शरद कोकाश जी मेरे नगर में ही रहते हैं, गाहे-बगाहे मेल-मुलाकात होते रहती है एवं मोबाईल में बातें भी होती है, वे मुख्य रूप से कवितायें लिखते हैं, कहानी,व्यंग्य,लेख और समीक्षाएँ भी लिखते हैं। उनकी एक कविता संग्रह "गुनगुनी धूप में बैठकर" और "पहल" में प्रकाशित लम्बी कविता "पुरातत्ववेत्ता " के अलावा सभी महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायें व लेख प्रकाशित हुई हैं। इसके साथ ही वे शरद कोकाश, पास पड़ोस व ना जादू ना टोना नाम से ब्लॉग भी लिखते हैं। उनके पेशे के संबंध में जो जानकारी मुझे है उसके अनुसार से वे भारतीय स्टैट बैंक में सेवारत थे जहॉं से उन्होंनें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है।
मेल-मुलाकातों में हमने कभी पूछा भी नहीं कि वे अब क्या करते हैं किन्तु आज उन्हें कर्मनिष्ठ देखकर हम चकरा गए, हुआ यूं कि हम भिलाई में आयोजित जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अधिवेशन में कुछ ज्ञान बटोरने के लिए गए तो वहां कार्यक्रम स्थल के बाजू में शरद भाई हमें चाय ठेले में चाय बनाते मिले .... शरद भाई बैंक की नौकरी छोड़कर, चाय ठेला चला रहे हैं ... हमारी आंखें तो आश्चर्य से फटी की फटी रह गई किन्तु शरद भाई नें मुस्कुराते हुए चाय बनाकर पिलाया और हमने एक फोटो के लिए फलैश चमकाया, आप भी देखें -

चाय पीने के बाद हम कार्यक्रम स्थल में आकर बैठ गए पर मन अशांत सा शरद भईया के संबंध में ही सोंच रहा था वैसे ही मंच में शरद कोकाश भईया का नाम पुकारा गया और शरद कोकाश जी बड़े निर्विकार भाव से अपना सारगर्भित उद्बोधन देने लगे -
शरद भाई के इन दोनों रूप को हमने आज देखा, सोंच रहे थे, कि कार्यक्रम के बाद शरद भाई से पूछें, पर घर के लिए सब्जी लेना था इसलिये हम कार्यक्रम बीच में छोड़कर सब्जी बाजार की ओर लपक लिये।
जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अधिवेशन की तस्वीरों व रिपोर्टिंग के साथ फिर मिलेंगें, तब तक .... आप लोगों को कैसा लगा शरद भईया का यह रूप .. बताईये, बताईये, लजाईये मत टिपियाईये.
