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जइसन ला तइसन मिलै, सुन गा राजा भील. लोहा ला घुन खा गै, लइका ला लेगे चील.

इस छत्तीसगढ़ी लोकोक्ति का भावार्थ है दूसरों से बुरा व्यवहार करने वाले को अच्छे व्यवहार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए अर्थात जैसे को तैसा व्यवहार मिलना चाहिए.

पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही वाचिक परम्परा की इस लोकोक्ति का उल्लेख सन् 1978 में डॉ.मन्नू लाल यदु नें अपने शोध प्रबंध 'छत्तीसगढ़ी-लोकोक्तियों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन' में किया है. उन्होंनें इसे 'जैसन ला तैसन मिलै, सुन राजा भील. लोहा ला घुना लग गै, लइका ल लेगे चील. लिखा है, व्यवहार में एवं प्रचलन के अनुसार मैंनें इसके कुछ शब्दों में सुधार किया है.

इस लोकोक्ति के भावार्थ के संबंध में गांव के बड़े बुर्जुगों को पूछने पर वे एक दंतकथा बताते हैं. डॉ.मन्नू लाल यदु नें भी अपने शोध प्रबंध में उसका उल्लेख किया है. आइये हम आपको इस लोकोक्ति से जुड़ी दंतकथा को बताते हैं.




एक गांव में दो मित्र आस पास में रहते थे, दोनों में प्रगाढ़ मित्रता थी. एक बार एक मित्र को किसी काम से दूर गांव जाना था. उसके पास वरदान में मिली लोहे की एक भारी तलवार थी, उसने सोंचा कि वह भारी तलवार को बाहर गांव ले जाने के बजाए अपने मित्र के पास सुरक्षित रख दे और वापस आकर प्राप्त कर ले. उसने वैसा ही किया और तलवार दूसरे मित्र के घर रखकर दूर गांव चला गया. कुछ दिन बाद वह वापस अपने गांव आया और अपने मित्र से अपनी तलवार मांगा, किन्तु मित्र लालच में पड़ गया और तलवार हड़पने के लिए बहाना बना दिया कि मित्र उस तलवार को तो घुन खा गया. (घुन वह कीड़ा है जो लकड़ी में लगता है और धीरे धीरे पूरी लकड़ी को खा जाता है) तलवार का स्वामी मित्र के इस व्यवहार से बहुत व्यथित हुआ किन्तु कुछ कर ना सका.




समय बीत गया, बात आई गई हो गई. कुछ समय व्यतीत होने के उपरांत दूसरे मित्र को भी किसी काम से बाहर गांव जाना पड़ा. उसे जल्दी जाना था और परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि उसे अपने छोटे बच्चे को मित्र के पास छोड़ना पड़ा. काम निबटा कर जब वह वापस गांव आया और अपने बच्चे को मित्र से मांगा तो मित्र ने कहा कि उसे तो चील उठा कर ले गया.

दोनों के बीच लड़ाई बढ़ी और बात भील राजा के दरबार में पहुची. राजा ने मामला सुना और समझा, उसने न्याय करते हुए तलवार को दबा लेने वाले से मित्र को तलवार वापस दिलाई, मित्र नें उसे उसका बच्चा वापस दे दिया.




कलप डारना व कल नइ परना

छत्तीसगढ़ी मुहावरा ‘कलप डारना’ का भावार्थ आर्तनाद करना है एवं ‘कल नइ परना’ का भावार्थ शांति चैन नहीं मिलने से है। आईये आज इन दोनों मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘कलप’ एवं ‘कल’ के संबंध में चर्चा करते हैं।
इस ब्लॉग में दिए जा रहे छत्तीसगढ़ी शब्दों के आशय एवं शब्द विश्लेषण, शब्द उत्पत्ति के विवरण भाषा विज्ञान की दृष्टि से एकदम सटीक हैं, ऐसा हम नहीं कह रहे हैं. हमारा प्रयास यहॉं प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी शब्दों का आशय, सामान्य बोलचाल एवं समझ के अनुरूप, आपके समक्ष रखना है. इसे प्रयोजनमूलक या कामकाजी व्यवहार में आने वाले शब्दार्थ के रूप में स्वीकारेंगें तभी हमारा प्रयास सफल होगा. भाषा विज्ञान की दृष्टि से आशय या शब्दोत्पत्ति संबंधी कोई त्रुटि पाठकों को नजर आती है तो वे टिप्पणियों के द्वारा हमें अवगत करायें ताकि उसे सुधारा जा सके. छत्तीसगढ़ी से नजदीकी संबंध रखने वाले भाषा समूहों के पाठक यदि उन भाषाओं के मिलते जुलते या आशयों वाले शब्दों के संबंध में टिप्पणी करेंगें तो शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन भी होता जावेगा.




मुहावरे में प्रयुक्त ‘कल’ प्राकृत के ‘कल्ल’ से बना है जिसका आशय चैन, आराम या सुख है, शब्दकोष शास्त्री इसे अव्यक्त मधुर ध्‍वनि भी कहते हैं। ‘कल’ से बने अन्य छत्तीसगढ़ी शब्दों में एक शब्द ‘कलउली’ है जो हिन्दी के ‘कलपना’ का समानार्थी है और यही छत्तीसगढ़ी शब्द ‘कलप’ का आशय भी है। जिसका आशय चीत्कार करना, गिड़गिड़ाना या बार बार प्रार्थना करने की क्रिया या भाव है। बेचैनी, व्याकुलता व वाद विवाद, झगड़ा, कलह, क्रोध, रोष के साथ ही तीव्र भूख के लिए एक और छत्तीसगढ़ी शब्द बहुधा प्रयोग में आता है वह है ‘कलकली’।

इस शब्द से संबंधित ‘कलकली छाना’ मुहावरा प्रयोग में आता है जिसका भावार्थ बहुत भूख लगाना है। इस शब्द के भावों के करीब वाद विवाद करने वाला व झगड़ा करने वाला को ‘कलकलहा/कलकलहिन’ कहा जाता है। बेचैनी के भाव को प्रर्दशित करने वाले शब्‍दों में अरबी शब्द ‘क़ल्क़’ से बने छत्तीसगढ़ी शब्द ‘कलकुथ’ का आशय घबराकर विविध चेष्टांए करने का भाव, व्यग्रता, आतुरता है। तरसने की क्रिया या भाव व विलाप करने की क्रिया या भाव के आशय से ‘कलपई’ का प्रयोग होता है। व्याकुल होने, तिलमिलाने की क्रिया या भाव के लिए ‘कलबलई’ का प्रयोग होता है। दुख के कारण अधिक शोर मचाने, एक ही बात को बार बार कहने, दुख गोहराने की क्रिया या भाव को ‘कल्हरई’ कहा जाता है।





इन्हीं शब्दों के अर्थों को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ी में एक मुहावरा प्रचलित है जिसमें कहा गया है कि दो पत्नियों का पति हमेशा परेशान रहता है 'दू डउकी के डउका कलर कईया'. छत्तीसगढ़ी के सहयोगी बोली भाषाओं में कलप और कल का आशय पूछने पर बस्तर में बोली जाने वाली गोंडी भाषा बोलने वाले बतलाते हैं कि गोंडी में शराब को 'कल' कहा जाता है. इसके शब्द प्रयोग में वे महुवे की शराब को 'कलकद्दा' और दारू पीने की क्रिया को 'कल उन्डाना' कहते हैं.





खलक उजरना या उजड़ना और खँडरी नीछना या ओदारना

छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा 'खलक उजरना' व 'खलक उजड़ना' का भावार्थ किसी स्‍थान पर भीड़ लगना एवं विलोम अर्थ के अनुसार दूसरे स्‍थान से सभी का तत्‍काल भाग जाना होता है। आईये इस मुहावरे में प्रयुक्‍त 'खलक' शब्‍द पर अपना ध्‍यान केन्द्रित करते हैं।

संस्‍कृत शब्‍द 'खल्‍ल' से छत्‍तीसगढ़ी व हिन्‍दी में 'खल' का निर्माण हुआ है। 'खल' किसी वस्‍तु को कूटने के लिए धातु या पत्‍थर के एक पात्र को कहा जाता है। मूर्खता के लिए हिन्‍दी में प्रयुक्‍त 'खल' का छत्‍तीसगढ़ी में भी समान अर्थों में प्रयोग होता है, इससे संबंधित मुहावरा 'खल बउराना : पागल होना' है।

हिन्‍दी में प्रचलित 'खलना' के लिए छत्‍तीसगढ़ी में 'खलई' का प्रयोग होता है जिसका आशय ठगने या लूटने की क्रिया या भाव है। छत्‍तीसगढ़ी में पानी के बहाव की आवाज एवं बिना बाधा के उत्‍श्रृंखलता पूर्वक खर्च करने को 'खलखल' कहा जाता है। हिन्‍दी में उन्‍मुक्‍त हसी के लिए प्रयुक्‍त 'खिलखिलाना' के अपभ्रंश रूप में छत्‍तीसगढ़ी में 'खलखलाना' का प्रयोग होता है। घवराहट, व्‍याकुलता, हलचल व हो हल्‍ला के लिए छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द 'खलबली' का प्रयोग होता है। हिन्‍दी के 'खसकना' शब्‍द के लिए छत्‍तीसगढ़ी में 'खलसना' का प्रयोग होता है।

उपरोक्‍त विश्‍लेषण से उक्‍त मुहावरे में प्रयुक्‍त छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द 'खलक' का आशय स्‍पष्‍ट नहीं होता। भाषा विज्ञानियों का मत है कि यह हिन्‍दी के 'खाली' अर्थात रिक्‍त का अपभ्रंश है। हिन्‍दी के 'खाली' का अल्‍पार्थक रूप में 'खल' का प्रयोग आरम्‍भ हुआ होगा फिर यह 'खलक' के रूप में भी प्रयुक्‍त होने लगा।

चंद्रकुमार चंद्राकर जी नें इस मुहावरे का दो अलग अलग ग्रंथों में अलग अलग भावार्थ प्रस्‍तुत किया है। छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा कोश में उन्‍होंनें इसका भावार्थ भीड़ लग जाना लिखा है तो वृहद छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दकोश में सभी का तत्‍काल भाग जाना व तत्‍काल समाप्‍त हो जाना लिखा है। गांवों में इस मुहावरे का प्रयोग दो परिस्थितियों में होता है, एक तब जब पूरा गांव किसी आयोजन या मेले ठेले में एकत्रित हो जाए तो कहा जाता है 'खलक उजर गे गा' यानी पूरा गांव आ गया जी। दूसरा जब किसी स्‍थान पर भीड़ है और अचानक कोई घटना हो जाये और वहां से सब भाग जायें तब भी कहा जाता है 'खलक उजर गे' यानी सब भाग गए।

छत्‍तीसगढ़ी मुहावरा 'खँडरी नीछना' एवं 'खँडरी ओदारना' का भावार्थ खूब मारना है। इस मुहावरे में प्रयुक्‍त छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द 'खँडरी' का आशय बूझने का प्रयास करते हैं।

संस्‍कृत शब्‍द 'खंड' का आशय है किनारा, तट, भाग, टुकड़ा व हिस्‍सा। इसी से बने शब्‍द के कारण, विभाजित करने की क्रिया को छत्‍तीसगढ़ी में 'खँडना' कहते हैं। छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दकोशों में इसका यथोचित आशय नजर नहीं आ रहा है, हमारा अनुमान है कि हिन्‍दी शब्‍द 'खाल' एवं संस्‍कृत शब्‍द 'खंड' के प्रभाव से छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द 'खँडरी' का निर्माण हुआ होगा। प्रचलित रूप से चमड़ी या छाल को ही 'खँडरी' कहा जाता है यह केवल 'छाल' के अपभ्रंश रूप में बना होगा यह प्रतीत नहीं होता। इस मुहावरे में प्रयुक्‍त छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द 'नीछना' हिन्‍दी के 'छीलना' का समानार्थी है। छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द 'ओदारना' गिराने या ढहाने की क्रिया या भाव के लिए प्रयोग में लाया जाता है। निराश होने या किसी को निराश करा देने, रूठने की क्रिया या भाव के लिए भी 'ओदराना' शब्‍द का प्रयोग होता है यथा 'मुह ओदराना'। यहॉं मैं स्‍पष्‍ट करना चाहता हूं कि इस आशय के लिए जब 'ओदराना' का प्रयोग होता है तो 'ओदराना' के जगह पर 'ओंदराना' प्रयुक्‍त होता है। किसी किसी शब्‍दकोश में ओ के उपर बिंदु नहीं लगाया गया है।


छत्तीसगढ़ी मुहावरों में प्रयुक्त शब्दों से संबंधित इस सिरीज को लिखते हुए, मुझे बार बार डाॅ.मन्नूलाल यदु जी की पुस्तक 'छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन' का ख्याल आता था, स्कूली शिक्षा के दौरान मैने इसके संबंध में सुना था और बाद के वर्षों में लगातार संदर्भ के रूप में अनेक लोगों नें इस ग्रंथ का उल्लेख किया था, आज यह पुस्तक मुझे मिली है, मैं प्रयास करूंगा कि इस पुस्तक में दिए गए तुलनात्मक अध्ययन के संबंध में आगे के पोस्टों पर चर्चा करूं.

गरहन तीरना और गर से संबंधित मुहावरे

छत्तीसगढ़ी मुहावरा गरहन तीरना का भावार्थ अपंग होना से है. शब्द विच्छेद करते हुए छत्तीसगढ़ी शब्द 'गरहन' को देखें तो इसमें 'गर' और 'हन' का प्रयोग हुआ है. सामान्य बोलचाल में छत्तीसगढ़ी शब्द 'गर' का प्रयोग गलने के भाव या क्रिया के लिए एवं गरदन के लिए प्रयोग में आता है. गरदन के अभिप्राय से प्रयुक्त 'गर' से बने शब्दों में गरदन काटने वाला यानी भारी अनिष्ट करने वाले, हानि पहुचाने वाले को 'गरकट्टा' कहा जाता है. इसी भाव के कारण पौधों की बाली या कली व फूल को काटने वाले एक कीट को भी 'गरकट्टा' कहा जाता है. गरदन के लिए प्रयुक्त 'गर' से बने मुहावरों में 'गर नवाना : अधीनता स्वीकार करना, शर्मिंदा होना', 'गर अंइठना : गला दबाकर मार डालना', 'गर फंसना : बंध जाना या संकट में फसना' आदि हैं.

गरदन के अर्थ से परे 'गर' के साथ प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्दों में तेज बहाव, तीव्र ढाल वाली भूमि या पानी को शीघ्र सोंख लेने वाली भूमि को 'गरगरा' कहा जाता है. पौधों के जड़ मूल या वह भाग जो मिट्टी को जकड़ ले उसे 'गरगंसा' कहते हैं. संस्कृत शब्द गर्जन के अपभ्रंश से बने 'गरज' का अर्थ हिन्दी के ही समानार्थी बादल के गरजने या किसी गंभीर आवाज, दहाड़ आदि से है. वहीं अरबी शब्द 'ग़रज़' से बने छत्तीसगढ़ी 'गरज' का आशय मतलब, प्रयोजन, जरूरत, इच्छा, स्वार्थ, चाह है. वाक्य प्रयोग में 'मन गरजी : मन मुताबिक या मन के अनुरूप', 'मोला गरज नइ परे हे : मुझे जरूरत नहीं पड़ी है' आदि. 

आम की वह अवस्था जिसके गूदे को आसानी से चूसकर निगला जा सके उसे 'गरती' कहते हैं, यथा 'गरती आमा'. फारसी शब्द 'गर्द' से बने 'गरदा' का आशय धूल, खाक है, इसी से बने शब्द 'गरदा' का अभिप्राय समूल नष्ट कर देने से है यानी ठोस को चूर्ण बना देना, अस्तित्व मिटा देना. संस्कृत के शब्द 'गर्व' का समानार्थी 'गरब' भी यहां उसी अर्थों में प्रचलन में है. ताप व उष्णता के लिए हिन्दी में प्रयुक्त 'गरमी' का भी यहां इसी आशय से प्रयोग होता है. 

उपरोक्त मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द 'गरहन' संस्कृत के ग्रहणम व हिन्दी के ग्रहण शब्द से बना है. इसका अभिप्राय चंद्रमा और सूर्य को लगने वाले ग्रहण से है, सूर्य के सामने पृथ्वी और चंद्रमा के आ जाने के कारण प्रकाश में अवरोध की स्थिति ग्रहण है. इस संक्रमण की स्थिति को हिन्दी के 'ग्रसना' से जोड़ कर छत्तीसगढ़ी में 'गरसना' का प्रयोग होता है. संस्कृत शब्द 'ग्रह' के अपभ्रंश में 'गरह' और इसी से 'गरहा' व 'गिरहा' बना है. ग्रहण की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ग्रहों के कारण उत्पन्न संकट के लिए बाधा, विपत्ति, संकट को 'गिरहा' कहा गया. बोलचाल में 'गरहन धरे कस लागथे' का प्रयोग इसी भाव से किया जाता है. 

रूढ़ि मान्यता के अनुसार ग्रहण काल में कुछ विशेष कार्य वर्जित माने गए, इस मुहावरे को ध्यान में रखें तो वर्जित करने के बावजूद उसी काल में मैथुन, गर्भिणी स्त्री का घर से बाहर निकला 'गरहन तीरने' का कारण है. रूढ़ि को माने तो इसके कारण जब उस स्त्री का बच्चा पैदा होता है वह अपंग पैदा होता है, उसे पोलियो हो जाता है.

गोहार परना एवं गुहरी गदबद होना

छत्तीसगढ़ी मुहावरा गोहार परना का भावार्थ खूब विलाप करना है. चलिए आज इस मुहावरे में प्रयुक्त शब्द 'गोहार' का आशय देखते हैं. शब्दशास्त्री इसे संस्कृत शब्द गो एवं हरण वाले हार से निर्मित बताते हैं जिसका अर्थ सहायता के लिए किये जाने वाली पुकार है. 'गोहार' से बने शब्द 'गोहरईया' का आशय याचना या निवेदन करने वाला है एवं याचना या निवेदन करने के भाव को 'गोहराना' कहा जाता है. 'गोहार पारना' का आशय बात को फैलाना व सहायता के लिए पुकारना भी है. गोड़ी में भी 'गोहार' का आशय हल्ला है, नजदीकी शब्द 'गोहेनी' का आशय छलकपट है.

इससे नजदीक के शब्दों में गायों के रहने के स्थान को 'गोहड़ी' कहते हैं, पशुओं के समूह को 'गोहड़ी' ग्वाला, अहीर, ढ़ोर चराने वाले को 'गहिरा', गहरा को 'गहिर' आदि कहते हैं.

छत्तीसगढ़ी मुहावरा गुहरी गदबद होना का भावार्थ सत्यानाश होना या सबकुछ नष्ट होना है. इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्दों को समझने का प्रयत्न करते हैं.

संस्कृत शब्द 'गुहय' अर्थात मल, विष्ठा से बना हुआ छत्तीसगढ़ी शब्द 'गुह' है. इसी से बने शब्द 'गुहईन' का आशय मल का र्दुगंध है. एक और संयुक्त शब्द 'गुह गॉंगर' का आशय मैला कुचैला है. यानी गुह का प्रयोग नष्ट होने के भाव के लिए भी होता है इसी आशय से 'गुहरी' का प्रयोग इस मुहावरे में हुआ है. 

खराब करने, सामान को इधर उधर करने, उलटने पलटने आदि को छत्तीसगढ़ी में 'गदबद' कहा जाता है. समानार्थी शब्दों में मौज मस्ती के साथ मजा लेते हुए सामान को इधर उधर करने को भी 'गदफद' करना कहा जाता है. सामान के साथ ही विचारों को उलटने पलटने की क्रिया को 'गदबदाना' कहते हैं. 

समीप के शब्दों में अधपके फलों को 'गदरहा', गरिष्ठ को 'गादिल', अलाल को 'गबदा' आदि कहा जाता है. 



साथियों पिछले कई दिनों से इंटरनेट कनेक्शन बाधित हो रहा है इस कारण से छत्तीसगढ़ी शब्दों की यह श्रृंखला अंतरालों के साथ प्रस्तुत होगी. 


घला जाना व घुरवा गॉंगर होना

छत्तीसगढ़ी मुहावरा 'घला जाना' का भावार्थ है बाधित होना. इस मुहावरे में प्रयुक्त 'घला' शब्द 'घलई' का समानार्थी है. फेकने की क्रिया या भाव, बिगाड़ने की क्रिया या भाव, मिश्रण करने की क्रिया या भाव, ईट खप्पर के लिए मिट्टी तैयार करने की क्रिया के लिए 'घलई' का प्रयोग होता है. इसी से बने शब्द 'घलईया' का आशय उपरोक्त क्रिया करने वाला से है. इसके अतिरिक्त 'घलई' स्वयं के या दूसरे के व्यर्थ कार्य करने, रोक देने के कारण समय नष्ट होने के भाव के लिए भी प्रयुक्त होता है, यही 'घलाना' है. 

इस 'घला' के अतिरिक्त निश्चितता बोधक शब्द 'भी' के लिए भी 'घला', 'घलव' एवं 'घलोक' का प्रयोग होता है, यथा 'मोहन घला जाही : मोहन भी जायेगा'. 

छत्तीसगढ़ी मुहावरा घुरवा गॉंगर होना का भावार्थ बेकार होना है. इस मुहावरे में प्रयुक्त 'घुरवा' एवं 'गॉंगर' को समझने का प्रयत्न करते हैं.

इस छत्तीसगढ़ी मुहावरे में प्रयुक्त शब्द 'घुरवा' एवं 'घुरूवा' का प्रयोग समान रूप से समानार्थी रूप में होता है. यह हिन्दी शब्द 'घूर' का अपभ्रंश है जिसका आशय कूड़ा करकट फेकने का गड्ठा से है.

छत्तीसगढ़ी मुहावरा घुरवा गॉंगर होना का भावार्थ बेकार होना है. इस मुहावरे में प्रयुक्त शब्द 'घुरनहा' का आशय शीघ्र घुलनेवाला या घुलनशील होता है. इस घुरने से संबंधित एक और मुहावरा 'घुर घुर के मरना' है जिसका भावार्थ बहुत समय तक कष्ट सहकर मरना. इन शब्दों में 'घुर' का प्रयोग घुलने या गलने के भाव के रूप में हुआ है किन्तु इस 'घुर' का अलग अर्थों में भी प्रयोग होता है, डरने या डर से कांपने की क्रिया या भाव एवं शरीर में सुरसुरी चढ़ने की क्रिया या भाव को 'घुरघुरई' या 'घुरघुरी' कहते हैं. इस शब्द का व्यक्तिवाचक प्रयोग 'घुरघुरहा' व 'घुरघुरहिन' है. शीघ्र डर जाने वाला/वाली, कमजोर दिल वाला/वाली के लिए इसका प्रयोग होता है. 'घुरघुरहा' व 'घुरघुरहिन' का प्रयोग कमजोर स्वास्थ वाला/वाली एवं सुस्त पुरूष या महिला के लिए भी होता है. इन्हीं भावों की अनुभूति 'घुरघुरासी'.

सामान्य बोलचाल में अकेले 'गॉंगर' शब्द का प्रयोग छत्तीसगढ़ में नहीं होता शायद इसीलिए एवं शब्दकोशों में भी इसका उल्लेख नहीं है. इससे मिलते जुलते शब्दों में कमण्डलनुमा चौड़े मुह वाले धातु के पात्र को, पानी रखने वाले मिट्टी के पात्र को एवं देवी देवताओं को धूप दिखाने के लिए मिट्टी का बना डमरू के आकार का एक पात्र को छत्तीसगढ़ी में 'गंगार' कहते हैं. गोडी में उत्तर दिशा को 'गंगउ' कहते हैं. किन्तु इनमें से कोई भी शब्द का आशय मुहावरे के भावार्थ के अनुरूप नहीं है. मुहावरे के अनुसार 'गॉंगर' का आशय सड़ने या नष्ट होने से है ऐसा प्रतीत होता है. घूर में नष्ट होना यानी बेकार होना.

चुलुक लगाना, चिहुर परना व चिभिक लगा के

छत्तीसगढ़ी मुहावरा चुलुक लगाना का भावार्थ है तलब लगना। आईये इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘चुलुक’ को समझने का प्रयत्न कर हैं।

छत्तीसगढ़ी शब्द ‘चुलुकई’ उकसाने या उत्तेजित करने की क्रिया या भाव के लिए प्रयोग होता है। इसी से बने शब्द ‘चुलकहा’ का आशय चिढ़ाने वाला होता है, इस तरह से ‘चुलकाना’ का अभिप्राय इच्छा जगाना, उकसाना, चिढ़ाना एवं उत्तेजित करना होता है। इस ‘चुलक’ से बने ‘चुलुक’ शब्द की उत्पत्ति के संबंध में मान्यता है कि यह संस्कृत शब्द ‘चूष्’ का अपभ्रंश है जिसका आशय इच्छा या तलब है।

इस शब्द के नजदीक के शब्दों में ‘चूल’ व ‘चुलहा’ का प्रयोग भी आम है, ‘चूल’ विवाह आदि उत्सवों में सामूहिक भोजन बनाने के लिए मिट्टी को खोदकर बनाया गया बड़ा चूल्हा है। ‘चुलहा’ दैनिक भोजन बनाने के लिए घरों में उपयोग आने वाला मिट्टी का चूल्हा है। इस ‘चूल’ से बने शब्दों में ‘चुलमुंदरिहा’ व ‘चुलमुंदरी’ का उल्लेख पालेश्वर शर्मा जी करते हैं। उनके अनुसार दूल्हे की ओर से वह व्यक्ति जो विवाह के एक दिन पूर्व वधु के घर जाकर व्यवस्था देखता है उसे ‘चुलमुंदरिहा’ व विवाह की अंगूठी को ‘चुलमुंदरी’ कहा जाता है।

चिहुर परना का भावार्थ शोरगुल होना, अधिक विलाप करना, भीड़ लग जाना है। इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘चिहुर’ को समझने का प्रयास करते हैं।

चिड़िया की आवाज ‘चिंउ’ व उनका संयुक्त कलरव ‘चहचहाने’ के भाव व शब्दों के अपभ्रंश से संभवत: ‘चिहुर’ शब्द की उत्पत्ति हुई होगी। अविचारपूर्ण या बिना सोंचे समझे बोलने के लिए संस्कृत में एक शब्द ‘चिकुर’ है। इस ‘चिकुर’ का प्रभाव चिल्लाने के लिए प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ’चिचियाना’ व बच्चे की किलकारी के लिए प्रयुक्त शब्द ‘चिहुक’ पर पड़ा प्रतीत होता है। अपभ्रंश बिना सोंचे समझे चिल्लाने की क्रिया या भाव के लिए ‘चिहुरइ’ एवं उस क्रिया के कर्ता को ‘चिहुरइया’ बना प्रतीत होता है।

एक और मुहावरा है ‘चिभिक लगा के’ इस मुहावरे का भावार्थ है पूरे मन से। पूरे मन से, तल्लीनता से कार्य करने पर कहा जाता है ‘बने चिभिक लगा के काम करत हे टूरा ह’।

शब्दशास्त्रियों का अभिमत है कि संस्कृत शब्द क्षोभ के अपभ्रंश के रूप में विकसित शब्द ‘चिभिक’ संभवत: कार्य की उस शैली जिसे मन में क्षोभ ना हो के भाव के लिए प्रयुक्त होने लगा होगा। तल्लीनता के भाव के लिए प्रयुक्त ‘चिभिक’ के नजदीक के प्रचलित शब्दों में ‘चिभोरना’ व ‘चिभोर’ से बने शब्दों के अर्थ का भी प्रभाव ‘चिभिक’ पर स्पष्ट नजर आता है। ‘चिभोर’ किसी वस्तु को तरल में डुबाने के आदेशात्मक वाक्य के रूप में प्रयोग होता है, यह गीला करने या डुबाने के आदेशात्मक वाक्य के रूप में प्रयुक्त होता है। ‘चिभोरना’ का आशय किसी वस्तु को तरल में डुबाने, गीला करने की क्रिया या भाव से है। इस प्रकार से ‘चिभ’ या ‘चिभि’ डूबने के भाव को भी प्रदर्शित करता है, काम में डूबना तल्लीनता ही तो है।

चारी म बुड़ना, चपका बॉंधना व चँगोर फोरना

बुराई करने में समय गवांने या बुराई करने में रत रहने पर छत्तीसगढ़ी में ‘चारी म बुड़ना’ कहा जाता है। छत्तीसगढ़ी में 'चार' चार अंक को तथा एक फल जिससे चिरौंजी का दाना निकलता है को कहते हैं. गोंडी में 'चार' सीताफल को भी कहा जाता है. इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘चारी’ का विकास संस्कृत के ‘चाटु’ व ब्रज के ‘चाड़ी’ से हुआ है। इन दोनों भाषाओं में इसका आशय निंदा, बुराई, चुगली, अपयश से है। ‘चारी’ शब्द का विच्छेद करने इसमें चार लोगों में बात को फैलाने का भाव स्पष्ट नजर आता है, कालांतर में बात फैलाने का यह भाव चुगली करने के लिए प्रयुक्त होने लगा होगा।

मुह बंद करना या चुप करा देने के लिए छत्तीसगढ़ी में ‘चपका बॉंधना’ मुहावरे का प्रयोग होता है। आईये अब इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘चपका’ को समझने का प्रयास करते हैं।

नीरवता की स्थिति, शांति या स्थिर रहने की स्थिति के लिए संस्कृत में एक शब्द ‘चुप्’ है। इसी से ‘चप’ का प्रयोग आरंभ हुआ होगा और छत्तीसगढ़ी शब्द ‘चपक’ जैसे शब्द विकसित हुए होंगें। दबाने की क्रिया या भाव के लिए छत्तीसगढ़ी में ‘चपक’ व ‘चपकई’, ‘चपकना’ जैसे शब्द प्रयुक्‍त होते हैं। ‘चपक’ से बने शब्द ‘चपका’ का आशय इससे स्पष्ट हो रहा है, दबाये हुए को ‘चपका’ कहा गया।

नजदीक के अन्य शब्दों को भी देखें, तहबद्ध रखने की क्रिया या भाव के लिए ‘चपई’ शब्‍द प्रचलित है इसका प्रयोग दबाकर रखने के लिए भी होता है। किसी वस्तु या बात को छिपाकर रखने की, चुरा लेने की क्रिया या भाव के लिए ‘चपकई’ शब्द का प्रयोग होता है। दबाने के इस भाव से विकसित छत्तीसगढ़ी शब्द ‘चपलना’ का प्रयोग होता है जिसका आशय अतिक्रमण करने के भाव से है। पशुओं के मुह पर होने वाली एक संक्रामक बीमारी जिससे उनका मुह नहीं खुलता, छत्तीसगढ़ी में इस बीमारी को ‘चपका’ कहते हैं। मंगत रवीन्द्र जी इससे मिलते जुलते शब्दों में ‘चापन’ का तीन आशय चतुर, मजाक व परीक्षा बतलाते हैं।

चँगोर फोरना छत्‍तीसगढ़ी के इस मुहावरे का भावार्थ मृत्‍यु का शाप देना है। इस मुहावरे में प्रयुक्‍त ‘चंगोर’ व ‘फोरना’ को समझने का प्रयास करते हैं।

सामान्‍य प्रयोग में हाथ की चार उंगलियों के लिए हिन्‍दी शब्‍द ‘चंगुल’ है, इससे ही ‘चंगोरा’ का विकास हुआ है। छत्‍तीसगढ़ी में ‘च’ प्रत्‍यय का प्रयोग निश्चितता बोधक के रूप में होता है, यथा ‘मोरेच : मेरा ही’, ‘तोरेच : तेरा ही’। किन्‍तु यहॉं इस प्रत्‍यय से शब्‍द बनने का आभास नहीं हो रहा है। एक और प्रचलित शब्‍द है ‘चंगुरई’ इसका आयाय उँगलियों के समान हाथ पैर का मुड़ जाना या चल ना पाने के लिए छत्‍तीसगढ़ी में प्रयोग होता है। फारसी में ‘चंगुल’ का प्रयोग किसी चीज को पकड़ते समय हाथ के पंजे की स्थिति के लिए होता है। इसके अनुसार हाथ की अंगुलियों से संबंधित भाव ही ‘चंगोर’ के पीछे स्‍पष्‍ट प्रतीत होता है। हिन्‍दी के ‘चार’ व ‘अंग’ एवं ‘ओर’ से ‘चंगोर’ का निर्माण प्रतीत होता है। इससे भी हाथ के चार उंगलियों से किसी वस्‍तु को पकड़ने का भाव प्रकट होता है।

अन्‍य समीप के शब्‍दों में चार कोने वाली बांस की बनी टोकरी को छत्‍तीसगढ़ी में ‘चंगोरा’ कहा जाता है। कहीं कहीं इसी टोकरी के छोटे रूप को ‘चंगोरिया’ भी कहा जाता है, हिन्‍दी में इसे संभवत: ‘चौगोशिया’ कहा जाता है। कसे हुए या व्‍यवस्थित रूप या भाव के लिए छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द ‘चंगचंग ले’ का प्रयोग होता है जो ‘चंगा’ से बना प्रतीत होता है।

हिन्‍दी में प्रचलित शब्‍द ‘फोड़ना’ के समानअर्थी रूप में छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द ‘फोरना’ का प्रयोग होता है। संस्‍कृत शब्‍द ‘स्फोटन’ से इस शब्द का निर्माण हुआ है। तोड़ना, खंडित करना, दबाव के कारण किसी चीज को भेदकरबाहर निकलना, किसी को दूसरे पक्ष से निकालकर अपने पक्ष में करना, किसी संगठन को भंग करना के लिए छत्‍तीसगढ़ी में ‘फोरना’ का प्रयोग होता है। इसी से ‘फोरईया’ व ‘फोरउनी’ बना है।

नजदीक के शब्‍दों में सब्‍जी आदि में छौंक लगाने की क्रिया को छत्‍तीसगढ़ी में ‘फोरन’ कहा जाता है। सब्‍जी की डली या टुकड़े को ‘फोरी’, ‘फरी’ या ‘फारी’ कहा जाता है। शरीर में उभरने वाले बड़े दाने, फुंसी, व्रण को छत्‍तीसगढ़ी में ‘फोरा’ कहा जाता है।


बस्तिरहा गोंडी में पक्षी फसाने के जाल को 'चोप' कहते हैं, यह 'चोप' भी चपका के नजदीकी का आभास देता है. बात से शरीर के जकड़ने की बीमारी को 'चौरंगा' व रस्सी से बुनी चौकोर चौकी को 'चौरंगी', बांस को चार भाग में फाड़ना को 'फरना' कहते हैं.

घोरन मताना

इस छत्तीसगढ़ी मुहावरे का भावार्थ जिद्द करना है। इसमें प्रयुक्त ‘घोरन’ व ‘मताना’ का आशय पर हम अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं।

भयानक, भयंकर, विकराल, बहुत अधिक, कठिन, दुर्गम के समानार्थी के रूप में संस्कृत शब्द ‘घोर’ का प्रयोग होता है। यही हिन्दी में जोरदार शब्द उच्चारण या ध्वनि के लिए ‘घोर’, घोलने की क्रिया के लिए ‘घोल’ व पशु घोड़े के लिए कहीं कहीं ‘घोर’ का प्रयोग होता है, इसी से बने छत्तीसगढ़ी शब्द ‘घोरन’ का एक अर्थों में बार बार बताने की क्रिया के रूप में और दूसरे अर्थों में घोलने की क्रिया के रूप में प्रयोग होता है।

इन सब के मिले जुले रूप में छत्तीसगढ़ी में घोलने वाला एवं किसी बात को बार बार बताने वाले को ‘घोरईया’ कहा जाता है। जिद व हठ के लिए ‘घोरन’, किसी बात को बार बार कहने वाला या किसी बात के लिए बार बार जिद करने वाला को ‘घोरनहा’ व ‘घोरियाना’ का प्रयोग प्रचलित है। जिद करने के भाव से बना एक मुहावरा ‘घोर मताना’ भी है। किसी बात को बार बार बताने के भाव से ‘घोर घोर के बताना’ मुहावरा भी प्रयोग में है। अपनी बात पे अड़ने के भाव के लिए भी ‘घोरियाना’ का प्रयोग होता है। इसी से ‘घोर्री’ बना है जो ‘घोर्री फांदना’ जैसे मुहावरे में प्रयुक्‍त होता है। बाद के अपभ्रंश या मिलकर बने शब्दों में जिद्दी के लिए ‘घेक्खर’ व ‘घेक्खरहा’ का प्रयोग आरंभ हुआ होगा।

घोलने की क्रिया के लिए प्रयुक्त शब्द ‘घोरन’ में घोलने के लिए क्रमश: या बार बार प्रयत्न करने का भाव समाहित है। इसी कारण बार बार बोलने या जिद करने का भाव इस शब्‍द में प्रतिध्‍वनित होता है।

राय, विचार, सम्‍मति, तर्क, पंथ व संप्रदाय के लिए प्रयुक्‍त हिन्‍दी शब्‍द ‘मत’ का छत्‍तीसगढ़ी में प्रयोग नहीं के लिए होता है यथा ‘अइसे मत कर’। संस्‍कृत शब्‍द मंथन व हिन्‍दी ‘मथना’ से बने ‘मताना’ का आशय पौधे लगाने के लिए पानी भरे खेतों में हल चलाकर जमीन को पोला बनाने व गीली मिट्टी को पैरों से रौंद कर गारा बनाने से है। छत्‍तीसगढ़ी में ‘मताना’ मस्‍ती में मस्‍त कर देना, तहलका मचाना, परेशान करना, पागल कर देना, मन को विचलित कर देना व नशा चढ़ जाना को भी कहा जाता है।


बस्तर में बोली जाने वाली गोंडी में छेद, छिद्र को 'घर' कहा जाता है. गांव को 'घर-डहर' और परिवार के लिए 'घर-विंदार' का प्रयोग होता है. 'मत' के समीप के शब्दों में औषधि को 'मत', सगाई को 'मत्तरपरई', कोदो-कुटकी को 'मतौना', आकर्षक स्त्री को 'मतौनी', दुष्टता के देवता को 'मतियादेव' कहा जाता है.

छकल बकल करना

इस छत्तीसगढ़ी मुहावरे का भावार्थ है खूब खर्च करना। आईये देखें इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘छकल’ व ‘बकल’ का आशय।

तृप्त होने, पस्त होने या हारने की क्रिया के लिए हिन्दी शब्द ‘छकना’ का प्रयोग होता है। इसी भाव से छत्तीसगढ़ी ‘छकल’ बना है। इस प्रकार से 'छकना', 'छकाना', 'छकासी' ‘छकई’ का आशय अघा जाने की क्रिया या भाव, तृप्त होने की क्रिया या भाव, परास्त करने या हरा देने की क्रिया या भाव से है। इन्हीं अर्थों में संस्कृत शब्द ‘चक्’ का प्रयोग होता है, हो सकता है कि चक् के स्थान पर छत्तीसगढ़ी में 'छक्' फिर 'छकल' प्रयोग में आ गया होगा। ‘छकना’, ‘छकाना’, ‘छकासी’ इसी के नजदीक के शब्द हैं।

इसके समीप के शब्दों में 'छकनहा' शब्द का प्रयोग होता है जिसका आशय चंद्रकुमार चंद्राकर जी चकित होने वाला, भ्रमित होने वाला, चकमा देने वाला, धोखेबाज, झूठा आदि बतलाते है. मेरी जानकारी के अनुसार 'छकनहा' उन पात्रों को कहा जाता है जिन पात्रों में खुदाई करके विभिन्न प्रकार के बेलबूटे आदि बनाए गए हों. यथा, 'छकनहा थरकुलिया', 'छकनहा माली', 'छकनहा थारी' आदि.

'छकल बकल' छलक कर बिखरते तक खर्च करने के भाव को प्रदर्शित करता है. यानी तृप्त होते तक खर्च करने के लिए विकल बकल हो सकता है जो इसी शब्द का अपभ्रंश हो. संभावना यह भी है कि यह छत्तीसगढ़ी शब्द 'बक' से बना हो. छत्तीसगढ़ी में 'बक', 'बकना' व 'बक् खानना' का आशय गाली देना है, जबकि 'बक् खाना' का आशय आश्चर्य में पड़ना है. अब देखें यही 'बक' जब 'बकबकाना' व 'बकबकई' के रूप में प्रयुक्त होता है तो इसका आशय बकवास करना होता है. छत्तीसगढ़ में कहीं कहीं संपूर्णता के भाव यानी पात्र के पूर्ण भरने पर भी 'बकबकाना' व 'बकबकई' शब्द प्रयोग में लाया जाता है.


इन दो शब्दों का आशय भी देखें - थोड़ी थोड़ी बात पे गुस्सा जाने वाले को 'छनकहा' कहा जाता है. जो बछड़ा दूध ना पी रहा हो, या जिसने अपनी मॉं का दूध पीना छोड़ दिया है ऐसे बछड़े को छत्तीसगढ़ी में 'बकेना' कहते हैं. इसके बाद इसकी उम्र दांतों से गिनी जाती है.

जी अरझना और जी कल्लाना

छत्तीसगढ़ी मुहावरे "जी अरझना" का भावार्थ इंतजार करना एवं "जी कल्लाना" का भावार्थ व्याकुल होना है। इन दोनों मुहावरे में ‘जी’ के साथ दो अलग अलग छत्तीसगढ़ी शब्द का प्रयोग हुआ है।

पहले मुहावरे में प्रयुक्त ‘अरझना’ छत्तीसगढ़ी अकर्मक क्रिया शब्द है। यह संस्कृत शब्द अवरूंधन के अपभ्रंश से बना है जिसका आशय फंसना, लटकना, अटकना, उलझना से है। इसी से बने शब्द ‘अरझाना’ का आशय फंसाना, लटकाना, अटकाना, उलझाना से है।

दूसरे मुहावरे मे प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘कल्लाना’ अकर्मक क्रिया है यह संज्ञाहीन होने के लिए प्रयुक्त संस्कृत शब्द ‘कल्’ से बना है। छत्तीसगढी में इस शब्द का प्रयोग रगड़ने, रगड़ाने, बाल आदि पकड़कर खींचने से त्वचा में दर्द होने, जलन होने, दुखदाई होने पर होता है। शब्दशास्त्री इसे संस्कृत शब्द ‘कल’ यानी चैन, सुख और हिन्दी शब्द ‘हरना’ यानी हरण से मिलकर बना मानते हैं। इस प्रकार से बेचैन, सुख ना रहने, परेशान होने, विलाप करने के लिए ‘कल्लाना’ शब्‍द का प्रयोग होने लगा होगा। केन्द्रीय छत्तीसगढ़ी भाषी क्षेत्र में ‘कल्लाना’ का सीधा अर्थ बाल को खीचने से होने वाले दर्द के रूप मे प्रचलित है।

इससे बने या इसके नजदीक के शब्दों में विलाप करने के लिए प्रचलित शब्‍द ‘कल्लई’, ‘कल्हरना’ व ‘कलपना’ है जो दुख के भाव को ही प्रकट करता है। कल नहीं पड़ने के भाव पर बने अन्य शब्दों में ‘कलबलाना’ का आशय व्याकुल होना या तिलमिलाना, दर्द के कराह के कारण जोर जोर से रोना है।

उछरत बोकरत ले भकोसना और सतौरी धराना

इन दो मुहावरों में पहले मुहावरे का भावार्थ अत्यिधक खाना है. मुफ्त में मिले माल को उड़ाने का भाव या किसी को नुकसान पहुचाने के उद्देश्य से माल उड़ाने का भाव इस मुहावरे से प्रतिध्वनित होता है. 

आईये इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्दों का आशय समझने का प्रयास करते हैं. 'उछरत' बना है 'उछरना' से जो क्रिया है, इसका आशय खाई हुई चीज बाहर निकालना, वमन, उल्टी करना है. 

'बोकरत' को समझने के लिए इसके करीब के शब्दों का आशय भी देखते चलें. छत्तीसगढ़ी शब्द 'बोकबकई' हक्का बक्का होने की क्रिया के लिए प्रयोग में आता है. इसी से बने शब्द 'बोकबोकहा - हक्का बक्का होने वाला', 'बोकबोकासी - हक्का बक्का होने की क्रिया या भाव', 'बोकबोकाना - वही' आदि है. कुछ और शब्दों में 'बोकरईन - बकरे की दुर्गंध', 'बोकरइया - वमन करने वाला', 'बोकरना - बो बो शब्द के साथ खाए हुए अनाज को मुह के रास्ते पेट बाहर से निकालना' आदि है. इस प्रकार से उपरोक्त मुहावरे में प्रयुक्त 'उछरत' और 'बोकरत' दोनो समानार्थी शब्द हैं. 

छत्तीसगढ़ी शब्द 'भकोसना' सकर्मक क्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है. यह संस्कृत के 'भक्षण' से बना है. इसका आशय बड़ा बड़ा कौर लेकर जल्दी जल्दी खाना से है. इसी से बने शब्द 'भक्कम' का आशय है बहुत अधिक. अन्य समीप के शब्दों में 'भखइया - भक्षण करनेवाला', 'भखई - भक्षण करने की क्रिया, बोलना', 'भखना - भोजन करना, खा जाना'. महामाई ह राजा के बेटा ल भख दिस जैसे शब्द प्रयोग जिन्दा सर्वांग खा जाने, ठाढ़ लिलने के लिए 'भख' का प्रयोग होता है.

अब आईये 'सतौरी धराना' का भावार्थ और शब्दों का आशय जानने की कोशिस करते हैं. छत्तीसगढ़ में 'सतौरी धराये', 'सतौरी धरा' का प्रयोग सामान्यतया बात नहीं मानने या नियमानुसार कार्य ना करने पर झिड़कने या डांटने के लिए होता है. बुर्जुगों के द्वारा इसके प्रयोग करने पर बचपन में मैं सोंचता था कि यह गंदी गाली है किन्तु जब इसके शब्दों के अर्थों पर ध्यान दिया तब पता चला कि यह पूर्वजों को उलाहना देने के भाव के लिए प्रयुक्त होता है.

इसमें प्रयुक्त 'सतौरी' 'सत' से बना है और सत संस्कृत का मूल शब्द है जिसका आशय सत्य, श्रेष्ठ से है. सत का प्रयोग सात अंक से जुड़े भावों के लिए भी प्रयुक्त होता है, सात, सतहत्था. सत से मिलकर एक शब्द और बना है 'सतईया' इसका आशय परेशान करने वाला से है. इन तीनों अर्थों में मुहावरे का आशय स्पष्ट नहीं होता, शब्दशास्त्रियों का मानना है कि यह हिन्दी के अंक वाले 'सत' एवं संस्कृत के 'औरसी' से मिलकर बना है, इन दोनों के मिलने से जो भाव एवं आशय स्पष्ट होते हैं वह है - कोख से उत्पन्न, कोख से उत्पन्न होने वाली सातवीं पीढ़ी का पुत्र, सात पीढ़ी तक के पूर्वज. बात नहीं मानने या नियमानुसार कार्य ना करने पर झिड़कने के लिए जब 'सतौरी धरा' का प्रयोग होता है तो उसका भाव होता है सातो पुरखा को धरा यहां यह 'धरा' उन्हें कष्ट देनें से है. इस प्रकार से 'सतौरी धरा' पूर्वजों को गाली देना है. 

जॉंगर पेरना, जॉंगर खिराना व जँउहर होना

इन तीनों छत्तीसगढ़ी मुहावरों का भावार्थ इस प्रकार है, जॉंगर पेरना : मेहनत करना, जॉंगर खिराना : शक्तिहीन होना, सामर्थहीनता व जँउहर होना : विपत्ति आना।

आईये इन मुहावरों में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्दों को समझने का प्रयास करते हैं। पहले मुहावरे में प्रयुक्त ‘जॉंगर’ मूलत: जॉंघ या जंघा की शक्ति के भाव से बना है। शारिरिक बल, ताकत, सामर्थ के लिए छत्तीसगढ़ी में ‘जॉंगर’ शब्द का प्रयोग होता है। इससे संबंधित अन्य मुहावरों में ‘जॉंगर के टूटत ले कमाना : खूब परिश्रम करना’, ‘जॉंगर चलना : शरीर में शक्ति रहना’, ‘जॉंगर टूटना : निकम्मा होना’, ‘जॉंगर चोट्टा : कामचोर, निकम्मा’ आदि है।

‘खिराना’ ‘खिरना’ से बना है जो संस्कृत शब्द ‘श्रय:’ या ‘कृश’ से बना है। इसी से बने सकर्मक क्रिया शब्द ‘खिराना’ का आशय समाप्त कर देना, घिस डालना, गुमा देना है। इससे मिलते जुलते शब्दों में ‘खियाना : क्षीण होना’, ‘खिरकी : झरोखा, खिड़की’, ‘खीरा : ककड़ी’ आदि हैं।

चमक का समानार्थी अरबी शब्द ‘जौ’ एवं संस्कृत शब्द 'हरणम्'  से मिलकर छत्तीसगढ़ी ‘जँउहर’ बना है। वह कार्य या घटना जिससे यश, कीर्ति या मान सम्मान को क्षति पहुंचे उसे ‘जँउहर’ कहा जाता है। इसका प्रयोग अपयश, धोखा या हानि बोधक शब्द के रूप में भी होता है। शब्दशास्त्री इसे हिन्दी के ‘जीवहर’ से अपभ्रंश मानते हैं जिसके अनुसार इसका अभिप्राय मृत्युकारक घटना, मृत्यु, नाश है। छत्तीसगढ़ी में एक गाली है ‘तोर जँउहर होवय......’.

झकझक ले दिखना और झख मारना

छत्तीसगढ़ी मुहावरा ‘झकझक ले दिखना’ का भावार्थ एकदम साफ दिखना है एवं ‘झख मारना’ का भावार्थ बेकार समय गंवाना है।

इन दोनों मुहावरों में प्रयुक्‍त छत्तीसगढ़ी शब्‍द ‘झक’ व ‘झख’ को समझने से दोनों मुहावरे का भावार्थ हमें स्पष्ट हो जायेगा। पहले मुहावरे में प्रयुक्त ‘झक’ का दुहराव शब्‍द युग्म बनते हुए ‘झकझक’ बना है। छत्तीसगढ़ी शब्द ‘झक’ संस्कृत के ‘झषा’ से बना है जिसका आशय ताप, चमक, स्वच्छ है। ‘झक’ और ‘झक्क’ का प्रयोग हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी दोनों में समान रूप से साफ दिखने या चमकने के लिए होता है। क्रिया विशेषण के रूप में प्रयुक्त शब्द ‘झकझक’ का आशय चमकता हुआ, बहुत साफ या स्पष्ट है, पर्दारहित या खुले रूप में प्रस्तुति के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है।

संभवत: शब्‍द विकास की प्रकृया में चमक को अप्रत्याशित रूप में स्वीकारते हुए ‘झकझक’ को चमकने या चमकाने की क्रिया या भाव, हड़बड़ी करने की क्रिया या भाव भी मान लिया गया। इस प्रकार से ‘झकझक’ करने वाले को ‘झकझकहा’, ‘झकझकइया’ या ‘झकझकहिन’ कहा गया। इसी भावार्थो में ‘झकझकाना व झकनई : चमकने या चमकाने की क्रिया या भाव, हड़बड़ी करने की क्रिया या भाव’ एवं ‘झकझकासी : चमकने या चमकाने की की इच्‍छा, हड़बड़ी करने की इच्छा’ के रूप में प्रचलित है। इसी के चलते चमकने वाले या कम समझ के व्‍यक्ति को ‘झक्‍की’ कहा जाने लगा होगा।

शब्द विस्तार एवं नजदीक के शब्दों पर ध्यान केन्द्रित करने पर एक शब्द ‘झझक’ का प्रभाव या अपभ्रंश ‘झकझक’ पर नजर आता है। चमकने या चमकाने की क्रिया या भाव के लिए ‘झझक’ का प्रयोग होता है। इसी ‘झझक’ से बने शब्द ‘झझकना’, ‘झुझकना’ आदि का प्रयोग भी ‘झकझक’ से बने शब्दों की भांति होता है।

कार्य पूरा करने की धुन में ढंग से बिना देखे समझे जल्दबाजी करने की क्रिया या भाव को ‘झकझिक - झकझिक’ कहा जाता है। इसका प्रयोग किसी कारण वश बार बार और जल्दी जल्दी आने जाने की क्रिया या भाव को, हड़बड़ी को भी ‘झकझिक - झकझिक’ करना कहा जाता है।

चौकने के भाव के लिए ‘झनकई’ का भी प्रयोग होता है जो झनक यानी कम्पन के समानार्थी रूप में छत्तीसगढ़ी में प्रयुक्त होता है। झांकने की क्रिया के लिए प्रयुक्त शब्‍द ‘झकई’ कम दिखने के लिए भी प्रयुक्त होता है। हिन्दी में झटका देने, जोर से हिलाने की क्रिया के लिए प्रयुक्त ‘झकझोरना’ का प्रयोग छत्‍तीसगढ़ी में समानअर्थों में किया जाता है। ठंडी हवा या बारिस के झोंके के लिए छत्तीसगढ़ी में ‘झकोर’ या ‘झकोरा’ ‘झक्कर’ का प्रयोग होता है।

दूसरे मुहावरे में प्रयुक्त ‘झख’ का आशय मजबूरी या विवशता है। हिन्दी में भी यह इसी अर्थ के साथ प्रचलित है। वाक्य प्रयोग में ‘झकमारी’ या ‘झखमारी’ का आशय विवशता, मजबूरी या लाचारी है।

तरूआ ठनकना

इस मुहावरे का भावार्थ है शंका होना, किसी बुरे लक्षण को देखकर चित्त में घोर आशंका उत्पन्न होना, कुछ स्थितियों पर आश्‍चर्य होने पर भी इसका प्रयोग होता है.

'तरूआ' 'तेरवा' से बना है जो हिन्दी शब्द 'तेवान' अर्थात सोंच विचार का अपभ्रंश है. छत्तीसगढ़ी शब्द 'तरूआ' का आशय शरीर का वह अंग जो सोंचने विचारने का केन्द्र होता है यानी मस्तक या भाल है. छत्तीसगढ़ में तले हुए सब्जियों के लिए भी 'तरूआ' शब्द का प्रयोग होता है. हिन्‍दी में 'तरू' वृक्ष व रक्षक का समानार्थी है जबकि 'तरूआ' पैर के नीचे भाग तलवा को बोला जाता है.

अकर्मक क्रिया शब्द 'ठनकना' ठन शब्द से बना है जिसका आशय ठन ठन शब्द करना, सनक जाना, रह रह कर दर्द करना या कसक होना है. 'ठनकई' इसी आशय के क्रिया या भाव को कहा जाता है. हिन्‍दी में ठन से आशय धातुखंड पर आघात पड़ने का शब्द या किसी धातु के बजने का शब्द से है इसका यौगिक शब्‍द ठन ठन है. 'ठनकना' का आशय रह रहकर आघात पड़ने की सी पीड़ा, टीस या चसक है. अन्‍य समीप के शब्‍दों में 'ठनका' रह रहकर आघात पड़ने की सी पीड़ा, 'ठनकाना : किसी धातुखंड या चमड़े से मढ़े बाजे पर आघात करके शब्द निकालना, बजाना, जैसे, तबला ठनकाना, रुपया ठनकाना.

हिन्दी के 'ठस' के अपभ्रंश के रूप में बने 'ठनक' का आशय बुलंद आवाज में, दमदारी के साथ के लिए भी होता है. 'बने ठनक के गोठिया!' जैसे वाक्याशों का प्रयोग प्रचलित है. इसी शब्‍द से बना व हिन्‍दी में प्रचलित मुहावरा ठनककर बोलना का भावार्थ कड़ी आवाज में कुछ कहना से है. इसके करीब के शब्दों में 'ठनकी' हिन्दी के 'ठनक : टीस' से बना है जिसके कारण इसका प्रयोग जलने के साथ रूक रूक कर पेशाब होने की क्रिया या भाव के लिए प्रयोग होता है. हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से प्रचलित शब्द 'ठनठनगोपाल' का आशय छूँछी और निःसार वस्तु, वह वस्तु जिसके भीतर कुछ भी न हो, खुक्ख आदमी, निर्धन मनुष्य, वह व्यक्ति जिसके पास कुछ भी न हो, है. ढनमनाना के लिए कभी कभी 'ठनमनाना' का भी प्रयोग होता है. 'ठनाठन' नगद या तुरंत अदा करने के भाव के लिए भी प्रयोग होता है.


इस छत्तीसगढ़ी शब्द 'तरूआ' के 'आ' प्रत्यय के स्थान पर 'वा' का प्रयोग 'तरूवा' के रूप में भी होता है. मेरी जानकारी में दोनों शब्दों का प्रयोग समान अर्थ रूप में होता है,

मही मांगें जाना अउ ठेकवा लुकाना

छत्तीसगढ़ी के इस मुहावरे का भावार्थ है मांगना भी और शरमाना भी या कहें लजाते हुए उपकृत होने की इच्छा रखना.

दो व्यक्तियों के सिर टकराने की क्रिया के लिए हिन्दी में 'ठेसना' शब्द का प्रयोग होता है. इसी से छत्तीसगढ़ी 'ठेकवा' व 'ठेकी' बना है. ठेकवा से संबंधित छत्तीसगढ़ी का एक और मुहावरा 'ठेकवा फोरना' है जिसका भावार्थ दो व्यक्तियों का सिर आपस में टकराना है. इसके नजदीक के शब्दों में पैसे संचित करने वाले मिट्टी के पात्र गुल्लक को 'ठेकवा', सर मुडाए हुए पुरूष को 'ठेकला' व स्त्री को 'ठेकली' कहा जाता है. कार्य की पद्धति ठेका से बने छत्तीसगढ़ी 'ठेकहा' का आशय ठेके से दिया हुआ से है.

संस्कृत शब्द 'लुक्' व 'लोक' जिसका अर्थ चमकना, आग का छोटा टुकड़ा, चिनगारी, सिगरेट बीड़ी आदि से गिरने वाली जलती हुई राख है. इसके समानार्थी छत्तीसगढ़ी शब्द 'लूक' का भी इन्हीं अर्थों में प्रयोग होता है. इस 'लूक' या 'लुक' के अपभ्रंश से छत्तीसगढ़ी में कोई शब्द निर्माण का पता नहीं चलता. इसमें प्रयुक्त लुक के नजदीक के अन्य शब्दों में 'लुकलुकईया : जल्दबाज, उतावला, अधिक उत्साहित या उत्सुक', 'लुकलुकहा : जल्दबाज, उतावला, अधिक उत्साहित या उत्सुक', 'लुकलुकाना : जल्दबाजी, उतावलापन, अधिक उत्साहित या उत्सुक होने की क्रिया या भाव', जल्दबाजी से संबंधित ये सभी शब्द 'लक' से बने प्रतीत होते हैं जिसका स्पष्ट प्रयोग 'लकर धकर' के रूप में प्रचलन में है. एक अन्य शब्द 'लुकी' भी प्रचलित है जो चिढ़ चलाने के भाव या क्रिया के लिए प्रयोग होता है यथा 'लुकी लगा दीस', 'लुकी लगइया' आदि.

उपरोक्त 'लुक' व 'लक' के अतिरिक्त छिपाने की क्रिया या भाव के लिए छत्तीसगढ़ी शब्द 'लुकाना' प्रचलन में है. छिपने के लुका छिपी के खेल को छत्तीसगढ़ी में 'लुकउला' कहा जाता है. हिन्दी में भी लुकने में प्रवृत्त करना या छिपाना के लिए लुकना या लुकाना का प्रयोग होता है.

हिन्दी में विश्व या संसार का समानार्थी शब्द 'मही' का छत्तीसगढ़ी में 'मैं' या 'मैं ही' के रूप में प्रयोग होता है. इसका एक और आशय प्रयोग में है वह है, दही से मक्खन निकालने के बाद निकले छाछ या मठा को भी छत्तीसगढ़ी में 'मही' कहा जाता है.


पहले के समय में छत्तीसगढ़ के गाँवों में निवासरत किसान गो धन से परिपूर्ण होते थे, उनके घरो में दूध, दही, घी का भंडार हमेशा भरा रहता था. परिपूर्णता के कारण इनके उपउत्पाद के रूप में निकले मठा को बाटने की परम्परा रही है. इसी 'मही' को मांगने के संबंध में यह मुहावरा बना है.
ठेकुआ या खमौनी एक बिहारी व्यंजन है.


थोथना ओरमाना

इस छत्तीसगढ़ी मुहावरे का भावार्थ है दुख्री होना, नाराज होना. मुहावरे की प्रयोग की दृष्टि से इस पर मेरा अनुमान है कि इसका आशय स्वयं की गलती पर दुखी होना या नाराज होन है.

आईये अब इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द 'थोथना' को समझने का प्रयास करें. 'थोथना' हिन्दी के 'थूथन' से बना है जिसका आशय लम्बा निकला हुआ मुह है. इसी मुहावरे के समानार्थी मुहावरा 'थोथना उतारना' भी छत्तीसगढ़ में प्रचलित है, जिसका भावार्थ उदास होना है.

'थोथना' के समीप के छत्तीसगढ़ी शब्दों में 'थोथनहा : गुस्से में मुह उतार कर बैठने वाला', 'थोथनहिन : गुस्से में मुह उतार कर बैठने वाली' आदि हैं.

इस भाव से परे इसके नजदीक के शब्दों को भी देखें, चिचोड़-चिचोड़ कर खाने की क्रिया या भाव को छत्तीसगढ़ी में 'थोथलई' कहा जाता है. शेर या हिंसक पशु के द्वारा मृत पशु के मांस खाने को 'थोथलई' कहा जाता हैं. चिचोड़-चिचोड़ कर खाने वाले को 'थोथलईया' कहा जाता है. बोलते हुए या कोई कार्य करते हुए अटक जाने के भाव को 'थोथकना' कहा जाता है. जो कुछ काम कर नहीं सकता यानी अकर्मण्य को छत्तीसगढ़ी में 'थोथवा' या 'थोथो' कहा जाता है. ध्यान रखें कि साधनहीन के लिए भी 'थोथवा' का प्रयोग होता है जहाँ अकर्मण्यता के स्थान पर विवशता झलकती है. 'थोथवा' का प्रयोग काटने वाले औजारों के लिए तब किया जाता है जब वह धार रहित हो जावे.

'ओरवाती' के संबंध में चर्चा करते हुए हमने पहले 'ओर' के संबंध में बताया था. इस मुहावरे में प्रयुक्त 'ओरमाना' इसी के करीब का सर्कमक क्रिया शब्द है जिसका आशय लटकाने या झुकाने से है.

टोंटा मसकना

इस मुहावरे का भावार्थ है शोषण करना या धन हड़पना, शब्‍दार्थ रूप में भी इस मुहावरे का प्रयोग होता है जिसका अर्थ मार डालने से है (गले को दबाना).

'टोंटा' संस्‍कृत शब्‍द 'तुण्‍ड' से बना है जिसका आशय ग्रसिका, गला या गर्दन है. इसके करीब का एक शब्‍द है 'टोण्‍डा' जिसका आशय है बड़ा सा छेद. शायद गले की नली के कारण यह शब्‍द प्रचलन में आया होगा.
हिन्‍दी में प्रचलित टोंटी से भी 'टोंटा' का बनना माना जा सकता है.

अब देखें 'मसकना' को जो 'मस' और 'कना' से मिलकर बना है. 'मस' से बने अन्‍य शब्‍दों में 'मसक' का प्रयोग होता है यह अरबी 'मश्‍क' (चमड़े का पानी रखने वाला थैला) से बना है. छत्‍तीसगढ़ी 'मसक' शब्‍द दबाने की क्रिया या भाव के लिए प्रयोग में लाया जाता है. इस अनुसार से शब्‍दशात्रियों का मानना है कि, परिश्रम के लिए अरबी का एक शब्‍द है 'मशक्‍कत' हो सकता है कि इसके अपभ्रंश के रूप में छत्‍तीसगढ़ी में 'मसकना' प्रयुक्‍त होने लगा हो. इस मसकने का दो अर्थों में प्रयोग होता है एक दबाना दूसरा किसी कार्य के लिए जाना या चले जाना. मुहावरे के रूप में 'मसक देना' का प्रयोग इन दोनों अर्थों के लिए होता है. पहले ही लिखा जा चुका है कि इसका प्रयोग मार डालने या क्षति पहुचाने के लिए भी होता है. हिन्दी में स्वीकार्य 'मसका' फारसी मस्‍क से बना है जो मक्‍खन के लिए प्रयुक्त होता रहा है, अपभ्रंश में यह चिकनी चुपड़ी बातें करना, खुशामद का भाव, चापलूसी के लिए हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में समान रूप से प्रयोग हो रहा है.

टोनही चुहकना

इस छत्‍तीसगढ़ी मुहावरे का भावार्थ 'बेहद कमजोर होना या दुर्बल होना' है. आईये इस मुहावरे में प्रयुक्‍त छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द 'टोनही' और 'चुहकना' को स्‍पष्‍ट करते हैं.

छत्‍तीसगढ़ी स्‍त्रीवाचक विशेषण/संज्ञा शब्‍द 'टोनही' 'टोना' से बना है. 'टोना' संस्‍कृत शब्‍द 'तंत्र : जादू' का अपभ्रंश है, जिसका आशय मारन या अनिष्‍ट के लिए किसी व्‍यक्ति पर तंत्र का प्रयोग करने की क्रिया या भाव है. 'टोना' एवं 'टोटका' का प्रयोग लगभग एक साथ किया जाता है जिसमें 'टोटके' का आशय अनिष्‍ट निवारण के लिए किया जाने वाला तात्रिक कार्य से है. इस प्रकार से 'टोनही' का आशय जादू टोना करने वाली स्‍त्री, डायन है. इससे मिलते जुलते शब्‍दों में 'टोनहईया : जो जादू टोना करता हो', 'टोनहई : जादू टोना करने की क्रिया', 'टोनहावल : जादू टोने से प्रभावित व्‍यक्ति' आदि.

'चुहकना' चूने या टपकने की क्रिया 'चुह' से बना है. चुह से बने अन्‍य शब्‍दों में 'चुहउ' का आशय टपकने योग्‍य, 'चुहका : पानी का श्रोत या वह छिद्र जहां से पानी बूंद बूंद कर गिरे', 'चुहकी : निरंतर जल का रिसाव', 'चुहना : बूंद बूंद टपकना', 'चुहरा : वह स्‍थान जहां पानी हमेश चूता हो', 'चुहाना : टपकाना', 'चुचवाना : टपकाना इसका प्रयोग पछताने के लिए भी होता है' आदि है. इन सब शब्‍दों से परे 'चुहक' का आशय देखें, 'चुहक' चूसने की क्रिया या भाव के लिए प्रयुक्‍त होता है. संभावना है कि यह चुस्‍की से बना होगा. इसी से 'चुहकईया' बना है जिसका आशय चूसने वाला है. चुसवाने की क्रिया को 'चुहकाना' कहा जाता है. 'चुहकई' व 'चुहकना' का प्रयोग भी चूसने की क्रिया या भाव के लिए किया जाता है.


रूढि़गत परम्‍पराओं और किवदंतियों में विश्‍व के प्रत्‍येक क्षेत्र में समाज के इर्दगिर्द एक ऐसी महिला पात्र उपस्थित रही है जिसका संबंध जादू या तंत्र से रहा है. इसी स्‍त्री को डायन कहा जाता है एवं छत्‍तीसगढ़ में ऐसी स्त्री को 'टोनही' नाम दिया गया है. कहा जाता है कि 'टोनही' रात में तंत्र सिद्धि करने के लिए निकलती है. उसके जीभ से लगातार लार बहता हैं जो मुह से निकलते ही जलने लगता है. तथाकथित रूप में यह 'टोनही' तांत्रिक क्रियाओं के दौरान नाचती (झूपती) है और इसके टपकते लार लगातार (भंग-भंग) जलते रहते हैं. कहा यह जाता है कि ऐसी सिद्धि को प्राप्‍त कर चुकी 'टोनही' किसी भी जीवित (चर-अचर, पेंड, पशु, मनुष्‍य) को चुह‍क सकती है. वह अपनी स्‍वेच्‍छा से या किसी से दुश्‍मनी के चलते मांत्रिक प्रयोगों के द्वारा प्राणी को धीरे धीरे बीमार बनाती है और अंत में वह प्राणी मर जाता है. इसके बाद की क्रियाओं में 'टोनही जगाने' आदि की भी किवदंतियां है जिसमें वह 'टोनही' उस मृतक के शव पर 'झूप' कर उसकी आत्‍मा को अपनी सेवा के लिए वश में करती है. छत्‍तीसगढ़ सहित देश के अन्‍य क्षेत्रों में इस रूढि़ के चलते कई महिलाओं को सार्वजनिक रूप से मार दिया गया या फिर अत्‍याचार हुए. इसी को ध्‍यान में रखते हुए इस पर एक कानून भी बना जिसके बाद इस रूढि़ पर कुछ लगाम लग पाया.

दहरा के भरोसा बाढ़ी खाना

इस छत्तीसगढ़ी मुहावरे का भावार्थ है संभावनाओं पर कार्य करना. आईये अब इस मुहावरे में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द 'दहरा' एवं 'बाढ़ी' का विश्लेषण करें.

पानी भरे हुए खाई को हिन्दी में 'दहर' कहा जाता है. यही दहर अपभ्रंश में 'दहरा' में बदल गया होगा. छत्तीसगढ़ी में गहरा जलकुण्ड या नदी के गहरे हिस्से को 'दहरा' कहा जाता है. दहरा से संबंधित एक और मुहावरा है 'दहरा के दहलना : डर या भय से कॉंपना'. इस मुहावरे में प्रयुक्त शब्दों का आशय बताते हुए शब्दशास्त्रियों का अभिमत है कि संस्कृत के अकर्मक क्रिया 'दर' जिसका आशय 'डर' है से 'दहरा' बना है. 'दहरा के दहलना' में प्रयुक्त भावार्थ के अनुसार 'दहरा' का आशय डर का प्रयोग छत्तीसगढ़ी में बहुत कम होता है. सामान्य सोंच के अनुसार देखें तो गहरा से दहरा बना होगा यह प्रतीत होता है.

'बाढी' शब्द हिन्दी के बढ़ से बना है. इसके नजदीकी शब्दों में 'बाढ़' का आशय बढ़ने की क्रिया या भाव, वृद्धि है. अधिक वर्षा आदि के कारण नदी का बढ़ा हुआ जल स्तर को भी हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी में 'बाढ़' कहा जाता है. मान, योग्यता, अधिकार, मात्रा, संख्या आदि में वृद्धि को 'बाढ़ना' कहा जातजा है. धान को नापते समय बाढ़े सरा इसी उद्देश्य से कहा जाता है.

मूल में वृद्धि का यह भाव छत्तीसगढ़ में ऋण के लिए भी प्रयुक्त होता है. पारंपरिक रूप से धान्य उत्पादन क्षेत्र होने के कारण यहां लेन देन में मुद्रा के स्थान पर धान का प्रयोग होते रहा है. लोग ऋण में धान लेते रहे हैं, ऋण की पद्धतियों में जैसे साधारण ब्याज व चक्रवृद्धि ब्याज दर की पद्धति प्रचलित है. उसी प्रकार से छत्तीसगढ़ में ऋण के रूप में अन्न लेने की वह पद्धति जिसमें दिए गए मात्रा को बढ़ाकर अन्न के रूप में ही लौटाया जाता है वह 'बाढ़ी' कहलाता है.


छत्तीसगढ़ी के कई लोकगीतों और लोककथाओं में 'दहरा के भरोसे बाढ़ी खाने' का जिक्र आता है. इतिहास बताता है कि कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में कई बार भीषण अकाल पड़े, अकाल की निरंतरता रही. ऐसी स्थिति में लोग खाने के लिए तो अनाज ऋण में लेते ही थे साथ ही खेत में बीज बोने के लिए भी अनाज ऋण में लेते थे. वस्तु के अभाव में उसकी कीमत में वृद्धि के सिद्धांत के अनुसार ऋण देने वाला उस अनाज की मात्रा का डेढ़ा, दुगना वापसी की शर्त पर लोगों को अनाज देता था. लोग इस भरोसे पर कि चलो इस साल अच्छे पैदावार होनें पर ऋण लौटा ही देंगें सोंचकर ऋण लेते थे. संभावना के इस भाव से ही यह मुहावरा बना है.

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