संजीव तिवारी की कलम घसीटी

01 May, 2019

दुर्ग ग्रामीण के रूप में उस समय दुर्ग से लगे ग्राम कुथरैल विधानसभा सीट था। दूसरे चुनाव में यह सीट भिलाई के रूप में परिसीमित हुआ था। उस समय के इस दुर्ग ग्रामीण सीट में कांग्रेस के मोहनलाल बाकलीवाल, समाजवादी पार्टी के दाउ त्रिलोचन सिंह, राम राज्य परिषद के लाल दशरथ सिंह, शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के रंदुल, कम्युनिस्ट पार्टी के चंदूलाल और निर्दलीय उमेश सिंह उम्मीदवार थे। चुनाव में त्रिलोचन सिंह की जीत हुई थी और निकटतम प्रतिद्वंदी मोहनलाल बाकलीवाल सहित अन्य सभी हार गए थे। इस चुनाव के बाद मोहनलाल बाकलीवाल ने त्रिलोचन सिंह के विरुद्ध चुनाव में अनियमितता का आरोप लगाते हुए चुनाव याचिका दायर किया था। बाकलीवाल ने आरोप लगाया था कि त्रिलोचन सिंह ने मतदाताओं को मतदान बूथ तक लाने ले जाने के लिए गांव-गांव में वाहन की व्यवस्था की थी। इस तरह से उसने मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए चुनाव आचार संहिता के नियमों का उल्लंघन किया था। उन्होंने अपनी याचिका में त्रिलोचन सिंह के निर्वाचन को अवैध घोषित करने एवं स्वयं को निर्वाचित घोषित करने की मांग की थी। इस याचिका की सुनवाई लंबे समय तक चली। बाकलीवाल यह सिद्ध नहीं कर पाए कि चुनाव में आचार संहिता का उल्लंघन किया था। फलत: याचिका खारिज हो गई। संभवत: दुर्ग जिले के लिए यह पहली चुनाव याचिका थी।




विधान सभा 1952 के पंचवर्षीय में ही मोहनलाल बाकलीवाल की किस्मत चमकी। हुआ यह कि दुर्ग विधानसभा के विधायक घनश्याम सिंह गुप्त जब निर्वाचित होकर मध्य प्रदेश विधानसभा पहुंचे तब वे चाहते थे कि वे पुन: स्पीकर बनें किन्‍तु उन्‍हें स्‍पीकर नहीं बनाया गया। इससे नाराज होकर उन्‍होंनें इस्तीफा दे दिया। तब दुर्ग के में मध्यावधि चुनाव हुआ। जिसमें मोहनलाल बाकलीवाल कांग्रेस की टिकट से जीते। उसके बाद तो मोहन लाल बाकलीवाल लोकसभा चुनाव 1997 में दुर्ग के सांसद निर्वाचित हुए।
-संजीव तिवारी

इस आलेख के आधार पर दुर्ग पत्रिका नें विधान सभा चुनाव के समय समाचार प्रकाशित किया था। क्रियेटिव कामन्‍न्‍स के तहत इसे यहां प्रकाशित कर रहा हूं क्‍योंकि इस सामाग्री को एकत्रित करने के लिए मैने मानसिक श्रम किया है।



इन्‍हें भी देखें ..




29 April, 2019

छत्तीसगढ़ की प्रदर्शनकारी लोककला "पंडवानी" के इतिहास पर इतना कहा जाता है कि यह "भजनहा" से आरंभ होकर नारायणलाल वर्मा, झाड़ूराम देवांगन, पद्मश्री पूनाराम निषाद और पद्मविभूषण तीजनबाई तक सफर करते हुए वर्तमान "पंडवानी" के रूप में स्थापित हुई।




सभी वरिष्ठ पंडवानी कलाकार सबल सिंह चौहान और वाचिक लोकाख्यान को अपने गायन का आधार बताते हैं। इस अवधि में कलाकारों की, प्रस्तुति की अपनी-अपनी शैली को निरंजन महावर ने नया शब्द गढ़ते हुए, वेदमती और कापालिक नाम दिया। इसे अर्थांवित करते हुए उन्होंने कहा कि जो वेद सम्मत गायन है, वह वेदमती है एवं जो लोक सम्मत गायन है वह कापालिक है। इसे उन्‍होंनें विस्‍तार से समझाया है। उनकी किताब और मध्‍यप्रदेश जनजातीय परिषद की पत्रिका 'चौमासा' में प्रकाशित आलेखों को संदर्भित करते हुए लोग धीरे-धीरे पंडवानी विशेषज्ञ बनते गए। छत्‍तीसगढ़ की धरती में इसकी खुशबू कैसे फूटी इसे गिने-चुने स्‍थानीय लोगों के अतिरिक्‍त किसी और ने नहीं किया।



किसी ने गपालिक के सूत्र को और आगे बढ़ाया कि जो अपने कपाल से कथा तैयार कर कथा गाता है वह कापालिक है यानी कल्पना प्रधान। किसी ने कहा कि जो खड़े होकर-नाट्य प्रदर्शन कर कथा गाता है वह कापालिक है, यह भी कहा गया कि, बैठकर जिसे गाया जाता है वह वेदमती। वैसे अधिकतम गायक/गायिका अपने आप को कापालिक गायक/गायिका कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। पद्मविभूषण तीजनबाई स्वयं अपने आप को कापालिक गायिका कहती है। 




आप सभी जानते हैं कि पिछले सत्तर के दसक से प्रत्येक गायक/गायिका अपने साक्षात्‍कार में कहते हैं कि वे, सबल सिंह चौहान और लोक आख्यान के परस्पर मेल से पंडवानी प्रस्तुत करते हैं। इस तथ्य के साथ तथाकथित शैली की परिभाषा मुझे दिग्भ्रमित करती है। मेरे अनुसार से अब पंडवानी मात्र कापालिक है, वेदमती पंडवानी पहले कभी होती रही होगी।
इस पर अभी लिखना जारी है ... साथ बने रहें।
- संजीव तिवारी

छत्तीसगढ़ी शब्द

छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास

पंडवानी

पुस्तकें-पत्रिकायें

Labels

संजीव तिवारी की कलम घसीटी समसामयिक लेख अतिथि कलम जीवन परिचय छत्तीसगढ की सांस्कृतिक विरासत - मेरी नजरों में पुस्तकें-पत्रिकायें छत्तीसगढ़ी शब्द विनोद साव कहानी पंकज अवधिया आस्‍था परम्‍परा विश्‍वास अंध विश्‍वास गीत-गजल-कविता Naxal अश्विनी केशरवानी परदेशीराम वर्मा विवेकराज सिंह व्यंग कोदूराम दलित रामहृदय तिवारी कुबेर पंडवानी भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष गजानन माधव मुक्तिबोध ग्रीन हण्‍ट छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म ओंकार दास रामेश्वर वैष्णव रायपुर साहित्य महोत्सव सरला शर्मा अनुवाद कनक तिवारी कैलाश वानखेड़े खुमान लाल साव गोपाल मिश्र घनश्याम सिंह गुप्त छत्‍तीसगढ़ का इतिहास छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास पं. सुन्‍दर लाल शर्मा वेंकटेश शुक्ल श्रीलाल शुक्‍ल संतोष झांझी उपन्‍यास कंगला मांझी कचना धुरवा कपिलनाथ कश्यप किस्मत बाई देवार कैलाश बनवासी गम्मत गिरौदपुरी गुलशेर अहमद खॉं ‘शानी’ गोविन्‍द राम निर्मलकर घर द्वार चंदैनी गोंदा छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंजन राय बहादुर डॉ. हीरालाल रेखादेवी जलक्षत्री लक्ष्मण प्रसाद दुबे लाला जगदलपुरी विद्याभूषण मिश्र वैरियर एल्विन श्यामलाल चतुर्वेदी श्रद्धा थवाईत