ब्लॉग छत्तीसगढ़

इस ब्‍लॉग के अतिरिक्‍त आप संजीव तिवारी एवं तमंचा रायपुरी के समग्र पोस्‍ट झॉंपी पर पढ़ सकते हैं.

27 November, 2014

अब तुलसी क़ा होइहै, नर क़े मनसबदार

-छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 12 से 14 दिसम्बर को पुरखौती मुक्तांगन में प्रस्तावित 'रायपुर साहित्य महोत्सव' पर शेष-

राज्य बन जाने के बाद छत्तीसगढ़ का क्रेज हिन्दी पट्टी में भी बढ़ा है. इस बात को साबित करने के लिए एक वाकया काफी है. हुआ यूं कि एक बार, देश के सर्वोच्च आलोचक डॉ.नामवर सिंह राजकीय मंच से कहते हैं कि मैं ही आपका माधव राव सप्रे हूं. रियाया तालियॉं बजाती है, क्रांतिकारी हाथ मलते हैं, मनसबदारों के जी में जी आता है, कुल मिला कर बात यह कि, कार्यक्रम सफल होता है. आपने कभी सोंचा कि यह परकाया प्रवेश का चमत्कार कब होता है, तब, जब एक मुहफट आलोचक राजकीय अतिथि बनकर परम तृप्त होता है.

संतों! समय ऐसे कई उच्च साहित्यकारों के परकाया प्रवेश का समय आ रहा है. हॉं भाई, रायपुर साहित्य महोत्सव होने जा रहा है. इस पर राज्य में सुगबुगाहट है, खुसुरपुसूर हो रही है और साहित्य के कुछ संत छाती पीट रहे हैं. 

हमने भी रचनाकारों के प्रति राजकीय आस्था अनास्था के क्रम में कल ही कुम्भनदास को कोट किया था. लिख डालने के बाद याद आया कि, कुम्भनदास के समय में तुलसीदास नाम से भी एक कवि हुए थे. इधर अकबर के बुलावे पर कुम्भनदास अपनी पनही टोरते पैदल निकल पड़ते हैं सीकरी. उधर तुलसीदास बुलाने पर, बार बार बुलाने पर, बग्धी भेजे जाने पर, भी नहीं जाते. उनके दरबारी मित्र अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना रहीम का स्पेशल फोन भी आता है कि, मियॉं सीकरी में साहित्य महोत्सव करना है आकर चर्चा कर लेवें.

आगे की छोटी बातों को आप सब जानते हैं, बड़ी बात यह रही कि अकबर के बुलाने पर भी तुलसी नें दरबार में मत्था नहीं टेका वे रचते रहे, रचते रहे. आगे सत्य को समय नें सिद्ध किया और जहॉंगीर स्वयं तुलसी के दुआरे पहुंचे. साहित्य महोत्सव की रूपरेखा तय करने के लिए डायरी साथ लाए किन्तु तुलसीदास जी नें निर्विकार भाव से कहा कि मैं राज 'काज' में दखल नहीं दूंगा. वाह! धन्य हैं बाबा तुलसी, बाबा तुलसी की जय!

ऐसे मनसबदार कवि रहीम और जनझंडाबरदार कवि तुलसी, हर राज में हुए है. मनसबदार राजा को रचनाकारों और कलाकारों का लिस्ट सौंपते रहे हैं. कला और साहित्य के आयोजनों के प्रेमी राजा अकबर ऐसे मनसबदार कवि रहीम की अगुवाई में या पिछुवाई में कलाकारों और रचनाकारों को समय समय पर दरबार में 'नचनिया पेश किया जाए!' के तर्ज पर बुलाते भी रहे. वहीं राजा जहॉंगीर भी हुए जो तुलसी जैसे जनकवि के चौंखट में सलाम ठोंकरने स्वयं जाते भी रहे हैं. यही युग सत्य है, समय सापेक्ष है. 

आप रामचरित मानस लिखिए, जहॉंगीरों को आपके दुवारे आना पड़ेगा. बोलो सियाबर रामचंद्र की जय!!

किन्तु किस्सा अभी बाकी है मेरे दोस्त— ताजा रसोई से उठती खुशबू के साथ चर्चा यह भी आम रही कि, इतने बड़े आयोजन के पूर्व राज्य के साहित्यकारों और साहित्यिक समितियों से सलाह तो कम से कम ले लेना था. उनसे पूछा जाना चाहिए था कि आप किन्हें सुनना चाहते हो, देखना चाहते हो. बात में दम तो है, पूछने में हर्ज क्या था, एक सार्वजनिक प्रकाशन भर करना था. मानना नहीं मानना तो अकबरों की मर्जी है. आप अकबरबाजी छोड़कर जहॉंगीर की भूमिका निभा कर तो देखिए, हम मानते हैं कि हम तुलसी जैसे नहीं किन्तु राज्य में मानस रचयिता तुलसियों की कमी भी नहीं है.

सनद रहे कि हम जहाँगिरों को यह आस्वस्त भी करते हैं कि, हम सरकार की विफलताओं या नसबंदी कांड मे मृत महिलाओं का लेखा जोखा नहीँ पूछेंगे. सरकारी पोंगा से विरोध का गान नहीं गायेंगे किन्तु इतने बड़े आयोजन के सम्बन्ध में हमें पूछ तो लेते. हमें यह केवल्य ज्ञान हैं कि, समय हर जख्म को भुला देता है, हर गाला भर देता है. वैसे भी हमारा मगज तो सरकारी विज्ञापनों और अनुदानो के बिला पर गिरवी रखा है.

तमंचा रायपुरी
(बचा खुचा अपच का वमन)

26 November, 2014

संतन को कहाँ सीकरी सों काम ?

-छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 12 से 14 दिसम्बर को पुरखौती मुक्तांगन में प्रस्तावित 'रायपुर साहित्य महोत्सव' पर शेष-
अब न कुम्भनदास रहे न अकबर बादशाह न फतेहपुर सीकरी। अब के कुम्भनदासों को हर पल अगोरा रहता है कि कब सीकरी से बुलावा आए और वे दौड़ पड़े। बिना अपने पनही के टूटने या घिसने की परवाह किए। इसमें शर्त बस इत्ती सी है कि, सीकरी तक आने जाने के लिए पुष्पक और असमान्य सम्मानजनक मानदेय। फ़ोकट में तो कोई भिस्ती भी न जाय। अब रही बात अब के रियाया और दरबारियों की, तो वे भी तभी इन कुम्भंदासों के आह में ताली बजाने आयेंगे जब कोई चतुर सेनापति बौद्धिक रणनीति अपनाएगा।

मौजूदा हालत में कुम्भंदासों की टीम और रियाया दोनों, सीकरी के आयोजन के प्रति उत्सुक हैं। सीकरी के चाहरदीवारी में रहने वाले बौद्धिक जो रियाया और दरबारी की परिभाषा से अपने आप को, परे समझते हैं उनके लिये ये समय मंथन का है। सरकारी है तो क्या ये असरकारी होगा? असरकारी होता तो क्या प्रभावकारी होगा? इन प्रश्नों की गठरी बांधने के बजाय, इस सरकारी साहित्यिक आयोजन को हम फैंटेसी मान लें।

भक्तजनों! साहित्य की दुनिया में आयोजनों का बड़ा क्रेज रहा है। आपको तो मालूम ही है कि, आयोजनो के चकाचौंध में लेखन गौड़ हो जाता है लेखक महत्वपूर्ण हो जाता है। आयोजनों की आंच दूर तक जाती है जिसमें कई कई परत के पूर्वाग्रह पकते हैं। इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए साहित्यकार बोधित्सव नें फेसबुक मे एक बार लिखा कि, लोकार्पण शब्द कभी कभी तर्पण की तरह सुनाई देता है.. और विमोचन लुंचन की तरह .. पुरस्कार तिरस्कार की तरह और .. बडा कवि सड़ा कवि ध्वनित करता है। ऐसे समय में जब एक जिम्मेदार साहित्यकार ये कहता है तब साहित्य का छद्म अनावृत हो जाता है, इनके कथनी और करनी में फ्रिक्शन नजर आने लगता है। राज्य का ताजा इतिहास गवाह है कि, सेनापति के खून सने हांथो से नेवता नई झोकेंगे कहने वालों की भीड़ सेनापति को सलाम ठोकते नजर आते हैं और हमारे जैसे दू दत्ता बछवा को चूतिया बनाते है। इसीलिए कलम की जनपक्षधरता में संदेह होने लगता है। छद्म जनपक्षधर कलमकारों और संदेह का लाभ उठाने वाले साहित्यकारों की पहचान तय करना आवश्यक हो जाता है। ऐसे कलमकारों, साहित्यकारों और जन पैरोकारों से साक्षात्कार के लिए हमें आयोजन को बढ़ावा देना चाहिए।

रही बात आयोजन में राज्य के दखल की तो, प्लेटो, अरस्तु और सुकरात के समय मे भी राजाओं का अस्तित्व दखलकारी रहा। किंग एडिबस रैक्स का फितूर कलम पर हावी रहा। साहित्य का वैचारिक पक्ष जहर के प्यालों में उबलता रहा। ऐसे ही समय मे सुकरात ने अपनी बात बड़ी दृढ़ता से रखी, उन्होंने कहा अपनी मूर्खता का जिसे ज्ञान है वही बुद्धिमान है। इसीलिए मै अपनी सर्वोच्च मुर्खता का भान और मान रखते हुए इस साहित्य उत्सव का स्वागत करता हूँ।

तमंचा रायपुरी
(अपच बौद्धिकता का रायता बिखराते हुए)

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