ब्लॉग छत्तीसगढ़

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18 April, 2015

वामपंथ और तीसरा विकल्प : विश्लेषण

यदि देश की भावी राजनीति को दिशा देने की जिम्मेदारी सचमुच निभानी है तो माकपा को अपनी असफलता के कारणों को दूर करना पड़ेगा। नेतृत्व परिवर्तन अपनी जगह, लेकिन जनता से अलगाव मिटाने के लिए जनता परिवार की तरह नकारात्मक नारा न देकर सकारात्मक कार्यक्रम पर चलकर आंदोलन खड़ा करना होगा संसदीय भटकाव से बचते हुए संसदीय सफलता का रास्ता जनांदोलनों से ही जाता है- कम्युनिस्टों की इस सीख से आम आदमी पार्टी ने फायदा उठाया तो माकपा क्यों नहीं उठा सकती..  -अजय तिवारी

इस समय विशाखापट्टनम में चल रही माकपा की 21वीं राष्ट्रीय कांग्रेस पर लोगों की नजर खासकर इसलिए है कि वहां सिर्फ नेतृत्व-परिवर्तन होगा या नीति-परिवर्तन भी? हाल ही में पुड्डूचेरी में संपन्न भाकपा के महाधिवेशन में लगभग वही समस्याएं थीं, जो माकपा के सामने हैं। कम्युनिस्ट पार्टयिों के सम्मेलनों से जनसाधारण में कोई आशा-उत्साह नहीं है। किंतु राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि अगले कुछ वर्षो में राजनीतिक शक्तियों का ध्रुवीकरण किस दिशा में होगा और उसमें कम्युनिस्ट पार्टयिों की भूमिका कैसी और कितनी होगी। एक तो भाकपा की तरह माकपा भी ‘‘अपनी स्वतंत्र छवि पुनस्र्थापित’ करने के लिए प्रयत्नशील है; दूसरे क्षेत्रीय दलों, विशेषत: जनता परिवार के विलय से उत्पन्न माहौल में वह अपनी नई भूमिका की खोज में भी है। यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है कि अपनी ‘‘राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन’ की समीक्षा में माकपा ने स्वीकार किया है, ‘‘क्षेत्रीय पार्टयिां नवउदार नीतियां अंगीकार करती जा रही हैं।’ यह तय उत्तर और दक्षिण भारत की क्षेत्रीय पार्टियों के बारे में समान रूप से लागू होता है। इतना ही नहीं, क्षेत्रीय पार्टियॉं विश्व-पूंजी के प्रति वही रुख अपनाती हैं जो कांग्रेस-भाजपा का है। वे ग्रामीण क्षेत्र के धनिकों और नवधनिकों का प्रतिनिधित्व भी करती हैं। इस स्थिति में उन्हें किसी कार्यक्रम के आधार पर जोड़ना तभी संभव है जब माकपा या वामपंथ का स्वतंत्र जनाधार हो जिसके बिना क्षेत्रीय पार्टियों के हित न सिद्ध होते हों। उक्त समीक्षा में माकपा ने यथार्थवादी होकर स्वीकार किया है कि उसका स्वतंत्र जनाधार कमजोर हुआ है। क्या यह कहना चाहिए कि क्षेत्रीय पार्टियों के बारे में आंख खुली, लेकिन इतनी देर से कि भूलसुधार एक टेढ़ी खीर लगता है। हालांकि अपने अधिवेशन में माकपा ने वाममोर्चे की पार्टियों (भाकपा, फॉर्वड ब्लॉक, आरएसपी) के अलावा भाकपा-माले और एसयूसीआई को भी आमंत्रित किया। लेकिन इन सबके बीच किसी नीति या कार्यक्रम की साझेदारी शायद ही हो। इसलिए यह ‘‘वामपंथी’ मंच व्यापक जनतांत्रिक एकता का आधार बन सकेगा, इसमें संदेह है।

सच्चाई यह है कि 2005 में प्रकाश करात के महासचिव बनने के बाद माकपा की स्वतंत्र छवि का ह्रास हुआ है, गुटबाजी तेज हुई है, जहां जनाधार था वहां भी पार्टी सिकुड़ गई है। यही कारण है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में हिंदी क्षेत्र हो या दक्षिण भारत, कहीं भी उसका कोई कहने-सुनने लायक मोर्चा नहीं बना। उसके प्रयास को इतनी असफलता पहले कभी नहीं मिली थी। सबसे जरूरी है हिंदी क्षेत्र में पार्टी का अस्तित्व। प्रकाश करात के कार्यकाल में हिंदी क्षेत्र के प्रति विशेष उपेक्षा का परिचय मिला। 2005 के दिल्ली सम्मेलन से पहले ‘‘हिंदी क्षेत्र: तकलीफें और मुक्ति के रास्ते’ पहचानने के लिए माकपा ने एक हफ्ते का विचार-विमर्श रखा था। उसके अनुभवों से लाभ उठाने के बदले प्रकाश करात के नेतृत्व ने पूरे प्रसंग को ठंडे बस्ते में डाल दिया। हिंदी क्षेत्र की उपेक्षा का परिणाम है कि माकपा के पास राष्ट्रीय स्तर का कोई लोकप्रिय नेता नहीं है। हिंदी क्षेत्र में जनाधार के बिना वामपंथ राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प बनने की बात सोच भी नहीं सकता। फिर भी, एक जिम्मेदार पार्टी के रूप में माकपा, भाजपा के विकल्प की संभावना खोज रही है। इसके लिए हिंदी क्षेत्र में एकीकृत जनता-परिवार से मोर्चा बनाने की जरूरत होगी। खुद आगामी महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा है कि ऐसा मोर्चा बनाने की संभावना खोजी जाएगी। लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि अपनी स्वतंत्र ताकत के बिना वामपंथ या तो क्षेत्रीय निहित स्वार्थो का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टयिों का पिछलगुआ बनकर रह जाएगा या उसका जनाधार खिसककर क्षेत्रीय पार्टयिों में समा जाएगा। साथ ही, इस तरह के असंतुलित मोर्चे से आर्थिक नीति के मामले में वामपंथ और दक्षिणपंथ का अंतर धुंधला होता है और सांप्रदायिकता-विरोधी मंच जनता की नजर में सत्ताप्रेमी गठजोड़ बनकर रह जाता है। संयोग की बात नहीं है कि जनता परिवार के छह गुटों के एकीकरण का संदेश देते हुए लालू प्रसाद यादव ने केवल भाजपा को रोकने की बात कही, किसी सकारात्मक कार्यक्रम पर आधारित एकता का मुद्दा नहीं उठाया। जनता परिवार को बुनियादी और वास्तविक मुद्दों से विशेष सरोकार नहीं दिखाई देता। इससे पता चलता है कि यह एकीकरण किसी सार्थक उद्देश्य से न होकर केवल सत्ता के लिए है।

सच्चाई यह है कि जनता परिवार अधिकांशत: दगे कारतूसों की बारात है, जिसका आज की बदली हुई राजनीति से ज्यादा संबंध नहीं है। न सिर्फ राजनीति बदली है बल्कि राजनीति के प्रति लोगों का, विशेषत: युवाओं का रुख भी बदला है। अब भाजपा में भी आडवाणी नहीं, मोदी हृदय-सम्राट हैं। बाहर केजरीवाल युवाओं के आकर्षण हैं। इन समस्याओं पर विचार करना माकपा के लिए अत्यंत आवश्यक है। एक तो उसके अपने अस्तित्व और विकास के लिए, दूसरे देश की राजनीति में जनोन्मुख परिवर्तन के लिए। किंतु इसका आभास नहीं होता। 1978 में भाकपा की भटिंडा कांग्रेस ने आपातकाल के समर्थन और विरोध की बहस में समझौतावादी रुख अपनाया, 2015 में माकपा की विशाखापटट्नम कांग्रेस भी वही कर रही है-करात की मान्यता है कि अब तक की राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन गलत है, येचुरी की राय है कि नीति सही है, उसका क्रियान्वयन दोषपूर्ण है। कांग्रेस में मंजूरी के लिए नेतृत्व की ओर से पेश दस्तावेज में दोनों का मिश्रण है। उल्लेखनीय है कि 10वीं कांग्रेस में माकपा ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया था, ‘‘मजदूर वर्ग और उसकी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियां तथा उनका लगातार मजबूत होते जाना, वामपंथी एवं जनवादी मोर्चे के गठन के लिए जरूरी है।’ तब से अब तक माकपा इसी नीति पर चलती आई है। करात से पहले, 2004 के चुनाव में, माकपा और वामपंथ अपने सर्वोच्च शिखर पर थे। तब यह नीति सही थी। करात के नेतृत्व में विकास कर के पार्टी 55 सांसदों से 12 पर आ गई। अब यह नीति गलत हो गई। इस दौरान गुटबाजी के कारण केरल की सरकार गई। गलत तत्वों के कारण बंगाल गया।

हिंदी प्रदेशों में जो थोड़ी-बहुत ताकत थी, वह केंद्रीय नेतृत्व के नकारात्मक रुख के कारण समाप्त हो गई। ऐसी हालत में कौन-सा मोर्चा बनेगा? 16वीं कांग्रेस (1998) में ‘‘तीसरे विकल्प’ का नारा दिया गया, जो कार्यक्रम-आधारित होगा। लेकिन 2005 में 18वीं कांग्रेस तक क्षेत्रीय ‘‘धर्मनिरपेक्ष पूंजीवादी पार्टियों’ को न्यूनतम कार्यक्रम पर एकजुट करने की मुश्किलें समझ में आ गई थीं। इस समझ के पहले ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोका जा चुका था जिसने इन पार्टियों से माकपा के अलगाव में बड़ी भूमिका निभाई। यदि देश की भावी राजनीति को दिशा देने की जिम्मेदारी सचमुच निभानी है तो माकपा को अपनी असफलता के कारणों को दूर करना पड़ेगा। नेतृत्व परिवर्तन अपनी जगह, लेकिन जनता से अलगाव मिटाने के लिए जनता परिवार की तरह नकारात्मक नारा न देकर सकारात्मक कार्यक्रम पर चलकर आंदोलन खड़ा करना होगा। संसदीय भटकाव से बचते हुए संसदीय सफलता का रास्ता जनांदोलनों से ही जाता है- कम्युनिस्टों की इस सीख से आम आदमी पार्टी ने फायदा उठाया तो माकपा क्यों नहीं उठा सकती!
-अजय तिवारी
 (आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं) यह आलेख आज दिनांक 18.04.2015 के राष्‍ट्रीय सहारा में प्रकाशित है

16 April, 2015

कुछ जमीन से कुछ हवा से : रंगों और तूलिकाओं की दुनिया में तीन दिन

- विनोद साव


अतिथि चित्रकार अखिलेश के साथ लेखक.
भिलाई के चित्रकार हरि सेन ने फोन किया था कि ‘भिलाई में चित्रकला पर तीन दिनों का बढ़िया आयोजन है .. आप अपने विचारों के साथ आ जाइये.’ ऐसा कहते हुए उनके छत्तीसगढ़ी के चिर परिचित जुमले थे ‘भइगे कका.. जान दे कहाथे’. हरि सेन से मेरा परिचय १९९३ से है जब उन्होंने मेरे पहले व्यंग्य संग्रह ‘मेरा मध्य प्रदेशीय ह्रदय’ का मुखपृष्ठ बनाया था. लेकिन मुझे चित्रकारों के बीच में ‘लॉन्च’ किया है चित्रकार डी.एस.विद्यार्थी और सूक्ष्म कलाकार अंकुश देवांगन ने. मेरा मन शिल्पों, चित्रों और रंगों की दुनियां में शुरू से ही रमा रहा है. हाँ .. चित्रकारों की संगत देर से मिल रही है.

मैं हर शाम ऑफिस से निकलता और इन तूलिकाओं और उनके रंगों की दुनिया में जा समाता. पहली शाम सिविक सेंटर के नेहरु आर्ट गैलरी में थी जहाँ कला प्रेमी नेहरु को हार पहना कर चित्रकला प्रदर्शनी का उदघाटन किया गया. इस अवसर पर अनेक चित्रकारों व भिलाई के अधिकारियों कर्मचारियों के बीच इंदौर से आये प्रसिद्ध चित्रकार व लेखक अखिलेश उपस्थित थे. गोल गुम्बद वाली इस गैलरी में चित्रों को देखना एक अलहदा अनुभव होता है.

सभी चित्र आधुनिक कलाओं के यानी ‘माडर्न आर्ट’ के थे. तीन दिनों के इस चित्रमय आयोजन को स्वच्छता अभियान को समर्पित किया गया था. चित्रों में औद्योगिक विकास के साथ मिलने वाले प्रदूषण की ओर ध्यान आकर्षित किया गया था. अखिलेश के बनाये कुछ चित्रों में मशीनीकरण के बीच फंसे मनुष्य के द्वन्द को इस प्रकार दर्शाया गया था मानों वे भी मशीन के कल पुर्जे हो गए हों. एक अन्य चित्रकार ने धूल और कालिमा से अंटे एक पेड़ को दर्शाया था जो स्पंज आयरन फैक्टरी की देन थे. कुछ ताल तलैया थे जिनमे प्रदूषित जलों की वीभत्सता को दर्शाया गया था.


कैनवास पर चित्र बनाते हुए सुनीता वर्मा तथा अन्य चित्रकार
इस तीन दिवसीय आयोजन की एक बड़ी विशेषता यह थी कि कला पर विमर्श करने की कोशिश की गई थी. दूसरे दिन भिलाई क्लब में कला विमर्श पर गोष्ठी थी. भिलाई आर्ट क्लब के अध्यक्ष आर.के.मेराल ने बताया था कि ‘यह द्विपक्षीय सम्प्रेषण का विमर्श है जिसमें चित्र बनाने वाले और चित्रों को देखने वाले दोनों अपनी बातें कह सकेंगे. यह एक तरह से विमर्श में जन भागीदारी है.’ संचालन कर रहे सत्यवान नायक ने जब मुझे बोलने का अवसर दिया तब बातें इस तरह निकलीं कि ‘कला के किसी भी प्रति-रूप का सम्प्रेषण जितनी बड़ी चुनौती कला को देखने वाले के लिए है उससे बड़ी चुनौती यह कला का सृजन करने वाले के लिए है. और यह चुनौती सबसे अधिक माँडर्न आर्ट के लिए है.. यहाँ प्रदर्शित कलाओं की यह बड़ी विशेषता है कि वे हमारे कल कारखानों से बढते प्रदूषण को बता पा रही हैं. हमें सावधान कर पा रही हैं.’

१९३६ में बनी फिल्म ‘चार्ली इन माँडर्न टाइम्स’ में चार्ली चेप्लिन ने इस भोगवादी संस्कृति और उत्पादन की मारामारी के बीच मनुष्य को भी मशीन बना देने जैसे मालिकों के जघन्य कृत का खुलासा किया था. चैप्लिन को यह फिल्म बनाने की प्रेरणा महात्मा गाँधी से मिली थी.’

गोष्ठी के मुख्य वक्ता अखिलेश थे. कान में बाली पहने ऊंची कद काठी वाले अखिलेश केवल एक चित्रकार ही नहीं हैं एक अच्छे लेखक भी हैं. पिछले दिनों भिलाई के सार्वजनिक वाचनालय से उनकी एक किताब हासिल हुई थी ‘मकबूल’ नाम की जो मकबूल फ़िदा हुसैन पर लिखी गई है. अखिलेश इसमें लिखते हैं कि ‘आज भी कला महाविद्यालय में प्रवेश लेने वाले युवा मन में पहली छवि हुसैन की ही होती है. यह आलोक हुसैन अकेले दम पर फैलाते हैं, जिसमें कई साल बाद आने वाला युवा चित्रकार भी प्रकाशित होता है.’

आयोजन के तीसरे दिन ऐसे कई युवा चित्रकार प्रकाशित हो रहे थे और अपनी तूलिकाओं से आलोक फैला रहे थे उस सौ फुट लंबे सफ़ेद कैनवास पर. यह कैनवास नेहरु आर्ट गैलेरी के सामने फैलाया गया था जिसमें हरि सेन, सुनीता वर्मा, योगेन्द्र त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ चित्रकारों के साथ अनेक युवा चित्रकार भी अपनी तूलिकायें लेकर जुट गए थे और रंगों की छटा बिखरा रहे थे. यह रंगों और चित्रों की एक अलग दुनियां थी जो अद्भुत और अविस्मणीय थी.




20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जन्मे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में प्रबंधक हैं। मूलत: व्यंग्य लिखने वाले विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, ज्ञानोदय, अक्षरपर्व, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में भी छप रही हैं। उनके दो उपन्यास, चार व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों के संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है। उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। वे उपन्यास के लिए डॉ. नामवरसिंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी पुरस्कृत हुए हैं। आरंभ में विनोद जी के आलेखों की सूची यहॉं है।
संपर्क मो. 9407984014, निवास - मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001
ई मेल -vinod.sao1955@gmail.com


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