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कापी टू अन्‍ना हजारे, रालेगन सिद्धी

आज दोपहर बाद नगर पालिक निगम, भिलाई के भवन अनुज्ञा शाखा कुछ काम से जाना हुआ। कार्यपालन अभियंता सह भवन अधिकारी महोदय के पास बैठा ही था कि एक व्‍यक्ति अंदर आया और अपना परिचय भवन अधिकारी को दिया। भवन अधिकारी और आगंतुक के बीच हो रही चर्चा से यह ज्ञात हुआ कि आगंतुक के भवन में अवैध निर्माण के संबंध में तीन शिकायत निगम को मिला था। आगंतुक नें अधिकारी से कहा कि उसके भवन में कुछ भी अवैध निर्माण नहीं हो रहा है, जो निर्माण हो रहा है उसकी अनुज्ञा प्राप्‍त है जिसे मैं साथ लाया हूँ। आगंतुक नें आगे कहा कि फिर भी आप अपने अभियंता से जांच करवा लीजिये, मेरे भवन में चार किरायेदार हैं जो मेरे दुकान पर कब्‍जा कर लिये हैं ना किराया दे रहे हैं ना दुकान खाली कर रहे हैं और समय बेसमय सूचना के अधिकार के तहत कभी इनकम टैक्‍स से तो कभी सेल्‍स टैक्‍स से और कभी निगम से मेरे व्‍यवसाय की फाईल की कापी मांगते रहते हैं, मैं छोटा सा व्‍यवसायी हूँ साहब परेशान हो गया हूं, मेहनत के पैसे से छ: दुकान बनवाया हूं। भवन अधिकारी उसके अनुरोध पर एक अभियंता को आगंतुक के साथ उस भवन में भेज दिया। मेरे बैठे-बैठे ही लगभग पंद्रह मिनट में अभियंता और आगंतुक वापस आ गए, अभियंता नें बतलाया कि अवैध निर्माण नहीं हो रहा है बल्कि अनुज्ञा प्राप्‍त तल में टाईल्‍स लगाया जा रहा है। 

आगंतुक नें भवन अधिकारी से अनुरोध किया कि महोदय, मुझे उस फर्जी शिकायत को दिखाया जाय। अधिकारी ने फाईल मंगवाया, और आगंतुक वह पत्र देखने लगा जो पंजीकृत डाक से भवन अधिकारी को प्राप्‍त हुआ था जिसमें आगंतुक के द्वारा अवैध निर्माण के संबंध में कहानी गढ़े गए थे। मैं आगंतुक के बाजू में बैठा था इस कारण वह पत्र मैं भी सुविधाजनक रूप से पढ़ पा रहा था। आवेदन के अंत में लिखे शब्‍द नें मेरी उत्‍सुकता बढ़ा दी, वहां लिखा था 'कापी टू श्रीमान अन्‍ना हजारे, रालेगन सिद्धी, म.रा.' । मेरे चेहरे में फैलती मुस्‍कान अब हसी में बदल गई और आगंतुक सहित कार्यालय में बैठे सभी लोग हसने लगे थे।

शिकायतकर्ता का जो नाम और पता लिखा था वह पूर्णतया फर्जी था, क्‍यूंकि जिस परिसर का पता दिया गया था उस परिसर में इस नाम का कोई व्‍यक्ति नहीं है यह मैं जानता था। शिकायतकर्ता द्वारा यह शिकायत क्‍यूं प्रेषित किया गया था यह समझ में नहीं आया किन्‍तु कापी टू अन्‍ना हजारे को देखकर होठ बार बार बुदबुदाते रहे 'कापी टू ......' 

उस पत्र को देखने के बाद से मैं सोंच रहा हूँ कि  1. क्‍या लोग अन्‍ना पर भरोसा करते हैं, 2. क्‍या लोग अन्‍ना को मजाक समझते हैं या 3. क्‍या लोग अन्‍ना के नाम पर सरकारी कर्मचारियों को डराते हैं या रौब गांठते हैं। या 4. क्‍या अन्‍ना और सूचना के अधिकार कानून के नाम पर ब्‍लैकमेलिंग चालू हो गई है। 

जो भी हो अब मैंनें भी सीख लिया है कोई सरकारी विभाग में शिकायती पत्र लिखना है तो नीचे लिखा जाए 'कापी टू अन्‍ना हजारे' भले भेजें कि मत भेजें।


संजीव तिवारी   

घर की ओर बढ़ती नदी

पिछले दिनों देश के अन्‍य हिस्‍सों में लगातार हो रही वर्षा के कारण नदी-तालाब लबालब भर गए थे और कई नदियॉं उफान पर थी। छत्‍तीसगढ़ में भी अन्‍य नदियों के साथ पहाड़ी और मैदानी इलाकों से शिवनाथ में भी लगातार जल भराव हो रहा था और महानदी के भरे होने के कारण शिवनाथ अपने किनारों को लीलती हुई फैल रही थी। लगातार हो रही वर्षा और नदी के जलस्‍तर में वृद्धि की खबरों के बीच बच्‍चों की चिंता को अपने अतीत के अनुभवों से हौसला दे रहा था। यहॉं दुर्ग में जहां मेरा घर है वह शिवनाथ के करीब है और पुलगांव नाले के डुबान क्षेत्र में है। सामान्‍यतया तेजी से विकसित होते दुर्ग शहर की इस कालोनी में बाढ़ या वर्षा से कोई प्रभाव नहीं पड़ता किन्‍तु ज्‍यादा वर्षा से पिछले पंद्रह सालों में यह क्षेत्र तीन बार डूब चुका है और कालोनी से रहवासियों को बाहर निकल कर अन्‍यत्र शरण लेना पड़ा है। इस समय नदी के उफान को देखते हुए संभावना यही बन रही थी कि कालोनी डूबेगी। 

मेरे जीवन में शिवनाथ का अहम स्‍थान रहा है, जिस गांव में मै जन्‍म लिया और अभी तक के जीवन का आधे से अधिक हिस्‍सा जहॉं बिताया वह इसी शिवनाथ के मैदानी किनारे में बसा हुआ है। मेरे गांव से लगभग डेढ़ किलोमीटर उपर शिवनाथ से खारून मिलती है जहां सोमनाथ नाम का देव-पर्यटन स्‍थल है। खारून के मिलने के बाद शिवनाथ और चौड़ी और बलवती हो जाती है। किनारे में बसे छोटे से कच्‍चे घरों वाले गांव में बचपन से लेकर जवानी तक कई भीषण बाढ़ों का सामना हमने किया है जिनमें 1994 में आई बाढ़ के संबंध में मैंनें एक पोस्‍ट भी लिखा था। आज भी मेरे पास मेरे गांव के बाढ़ से संबंधित भास्‍कर में प्रकाशित चित्रमय रिपोर्ट सुरक्षित है जो मेरी यादों को ताजा करती रहती है। 

बाढ़ों से निरंतर जूझने के कारण बाढ़ का भय मन में नहीं था किन्‍तु तब जान-माल-अन्‍न-धन के नुकसान पर कोई दृष्टि विकसित नहीं हो पाई थी। पारिवारिक दायित्‍वों के साथ संभावित बाढ़ नें मेंरे मन में चिंता जरूर पैदा कर दी थी कि कैसे करेंगें, घर के सारे सामान का डूबना निश्चित था। समय कुछ ऐसा था कि मुझे कम्‍पनी ला बोर्ड, मुम्‍बई में एक केस के सिलसिले में जाना था और इन्‍हीं तारीखों में शिवनाथ घर में घुसने को उतावली थी। आगे की कहानी चित्रों की जुबानी -

07.09.2011 सुबह
07.09.2011 सुबह
07.09.2011 दोपहर
07.09.2011 दोपहर
07.09.2011 शाम

08.09.2011 सुबह
रात भर ठहराव के बाद सुबह से धीरे-धीरे नदी क्षेत्र के भूजल स्‍तर को बढ़ाती हुई अपने किनारों की ओर सिमटने लगी, और हमारी गली बाढ़ से सुरक्षति बच गई।

1411 बाघो के संरक्षण व संवर्धन के लिये क्या कर सकते है हम ?

CG Blog

इन दिनो टीवी से गम्भीर आवाज मे बाघो के संरक्षण व संवर्धन के लिये प्रतिदिन अंतरालो के बाद सन्देश प्रसारित हो रहा है. जिसमे बाघो के संरक्षण व संवर्धन के लिये ब्लाग लिखने के लिये भी प्रेरित किया जाता है. हम प्रत्यक्षत:  बाघो के संरक्षण व संवर्धन के किसी कार्यक्रम से जुडे नही है इस कारण इस पर कुछ लिख नही पा रहे है. जो चीज हमारे बस मे है वह  यह है कि हम इस सन्देश को आगे बढाये. इसी हेतु से हमने ब्लाग मे लगाने के लिये एक टिकट इमेज बनाया है.  नीचे दिये गये कोड को कापी कर अपने ब्लाग के एचटीएमएल गैजेट मे पेस्ट कर के अपने ब्‍लाग मे लगा सकते है और भारतीय बाघो के संरक्षण व संवर्धन मे भावनात्मक रूप से अपना सहयोग बना सकते है.

दुकान और पकवान के बीच सामन्‍जस्‍य तो आपको ही बनाना है

ललित शर्मा जी नें अपने ब्‍लाग एक लोहार की के ताजे पोस्‍ट में टिप्‍पणियों की समस्‍या के संबंध में पूछा है कि पाठकों की माडरेट की गई टिप्‍पणियां पब्लिश करने के बाद भी उनके पोस्‍टों में प्रकाशित नहीं होती। टिप्‍पणियां कुछ इस तरह से गायब होती हैं जैसे कहीं कोई बरमूडा ट्रैंगल हो या ब्‍लैक होल हो। उनकी चिंता लाजमी है इस समस्‍या पर तकनीकि के जानकार लोगों नें अपना सुझाव दिया है जिन पर ललित जी को अमल करना चाहिए।

उनके पोस्‍ट पर पी.सी.गोदियाल जी नें टिप्‍पणी की है

एक बात और, कुछ लोगो की साईट पर हम लोग चाह कर भी टिपण्णी नहीं कर पाते जैसे उद्दहरण के लिए दर्पण साह दर्पण जी का ब्लॉग, लाख कोशिश करो लेकिन ब्लॉग ठीक से खुलता ही नहीं कारण ब्लॉग पर अत्यधिक भार जैसे विज्ञापन, फोटो इत्यादि अतः उन लोगो से भी यही अनुरोध रहेगा कि वे अपने ब्लॉग को लोगो की पहुँच के लिए सुगम बनाए !


इस पर ब्‍लागजगत में चर्चा आवश्‍यक है, उन्‍होंनें कुछ ऐसी समस्‍याओं के संबंध में लिखा है जिससे हिन्‍दी ब्‍लागों के पाठक रोज दो-चार होते हैं। इसमें से एक मैं भी हूं, मैं अपने लैपटाप में सोनी के 550 मोबाईल से एयरटेल नेट कनेक्‍ट होता हूं। मोबाईल से नेट कनेक्‍ट होने के कारण मैं ऐसे ब्‍लागों एवं वेब साईटों में ही जा पाता हूं जो कम बाईट्स वाले हों, यहां तक कि हिन्‍दी फीड एग्रीगेटरों का अवलोकन भी हम नहीं कर पाते।

ज्‍यादातर ब्‍लागर अपने ब्‍लाग के हेडर में एवं साईडबार में भारीभरकम चित्र, स्‍लाईडशो, घडी आदि लगाये रखते हैं (कमोबेश हम भी यही करते हैं)जिससे उनका ब्‍लाग स्‍लो नेट कनेक्‍शन से खुलता ही नहीं है और हमारे जैसे उपयोक्‍ताओं को ऐसे ब्‍लागों का दर्शन भी नहीं हो पाता। इसी कारण हम ब्‍लागों का पठन मेल के द्वारा या गूगल फीड रीडर के द्वारा ही करते हैं। इससे एक समस्‍या यह रहती है कि हमारी टिप्‍पणियां उस ब्‍लाग की शोभा नहीं बढा पाती और अहम यह कि ब्‍लागर यह जान नहीं पाता कि हमने उसके ब्‍लाग के धांसू पोस्‍ट को पढा है। वैसे हमारे जैसे स्‍लो नेट कनेक्‍शन वाले पाठक अब विरल हो गए हैं सभी के पास हाईस्‍पीड ब्राड बैंड कनेक्‍शन है यदि हम नहीं पढ पाये भी तो ब्‍लागर को क्‍या अंतर पडता है यदि आप समझते हैं कि हमारे जैसे स्‍लो नेट कनेक्‍शन वाले भी आपके ब्‍लाग को पढ पायें तो निरर्थक विजेटों को अपने ब्‍लाग से हटा देवें। इससे उन लोगों को भी फायदा होगा जो सीमित बाईट्स के ब्राड बैंड प्‍लान लेते हैं, आपके ब्‍लाग पर आने में उनको कम बाईट्स खर्चना पडेगा और वे आपके पोस्‍ट को पढ पायेंगें।

हमारे इस विचार से हमारे अधिकतर ब्‍लागर संगी सहमत नहीं हैं उनका कहना है कि ऐसा करने से ब्‍लागिंग का मजा जाता रहता है, ब्‍लाग बिल्‍कुल ऐसा दिखना चाहिए जैसा वेब साईट हो, सजे धजे दुकान की तरह। तो दुकान और पकवान के बीच सामन्‍जस्‍य तो आपको ही बनाना है, आप जैसा सोंचें, आखिर हम सब ब्‍लागर हैं।


आप सभी को देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह (छत्‍तीसगढ में जेठउनी) त्‍यौहार की हार्दिक शुभकामनांए।

संजीव तिवारी

ब्‍लाग ब्‍लागिंग और पोस्‍ट खिचडी

पिछले कुछ दिनों से हिन्‍दी ब्‍लाग में सक्रिय नहीं रह पाने का मलाल अन्‍य सुधी ब्‍लागरों की तरह मुझे भी है। पिछले कुछ दिनों की असक्रियता के समय में ना जाने कितना पानी गंगा में और शिवनाथ में बह गया, ब्‍लागवाणी विवाद से लेकर इलाहाबाद चिट्ठाकार सम्‍मेलन तक ना जाने कितने पोस्‍ट ब्‍लागवाणी और चिट्ठाजगत से होकर गुजर गए और हम बिना नहाए बिना पढे रह गए। इस बीच गूगल रीडर से पढे गए इलाहाबाद ब्‍लागर्स सम्‍मेलन के भारी टिप्‍पणीपाउ पोस्‍टों को देखकर ब्‍लागर मन पुन: मचलने लगा कि हमें भी पोस्‍ट परोसना चाहिए। छत्‍तीसगढ में ठंडी की हल्‍की पुरवाई चलने लगी है और सुबह और शाम का माहौल खुशनुमा हो चला है, ब्‍लागजगत की खिचडी भी इसी समय उबलती है और ब्‍लाग हांडियों में अलग अलग स्‍वाद के पोस्‍ट नजर आते हैं। ठंड की सुबह में हम अपने घर के खाली पडे एक हिस्‍से में ईटों से चूल्‍हा बना कर नहाने के लिए पानी गरम करते हैं अब आग की तपिश का आनंद भी लेना है और ब्‍लाग उर्जा को आत्‍मसाध करना है तो ऐसे दृश्‍य तो निर्मित होंगे ही -




बहरहाल इलाहाबाद सम्‍मेलन में हमें भी नहीं बुलाया गया था सो सभी पोस्‍टों को पढकर और फोटूओं को निहार-निहार कर खुश हो रहे हैं। इस सम्‍मेलन में हमें बुलावा नहीं मिलना हमारे लिए चिंता का विषय तो नहीं है किन्‍तु चिंतन का विषय अवश्‍य है। हम अपने कार्य की वजह से प्राय: कहीं बाहर नहीं निकल पाते सो ऐसे निमंत्रण पातियों के आने नहीं आने का कोई औचित्‍य ही नहीं रह पाता किन्‍तु यदि हमें बुलावा नहीं आया है तो इसका सीधा मतलब है कि हमें ऐसे सम्‍मेलनों और कार्यक्रमों में बुलाया जाए इसके लिये अपने स्‍वयं की समीक्षा कर ली जाए। किन्‍तु इसके लिए पोस्‍ट लिखने की आवश्‍यकता नहीं है पर यह एक बहाना है मित्रों से पोस्‍ट के माध्‍यम से दुवा-सलाम करने का।

हैप्‍पी ब्‍लागिंग मित्रों ...........

संजीव  तिवारी

नाचा : विश्व-धरोहर की डगर पर !

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद राज्य निर्माण के लिए चले मैदानी संघर्ष का वास्तविक इतिहास नहीं लिखा गया। भाषा, संस्कृति, लोकमंच, राजनीति और साहित्य से जुड़े छत्तीसगढ़ के सपूतों ने भिन्न-भिन्न कालखंडों में राज्य निर्माण के लिए चले अभियानों में अपना योगदान दिया है। अस्मिता और अंचल की पीड़ा पर प्रभावी रचनाओं ने भी पृथक राज्य के स्वप्न को जमीनी आधार देने की दिशा में ठोस कार्य किया।

यह छत्तीसगढ़ के लिए गर्व योग्य उपलब्धि है कि "नाचा" को मंचीय विश्व-धरोहर के रूप में रेखांकित किया जा रहा है। मानव संग्रहालय, भोपाल ने यह प्रशंसनीय पहल की है। पिछले साल पद्मश्री सम्मान नाचा के प्रसिद्ध कलाकार गोविंदराम निर्मलकर को मिला। उनका नाम भी छत्तीसगढ़ से नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश से गया था। नाचा छत्तीसगढ़ की मंचीय विधा है। विश्व-धरोहर सूची में कुछ वर्षों से यूनेस्को द्वारा मंचीय विधाओं को स्थान दिया जाता है। यह सम्मान अब तक भारत की तीन मंचीय विधाओं को प्राप्त हो चुका है। जिनमें रामलीला, वैदिक गायन एवं कुड़ियट्टम हैं। इस वर्ष देश भर के मंचीय विधा विशेषज्ञों एवं चिंतकों की सम्मति के आधार पर ५० विधाओं में से २० विधाओं को सूचीबद्ध कर अनुशंसा हेतु भेजा गया है। "नाचा" उसमें से एक है। अगर नाचा विधा को मंचीय विश्व-धरोहर के रूप में स्थान मिल गया तो यह छत्तीसगढ़ के लिए और ग्राम्य जीवन से जुड़े इस बेहद प्रभावी विधा के लिए गर्व की बात होगी। नाचा को गाँवों के कलाकारों ने जीवित रखा। एक महत्वपूर्ण योगदान भिलाई इस्पात संयंत्र के लोक-कला महोत्सव का भी है।

यह दुखद संयोग है कि नाचा के सर्वाधिक चर्चित कलाकार नायिकदास मानिकपुरी अभी हाल ही में ९० वर्ष की उम्र में परलोकगामी हुए। उनके जोड़ीदार झुमुकदास दो वर्ष पूर्व विदा हो गए थे। नाचा के नामचीन कलाकार भुलवाराम, ठाकुरराम, गोविंदराम, दुलारसिंह साव मदराजी के साथ ही बेमेतरा के पास पिंडकर गाँव की महरिन बाई का नाम उल्लेखनीय है। महरिन बाई अकेली ऐसी संयोजिका थी जिनके नाम से नाचा दल चला। नाचा के तमाम नामी-गिरामी कलाकार अब नहीं रहे। नई पीढ़ी इस विधा से जुड़कर यशस्वी परंपरा को आगे ले जा रही है। गीत, संगीत, अभिनय, नृत्य, गायन सब कुछ एक ही विधा में अगर देखना हो तो वह विधा नाचा ही हो सकती है।

इसी बीच छत्तीसगढ़ लोक-कला महोत्सव के पूर्व संयोजक, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.विमल पाठक की निराशा और खिन्नता का समाचार भी आया। ७२ वर्षीय डॉ. पाठक पाँव की हड्डी के इलाज के सिलसिले में अस्पताल में भर्ती थे। उपेक्षा, दुख एवं अकेलेपन के कारण उन्होंने अपने लिए दया-मृत्यु की घोषणा कर दी। लेकिन, छत्तीसगढ़ शासन के मंत्री श्री ननकीराम कंवर और संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने उनकी व्यथा को तुरंत कम किया। श्री ननकीराम कंवर ने २५ हजार रुपए देने का निर्देश दुर्ग के कलेक्टर को दिया। श्री बृजमोहन अग्रवाल ने संस्कृति विभाग के आयुक्त श्री राजीव चंद्र श्रीवास्तव को डॉ. पाठक से मिलने भेजा। डॉ. पाठक ने बताया कि अब तक उन्हें श्री अजीत जोगी ने एक लाख तथा डॉ. रमन सिंह ने ढाई लाख रुपया दिया है। इस तरह शासन से इलाज के लिए वे साढ़े तीन लाख रुपए पा चुके हैं।

प्रायः वैचारिक असहमति के आधार पर सहयोग में कटौती की परंपरा रही है, लेकिन डॉ. रमन सिंह ने अपने से असहमत जनों का मान भी भरपूर बढ़ाया है। पिछले दिनों वामपंथी विचारधारा से जुड़े प्रमोद वर्मा की स्मृति में आयोजित समारोह में वे लेखकों के स्वागत के लिए भी गए। जबकि, उनकी सरकार की विचारधारा में और वामपंथी विचारधारा दोनों उत्तर-दक्षिण है। लेकिन, यही सहिष्णुता छत्तीसगढ़ की विशेषता है। आशा है, छत्तीसगढ़ी मंचीय विधाओं का राजा नाचा दमकते हुए नई आभा के साथ विश्व मंच पर प्रकाशनमान होगा।

डॉ.परदेशी राम वर्मा


उपर बायां चित्र - श्रृंगाररत स्‍त्री (परी) रूप धरते कोदूराम एवं अन्‍य पुरूष कलाकार.
नीचे दाहिना चित्र - मटेवा नाच पार्टी के कलाकार झुमुकदास, गम्‍मतिहा के मदन निशाद, गोकुल एवं चतरू राम 
चित्र साभार - डॉ.शैलजा चंद्राकर 

छत्‍तीसगढ की दीपावली मडई, गोवर्धन पूजा और रावत नाच

छत्‍तीसगढ के ग्रामीण मजदूर कमाने खाने लद्दाख के बरफबारी से बंद हुए सडकों को साफ करने से लेकर आसाम के चाय बागानों तक एवं दिल्‍ली के कालोनी निर्माण से लेकर मुम्‍बई के माल निर्माण तक संपूर्ण देश में कार्य करने जाते हैं, किन्‍तु दीपावली में वे अपने-अपने गांव लौट आते हैं। वहां की हिन्‍दी एवं सस्‍ती आधुनिक संचार यंत्रों के साथ छत्‍तीसगढी मिश्रित बटलर हिन्‍दी बोलते इन लोगों को इसी दिन का इंतजार रहता हैं। उत्‍सवधर्मी इन भोले भाले लोगों के साथ दीपावली मनाने हम भी हर साल गांव चले आते हैं। वहां गांव की सांस्‍कृतिक परंपराओं का आनंद लेते हैं।


कई गांवों में रावत नाच के साथ 'मडई' भी चलता है। मडई लम्‍बे खडे बांस में साडी-धोती और बंदनवार को बांधकर बनाया जाता है। इस मडई को गांव के मडईहा परिवार के लोग मन्‍नत मांगने के लिए बनाते हैं एवं गांव में दीपावली से लेकर 'मडई' मनाए जाने तक बनाए रखते हैं। जब भी रावत नाच पार्टी के साथ इन मडईहा परिवार को रावत नाच उत्‍सव या मातर आदि का निमत्रण दिया जाता है ये मडई रावत नाच के पीछे पीछे अपनी लम्‍बी पताका लिए मौजूद रहता है।
छत्‍तीसगढ में दीपावली की रात गउरा उत्‍सव के रूप में मनाया जाता है, यहां गांवों में दीपावली का असली मजा दीपावली के दूसरे दिन ही आता है, गावों में इस दिन को गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है। कृषि प्रधान इस प्रदेश में पशुधन के महत्‍व को रेखांकित करने वाला यह त्‍यौहार गायों के श्रृंगार और पूजन का त्‍यौहार है। इस त्‍यौहार का संपूर्ण प्रतिनिधित्‍व यादव - ग्‍वालों (रावत) के समुदाय के हाथों रहता है, गांव में 'बाजा लगाने' (रावत नाच के साथ वाद्य यंत्र बजाने के लिए वाद्यकों के समूह एवं नृत्‍य करने के लिए स्‍त्री के रूपधारी पुरूषों को निश्चित पारिश्रमिक पर तय करना। इस पारिश्रमिक की व्‍यवस्‍था सामूहिक सहयोग से की जाती है) से लेकर मातर मनाने तक चलने वाला यह लगभग पंद्रह दिनो का उत्‍सव होता है। बाजे के साथ श्रृंगार किये हुए ग्‍वालों का समूह घर घर जाकर नृत्‍य करता है जिसे 'जोहारना' कहा जाता है 'ठाकुर जोहारे आयेन .... जैसे दोहों के साथ, रावत नाच प्रस्‍तुत किया जाता है।

भगवान कृष्‍ण के द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर बृजवासियों और गोधन की रक्षा करने की स्‍मृति को जीवंत बनाने के लिए गोवर्धन पूजा किया जाता है। ग्‍वालों का विश्‍वास है कि वे यदुवंशी कृष्‍ण के वंशज है इसलिए वे परंपरागत रूप से इस त्‍यौहार को मनाते आ रहे हैं जो संपूर्ण छत्‍तीसगढ में मनाया जाता है। इस दिन सुबह गायों की पूजा की जाती है और उन्‍हें 'खिचडी' खिलाई जाती है। संध्‍या गांव के सहडा देव (जो सांढ देवता के रूप में पूज्‍य होता है)के पास गोवर्धन पर्वत के प्रतीक के रूप में गाय के गोबर से गोवर्धन भगवान की प्रतिकृति बनाई जाती है, एवं ग्‍वालों की पत्नियां उसकी पूजा करती हैं।

इधर ग्‍वाले बाजे गाजे के साथ अपने पारंपरिक रावत नाच नाचते हुए गांव के प्रत्‍येक घर जा-जा कर घरवालों को 'गोवर्धन पूजा' हेतू बुलाते हैं। जब गोधुली बेला में सारा गांव सहडा देव के पास इकत्रित हो जाता है ग्‍वाले गोवर्धन देव में नारियल अर्पित कर पूजा करते हैं और छोटे बछडे के पावों से उस गोवर्धन की प्रतिकृति को रौंदवाते हैं। इसके बाद गांव के सभी गायों को उस गोवर्धन की प्रतिकृति से गुजारा जाता है। गोवर्धन की प्रतिकृति को इस तरह से गायों के खुरों से रौंदवाने को देखकर हर बार मेरे मन में बचपन में सुने किस्‍से के अनुसार इंद्र का वह कोप जीवंत हो उठता है जब बृजवासियों एवं गायों पर भीषण वर्षा करके इंद्र नें अपना तूफानी कहर बरपाया था और नंदकिशोर नें कंदुक सम विशाल गोवर्धन पर्वत को तर्जनी उंगली में उठाकर इनकी रक्षा की थी। जहां तक मुझे लगता है कि इन ग्‍वालों के द्वारा 'गोवर्धन खुदवाना' इंद्र का मान मर्दन करना ही है, कभी इन पहलुओं पर विस्‍तृत लिखूंगा।


गोवर्धन खुंदवाने के बाद गोवर्धन की प्रतिकृति के बिखरे गोबर को बडे बुर्जुगों के माथे पर लगा कर आर्शिवाद ली जाती है। अजब प्रेम है यहां का, बेमोल गोबर को माथे में लगाकर सम्‍मान करने की इस परंपरा का सम्‍मान इस प्रदेश के सभी रहवासियों को करना ही चाहिए।



हे ग्राम्‍य देवी, हमारे स्‍नेह की बाट जोहते इन ग्रामीण बच्‍चों की चेहरों में मुस्‍कान और इनकी आंखों में दीपों की आभा देखने हम हर दीपावली आते ही रहेंगें।

संजीव तिवारी

'प्रथम व्यक्ति' गंभीर कथानक का कसावट भरा मंचन

गिरते नैतिक मूल्यों की गंभीरता से पड़ताल करने वाला नाट्य
अरूण काठोटे

रायपुर। संस्कृति विभाग की पाक्षिक पहल सफर मुक्ताकाश के 12वें पड़ाव पर दर्शकों के सम्मुख बेहद गंभीर कथानक पर केंद्रीत नाटक प्रथम व्यक्ति खेला गया। 'प्रथम व्‍यक्ति' समाज में गिरते नैतिक मूल्यों और मानव मन के भीतर छुपी भावनाओं की गंभीरता से पड़ताल करता है। नाटक कुल चार पात्रों के बीच एक परिवार के चरित्रों के अंतर्द्वंद्व को प्रगट करता है। समाज की संवेदनहीनता पर कटाक्ष करते हुए यह समयानुरूप बदलते फैसलों पर भी सवाल खड़े करता है। प्रासंगिक घटनाओं के संदर्भ में मानवतावादी फैसलों का पक्षधर है प्रथम व्यक्ति। मूलत: बांग्लादेश के लेखक शहजाद फिरदौस के बांग्ला भाषा में लिखे कथानक को बालकृष्ण अय्यर व श्यामल मुखर्जी ने हिंदी में अनुदित किया है।

छत्तीसगढ़ आट्र्स एंड थिएट्रिकल सोसायटी, दुर्ग की इस प्रस्तुति को बालकृष्ण अय्यर ने निर्देशित किया है। नाटक में प्रथम व्यक्ति (पिता) का किरदार शकील खान ने निभाया है। परिवार के अन्य सदस्यों में राजश्री देवघरे (मां), प्रकाश ताम्रकार (बेटा), दीपिका नंदी (बेटी) तथा योगेश पांडेय (इंस्पेक्टर) ने भूमिका की है। अपने समूचे कथानक में नाटक दर्शकों को बांधने में सफल रहा। पल-पल घटते, बदलते हालातों की मिमांसा, चरित्रों के आपसी व्यवहार तथा व्यक्ति के सामाजिक दायित्वों जैसे मुद्दों पर यह गंभीर कटाक्ष करता है। प्रथम व्यक्ति की केंद्रीय भूमिका में शकील खान ने प्रारंभ से अंत तक प्रभाव डाला। वैसे समूचा नाटक एक्टर बेस्ड होने के कारण भी अन्य कलाकारों ने पूरी शिद्दत के साथ अपनी भूमिकाएं कीं। गंभीर कथानक को मुक्ताकाशी मंच पर सफलता से खेलकर बालकृष्ण अय्यर ने अपनी निर्देशकीय पकड़ साबित की। टीम वर्क, कंपोजिशन, नेपथ्य में लगा शहरी इमारतों का कट-आउट आदि उनकी परिपक्व समझ को प्रदर्शित करते हैं। नाटक देखकर निकलते वक्त लोगों में विचार पैदा करता है, जो इसकी कामयाबी का सबसे बड़ा सबूत है। नेपथ्य में संगीत पक्ष सुधीर रवानी ने तथा मंच परिकल्पना का जिम्मा तुषार वाघेला ने संभाला था। व्यवस्थापन पंकज सतपथी का था।







( साभार: दैनिक आज की जनधारा, रायपुर. फोटो साभार : बालकृष्ण अय्यर)

अंग्रेज सरकार ने दिनकर के पीछे लगवा दिए थे जासूस

आईये 23 सितंबर 1908 में बिहार के तत्कालीन मुंगेर जिले के बेगूसराय जिले में जन्मे दिनकर जी को आज याद कर लें-



जला अस्थियां बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल।
कलम, आज उनकी जय बोल

जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल

पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल

अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
रामधारी सिंह 'दिनकर' जी की कविता 'कविता कोश' से साभार

छत्‍तीसगढ से परजीवियों के लिए सुसमाचार

समाचार है कि योजना आयोग व छत्तीसगढ शासन के अधिकारियों के बीच पिछले दिनों हुई बैठक में दोनों पक्षों के बीच कुल 18310.32 करोड रुपए के योजना पर सहमति बन गई है। इसमें केंद्र द्वारा संचालित योजना, ऑफ बजट स्कीम व केंद्र-क्षेत्रीय व्यय भी शामिल हैं। इस बात की संभावना मजबूत है कि राज्य के पिछले प्रदर्शन को देखते हुए आवंटन और ज्यादा हो। आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहुलवालिया व मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के बीच अगले कुछ दिनों में होनेवाली बैठक में इसको अंतिम स्वीकृति दी जाएगी व इसकी घोषणा की जाएगी। छत्तीसगढ योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष डा डीएन तिवारी ने बताया कि पिछली बार राज्य की कुल योजना 14000 करोड रुपए की थी, जबकि इस बार योजना 18310 करोड रुपए की है।

राज्य ने अपनी योजना में दो हजार एनीकेट बनाने की योजना के लिए आर्थिक सहयोग की मांग की है। आज की बैठक में जल प्रबंधन पर सर्वाधिक जोर देते हुए कहा गया कि राज्य के पानी के समुद्र में बहाव को रोकने व उसके कृषि व औद्योगिक उपयोग के लिए दो हजार एनीकट व ढाई हजार लघु सिंचाई योजनाओं पर जोर देना होगा। सूत्रों के अनुसार अकेले इस योजना का व्यय लगभग 15 हजार करोड क़ा है। फिलहाल राज्य ने लगभग 600 एनीकेट के निर्माण के लिए कार्ययोजना तैयार कर ली है। उचित जल प्रबंधन कर राज्य के 70 प्रतिशत जल की हो रही बर्बादी को रोककर उससे कृषि के साथ औद्योगिक विकास भी किया जा सकेगा। इसमें सीमेंट कारखाने व पनबिजली संयंत्र चलाने के अलावा मछलियों का भी उत्पादन हो सकेगा। राज्य ने आयोग से राष्ट्रीय बायोटिक स्ट्रेस मैनेजमेंट इंस्‍टीट्यूट को भी केंद्र से जल्द स्वीकृति दिलाने की मांग की है। ज्ञात हो कि राज्य ने इसके लिए रायपुर में भूमि व अन्य संसाधन उपलब्ध करा दिए हैं। पूसा से भी अधिक उन्नत यह संस्थान शोध के साथ बीजों का उत्पादन भी करेगा। राज्य ने राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान की स्थापना की मांग रखी है। इसके साथ ही वनवासियों को भूमि पट्टा दिलाने के लिए इस मद में 100 करोड रुपए के आवंटन की बात कही है।

बस्तर में मलेरिया के कहर को देखते हुए राष्ट्रीय मलेरिया कार्यक्रम में राज्य को शामिल करने, एम्स की जल्द स्थापना व हर्बल प्रोसेसिंग योजना में मदद की भी मांग रखी गई है। राज्य ने योजना आयोग से प्रदेश में एक आईआईटी की स्थापना व बस्तर या सरगुजा में से किसी एक आदिवासी विश्वविद्यालय को केंद्रीय वनवासी विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने की मांग की है। झारखंड को पछाड क़र देश के सबसे अधिक खनन करने वाला राज्य बनने के आधार पर प्रदेश में राष्ट्रीय खनन संस्थान खोलने की भी मांग रखी गई है। राज्य ने नई राजधानी की स्थापना में केंद्र से 600 करोड रुपए की सहायता की भी मांग की है.

ऐसे समाचार और आंकडे छत्‍तीसगढ में मंत्रियों-संत्रियों के चम्‍मचों और कागजों पर कार्य कर रहे व मजे कर रहे एनजीओ के लिए बडे काम की है, वे तो पहले से ही नोट कर लिए होंगें या ये भी हो सकता है कि वे अपने उत्‍थान के लिए जुगत भिडा कर इन आंकडो में अपने स्‍वार्थ के मुद्दों को शामिल करा लिए हों. छत्‍तीसगढ जाए भांड में इन्‍हें क्‍या इन्‍हें तो अपना झोला भरना है अपने घर में खाली करना है और फिर से खाली झोला लटकाये, लुभावने प्रोजेक्‍टों व सेमीनारों का मायाजाल बिखेरते, लाईन में लग जाना है, जनता के पैसों से एश करने के लिए.

संजीव तिवारी

जुडूम जुडूम सलवा जुडूम : बिना टिप्‍पणी

जुडूम मामले पर प्रशासन सख्त
हरिभूमि न्यूज
नक्सलियों के खिलाफ शुरू हुऐ शांति अभियान मे चल रहे अनियमितता का दौर अब समाप्ति की ओर नजर आ रहा है। जिला प्रशासन के सख्त रवैय्यें के बाद सलवा जुडूम अभियान मे गड़बड़ झाला करने वालों पर कार्रवाई की गाज गिरनी शुरू हो गई है। वही दोरनापाल मामले मे जिला प्रशासन की निष्पक्ष कार्रवाई के बाद कोन्टा के पटवारी पर मामला दर्ज होने से ऐसे तत्वों मे हड़कंप व्याप्त हो गई है। प्राप्त जानकारी अनुसार वर्ष 2006 मे नक्सलियों के विरूद्ध शुरू हुऐ सलवा जुडूम आंदोलन ने कई तरह के उतार चढ़ाव देखे। इस दौरान राहत सामाग्री से लेकर राहत कार्यो तक मे विपक्षियों ने सरकार को घेरने मे कोई कसर नही छोड़ी। जिसके चलते यह आंदोलन मजबूत होने की बजाय इसके अस्तित्व को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो गऐ। वही वर्तमान जिला कलेक्टर श्रीमति रीना कंगाले के द्वारा पीडीएस व जुडूम मे हो रही अनियमितताओं पर कड़ी नजर रखते हुऐ कार्रवाई पर कार्रवाई शुरू कर दी। सलवा जुडूम अभियान को कमाई का एक मात्र जरिया समझने वालों के लिऐ यह दौर अब कठिनाईयों भरा साबित होने लगा है। 

कलेक्टर श्रीमति रीना कंगाले द्वारा दोरनापाल राहत शिविर मे घटिया राशन सप्लाई मामले मे निष्पक्ष कार्रवाई के बाद अब एक बार फिर कोन्टा मे थाना प्रभारी कमलेश ठाकुर ने स्वयं तहसील कार्यालय के सामने के गोदाम की जाँच की लेकिन इस दौरान कई सामाग्री मे हेराफेरी देखने को आई। वही इस गंभीर मामले पर जुडूम कैंप वितरण प्रभारी दीपक कुमार भारद्वाज के विरूद्ध थाना कोन्टा के अपराध क्रं.26/09 धारा 420,409 भादवि के तहत मामला पंजीबद्ध कर विवेचना मे लिया गया। गौरतलब है कि इसके पूर्व मे भी उक्त कर्मचारी के विरूद्ध घटिया राशन वितरण करने का आरोप लग चुका था। लेकिन जानबुझकर उक्त कर्मचारी को बचाया गया। लेकिन इस बार कोन्टा पुलिस ने जिला प्रशासन की कार्रवाईयों से मार्गदर्शन लेते हुऐ उक्त कदम उठाया। गौरतलब है कि जुडूम के इस 3 वर्ष के दरम्यान अनियमितता कोई नई बात नही थी। लेकिन इस तरह की कार्रवाई पहली बार सामने आई है। वही शिविरार्थियों मे चर्चा है कि जिस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई वर्तमान मे चल रही है वही अगर जुडूम शुरू होने के वक्त होती तो आज स्थिति कुछ और होती।  
हरिभूमि से साभार  - http://119.82.71.95/haribhumi/Details.aspx?id=2419&boxid=29982410

हर मर्ज की दवा है यहॉं ..छुट्टी भूल जावो ....

पिछले दो माह में दो बार एक दो दिन के लिये बीमार पड़ा तो सोंचता रहा 'सीजनल बुखार' है सो एन्‍टीबायोटिक व दर्द-बुखार की दवा लिये और दौड पड़ी हमारी बाईक सड़कों पर. यद्धपि काम में मन पिछले पन्‍द्रह दिन से नहीं लग रहा था पर ये कोई तुक नहीं कि काम में मन नहीं लग रहा है तो कार्यालय नहीं जाए या काम न करें. किन्‍तु पिछले रविवार से पुन: रोज शाम और रात को शरीर का तापमान सामान्‍य से अधिक रहने लगा. तो खूंन जांच करवा लेना हमने उचित समझा, जांच करवाया तो पता चला 'टायफाईड' है. डाक्‍टर नें टायफाईड की दस दिन की दवाई दी और कहा घर में आराम करो. हमने अपनी बत्‍तीसी निपोरी और हो हो हो करते हुए कहा अवश्‍य डॉक्‍टर साहब.
आज सुबह सुबह श्रीमतिजी को ज्ञानदत्‍त पाण्‍डेय जी के गंगा टैगित सभी पोस्‍टों एवं चित्रों का दर्शन कराकर गंगा स्‍नान का पुण्‍यलाभ प्राप्‍त किया और इस पोस्‍ट को 'बीमार' होते हुए भी पब्लिश करने का अवसर भी किन्‍तु जैसे ही पब्लिश बटन दबाने वाला था बिजली नें करंट, शिकायत केन्‍द्र व अधिकारियों के मोबाईलों सहित आंखें मूंद ली. समाचार पत्र देखा तो ज्ञात हुआ शाम तीन बजे सो के उठेगी. यह पोस्‍ट सायबर कैफे के सहारे स्‍वीकार हो.
आज रोज की तरह आफिस जाने के लिए तैयार होते देख कर श्रीमति जी को फीलगुड नहीं लगा. उसने कहा कि आपकी तबियत खराब है और आप फिर आफिस जा रहे हो, डॉक्‍टर नें कहा है ना, घर में आराम करो. और फिर आफिस वालों को पढ़वा देना कि टायफाईड है .... यह है पैथेलाजिस्‍ट का रिपोर्ट. वह रिपोर्ट को हवा में लहराने लगी थी. हमने अपनी बत्‍तीसी फिर निपोरी हो हो हो.

हमने कहा श्रीमतिजी यदि हम आफिस नहीं गये तो सुबह दस बजे से मोबाईल खनकने लगेंगें पूछ परख बारह बजते तक हाई ब्‍लड प्रेशर की तरह बढ़ जायेगी. और मुझे एकमात्र दवा दिव्‍य मुक्‍तावटी की तरह रेपर से निकलकर कार्यालय के मुह तक ले आयेगी. और यदि मोबाईल बंद कर दिया तो घर के स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी के कोटे से प्राप्‍त बीएसएनएल फोन अवश्‍य घनघनाएगा. और वहां से पांच तुलसी का पत्‍ता अदरक का एक चम्‍मच रस, एक चम्‍मच मधुरश से लेने को या ऐसा ही कोई फटाफट नुख्‍शा बोला जाएगा. और यकीन मानो इस विश्‍वास से बोला जाएगा कि यह दो चम्‍मच मृत्‍युशैया में पड़े व्‍यक्ति को भी पीटीउषा बना दे. और यदि न भी बनाए तो तुम्‍हें बनना है क्‍योंकि मैनें यह नुक्‍सा बताया है.

श्रीमतिजी उवाच - पंद्रह दिन पहले जब आपको एक डेढ़ दिन बिस्‍तर पकड़ने की नौबत आई थी तब से आपनें अदरक रस को पकड़ा है जिससे आपको पित्‍त की परेशानी बढ़ गई और दिव्‍य चिकित्‍सालय के बैद्य से परामर्श लेकर आपने उसे दूर किया. पिछले महीनों के इसी घालमेल एवं अपने मन से दवाई करने के चक्‍कर का परिणाम है यह टाईफाईड. अब ना किसी को अपनी बीमारी बताओं ना किसी से नुख्‍शा पावो.

ब्‍लागर उवाच - 'बीमार होते हुए भी हंसी खुशी ड्यूटी जावो. नहीं तो फिर कोई नया नुख्‍शा खावो.'

'तब तो अवश्‍य ही आफिस जावो.' अब ही ही ही करने की बारी श्रीमति जी की थी.

संजीव तिवारी

पितृ तर्पण और शिवनाथ

पितृ पक्ष के साथ ही हमें शिवनाथ की याद आ गई और हम पक्ष के पहले दिन सुबह हमारे घर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर शिवनाथ नदी पितृ तर्पण के लिए गए. बहुत दिनों बाद उस नदी को पाकर मन अति आनंदित हुआ. मेरा गांव इस नदी के किनारे खारून नदी के संगम के तुरंत बाद है और मैनें बचपन से आजतक इसे अपने दिल के बहुत ही करीब पाया है. लगभग सात किलोमीटर पैदल सिमगा पढ़ने जाने पर कई कई बार इसने मेरा रास्‍ता रोका है और कई कई बार मैनें इसकी उत्‍श्रंखलता को धता बतलाते स्‍कूल के रास्‍ते में आने वाले इसके सहायक नालों को पार करते हुए हुए इसके सिमगा पुल के उपर चढ़ जाने के बावजूद अपने बचकाने हाथ से साथी बच्‍चों के दल के साथ हाथ से हाथ थाम कर अपने बस्‍ता को बचाते हुए पुल पार किया है. पुल के इस पार आकर जोर से अट्टहास भी लगाया है कि 'तू..तू मुझे छकायेगी....' बहुत अच्‍छा लगाता है जब मैं अपने पुत्र को यह वाकया सुनाता हूं. ............... और भी बहुत सी यादें हैं इसके साथ.

आज दूसरे दिन जब मैं सुबह तर्पण के लिए नदी जाने के लिए निकलने लगा, मेरा पुत्र भी शिवनाथ जाने की जिद करने लगा. मैं उसे साथ लेकर दुर्ग के पुष्‍पवाटिका घाट आया. विगत वर्षों की भांति इस वर्ष कम वर्षा के कारण शिवनाथ में पानी बहुत कम है पर नदी में नहाने का आनंद कुछ अलग ही है. आज रवीवार होने के कारण भीड़ कुछ अधिक थी. मैंनें पुरखों को पानी दिया. इधर पुत्र नें कम पानी में बहुत मस्‍ती किया. किनारे में छिछले नदी के तेज घार का मजा लिया. कुल मिलाकर वह बहुत - बहुत 'हैप्‍पी' हुआ. उसके लिये यह नदी मात्र एक खेल है मेरे लिये इस नदी की क्‍या अहमियत है यह मैं उसे अभी तो नहीं समझा सकता हॉं, हो सकता है उम्र बढ़ने पर उसे कुछ समझ में आये.
संजीव तिवारी

स्‍वयं के द्वारा बस्‍तर बालाओं के मजेदार दैहिक भोग वृतांत हंस में : रामशरण जोशी

कुछ वर्ष पहले पत्रकार रामशरण जोशी नें हंस में दो किश्‍तों में लेख लिखा था. उसमें उन्‍होंनें लिखा था कि आपतकाल में दो माह के लिए वे बस्‍तर आये थे. वहां रहकर अपने आई.पी.एस.मित्र की कृपा से बस्‍तर की बालाओं के साथ उन्‍होंनें खुलकर दैहिक शोषण का खेल ख्‍ोला. जुगुप्‍ता उपजाने वाला अमर्यादित लंबा वृतांत दो किश्‍तों में छपा. उन्‍होंनें लिखा कि छत्‍तीसगढ में पदस्‍थ दीगर प्रांत के अफसर अपनी बीबी लेकर छत्‍तीसगढ में नहीं आते क्‍योंकि यहॉं औरतें आसानी से उपलब्‍ध रहती हैं.
उन्‍होंनें यह भी लिखा कि जो अफसर बीबी लेकर छत्‍तीसगढ आता है उसे बेवकूफ समझा जाता है. हंस में छपे उस आलेख पर मैनें तुरंत प्रतिवाद किया. हंस संपादक राजेन्‍द्र यादव नें अगले अंक में लेखमाला के प्रकाशन के लिए माफी मांग ली. और किस्‍सा खत्‍म हो गया. मगर इस प्रकरण से यह तो जाहिर ही हो गया कि छत्‍तीसगढ़ और विशेषकर छत्‍तीसगढ़ी को कितनी हिकारत से तथाकथित सभ्‍य दुनिंया देखती है. 

डॉ.परदेशीराम वर्मा जी के एक लेख का अंश. (छत्‍तीसगढ़ आसपास से साभार)

रामशरण जोशी से संबंधित एक और पोस्‍ट पढ़ें - अपने करीबी देह संबंधों की कथा क्‍या सार्वजनिक की जानी चाहिए ?

नीली फ़िल्म दिखाकर/छुपाकर लाल हुए पत्रकार ......

रायपुर में पिछले दिनों एक अफ़सर और उसकी पत्नि की ब्ल्यू फ़िल्म के सार्वजनिक हो जाने के बाद से चर्चा का बाजार गर्म है, अमीर धरती गरीब लोग में अनिल पुसदकर जी ने इसी मुद्दे पर मीडिया की लक्ष्‍मण रेखा में विमर्श प्रस्‍तुत किया था. न्‍यूज 36 वाले अहफाज रशीद जी नें भी सच का सामना - साधना में इस पर जानकारी प्रस्‍तुत की थी. आज अहफाज रशीद जी नें अपने ब्‍लाग में इस पर तीखी प्रतिक्रिया प्रस्‍तुत की है, हम उनसे अनुमति प्राप्‍त कर यह पोस्‍ट यहां प्रस्‍तुत कर रहे हैं - 

नीली फ़िल्म दिखाकर/छुपाकर लाल हुए पत्रकार ......
   

अहफ़ाज रशीद

छत्तीसगढ़ का पत्रकारिता जगत आज अपने आप में शर्मिंदा है। एक अफसर और उसकी पत्नी की नीली फ़िल्म दिखाने, छुपाने या अफसर से बाईट के बहाने मिलने वाले कई पत्रकारों के चेहरे की रौनक उडी हुई है। न्यूज़ २४ ने तो इसी मामले में अपने संवाददाता अर्धेन्दु मुख़र्जी को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। वैसे मैं अर्धेन्दु मुख़र्जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ वो वसूली जैसे मामलों से हमेशा दूर रहा है। मैं शुरू से उन वसूलीबाज़ पत्रकारों को जानता हूँ जो पत्रकारिता करने नहीं सिर्फ़ वसूली करने के लिए पत्रकारिता में आए हैं। वही पत्रकार हैं जो इस मामले में ज़्यादा रूचि ले रहे हैं और अपनी वसूली स्पर्धा में आड़े आने वाले पत्रकारों को निपटाने में लगे हैं । वोही लोग हैं जो इस मामले में संलिप्त पत्रकारों की शिकायतें चैनल के दफ्तरों तक पहुँचा रहे हैं। वो बिल्कुल नहीं चाहते की उनकी वसूली प्रभावित हो या कोई और उनसे आगे निकले। 


अहफ़ाज रशीद
22 साल से प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में समान रूप से सक्रिय. इसके अलावा छत्तीसगढ़ी फिल्म एवं अलबम निर्माण. जूझारू साथी. दोस्तों के दोस्त. दुश्मनों के दुश्मन. करना क्या है ? जिंदगी दो दिन का है. कर जाऊँ कुछ औरों से हटकर- बोलना सब जानते हैं लेकिन कहाँ, कब और कैसे बोलना है यह नहीं जानते. और यही हालत लेखनी की भी है . यही बहुत है अपने बारे में . कभी बतियाना चाहें तो यह लीजिए मेरा मोबाइल - 09329126363 or 09424223553.
विदेश दौरा करके आने के बाद कई दिनों तक अपने ब्रीफकेस पर टैग लटका कर घूमने वाले पत्रकार इस बार बिना टैग के एअरपोर्ट से वापस आए हैं। एक अफसर ने अपनी बीवी के साथ नीली फ़िल्म बनाकर ये तो साबित कर दिया है कि रमन सिंह के राज में सब सम्भव है। जिसकी मर्जी में जो आ रहा है कर रहे हैं। अफसरों की इतनी औकात हो गयी है कि इस मामले में साधना न्यूज़ का प्रसारण तक प्रभावित किया गया। इस मामले भी सीख यही मिलती है कि शासन से जुड़े किसी भी आदमी से उलझना ठीक नहीं है। पत्रकारों को भी सोचना चाहिए कि जब सारे अधिकारी सीधे मुख्यमंत्री के संपर्क में हैं तो उनसे उलझना कहाँ कि समझदारी है। इस मामले में भी तो ऐसा ही संदेह है। 

एक अफसर अपनी ख़ुद की निजी बीवी के साथ नीली फ़िल्म बनाता है । उसे होश नहीं है कि ये फ़िल्म उसके कैमरे से बाहर कैसे चली गयी है। अगर कोई ठेकेदार इस मामले में शामिल था तो भी कैमरे से टेप बाहर कैसे आ गया। अब अफसर कहते हैं कि ऐसी कोई सी डी उन्होंने नहीं बनाई । उनकी पत्नी का कहना है कि अगर बीवी के साथ पति ही है तो क्या दिक्कत है। अपरोक्ष रूप से दोनों ने ये बात स्वीकार की कि गलती हुई है लेकिन चेहरे पर हवाइयां लगातार उड़ रही थी। दोनों बार बार ये बात कहते रहे कि वे किसी षडयंत्र का शिकार हुए हैं। 

ये बात अब तक मेरी समझ से बाहर है कि अफसर के हाथ में कैमरा था , पत्नी सामने थी तो फिर कैमरे का टेप बाहर आकर सी डी के रूप में तब्दील कैसे हो गया। सारे मामले अभी पुलिस कि जांच में हैं । कल ये मामला न्यायालय में चला जाएगा। गिरोहबाज पत्रकारों को इस मामले से सीख लेनी चाहिए। खासकर ऐसे पत्रकार जो एक मामले का पता चलने पर दो तीन पत्रकारों को साथ लेकर जाते हैं। वसूली हो गयी तो उसे आपस में बाँट लेते हैं। प्रेस क्लब ने तो साफ़ साफ़ कह दिया है कि वो इस मामले में आरोपी पत्रकारों के साथ नहीं हैं। ऐसे में सहारा समय पर चलने वाली एक ख़बर चौंकाने वाली रही। अचानक सहारा चौथे स्तम्भ कि दुहाई देने लग गया। साफ़ सुथरी छवि और न जाने क्या क्या कहने लग गया। प्रेस क्लब से छुपकर मार्केटिंग वाले बंदों का पेट काटकर सरकारी विज्ञापन में ख़ुद कमीशन खाने वाले लोगों का बदला हुआ रूप देखकर पत्रकार जगत हतप्रभ है। आपस की गला काट स्पर्धा में ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ बताना अच्छी बात है लेकिन दुःख के समय साथ खड़े होने की बजाय किसी को अकेले छोड़ देना कहाँ की समझदारी है? मुझे कभी कभी साधना के ब्यूरो चीफ पर तरस आता है। 

संजय जब ईटीवी में था । तब उसके पास एक पूरानी दोपहिया थी । आज उसके पास दो - दो मकान है। कार की भी ख़बर है मुझे। खैर,,,, अचानक चौथे स्तम्भ की दुहाई देने वाले सहारा के लोग क्या भूल गए की मार्केटिंग के बन्दों का पेट काटकर ख़ुद आर ओ लेने कौन पत्रकार अफसरों के चक्कर काटते हैं । मैं पूरी शिद्दत से जानता और मानता हूँ की पैसे से बहुत कुछ तो हो सकता है लेकिन सब कुछ नहीं .........

अहफ़ाज रशीद जी का ब्‍लाग है - NEWS 36

गणेश उत्‍सव और आस्‍था का बेढंगापन

तिथि में घट-बढ एवं पंडितों पुरोहितों के मतभिन्‍नता के कारण इस वर्ष कहीं तृतीया (तीज) के दिन ही गणेश चतुर्थी मनाया गया तो कहीं पंचमी के दिन गणपति बप्‍पा भव्‍य पंडालों में विराजमान हुए. अब जगह जगह गणेश उत्‍सव की धूम है, ढोल-नगाड़े बज रहे हैं और भक्‍तजन गणेश जी की सेवा में तन-मन-धन से जुटे हैं, अस्‍थाई गणेश पंडालों में भव्‍यता जड़ने के लिए हर उस रसूखदारों का दरवाजा टटोला जा रहा है जो इन आयोजनों के लिए पानी जैसा पैसा बहाते हैं. किसी एक जगह सामूहिक आयोजन करने के बजाए प्रत्‍येक गली मुहल्‍लों में बाकायदा प्रतिस्‍पर्धा के उद्देश्‍य से यह उत्‍सव किए-कराए जा रहे हैं और प्रत्‍येक चार कदम पर छोटे-बडे गणेश पंडाल नजर आ रहे हैं. आस्‍था से जुडे मुद्दे के कारण इसे कोई फिजूलखर्ची कहकर अपना मुह खोलना नहीं चाहता किन्‍तु पैसे की इस कदर बरबादी से आमजन आहत होता है. बालगंगाधर तिलक ने जब गणपति उत्‍सव आरंभ किया था तब इस उत्‍सव में बाहृय आडंबर न्‍यून व हृदय की आंतरिक श्रद्धा का संचार सर्वत्र था. अब आंतरिक श्रद्धा न्‍यून किन्‍तु बाह्य श्रद्धा का आडंबर इतना विशाल है कि लोग अपने आप को गणपति का बड़ा से बड़ा भक्‍त जताने में लगे हैं.

कल बारिश से बचने के लिए हम सड़क किनारे लगे एक ऐसे ही पंडाल में खड़े हो गए.  उसी समय गणेश भगवान की मूर्ति आ रही थी, गणपति बप्‍पा मोरया की हर्षध्‍वनि के साथ ढ़ोल के कानफाड़ू थाप के साथ बच्‍चे और युवा बारिश में भींगते हुए भी नाच रहे थे. पीछे ठेले में गणेश जी की मूर्ति आ रही थी जिसे पानी से बचाने के लिए पोलीथीन से ढंक दिया गया था. टोली पंडाल पहुची और गणेश जी के उपर से पोलीथीन हटाया गया तो मैं एक क्षण तो समझ ही नहीं पाया कि यह गजानन हैं ..... ? मेरे मन में गणेश जी का जो स्‍वरूप बचपन से अंकित है उससे वह स्‍वरूप मेल ही नहीं खा रहा था. बेढंगे गोल-मोल करके कुछ भी रूप-आकर दे दिया गया था जिसमें गणेश की अस्तित्‍व की गवाही सूढ और दांत दे रहे थे. हमने नाच-नाच कर थक गये एक किशोर से पूछा कि यह क्‍या गणेश है यार ?, उसने बड़े ही स्‍वाभाविक ढंग से उत्‍तर दिया कि एलियन गणेश है.

ये हाल है हमारी आस्‍था का. पहले विभिनन देवी-देवताओं के रूप में गणपति उत्‍सव के समय गणपति जी की मूर्ती विराजमान होने लगी फिर इसमें कलात्‍मकता का प्रवेश हुआ, कलाकारों नें विभिन्‍न वस्‍तुओं से गणपति जी की स्‍वाभाविक मूर्तियां बनाई और हमने-आपने सभी ने उसे स्‍वीकारा. इसी कलात्‍मकता और रचनाशीलता का ढोंग रचते हुए कुछ लोगों नें विभिन्‍न पशु पक्षियों के रूप में गणपति की मूर्ति स्‍थापित करने लगे और इस भावना को छूट देने का परिणाम यहां तक पहुच गया कि अब सुदर्शन गणाधिपति गदहा-घोड़ा, एलियन, अमीबा आदि के रूप में नजर आने लगे. यदि अब भी हम इनकी सराहना करते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब घृणित जीव-जंतुओं में भी ईश्‍वर का अंश होता है, ऐसी दलील के साथ उनके रूप-आकार के गणपति हमारे सामने होंगें.

पिछले दो दिनों से एयरटेल जीपीआरएस महोदय नौ दिन चले अढ़ाई कोस की चाल चल कर हमारे हरेभरे समसामयिक पोस्‍टों को चर रहा है सो पोस्‍ट पब्लिश हो जाये तो गणपति बप्‍पा मोरया नहीं तो जय राम जी.   

संजीव तिवारी  

छत्‍तीसगढी तिहार - पोला और किसानों की पीड़ा

आज छत्‍तीसगढ़ में पोला पर्व मनाया जा रहा है. पोला पर्व प्रतिवर्ष भाद्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को मनाया जाता है. पूरे देश में भयंकर सूखे की स्थिति को देखते हुए सब तरफ त्‍यौहारों की चमक अब फीकी रहने वाली है. फिर भी हर हाल में अपने आप को खुश रखने के गुणों के कारण भारतीय किसान अपनी-अपनी क्षेत्रीय संस्‍कृति के अनुसार अपने दुख को बिसराने का प्रयत्‍न कर रहे हैं.

छत्‍तीसगढ़ में अभी कुछ दिनों से हो रही छुटपुट वर्षा से किसानों को कुछ राहत मिली है किन्‍तु सौ प्रतिशत उत्‍पादन का स्‍वप्‍न अब अधूरा ही रहने वाला है. फिर भी अंचल में पर्वों का उत्‍साह बरकरार है. छत्‍तीसगढ़ में एक कहावत है 'दहरा के भरोसा बाढ़ी खाना' यानी भविष्‍य में अच्‍छी वर्षा और भरपूर पैदावार की संभावना में उधार लेना,  वो भी लिये रकम या अन्‍न का ढ़ेढ गुना वापस करने के वचन के साथ. किसान गांव के महाजन से यह उधार-बाढ़ी लेकर भी त्‍यौहारों का मजा लूटते हैं. पोरा के बाद तीजा आता है और गांव की बेटियां जो अन्‍यत्र व्‍याही होती है उन्‍हें मायके लाने का सिलसिला पोला के बाद आरंभ हो जाता है. बहन को या बेटी को मायके लिवा लाने के लिये कर्ज लिये जाते हैं, ठेठरी - खुरमी बनाने के लिए कर्ज लिये जाते हैं और '‍तीजा के बिहान भाय सरी-सरी लुगरा' बहन-बेटियों को साड़ी भेंट की जाती है वो भी उसके मनपसंद, तो इसके लिये भी कर्ज. फिर भी मगन किसान. मैं भी जड़ों से किसान हूं इस कारण उनकी पीड़ा मुझे सालती है किन्‍तु इसके बावजूद उनके एक दूसरे के प्रति प्रेम व त्‍यौहारों के बहाने खुशी जाहिर करना वर्तमान यंत्रवत जीवन में बिसरते  और बिखरते आपसी संबंधों को बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है.

आप सभी को पोला पर्व की हार्दिक शुभकामनांए ..............

छत्‍तीसगढ़ी तिहार : तीजा - पोरा पढ़ें संजीत त्रिपाठी जी के ब्‍लाग 'आवारा बंजारा' में .

संजीव तिवारी   

टिप्पणी (?) करना बंद कर दें अन्यथा अमिताभ बच्‍चन ब्लॉग लिखना बंद कर देंगे .....

कुछ अखबारों नें सूचना दी है कि अमिताभ बच्‍चन अपना ब्‍लाग बंद करने वाले हैं. यह समाचार अमिताभ बच्‍चन के करोड़ों प्रसंशकों को दुख पहुंचाने वाली है, क्‍योंकि यही वह अड्डा था जिसमें वे बिना प्रेस के नमक मिर्च के साथ प्रस्‍तुत होते थे. हालांकि इसके साथ ही बहुत से ब्‍लाग साथियों की यह भी शिकायत रही कि वे टिप्‍पणियों को तवज्‍जो नहीं देते.

अमिताभ के ब्‍लाग के संबंध में नित नई जानकारी देने वाले जोश नें ये पढ़ें वो पढ़ें करते हुए जो विवरण प्रस्‍तुत किया है उसके  अनुसार अपने ब्लॉग पर निजी एवं भद्दी किस्म की टिप्पणियों से आहत अभिनेता अमिताभ बच्चन ने ऐसी टिप्पणियां लिखने वालों को चेतावनी दी है कि या तो वे ऐसा करना बंद कर दें अन्यथा वह ब्लॉग लिखना बंद कर देंगे। बिग बी ने अपने ब्लाग ‘बिगबीडॉटबिगअड्डा’ पर लिखा है कि अपने ब्लॉग पर ऐसी टिप्पणियों को देखकर उन्हें ऐसा लगा मानो कलेजे में किसी ने शूल चुभा दी हो। उन्होंने लिखा है “ऐसे में मेरे पास यही विकल्प है। या तो आप ऐसा करना बंद कर दें या मैं ही बंद कर देता हूं।” बिग बी की इस चेतावनी से उनके प्रशंसक चिंतित हैं और वे अपने प्रिय अभिनेता से ब्लॉग बंद नहीं करने की गुजारिश कर रहे हैं।

अमिताभ ने लिखा है कि जब अपने ब्लॉग पर की जाने वाली टिप्पणियों को जबाव देने के लिये अपना ब्लॉग खोला और टिप्पणियों को पढ़ना शुरू किया तो यह देख उनका दिल भारी हो गया कि कई लोग इस माध्यम का इस्तेमाल एक दूसरे के खिलाफ अत्यंत निजी एवं आपत्तिजनक बातें करने के लिये कर रहे हैं। 

जब मैं आखिरी टिप्पणियों तक गया तो यह देखकर दंग रह गया कि उनमें गाली गलौच का भी प्रयोग किया गया था इन्हें देखकर ऐसा लगा कि मेरी छाती में किसी ने छुरा घोंप दिया हो।

अमिताभ बच्‍चन क्‍या सोंचते हैं वो तो वही जाने, फिलहाल बिग अड्डा अमिताभ के नाम पर किसी ना किसी बहाने चर्चा में रहने का बहाना ढूंढ़ ही लेता है. 

हरिभूमि के हिमांशु द्विवेदी को ‘वसुंधरा सम्मान’

लोक जागृति के ध्वजवाहक का बहुमान


स्व.देवीप्रसाद चौबे की स्मृति में स्थापित प्रतिष्ठित वसुंधरा सम्मान आज लोक जागरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए हरिभूमि समाचार पत्र समूह के प्रबंध संपादक हिमांशु द्विवेदी को प्रदान किया गया। भिलाई निवास में आयोजित भव्य समारोह में केबिनेट मंत्री हेमचंद यादव और संसदीय सचिव विजय बघेल के हाथों श्री द्विवेदी को 21 हजार की सम्मान निधि व शाल-श्रीफल से नवाजा गया।

प्रारंभ में कीर्तिशेष स्व.देवी प्रसाद चौबे के तैलचित्र पर अतिथियों ने माल्यार्पण व दीप प्रज्वलित कर श्रद्धांजलि दी। तत्पश्चात अतिथियों का सम्मान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे, प्रदीप चौबे व राजेन्द्र चौबे ने किया।

उपस्थित बुद्धिजीवियों को सम्बोधित करते हुए हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि पहले यह लाईफ टाईम एचीवमेंट सम्मान की तरह देखा जाता था, जिसने पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों अपना योगदान दिया उसे यह सम्मान दिया जाता था। अब पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय लोगों को भी दिया जाने लगा है। श्री द्विवेदी ने कहा ‘आज मैं आकाश में टिमटिमाने की कोशिश कर रहा हूं, तारे की हैसियत नहीं है, फिर भी सूर्य बनने की तमन्ना है मेरी। मैं वह कलम नहीं जो बिक जाती है बाजारों में, देश जले मैं कुछ ना बोलूं ऐसा मैं गद्दार नहीं’। उन्होंने कहा कि मीडिया को जो भूमिका नक्सली समस्या पर निभानी चाहिए वह सार्थक भूमिका नहीं निभाई जा रही है। देश के गद्दारों के प्रति सहानुभूति का नजरिया रखना भी देश के साथ गद्दारी है। प्रदेश नक्सलियों की चपेट में है और दिल्ली का मीडिया इसे तीन मिनट देने को तैयार नहीं है। अगर लोग राखी सावंत का स्वयंवर देखने आकर्षित नहीं हो तो अपने आप इस तरह के कार्यक्रम बंद हो जाएंगे। श्री द्विवेदी ने कहा ‘हिम्मत से सच कह दें तो बुरा मानते हैं लोग, और डर-डर के बात करने की हमें आदत नहीं।’

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृषि मंत्री हेमचंद यादव ने कहा कि जग में जब बच्चा जन्म लेता है तो वह रोता रहता है और सारे लोग खुशी मनाते हैं, काम ऐसे करो कि जब तुम दुनिया से जाओ तो दुनिया रोए। श्री यादव ने कहा कि आज सारी जवाबदारी मीडिया और जनप्रतिनिधियों पर मढ़ दी जाती है। उन्होंने कहा कि तटस्थता का शब्द बेमानी है। तटस्थता का दूसरा अर्थ कायरता है। वह लड़ाई में कूदता नहीं है और मन में दूसरे के हारने की कामना करते हैं। उन्होंने पत्रकारिता पर कहा कि आज कल जो बातें आनी चाहिए वह नहीं आतीं। श्री द्विवेदी की बात को दोहराते हुए कहा कि मंच से उन्होने जो बातें कही है वह उस पर कायम रहेंगे यह उम्मीद करता हूं, क्योंकि रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद व समाज के अलगाववाद को दूर करने के लिए सभी को अपने कर्तव्य का पालन करना होगा।

कार्यक्रम के अध्यक्ष संसदीय सचिव विजय बघेल ने हिमांशु द्विवेदी को यह प्रतिष्ठित सम्मान मिलने पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि जो बातें सच हैं उन्हें सामने लाया जाना चाहिए, चाहे वह किसी के भी खिलाफ क्यों न हो। श्री बघेल ने कहा कि हमारे विभाग में एक जनसंपर्क विभाग होना चाहिए, इस संबंध में मैंने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और गृह मंत्री से चर्चा की है। सम्मान के संबंध में उन्होंने कहा कि यह सम्मान निरंतर जारी रहे।

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि अब चुप्पी तोड़ने की जरूरत है। मीडिया को अपना पक्ष नक्सलवाद पर रखना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि राजनांदगांव की घटना को कितने अखबारों ने विस्तार से छापा..? किसी जनजागरण अभियान की तरह नक्सल के खिलाफ भी अभियान छेड़ने की जरूरत है, ताकि पूरे देश के लोग जानें कि हमारा प्रदेश किस त्रासदी से गुजर रहा है। इस मौके पर शिक्षाविद् आईपी मिश्रा ने भी अपने सारगर्भित विचार रखे। इस अवसर पर लोक जागरण पत्रिका वसुंधरा के 16वें अंक का लोकार्पण केबिनेट मंत्री हेमचंद यादव ने किया। विनोद मिश्र इस पत्रिका के संपादक हैं। मंच संचालन अनीता सावंत और आभार प्रदर्शन शायर मुमताज ने किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से जिला कांग्रेस कमेटी ग्रामीण के अध्यक्ष घनाराम साहू, तुलसी साहू, डॉ रक्षा सिंह, राजेन्द्र चौबे, केएस प्रसाद, रावलमल जैन मणि, डॉ. महेशचंद्र शर्मा, रविशंकर सिंह, नीता कांबोज, मुत्थुस्वामी सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार-पत्रकार व गणमान्य लोग उपस्थित थे।

हरिभूमि न्यूज
हरिभूमि से साभार,  ई पेपर यहां देखा जा सकता है.

कविता पर तनाव : विविक्षा ब्‍लाग से

छत्तीसगढ़ में शायद पहली बार किसी कवि की कविता पर तनाव की स्थिति पैदा हो गई। पेशे से शिक्षक कवि बद्रीप्रसाद पुरोहित की कविता सरायपाली के एक अखबार में छपी थी। बसना, सरायपाली और पिथौरा क्षेत्र तक सीमित अखबार छत्तीसगढ़ शब्द में आखिर ऐसा क्या था कि मुस्लिम समाज के कुछ युवकों ने उन्हें स्कूल से बाहर बुलाया और मारपीट की। आगे की जानकारी और कवि की उस कविता को पढें रायपुर से प्रकाशित समाचार पत्र छत्तीसगढ़ में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत श्री डॉ. निर्मल साहू के ब्‍लाग विविक्षा में.

श्री साहू जी के इस ब्‍लाग में अभी तक यही आखरी पोस्‍ट है इसके बाद इस ब्‍लाग में नियमित पोस्‍ट नहीं है. उनकी व्‍यस्‍तता हम समझ सकते हैं किन्‍तु विविक्षा के कुल 17 पोस्‍टों को पढते हुए ऐसा लगता है कि विविक्षा को नियमित रहना चाहिये. आप अपनी राय विविक्षा में ही देवें तो बेहतर होगा.

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लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...