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जनकवि स्व.कोदूराम “दलित” के गृह ग्राम टिकरी (अर्जुन्दा) में उनकी 47 वीं पुण्यतिथि का ऐतिहासिक आयोजन

[28 सितम्बर 2014]


टिकरी (अर्जुन्दा) में 05 मार्च 1910 को जन्मे जनकवि कोदूराम “दलित” जी की 47 वीं पुण्यतिथि उनके गृह गाँव टिकरी (अर्जुन्दा) के आम्बेडकर भवन में दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति और ग्राम टिकरी व अर्जुन्दा के उत्साही युवकों के संयुक्त तत्वाधान में 28 सितम्बर को मनाई गई. कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पं. दानेश्वर शर्मा, लक्ष्मण मस्तुरिया, मुकुंद कौशल, डॉ.निर्माण तिवारी के साथ ही दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति के अध्यक्ष डॉ.संजय दानी, सचिव संजीव तिवारी, रमाकान्तह बरडिया जी, दुर्ग के कविगण सूर्यकांत गुप्ता, उमाशंकर मिश्रा, संगवारी समूह के नवीन तिवारी अमर्यादित, जनकवि कोदूराम “दलित” जी के पुत्र कवि अरुण निगम तथा पुत्र-वधु कवियित्री श्रीमती सपना निगम और अर्जुन्दा-गुन्डरदेही के साहित्यकार केशव साहू, प्यारेलाल देशमुख, दिनेश्वर चंद्राकर आदि उपस्थित थे. आयोजन में जनकवि कोदूराम “दलित” जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला निगम और उनके पोते अभिषेक निगम विशेष रूप से उपस्थित थे. 


कार्यक्रम में सर्वप्रथम जनकवि कोदूराम ”दलित” के चित्र पर अतिथियों ने माल्यार्पण कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और दीप प्रज्जवलित किया. ग्राम टिकरी में दुर्ग और रायपुर से पधारे अतिथि साहित्यकारों के स्वागत के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकारों और स्व. कोदूराम “दलित” जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला निगम को टिकरी गाँव के प्रवीण लोन्हारे और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पुष्पलता लोन्हारे ने शाल और श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया. प्रवीण लोन्हारे ने स्वागत भाषण दिया. 

स्व. कोदूराम “दलित” जी के सुपुत्र अरुण निगम ने कहा कि जब दलित जी का निधन हुआ तब वे मात्र ग्यारह वर्ष के थे. बचपन के धुंधले से संस्मरण तो हैं किन्तु चूंकि दानेश्वर शर्मा जी ने दलित जी के साथ कई कवि सम्मेलनों के मंच साझा किये हैं और मुकुंद कौशल जी भी उनके शिष्य थे, अत: आज इन दोनों वरिष्ठ कवियों से दलित जी के कृतित्व और व्यक्तित्व के बारे में सुनना चाहेंगे. दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति के अध्यक्ष डॉ.संजय दानी ने जनकवि कोदूराम “दलित” जी की जीवन यात्रा के बारे में बताया. उन्होंने समिति द्वारा दलित जी पर प्रतिवर्ष पुण्यतिथि कार्यक्रम के आयोजन की बात कही. 

सुप्रसिद्ध कवि और गायक लक्ष्मण मस्तुरिया ने कहा कि उनकी दलित जी से मुलाकात नहीं हो पाई थी. मस्तुरिया जी ने पुण्यतिथि के अवसर पर अपनी कविताओं के माध्यम से भाव-सुमन समर्पित किये. 

मुकुंद कौशल ने बताया कि प्राथमिक शाला के दिनों में शाला में ही गणेश पूजा का आयोजन होता था. पूरे ग्यारह दिनों तक शाला में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ करते थे. गुरूजी बच्चों से नाटक और प्रहसन के साथ ही गहिरा नाच भी करवाते थे. गहिरा नाच में बच्चों को अपने लिखे दोहे देते थे. इन दोहों में सामाजिक चेतना , राष्ट्र निर्माण की भावना हुआ करती थी. उस समय का एक दोहा जो उन्होंने पढ़ा था आज भी याद है...हमर गाँव के कुछ ढोंगी मन लम्हा तिलक लगायं रे, हरिजन मन के छुआ मानयं, चिंगरी मछरी खायं रे . मुकुंद कौशल जी ने बताया कि उन दिनों वे बहुत छोटे थे लगभग पन्द्रह सोलह साल के, गुरूजी उन्हें कवि सम्मेलनों के मंचों पर ले गए. उन्होंने और भी बहुत से संस्मरण सुनाये. उन्होंोनें कहा कि गुरूजी की जयंती या पुण्ये तिथि पर इस गाँव में विशाल आयोजन होना चाहिए जिसमें आसपास के गाँव के सभी लोग आयें. उन्होंने ग्रामवासियों को हरसंभव सहयोग देने के प्रति आश्वस्त किया. 

वरिष्ठत कवि दानेश्वर शर्मा ने बताया कि प्राथमिक शाला में अध्ययन के समय दलित जी उनके गुरूजी थे. कोदूराम “दलित” जी का जन्म पाँच मार्च उन्नीस सौ दस को ग्राम टिकरी में हुआ था. उनकी कविताओं में देश की आजादी का आव्हान के साथ-साथ आजादी के बाद भारत के नव-निर्माण की भावना भी. आजादी के पूर्व जब देशवासियों को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं था तब गुरूजी बच्चों में राउत दोहों के माध्यम से आजादी के लिये जूझने को प्रेरित करते थे. उदहारण के तौर पर उन्होंने बताया ‘गाँधी जी के छेरी भैया, में में में नरियाय रे, एखर दूध ला पी के संगी बुढ़वा जवान हो जाये रे...’ कवि दानेश्वर शर्मा ने अपने बारे में बताया कि वे पहले केवल हिन्दी में लिखते थे, गुरूजी ने कहा कि छत्तीसगढ़ी में लिखो तो पहले तो उनहोंने कहा कि नइ बने गुरूजी, फिर बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ी में लिखना शुरू किया. पहली कविता बेटी कि बिदाई पर लिखी “कइसे के बेटी तोला मयं भेजवं, अँचरा के मोती ला दहरा मा फेंकवं “ इस गीत को एच.एम.व्ही. कंपनी ने रिकार्ड किया, साथ ही और भी गीत जैसे तपत कुरु भाई तपत कुरु बोल रे मिट्ठू तपत कुरु...आदि श्रीमती मंजुला दास गुप्ता की आवाज में रिकार्ड किये गए. अपनी अमरीका यात्रा का संस्मरण सुनाते हुए शर्मा जी ने बताया कि अमरीका में एक कार्यक्रम में वे किसी मित्र से छत्तीसगढ़ी में बात कर रहे थे तब एक महिला ने पूछ कि आप किस भाषा में बात कर रहे हैं, मैंने कहा कि छत्तीसगढ़ी में, तब उस महिला ने भाषा से प्रभावित होकर वायस आफ अमेरिका के लिये एक इंटरव्यू लिया. गुरु जी ने छत्तीसगढ़ी में लिखने की प्रेरणा देकर मुझे कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया. कवि दानेश्वर शर्मा ने दलित जी के बहुत से संस्मरण सुनाये. संस्मरण सुनते हुए वे कई बार भाव-विभोर हो उठे. उन्होंने टिकरी वासियों से कहा कि आप लोग जब भी गुरूजी का कोई कार्यक्रम करेंगे, मैं जरुर आऊंगा. 

कार्यक्रम के अध्यक्ष ताराचंद मेश्राम (पूर्व प्राचार्य) ने अपने उदबोधन में कहा कि श्री कोदूराम “दलित” जी कि वजह से ही आज उनका परिवार शिक्षित है और उच्च पदों पर विराजमान है. ऐसे धरोहर को पाकर पूरा गाँव अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहा है. 

कार्यक्रम में टिकरी, अर्जुन्दा और आसपास के ग्रामीण और साहित्यकार काफी उत्साह के साथ भारी संख्या में उपस्थित थे. कार्यक्रम का सफल सञ्चालन अर्जुन्दा के गीतकार मिथिलेश शर्मा ने अपने चुटीले अंदाज में किया. आभार प्रदर्शन रितेश देवांगन ने किया. ग्राम टिकरी अर्जुन्दा के राकेश मेश्राम, श्रीमती लता मेश्राम, जितेन्द्र सुखदेवे, श्रीमती अमृता सुखदेवे, हरिशंकर साहू, सुभाष देशमुख, डिगेंद्र साहू, ढालू विश्वकर्मा, छगन देवांगन, गिरिधर देवांगन, योगेन्द्र साहू, भुवन सिन्हा, डिलेश्वर साहू, गजानंद सिन्हा, राजू देशमुख,निर्मल सिन्हा, वेद सिन्हा, सुभाष, गजेन्द्र सहित अनेक युवाओं ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में अपनी सहभागिता दी.

- अरूण कुमार निगम

छत्तीसगढ़ी काव्य में अमर कवि कोदूराम ‘दलित’


28 सितम्बर : 46 वीं पुण्य तिथि पर विशेष
-विनोद साव (अमर किरण में 28 सितम्बर 1989 को प्रकाशित)

साहित्यकार का सबसे अच्छा परिचय उसकी रचना से हो जाता है | साहित्यकार की कृतियाँ उसकी परछाई है | रचनाकार का व्यक्तित्व, चरित्र, स्वभाव और दृष्टिकोण उसकी रचनाओं में प्रतिबिम्बित होता है | छत्तीसगढ़ी संस्कृति और साहित्य के धनी दुर्ग नगर में एक स्मय में ऐसे ही रचनाकार छत्तीसगढ़ी काव्य में अमर कवि कोदूराम ‘दलित’ उदित हुये जिनका परिचय उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत है :

“लइका पढ़ई के सुघर, करत हववँ मयँ काम
कोदूराम ‘दलित’ हवय , मोर गँवइहा नाम
शँउक मु हूँ –ला घलो, हवय कविता गढ़ई के
करथवँ काम दुरुग –माँ मयँ लइका पढ़ई के “

दलित जी छरहरे, गोरे रंग के बड़े सुदर्शन व्यक्तित्व के थे | कुर्ता, पायजामा, गाँधी टोपी और हाथ में छतरी उनकी पहचान बन गई थी | हँसमुख और मिलनसार होने के कारण सभी उम्र और वर्ग के लोगों में हिलमिल जाया करते थे | कविता करना उनका प्राकृतिक गुण था | उन्हीं के शब्दों में –

“कवि पैदा होकर आता है,
होती कवियों की खान नहीं
कविता करना आसान नहीं |“

रचना क्षमता प्रकृति प्रदत्त इस गुण के कारण ही दलित जी का रचना संसार इतना व्यापक है कि उन्होंने न केवल छत्तीसगढ़ी बल्कि हिन्दी साहित्य की सभी विधओं में भी लिखा | कवि की आत्मा रखने के बाद भी उन्होंने अनेकों कहानियाँ, निबंध, एकांकी, प्रहसन, पहेलियाँ,बाल गीत और मंचस्थ करने के लिये क्रिया-गीत (एक्शन सांग) लिखे | दलित जी की अधिकांश कवितायें छंद शैली में लिखी गई हैं | वे हास्य-व्यंग्य के कुशल चितेरे थे | व्यंग्य और विनोद से भरी उनकी कविता चुनाव के टिक्कस की पंक्तियाँ देखिये | चुनाव के पास आने पर नेताओं में टिकट की लालसा कितनी तीव्र हो जाती है –

बड़का चुनाव अब लकठाइस,
टिक्कस के धूम गजब छाइस |
टिक्कस बर सब मुँह फारत हें
टिक्कस बर हाथ पसारत हें
टिक्कस बिन कुछु सुहाय नहीं
भोजन कोती मन जाय नहीं
टिक्कस बिन निदरा आय नहीं
डौकी-लइका तक भाय नहीं
टिक्कस हर बिकट जुलुम ढाइस
बड़का चुनाव अब लकठाइस “|

स्वाधीनता के पहले जिन नेताओं ने देश के लिये त्याग और बलिदान दिया उनकी तुलना में वे आज के सुविधाभोगी नेताओं के विषय में कहते हैं | ध्यान दें छत्तीसगढ़ी की यह रचना हिन्दी के कितने करीब है –

“ तब के नेता जन हितकारी |
अब के नेता पदवीधारी ||
तब के नेता किये कमाल |
अब के नित पहिने जयमाल ||
तब के नेता काटे जेल |
अब के नेता चौथी फेल ||
तब के नेता गिट्टी फोड़े |
अब के नेता कुर्सी तोड़े ||
तब के नेता डण्डे खाये |
अब के नेता अण्डे खाये||
तब के नेता लिये सुराज |
अब के पूरा भोगैं राज ||

अंतिम पंक्ति में कवि जनता को जागृत करते हैं –

तब के नेता को हम माने |
अब के नेता को पहिचाने ||
बापू का मारग अपनावें |
गिरे जनों को ऊपर लावें ||

दलित जी ने अपना काव्य-कौशल केवल लिखकर ही नहीं वरन् मंचों पर प्रस्तुत करके भी दिखलाया | वे अपने समय में कवि-सम्मेलनों के बड़े ‘हिट’ कवि थे | तत्कालीन मंचीय कवि पतिराम साव, शिशुपाल, बल्देव यादव, निरंजन लाल गुप्त, दानेश्वर शर्मा आदि सब एक साथ हुआ करते थे | दलित जी को आकाशवाणी नागपुर, इंदौर और भोपाल केंद्रों में भी आमंत्रित किया जाता था जहाँ उनकी कवितायें और लोक-कथायें प्रसारित होती थीं | कवि सम्मेलनों में अनेक छोटे-बड़े स्थानों में वे गये | विशेषकर रायपुर, बिलासपुर, भिलाई और धमतरी के मंचों पर उन्होंने अपने काव्य-कौशल का डंका बजाया | शासकीय सूचना और प्रसारण विभाग द्वारा उज्जैन के कुम्भ मेले में भी काव्य-पाठ के लिये आमंत्रित किये गये थे | मद्य-निषेध पर उनकी कविता म.प्र.शासन द्वारा पुरस्कृत हुई |

मंचों में उनकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई थी कि जब स्व. इंदिरा गांधी का 1963 में दुर्ग के तुलाराम पाठशाला में आगमन हुआ था तब स्वागत के लिये दलित जी को ही चुना गया | स्वागत गान की कुछ पंक्तियाँ देखिये –

धन्य आज की घड़ी सुहानी, धन्य आज की शाम
धन्य-धन्य हम दुर्ग निवासी,धन्य आज यह धाम ||

दलित जी एक साहित्यकार ही नहीं बल्कि एक योग्य अध्यापक, समाज सुधारक और संस्कृत निष्ठ व्यक्ति थे | वे भारत सेवक समाज और आर्य समाज के सक्रियसदस्य थे | जिला सहकारी बैंक के संचालक और म्युनिस्पल कर्मचारी सभा के दो बार मंत्री हुये तथा सरपंच भी रहे | वे जुझारू आदमी थे | 1947 में स्वराज के बाद शिक्षक संघ के प्रांतीय आंदोलन में कूद पड़े तो उन्हें और पतिराम साव जी को अन्य आंदोलनकारियों के साथ गिरफ्तार कर 15 दिनों के लिये नागपुर जेल में बंद रखा गया | जेल से छूटने के बाद इन दोनों को प्रधानाध्यापक पद से ‘रिवर्ट’ कर दिया गया | राष्ट्र के लिये शहीद सैनिकों को समर्पित उनकी पंक्तियाँ देखिये –

आइस सुग्घर परव सुरहुती अऊ देवारी
चल नोनी हम ओरी-ओरी दिया बारबो
जउन सिपाही जी-परान होमिस स्वदेश बर
पहिली ऊँकर आज आरती हम उतारबो ||

वे बच्चों में भी राष्ट्र-प्रेम की भावना भरते हुये कहते हैं –

उठ जाग हिन्द के बाल वीर, तेरा भविष्य उज्जवल है
मत हो अधीर, बन कर्मवीर, उठ जाग हिन्द के बाल वीर ||


उनके अनेकों बाल गीतों में एक गीत इस प्रकार है –

अम्मा ! मेरी कर दे शादी
ऐसी जोरू ला दे जल्दी
जैसी बतलाती थी दादी
न पाँच फीट से छोटी हो
न अधिक खरी न खोटी हो
हो चंट चुस्त चालाक किंतु
दिखलाई दे सीधी-सादी ||

दलित जी की रचनाओं का प्रकाशन देश की अनेक पत्रिकाओं में हुआ | उन दिनों नागपुर से-नागपुर टाइम्स, नया खून, लोक मित्र,नव प्रभात ,जबलपुर से –प्रहरी, ग्वालियर से ग्राम-सुधार, नव राष्ट्र, बिलासपुर से पराक्रम, चिंगारी के फूल, छत्तीसगढ़ सहकारी संदेश , दुर्ग से- साहू संदेश, जिंदगी, ज्वालामुखी , चेतावनी, छत्तीसगढ़ सहयोगी, राजनांदगाँव से जनतंत्र आदि पत्रिकाओं में इनकी कवितायें छपती रहती थीं |

दलित जी का जीवन अत्यंत संघर्षमय और अभावग्रस्त रहा | यही कारण है कि हजारों की संख्या में लिखी हुई अपनी रचनाओं का प्रकाशन वे नहीं करा पाये. सन् 1965 में पतिराम साव ,मंत्री हिंदी साहित्य समिति , दुर्ग के सहयोग से एक मात्र काव्य-संकलन “सियानी-गोठ” का प्रकाशन हो पाया. यह संकलन स्व.घनश्याम सिंह गुप्ता को समर्पित है. जिसमें तत्कालीन विधायक स्व.उदय राम वर्मा का संदेश है | “सियानीगोठ” काव्य संकलन कुण्डली शैली में लिखी गई है जिनमें 27 कुण्डलियों का समावेश है | उल्लेखनीय है कि कुण्डलियों के सभी कवि बीच में अपना नाम जरूर डाला करते थे लेकिन दलित जी ने कहीं भी अपना नाम नहीं डाला है | इसका लाभ समय-समय पर कुछ लोगों ने उठाया और दलित जी की रचना पर अपना अधिकार जताया है | यह संकलन विविध विषयों पर आधारित है | इसमें आध्यात्मपरक रचनायें हैं जैसे “पथरा”शीर्षक से –

“ भाई एक खदान के, सब्बो पथरा आयँ
कोन्हों खूँदे जायँ नित, कोन्हों पूजे जायँ ”

इस संकलन में हास्य रस, मानवीय सम्वेदना, जानवरों के नाम पर, राष्ट्र-प्रेम, दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं पर, विज्ञान की स्वीकारोक्ति है –

आइस युग विज्ञान के, सीखो सब विज्ञान
सुग्घर आविष्कार कर, करो जगत कल्यान

सरकारी योजनाओं पर जैसे पंचायती राज शीर्षक से –

हमर देश मा भइस हे, अब पंचयात राज
सहराये लाइक रथय, येकर सब्बो काज

विविध शीर्षकों पर लिखित ये कवितायें दलित जी के आधुनिक, वैज्ञानिक, समाजवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण होने के परिचायक हैं | उनकी अन्य रचनायें जिन्हें प्रकाशन की प्रतीक्षा है, वे हैं –

पद्य – हमर देस, कनवा समधी, दू मितान, प्रकृति वर्णन, बाल कविता और कृष्णजन्म | गद्य – अलहन, कथा-कहानी | प्रहसन, लोकोक्तियाँ, बाल-निबंध और शब्द-भण्डार आदि हैं |

दलित जी की स्मृति में 5 मार्च 1989 को उनकी 67 वीं जयंती रायपुर में मनाई गई | चंदैनी-गोंदा और कारी के निर्माता राम चंद्र देशमुख ने दलित जी का स्मरण करते हुये कहा – वे छत्तीसगढ़ के इतने ख्यात नाम व्यक्ति थे जिनके निधन का समाचार मुझे बम्बई के वहाँ के अखबारों में मिला| चंदैनी गोंदा के प्रथम प्रदर्शन में प्रथम गीत दलित जी का था | नाम के भूखे न रहने वाले दलित जी की “नाम” शीर्षक से प्रकाशित अंतिम कविता देखिये -

रह जाना है नाम ही, इस दुनियाँ में यार
अत: सभी का कर भला, है इसमें ही सार
है इसमें ही सार, यार तू तज के स्वारथ
अमर रहेगा नाम,किया कर नित परमारथ
कायारूपी महल, एक दिन ढह जाना है
किंतु सुनाम सदा दुनियाँ में रह जानाहै ||

(दैनिक अमर किरण और विनोद साव से साभार)
इस ब्लॉग में दलित जी पर अन्य पोस्ट इस कड़ी में देखें.

काली थी लैला, काला था कमलीवाला -ज्ञानसिंहठाकुर

5 मार्च जनकवि कोदूराम दलित जयंती पर विशेष .....

(नई दुनिया 4 मार्च1968 में प्रकाशित लेख, नई दुनिया से साभार)

जिसका कमलीवाला था वह स्वयं भी अपने कमलीवाले की तरह ही काला था तन से, मन से नहीं.....| काव्य-साधना के श्याम रंग थे छत्तीसगढ़ी के वयोवृद्धकवि कोदूराम जी “दलित” | उनके ‘काले की महिमा’ ने तो छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में धूम मचा दी थी | ...गोरे गालों पर काला तिल खूब दमकता....उनका यह कटाक्ष जाने कितनी लावण्यमयियों के मुखड़े पर लाज की लाली बिखेर देता था..... नव-जवान झूम उठते थे.....एक समां बँध जाता था उनकी इस कविता से | आज बरबस ही उनकी स्मृति आती है तो स्मृत हो आते हैं उनके पीड़ा भरे वे शब्द, एक स्वप्न की तरह उनका वह झुर्रीदार चेहरा उभर उठता है स्मृति के आकाश पर.....| वे हाथ में थैली लिए बुझे-बुझे से चले आ रहे थे | मेहता निवास (दुर्ग) के निकट ही वे मुझे मिल गये | मैंने कुशल-क्षेम पूछी तो बरबस ही उनकी आँखें द्रवित हो आई....कहने लगे ज्ञान सिंह बहुत कमजोर हो गया हूँ | चंद्रजी व वोरा जी ने मिलकर सिविल सर्जन को दिखाया है...अब अच्छा हो जाऊंगा....| अस्पताल में दवा नहीं है | डॉक्टर लिख देते हैं , प्रायवेट मेडिकल स्टोर्स से दवा खरीदना पड़ता है.... इंजेक्शन लग रहे हैं , ताकत बिल्कुल नहीं है शरीर में और यह कहते-कहते उनका कंठ अवरुद्ध हो आया | मौत की काली परछाई वे देख रहे थे | एकदम निराश , एकदम शिथिल शून्य | मैंने कहा दलित जी आप आराम अधिक करें |ईश्वर सब ठीक कर देगा | आप शीघ्र ही स्वस्थ हो जाएंगे | इंजेक्शन लग रहे हैं न.....तो, ताकत भी आ जायेगी....| उनकी निराश आँखें क्षण भर मुझे देखती रहीं | फिर उन्होंने कहा जिसमें एक साहित्यकार की मर्मांतक पीड़ा कराह रही थी | कहने लगे ज्ञानसिंह आधा तो कवि सम्मेलन करा - करा कर लोगों ने मार डाला मुझको | रात भर चाय पिला-पिलाकर कविता सुनते हैं.....| खाने को दिया तो ठीक है नहीं तो सुनाओ कविता जाग-जाग कर आधी रात तक और 21) लो और घर जाओ | कहने लगे ये पी. आर. ओ. संतोष शुकुल कराते हैं न सरकारी कवि सम्मेलन उसमें तो कोई चाय तक को नहीं पूछता....|

सोचता हूँ तो ये सब चेहरे एक-एक कर स्मृत हो आते हैं.....महाकवि निराला....मैथली शरण गुप्त....माखनलाल चतुर्वेदी....मुक्तिबोध इन्होंने हमें क्या नहीं दिया और क्या दिया हमने उन्हें बदले उसके....| वह इलाहाबाद की माटी हो या दिल्ली की या छत्तीसगढ़ की ...माटी सबकी प्यारी है.... है तो भारत की ही माटी... और इस संदर्भ में याद हो आयी हैं वे पंक्तियाँ जाने क्यों....तन का दिया,प्राण की बाती ...दीपक जलता रहा रात भर | हाँ हमारे दलित जी भी जलते रहे दीपक की तरह....और भूखी और जलती सदी का छत्तीसगढ़ी का कवि दलित भी खो गया पीड़ा के बियाबानों में....| दलित जी सचमुच दलित ही थे शायद जिनका शोषण किया गया | तब वे काफी अस्वस्थ थे | एक कवि गोष्ठी में उनकी अस्वस्थता का समाचार मुझे मिला तब मैंने कहा भाई सब मिलकर कुछ करो.....कुछ और नहीं तो उनका सार्वजनिक अभिनंदन ही कर दो....मेरी आवाज को शून्य आकाश निगल गया...और बात आई गई हो गई | नियति को कुछ और ही मंजूर था....| उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनका एक संग्रह छप जाता परन्तु उनकी यह इच्छा उस समय बड़ी ही कठिनाई से पूरी हो पाई जब व्यक्ति की कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती है | एक ओर मौत के लम्बे और ठंडे हाथ आगे बढ़ रहे थे उनकी ओर और दूसरी ओर छप रहा था उनका काव्य-संग्रह | कैसी विडम्बना थी वह | अपना जीवन जिसने माँ भारती के चरणों में समर्पित कर दिया उसे अंतिम समय में क्या मिला.....गहन नैराश्य....पीड़ा और मुद्रा राक्षस का आर्तनाद... | सोचता हूँ मेरे छत्तीसगढ़ की धरती सरस्वती पुत्रों को जन्म देती आई है ....क्या उसे उसके पुत्रों की कराह भी सुनाई नहीं देती | जिस धरती की खुशी उसकी खुशी थी ... जिस धरती का दु:ख उसका दु:ख था ....उस धरती के लोगों ने क्या दिया उसे.... और एक पश्चाताप की अग्नि में मैं जलने लगता हूँ.... चाहता हूँ इस प्रसंग से हट जाऊँ.....चाहता मोड़ दूँ एक पुष्ट कविता की तरह ......लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाता हूँ .... और एक कवि का... नहीं-नहीं .....एक व्यक्ति का एक सर्वहारे का झुर्रीदार चेहरा आँखों में झूल उठता है |…नहीं-नहीं , कवि तो युग-दृष्टा होता है....वह सर्वहारा कैसे हो सकता है | वह अजर-अमर है .....छत्तीसगढ़ की माटी में जब तक सोंधी-सोंधी महक उठेगी ,जब तक चाँद और चकोर है, अमराइयों में जब तक काली कोयल गायेगी....चातक जब तक स्वाती की एक बूँद को तरसेगा , तब तक वह अजर-अमर है ....उसके झुर्रीदार चेहरे पर जाने कितने प्रश्न-चिन्ह अंकित थे....और वे छत्तीसगढ़ की माटी में आज भी प्रश्न-चिन्ह बन कर अंकित हैं ....शायद सदा अंकित रहेंगे |

आज भी जब दुर्ग के उन गली –कूचों से गुजरता हूँ तो आते-जाते यह ख्याल आता है कि शायद दलित जी इस ओर से आते होंगे | पाँच-कंडील चौराहे पर पहुँचकर ठिठक जाता हूँ....तस्वीरों की यही दुकान है जहाँ उनकी खास बैठक होती थी ....यही वह स्थान है जहाँ वे घंटों बैठे खोये-खोये से जाने क्या सोचा करते थे | मेरे कानों पर फिर उनके शब्द गूँज उठे हैं....आप बहुत अच्छा लिख रहे हो......शिक्षक वाली कविता बहुत सुंदर है.....बिना कफन मत निकले लाशें सरस्वती के बेटों की...हँसी खुशी मत लुटे किसी भी लक्ष्मी के अब ओठों की....आपका आशीर्वाद है दलित जी ....मैं कहता हूँ | ...आज फिर बरबस ही हृदय भर आया है | जीवन संघर्षों से जूझते हुये भी एक शिक्षक ने छत्तीसगढ़ी बोली में जो कवितायें लिखी हैं उनमें न केवल लोकपरक अनुभूतियों का जीता-जागता चित्रण है बल्कि उनमें छत्तीसगढ़ की धरती का प्यार है.... सोंधी-सोंधी महक है |यहाँ की लोक-संस्कृति व अलबेले लोक चित्र हैं जिनके माध्यम से वे सदा अजर-अमर रहेंगे | आज उनकी प्रथम जयंती की पावन बेला में सरस्वती के इस वरद् पुत्र को अपने श्रद्धा के सुमन अर्पित करते हैं |

-ज्ञानसिंहठाकुर 
(नई दुनिया 4 मार्च1968 में प्रकाशित लेख, नई दुनिया से साभार)

छत्तीसगढ़ के जन-कवि स्व.कोदूराम "दलित" के 102 वें.जन्म दिन पर विशेष...


-अरुण कुमार निगम 

कवि कोदूराम 'दलित' का जन्म ५ मार्च १९१० को ग्राम टिकरी(अर्जुन्दा),जिला दुर्ग में हुआ . आपके पिता श्री राम भरोसा कृषक थे.आपका बचपन ग्रामीण परिवेश में खेतिहर मजदूरों के बीच बीता. आपने मिडिल स्कूल अर्जुन्दा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की . तत्पश्चात नार्मल स्कूल रायपुर , नार्मल स्कूल बिलासपुर में शिक्षा ग्रहण की .स्काउटिंग,चित्रकला ,साहित्य विशारद में आपको सदैव उच्च स्थान प्राप्त हुआ .१९३१ से १९६७ तक आर्य कन्या गुरुकुल,नगर पालिका परिषद् तथा शिक्षा विभाग दुर्ग की प्राथमिक शालाओं में आप अध्यापक और प्रधान अध्यापक के रूप में कार्यरत रहे .

अपने १९२६ में कवितायेँ लिखना प्रारंभ की. आपकी रचनाएँ अनेक समाचार पत्रों एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं."सियानी गोठ"(१९६७) तथा "बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय"(२०००) आपकी प्रकाशित पुस्तकें हैं.आपकी कविताओं तथा लोक कथाओं का प्रसारण आकाशवाणी भोपाल ,इंदौर, नागपुर, रायपुर से अनेक बार हुआ है.मध्य प्रदेश शासन , सूचना-प्रसारण विभाग , म.प्र.हिंदी साहित्य अधिवेशन ,विभिन्न साहित्यिक सम्मलेन ,स्कूल-कालेज के स्नेह सम्मलेन, किसान मेला, राष्ट्रीय पर्व ,गणेशोत्सव के कई मंचों पर अपने काव्य पाठ किया है. सिंहस्थ मेला (कुम्भ) उज्जैन में भारत शासन द्वारा आयोजित कवि सम्मलेन में महाकौशल क्षेत्र से कवि के रूप में आप आमंत्रित किये गए. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के नगर आगमन पर अपने काव्यपाठ किया है.

आप राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा, इकाई -दुर्ग के सक्रिय सदस्य रहे .दुर्ग जिला साहित्य समिति के उपमंत्री, छत्तीसगढ़ साहित्य के उपमंत्री, दुर्ग जिला हरिजन सेवक संघ के मंत्री, भारत सेवक समाज के सदस्य,सहकारी बैंक दुर्ग के एक डायरेक्टर ,म्यु.कर्मचारी सभा नं.४६७, सहकारी बैंक के सरपंच, दुर्ग नगर प्राथमिक शिक्षक संघ के कार्यकारिणी सदस्य, शिक्षक नगर समिति के सदस्य जैसे विभिन्न पदों पर सक्रिय रहते हुए आपने अपने बहु आयामी व्यक्तित्व से राष्ट्र एवं समाज के उत्थान के लिए सदैव कार्य किया है.

आपका हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य में गद्य और पद्य दोनों पर सामान अधिकार रहा है. साहित्य की सभी विधाओं यथा कविता, गीत, कहानी ,निबंध, एकांकी, प्रहसन, बाल-पहेली, बाल-गीत, क्रिया-गीत में आपने रचनाएँ की है. आप क्षेत्र विशेष में बंधे नहीं रहे. सारी सृष्टि ही आपकी विषय-वस्तु रही है. आपकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं. आपके काव्य ने उस युग में जन्म लिया जब देश आजादी के लिए संघर्षरत था .आप समय की सांसों की धड़कन को पहचानते थे . अतः आपकी रचनाओं में देश-प्रेम ,त्याग, जन-जागरण, राष्ट्रीयता की भावनाएं युग अनुरूप हैं.आपके साहित्य में नीतिपरकता,समाज सुधार की भावना ,मानवतावादी, समन्वयवादी तथा प्रगतिवादी दृष्टिकोण सहज ही परिलक्षित होता है.

हास्य-व्यंग्य आपके काव्य का मूल स्वर है जो शिष्ट और प्रभावशाली है. आपने रचनाओं में मानव का शोषण करने वाली परम्पराओं का विरोध कर आधुनिक, वैज्ञानिक, समाजवादी और प्रगतिशील दृष्टिकोण से दलित और शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया है. आपका निति-काव्य तथा बाल-साहित्य एक आदर्श ,कर्मठ और सुसंस्कृत पीढ़ी के निर्माण के लिए आज भी प्रासंगिक है.

कवि दलित की दृष्टि में कला का आदर्श 'व्यव्हार विदे' न होकर 'लोक-व्यव्हार उद्दीपनार्थम' था. हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों ही रचनाओं में भाषा परिष्कृत, परिमार्जित, साहित्यिक और व्याकरण सम्मत है. आपका शब्द-चयन असाधारण है. आपके प्रकृति-चित्रण में भाषा में चित्रोपमता,ध्वन्यात्मकता के साथ नाद-सौन्दर्य के दर्शन होते हैं. इनमें शब्दमय चित्रों का विलक्षण प्रयोग हुआ है. आपने नए युग में भी तुकांत और गेय छंदों को अपनाया है. भाषा और उच्चारण पर आपका अद्भुत अधिकार रहा है. आपकी रचनाएँ इन्टरनेट के www.gharhare.blogspot.in पर पढ़ी जा सकती है. पर पढ़ी जा सकती है.

कवि कोदूराम"दलित" का निधन २८ सितम्बर १९६७ को हुआ.

छत्तीसगढ़ी जन-कवि – स्व.कोदूराम”दलित” (आज 28 सितम्बर को 44 वीं पुण्य-तिथि पर विशेष)

मध्य प्रदेश का पूर्वीय अंचल छत्तीसगढ़ कहलाता है. इस क्षेत्र में हिंदी की एक उप भाषा छत्तीसगढ़ी बोली जाती है.छत्तीसगढ़ी का पद्य-साहित्य यथेष्ट सम्पन्न है.गत पचास वर्षों में छत्तीसगढ़ी काव्य के पितामह पं.सुंदर लाल शर्मा से लेकर वर्तमान पीढ़ी के छत्तीसगढ़ी काव्यकारों के बीच अनेक प्रतिभाशाली कवियों की एक सशक्त श्रृंखला रही है.इस श्रृंखला की एक कड़ी के रूप में दुर्ग के स्व.कोदूराम “दलित” का नाम ससम्मान लिया जाता रहा है. जिन्हें काल के कठोर हाथों ने पिछले दिनों हमसे छीन लिया.
कुर्ता, पैजामा, सिर पर गाँधी टोपी, पैरों में चप्पल, एक हाथ में छाता, दूसरे में एक थैली – तथा मुख पर एक निश्छल - खिली हुई हँसी से युक्त इस सरल व्यक्तित्व को देख कर कोई भी अनुमान भी नहीं कर पाता था कि वह छत्तीसगढ़ी के एक प्रमुख कवि को देख रहा है. जब से हमने होश सम्हाला था हमने दलित जी के स्वास्थ्य में कभी कोई परिवर्तन नहीं पाया था. अत: मित्रों के बीच हम लोग उनकी चर्चा एक सदाबहार कवि के रूप में किया करते थे.

दलित जी का जन्म 5 मार्च 1910 को दुर्ग जिले के टिकरी नामक गाँव में  एक निर्धन कृषक परिवार में हुआ था. बाल्यकाल सरल एवं सहृदय ग्रामीणों के बीच बीता. हरी-भरी अमराइयों, लहलहाते खेतों, महमहाते बागों एवम लहराते सरोवरों ने उनके हृदय में प्रकृति के प्रति अपार आकर्षण का बीज बो दिया था जो आगे चल कर काव्य के रूप में अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित हुआ. मिडिल तक उनकी शिक्षा अर्जुंदा नामक स्थान में हुई.  एक होनहार छात्र के रूप में दलित जी नार्मल स्कूल की प्रवेश एवं अंतिम परीक्षाओं में सर्वप्रथम रहे. एक प्राथमिक शाला के शिक्षक के रूप में उन्होंने जीवन में प्रवेश किया और अंत में अनेक वर्षों तक वे दुर्ग में प्रधान अध्यापक के पद पर रहे.
दलितजी सन 1926 में एक कवि के रूप में साहित्य जगत में आये. काव्य की प्रेरणा उन्हें आशु कवि श्री पीला लाल चिनोरिया से प्राप्त हुई. दलित जी ने हिंदी तथा छत्तीसगढ़ी दोनों में काव्य रचना की परंतु छत्तीसगढ़ी के कवि के रूप में उन्हें अधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई.कविता के क्षेत्र में ही नहीं , जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उन्होंने उसी लगन और उत्साह से कार्य किया था.त्रिपुरी –कांग्रेस अधिवेशन में वे एक स्वयं-सेवक के रूप में सम्मिलित हुये थे.यह सेवा का भाव उनमें जीवन पर्यंत रहा परंतु साथ ही वे स्वाभिमानी भी बड़े थे.एक प्राथमिक शाला के शिक्षक के रूप में कठिन से कठिन आर्थिक परिस्थितियों में भी उन्होंने स्वाभिमान को बिकने नहीं दिया. दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति ,दुर्ग नगर शिक्षक संघ, हरिजन सेवक संघ तथा सहकारी साख समिति आदि संस्थाओं के मंत्री के रूप में उन्होंने दुर्ग नगर की उल्लेखनीय सेवा की थी.दुर्ग के शिक्षकनगर के निर्माण की पृष्ठ भूमि में भी दलित जी के अथक प्रयत्नों की मौन गाथा है.
वे सच्चे अर्थों में एक जनकवि थे.उन्होंने वयस्कों के लिये ही नहीं ,बच्चों के लिये भी यथेष्ठ साहित्य का सृजन किया था. पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो तथा कवि सम्मेलनों के द्वारा उनकी  छत्तीसगढ़ी जन-जीवन में घुलमिल सी गयी थीं. मध्यप्रदेश शासन द्वारा अनेक अवसरों पर आपकी रचनायें पुरस्कृत भी हुई थीं. दलित जी के काव्य की मुख्य तीन धाराएं हैं – नीति काव्य, राष्ट्रीय-रचनायें एवं हास्य-व्यंग्य से पूर्ण कवितायें. जहाँ तक उनके नीति काव्य का सम्बंध है, दलित जी छत्तीसगढ़ के ’गिरधर कविराय’ हैं .उनकी कतरनी (कैंची) –सूजी (सुई) शीर्षक रचना देखिये –
काटय – छाँटय कतरनी,सूजी सीयत जाय.
सहय अनादर कतरनी,सूजी आदर पाय.
सूजी आदर पाय ,रखय दरजी पगड़ी मां
अउर कतरनी ला चपकय, वो गोड़ तरी मां.
फल पाथयँ उन वइसन, जइसन करथयं करनी
सूजी सीयत , काटत –छाँटत जाय कतरनी.
( कैंची काटती-छाँटती है तथा सुई सीती जाती है फलस्वरूप कैंची को अनादर तथा सुई को आदर प्राप्त होता है. सुई को दर्जी अपनी पगड़ी में रखता है जबकि कैंची पैरों के नीचे दबाई जाती है. अपने कर्मों के अनुसार  ही व्यक्ति को फल मिलता है.)
दलित जी में राष्ट्रीय भावनायें कूट-कूट कर भरी थी , अत: उनकी अधिकांश रचनाओं में यह देश-प्रेम किसी न किसी रूप में फूट निकला है –
झन लेबे बाबू रे , तैं फुलझड़ी – फटाका
विपदा के बेरा में दस- पंधरा रुपया के.
येकर से तैं ऊनी कम्बल लेबे तेहर
देही काम जाड़ मां , एक सैनिक भइया के.
{ बेटे इस (राष्ट्रीय) विपत्ति के समय दस – पंद्रह रुपये के फटाके मत खरीदना. इससे तू एक ऊनी कम्बल खरीदना जो ठंड में एक सैनिक भाई के काम आयेगा.}
हास्य और व्यंग्य दलित जी के काव्य का मूल स्वर है. उनका व्यंग्य शिष्ट एवं प्रभावशाली है.छतीसगढ़ी व्यंग्य काव्य में उनकी ‘कनवा – समधी’ नामक रचना का एक महत्वपूर्ण स्थान है. इस रचना में नगर की गंदगी पर किया गया व्यंग्य दर्शनीय है –
ये लाल – बम्म अंधेर अबीर – गुलाल असन
कइसन के धुर्रा उड़त हवय चारों कोती
खाली आधा घंटा के किंजरे मां समधी
सुंदर बिना पैसा के रंग गे कुरता धोती.
भन-भन , भन , भन ,भन , भिनक – भिनक के माँछी मन
काकर गुन ला निच्चट  , जुरमिल के गावत हे
अउ खोर – खोर , रसदा – रसदा मां टाँका के
पावन जल अड़बड़ काबर आज बोहावत हे.
(अबीर – गुलाल सी धूल क्यों चारों ओर उड़ रही है , केवल आधे घंटे तक घूमने से ही बिन पैसे के  कुरता – धोती  सुंदर रंग गये हैं. भन-भन के स्वर में  ये मक्खियाँ मिलकर किसका गुणगान कर रही हैं  तथा  आज  गली- गली एवं रास्ते- रास्ते पर (गंदे) टाँके का पवित्र जल , इतना अधिक क्यों बह रहा है ?)
दलितजी ने ‘धान – लुवाई’ ( धान – कटाई) जैसी रचनाओं से ---
दुलहिन धान लजाय मने मन मुड़ी नवा के
आही हँसिया राजा मोला लेगिही आज बिहा के.
( लाज भरी धान की फसल मन ही मन सिर झुका कर सोचती है कि हँसिया राजा आयेगा और मुझे विवाह करके ले जायेगा) ------
छत्तीसगढ़ी को न केवल काव्य – गरिमा प्रदान की है बल्कि साथ ही ‘ चरर – चरर गरुवा मन खातिर  बल्दू लूवय कांदी ( बल्दू गायों के लिये चरर-चरर घास काटता है) जैसे अनेक ध्वनि चित्र एवं ‘सुटुर- सुटुर सटकिस समधिन हर , देखे खातिर नाचा ( समधिन शीघ्रता में चुपचाप नाच देखने निकली)  जैसे दृश्य-चित्र भी उन्होंने रखे हैं. छत्तीसगढ़ी के शब्दों पर उनका असाधारण अधिकार था.
‘सियानी-गोठ’ (नीतिपरक काव्य संग्रह) दलित जी का एक मात्र प्रकाशितग्रंथहै.’ दू मितान ‘ ,’कनवा-समधी’, ’हमर देश’, ’ छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ और मुहावरे’ तथा छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार’ आदि आपके अनेक अप्रकाशित ग्रंथ हैं.
28 सितम्बर 1967 को दुर्ग में छत्तीसगढ़ी के  इस कर्मठ कवि का स्वर्गवास हो गया. इस मृत्यु से दुर्ग ने अपना एक कीमती लाल खो दिया, छत्तीसगढ़ ने अपना एक अमूल्य रत्न खो दिया.


-हनुमंत नायडू
{ नवभारत टाइम्स , बम्बई (अब मुम्बई)  दिनांक 03 मार्च 1968  से साभार }


जनकवि स्‍व.कोदूराम 'दलित' जी की रचनांए आप सियानी गोठ में पढ़ सकते हैं, उनकी रचनाओं को सर्वसुलभ बनाने के लिये उनके पुत्र श्री अरूण कुमार निगम जी अपनी व्‍यस्‍तता के बावजूद सियानी गोठ में जनकवि स्‍व.कोदूराम 'दलित' जी की रचनाओं का नियमित प्रकाशन कर रहे हैं।  

गाँधीवादी विचारधारा के छत्तीसगढ़ी साहित्यकार -कोदूराम "दलित"

छत्तीसगढ़ के जन कवि स्व.कोदूराम"दलित" के १०१ वें जन्म दिवस पर विशेष स्मृति

(५ मार्च १९१० को जन्मे कवि कोदूराम "दलित" की स्मृति में हरि ठाकुर द्वारा पूर्व में लिखा गया लेख)
छत्तीसगढ़ की उर्वरा माटी ने सैकड़ो कवियों,कलाकारों और महापुरुषों को जन्म दिया है. हमारा दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें या तो भुला दिया अथवा उनके विषय में कुछ जानने की हमारी उत्सुकता ही मर गई. जिस क्षेत्र के लोग अपने इतिहास, संस्कृति और साहित्य के निर्माताओं और सेवकों को भुला देते हैं, वह क्षेत्र हमेशा पिछड़ा ही रहता है. उसके पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं रहता.छत्तीसगढ़ भी इसी दुर्भाग्य का शिकार है.
छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को विकसित तथा परिष्कृत करने का कार्य द्विवेदी युग से आरंभ हुआ. सन १९०४ में स्व.लोचन प्रसाद पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ी में नाटक और कवितायेँ लिखी जो हिंदी मास्टर में प्रकाशित हुईं. उनके पश्चात् पंडित सुन्दर लाल शर्मा ने १९१० में "छत्तीसगढ़-दान लीला" लिखकर छत्तीसगढ़ भाषा को साहित्यिक संस्कार प्रदान किया. "छत्तीसगढ़ी दान लीला" छत्तीसगढ़ी का प्रथम प्रबंध काव्य है. उत्कृष्ट काव्य-तत्व के कारण यह ग्रन्थ आज भी अद्वितीय है.
पंडित सुन्दर लाल शर्मा के साहित्य के पश्चात् छत्तीसगढ़ी को अपनी सुगढ़ लेखनी से समृद्ध करनेवाले दो कवि प्रमुख हैं- पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र' तथा कोदूराम 'दलित'. विप्र जी को भाग्यवश प्रचार और प्रसार दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हुए. दुर्भाग्यवश उन्हीं के समकालीन और सशक्त लेखनी के धनी कोदूराम जी को न तो प्रतिभा के अनुकूल ख्याति मिली और न ही प्रकाशन की सुविधा.
कोदूराम जी का जन्म ग्राम टिकरी, जिला दुर्ग में ५ मार्च १९१० में एक निर्धन परिवार में हुआ. विद्याध्ययन के प्रति उनमें बाल्यकाल से ही गहरी रूचि थी. गरीबी के बावजूद उन्होंन विशारद तक की शिक्षा प्राप्त की और शिक्षा समाप्त करके प्राथमिक शाला, दुर्ग में शिक्षक हो गए. योग्यता और निष्ठा के कारण उन्हें शीघ्र ही प्रधान पाठक के पद पर उन्नत कर दिया गया. वे जीवन के लिए शिक्षकीय कार्य करते थे, किन्तु मूलतः वे साहित्यिक साधना में लगे रहते थे. साहित्यिक साधना में वे इतने तल्लीन हो जाते थे की खाना, पीना और सोना तक भूल जाते थे. इसके बावजूद वे वर्षों दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति, प्राथमिक शाला शिक्षक संघ, हरिजन सेवक तथा सहकारी साख समिति क मंत्री पद पर अत्यंत योग्यता के साथ कर्तव्यरत रहे.
दलित जी विचारधारा के पक्के गाँधीवादी तथा राष्ट्र भक्त थे. राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए वे सदैव चिंतित रहते थे. हिंदी और हिंदी की सेवा को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था. वे आदतन खादी धारण करते थे और गाँधी टोपी लगाते थे. उनका रहन-सहन अत्यंत सदा और सरल था. सादगी में उनका व्यक्तित्व और भी निखर उठता था.  दलित जी अत्यंत और सरल ह्रदय के व्यक्ति थे. पुरानी पीढ़ी के होकर भी नयी पीढ़ी के साथ सहज ही घुल-मिल जाते थे.  मुझ जैसे एकदम नए साहित्यकारों के लिए उनके ह्रदय में अपर स्नेह था.
दलित जी मूलतः हास्य-व्यंग्य के कवि  थे किन्तु उनके व्यक्तित्व में बड़ी गंभीरता और गरिमा थी. कवि-सम्मेलनों में वे मंच लूट लेते थे. उस समय छत्तीसगढ़ी में क्या, हिंदी में भी शिष्ट हास्य -व्यंग्य लिखने वाले उँगलियों में गिने जा सकते थे. वे सीधी-सादे ढंग से काव्य पाठ करते थे फिर भी श्रोता हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते थे और दलित जी गंभीर बने बैठे रहते थे. उनकी यह अदा भी देखने लायक ही रहती थी. देखने में वे ठेठ देहाती लगते और काव्य पाठ भी ठेठ देहाती लहजे में करते थे.
छत्तीसगढ़ी भाषा और उच्चारण पर उनका अद्भुत अधिकार था. हिंदी के छंदों पर भी उनका अच्छा अधिकार था. वे छत्तीसगढ़ी कवितायेँ हिंदी के छंद में लिखते थे जो सरल कार्य नहीं है. दलित जी मूलतः छत्तीसगढ़ी के कवि थे.
वह तो आजादी के घोर संघर्ष का दिन था. अतः विचारों को गरीब जनता तक पहुँचाने के लिए छत्तीसगढ़ी से अच्छा माध्यम और क्या हो सकता था. दलित जी ने गद्य और पद्य दोनों में सामान गति और समान अधिकार से लिखा.
उन्होंने कुल १३ पुस्तकें लिखी हैं. (१) सियानी गोठ (२) हमर देश (३) कनवा समधी (४) दू-मितान (५) प्रकृति वर्णन (६)बाल-कविता - ये सभी पद्य में हैं. गद्य में उन्होंने जो पुस्तकें लिखी हैं वे हैं (७) अलहन (८) कथा-कहानी (९) प्रहसन (१०) छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ (११) बाल-निबंध (१२) छत्तीसगढ़ी शब्द-भंडार. उनकी तेरहवीं पुस्तक कृष्ण-जन्म हिंदी पद्य में है.
इतनी पुस्तकें लिख कर भी उनकी एक ही पुस्तक  "सियानी-गोठ" प्रकाशित हो सकी. यह कितने दुर्भाग्य की बात है, दलित जी की अन्य पुस्तकें आज भी अप्रकाशित पड़ी हैं और हम उनके महत्वपूर्ण साहित्य से वंचित हैं. "सियानी-गोठ" में दलित जी की ७६ हास्य-व्यंग्य की कुण्डलियाँ संकलित हैं. हास्य-व्यंग्य के साथ दलित जी ने गंभीर रचनाएँ भी की हैं जो गिरधर कविराय की टक्कर की हैं.
दलित जी ने सन १९२६ से लिखना आरंभ किया. उन्होंने लगभग 800 कवितायेँ लिखीं. जिनमे कुछ कवितायेँ तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और कुछ कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी से हुआ. आज छत्तीसगढ़ी में लिखनेवाले निष्ठावान साहित्यकारों की पूरी पीढ़ी सामने आ चुकी है, किन्तु इस वट-वृक्ष को अपने लहू-पसीने से सींचनेवाले, खाद बनकर उनकी जड़ों में समा जानेवाले साहित्यकारों को हम न भूलें.
-हरि ठाकुर


जनकवि कोदूराम 'दलित' के पुत्र श्री अरूण कुमार निगम जी के द्वारा दलित जी की रचनाओं के लिए संचालित ब्‍लॉग  - www.gharhare.blogspot.com 


गुरतुर गोठ : छत्‍तीसगढ़ी में आज दलित जी के दोहे 

छत्तीसगढ़ के जन-कवि स्व.कोदूराम 'दलित' की पुण्यतिथि में तीन पीढि़याँ उपस्थित

जनकवि कोदूराम ''दलित'' के ज्‍येष्‍ठ पुत्र श्री अरुण कुमार निगम के द्वारा प्रेषित एक रपट :-
छत्तीसगढ़ के जनकवि स्व.कोदूराम 'दलित' की पुण्यतिथि नवागढ़ में स्थित शासकीय स्व.कोदूराम 'दलित' महाविद्यालय में मनाई गई.यह महाविद्यालय काफी वर्षों से नवागढ़ में स्थित है.इस बात की जानकारी दलित जी के परिवार को भी नहीं थी. महाविद्यालय के प्राचार्य , नवागढ़ के नागरिकों तथा विद्यार्थियों को यह नहीं मालूम था कि स्व.कोदूराम 'दलित' कौन है और कहाँ के हैं. जिला चिकित्सालय,दुर्ग के जिला मलेरिया अधिकारी डा. विनायक मेश्राम ने एक दिन नवागढ़ का दौरा करते हुए दलित जी का नाम महाविद्यालय के प्रवेश द्वार पर देखा और उत्सुकतावश महाविद्यालय में जाकर प्राचार्य से मिले और बताया कि दलितजी हमारे बड़े पिताजी हैं. प्राचार्य श्री इतवारीलाल देवांगन बहुत खुश हुए और उन्होंने दलितजी के बारे में विस्तृत जानकारी चाही. डा.मेश्राम ने उनका मोबाईल नंबर लेकर उन्हें आश्वस्त किया कि वे दलित जी के ज्येष्ठ पुत्र अरुण निगम से शीघ्र ही संपर्क कराएँगे. इस प्रकार मुझे अपने पिताजी के नाम पर महाविद्यालय होने कि जानकारी मिली और मैंने तुरंत ही प्राचार्य से मोबाईल पर संपर्क किया. प्राचार्य ने बताया कि वे सोलह वर्षों से वहां पदस्थ है किन्तु दलितजी के बारे में अनभिज्ञ हैं. हम न तो ग्रामवासियों को और नही विद्यार्थियों को दलितजी के बारे में कुछ बता पाते हैं. मैंने निश्चय कर लिया कि २८ सितम्बर को बाबूजी कि पुण्यतिथि नवागढ़ के महाविद्यालय में ही मनाएंगे जिससे नवागढ़वासियों को बाबूजी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में पता चल सके. इस कार्यक्रम में हमने सपरिवार चलने का निश्चय किया. मैंने श्री दानेश्वर शर्मा जी से संपर्क कर इस सम्बन्ध में चर्चा की, उन्होंने खुश होकर स्वीकृति दे दी. आयोजन के सम्बन्ध में प्राचार्य श्री देवांगन से केवल मोबाईल पर ही चर्चा होती रही और उन्होंने स्वत: ही सारी व्यवस्था करनी शुरू कर दी.
२८ सितम्बर को हम सपरिवार श्री दानेश्वर शर्मा जी के साथ नवागढ़ पहुचे. हमारे साथ स्टेट बैंक रायपुर में कार्यरत व्यंगकार श्री उमाशंकर मिश्रा जी भी थे. शासकीय स्व.कोदूराम 'दलित' महाविद्यालय, नवागढ़ में काफी उत्सुकता और उत्साह का माहौल था. स्थानीय गणमान्य निवासी, विद्यार्थी, पत्रकार एवं महाविद्यालय के कर्मचारी उपस्थित थे. कार्यक्रम के प्रारम्भ में बाबूजी के फोटो का अनावरण किया गया. श्री दानेश्वर शर्मा ने दलितजी के व्यक्तित्व पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा कि कोदूराम जी दलित ने मुझे चौथी हिंदी में पढाया है. अपने संस्मरण में उन्होंने बताया कि दलितजी मेरे शालेय जीवन के दौरान मुझे रामलीला में लक्ष्मण का अभिनय करते हुए देख लिया था. दुसरे दिन उन्‍होंनें शाला में मुझे बेंच पर खड़े होकर अपने संवाद सुनाने को कहा. इस प्रकार वे छात्रों को हमेशा प्रेरित किया करते थे. वह समय आज़ादी के पहले का था. दलितजी कविताओं और राउत नाचा के दोहों के जरिये राष्ट्रीयता कि भावना जागृत करते थे. राउत नाचा में मैंने उनका यह दोहा पढ़ा था : 'गांधीजी के छेरी भैया दिन भर में-में नरियाय रे, ओकर दूध ला पीके भैया,बुढुवा जवान हो जाये रे." इसी प्रकार उनकी ये पंक्तियाँ देखें : ''सत्य-अहिंसा के राम -बाण , गांधीजी मारिस तान-तान.'', ''खटला खोजो मोर बर, ददा-बबा सब जाव, खेखर्री सही नही, बघनिन सही लाव.
श्री दानेश्वर शर्मा ने बताया कि दलितजी बड़े विनोदी स्वभाव के थे. चर्चाओं और गोष्ठियों में उनकी चुटकियाँ हास्य प्रधान व्यंग्‍य तथा बेबाक उक्तियाँ सुनी जा सकती थी. इत्र के बड़े शौकीन थे. दलितजी खरे भी उतने ही थे. गलतियों को बर्दाश्त नही करते थे. नगरपालिका के शाला में अध्यापक होते हुए भी व्याकरण की गलती पर कालेज के प्रोफ़ेसर को भी फटकार देते थे. वैसे, वे सहृदय भी बहुत थे. एकबार ठण्ड के दिनों में मैं और दलितजी बिलासपुर के कवी सम्मलेन से लौट रहे थे. रात दो बजे के लगभग उनी कोट, मफलर, मोज़े पहने रहने के बावजूद भी मैं ठण्ड से कांप रहा था. मुझे कांपते देख कर दलितजी ने कहा- तुम्हे ठण्ड ज्यादा लग रही है, मेरी शाल ले लो. मैं हैरान हो गया. शिष्य के प्रति इस प्रकार पुत्रवत व्यवहार आज के हमारे जीवन में कल्पना से भी परे है. श्री शर्माजी ने ऐसे बहुत से संस्मरण सुनाये.
श्री दानेश्वर शर्मा के संस्मरणों के पश्चात् जनकवि कोदूराम 'दलित' क़ी ज्येष्ठ पुत्रवधू श्रीमती सपना निगम ने अपनी मधुर आवाज में कृष्ण क़ी रास लीला पर अपनी स्वरचित कविता का पाठ किया. ''ई नंदलाला, अरे गोपाला, किशन कन्हैया, तय बंशीवाला.'' इस रचना में उन्होंने कृष्ण क़ी रासलीला में ब्रम्हा, विष्णु, महेश, गणेश आदि देवी-देवताओं के सपत्नीक रासलीला में शामिल होने क़ी अद्भुत कल्पना की. श्रोताओं ने रचना को काफी पसंद किया. श्रोतागण हँसते रहे और तालियाँ बजाते रहे. मैंने बाबूजी क़ी कुंडलियों का पाठ किया. ''भाई एक खदान के सब्बो पथरा आन, कोन्हो खुंदे जाय नित, कोन्हो पूजे जाय.'' अन्य रचना ''काटत जाये कतरनी, सूजी सीयत जाय, सहे अनादर कतरनी, सूजी आदर पाय ''.साथ बाबूजी की हिंदी तथा बालोपयोगी रचनाओं का भी पाठ किया. मेरे पश्च्यात उमाशंकर मिश्र ने भी दलितजी क़ी कुंडलियों का पाठ किया. ''मुड़ी हलाये टेटका, अपन टेटकी संग.'' अन्य रचना में ''अरे खटारा साईकिल निच्चट गए बुढाए.''
दूसरे दौर में दानेश्वर शर्मा ने अपनी सदाबहार रचना ''तपतकुरू भाई तपतकुरू '',  ''सुनतो दीदी पार्वती, के साग रांधे रहे '' (छंद) सुना कर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया. नवागढ़ के निवासियों ने कहा कि पहले तो हम जानते नही थे क़ी कोदूराम ''दलित' कौन हैं. आज इस कार्यक्रम के आयोजन से हम उनकी महानता से परिचित हो गए हैं. हमें गर्व हो रहा है कि कोदूराम ''दलित' हमारे ही दुर्ग जिले के हैं. मेरी माँ श्रीमती सुशीला निगम ने इस आयोजन के लिए महाविद्यालय और नवागढ़वासियों का आभार प्रकट किया. मेरे छोटे भाई हेमंत निगम ने प्राचार्य श्री देवांगन का शाल श्रीफल से सम्मान किया. कार्यक्रम में मेरे छोटे भाई की धर्मपत्नी श्रीमती नंदा निगम, अपने बच्चों निति, कृति और दीप के साथ उपस्थित थी. मेरा छोटा पुत्र अभिषेक निगम और भांजी शुभा मस्तुरिया ने आयोजन को सफल बनाने में अपना उत्कृष्ट सहयोग दिया. इस प्रकार उक्त आयोजन में कोदूराम ''दलित'' कि तीन पीढि़याँ उपस्थित रहीं. कार्यक्रम की सफलता में ग्राम टिकरी के श्री प्रवीण लोन्हारे(वर्तमान में बेमेतरा में पदस्थ) की भूमिका अविस्मर्णीय रही. कार्यंक्रम की समाप्ति पर हमने बाबूजी की कविताओं का संग्रह ''बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय'' का वितरण सभी को किया.
अरुण कुमार निगम
एच.आई. जी.१/२४
आदित्य नगर,दुर्ग.
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व्यंग्य कवि कोदूराम दलित

छत्तीसगढी भाषा साहित्य के इतिहास पर नजर दौडानें मात्र से  बार बार एक नाम छत्तीसगढी कविता के क्षितिज पर चमकता है. वह है  छत्तीसगढी भाषा के ख्यात कवि कोदूराम दलित जी का.  कोदूराम दलित जी ने छत्तीसगढी कविता को एक नया आयाम दिया और इस जन भाषा को हिन्दी कविसम्मेलन मंचो मे भी पूरे सम्मान के साथ स्थापित किया. कोदूराम जी की हास्य व्यंग्य रचनाएँ समाज के खोखले आदर्शो पर तगडा प्रहार करते हुए गुददुदाती और अन्दर तक चोट करती हुई तद समय के मंचो पर छा गयी थी.  

ठेठ ग्रामीण जीवन की झलक से परिपूर्ण दलित जी की कविताये आम आदमी को सीख भी देती हैं और दीर्धकालिक प्रभाव भी छोडती हैं.  वे अपनी कविताओ मे छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का प्रयोग बड़े सहज और सुन्दर तरीके से करते थे. इन सबके कारण उनकी कविताओ को बार बार पढने को जी चाहता है. उनकी कविताये आज भी प्रासांगिक हैं. इस सम्बन्ध मे विस्तार से लिखने का इरादा है.  

आज ही के दिन 5 मार्च सन् 1910 में छत्तीसगढ के जिला दुर्ग के टिकरी गांव में जन्मे गांधीवादी कोदूराम जी प्राइमरी स्कूल के मास्टर थे. उन्होने पहले पहल स्वांत: सुखाय कविता लिखना आरम्भ किया,  उनकी धारदार कविताओ की खुशबू धीरे धीरे महकने लगी और वे कविसम्मेलन मंचो पर छा गये.  उनकी अधिकम रचनाये आज भी अप्रकाशित है. जिसे उनके पुत्र श्री अरुण कुमार निगम जी ने सजो कर रखा है, श्री निगम भारतीय स्टैट बैंक जबलपुर मे सेवारत है. आज सुबह ही अरुण जी से हमारी फोन पर बात हुई और अरुण जी ने हमे हमारे पाठको के लिये आदरणीय कोदुराम "दलित" जी का फोटो ई मेल किया.  आदरणीय कोदुराम "दलित" जी की प्रकाशित कविता संग्रह हैं - सियानी गोठ,  कनवा समधी, अलहन,  दू मितान, हमर देस,  कृष्ण जन्म, बाल निबंध, कथा कहानी, छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार अउ लोकोक्ति.

उनकी रचनाओं में से कुछ पंक्तिया हम यहा प्रस्तुत कर रहे है  - 

संगत सज्जन के करौ, सज्जन सुपा आय 
दाना-दाना ला रखय, भूसा देय उडाय 
भूंसा देय उडाय, असल दाना ला बांटय 
फून-फून के कनकी, कोढा गोंटी छांटय 
छोडव तुम कुसंग, बन जाहू अच्छा मनखे 
सज्जन हितवा आय, करव संगत सज्जन के ।

छत्‍तीसगढ पैदा करय, अडबड चांउर दार
हवय लोग मन इंहा के, सिधवा अउ उदार
सिशवा अउ उदार, हवैं दिन रात कमाथें
दे दूसर ला भात, अपन मन बासी खाथें
ठगथैं ये बपुरा मन ला, बंचकमन अडबड
पिछडे हावय हमर, इही कारन छत्‍तीसगढ ।

ढोंगी मन माला जपैं, लम्‍मा तिलक लगाय
हरिजन ला छूवै नहीं, चिंगरी मछरी खाय
चिंगरी मछरी खाय, दलित मन ला दुतकारै
कुकुर बिलई ला चूमय, पावै पुचकारैं
छोंड छांड के गांधी के, सुघर रस्‍ता ला
भेदभाव पनपाय, जपै ढोंगी मन माला ।

मेरे संग्रह में आदरणीय कोदूराम दलित जी की कुछ और कवितायें हैं जिन्‍हें मैं गुरतुर गोठ में प्रस्‍तुत करूंगा. आज वे हमारे बीच नहीं हैं किन्‍तु उनकी लिखी कवितायें आज भी इस प्रदेश के बहुतेरे लोगों के जुबां पर जीवंत है. आज उनके जन्म  दिवस पर हम उन्‍हें श्रद्धांजली अर्पित करते हैं.

संजीव तिवारी 

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