ब्लॉग छत्तीसगढ़

इस ब्‍लॉग के अतिरिक्‍त आप संजीव तिवारी एवं तमंचा रायपुरी के समग्र पोस्‍ट झॉंपी पर पढ़ सकते हैं.

24 December, 2014

सिरपुर के संबंध में एक महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज



छत्‍तीसगढ़ में स्थित सिरपुर का महत्‍व अब सर्वविदित है। सोमवंशी शासकों के काल में जब यह क्षेत्र दक्षिण कौसल के नाम से जाना जाता था तब इसकी राजधानी सिरपुर ही थी जिसे श्रीपुर कहा जाता था। विद्धानों नें कहा है कि कला के शाश्वत नैतिक मूल्यों एवं मौलिक स्थापत्य शैली के साथ-साथ धार्मिक सौहार्द्र तथा आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश से आलोकित सिरपुर भारतीय कला के इतिहास में विशिष्ट कला तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। इस नगरी का अब अस्तित्‍व ही शेष है, वर्तमान समय में इसके वैभव की परिकल्‍पना को साकार करने के लिए यहॉं यत्र तत्र पुरातात्विक अवशेष आज भी शेष हैं।

इन पुरातात्विक अवशेषों का विश्‍लेषण करते हुए सिरपुर पर शोध तो कितनों ही हुए हैं किन्‍तु पुस्‍तकाकार रूप में इस नगरी के वैभव को उकेरता हुआ कोई एकाग्र ग्रंथ अभी तक नहीं आ पाया था। ललित शर्मा की किताब ‘सिरपुर : एक सैलानी की नजर में’ जब हमारी नजर पड़ी तो प्रसन्‍नता हुई। यायावर ब्‍लॉगर ललित शर्मा देश के विभिन्‍न पुरातात्विक स्‍थलों के संबंध में कलम चलाते रहे हैं एवं उन्‍होंनें कई पुरातात्विक रहस्‍य उद्घाटित भी किया है। इस कारण उनकी इस किताब पर हमारी स्‍वाभाविक रूप से विश्‍वसनीयता बढ़ी है।

किताब सहज व सरल भाषा में तथ्‍यात्‍मक रूप से लिखी गई है। विवरणों के साथ ही रंगीन चित्रों नें किताब के महत्‍व को और बढ़ाया है एवं सिरपुर को सजीव कर दिया है। किताब का आवरण बहुत आकर्षक है। सुप्रसिद्ध हिन्‍दी ब्‍लॉगर ललित शर्मा नें इस पुस्‍तक में सिरपुर का संपूर्ण पुरा ऐतिहासिक विवरण दिया है। इसके अलावा लेखक द्वारा वैभवशाली श्रीपुर को वहॉं उपलब्‍ध पुरातत्विक अवशेषों में खोजना और उन्‍हीं कालखण्‍डों में जाकर उस भव्‍य नगर का चित्र खींचना एक अद्भुत अनुभूति पैदा करता है।

पुरातात्विक शोध ग्रंथों की उबाउ पठनीयता के मुकाबिले किताब ‘सिरपुर : एक सैलानी की नजर में’ ना केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय है। सिरपुर पर उनके इस किताब के मुख्‍य स्‍त्रोत प्रसिद्ध पुरातत्‍ववेत्‍ता अरूण कुमार शर्मा हैं इस कारण यह किताब सिरपुर के संबंध में एक महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज भी है। हमें विश्‍वास है इस सैलानी की नजर से अब सिरपुर को देखना और भी आसान हो जायेगा।

पुस्तक – सिरपुर; सैलानी की नज़र से
लेखक – ललित शर्मा
प्रकाशक – ईस्टर्न विन्ड, नागपुर
मूल्य – रुपये 375/- (सजिल्द)
कुल पृष्ठ – 99
रंगीन 10 पृष्ठ अतिरिक्त

संजीव तिवारी

22 December, 2014

छत्तीसगढ़ी भाषा की मिठास: गुरतुर छत्तीसगढ़ी

(संदर्भ – रायपुर साहित्य महोत्सव)

रायपुर साहित्य महोत्सव, छत्तीसगढ़ में अपने तरह का पहला आयोजन था जिसमें हिंदी और क्षेत्रीय भाषा छत्तीसगढी को विशेष रूप से फोकस किया गया था। यह हमारे प्रदेश के लिए गौरव की बात है कि, इस आयोजन के विभिन्न सत्रों में हमारी क्षेत्रीय भाषा और अस्मिता पर चर्चा हुई। पूरे कार्यक्रम में लगभग चौदह सत्रों में हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति पर बात हुई। हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति के महत्व को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित करने के लिए यह कार्यक्रम एक बहुत बडा मंच बना।

इस आयोजन में सभी सत्रों के लिए लगभग एक घंटे का समय निर्धरित था। सीमित समय मे विषय विशेषज्ञ से मूल बातों को सामने लाना लगभग असंभव होता है किन्‍तु वैश्विक फलक पर इससे सम्मिलत विषयों पर विमर्श का उद्देश्य पूरा होता है। अनके सत्रों के मध्य ऐसे ही एक घंटे मे छत्तीसगढी भाषा की मधुरता पर 'गुरतुर छत्तीसगढ़ी' के नाम से एक सत्र था, जिसमें बतौर सूत्रधार मुझे विषय को सामने रखते हुए वक्ताओं से छत्तीसगढी भाषा में अंतर्निहित व्यंजकता, ध्वन्यात्मकता और शब्द शक्ति के साथ माधुर्य गुणों के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाना था। मुझे सूत्र जोड़ते हुए सत्र के उद्देश्यों की ओर वार्ता को आगे बढ़ाना था।

वर्तमान समय में छत्‍तीसगढ़ी भाषा के संबंध में जो तथ्य एवं प्रश्न वैश्विक क्षितिज पर ज्वलंत रूप से उभरे हैं उस पर ध्यान रखते हुए ही हमें अपनी भाषा पर विमर्श करना आवश्यक था। हमारी मीठी बोली छत्तीसगढ़ी बोलने वालों के कण्ठों में वस्तुत: लोक जीवन के प्रेम, सौहार्द्र, पारस्परिकता, निश्छलता और सामाजिकता की मिठास बसी हुई है। भाषा का सौंदर्य और उसकी सृजनात्मकता उसके वाचिक स्वरूप और विलक्षण मौखिक अभिव्यक्तियों में निहित है। इधर वह लिखित-मुद्रित अभिव्यक्तियों और औपचारिक साहित्‍य में भी क्रमश: रूपांतरित हो रही है, यह स्वागतेय है। यह सत्य भी है कि, छत्तीसगढ़ का विकास इसी रास्ते से होगा किन्तु प्रश्न यह भी है, कि क्या मौखिक अभिव्यक्ति के माधुर्य को छत्तीसगढ़ी के लिखित, मुद्रित और औपचारिक प्रारूप में बचाए रखना संभव है। इसके साथ ही कुछ अन्य सामयिक ज्वलंत प्रश्न भी हमारे सामने उठते रहे हैं।

इन प्रश्नों और तथ्यों के साथ विमर्श को आगे बढ़ाते हुए अंतरजाल में सक्रिय वरिष्ठ ब्लॉगर ललित शर्मा ने कहा कि अब अंतरजाल मे भी छत्तीसगढ़ी भाषा स्थापित हो रही है। हिन्दी ब्लॉगों के आरंभिक दिनों में अंतरजाल के पाठक एवं लेखक छत्तीसगढ़ को एक पिछड़े व विपन्न राज्य के रूप में देखते थे। छत्तीसगढ़ के ब्लॉगरों नें अपने साहित्य एवं संस्कृति के संबंध में धीरे धीरे जानकारियां ब्लॉग में डाली। जिससे हमारे साहित्य व हमारी भाषा और हमारी सांस्कृतिक परंपराओं पर वैश्विक चर्चा शुरू हुई। इसी समय में छत्तीसगढ़ की भाषा की समृद्धि को प्रस्तुत करने के लिए गुरतुर गोठ नामक वेबसाइट का संचालन शुरु किया गया। इसके बाद अंतरजाल मे कई और छत्तीसगढ़ी भाषा के ब्लॉग आरंभ हुए। हिंदी भाषा-भाषी लोगो ने भी इस भाषा के मर्म को समझा और इस भाषा की सरलता व मधुरता से वे प्रभावित हुए। अंतरजाल मे हमारी लोक भाषा के साहित्य की उपस्थिति पर उन्होंने बल दिया जिससे कि हमारी भाषा एवं उसके साहित्य का परम्म्परिक माध्यमों से एक कदम आगे बढ़कर अनौपचारिक दस्तावेजीकरण हो सके।

अगले वक्ता के रुप मेँ नीरज मनजीत ने अपने माधुर्य गुण के कारण अन्य भाषा-भाषियोँ को लुभाती छत्तीसगढ़ी पर अपने अनुभव को विस्तारित किया। उन्होंनें बताया कि एक पंजाबी भाषी होने के बावजूद छत्तीसगढ़ी की मीठी बोली उन्हें किस तरह से प्रभावित करती है। उन्होंनें कहा कि दूसरी भाषाओं के साहित्य का छत्तीसगढ़ी में रुपांतरण या अनुवाद होना चाहिए एवं इसका क्षेत्रीय प्रकाशन भी होना चाहिए ताकि छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्य में विविधता आये। अगली कड़ी मेँ डॉ.अनसूइया अग्रवाल नें छत्तीसगढ़ी भाषा के सौंदर्य और उसकी वाचिक परम्परा की मौखिक अभिव्यक्तियों को छत्तीसगढी लोकोक्तियाँ एवं मुहावरों के माध्यम से विस्तृत किया। उन्होंनें अपना परचा पढ़ते हुए छत्तीसगढ़ी की अनेक मुहावरों का अर्थ सहित उल्लेख किया। कवि गणेश सोनी प्रतीक ने अपना वक्तव्य कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंनें छत्तीसगढ़ में अपनी ही भाषा के प्रयोग पर शरमाते लोगों को आड़े हाथ लेते हुए भाषा की महिमा का गान प्रस्तुत किया। एक भाषा विशेषज्ञ के रूप में डॉ.चित्तरंजन कर जी भी इस कार्यक्रम में प्रतिभागी थे किन्तु वे किसी कारणवश नहीं आ सके। भाषा विज्ञान की दृष्टि से डॉ.कर की उपस्थिति से छत्तीसगढ़ी भाषा का भाषा वैज्ञानिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला जा सकता था।

कार्यक्रम के अंत मेँ पद्मश्री डॉ.सुरेंद्र दुबे नें विषय को समग्रता से विस्तार देते हुए छत्तीसगढी भाषा की अस्मिता और उससे जुड़े हमारे सम्मान पर उदाहरणों सहित अपने विचार रखे। उन्होंनें मेनस्ट्रीम औपचारिक साहित्य में रूपांतरित हो रहे छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्य पर भी विस्तार से अपने विचार रखे। हमारी भाषा के अदभुत शब्द ग्राह्यता गुण एवं हिन्दी पट्टी में स्वीकार्यता के संबंध मे बताते हुए उन्होंनें रामचरित मानस में छत्तीसगढ़ी शब्द प्रयोग का उदाहरण दिया। अंग्रेजी व अन्य भाषाओं के शब्दों का छत्तीसगढ़ी में सहज रूप से समाहित हो जाने का उल्लेख करते हुए अपनी आलराइट नामक छत्तीसगढी कविता का पाठ भी किया। अपने वक्तव्य में उन्होंनें मंगलेश डबराल के द्वारा छत्तीसगढ़ को सांस्कृतिक रूप से विपन्न कहे जाने पर अपना रोश व्यक्त किया। रायपुर साहित्य महोत्सव के मंच से मानसिक रूप से विपन्न मंगलेश डबराल को लानत भेजते हुए उन्होंनें छत्तीसगढ़ी में कविता पाठ किया। जिसका आशय था कि संकुचित मानसिकता को छोड़ डबरवाल और मिट्टी कीचड़ के छोटे संकुचित गड्हे से तो बाहर निकल। हमारे प्रदेश के साहित्य और संस्कृति को निहार फिर कह विपन्न कौन है। इस दिन सम्पन्न हुए सभी सत्रों से ज्यादा दर्शक इस सत्र में थे जिन्होंनें डॉ.दुबे के स्वर में स्वर मिलाते हुए छत्तीसगढ़ियों को विपन्न कहने वाले मंगलेश डबराल की कड़ी आलोचना की।

इन प्रश्नों के अतिरिक्त सत्र में जो हस्तक्षेप के बिन्दु थे उनमें जो प्रश्न व समाधान उभर कर सामने आ रहे थे उसके अनुसार पहला प्रश्न यह था कि, क्या वजह है कि अब क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य जिस तरह का विस्तार एवं जगह बना पाया है वैसा छत्तीसगढ़ी का साहित्य नहीं बना पाया है ? इस प्रश्न के जवाब में जो बातें सामने आई उसके अनुसार इसमें मूल रूकावट हमारी भाषा के साहित्य का मूल्यांकन नहीं होना ही है। साथ ही छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्य का अन्य भाषाओं में अनुवाद नहीं होना भी इसका सबसे बड़ा कारण रहा है। अगला प्रश्न यह रहा कि यदि छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बना भी दें तो इससे क्या साहित्य का विस्तार हो जाएगा, जबकि हिन्दी राष्ट्रभाषा बनने के बाद स्वयं संकुचित होने का खतरा उठा रही है ? इस हस्तक्षेप के जवाब में सत्र से जो बातें निकल कर सामने आई उसके अनुसार लोक भाषा का राजभाषा के रूप में कार्य व्यवहार होने से भाषा संकुचित नहीं होती बल्कि इससे लोक भाषा का विस्तार होता है। उसमें नित नये भाषा शब्दों का समावेश होता है एवं भाषा की नदी निरंतर आगे प्रवाहमान रहती है। हिन्दी लोक भाषा नहीं है इस कारण इसे उदाहरण स्वरूप रखना श्रेयकर नहीं है।

हस्तक्षेप का तीसरा प्रश्न यह था कि, यदि हम रेखांकित करना चाहें तो छत्तीसगढ़ी साहित्य के शीर्ष रचनाकार कौन होंगें और उनके साहित्य का राष्ट्रीय विस्तार क्या है ? एवं छत्तीसगढ़ी अस्मिता को आप किस तरह समझते हैं और छत्तीसगढ़ी समाज के लिए यह कितना जरूरी है, जब वैश्विक समाज की बात हो रही है ? इसके उत्तर में सत्र की वैचारिकी यह रही कि वर्तमान समय में हमें हमारी लोक भाषा के साहित्य का विस्तार करने के हर संभव प्रयास करने हैं। वर्तमान में हम अपनी अस्मिता और स्वाभिमान के साथ अपनी भाषा के संविधान की आठवीं अनुसूची में जुड़ने का बाट जोह रहे हैं। हमारी भाषा की धमक, संपूर्ण विश्व में एडिनबरो नाट्य समारोह से लेकर पद्मश्री तीजन बाई के पंडवानी गीतों के रूप में गुजायमान हो रही है। हमारी लोक कलायें व शिल्प का डंका संपूर्ण विश्व में बज रहा है ऐसे समय में हमें विश्वास है कि हमारी भाषा भी अब शीघ्र ही अपने वांछित सम्मान को पा लेगी। वैश्विक समाज की अवधारणा के संबंध में हमारी वैचारिकी सोशल मीडिया में अपना धरातल तलास रही है जिसे अभी और खाद पानी का इंतजार है।

अचानक साहित्य की मुख्यधारा मे आना, बौद्धिकों की तेज धाराओं में अबौद्धिक होते हुए भी, न केवल जमे रहना बल्कि गाल बजाना, कितना कठिन होता है यह आप मुझसे जान सकते हैं। फिर भी मैं ये 'अतलंग' बार बार करता रहा हूं, मेरा उद्देश्य अपनी भाषा को वैश्विक परिदृश्य मे रखना था। मैंने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल व अन्य लिटरेचर फैस्टिवल के ढेरो वीडियोज देखे एवं उन कार्यक्रमों के अनुरूप अपने कार्यक्रम की रूपरेखा तय भी किया, किन्तु सचमुच में छत्तीसगढ़िया मनखे सुप्पर इंटेलीजेंट। बिना किसी संकुचित कैनवास के मुक्तांगन के विस्तृत कैनवास में प्रतिभागियों नें विमर्श के उपरांत रायपुर साहित्य महोत्सव के मंच पर गुरतुर छत्तीगढ़ी के उद्देश्य को सिद्ध किया। इस आयोजन से हमारी अस्मिता को हिन्दी पट्टी के वैश्विक परिदृश्य पर सामने रखने की एक शुरुआत हुई।

संजीव तिवारी

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