छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा में एक गम्मत खेला जाता है। इस गम्मत में नायक की शादी होने वाली रहती है, गांव का एक बुजुर्ग व्यक्ति उनके सामने बहुत सारी लड़कियों को लाकर एक-एक करके पूछता है।
सबसे पहले ब्राह्मण लड़की को सामने लाकर पूछता है कि इससे शादी करोगे? नायक कहता है, नही। इससे शादी करने के बाद दिन भर इसके पांव पड़ते-पड़ते मेरा माथा 'खिया' जाएगा। राजपूत लड़की के लिए कहता है कि, इससे शादी करने पर यह मुझे 'दबकार-दबकार के झोल्टु राम' बना देगी। इसी तरह अन्य समाज की लड़कियोँ को उनके जातिगत विद्रूपों को उधेड़ते हुए, नायक विवाह से इंकार कर देता है। अंत मे एक मैला ढोने वाली की बेटी को उसके सामने लाकर पूछा जाता है कि क्या इससे शादी करोगे?
नायक कहता है कि इसे पहले ही क्यूँ नही लाये, 'लउहे लगन धरावव' मैं इसी से शादी करूँगा। उससे पूछा जाता है कि ऐसी क्या खूबी है इसमें जो ब्राह्मण, ठाकुर जाति की आदि सुंदर लड़कियों को ठुकरा कर इस लड़की से शादी करना चाहते हो?
नायक कहता है क्योंकि यह लोगों को स्वच्छ रखने के लिए, दूसरों के घरों का मैला साफ करती है। 'रोग-राई' दूर करने वाली देवी है।
नायक के भोलेपन से बोले गए संवाद और स्वाभाविक इम्प्रोवाइजेशन से दर्शक हँसते-हँसते लोटपोट होते है। तीक्ष्ण व्यंग्य जाति-समाज में पैठे आडम्बर को परत दर परत उधेड़ता है। देखते ही देखते, गम्मत के क्लाइमेक्स में बावरा सा यह नायक इतना गंभीर संदेश संप्रेषित कर देता है।
हालांकि अब मैला ढोने की प्रथा समाप्त हो गई और बहुत हद तक जाति-पाति का भेद भी मिट गया। इसके बावजूद नाचा में ऐसे पारंपरिक गम्मत आज भी 'खेले' जाते हैं। नाचा के वर्तमान संदर्भों पर चर्चा करते हुए डॉ. परदेशीराम वर्मा कहते हैं कि पिछले सौ साल से छत्तीसगढ़ के लोक में, स्वच्छता अभियान का इस तरह से अलख जगाने का काम, यहां के लोक कलाकार करते रहे हैं। वे कहते हैं कि इस गम्मत को मोदी जी को दिखाना चाहिए।
- संजीव तिवारी
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नाचा का एक गम्मत : भकला के लगन
राजधानी में पारम्परिक नाचा के दीवाने
पिछले दिनों रायपुर के एक प्रेस से पत्रकार मित्र का फोन आया कि संस्कृति विभाग द्वारा राजधानी में पहले व तीसरे रविवार को मुख्यमंत्री निवास के बाजू में नाचा - गम्मत का एक घंटे का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है इस पर आपकी राय क्या है तो मैंने छूटते ही कहा था कि छत्तीसगढ़ की पारम्परिक विधा नाचा रात से आरंभ होकर सुबह 'पंगपंगात' ले चलने वाला आयोजन है जिसमें एक-एक गम्मत एक-दो घंटे का होता है, आगाज व जोक्कड़ों का हास्य प्रदर्शन, जनउला गीत ही लगभग एक-डेढ़ घंटे का होता है तब कहीं जाकर सिर में लोटा 'बोहे' परी दर्शकों के पीछे से गाना गाते प्रकट होती है 'कोने जंगल कोने झाड़ी हो ......' इसके बाद प्रहसन रूप में शिक्षाप्रद कथाओं का गम्मतिहा नाट्य मंचन होता है। ऐसे में विभाग के द्वारा इतने सीमित समय में इस आयोजन को समेटने से इसका मूल स्वरूप खो सा जायेगा। बात आई-गई हो गई।
आज राजधानी के आनलाईन समाचार पत्रों के पिछले पन्ने पलटते हुए इस कार्यक्रम का समाचार नजर आया तो रायपुर में मित्रों को फोन मिलाया और सिंहावलोकन वाले राहुल सिंह जी से इस सफल आयोजन के संबंध में विस्तृत जानकारी व फोटो मांग लाया। मित्रों व राहुल सिंह जी से प्राप्त जानकारी के अनुसार रायपुर के नागरी परिवेश में छत्तीसगढ़ की यह संस्कृति जब मंच पर उतरी तो लोग अभिभूत होकर देखते ही रह गए। साज-सज्जा से कोसो दूर होने के बावजूद यह कार्यक्रम जैसे ही शुरू हुआ, लोगों की भीड़ जुटने लगी। इसमें प्रदेश के कलाकारों द्वारा छत्तीसगढ़ की मूल सांस्कृतिक धरोहर नाचा को बेहतरीन तरीके से मंच पर प्रस्तुत किया गया।
शुरुआत लोक गायिका किरण शर्मा द्वारा गणपति वंदना तै मूसुवा में चढ़ के आजा गणपति से हुई। इसके बाद एक से बढ़कर एक लोकगीतों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बांधे रखा। भरथरी, देवार, नाचा व कर्मा गीतों की प्रस्तुतियों ने लोगों को अपनी माटी की खुशबू को करीब से जानने का मौका दिया। फिर शुरू हुआ हास्य गम्मत प्रहसन का दौर। इसके मुख्य कलाकार रामलाल निर्मलकर की प्रस्तुति को देखने के लिए लोग बेताब नजर आएँ। ये उन चुनिंदा कलाकारों में से एक हैं, जिन्होंने हबीब तनवीर के साथ काम किया है। गड़बड़ गपशप शीर्षक पर आधारित इस गम्मत ने जहाँ दर्शकों का मनोरंजन किया, वहीं सशक्त संदेश भी दिया। इसमें पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे व्यक्ति की वजह से कलह मच जाती है, पर बाद में सच्चाई पता होने पर उन्हें बहुत पछतावा होता है। इसमें यही संदेश देने की कोशिश की गई, कभी भी दूसरों की बातों में आकर गलतफहमी का शिकार न होवें। इसे कलाकारों ने न केवल अभिनय के जरिए बल्कि नृत्य व संगीत के साथ प्रस्तुत किया।
दर्शकों की उपस्थिति और खासकर बच्चों की उत्साहपूर्वक सहभागिता ने मानों साबित किया कि टीवी पर ढ़र्रे वाले सतही कार्यक्रम और फूहड़ता को देखना लोगों की मजबूरी है अगर उन्हें सहज, सुलभ मनोरंजक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां उपलब्ध कराई जाय तो इसकी दर्शक संख्या अभी भी कम नहीं. रामलाल, अछोटा, धमतरी पार्टी के साथ, मंदराजी सम्मान प्राप्त कलाकार मानदास टंडन का गायन व चिकारा वादन, सुश्री किरण शर्मा का लोकगीत गायन व नृत्य, लच्छी-दुर्योधन की जोड़ी की भी प्रस्तुतियां थीं. निरंजन महावर जी और आयुक्त संस्कृति राजीव श्रीवास्तव जी विशेष रूप से उपस्थित रहे. निसार अली ने संयोजन में सहयोग दिया.
छत्तीसगढ़ी नाचा को मंच देने और लोगों को इससे रूबरू कराने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग और नाचा थियेटर द्वारा हर माह के पहले और तीसरे रविवार को यह कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। अगली प्रस्तुति में नाचा के साथ छत्तीसगढ़ी संस्कृति का आनंद लेने के लिये अभी से तैयार रहें ..
आज राजधानी के आनलाईन समाचार पत्रों के पिछले पन्ने पलटते हुए इस कार्यक्रम का समाचार नजर आया तो रायपुर में मित्रों को फोन मिलाया और सिंहावलोकन वाले राहुल सिंह जी से इस सफल आयोजन के संबंध में विस्तृत जानकारी व फोटो मांग लाया। मित्रों व राहुल सिंह जी से प्राप्त जानकारी के अनुसार रायपुर के नागरी परिवेश में छत्तीसगढ़ की यह संस्कृति जब मंच पर उतरी तो लोग अभिभूत होकर देखते ही रह गए। साज-सज्जा से कोसो दूर होने के बावजूद यह कार्यक्रम जैसे ही शुरू हुआ, लोगों की भीड़ जुटने लगी। इसमें प्रदेश के कलाकारों द्वारा छत्तीसगढ़ की मूल सांस्कृतिक धरोहर नाचा को बेहतरीन तरीके से मंच पर प्रस्तुत किया गया।
शुरुआत लोक गायिका किरण शर्मा द्वारा गणपति वंदना तै मूसुवा में चढ़ के आजा गणपति से हुई। इसके बाद एक से बढ़कर एक लोकगीतों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को बांधे रखा। भरथरी, देवार, नाचा व कर्मा गीतों की प्रस्तुतियों ने लोगों को अपनी माटी की खुशबू को करीब से जानने का मौका दिया। फिर शुरू हुआ हास्य गम्मत प्रहसन का दौर। इसके मुख्य कलाकार रामलाल निर्मलकर की प्रस्तुति को देखने के लिए लोग बेताब नजर आएँ। ये उन चुनिंदा कलाकारों में से एक हैं, जिन्होंने हबीब तनवीर के साथ काम किया है। गड़बड़ गपशप शीर्षक पर आधारित इस गम्मत ने जहाँ दर्शकों का मनोरंजन किया, वहीं सशक्त संदेश भी दिया। इसमें पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे व्यक्ति की वजह से कलह मच जाती है, पर बाद में सच्चाई पता होने पर उन्हें बहुत पछतावा होता है। इसमें यही संदेश देने की कोशिश की गई, कभी भी दूसरों की बातों में आकर गलतफहमी का शिकार न होवें। इसे कलाकारों ने न केवल अभिनय के जरिए बल्कि नृत्य व संगीत के साथ प्रस्तुत किया।
दर्शकों की उपस्थिति और खासकर बच्चों की उत्साहपूर्वक सहभागिता ने मानों साबित किया कि टीवी पर ढ़र्रे वाले सतही कार्यक्रम और फूहड़ता को देखना लोगों की मजबूरी है अगर उन्हें सहज, सुलभ मनोरंजक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां उपलब्ध कराई जाय तो इसकी दर्शक संख्या अभी भी कम नहीं. रामलाल, अछोटा, धमतरी पार्टी के साथ, मंदराजी सम्मान प्राप्त कलाकार मानदास टंडन का गायन व चिकारा वादन, सुश्री किरण शर्मा का लोकगीत गायन व नृत्य, लच्छी-दुर्योधन की जोड़ी की भी प्रस्तुतियां थीं. निरंजन महावर जी और आयुक्त संस्कृति राजीव श्रीवास्तव जी विशेष रूप से उपस्थित रहे. निसार अली ने संयोजन में सहयोग दिया.
छत्तीसगढ़ी नाचा को मंच देने और लोगों को इससे रूबरू कराने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग और नाचा थियेटर द्वारा हर माह के पहले और तीसरे रविवार को यह कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। अगली प्रस्तुति में नाचा के साथ छत्तीसगढ़ी संस्कृति का आनंद लेने के लिये अभी से तैयार रहें ..
हबीब तनवीर के ख्यात नाचा कलाकार गोविंद निर्मलकर लौटाएंगे पद्मश्री
आज के सांध्य दैनिक में इस समाचार को पढ़कर मैं सकते में आ गया अभी दो दिन पहले ही हबीब तनवीर जी की पुण्यतिथि पर साथी ब्लॉगरों नें पोस्ट लगाया और भाइयों नें टिप्पणियां भी की और ताने भी मारे कि हबीब जी की पुण्य तिथि छत्तीसगढ़ को याद रखना चाहिए. यद्धपि भाईयों को पता ही नहीं था कि छत्तीसगढ़ हबीब के सम्मान में पूरे एक सप्ताह का कार्यक्रम कर रहा है. और याद करने वाले दिल याद कर रहे हैं। खैर .... आवारा बंजारा का पोस्ट पढ़ नहीं पाये होंगें! इससे उबर ही नहीं पाया था कि यह समाचार नजर आया, तब हबीब तनवीर और गोविंद निर्मलकर पुन: स्मृति में छा गए।
दैनिक छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव संवाददाता प्रदीप मेश्राम नें गोविंद निर्मलकर से मिलकर उनका दुख समाचार पत्र के मुख्य पृष्ट में ही उकेरा है. उन्होंनें लिखा है कि विश्व धरोहर बनने वाली, छत्तीसगढ़ संस्कृति से जुड़ी लोक नाट्य शैली 'नाचा' के कलाकार पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित गोविंदराम निर्मलकर अपना सम्मान और पदक लौटाना चाहते हैं। वे अपनी परेशानी का सबसे बड़ा कारण इस सम्मान को मानते हैं। वे कहते हैं - 'लोग यह समझते हैं कि पद्मश्री से सम्मानित होने के कारण मुझे दिल्ली से बहुत पैसा मिला होगा, इसलिए रिश्तेदार से लेकर पड़ोसी तक आर्थिक सहायता नहीं देते। जबकि हकीकत सरकार जानती है। मुझे सिर्फ दिल्ली आने-जाने के पैसे दिए गए थे। राष्ट्रपति से अवार्ड के अलावा और कुछ भी नहीं मिला।गोविंद निर्मलकर जी को पद्म श्री मिलने के कुछ माह पहले ही मेरी उनसे भिलाई में बहुमत सम्मान के अवसर पर मुलाकात हुई थी इसके बाद पद्म श्री मिलने के बाद अलग-अलग कार्यक्रमों में चार पांच बार मुलाकात हुई है. उनसे चर्चा के दौरान प्राप्त जानकारी के अनुसार गोविंद निर्मलकर जी के बेटे उसे पद्म श्री मिलने के पहले ही छोड़ चुके थे वे अकेले अपनी पत्नी के साथ रहते थे. बाद में मैनें सूत्रों से यह सुना कि पद्म श्री के पुरस्कार राशि के चलते उसे बेटो नें अपने साथ रख लिया है पर पद्मश्री के हालात नहीं बदल पाये हैं. सूत्रों से प्राप्त जानकारी को प्रदीप मेश्राम का यह रपट पुष्ट कर रहा है।
पद्मश्री पाने के पूर्व ही गोविंन्द राम निर्मलकर जी का आधा शरीर लकवाग्रस्त हो चुका है, उन्होंनें मुझे भी बतलाया था कि बीते एक बरस में उनकी माली हालत और भी खराब हुई है, उनके स्वास्थ्य के बारे में न तो प्रशासन ने सुध ली है और न ही कोई जनप्रतिनिधि उन्हें पूछता है, न ही लोक नाट्य वाले। उन्होंनें पिछले दिनों हंसते हुए कहा था जिसे वे प्रदीप मेश्राम जी को भी कहते हैं कि भईया ये पदम सिरि अवार्ड मेरे लिए एक मुसीबत बन गया है। लोग मुझे पैसे वाला मानते हैं, जबकि मुझे राष्ट्रपति से सिफ एक प्रमाण-पत्र और पदक मिला है। बकौल प्रदीप खराब स्वास्थ्य की वजह से श्री निर्मलकर इन दिनों बिस्तर में पड़े रहते हैं। लगातार गिर रहे स्वास्थ्य की वजह से श्री निर्मलकर के ऊपर लगभग ढाई लाख रूपये का कर्ज चढ़ गया है, जिसे चुकाने की क्षमता उनके पास अब नहीं है।
हमारा भी मानना है कि कि इन हालातों में नाचा का यह चितेरा कहीं गुमनामी में ही अपना दम न तोड़ बैठे, राज्य सरकार को कम से कम उनके इलाज के लिए वित्तीय सहायता उनके घर जाकर देनी चाहिए। आशा है ऐसे समय में जब प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनांदगांव जिले को अपना दत्तक जिला मानते हैं उसी जिले में हमारी संस्कृति लोक के ध्वजवाहक की विपन्नता में स्वयं पहुचकर उनकी सुधि लेंगें।
हमारा भी मानना है कि कि इन हालातों में नाचा का यह चितेरा कहीं गुमनामी में ही अपना दम न तोड़ बैठे, राज्य सरकार को कम से कम उनके इलाज के लिए वित्तीय सहायता उनके घर जाकर देनी चाहिए। आशा है ऐसे समय में जब प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनांदगांव जिले को अपना दत्तक जिला मानते हैं उसी जिले में हमारी संस्कृति लोक के ध्वजवाहक की विपन्नता में स्वयं पहुचकर उनकी सुधि लेंगें।
छत्तीसगढ़ी नाचा के दधीचि दुलारसिंह साव मदराजी
देवासुर संग्राम में देवों के विजय के लिए दधीचि ने हड्डीयों का दान दिया था । वैसे ही छत्तीसगढ़ी लोकमंच की अंत्यन्त लोकप्रिय विधा नाचा के लिए दुलारसिंह साव मदराजी ने भी इसी परंपरा में अपना सर्वस्व होम कर दिया था । लोकमंच के संवर्धनकर्त्ता दाऊओं में दुलारसिंह साव मदराजी ही अकेले उदाहरण हैं जो सौ एकड़ जमीन के मालिक के रूप में मंच पर आये और चालीस वर्ष मंच पर रोशनी बिखरने के बाद जब इस लोक से विदा हुए तो - सिंकदर जब गया दुनियां से दोनों हाथ खाली थे ।
मदराजी दाऊ सर्वस्व अर्पित करने वाले महान भक्तों की परंपरा के छत्तीसगढ़ी कलाकार थे । वे ही सबसे पहले हारमोनियम लेकर छत्तीसगढ़ी लोकमंच पर अवतरित हुए । वे स्वयं विलक्षण हारमोनियम वादक थे । जीवन की संध्या में जब बारी बारी सब साथ छोड़ गये तब भी उनके पास हारमोनियम रह गया । जमीन-जायदाद सब लुट गए रह गया हारमोनियम । उस्ताद वादक कलाकार मदराजी दाऊ अंतिम दिनों में छोटे छोटे नाचा दलों में हारमोनियम बजाते थे । वह भी अनुरोध के साथ । बुलवाराम, ठाकुरराम, बोड़रा जैसे महान नाचा कलाकारों को एक जगह रिंगनी रवेली साज के मंच पर एकत्र कर मदराजी दाऊ ने नाचा का वो रिंगनी रवेली साज खड़ा किया कि छत्तीसगढ़ दीवाना हो गया । ‘तोला जोगी जानेंव रे भाई तोला साधू जानेंवगा ..... राजा लंकापति रावन ला मंय साधू जानेंव ‘ यह अमर गीत उन्हीं के मंच पर गूंजा । बुलवा राम यादव परी बनकर जब यह गीत गाते थे तब सीता पर आई विपत्ती का चित्र शब्द और ध्वनि से कुछ इस तरह मंच पर खिंच जाता था कि स्त्रियां विलाप कर उठतीं ।
बुलवाराम ने यही गीत बाद में विश्व के कई देशों में जाकर गाया और भरपूर मान प्राप्त किया । बुलवाराम को राज्य शासन ने २००४ में मंदराजी सम्मान दिया ।
मदराजी दाऊ वचन के पक्के थे । एक अवसर पर वे नाचा प्रस्तुति के लिए नारियल झोंक कर वचन दे बैठे । बच्चा बीमार था । ठीक प्रस्तुति के लिए निर्धारित दिन बच्चा चल बसा । बच्चे की लाश को घर में छोड़कर वे उस गांव तक गए जहाँ प्रस्तुति देनी थी । रात भर हारमोनियम बजाने के बाद वे सुबह रोते हुए घर आये । तब लोगों ने जाना की विरागी राजा जनक ही नहीं थे हमारे लोकमंच के पुरोधा भी वीत रागी हैं ।
इस विलक्षण कलाकार की स्मृति में छत्तीसगढ़ शासन ने दो लाख का पुरस्कार घोषित कर सही निर्णय लिया । जो कला के लिए सब कुछ लुटाकर फकीर हो गए उनके नाम पर ईनाम से मालामाल होकर प्रतिवर्ष एक कलाकार दो लाख धारी बनता है । जीवन भर वे मंच पर थिरकते कलाकारों के हित के लिए छायादार वृक्ष की तरह तने रहे जाने के बाद भी उनका परोपकारी स्वरूप विस्तारित होता जा रहा है ।
हम साया पेड़ जमाने के काम आये,
जब सूख गए तो जलाने के काम आये ।
मदराजी दाऊ का रिंगनी रवेलीसाज १९२८ में खड़ा हुआ । १९५३ तक वह चला । हारमोनियम के साथ मदराजी दाऊ चिकारा, तबला वादक एवं गायन में भी सिद्ध थे । मशाल नाच में वे चिकारा बजाते रहे । चिकारा बजाने वाले हाथों ने ही हारमोनियम को साधा और नाचा का नई ऊँचाई मिली ।
१९११ में ग्राम रवेली जिला राजनांदगांव में जन्में दाऊ मदराजी का निधन २४ दिसंबर १९८४ में हुआ । उनकी परंपरा को चंदैनी गोंदा के माध्यम से आज तक श्री खुमान साव सींच रहे हैं ।
डॉ. परदेशीराम वर्म
द्विअर्थी साखियां व अन्य साखियां
द्विअर्थी साखियां - नाचा में यदा-कदा द्विअर्थी साखी का प्रयोग किया जाता है। सुनने में अश्लील लगते हैं किंतु भवार्थ स्पष्ट करने पर अश्लीलता की परिधि से बाहर आ जाते हैं। नाचा में इस तरह की साखियां पहले कही जाती थी किंतु अब इसका प्रयोग नहीं किया जाता, अश्लीलता व अशिष्टता से बचने के लिए। एक तो वैसे भी अभिजात्य वर्ग नाचा व नाचा कलाकारों को अशिष्ट कहता और हेय दृष्टि से देखता है। आज पाश्चात्य प्रभावों से ग्रसित अभिजात्य व शिष्ट समाज की अशिष्टता व अश्लीलता ही उसकी शिष्टता है। ब्लू फिल्म देखने के आदि शिष्ट समाज को नाचा में अश्लीलता नजर आती है पर ब्लू फिल्मों में नहीं। कुछ द्विअर्थी साखियां-
छाती से छाती मिले, मिले पेट से पेट।
दूनों में रगड़ घसड़ होय, निकले सफेद-सफेद।।
उपरोक्त साखी में स्थूलत: एकाकार स्त्री- पुरुष की संभोग क्रिया का अर्थ आशातीत होता है। जबकि सूक्ष्मत: इसका भावार्थ चक्की से हैं। चक्की के दो पाट होते हैं दोनों में रगड़ होने पर आटा निकलता है।
मोर लम्भा तोर चेपटी, दूनों के एके रंग।
एक ऊपर एक खाल्हे, नई छूटे दूनों के संग।।
इस साखी में भी साधारणत: स्त्री-पुरूष के गुप्तांगों का अर्थ ध्वनित होता है, पर असाधारण बात यह है कि इसमें कवेलू का र्वणन है। कवेलू दो तरह के होते हैं- एक लंबा (अर्द्धगोलाकार) व दूसरा चपटा दोनों का रंग लाल होता है। चपटा कवेलू नीचे व लंबा कवेलू ऊपर होता है। इस तरह ये दोनों साथ होते हैं।
तरी पेंदा ऊपर सीसा, मारे बीता-बीता।
मार मुरा के तैं संगी, पढ़ले रमायन गीता।।
प्रस्तुत साखी सुनने में अटपटा और अश्लील लगती है। किंतु यह पेट्रोमेक्स (गैस बत्ती) का भावार्थ लिए हुए हैं।
अन्य साखियां - नाचा में और भी कई प्रकार की साखियां कही जाती है। जो वर्तमान संदर्भों में मानवीय क्रियाओं, मानवीय आवश्यकताओं से संबंधित है। लोक जो देखता है, सुनता है और अनुभव करता है वह ही उसकी साखी के विषय बनते हैं, इसलिए नाचा की साखी परंपरा में विविधता है-
देह तोर तिपे हे, तोला जर धरे हे का जी?
बोकोर-बोकोर देखथस मोला, खा देबे तैं का जी?
उपरोक्त साखी में बिल्ली गर्म रोटी को देखकर कहती है- तुम्हें बुखार है क्या? तब रोटी प्रतिप्रश्न करती है- तुम मुझे खा डालेगी क्या?
दूर देस तोर मईके, गांव-गांव ससुरार।
अलिन-गलिन गोसइंया, तोर घरो घर लगवार।।
यह साखी बिजली से संबंधित है। बिजली जहां पैदा होती है वह उसका मायका (मैहर) है। गांव-गांव उनकी ससुराल है। गलियों- सड़कों के बिजली खंभे उसके स्वामी (पति) हैं। और प्रत्येक घर में उसके चाहरे वाले प्रेमी है।
मट मट करथस मटमटही, तोर माथ म हीरा ठोकाय।
आखा-बाखा ल छोडके तैं, पूछी म संख बजाय।
इस साखी में हवाई जहाज का चित्रण है। रात में जलने वाली बत्ती उसके माथे का हीरा है। हवाई जहाज की आवाज पीछे सुनाई देती है। वहीं शंख ध्वनि।
डोकरा भागे लड़भड़ लईया,मोटियारी दमदमाय।
लईका भागे तुरतुर तुरतुर, पेटभरी तनियाय।।
लोक कलाकारों ने इस साखी में खाली ट्रक, मोटर, बस, जीपकार व भरी हुई ट्रक की गति की क्रमश: बूढे,जवान, लड़की, बच्चों व गर्भवती स्त्री के चलने की गति से तुलना की है। नाचा में साखी के माध्यम से जोक्कड़ हास-परिहास उत्पन्न कर दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। मनोरंजन का यह माध्यम लोक की आभा को द्विगुणित करता है। शिष्ट वर्ग भले ही अश्लील बातों को मनोरंजन का जरिया बनाये लेकिन लोक के पास तो मनोरंजन के अनेकों माध्यम है। उसकी व्यापक व पैनी दृष्टि लोक के क्रिया व्यापारों में ही उसके लिए मनोरंजन और ज्ञानार्जन की सामग्री चुन लेती है। गम्मत प्रारंभ होने के पूर्व नाचा में साखी की परंपरा नाचा को उद्देश्य परक और लोकरंजक बनाती है। साखी परंपरा नाचा की अपनी नीजता है। उसका अपना वैशिष्ट्य है। इसके मूल में लोक का र्दीर्धकालीन अनुभव और अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय है।
डॉ. पीसीलाल यादव
संपर्क: 'साहित्य कुटीर`
गंडई पंडरिया जिला- राजनांदगांव (छ.ग.)
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विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...
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दे दे बुलउवा राधे को : छत्तीसगढ में फाग संजीव तिवारी छत्तीसगढ में लोकगीतों की समृद्ध परंपरा लोक मानस के कंठ कठ में तरंगित है । यहां के ...
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