ब्लॉग छत्तीसगढ़

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22 June, 2015

तमंचा रायपुरी की छत्तीसगढ़ी कविता

बेटा सोंचथे
कब ददा पईसा दिही अउ
नवा मोबाईल लेतेंव
वोखर दाई सोंचथे
कब येखर कमई बाढही अउ
नवा लुगरा लेतेंव
मै सोंचथव
कब मोला काम मिलही अउ
बांस खपरा के उधारी छुट लेतेंव
महाजन सोंचथे
कब येखर सक हारतिस अउ
येखर बांचे गाँव के खेत ल बिसा लेतेंव
हमन लुकपुकहा अन हडबड़ाथन
हमर सुख के कथरी ऐसनेहे कंपाथे
कोनो दिन सड़क म हमर फटफटी
इही हडबड़ी म टरक म झंपाथे
महाजन धीर हे, अगोरथे
इहि समे म हमर इलाज अउ
किरिया करम बर हमर खेत ह बेचाथे
अउ हमर जम्मो सउख
धारो धार आसू म बोहाथे.

- संजीव तिवारी "तमंचा रायपुरी"

20 June, 2015

डा: संजय दानी "कंसल" की गज़ल : माहे- रमज़ान

रोज़ा रखो या न रखो माहे- रमज़ान में,
दिल की बुराई तो तजो माहे -रमज़ान में।

ख़ुशियां ख़ूब मना ली जीवन में गर तो,
ग़ैरों के दुख को हरो माहे-रमज़ान में।

कि बड़ों को आगे झुकना वाजिब है पर,
सच के ख़ातिर न झुको माहे -रमज़ान में।

बेश डरो अपने माबूद से जीवन भर,
झूठ फ़रेब से भी डरो माहे-रमज़ान में।

हर ज़ीस्त ख़ुदा का है,हर ज़ीस्त ख़ुदा जब,
ज़ीस्ते ख़ुदा से न लड़ो माहे-रमज़ान में।

पाप की टोकरी तुम सदियों ढो चुके,तो बस,
नेकी की फ़स्ल रखो माहे-रमज़ान में।

उलजन,फ़िसलन,विचलन,संशय बंद भी हो ,
कि सबल किरदार करो माहे-रमज़ान में।

बीबी बच्चों से बड़ा जग में शय ना इक,
वापस घर लौट चलो माहे-रमज़ान में।

डॉ.संजय दानी "कंसल" दुर्ग

डॉ.संजय दानी "कंसल" पेशे से चिकित्‍सक हैं एवं उर्दू अद़ब से जुड़े हुए हैं। इंटरनेट की दुनियॉं में इनका एक ब्‍लॉग भी है। गज़ल एवं कहानियॉं लिखते हैं, वर्तमान में वे दुर्ग जिला हिन्‍दी साहित्‍य समिति के अध्‍यक्ष एवं विभिन्‍न साहित्यिक व अदबी संस्‍थाओं से जुड़े हुए हैं। डॉ.दानी जनअधिकारों एवं जनमुद्दों पर भी समय समय पर आवाज उठाते रहते हैं। अभी हाल ही में उन्‍होंनें भारतीय रेल में यात्रा के दौरान सेवा में कमी के लिए, रेलवे के विरूद्ध दायर किए गए मुकदमें में सफलता पाई है जिसकी सर्वत्र चर्चा हुई है। उक्‍त मुकदमें की संक्षिप्‍त जानकारी यहॉं है

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