ब्लॉग छत्तीसगढ़

15 June, 2018

मोहक रंग संसार में है लोक जीवन की चेतना

जनजातीय चित्रकला में रुचि रखने वालों के बीच लतिका वैष्णव का नाम जाना पहचाना है। लतिका अपने चित्रों में बस्तर के आदिम राग को अपनी विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त करती है। लोक तत्वों से परिपूर्ण उसके चित्रों, भित्ति चित्रों में लोक संगीत प्रतिध्वनित होती है। बस्तर की माटी की गंध से सराबोर लतिका के परिवार में बस्तर के विभिन्न लोक परंपरा से जुड़े कलाकार हैं। कला का यह संस्कार उसे इसी पारिवारिक परंपरा से प्राप्त हुआ है। उसकी यह पारंपरिक अभिव्यक्ति शैलीगत रूढ़ि के भीतर भी मौलिक है। हमने लतिका वैष्णव से इस संबंध में एक बातचीत किया, प्रस्तुत है लोकचित्रकार लतिका वैष्णव से बातचीत के कुछ अंश- 

बस्तर की लोक चित्रकला पर काम करने का विचार आपके मन में कैसे प्रकट हुआ ?
मेरा जन्म अविभाजित बस्तर जिले के लगभग मध्य में स्थित छोटे-से नगर कोंडागांव में हुआ जो आज सात जिलों में विभाजन के उपरान्त कोंडागांव जिले के रूप में बस्तर संभाग का हिस्सा है। यह स्थान वर्षों से सांस्कृतिक नगरी के रूप में जाना जाता रहा है। कोंडागांव नगर एवं इस जिले में ही सभी प्रकार की लोक कलाओं का समागम है, जो अन्य जिलों में बहुत कम देखने में आता है। मैं लोकचित्र-विधा से इसलिए जुड़ पाई क्योंकि मेरे पिता श्री खेम वैष्णव एक प्रख्यात लोकचित्रकार, लोक संगीतकार एवं छायाचित्रकार भी हैं। मैंने जब से होश संभाला तब से मैंने हर पल अपने -आपको तूलिका, रंगों एवं लोकचित्रों के बीच पाया। इस तरह स्वाभाविक है कि मैं मेरी रुचि खिलौनों में कम और रंगों से खेलने में अधिक रही। फिर धीरे-धीरे कुछ ऐसा हुआ कि मेरी दैनिक गतिविधियों में पढ़ाई के साथ-साथ लोकचित्रकारी एक अनिवार्यताः की तरह जुड़ गई। उम्र बढ़ने के साथ-ही-साथ लोकचित्रकला की बारीकियों की ओर अपने पिता के मार्गदर्शन में मेरा ध्यान केंद्रित होता गया।
जैसा कि आप बता रही हैं कि आपका जन्म कोंडागांव में हुआ, जो एक आदिवासी बाहुल्य जिला है। तो आपने अपने अध्ययन के साथ-साथ लोकचित्र की परम्परा को किस तरह से आत्मसात् किया ?
यह मेरा परम सौभाग्य है कि मैं कोंडागांव जैसी सांस्कृतिक नगरी में जन्मी हूं तथा मुझे जन्म से ही विरासत के रूप में विभिन्न कलाओं को अपने पापा के माध्यम से जानने का अवसर मिला। कारण, आसपास के गांवों में होने वाले लगभग हर महीने के मुख्य-मुख्य लोक एवं आदिवासी तीज-त्यौहारों में, विवाह एवं अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में मेरा अपने पापा के साथ जाना होता रहा है। इन तीज-त्यौहारों एवं अन्य प्रसंगों को मैं अपने बाल्यकाल से पापा के साथ देखती रही हूं। इन्हें देखकर एवं अनुभव कर इनके  चित्रांकन के दृष्टिकोण से विभिन्न प्रतीकों को, जो मुझे बहुत ही आकर्षक लगते थे, उन्हें अपने ढंग से बनाकर या खींचकर उन चित्रों को  पापा को दिखाकर मार्गदर्शन लेती थी। समय-समय पर मम्मी के साथ भी विवाह, जन्म संस्कार एवं अन्य संस्कारों में भी जाना होता रहा है, जिसे मैं अपनी रुचि अनुसार ऑब्जर्व कर स्कैच कर लिया करती थी। इन्हें पापा के द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अनुसार संशोधित व परिमार्जित कर उसे प्रस्तुत करती थी। पापा मुझे प्रस्तुतिकरण की तकनीक भी मुझे बताया करते रहे हैं। सभी संस्कारों, कार्यक्रमों आदि को साक्षात् रूप से देखने और उसे समझने का अवसर ही मेरे लिए एक ऐसा आधार बना जिसे मैं आत्मसात् किए बिना नहीं रह सकी। 
चित्रकला के विभिन्न आयाम हैं किंतु आपने लोकचित्र को ही क्यों चुना ?
मेरे अध्ययन-कालअमें स्कूल में मुझे कई कार्यक्रमों में चित्रकला प्रतियोगिताओं में भाग लेना होता था। उन विषयों के अनुसार चित्र बनाना पड़ता था। किंतु बचपन से लोकचित्र बनाते हुए उन चित्रों में भी लोक जीवन का कुछ-न-कुछ अंश आ ही जाता था, जिसके कारण मुझे पुरस्कार के साथ-साथ प्रशंसा भी मिलती रही है। मुझे एक ऐसी पृष्ठभूमि जन्म से ही मिली, जिससे मेरा रुझान इस ओर ज्यादा हुआ। चित्रकला के विभिन्न आयामों में से अपने क्षेत्र की लोक कलाओं को विकसित करने का जो मेरे पापा का संकल्प था उसे मैंने भी चुनौती के रूप में स्वीकार कर आगे बढ़ाने का एक छोटा-सा प्रयास कर रही हूं। वैसे तो फाईन आर्ट, कॉमर्शियल आर्ट, मॉडर्न आर्ट एवं अन्य विधाएं चित्रकला में हैं, किंतु अपनी मिट्टी की पहचान बनाए रखने का जो संकल्प किया है, उसमें मैं अपना योगदान दे रही हूं। इस विधा को जीवित रखना अत्यंत अनिवार्य है। कारण, यह विधा आज विलुप्त होने की कगार पर है।
जैसा कि बस्तर क्षेत्र में बेलमेटल, लौह शिल्प, काष्ठ शिल्प एवं अन्य शिल्प का विशेष महत्त्व वहां के समाज में प्रचलित है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक समस्त संस्कारों में परिलक्षित होता है। क्या लोक चित्र भी कहीं सभी संस्कारों में दिखाई पड़ता है ?     
यह आपने बहुत ही मार्मिक प्रश्न किया है जिसके उत्तर में मैं अपने अध्ययन से केवल इतना कहना चाहूंगी, कि जिस तरह बस्तर क्षेत्र में प्रचलित अन्य विधाओं को समाज के सभी संस्कारों में अंगीकृत किया हुआ है, जो मूर्त रूप में और स्थाई होने के कारण दिखाई पड़ता है। चूंकि लोक चित्र प्रायः मांगलिक अवसरों पर भित्ति एवं आंगन आदि पर चित्रित होते हैं और संबंधित प्रसंग सम्पन्न होने के साथ ये चित्र मिटा दिए जाते हैं। इस तरह इसमें स्थायीपन नहीं होने के कारण इसका विकास शेष कलाओं के अनुरूप नहीं हो पाया है। किंतु जैसा कि हमारा संकल्प है, हम इसे अक्षुण्ण बनाने हेतु संकल्पित होने के साथ-साथ स्थायित्व प्रदान करने के लिए अभी भी जूझ रहे हैं। कारण,  इस विधा पर काम करने वाले कलाकार बहुत ही सीमित हैं तथापि इसे आगे बढ़ाने में काफी प्रयास करना पड़ रहा है। अब जहां इसके स्थायीकरण की बात आई है तो मैं आपको यह बताना चाहूंगी कि बस्तर क्षेत्र में प्रचलित अलिखित लोक महाकाव्य लक्ष्मी जगार, तीजा जगार, आठे जगार एवं बाली जगार में किए जाने वाले चित्रांकन के साथ-साथ अन्य संस्कारों में भी इसे अन्य रूप में जाना जाता है। बस्तर क्षेत्र के प्रख्यात लोक साहित्यकार श्री हरिहर वैष्णव जो मेरे सौभाग्य से मेरे बड़े पिताजी (ताऊजी) हैं, ने उक्त चारों लोक महाकाव्यों का ध्वन्यांकन कर उसे लिपिबद्ध किया तथा देश के प्रख्यात प्रकाशन संस्थानों द्वारा इसका प्रकाशन भी किया गया है। इन जगारों की लोक गायिकाएं (गुरूमाएं)  अधिकांशतः पढ़ी लिखी नहीं हैं, जिन्हें लाखों पंक्तियां कंठस्थ रहती हैं। यह तथ्य अपने-आप में अकल्पनीय एवं अविश्वसनीय लगता है किन्तु सत्य यही है कि इन लोकगायिकाओं को ऊपर बताई गयी पक्तियां याद रहती हैं। इन्हीं लोक गायिकाओं (गुरूमांओं) द्वारा गाए जाने वाले लोक महाकाव्य में लोक चित्र बनाने की परम्परा का प्रादुर्भाव देखने को मिलता है। जगार-आयोजन-स्थल पर बनाए जाने वाले चित्र जगार शैली के चित्रों के रूप में प्रचलित हुंए हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सभी संस्कारों में क्षेत्र की विभिन्न जनजातियों के द्वारा बनाए जाने वाले चित्रों को हम पृथक्-पृथक् श्रेणी में रखते हैं। जिसे स्थानीय भाषा में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। उदाहरण के तौर पर जमीन पर चावल और हल्दी के आटे से अंकित किए जाने वाले चित्रों को बाना/बाधा लिखना या फिर चउंक पूरना कहते हैं। कुछ अवसरों पर इसी आटे के घोल में हथेलियों को डुबाकर भित्ति अथवा मनुष्य या गोधन की पीठ पर बनाने वाले चिन्ह को हाता देना कहा जाता है। चावल के आटे के घोल में गिलास या कटोरी के ऊध्र्व भाग को डुबोकर इनका चिन्ह गोधन के शरीर पर दियारी नामक त्यौहार पर दिए जाने की परम्परा है। विवाह के समय  चावल एवं हल्दी के आटे से किए जाने वाले चित्रांकन को चउंक पूरना कहा जाता है जबकि मृत्यु-संस्कार के समय किया जाने वाला चित्रांकन मरनी बाधा कहलाता है। इन सभी को हम थल चित्रों के नाम से जानते हैं। इसी तरह देह पर बनाए जाने वाले गोदना को देह चित्र कह सकते हैं। पुरातन काल में पत्थरों पर उकेर कर बनाए जाने वाले चित्र को शैलचित्र की श्रेणी में रखा गया है। बस्तर अंचल की गोण्ड जनजाति की माड़िया उपजाति के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति की मृत्यु होने पर उनकी स्मृति में बनाया जाने वाला चित्र मृतक-स्मृति-स्तंभ (माड़िया खम्भा) कहलाता है। भित्ति (दीवार) पर  बनाया जाने वाला चित्र भित्ति चित्र कहलाता है। जगार शैली के चित्रांकन के लिए किसी विशेष जनजाति अथवा जाति का होना आवश्यक नहीं है’ किसी भी वर्ग की महिला अथवा पुरुष जगार गायकों, गुरुमांओं के निर्देशानुसार चित्रांकन किया जाता है। अब चूंकि स्थायीकरण की बात आती है तो जगार आयोजन.स्थल में प्रायः आयोजन के बाद घरों की लिपाई-पोताई के समय उन चित्रों की भी पुताई कर दी जाती है’ इसी तरह अन्य तीज-त्यौहरों या कार्यक्रमों में बनाए जाने वाले थल-चित्र भी अस्थाई होते हैं, जिसे कार्यक्रम के बाद मिटा दिया जाता है। गोंड जनजाति द्वारा बनाये जाने वाले मृतक-स्मृति-स्तंभ ही एक ऐसा स्थाई चित्रांकन है, जिसे उनकी (मृतक की) स्मृति में संरक्षित रखा जाता है। ठीक इसी तरह जगार शैली के लोक चित्रों को संरक्षित रखने के दृष्टिकोण से हमने इसे लुप्त होने से बचाने का प्रयास आरम्भ किया है। जिस तरह लोक साहित्यकार श्री हरिहर वैष्णव द्वारा अलिखित लोक महाकाव्यों को लिखित रूप में प्रकाशन दिलाने का एक प्रयास किया गया है, ठीक इसी तरह हम चंद लोकचित्रकार भी इस लोक चित्रकला को अन्य विधाओं के समकक्ष रखने का प्रयास कर रहे हैं।
इस विधा के बारे में आपने अब तक जो बताया वह वास्तव में आपके गहरे अध्ययन को दर्शाता है इसे राज्य स्तर या राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का भी प्रयास आपने किया है। इस परंपरा को कैसे संरक्षित और सवंर्धित किया जा सकता है ? इस बारे में बताएं।
मेरे पापा श्री खेम वैष्णव, मैं और मेरी छोटी बहन रागिनी वैष्णव तथा मेरी फुफेरी बहन सरला यादव के अतिरिक्त श्री राजेंद्र राव एवं श्री सुरेंद्र कुलदीप ऐसे लोक चित्रकार हैं जो इस विधा को जीवित रखने की दिशा में प्रयासरत हैं। आज के इस आधुनिकता, अंधानुकरण और प्रतिद्वंद्विता के चलते संस्कारों को बचाना कठिन तो लगता है किंतु संकल्प से सिद्धि की प्राप्ति होती है। यह सत्य है। इसलिये इस वाक्य को ही दृढ़ता से हमें अमल में लाना अनिवार्य होगा तब जाकर इस विधा को संरक्षित किया जा सकता है। रही बात संवर्धन की, तो शासन के सहयोग के बिना इस दिशा में कुछ भी किया जाना असम्भव तो नहीं किन्तु कठिन अवश्य ही लगता है। 
आपके द्वारा बनाए गए लोकचित्रों का प्रदर्शन, प्रकाशन के साथ अब तक आपने कहां कहां चित्रांकन किया है ? अपनी उपलब्धियों के विषय में बताएं।
मेरे द्वारा बस्तर अंचल के ‘‘तीजा जगार ‘‘ व ‘‘लछमी-जगार‘‘ की कथाओं के चित्रांकन किये गये हैं। इसी तरह विभिन्न तीज-त्यौहारों, जनजीवन, मेला-मड़ई, देवी-देवताओं, जतरा आदि विषयों पर केन्द्रित लोकचित्रों की प्रदर्शनी संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के कला वीथिका में हुई है। इसका शुभारंभ ललित कला अकादमीए नई दिल्ली के चेयरमेन डॉ. के. के. चक्रवर्ती द्वारा किया गया। मेरे लोकचित्र भिलाई इस्पात संयंत्र के नेहरू आर्ट गैलरी, भिलाई में भी प्रदर्शित हुए है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग पारम्परिक व्यजंन आस्वादन केन्द्र ‘‘गढ़कलेवा‘‘, स्वच्छ भारत मिशन अन्तर्गत ‘‘हमर-छत्तीसगढ़‘‘, एवं केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री जे. पी. नड्डा के दिल्ली निवास में चित्रांकन किया गया। जवाहर नवोदय विद्यालय, कुरूद में ‘‘बस्तर आदिवासी पेटिंग कार्यशाला‘‘ में करीब 200 छात्र-छात्राओं को एक माह तक तक प्रशिक्षण दिया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित बस्तर की भतरी बोली पर आधारित बाल लोककथा ‘‘बालमतिर भईंस‘‘ के लिए आवरण चित्र निर्माण, लोक महाकाव्य लछमी-जगार के लिए आवरण पृष्ठ तैयार किया गया, जिसका प्रकाशन साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा किया गया। पाठ्य पुस्तक निगम द्वारा प्रकाशित 5 अंको के लिए लोकचित्र पर आधारित आवरण पृष्ठ।  सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र नई दिल्ली के गुरू शिष्य परम्परा अन्तर्गत 3 वर्षों तक फेलोशिप प्राप्त। दक्षिण-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर द्वारा गुरू-शिष्य-परम्परा अन्तर्गत गुरू/प्रशिक्षक के रूप 6 माह तक 4 चार शिष्यों को प्रशिक्षित किया। राज्य स्वास्थ्य संसाधन केन्द्र, रायपुर द्वारा प्रकाशित, 12 एवं राज्य संसाधन केन्द्र, रायपुर द्वारा प्रकाशित 8 पुस्तकों के आवरण-चित्र एवं भीतरी रेखांकन/चित्रांकन का कार्य किया।युनिसेफ के लिए 5 फिलिप चार्ट (चित्रांकन एवं रेखांकन) का निर्माण। स्वास्थ्य सेवायें,
छत्तीसगढ़ शासन के लिए संदर्शिका, पोस्टर निर्माण। 
आपके पारिवारिक माहौल के बारे में बताएं। आप एक घरेलू महिला होते हुए भी अपनी कला-साधना के लिए कैसे समय निकाल पाती हैं?
मेरा पारिवारिक माहौल आरम्भ से यानि मेरे दादा जी के समय से ही सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं पारंपरिक रहा है। इसकी वजह से महिला एवं पुरुष में कोई अंतर अथवा भेदभाव न करते हुए सभी को समान रूप से उनके कत्र्तव्यों एवं अधिकारों को निभाने में भरपूर सहयोग मिला है। यही कारण है कि मुझे भी इस क्षेत्र में पूरी स्वतंत्रता मिली सकी। यह कला मुझे पारंपरिक रूप से विरासत में प्राप्त हुई है। मैं चाहती हूं कि हर परिवार में, विशेषकर महिलाओं को, ऐसा माहौल मिले जिसके द्वारा कला, साहित्य एवं संस्कृति को, और विशेष रूप से लुप्तप्राय विधाओं को संरक्षित करने हेतु महिलाओं को भी इसकी पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। ऐसा होने पर ही समाज में हम अपनी परंपरा को रचनात्मक ढंग से भावी पीढ़ी तक हस्तांतरित कर सकते हैं। आज के अत्याधुनिक और यान्त्रिक युग में प्रत्येक व्यक्ति पैसे के पीछे भाग रहा है और अपनी विलासिता की वस्तुओं को संग्रहित करने में जुटा हुआ है। ऐसे कठिन समय में न केवल पुरुषों अपितु महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी अपने घरेलू दायित्वों को निभाते हुए कला एवं संस्कृति के विस्तार, संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में सुनिश्चित करनी चाहिए।
 लतिका वैष्‍णव से आप यहां उनके फेसबुक प्रोफाईल में मिल सकते हैं।

08 May, 2018

छत्तीसगढ़ में अस्मितावादी लेखन - विनोद साव

विचार गोष्ठी में बाएं से मुख्य वक्ता विनोद साव, डा.जे.आर.सोनी, बी.एल.ठाकुर, मुख्य अतिथि डा.संजय अलंग(IAS), दिनेंद्र दास, छत्तीसगढ़ी वंशी असम निवासी शंकरचंद्र साहू, परदेशीराम वर्मा, अशेश्वर वर्मा.
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर ‘अगासदिया’ भिलाई में ‘छत्तीसगढ़ में अस्मितावादी लेखन पर’ विचार गोष्ठी संपन्न हुई. बुद्ध ने कहा था कि ‘परम्पराओं को इसलिए मत मानो कि इसे मैं मानता हूं या हमारे पूर्वज मानते थे. बरसों पुरानी परंपराओं को अपनाने से पहले यह देख लो कि यह आज भी अपनाने योग्य है या नहीं?.’ जाहिर है बुद्ध का यह कथन परंपराओं और रीति-रिवाजों पर लकीर के फ़कीर बने रहने से समाज को सावधान करना था.  इन परम्पराओं में हमारी अस्मिता निहित होती है. इस अस्मिता की रक्षा को लेकर भी न केवल सामान्यजनों में बल्कि लेखक बुद्धिजीवियों के बीच भी बहस हो जाती है.
हम अपनी अस्मिता को भिन्न माध्यम से तलाशते हैं: इसमें हमारी जातीय स्मृतियों, लोक-गाथाओं, मिथकों, पौराणिक चरित्रों कथाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. ये काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक लगती हैं. योग शास्त्र के अनुसार यह पाँच क्लेशों में से एक है. राग, द्वेष की तरह मन का यह भाव या मनोवृत्ति कि ‘मेरी एक पृथक् और विशिष्ट सत्ता है’.. और यही इसकी सीमा है. कभी अस्मिता रक्षा की भावना इतनी आवेग युक्त हो जाती है कि यह पृथकतावादी आन्दोलन की ओर रूख कर जाती है. यह किसी क्षेत्रीय और साम्प्रदायिक मांग की तरह अपनी अलग ‘टेरिटरी’(भू-भाग) की मांग करने लग जाती है.
बहरहाल छत्तीसगढ़ में अपनी अस्मिता के लिए आवाज़ दीगर राज्यों की तरह उग्र और आक्रामक नहीं रही है. यह छत्तीसगढ़ के रहवासियों की तरह सहृदयता पूर्ण है जिसमें उसके निजपन के आनंदमय संसार की चाहत है जिसमें वह सदा मगनमय होता आया है. छत्तीसगढ़ की अस्मिता की पहचान उसके लोकतत्व के रचे बसे संसार में है जहां से वह अपने जीवन के लिए अतिरिक्त उत्साह और उर्जा प्राप्त करता रहता है. इन्हीं लोकतत्वों की उपज है तीजनबाई, देवदास, सूरजबाई खांडे, रामचंद देशमुख – ये छत्तीसगढ़ी संस्कृति के ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं.
डा.हीरालाल शुक्ल, डा.रमाकांत श्रीवास्तव जैसे अनेक आलोचकों के अनुसार यह माना जाता है कि १५ वीं सदी में खैरागढ़ के राजाश्रित कवि दलपत साय ने अपने संरक्षक लक्ष्मीनिधि राय जो उस समय खोलवा के जमींदार थे - को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ को एक पृथक ईकाई माना था. दलपत साय ने भरी सभा में हुंकारते हुए कहा था कि
‘लक्ष्मीनिधिराय सुनो चित्त दै, गढ़ छत्तीस में न गढैया रही
मरदुमी रही नहि मरदन में, फेर हिम्मत से न लड़ैया रही
भयभाव भरे सब कांप रहे, भय है नहि जाय डरैया रही
दलराम भने सरकार सुनो, नृप कोउ न ढाल अडैया रही‘
इस हुंकार की परिणति चार सौ साल बाद छत्तीसगढ़ राज्य के पृथक अस्तित्व में आने पर हुई.  इन पंक्तियों से यह भी स्पष्ट होता है कि ‘छत्तीसगढ़’ जैसे अंचल का एक चित्र मानस पटल पर उभरने लगा था. छत्तीसगढ़ शब्द का प्रयोग दूसरी बार रतनपुर के कवि गोपाल मिश्र ने अपने काव्य ‘खूब तमाशा’ में सन १६८० में किया.. तब यह क्षेत्र दक्षिण कोसल कहलाता था. ‘छत्तीसगढ़ी’ संज्ञा अस्तित्व में कब आई इस पर इतिहासकार डा.संजय अलंग जैसे प्रबुद्धजन चर्चा करते रहे हैं. उनकी किताब ‘कोसल से छतीसगढ़ तक’में छत्तीस’ क्या है ‘गढ़’ क्या है?‘ इसका पुराना नाम ‘कोसल’ क्यों प्रचलित नहीं हो पाया है क्यों नहीं अपनाया गया. छत्तीसगढ़ का वर्तमान स्वरुप कैसे विकसित हुआ. इन सभी प्रश्नों पर सामूहिक चर्चा वे निरंतर कर रहे हैं.
यहां कुछ उन लेखकों के संदर्भ में बातें की जा सकती हैं जिन्होंने विगत दशकों में इतिहास, कविता और गद्य लेखन के प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवाई हैं. इनमें हैं हरि ठाकुर, लक्षमण मस्तुरिया और परदेशीराम वर्मा. इन तीनों रचनाकारों ने हिन्दी छत्तीसगढ़ी दोनों में लेखन किया है. हरि ठाकुर जब बोलते थे तब बहुधा इन पंक्तियों से आरम्भ करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ की भाषा संस्कृति के प्रति मुझे बड़ा मोह है.’  परदेशी राम वर्मा ने लिखा है कि ‘छत्तीसगढ़ को जानना है तो हरि ठाकुर को पढ़ो.’ छत्तीसगढ़ की गाथा, जल, जंगल और ज़मीन के संघर्ष की शुरूआत, छत्तीसगढ़ का प्रांरभिक इतिहास और सांस्कृतिक विकास, कोसल की भाषा कोसली जैसे नामों से हरि ठाकुर की दर्ज़नों कृतियाँ हैं जिनमें छत्तीसगढ़ का वे तुलनात्मक रूप से अधिक प्रामाणिक इतिहास परोसते हैं. राष्ट्र स्तर पर होने वाले महाविद्रोह में छत्तीसगढ़ के राजाओं और जमीदारों ने भी हिस्सा लिया था. इस राष्ट्रीय अस्मिता को वे रेखांकित करते हैं :
‘छत्तीसगढ़ भी ठोंकिस ताल, अठरा सौ सन्तावन साल।
गरजिस वीर नारायण सिंह, मेटिस सबे फिरंगी चिन्ह।‘  
छत्तीसगढ़ के पहले क्रांतिकारी शहीद वीर नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने पम्फलेट छपाकर ‘लाल जोहार किया है’
परदेशीराम वर्मा ने हिन्दी छत्तीसगढ़ी में आपने विपुल गद्य लेखन से इस अस्मिता की आवाज़ में ऐसा चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न किया कि उनके अनेक समकालीन व परवर्ती लेखक उनका अनुसरण करने लग गए. उन्होंने अपनी कहानियों में छत्तीसगढ़ी लोक-मान्यता से ओतप्रोत परिवेश बुनकर, पात्र व चरित्र खड़े कर, हिन्दी कथाओं में आंचलिक बोली व उनके हाने-मुहावरों का जमकर प्रयोग कर अपनी रचनाओं को और भी संप्रेषणीय बना लिया है.
इनमें लक्ष्मण मस्तुरिया ने जितना लेखन किया उससे ज्यादा अपने गीतों की मंचों पर प्रभावी प्रस्तुति से अपने अस्मितापूर्ण लेखन का अलग प्रभाव उन्होंने जना है और वे लगभग असम के भूपेन हज़ारिका की तरह छत्तीसगढ़ के जनमानस में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले कवि गीतकार हो गए. उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में छंद के स्तर पर भी प्रयोग किए हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां असम ने अपने सृजनकार भूपेन हजारिका को पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कारों तक पहुँचाया वहीं लक्ष्मण मस्तुरिया की यहां के शासन-प्रशासन और यहां की जनता ने कितनी सुधि ली है इसकी भनक लोगों को नहीं हो पायी, न ही उन्हें किसी पुरस्कार अलंकरण से कभी नवाज़ा गया.

 -  विनोद साव


20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जनमे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व विभाग में सहायक प्रबंधक हैं। fहंदी व्यंग्य के सुस्थापित लेखक विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, अक्षरपर्व, वसुधा, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं। उनके दो उपन्यास, तीन व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों व कहानियों के संग्रह सहित अब तक कुल बारह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल के लिए भी चित्र-कथाएं उन्होंने लिखी हैं। वे उपन्यास के लिए डाॅ. नामवरfसंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी सम्मानित हुए हैं। उनका पता है: मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001 मो.9301148626 ई-मेलः vinod.sao1955@gmail.com

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