्रवाह हो पाता है । नारद महाराज के यहा विवाद के बावजूद यह देखने सुनने को मिलता है कि किसके व्लाग में कितना चटका लगा, यह चटका ही उस लेख की लोकप्रियता का आधार है । नारद में बाकायदा चटकों के रिकार्ड के साथ इस दिन,

अश्लीलता शब्द की अवधारणा

अश्लीलता शब्द की अवधारणा के संबंध में सदैव विवाद रहा है समय काल व परिस्थितियों के अनुसार इसकी परिभाषा बदलते रही है अभी पिछले वर्ष दिसम्बर २००६ में अजय गोस्वामी बनाम भारत सन्घ व अन्य के वाद से संबंधित एक महत्वपूर्ण मुकदमें में सुप्रीम कोर्ट नें इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार किया एवं वकीलों के तर्क वितर्क के पश्च्यात निर्णय सुनाया । अश्लीलता के संबंध में भारत के न्यायालयों में चल रहे व निर्णित वादों एवं वर्तमान परिवेश में इस संबंध में चल रहे अटकलों एवं समाज में व्याप्त चिंतन पर स्पष्ट प्रकाश डालने में यह न्याय निर्णय अगले कुछ बरसो तक सक्षम साबित होगा . इस वाद में वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं अश्लीलता का विस्तृत विवेचन किया गया है । जिसमें अश्लीलता के उस पहलू पर विचार किया गया है जो विज्ञापनों के द्वारा बाल व किशोर मन में अश्लीलता को जगाता है । इस वाद का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें प्रतिवादी के रूप में भारत के दो जाने माने पत्र समूह हिन्दुस्तान टाईम्स व टाईम्स आफ इंडिया के साथ ही प्रेस कौंसिल आफ इंडिया का नाम भी है । इस वाद में अश्लीलता को परिभाषित करने के लिये समसामयिक

मेरी तीन अधूरी कवितायें

आज मैं अपनी १९९० की डायरी के पन्नों में जीवंत मेरे कवि मन को पाकर काफी खुश हुआ उसमें दस बारह कवितायें बार बार काट छांट के साथ लिखी गयी हैं । मेरी व्यक्तिगत सोंच है कि यदि व्यक्ति अपनी लेखनी में, एक बार लिख लेने के बाद उस पर सुधार करता है तब वो लम्हे वो परिस्थितियां व्यक्ति के हार्डडिस्क के किसी कोने में फारमेटिंग के कुप्रभाव से दूर लंबे समय तक सेव्ड हो जाता है । जैसे ही उस पल की कोई निशानी सामने आती है तो वरसों पुरानी कहानी जीवंत हो जाती है। मेरी डायरी के पन्नों में लिखी कुछ कविताओं के कुछ अंश आपको अर्ज करता हूं इसके बीच के हिस्सों में कुछ व्यक्तिगत पद हैं इसलिए उन्हें मैं यहां प्रस्तुत नही कर रहा हूं - १. प्रियतम घूंघट निकारे आंचल सजाये, चली जा रही हो वो किस ठांव है प्रिय । xxx xxx xxx स्वप्नों में शाश्वत का श्रृंगार कर के मेंहदी रचाई हो, किस ठांव है प्रिय । xxx xxx xxx तेरी हर खुशी ही तो संबल था मेरा तू खुश है जहां, वो किस ठांव है प्रिय । xxx xxx xxx भावों को शव्दों का आधार देकर मुझे छोड आई हो, किस ठांव है प्रिय । xxx xxx xxx २.

भूमि अधिग्रहण अधिनियम : “लोक प्रयोजन” का व्यूह

दिल्ली से अधिवक्ता मित्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रिट पिटीशन नं २२४/२००७, कर्नाटक भूमिहीन किसान संगठन व अन्य विरुद्ध भारत सरकार व अन्य दिनाक ११ मई को न्यायाधिपति आर वी रविंद्रन व एच एस बेदी के बेंच में नियत ईस प्रकरण की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधिपति के जी बालकृशनन ने प्रकरण मे निहित विधि के प्रश्न “लोक प्रयोजन” पर कहा कि केंद्र व राज्य शासन को लोक प्रयोजन के मसले पर प्रस्तुत पिटीशनो पर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अन्य उपबंधों के तहत प्रस्तुत पिटीशनो से ज्यादा गम्भीरता पुर्वक अपने दायित्वों को समझना चाहिये इस संबंध मे न्यायालया ने सभी राज्यो के मुख्य सचिव व कृषि मंत्रालय को नोटिस भेजा है । मै इस समाचार को छत्तीसगढ के नजरिये से देखते हुये अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं यहा शासन ने लोक प्रयोजन शब्द को अपने हित मे अर्थान्वयन करवाने के लिये जो व्यूह रची यह देखे :- छत्तीसगढ में अभी टाटा के संयंत्र के लिये भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है जहा अधिग्रहण पूरी तरह से विवादित है नक्सलियो की जन अदालत की तर्ज पर ग्राम सभा मे प्राप्त किसानों की स्वीकृति व १३ लकीरों मे छिन चु

माया मिश्रा मेल ः असर छत्तीसगढ तक

उत्तर प्रदेश मे मायावती की जीत से छत्तीसगढ मे एक नया समीकरण बनता नजर आ रहा है . उत्तर प्रदेश मे माया की जीत को यहा के ब्राह्मण एक नये युग की शुरुआत के रूप मे देख रहे है छत्तीसगढ के 99 प्रतिशत ब्राह्मण उत्तर प्रदेश से व 1 प्रतिशत राजस्थान से बरसो पहले आकर छत्तीसगढ मे बस गये थे और यहा की भाषा व सन्सकृति उत्तर प्रदेश की सरयु की पानी मे घुल कर महानदी, अरपा, शिवनाथ व खारून मे समहित हो गयी थी समय ने उन्हे पूरी तरह से छत्तीसगढया बना दिया था यह सर्वविदित है कि छत्तीसगढ के मूल निवासी आदिवासी ही रहे है किन्तु अयोध्याकालीन धार्मिक इतिहास को प्रमाणिक माना जाय तो दण्कारण्य व कौशल क्षेत्र मे ऋषि मुनियो का निवास अर्वाचीन काल से रहा है खैर हम यहा इतिहास बताने के लिये नही लिख रहे है पर उत्तर प्रदेश के सरयू के किनारे निवासरत ब्राह्मणो का यहा पर आगमन मोरध्व्ज के काल से माना जाता है जो आज तक जारी है पृथक छत्तीसगढ आन्दोलन अपने अन्तिम चरण मे था तो कुछ स्वार्थी तत्वो ने उस समय छत्तीसगढया गैरछत्तीसगढ शब्दो का एसा ताना बाना रचा जिससे छत्तीसगढ के ब्राह्मण मानसिक रूप से काफी आहत हुये थे और उनकी वेदना समय स

एडवांटेज छत्तीसगढ : विजन २०१०

दैनिक भास्कर समूह नें आज छत्तीसगढ में एडवांटेज छत्तीसगढ विजन २०१० का वितरण छत्तीसगढ के प्रमुख व्यक्तियों को किया इस बहुप्रतिक्षित पुस्तक का छत्तीसगढ के प्रबुद्ध जनता एवं छत्तीसगढ के विकास में सहभागिता साबित करने वालों को बेसब्री से इंतजार था तेजी से बढते अखबार दैनिक भास्कर नें छत्तीसगढ सहित पूरे देश में अपनी व्यावसायिक क्षमता एवं पत्रकारिता के बल पर प्रकाशन की ऐसी श्रृखला को रचा है जो किसी समाचार पत्र की बढती लोकप्रियता का स्पष्ट उदाहरण है । देश की जनता में बेहद लोकप्रिय हो चुके अखबार के द्धारा छत्तीसगढ के विकास से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज के प्रकाशन, जिसके संबंध में रोज बडे बडे विज्ञापन छापे जा रहे थे, को पढने के लिए लोग उत्सुक थे जिसका इंतजार आज खत्म हो गया । अन्य व्यक्तियों के साथ ही भिलाई भास्कर के द्धारा मेरे संगठन को यह विजन स्टेटमेंट आज प्राप्त हुआ । बहुप्रतीक्षित एवं बहुचर्चित होने के कारण मैं इसे हांथ में आते ही चट कर गया क्योंकि बहुत ही आकर्षक तरीके से बाइंडिंग और ग्लैजड A4 पेपर में रंगीन मुद्रित १०० पेज का यह स्टेटमेंट छत्तीसगढ के विकास की गाथा कहने को बेताब दिख रहा था ।

रूद्राक्ष प्रयोग : रत्न परीक्षण का आधार (ज्योतिष)

इस लेख का कोई वैज्ञानिक आधार नही है यह पूर्णतया मान्यताओं पर आधारित है जो व्यक्ति ज्योतिष, पराशक्ति आदि में विश्वास रखता है उनके लिये हम इसे प्रस्तुत कर रहे हैं । विश्व के प्राय: हर देश में रत्नों के लिए स्वाभविक आकर्षण प्रारंभ से रहा है । रत्नों के लुभावने रंग व आभा समूचे संसार का मन भावन रहा है । रत्नों का प्रयोग आभूषणों के लिए प्राचीन काल में होता था किन्तु ज्योतिषीय मतों के अनुसार उसमें निहित दैवीय प्रभाव नें मनुष्य को उसके प्रति आकर्षण को और बढा दिया है । इसी के कारण आजकल १०० में से ८० व्यक्तियों के हांथों की उंगलियों में रत्नजडित अंगूठियों को देखा जा सकता है । ज्योतिष के सिद्धांतों पर यदि हम विश्वास करें तो रत्नों का प्रभाव मनुष्य के जीवन में पडता है । रत्न मनुष्य को उसके जन्म कालिक ग्रहों की स्थितियों एवं वर्तमान काल की ग्रहीय स्थितियों के अनुसार फल देते हैं । विवादों के बाद भी यह माना जा रहा है कि रत्नों के धारण करने मात्र से समयानुसार आने वाली मनुष्य की परेशानिया कम या समाप्त हो जाती है । इसी के कारण व्यावसायिक ज्योतिषियों के खजाने भरते जा रहे हैं । रत्नों के प्रति हमारे रूझान

आत्ममुग्धता के वसीभूत चिटठाकार : आरंभ

फुरसतिया जी ने अपने चिटठे में एक बार लिखा था कि कुछ चिटठाकार आत्ममुग्धता के वसीभूत होते हैं जिसपर मैनें स्वीकार किया था कि मैं स्वयं इसका शिकार रहा हूं । पिछले दो चिटठे में मेरी आत्ममुग्धता को पुन: बल मिल गया । छत्तीसगढ के सामयिक समाचारों को लिखनें की अतिउत्सुकता एवं एक चिटठाकार होने के दायित्व के निर्वहन की थोथी मंशा के कारण पिछले पोस्ट में मुझसे गलती हो गयी जो चिटठाकारिता के अलिखित संविधान का उलंघन था । उक्त पोस्ट के नारद पर आने के तुरंत बाद मेरे मित्रों नें मुझे फोन कर के “३६ गढ” को तत्काल हटाने के लिए फोन किया पर मैं उस समय इंटरनेट उपयोग क्षेत्र से दूर था जब नेट क्षेत्र में आया तो इंटरनेट कैफे के पुरानी मशीनों एवं धीमी गति के नेट के चक्कर में कई कोशिस करने के बाद भी पोस्ट एडिट नही हो पाया तब तक गलती आम हो गयी थी, छुपाने का समय नही था । चिटठाकार का सामाजिक दायित्व होना चाहिए सहीं तथ्यों को चिटठे में प्रदर्शित करना यदि कोई जानकारी अधूरी है तथ्यपरक नही है तब उस पर अपने स्वयं की जानकारी के अनुसार जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। मैने पिछले पोस्ट में “३६ गढ के स्कूलों में .... गोम

३६ गढ के स्कूलों में बच्चों पर गो मूत्र का छिडकाव : पवित्रीकरण

समाचारों में आदिवासी ईलाकों के स्कूलों में शिक्षकों के द्वारा दलित बच्चो पर पवित्रीकरण के लिये गो मूत्र के छिडकव करने की सूचना मिलने पर - सचमुच में यह बहुत बडी विडंबना है कि हम आज भी आदम के युग से उबर नही पाये हैं । हमारी यही प्रवृत्ति के कारण ही समाज में भाई‍ चारा कायम नही हो पा रहा है पर जब भी ऐसे समाचार मुझे झकझोरते हैं, मैं अपने अतीत को झांकता हूं । मैं एक मालगुजार परिवार से हूं, जहां मेरे दादा मालगुजार थे यानी आस पास के चार गावों के पालनहार या तानाशाह । 60 के दसक की जानकारी जो मुझे मेरे परिवार जन देते थे तब की कुछ यादें आज भी शेष हैं । दादा जी का खौफ़ कुछ एसा था कि हमारे घर के सामने की गली से हर कोई अपने जूते उतार कर चलता था चाहे कितनी भी तेज तपिश हो यदि दूसरे स्‍थान में रहने वाला तनिक विकासवादी या अनजान, जूते के साथ हमारी गली में दाखिल हुआ नही कि मेरे दादा के गुर्गे जो साहू, निषाद, सेन व यादव हुआ करते थे अपने ही जात भईयों को मेरे दादा के प्रति स्वामिभक्ति एवं चाटुकारिता प्रदर्शित करने के लिये बेरहमी से पीटते थे और अपने मूछों में ताव देते थे । मेरे दादा स्‍वयं इसके लिए हमारे नौं

बिजली कर्मियो का बटवारा म प्र एव छत्तीसगढ मे एक दिवा स्वप्न

छत्तीसगढ राज्य निर्माण के बाद से मध्य प्रदेश विधुत मण्डल व छत्तीसगढ राज्य विधुत मण्डल के बीच कर्मियो का बटवारा प्रशासनिक स्तर से होते हुए न्यायिक स्तर तक पहुच गया है किन्तु दोनो राज्यो के कर्मचारी अपने अपने राज्य मे अपने अपने राज्य के विधुत मण्डल मे सेवा करने की आश सजोये पिछले सात साल से अधर मे लटके जी रहे है । इनकी विडम्बना यह है कि इनके परिवार व घर मे इनकी आवश्यकता महती है फिर भी ये अपने घर से काफी दूर मे निवास करने के लिये मजबूर है, किसी का बूढा बाप बीमार है तो किसी का घर खेत बन्जर हो रहा है । सूत्र बताते है कि यह समस्या छत्तीसगढ के कर्मचारी जो अविभाजित मध्य प्रदेश मे सेवारत थे उनकी ज्यादा है क्योकि मध्य प्रदेश विधुत मण्डल से ज्यादा वेतन व सुविधाये छत्तीसगढ राज्य विधुत मण्डल द्वारा दी जा रही है जिसके कारण मध्य प्रदेश के कर्मचारी जो छत्तीसगढ राज्य विधुत मण्डल मे वर्तमान मे सेवारत है वे मध्य प्रदेश जाना नही चाहते जबकि छत्तीसगढ के कर्मचारी जो मध्य प्रदेश विधुत मण्डल मे सेवारत है वे अपने गाव व घर के करीब नौकरी करना चाहते है उनके लिये वेतन का उतना महत्व नही है । बिजली कर्मियो के बटवारे