ब्लॉग छत्तीसगढ़

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31 July, 2015

पुरूरवा का पूर्वानुमान एवं सीता जी की आखिरी रात

पारम्‍परिक साहित्‍य में प्रेम एवं विरह, गद्य एवं पद्य की मूल विषय वस्‍तु रही है. विभिन्‍न महान कवि एवं लेखकों नें इसे केन्‍द्र में रखकर साहित्‍य की रचना की है. रचनाकारों के इसी सृजन से भारतीय साहित्‍य में भी विभिन्‍न नायक-नायिकाओं की कहानियॉं उपलब्‍ध है. इसी क्रम में उर्वशी एवं पुरूरवा की प्रेम कथायें भारतीय संस्‍कृत साहित्‍य एवं तदनन्‍तर हिन्‍दी साहित्‍य में भी मिलती हैं. पाठकों की रूचि के कारण रचनाकार इन प्रेम कहानियों को बार-बार नित-नव अर्थान्‍वयन करता हुआ नये रूप में प्रस्‍तुत करता है. ऐसा ही स्‍वागतेय प्रयास उडिया एवं अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्‍यकार डॉ.पंचानन मिश्र नें ‘पुरूरवा का पूर्वानुमान’ के रूप में किया है. उडिया में लिखी गई इस कविता का हिन्‍दी अनुवाद यशस्‍वी अनुवादक कृष्‍ण कुमार ‘अजनबी’ नें किया है.

उडिया में लिखी गई इस लम्‍बी कविता में कवि नें प्रेम एवं विरह के भावों का अद्भुत चित्रण है. इस मिथक कथा से परिचित सुधीजन जानते हैं कि पुरूरवा को मिलन से कहीं अधिक विरह को झेलना पड़ा है. कवि नें काव्‍य नायक असफल प्रेमी पुरूरवा का मार्मिक अंत:स्‍वर को इसमें शब्‍द दिया है. एक ऐसे अपूर्व सौंदर्यशाली, बलशाली पुरूष पुरूरवा जिससे उर्वशी जैसी अप्‍सरा मोहित हो जाती है उसके विरह की स्थिति का जीवंत चित्रण करता हुआ कवि लिखता है ‘हे ब्रम्‍हाण्‍ड सुन्‍दरी/उतर आओ धरती पर फिर से एक बार/ जीर्ण-शीर्ण अस्थि पंजर वाले../ इस शरीर में फूंक दो जीवनांश का मंत्र/ देकर एक ऐसा चुम्‍बन.’ ऐसा आर्तनाद करते पुरूरवा की नायिका ब्रम्‍हाण्‍ड सुन्‍दरी उर्वशी का परिचय कवि कुछ इस तरह से कराते हैं ‘.. और विस्‍तृत नितम्‍बों के घूर्णन पर/ गतिशील होते हैं पृथ्‍वी के/ उत्‍तर व दक्षिण गोलार्ध दोनों. कम्पित वक्षोजों के उत्‍थान एवं पतन पर/ लिपिबद्ध हो जाता/ मानवीय संस्‍कृति का लम्‍बा इतिहास/ हिरणी से नैनों वाली की/ तिरछी नजरों से/ मोहासक्‍त है स्‍वर्ग, मर्त्‍य व पाताल.’

कवि इस लम्‍बी कविता में इसी तरह से अपनी अभिव्‍यक्ति को बहुत सुन्‍दर ढंग से मुखरित किया है. मिलन की आस में सूखते पुरूरवा स्‍वयं कविता के रूप में अपनी कहानी कहता है जिसे कवि आगे बढ़ाता है. कविता में कवि की दार्शनिकता घटनाओं का प्रतीकात्‍मक विश्‍लेषण करते हुए बार बार सोचने के लिए विवश करती है. देवराज इन्‍द्र, लुब्‍धक दैत्‍य, चित्ररेखा व अन्‍य अप्‍सराओं के साथ उमड़ते घुमड़ते यादों के बवंडर कविता को रोचक बनाते हैं.

डॉ.पंचानन मिश्र जी की कृति ‘सीता जी की आखिरी रात’ रामचरित के सीता वनवास की कथा है. यह लम्‍बी कविता पूरी तरह से दर्शन पर आधारित कविता है. कवि इसे काव्‍य रूप में रचने के पहले अपनी मनोदशा एवं चिंतन को पाठकों के सामने रखने के लिए नौ पृष्‍टों में भूमिका लिखा है. बार बार अग्निपरीक्षा देती नारी के मनोभावों का मार्मिक चित्रण इस कविता में नजर आती है. राज्‍याभिषेक के उपरांत सीता पर लांछन लगने के कारण राम द्वारा उसे त्‍याग दिया जाता है. गर्भवती असहाय नारी को जंगल में इस तरह छोड़ जाने से थोथे राम राज्‍य की परिकल्‍पना पर भी जगह-जगह इसमें तीक्ष्‍ण व्‍यंग्‍य उपस्थित हैं. शब्‍दों का संयोजन एवं भाव प्रवाह अद्भुत है, कविता को पढ़ते हुए सीता के प्रति करूणा के साथ ही मानवीय सम्राट के निर्णय पर बार बार खीझ उभर आता है. कविता प्रत्‍येक पूर्णविरामों के साथ गंभीरता से सोंचने को मजबूर करती है. ‘सीता जी की आखिरी रात’ के कई हिस्‍से अत्‍यंत प्रभावशाली एवं उल्‍लेखनीय है जिन्‍हें मैं यहां लिखना चाहूं तो पूरे किताब की नकल यहां उतारना पड़ेगा. यह लम्‍बी कविता काव्‍य के सभी तत्‍वों से परिपूर्ण है, प्रादेशिक भाषा उडिया में लिखे इस उत्‍कृष्‍ट साहित्‍य को तो राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पुरस्‍कार मिलना चाहिए.

प्रतीकों एवं शब्‍द संयोजन में कवि की सिद्धस्‍तता दोनों पुस्‍तकों में स्‍पष्‍ट झलक रही है. अनुवादक के हिन्‍दी शब्‍द सामर्थ्‍य से यह रचना हिन्‍दी पाठकों के लिए भी सुगम व बोधगम्‍य हो गई है. इन्‍ही गुणों के कारण दोनों पुस्‍तकों को पढ़ते हुए, आरंभ से अंत तक, घटनाओं का प्रवाह अविरल रूप से मानस में समाता चला जाता है. छंदमुक्‍त नई कविता के स्‍वरूप में लिखी गई इन दोनों लम्‍बी कविताओं के रचनाकार डॉ.पंचानन मिश्र एवं अनुवादक कृष्‍ण कुमार ‘अजनबी’ को मेरी शुभकामनायें.
संजीव तिवारी


पुरूरवा का पूर्वानुमान
रचनाकार : डॉ.पंचानन मिश्र
भाषान्‍तर : कृष्‍ण कुमार ‘अजनबी’
प्रकाशक : पहले पहल प्रकाशन, भोपाल
प्रथम संस्‍करण 2015
पृष्‍ट संख्‍या : 112
मूल्‍य : 150/- हार्ड बाउन्‍ड


 सीता जी की आखिरी रात
रचनाकार : डॉ.पंचानन मिश्र
भाषान्‍तर : कृष्‍ण कुमार ‘अजनबी’
प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नई दिल्‍ली
प्रथम संस्‍करण 2015
पृष्‍ट संख्‍या : 136
मूल्‍य : 260/- हार्ड बाउन्‍ड

07 July, 2015

राज योग की फिरकी

चित्र दैनिक ट्रिब्यून से साभार
हाल ही में राज्य सरकार नें निगम मण्डलों में अध्यक्षों की नियुक्ति की है एवं सरकार के प्रति निष्ठा रखने वालों को उपकृत किया है। राज्य सरकार में मंत्री मण्डल के बाद निगम, मण्डल और आयोग के प्रमुख के पद का अहम स्थान होता है, इनमें से कुछ को तो राज्य मंत्री का दर्जा भी प्राप्त होता है। इनके प्रमुख, अपने आपको अध्यक्ष कहाने से ज्यादा 'राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त' कहाना और लिखाना जादा पसंद करते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि उनकी अहमियत राज्य में कितनी है। राज्य में कुछेक निगम, मण्डल और आयोग को छोड़कर बाकी के प्रमुख, राजनीति से जुड़े व्यक्ति ही बनते हैं। जो कुछेक हैं उनमें छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष का पद भी है जिसमें गैर राजनैतिक व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया जाता है। हालांकि अघोषित तौर पर अध्यक्ष के चयन में प्रत्याशी के राजनैतिक सोच एवं निष्ठा की परख की जाती है। आप सबको ज्ञात ही है कि, इस आयोग का गठन, प्रदेश में छत्तीसगढ़ी भाषा को राजकाज की भाषा बनाने के मुख्य उद्देश्य के लिए किया गया है। आयोग के गठन के पिछले दो कार्यकाल की परम्परा को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि, इसमें साहित्यकार को अध्यक्ष बनाया जाता है। साहित्यकार में राजनीतिज्ञ के गुण हो तो उसे अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है। छत्तीसगढ़ी राजकाज की भाषा बने ना बने, उसे छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों को 'बेंझालना' आना चाहिए यह विशेष योग्यता तय है।

पिछले कई महीनों से साहित्यिक गलियारों में कानाफूसी चल रही है, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तथाकथित भावी अध्यक्षों और सदस्यों की धड़कने तेज है। अपनी दावेदारी पुख्त़ा कराने के लिए वे हर संभव प्रयास एवं जुगाड़ कर रहे है। वीतरागी बने रहना चाह रहे हैं, 'हंफर' रहे हैं किन्तु धड़कनों को छुपा रहे हैं। बहुत कठिन समय है, दिन फोनियाने में गुजर रहा है एवं रातो को नींद नहीं, स्वप्न आ रहे हैं। जुगाड़तोड़ करवाने वाले लोग राजनैतिक सोच की फर्जी डिग्री एवं निष्ठा के भभूत से बंधा बायोडाटा 'घेरी बेरी' मुख्यमंत्री कार्यालय भिजवा रहे हैं। इधर डाक्टर साहब हैं कि नाम की घोषणा कर ही नहीं रहे हैं।

भावी होने का आनंद व्यक्त होने के लिए उतावला होता है किन्तु प्रत्यक्ष तौर पर सभी भावी यही कहते नजर आ रहे हैं कि वे इस दौड़ में शामिल नहीं हैं। सुनने में यह भी आया है कि कुछ भावी यह बोलते नहीं अघा रहे हैं कि उन्हें 'जोजियाया' जा रहा है। मुख्यमंत्री या विभागीय मंत्री को अध्यक्ष या सदस्य बनने के लिए किसी को 'जोजियाना' पड़ रहा है, यह बात पच नहीं रही है। अब जो भी हो, 'जोजवा' टाईप साहित्यकार लोग बिलीभ कर रहे हैं एवं बेनर पोस्टर की तैयारी में जुट गए हैं। हम तो ठहरे 'आईटम' टाईप साहित्यकार हमें क्या, आदेश जारी होने पर ही 'पतियायेंगें'।
—तमंचा रायपुरी

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