ब्लॉग छत्तीसगढ़

इस ब्‍लॉग के अतिरिक्‍त आप संजीव तिवारी एवं तमंचा रायपुरी के समग्र पोस्‍ट झॉंपी पर पढ़ सकते हैं.

30 May, 2015

शब्द गठरिया बांध : अरूण कुमार निगम

हिन्दी कविता में छंद का अनुशासन जब से कमजोर हुआ है, हिन्दी की कविता जन मन से दूर होती गई है। छंद बंधन से मुक्त कवितायें एकांतिक पाठ के आग्रह के साथ ही विशिष्ठ पाठक वर्ग और बौद्धिक मनों में सीमित होती गई। बंधन मुक्त कविता नें अभिव्यक्ति के नव आलोक को जन्म तो दिया पर वह लोक के कंठों में तरंगित नहीं हो सकी। संभवत: आदि कवियों नें साहित्य को लोक कंठों में बसाने के लिए ही संस्कृत छंद शास्त्र में शब्दों का अनुशासन लिखा था। जिससे अनुशासित शब्दों से पिरोए गए वाक्यांश स्वमेव गीतात्मकता को जीवंत रखे।


अरूण कुमार निगम जी के पोते
यश निगम के हाथों में ‘शब्द गठरिया बाँध’
छत्तीसगढ़ में ऐसे ही एक जनकवि हुए जिनका नाम प्रदेश बड़े सम्मान के साथ लेता है, उनका नाम है जनकवि कोदूराम दलितदलित जी जितने अपने पद्य में अभिव्यक्त शब्दों के प्रति अनुशासित थे उतने ही अपने जीवन आर्दशों के प्रति वे अनुशासित थे। उन्हीं के जेष्ठ पुत्र अरूण कुमार निगम नें विरासत में मिली इस परम्परा को पल्लवित एवं पुष्पित किया। अरूण कुमार निगम जी के कविता साधना से निकले छंदबद्ध रचनाओं का संकलन 'शब्द गठरिया बांध' अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद से अभी-अभी प्रकाशित हुई है। दोहा, सवैया, आल्हा, कहमुकरी, कुण्डलियॉं और विविध छंदों से युक्त इस संग्रह को पढ़ते हुए गीतों के अर्थ और भाव सहज रूप से ग्राह्य होकर हृदय में उतरते जाते हैं। इस संकलन में शब्दों की गठरी जब खुलती है तब शब्द बरबस बुदबुदानें और गुनगुनाने को मजबूर करते हैं।

विभिन्न विषयों और अलंकारों से युक्त इस संकलन में कवि आरंभ में ही, कलम की महिमा बहुत सहज रूप से दोहे में प्रस्तुत करते हुए कहता हैं -
मान और सम्मान की, नहीं कलम को भूख।
महक मिटे ना पुष्प की, चाहे जाये सूख।।
कवि की यही सहजता काव्य को उसके लक्ष्य- तक पहुंचाती है। संग्रह के 112 पृष्टों तक, हर पृष्ट में कवि अपने कलम से निरंतर विभिन्न विषयों के उपर उत्कृष्ट रचनाओं का सुवासित पुष्प बिखराते हैं। संग्रह के विभिन्न छंदों को पढ़ते हुए लगता है कि हम रीतिकालीन या भक्तिकालीन काव्य का पठन कर रहे हैं जबकि कवि समय के बंधन से मुक्त , निराला और पंत के साथ ही वर्तमान समय को भी अपने गीतों में पिरोते आगे बढ़ते हैं -
कार्तिक अगहन पूस ले, आता जब हेमंत।
तन की चाहत सोंचती, बनूँ निराला पन्त।।

हिन्दी साहित्य में कवियों नें प्रकृति का मनोहारी चित्रण किया है, हमारे काव्य साहित्य में ऋतु वर्णन के प्रचुर छंद विद्यमान है। इसके बावजूद आज भी जब कोई कवि ऋतुओं पर छंद लिखता है तो मन उसे पढ़कर आनंदित होता है। ऋतु, प्रकृति और पर्यावरण पर इस संग्रह में कवि नें भी खूबसूरत कलम चलाई है, सावन पर इस संग्रह में संग्रहित मालती सवैया देखें -
सावन पावन है मन भावन, हाय हिया हिचकोलत झूलै
बॉंटत बूंदनियॉं बदरी, बदरा रसिया रस घोरत झूलै
झॉंझर झॉंझ बजै झनकै, झमकै झुमके झकझोरत झूलै
ए सखि आवत लाज मुझे, सजना उत मोहि बिलोकत झूलै।

अरूण कुमार निगम जी के पास शब्दों का अपार भंडार है, उनकी कल्पना जब छंदों में श्रृंगार करती है तो इस तरह के सावन के दोहे बन पड़ते हैं -
भरे कल्पना छन्द में, इंद्रधनुष से रंग।
शब्दों का सावन करे, कुदरत को भी दंग।।
देख—देख श्रृंगार को, छलका रस श्रृंगार।
पानी—पानी वादियॉं, बदरा आये द्वार।।

मनभावन सावन जब आल्हा छंद में कवि द्वारा अभिव्यपक्त होता है तो उसके शब्द प्रयोग की कुशलता देखते बनती है -
चोट लगी वृक्षों को जब भी, होता घायल यह आकाश।
रो न सकी है आंखें इसकी, बादल इतना हुआ हताश।।
आने वाले कल से छीनी, तूने कलसे की हर प्यास।
आज मनाता जल से जलसे, कल की पीढ़ी खड़ी उदास।।

इसी तरह के ढेरों उदाहरणों से परिपूर्ण उत्कृष्ठ छंदों के इस संग्रह के कुछ उल्लेखनीय दोहे देखें, दीपावली में बने खीर के संबंध में, निर्जीव चूल्हे और प्रकृति का मानवीकरण बहुत सुन्दर रूप में अरूण जी इस दोहे में करते हैं -
मिट्टी का चूल्हा हॅंसा, सॅंवरा आज शरीर।
धूँआ चख—चख भागता, बटलोही की खीर।।

पर्यावरण पर कवि की चिन्ता दोहे में देखें -
बॉंझ मृदा होने लगी, हुई प्रदूषित वायु।
जल जहरीला हो रहा, कौन हाय दीर्घायु।।

मजदूरनी पर कवि की कल्प ना पर दोहा देखिए -
मौन हो गई चूड़ियॉं, बिंदिया भी चुपचाप।
पीर गज़ल गाती रही, धड़कन देती थाप।।

शब्दों शक्ति से परिपूर्ण कवि का मद्यपान पर दोहा देखें -
मैं की मय पीकर करे, मैं मैं मैं का जाप।
सुन मैं मय के बावरे, मैं मय दोनों पाप।।

इस पूरे संग्रह में एक से एक पद है जिनका उल्लेख यहॉं आवश्यक जान पड़ता है किन्तु यह संभव नहीं। मैं सिर्फ इस संग्रह से आपका परिचय करा रहा हूं, यह संग्रह shimply.com, flipkart.com और redgrab.com पर आन लाइन उपलब्ध और अरूण कुमार निगम जी के छंदों से साक्षात्कार कर सकते हैं। अरूण कुमार निगम जी के छंदों को आप उनके ब्लॉग मितानी गोठ में भी पढ़ सकते हैं। अरूण कुमार निगम जी सोशल मीडिया के चर्चित कवि हैं वे निरंतर कविता रचते हुए ओपन बुक्‍स आनलाईन एवं फेसबुक आदि के माध्यम से लगातार नव रचनाकारों को उत्साहित करते हुए छंद शास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं एवं हिन्दी में खो रहे गीत को नई दिशा दे रहे हैं। प्रभावशाली व उपयुक्त शब्दों को जोड़-जोड़ कर गीत रचते निगम जी व्याकरण को अपना आधार मानते हैं। उन्होंनें अपने संग्रह के शीर्षक कविता में स्वयं लिखा है-
अक्षर—अक्षर चुन सदा, शब्द गठरिया बॉंध।
राह दिखाए व्याकरण, भाव लकुठिया बॉंध।।

- संजीव तिवारी

शब्द गठरिया बांध के विमोचन के समय के कुछ चित्र - 
 
देश के वरिष्ठ गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र तथा यश मालवीय के करकमलों से विमोचन इलाहबाद में
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय क्षेत्रीय केंद्र इलाहबाद के सत्य प्रकाश मिश्र सभागार में लोकार्पण में उपस्थित साहित्यकार


विमोचन समारोह में कविता पाठ करते अरूण कुमार निगम
भिलाई के ग़ज़लकार गिरिराज भंडारी और इलबबद के साहित्यकार सौरभ पाण्डेय के साथ अरुण व सपना निगम
युवा ग़ज़लकार और अंजुमन प्रकाशन के संचालक वीनस केसरी इलाहबाद

28 April, 2015

कला दीर्घा : हर ‘निगेटिव’ को ‘पॉजिटिव’ बनाते हुए अनिल कामड़े

-विनोद साव

भिलाई आर्ट्स क्लब ने इस शहर को चित्रों और रंगों से भर दिया है. पिछले महीने भिलाई में चित्रकला पर तीन दिनों का सार्थक आयोजन किया गया था और इस बार अनिल कामड़े के छायाचित्रों की प्रदर्शनी लगवा दी. नेहरू आर्ट गैलरी के सामने ही अनिल मिल गए. अपने चिर-परिचित हंसमुख चेहरे के साथ. जन संपर्क विभाग के फोटो विडियो सेक्शन में एक समय तीन कलाकार ऐसे सहभागी थे जो दुर्ग से एक साथ आते और जाते रहे – हिमांशु मिश्रा, प्रमोद यादव और अनिल कामड़े. ये तीनों दुर्ग में गया नगर के आसपास लगभग एक ही इलाके में रहे. इन तीनों कलाकारों में जबर्दस्त यारी थी और इनके कारण जन संपर्क विभाग में याराना माहौल बना रहता था. इनमें विलक्षण विडियोग्राफर हिमांशु मिश्रा हबीब तनवीर के ‘सेट’ पर कार्य करते हुए दुर्घटनाग्रस्त होकर असमय ही यारों के बीच से चले गए. हिमांशु के पास किसी फिल्म के छायाकार जैसी समृद्ध दृष्टि और तकनीक थी. उनकी बनाई विडियो फिल्मों ने छत्तीसगढ और इसके बाहर भी अपनी छाप छोड़ी थी.

साहित्य में कदम रखने से पहले मैंने भी कुछ विडियो फीचर फिल्मों के निर्माण में दांव पेंच आजमाए थे. हिमांशु के साथ मिलकर ‘पाटन दर्शन’ और ‘भारत-सोवियत मैत्री’ बनाई थी जिनका कई जगह प्रदर्शन हुआ था. हिमांशु के सहयोगी साथी अनिल वशिष्ठ और हसन उनकी कलात्मक बारीकियों के हरदम साक्षी रहे हैं. इनके साथी कुशल फोटोग्राफर प्रमोद यादव पिछले वर्ष सेवानिवृत हो गए. प्रमोद यादव के कैमरे के पीछे एक साहित्यकार की नज़र भी होती है क्योंकि वे एक प्रकाशित होने वाले लेखक भी हैं. इस महीने अनिल कामड़े ने भी अवकाश ग्रहण कर लिया है लेकिन केवल नौकरी से अवकाश ग्रहण किया है कला से नहीं. नौकरी से निवृत होना कलाकारों के लिए ‘प्लस’ होता है. रिटायरमेंट के बाद कलाकारों की कला की एक अलग दुनियां होती है, जो उनकी अपनी नितांत निजी दुनियां होती है. वे मुक्त होकर फिर से अपनी कला में लीन होने का पूरा अवसर पा लेते हैं.

अनिल कामड़े अपनी मुचमुची मुस्कान के साथ कहते हैं कि ‘विनोद भाई १९५५ में जन्मे जो कला प्रेमी हुए उनमें मैं, आप और हिमांशु थे. यह सुनकर प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि रंजना मुले, महाप्रबंधक (सी.एस.आर.) किलकते हुए कह उठती हैं कि ‘हम भी १९५५ के हैं.’

गोलाकार गैलरी में लगे हैं अनिल कामड़े के खींचे हुए रंगीन और श्वेतश्याम चित्र. ये बस्तर के आदिवासी जीवन पर केंद्रित चित्र हैं. इनमें बस्तर के नैसर्गिक दृश्यों की उपस्थिति भी उनके जन-जीवन से है. मनुष्य की जिजीविषा के बिना प्रकृति का भी मोल कितना है ? प्रकृति की छटा तो तभी निखरती और बिखरती है जब उस वन प्रांतर की जन भागीदारी प्रकृति के श्रोतों पर होती है. नदी पहाड़ और सूरज चाँद के साथ मनुष्यों का समुदाय हो तब जाकर कला का प्रयोजन सिद्ध होता है.. और अनिल इसे खूब सिद्ध करते हैं अपनी छायांकन कला से. अनिल के भीतर एक यायावर है. वे घूमते रहते हैं हाथ और कंधे पर अपना कैमरा लिए. जहाँ भी कुछ असाधारण दिखा कि उसे कैमरे में कैद किया. अनिल उन फटाफट फोटोग्राफरों में नहीं हैं जो फोटो खींचे और चलते बने. वे बड़े धैर्य के साथ अपने ‘ऑब्जेक्ट’ को ‘फोकस’ करते हैं. कैमरे में उनकी तन्मयता उस निशानेबाज की तरह दिखाई देती है जिसे निशाना लगाना है तो सीधे अपने लक्ष्य पर अन्यथा नहीं. प्रदर्शनी में लगे चित्रों में यह साफ दिख रहा है कि चित्रकार ने बस्तरिहा जीवन के सूक्ष्म लोक तत्वों को बड़ी सूक्ष्मता से उतार लिया है. यह उनके चित्रों को देखकर ही महसूसा जा सकता है, कुछ इस तरह कि बस्तर के लोक जीवन की मधुर लय भी देखने वाले के कानों में झंकृत हो उठती है.

अनिल कामड़े को वर्ष 2000 में भिलाई में हुई अखिल भारती फोटोग्राफी प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला था. उनके चित्र धर्मयुग और सारिका जैसी पत्रिकाओं सहित अनेक अख़बारों में प्रमुखता से छपते रहे हैं. प्रगतिशील लेखक संघ के भोपाल और लखनऊ सम्मेलनों में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी. वे कहते हैं कि ‘इंसान के रोजमर्रा की खटखट, जिंदगी में उसकी उठा पटक और उसकी जद्दोजहद के बीच जो सौंदर्य झांकता है कुछ ऐसे ही पलों को मैं कैमरे में ले लेता हूँ.’ अपने छायांकन में वे जीवन की नकारात्मकता को सकरात्मक आयाम देते हैं. हर ‘निगेटिव’ को ‘पॉजिटिव’ बना लेने की कला है अनिल कामड़े में.


20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जन्मे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में प्रबंधक हैं। मूलत: व्यंग्य लिखने वाले विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, ज्ञानोदय, अक्षरपर्व, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में भी छप रही हैं। उनके दो उपन्यास, चार व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों के संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है। उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। वे उपन्यास के लिए डॉ. नामवरसिंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी पुरस्कृत हुए हैं। आरंभ में विनोद जी के आलेखों की सूची यहॉं है।
संपर्क मो. 9407984014, निवास - मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001
ई मेल -vinod.sao1955@gmail.com


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