ब्लॉग छत्तीसगढ़

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05 March, 2015

छत्तीसगढ़ के जनकवि :कोदूराम “दलित” भुलाहू झन गा भइया

५ मार्च को एक सौ पाँचवीं जयन्ती पर विशेष
{छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कहानीकार और वरिष्ठ साहित्यकार श्री परदेशीराम वर्मा जी की किताब – “अपने लोग” के प्रथम संस्करण २००१ से साभार संकलित}
छत्तीसगढ़ के जनकवि :कोदूराम “दलित”
भुलाहू झन गा भइया

पिछड़े और दलित जन अक्सर अन्चीन्हे रह जाते हैं | क्षेत्र, अंचल, जाति और संस्कृति तक पर यह सूत्र लागू है | पिछड़े क्षेत्र के लोग अपना वाजिब हक नहीं माँग पाते | हक पाने में अक्षम थे इसीलिये पिछड़ गये और जब पिछड़ गये तो भला हक पाने की पात्रता ही कहाँ रही |
हमारा छत्तीसगढ़ भी एक ऐसा क्षेत्र है जिसे हक्कोहुकूक की समझ ही नहीं थी | परम श्रद्धालु, परोपकारी, मेहमान-नवाज, सेवाभावी यह छत्तीसगढ़ इसी सब सत्कर्मों के निर्वाह में मगन रह कर सब कुछ भूल जाता है | “मैंने उन्हें प्रणाम किया” यह भाव ही उसे संतोष देता है | जबकि प्रणाम करवाने में माहिर लोग उसकी स्थिति पर तरस ही खाते हैं | छत्तीसगढ़ी तो अपनी उपेक्षा पर जी भर रोने का अवकाश भी नहीं पाता | जागृत लोग ही अपनी उपेक्षा से बच्चन की तरह व्यथित होते हैं ....
‘मेरे पूजन आराधन को
मेरे सम्पूर्ण समर्पण को,
जब मेरी कमजोरी कहकर
मेरा पूजित पाषाण हँसा,
तब रोक न पाया मैं आँसू’

हमारे ऐसे परबुधिया अंचल के अत्यंत भावप्रवण कवि हैं स्वर्गीय कोदूराम “दलित” | ५ मार्च १९१० को दुर्ग जिले के टिकरी गाँव में जन्मे स्व.कोदूराम “दलित” का निधन २८ सितम्बर १९६७ को हुआ | ये गाँव की विशेषता लेकर शहर आये | यहाँ उन्होंने शिक्षक का कार्य किया | अपने परिचय में वे कहते हैं....
‘लइका पढ़ई के सुघर, करत हववं मैं काम,
कोदूराम दलित हवय, मोर गवंइहा नाम |
मोर गवंइहा नाम, भुलाहू झन गा भइया
जन हित खातिर गढ़े हववं मैं ये कुण्डलिया,
शउक मुहू ला घलो हवय कविता गढ़ई के
करथवं काम दुरूग मा मैं लइका पढ़ई के’ |
कोदूराम “दलित” का यह उपनाम भी महत्वपूर्ण है | वे महसूस करते थे कि वे ही नहीं अंचल भी दलित है | छत्तीसगढ़ी का यह कवि हिन्दी और कवियों से जगमग लोकप्रिय काव्य मंचों पर अपनी विशेष ठसक और रचनात्मक धमक के कारण मंचों का सिरमौर रहा | अपने जीवन काल में ही दलित जी ने स्पृहणीय मुकाम पा लिया था मगर अतिशय विनम्र और संस्कारशील होने के कारण यथोचित महत्त्व न मिलने पर भी वे कभी नहीं तड़फड़ाये |
शोषण की चक्की में पिस रहे दलितों के पक्ष में कलम चलने वाले कवि ने आर्थिक सहयोग देने वाले राजनेता दाऊ घनश्याम सिंह गुप्त जी के सम्बन्ध में “सियानी गोठ” काव्य संग्रह में जो लिखा वह उनके चातुर्य और साहस को ही प्रदर्शित करता हऐ | “सियानी गोठ” के प्रकाशन के लिये दुर्ग के धान कुबेर दाऊ घनश्याम सिंह गुप्त ने उन्हें मात्र पचास रुपया दिया | सविनय राशि स्वीकारते हुये संग्रह में दाऊ जी के चित्र को ही उन्होंने नहीं छापा, बाकायदा यह वाक्य भी लिख दिया ....
“जानत हौ ये कोन ये
मनखे नोहय सोन ये”
यही दलित जी की विशेषता है |
“राजा मारय फूल म, त तरतर रोवासी आवय
ठुठवा मारय ठुस्स म, त गदगद हाँसी आवय”
यह कहावत है छत्तीसगढ़ में | कवि लेखक ठुठवा अर्थात कटे हाथों वाले लोग हैं |सत्ता, शक्ति से संचालित नहीं हैं लेखक के हाथ | इसीलिए वह ठुठवा है | और कमाल देखिये कि शक्ति संपन्न राजा जब फूल से भी मारता है तो मार भारी पड़ती है | मार खाने वाला बिलबिला कर रोने लगता है | लेकिन ठुठवा मारता है आहिस्ता और मार खाने वाला हँस पड़ता है क्योंकि चोट नहीं पड़ती | विरोध भी हो जाता है और सांघातिक चोट भी नहीं पड़ती | यह है कला की मार के सम्बन्ध में छत्तीसगढ़ का नजरिया | यह छत्तीसगढ़ी विशेषता है | दूसरे हमें फूल से छूते हैं तो हमें रोना आता है लेकिन हम दूसरों को मार भी दें तो वे आल्हादित होते हैं | यह प्रेम की जीत है | प्रेम का साधक किसी को मार ही नहीं सकता | छत्तीसगढ़ तो दूसरों को बचाता है स्वयं मिट कर | इसीलिए इसकी मार ऐसी होती है कि मार खाने वाले भी आनंद का अनुभव करते हैं |
छत्तीसगढ़ के लिए जो आंदोलन चला विगत पचीस बरस से, उसे आंदोलन के आदि पुरुष डॉ.खूब चंद बघेल ने अपने दम पर चलाया | छत्तीसगढ़ भातृ संघ के झंडे टेल संकल्प लेने वाले लाखों लोगों ने अपने खून से हस्ताक्षर कर उनके साथ जीने-मरने का संकल्प लिया | लेकिन छत्तीसगढ़ ने कभी तोड़-फोड़, मार -काट को नहीं अपनाया | जबकि दूसरे इलाकों में बात-बात में खून बह जाता है और लोग गर्वित भी होते हैं कि हमारे क्षेत्र में तो बात-बात में चल जाती है बन्दूक | हमें इस पर गर्व नहीं होता | हम तो गर्वित होते हैं कि हम सहिष्णु हैं | प्रेमी हैं | शांतिप्रिय और हितैषी हैं | इसीलिए कोदूराम दलित जैसा कवि हमारे बीच जन्म लेता है | और दान दाता धन कुबेर का सम्मान रखते हुए अपनी प्रतिपक्षी भूमिका भी पूरे गरिमा के साथ निभा ले जाता है …..
“जानत हौ ये कोन ये,
मनखे नोहे सोन ये”
यह मनुष्य नहीं सोना है | मनुष्य होता तो अरबों की संपत्ति का स्वामी साहित्य सेवक को मात्र पचास रुपया ही क्यों देता | व्यंग्य यह है | मगर पूरी मर्यादा के साथ |
दलित जी ने छत्तीसगढ़ी कविता को एक आयाम ही नहीं दिया , उसे वे जनता तक ले जाने में सफल हुए | वे छत्तीसगढ़ी कुंडलियों के रचनाकार के रूप में विख्यात हुए | बेहद प्रभावी और बहु आयामी कुंडलियों को लेकर वे मंच पर अवतरित हुए | आजादी मिली | जनतंत्र में कागज़ के पुर्जे से राजा बनाने की प्रक्रिया चुनाव के माध्यम से शुरू हुई | इसे दलित जी ने कुछ इस तरह वर्णित किया......

'अब जनता राजा बनिस करिस देश मा राज,
अउ तमाम राजा मनन बनगे जनता आज |
बनगे जनता आज, भूप मंत्री पद मांगे,
ये पद ला पाए बर, घर-घर जाय सवांगे
बनय सदस्य कहूँ जनता मन दया करिन तब
डारयँ कागद पेटी ले निकरय राजा अब ||

दलित जी आधुनिक चेतना संपन्न एक ऐसे कवि थे जिन्होंने विज्ञान के लाभकारी प्रभाव को अपनी कविता का विषय बनाया | उनके समकालीन कवियों में यह दृष्टि बहुत कम दीख पड़ती है …

तार मनन मा ताम के, बिजली रेंगत जाय
बुगुर बुगुर सुग्घर बरय,सब लट्टू मा आय
सब लट्टू मा आय ,चलावय इनजन मन ला
रंग-रंग के दे अँजोर ये हर सब झन ला
लेवय प्रान लगय झटका,जब एकर तन मा
बिजली रेंगत जाय, ताम के तार मनन मा ||
चाय, सिनेमा, घड़ी, नल, परिवार नियोजन, नशा, जुआ, पंचशील, अणु, विज्ञान, बम, पञ्चवर्षीय योजना, अल्प बचत योजना, चरखा, पंचायती राज आदि विषयों पर दलित जी ने कुंडलियों का सृजन किया है | अपनी धरती का मुग्ध भाव से उन्होंने यश गान किया ….


छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर डार,
हवयँ लोग मन इहाँ के, सिधवा अऊ उदार
सिधवा अऊ उदार हवयँ दिनरात कमावयँ
दे दूसर ला मान, अपन मन बासी खावयँ
ठगथयँ ये बपुरा मन ला बंचक मन अड़बड़
पिछड़े हवय अतेक, इही कारण छत्तीसगढ़ |
पिछड़े छत्तीसगढ़ में भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रादुर्भाव एवं उसके महत्त्व को कवि ने खूब रेखांकित किया है | वे एक चैतन्य कवि थे | उनकी चौकन्न आँखों ने अँधेरे उजले पक्षों को बखूबी देखा | भिलाई पर कवि की प्रतिक्रिया देखें …..
बनिस भिलाई हिन्द के, नवा तिरिथ अब एक
चरयँ गाय-गरुवा तिहाँ, बसगे लोग अनेक
बसगे लोग अनेक ,रोज आगी संग खेलें
लोहा ढलई के दुःख ला हँस-हँस के झेलें
रइथयँ मिल के रूसी- हिन्दी भाई-भाई
हमर देश के नवा तिरिथ अब बनिस भिलाई |

दलित जी अपने समकालीन कवियों में सर्वाधिक लोकप्रिय हुए | उनके सुयोग्य शिष्य के रूप में श्री दानेश्वर शर्मा आज उनकी परम्परा को और पुख्ता कर रहे हैं | श्री दानेश्वर शर्मा चौथी हिन्दी की कक्षा में उनके शिष्य थे | तब से ही लेखन और मंच के प्रति उनमें दलित जी ने संस्कार डालने का सफल यत्न किया | दलित जी छत्तीसगढ़ की परम्पराओं पर मुग्ध थे तो आधुनिक दुनिया के साथ कदम मिला कर चलने की कोशिश कर रहे छत्तीसगढ़ के प्रशंसक भी थे | उन्होंने राउत नाच इत्यादि के लिए भी अवसर आने पर दोहों का लेखन किया | यहाँ भी उनकी प्रतिबद्धता एवं दृष्टि का परिचय हमें मिलता है |

गांधी जी के छेरी भ इया दिन भर में नारियाय रे
ओखर दूध ला पी के भ इया, बुधुवा जवान हो जाय रे |
दलित जी परतंत्र भारत में जन्मे | उन्हें भारत की आजादी का जश्न देखने का अवसर लगा | भला उस यादगार दृश्य को वे क्योंकर न शब्दों में बाँधते ? उनका चित्रांकन जहाँ रंगारंग है वहीं अनोखेपन के कारण अविस्मरणीय भी ….............

आइस हमर लोक तंत्र के, बड़े तिहार देवारी
ओरी-ओरी दिया बार दे, नोनी के महतारी

विनोदी स्वभाव के दलित जी हास्य-व्यंग्य के अप्रतिम कवि सिद्ध हुए | भाषा और व्याकरण के जानकार दलित जी काव्यानुशासन को लेकर सतर्क रहते थे | जहाँ कहीं उन्हें रचना में अनुशासनहीनता दिखती वे सविनय रोकने से बाज नहीं आते | टोका-टोकी का उनका अंदाज अलबत्ता बहुत सुरुचिपूर्ण होता | टोके जाने पर भी व्यक्ति मुस्कुरा कर अपनी गलती स्वीकारता ही नहीं, सदा के लिए उनका मुरीद हो जाता | समाज में आर्थिक विषमता के कारण उत्पन्न कठिनाइयों का वर्णन उनकी रचनाओं में है | महत्वपूर्ण यह है कि वे अपनी रचनाओं के प्रतीक भी जीवनण और उससे जुड़ी अनिवार्य संगति से संदर्भित करते हुए उठाते हैं | इसीलिए दलित जी का व्यंग्य अपने अनोखेपन में उनके समकालीनों से एकदम अलग लगता है | यहाँ हम देख सकते हैं, उनकी विलक्षणता को.....

'मूषक वाहन बड़हर मन, हम ला
चपके हें मुसुवा साहीं
चूसीं रसा हमार अउर अब
हाड़ा -गोड़ा ला खाहीं |
हे गजानन ! दू गज भुइयाँ
नइ हे हमर करा
भुइयाँ देबो-देबो कहिथे हमला
कतको झन मिठलबरा

शोषण के कारण बेजार जन का ऐसा चित्रण वे ही कर सकते थे | अमीरों ने खून तो चूस लिया लेकिन अब वे हमारी हड्डियाँ भी चबाएँगे, यह भविष्य वाणी आजादी के पचास वर्षों में कितनी ठीक उतर गई इसे हम बेहतर समझ पा रहे हैं | वे हिन्दी में भी रचना करते रहे | एक लंबे समय से छत्तीसगढ़ में तरह-तरह के रचनाकारों की साधना चलाती आ रही है | एक वे जो यहाँ का हवा, पानी अन्न-जल ग्रहण करते हुए छत्तीसगढ़ी नहीं जानने के कारण हिन्दी में लिखने को मजबूर थे | दूसरी तरह के कलमकार वे हैं जिनके लिए छत्तीसगढ़ी दुदूदाई की बोली तो थी मगर वे उसमें रचना नहीं कर सके | उनका हिन्दीमय यशस्वी जीवन छत्तीसगढ़ी का कुछ भी भला नहीं कर सका | इसके अतिरिक्त ऐसे रचनाकार भी हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ में लेखन कर अपना स्थान बनाया और छत्तीसगढ़ी का गौरव भी बढ़ाया लेकिन सर्वाधिक कठिन साधना उनकी है जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों में ही सामान रूप से लिखने का जिम्मा सम्हाल रहे हैं | कोदूराम जी भी इसी परम्परा के कवि थे | यद्यपि सामान रूप से दोनों ही भाषाओं में या सभी विधाओं में महत्त्व प्राय: नहीं मिलता | दलित जी भी छत्तीसगढ़ी के कवि माने जाते हैं | चूंकि उनका काव्य वैभव छत्तीसगढ़ी में भी पूरे प्रभाव के साथ उपस्थित रहा | कल भी और आज भी उसका प्रभाव हमें दिखता है | इसीलिए उन्हें छत्तीसगढ़ी का संसार अपना प्रमुख कवि स्वीकारता है | लेकिन उनकी हिन्दी की रचनाएँ भी बहुत महत्वपूर्ण हैं |
काम और उससे उत्पन्न नाम ही महत्वपूर्ण है शेष काल के गाल में समा जाता है, इस भाव पर बहुत सारी रचनाएँ हम पढाते हैं | यहाँ देखें कुंडाली कुशल दलित जी का काव्य वैभव उनकी हिन्दी कविता के माध्यम से....
'रह जाना है नाम ही, इस दुनियाँ में यार
अत: सभी का कार भला, है इसमें ही सार
है इसमें ही सार, यार तू तज दे स्वार्थ
अमर रहेगा नाम, किया कर तू परमारथ
काया रूपी महल एक दिन ढह जाना है
किन्तु सुनाम सदा दुनियाँ में रह जाना है |

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04 March, 2015

इस होली में सारे कलुष धो लेना चाहता हूँ

इस सोसल मीडिया और इसके अस्त्र हिन्दी ब्लॉगिंग नें पिछले वर्षों से कुछ ऐसा छद्म और आभासी व्यक्तित्व का निर्माण कर दिया कि, लगने लगा कि मैं भी रचनाकार हूँ और मेरा एक अलग अस्तित्व निर्माण अब हो चुका है। हालाँकि हकीकत यह है कि ये पूर्ण आभासी है और जमीनी तौर पर मेरा लेखन घूरे के स्तर से उठ नहीं पाया है, किन्तु भरम तो भरम है। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकारों को सीट रिजर्वेशन लिस्ट में अपना नाम ढूंढते और झुंझलाते देखने पर कुछ ऐसा लगा कि, कम से कम मुझे तो अपने औकात में रहना चाहिए।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ में लोकभाषा में लिखने वाले लगभग एक हजार लोग हैं। जिसमे से एक से ज्यादा किताबों के रचयिता भी पांच सौ से कम नहीं हैं। निश्चित तौर पर ऐसे रचनाकार वरिष्ठता की श्रेणी में आते हैं। इन पांच सौ रचनाकारों के सामने मेरा अस्तित्व कुछ भी नहीं। ये पांच सौ रचनाकार ऊपरी तौर पर भले न स्वीकारें किन्तु ये स्वयं निरंतर मंच की तलाश कर रहे हैं। व्यवहारिक तौर पर महिमा मंडनीय नियत मंचीय कुर्सियों की संख्या कम है। कुर्सियों के लिए पहले से ही जद्दोजहद है। ऐसी स्थिति में बिना प्रचुर लेखन किए, सीटों पर अपना नाम लिखा देखने के लोभ को मुझे छोड़ना होगा। अब लग रहा है कि, अपनी दक्षता क्षेत्र को छोड़ कर अन्यान्य विधाओं में भोथरे ज्ञान के साथ सेंध लगाने की जुगत मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। अभी तो खड़ा होना सीखा हूँ, बहुत दूर तक चलना है, विश्वास भी है।
इस नए मीडिया के आभासी दुनिया में पांडित्य प्रदर्शन करते हुए यदि मैंने आपके सम्मान को चोट पहुचाया होगा तो मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ।
-संजीव तिवारी (�� तमंचा रायपुरी)

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