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जे.के.लक्ष्मी सीमेंट : स्थानीय बनाम बाहरी

दुर्ग जिले के अहिवारा ब्लॉक का एक छोटा सा गांव मलपुरी इन दिनों खबरों के शीर्ष पर है, गांव वालों पर आरोप है कि उन्होंनें निर्माणाधीन जे.के.लक्ष्मी सीमेंट प्लांट को आग लगा दिया. शांत स्वभाव वाले इन किसान और मजदूरों पर आरोप है कि उन्होंनें उग्र होकर भीषण आगजनी की जिसमें कम्पनी की 600 करोड़ की सम्पत्ति का नुकसान हुआ. कम्पनी के आने के पहले मलपुरी में किसान खेती करते थे और भूमिहीन उन खेतों में मजदूरी करते थे. कहते हैं कि मलपुरी के धरती के गर्भ में आसपास के अन्य गांवों से ज्यादा पानी है इसी कारण अधिकांश किसानों के पास बोर थे और फसल बारो मास लहलहाती थी. इस खुशहाल गांव में जब हरियाणा के लोगों के नाम से जमीनें धीरे धीरे खरीदी जाने लगी तभी से राहू की वक्र दृष्टि पड़ने लगी. जमीन दलाल सक्रिय हुए और किसानों को जमीन बेचने के लिए बहुविध लालच देने लगे. धीरे धीरे आधा से ज्यादा जमीन हरियाणवी ताउओं के नाम पर बहुत ही सस्ते दरों पर चढ़ गई. जब तक लोगों को पता लगा कि मलपुरी में सीमेंट प्लॉंट लगने वाला है तब तक जमीनें किसानों से छिन चुकी थी.

जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट के मालिकों को अहिवारा क्षेत्र के भूमि में दबे सीमेंट उत्पादन में सहयोगी पत्थरों की भनक बरसों पहले लग चुकी थी और उसके उत्खनन की अनुमति भी उन्होंनें ले ली थी, किन्तु उनकी औद्यौगिक साम्राज्य की जीजीविषा पर कुछ न्यायालयीन अड़चने पाला मार रही थी. न्यायालय से हरी झंडी मिलते ही जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट नें खानों के पत्थरों को उदरस्थ करने और पास बह रही शिवनाथ को लीलने की अपनी इच्छा शासन से की. इस समय तक राहुओं नें मलपुरी गांव सहित आस पास के गांवों की जमीनों को पूरी तरह से ग्रस लिया था. मलपुरी गांव में परिवहन सहित अन्य संसाधनों की सुगम सुविधाओं को देखते हुए प्लॉंट की स्थापना यहीं तय हुई. जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट ने आवश्यकता की अतिरिक्त भूमि के लिए राज्य शासन से गुहार लगाई और शासन ने त्वरित कार्यवाही करते हुए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया आरंभ कर दी. प्रक्रिया के चलते ही जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट नें गांव के निस्तारी भूमियों को कब्जा करना आरंभ कर दिया, धीरे धीरे उनके सभी पारंपरिक रास्ते बंद कर दिए गए. ठगे से ग्रामीणों नें तभी पहली बार विरोध में स्वर उठाया. जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट को सीधे विक्रय किए गए भूमि के भू स्वामियों नें नौकरी की मांग की और मांगों पर ध्यान नहीं दिए जाने के फलस्वरूप प्लांट के द्वार पर प्रभावितों की तंबू तन गई.

छत्तीसगढ़ के मजदूर किसान आन्दोलन का इतिहास जानने वाले लोग जानते हैं कि छत्तीसगढ़िया शांतिपूर्वक धरना देनें में विश्वास रखते हैं. वे लम्बे समयावधि तक धरने देते हैं, भूखे रहते हैं, स्वयं कष्ट सहते हैं और अपनी मांगों पर अडिग रहते हुए अपनी मांग मनवाते हैं. जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट प्रबंधन को छत्तीसगढ़ियों के इस स्वभाव का अंदाजा ही नहीं था वे अपने हरियाणा व राजस्थान के प्लांटों के अनुभवों को यहां आजमा रहे थे. निर्माण के लिए भारी संख्या में बाहरी लोगों को बुलाकर धड़ा धड़ निर्माण कराया जा रहा था, बलपूर्वक सरकारी और निस्तार की जमीनों को हथियाया जा रहा था और धरने में बैठे लोगों की वाजिब मांगों को मानने के बजाए उन्हें डराया धमकाया जा रहा था, लोगों की माने मो बाहर से बाउंसर बुलाकर बच्चो और महिलाओं तक को पिटवाया गया था ताकि गांव वालों पर कम्पनी की दहशत कायम हो.

उसके बाद के धटनाक्रम से पाठक वाकिफ हैं, अचानक क्या हुआ कि जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट को 600 करोड़ का नुकसान व इसके ठीकरे पर शांतिप्रिय छत्तीसगढ़ियों पर आरोपों और कष्टों का पहाड़ टूट पड़ा. रायपुर के एक युवा पत्रकार नें अपने ब्लॉग में लिखा 'कल जब जेके लक्ष्मी सीमेंट कंपनी के एक अधिकारी का ऑफिशियल वर्जन मेल पर आया तो मैं देखकर दंग रह गया। वे बोल रहे थे कि जैसे गांव का विकास जेके लक्ष्मी ने किया, कर रहा है और करेगा। मगर गांव वाले सबके सब नाकाबिल उनके प्लांट में आग लगाने वाले अपराधी हैं।' इसे पढ़कर लगा कि सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली शब्दांश ऐसे ही किसी वाकये को देखकर हमारे पुरखों नें शुरू किया होगा.

अपराध की बुनियाद पर इमारत खड़ी करने वाली कम्पनी जनता से कहती है कि तू अपराधी है, वाह जी! किस मुह से ये कह रहे हो. उचित मुआवजा व पुर्नवास के अनिवार्य दायित्व से बचने के लिए हरियाणवी ताउ से जमीन खरीदवाया वो भी कृषि के उद्देश्य के लिए फिर तान दी उद्योग. पर्यावरण अनुमति कहीं और के लिए लिया और मनमानी करते हुए फैक्ट्री कहीं और डाल ली, सरपंचों को धोखे में डालकर एनओसी लिया. गुण्डों से गांव वालों की पिटाई कराई, दहशत फैलाया. श्रमिक सुरक्षा के बेहतर इंतजाम नहीं किया इसलिए तीन मजदूर मिट्टी में दबकर मर गए. गांव वालों की जमीन को अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरा हुए बिना भी कब्जे में लिया. सम्मिलित चरागान की जमीन जिस पर सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट दिशा निर्देश है कि उसका निजी या उद्योग हेतु उपयोग नहीं किया जायेगा, उसे भी कब्जा कर लिया. व्‍यक्तिगत गलतियों को छिपाने के लिए जनता पर दोष मढ़ना कुछ सामर्थवानों की फितरत रही है. इसी क्रम में कम्‍पनी नें मीडिया में मेल भेजकर अपने आप को पाक साफ प्रचारित किया.

आगजनी, प्रशासन की कार्यवाही फिर कम्‍पनी का यह मेल छत्‍तीसगढ़ को बदनाम करने की कडिया ही हैं. शुरूआती मांगों, असंतोष व विवादों के संबंध में स्थानीय प्रशासन संवेदनशील नहीं रही. आग अंदर ही अंदर सुलगता रहा. संपूर्ण घटनाक्रम का बीज झूठ बोलकर जमीन खरीदने के समय से ही बो दी गई, फिर उसे परिवर्तित कराने व बाद में सरकारी डंडे से भूमि अधिग्रहण कराने की प्रक्रिया के द्वारा पानी खाद देकर इसे सींचा गया, मजबूत बनाया गया. स्थानीय भूमि अधिग्रहण अधिकारी नें अपने अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए, पुर्नवास एवं मुआवजा के मसले पर संवेदनाओं को ताक में रखकर कम्पनी के हित में अधिग्रहण को उचित ठहराया. यदि प्रकरण पर विचार करते समय कम्पनी के मुलाजिम मेहता को जिस प्रकार उचित आसन दिया जाता था उसी प्रकार एक मनुष्य होने के नाते अपने जमीन का हक खोने वाले मनुष्यों के अधिकारों को उचित स्थान दिया गया होता तो इस प्रकार के उग्र आन्दोलन की बात ही ना होती. नौकरी के लिए चल रहे घरने का औचित्‍य समाप्‍त हो जाता. भूमि अधिग्रहण के संबंध में निर्णय आने के पहले ही कम्पनी के द्वारा जमीनों पर धड़ाधड़ कब्जा किया गया, इससे ग्रामीणों की स्वतंत्रता लगभग समाप्त होती गई और प्रशासन चारागान व गांव के निस्तार की जमीनों पर कम्पनी के द्वारा किए जा रहे अतिक्रम व निर्माण को देख सुनकर भी मौन रही बल्कि एक कदम आगे बढ़ाते हुए उन्हीं जमीनों का अधिग्रहण कम्पनी के लिए करने में सहयोग करती रही.

हमने कम्पनी के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे अधिग्रहण के विरूद्व जब आपत्ति की थी तो कहा था कि प्रस्तावित अधिग्रहण से प्रदेश के भू स्वामियों के संवैधानिक मौलिक अधिकार अतिक्रमित होंगें एवं आस पास के ग्रामों में पुनर्स्‍थापना एवं पुनर्वास की गंभीर समस्या उपस्थित होगी। प्रस्तावित अधिग्रहण भूमिधारितों को सम्पत्ति से वंचित करने एवं वर्तमान व भविष्यगत क्षति कारित करने वाला है क्‍योंकि प्रभावित भू स्‍वामियों का मूल पेशा कृषि है एवं इनके भूमि से इनका अधिकार छीन लेने से ये कृषि कार्य नहीं कर पायेंगें एवं उन्‍हें अपूरणीय क्षति होगी। यह कि भूमि स्वामियों की मूल्यवान सम्पत्ति का अर्जन किया जा रहा है जिससे भूमि स्वामियों का वर्तमान एवं भविष्य अवलंबित है। इस अर्जन से कृषि कार्य में लगे मजदूर भी प्रभावित होंगें एवं उनके समक्ष रोजगार की बड़ी समस्या उपस्थित होगी.

हमने यह भी कहा था कि प्रस्तावित अधिग्रहण का प्रयोजन ‘औद्यौगिक प्रयोजन हेतु’ दर्शाया गया है. जिसके अनुसार यह परिलक्षित होता है कि भू अर्जन उक्‍त क्षेत्र में विभिन्‍न औद्यौगिक इकाइयों के स्‍थापना के उद्देश्‍य से किया जा रहा है किन्‍तु सामूहिक रूप से उद्योगों के व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध विकास को सुनिश्चित ना करते हुए एक निजी उद्योग कम्पनी के लिए यह अर्जन किया जा रहा है। किसी निजी उद्देश्‍य के भू अर्जन, लोक प्रयोजन की श्रेणी में कतई नहीं आता। यह अधिग्रहण निजी कम्पनी के लिए अधिग्रहण है इसके लिए भू अर्जन अधिनियम में विधिवत प्रावधान दिए गए है। कम्पनी हेतु अर्जन संबंधी धाराओं में अधिग्रहण किये जाने के वैकल्पिक प्रावधान होने के बावजूद सार्वजनिक प्रयोजन का मिथ्‍या अर्थान्‍वयन किया जाना अवैधानिक है। अधिग्रहण की यह प्रक्रिया एक उद्योग के लिए की जा रही है यहां अलग अलग औद्यौगिक इकाईयां या सामूहिक औद्यौगिक विकास का कार्य प्रस्तावित नहीं है. किसी एक ऐसे कम्पनी या उद्योग के लिए सरकार के द्वारा भूमि का अधिग्रहण किया जाना जन विरोधी है जिसका मूल उद्देश्य निजी लाभ अर्जित करना है ना कि सार्वजनिक लाभ. इसलिए यह कार्य या प्रयोजन सार्वजनिक प्रयोजन की श्रेणी में कतई नहीं आता. अर्जन की यह कार्यवाही जे.के.लक्ष्मी सीमेंट लिमिटेड के लिए भूमि की व्यवस्था हेतु, शासन के द्वारा अर्जित की जा रही है जबकि कम्पनी के पास इसके पूर्व ही काफी एवं समुचित मात्रा में किसानों की कृषि भूमि आपसी समझौते के तहत क्रय कर ली गई है। अब इसी कम्पनी के लिए अतिरिक्त एवं इतने भारी मात्रा में कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जाना ना ही न्याय संगत है एवं ना ही तर्कसंगत है। बढ़ते औद्यौगीकरण व प्रदूषण के कारण पूरे देश में एवं प्रदेश में धीरे धीरे कृषि भूमि का रकबा कम होते जा रहा है एवं देश में खाध्यान्य संकट की स्थिति पैदा हो रही है इस कारण इतने बड़े मात्रा में कृषि भूमि का अधिग्रहण प्रस्ताव निरस्त करने योग्य है। इस अर्जन कार्यवाही के द्वारा एक कम्पनी को लाभ पहुचाने के उद्देश्य से शासन ने शक्ति का छद्म प्रयोग किया है, यह प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि इस अधिग्रहण से किसी व्यक्ति विशेष या कम्पनी/संस्था विशेष को लाभ पहुच रहा है समुदाय या समाज को इससे कोई लाभ नहीं होगा। कि अधिग्रहित किए जाने वाले क्षेत्र के गावों में भू स्वामियों की भूमि को कम्पनी के द्वारा समझौते के तहत क्रय किए जाने की प्रक्रिया भी निरंतर जारी है कम्पनी के दलालों के द्वारा किसानों की जमीन को कृषि हेतु क्रय करने का झांसा देते हुए हड़पने का कार्य बदस्तूर जारी है ऐसे में जिन भू स्वामियों के द्वारा जागरूकता दिखलाते हुए भूमि कम्पनी को नहीं दी गई उनकी भूमि छीनने के उद्देश्य से सरकारी सहयोग एवं शक्ति का प्रयोग इस अधिग्रहण से किया गया था.

केन्‍द्रीय संसद में नया भूमि अधिग्रहण अधिनियम पारित होने की स्थिति में है ऐसी अवधि में शासन द्वारा पुराने भूमि अधिग्रहण अधिनियम के प्रावधानों के तहत् भूमि अधिग्रहण करना औचित्‍यहीन है। वैसे भी कानुनविदों एवं न्‍यायालयों नें विद्यमान भूमि अधिग्रहण कानून को असंगत एवं बदलाव की आवश्‍यकता वाला बतलाया है। यह सर्वविदित है कि माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायालय एवं केन्‍द्र शासन नें वर्तमान भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 को पूर्णरूपेण खारिज कर दिया है तथा केन्‍द्र शासन के द्वारा नया भूमि अधिग्रहण अधिनियम संसद में प्रस्‍तुत भी कर दिया गया है जो कि पारित होने के अंतिम स्‍तर पर है ऐसे में भू-स्‍वामी को अनावश्‍यक भू-अर्जन के द्वारा उसके नैसर्गिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यह कि ऐसे समय में जब देश में नया भू अधिग्रहण अधिनियम संसद में पारित होकर अधिनियमित होने वाला है जिसमें भू धारितों को अपने भूमि के बाजार मूल्य का छ: गुना मुआवजा देने का प्रावधान है, को अनदेखा कर यह अधिसूचना जारी की गई है ताकि अधिग्रहण चाहने वाली कम्पनी को भूमि के बाजार मूल्य का छ: गुना मुआवजा ना देना पड़े.

इन गंभीर आपत्तियों के बावजूद भी भूमि अधिग्रहण अधिकारी नें ना तो इन आपत्तियों के लिए अधिग्रहण चाहने वाली एजेंसी से इसका जवाब मांगा ना ही इसकी जांच करने की जहमत उठाई, आपत्तियों का निराकरण करने के बजाए सीधे आपत्तियों को खारिज किया कि दम है तो जावो उच्‍च न्‍यायालय और चुनौती दो हमारे फैसले को. अब हर कोई तो उच्‍च न्‍यायालय जाने से रहा और इस प्रकार कम्‍पनी की रोटी पक गई. सरकारी सहायता से अधिग्रहण के के माध्‍यम से भूमि प्राप्‍त करने वाले उद्योगों में आरंभिक विवाद चाहे कुछ भी हो मूल रूप से जमीन से जुड़ा होता है. जमीन से जुड़ा मसला जनता से जुड़ा मसला होता है चाहे वह भूमि छिनने वाले परिवार को नौकरी देने, उचित मुआवजा देने या अन्‍य संसाधनों के विकास की मांग हो सभी जमीन से जुड़े मुद्दे होते हैं. प्रशासन को इसे संवेदनशीलता से हल करना चाहिए क्‍योंकि यही उग्र रूप धरते हैं और आपके हाथ से नियंत्रण छूट जाता है, फिर आप बौखला जाते हैं और इससे स्‍थानीय जनता पिसती है.

जे.के.लक्ष्‍मी सीमेंट में आगजनी की घटना के बाद पुलिस के मीडियायी बयानों को देखें तो इस घटनाक्रम के लिए वीरेन्द्र कुर्रे को महिमामण्‍डन करने का कुचक्र चल रहा है. समय का तकाजा एवं वर्तमान में बौद्धिकता की परम्‍परा हो गई है कि पश्चिमी देशों और वामपंथ के झंडाबरदारों, मानवाधिकार वादियों के मन में जनसुरक्षा कानून में फंसें लोगों के प्रति स्‍वाभाविक सहानुभूति आ जाती है. पुलिस इस बात से नाखबर है कि वह बड़ी आसानी से वीरेन्‍द्र को हीरो बनाने में सहयोग कर रही है. पुलिस कह रही है कि वीरेन्द्र के घर से नक्सली साहित्य बरामद हुआ है. नक्सल साहित्य का सटीक अर्थान्वयन अभी अदालतों में होना बाकी है, तब भी पुलिस व प्रशासन नक्सल साहित्य के आड़ में अपना हित साधती रही है. पुलिस तात्कालिक रूप से हालात को काबू में करना चाहती है, इसके लिए वो इसे हथियार के तौर पर प्रयोग करती है एवं लोगों में अपराध के प्रति डर को कायम करने का विफल प्रयास करती है. पाश, धूमिल, ब्रेख्त से लेकर नागार्जुन और मुक्तिबोध की कविताओं में सामंती दमन के खिलाफ उठते विरोध की पंक्तियों में बार बार नक्सल साहित्य उलझता है. काल र्माक्स, मेधा पाटकर, बी.डी.शर्मा, अरूंधती राय जैसों कई नामों व कई अनाम लेखकों के गद्यों में नक्सल विचारधारा को पुलिसिया बाईनाकुलर तलासती है. बार बार न्यायालयों में मुहकी खाती है और बार बार नक्सली साहित्य के सहारे लोगों को निरूद्ध करने का प्रयास करती है. इसे देखते हुए किसी के घर से तथाकथित 'नक्सली साहित्य' का बरामद होना जनसुरक्षा अधिनियम के तहत उस घर मालिक को अपराधी सिद्ध नहीं करती. अदालत में सिद्ध करने का भार पुलिस पर है और अभी लम्बी अदालती लड़ाई बाकी है. इस बीच बहुत सारे लोग हाथ सेकेंगें, बयानबाजी होगी, रूदालियां होगीं और स्थानीय किसान मजदूर बाहरी लोगों के नारों से पेट भरेंगें.

संजीव तिवारी

विश्‍व रंजन ... विश्‍वरंजन

(चित्र रविवार डाट काम से साभार)
कल मेल से प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के एक आयोजन की जानकारी, प्रेस विज्ञप्ति के माध्‍यम से प्राप्‍त हुई। इस पर कुछ विचार आ ही रहे थे कि मित्रों से पता चला कि प्रदेश कांग्रेस के अध्‍यक्ष के काफिले पर नक्‍सल हमला हुआ है और एक गाड़ी विष्‍फोट से उड़ा दी गई है। दो तीन फोन खटखटाए, कांग्रेस से जुड़े मित्र और रिश्‍तेदारों को सही सलामत पाकर पुन: काम में लग गए। किन्‍तु विचार और कार्य के साथ तालमेल नहीं बैठ रहा था, .... अपने रिश्‍तेदार या मित्र तो नहीं मरे यही सोंचकर हम प्रदेश की इस बड़ी समस्‍या से सदैव मुह मोड़ लेते हैं।

हमारे या आपके मुह मोड़ने या गाल बजाने से यह समस्‍या हल नहीं हो सकती। बारूद से दहलते बस्‍तर से ही एक तरफ समाचार आते हैं कि फलां अधिकारी के यहां एन्‍टीकरप्‍शन ब्‍यूरो का छापा पड़ा - अकूत सम्‍पत्ति बरामद। तो दूसरी तरफ समाचार आते हैं कि आदिवासी अपनी लंगोट के लिए भी तरस रहे हैं। यह आर्थिक असमानता सिद्ध करती है कि आदिवासियों के हक के पैसे साहबों के घर में जमा हो रहे हैं और आदिवासी छीने जा चुके लंगोट के कारण अपना गुप्‍तांग हाथों में छुपाकर घने जंगल में अंदर की ओर भाग रहे हैं। वे स्‍वयं भाग रहे हैं या उन्‍हें षड़यंत्रपूर्वक भगाया जा रहा है इसकी पड़ताल भी होनी चाहिए। जंगल में भागे कुछ लंगोट धारी, नक्‍सली वर्दी में बंदूक के साथ वापस लौट रहे हैं। किन्‍तु वे बस्‍तर के आदिवासियों का हक छीनकर अरब-खरबपती बनते सरकारी नुमाइंदों, शोषक साहबों पर बंदूक तानने के बजाए पुलिस और निरीह जनता की प्‍यासी हलक पर उपनी गोलियां उतार रहे हैं।

बस्‍तर में हुए कल के हमले और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की विज्ञप्ति के बीच छत्‍तीसगढ़ के डीजीपी विश्‍वरंजन भी याद आ रहे थे। क्‍योंकि कल दोपहर को मोबाईल गूगल रीडर से जनपक्ष में प्रकाशित कविता पढ़ा था, जिसमें लिखा था कि ''यह कविता छत्तीसगढ़ के जाने-माने पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन को राज्य सरकार द्वारा पद से हटाये जाने के बाद लेखकीय प्रतिबद्धता से जुड़े साहित्यकारों के बीच एक गंभीर बहस पर आधारित है ‘एक तानाशाह का पंचनामा’ जिसे विश्वरंजन के तमाम लेखों सहित पंकज चतुर्वेदी का खत और जयप्रकाश मानस की बौद्धिक जद्दोजहद को पढने के बाद पूरी बहस को एक सार्थक निष्कर्ष तक ले जाने की कोशिश की गयी है.'' कविता पोस्‍ट पर अभी तक कोई कमेंट नहीं हैं, निष्‍कर्ष हैं ‘एक तानाशाह का पंचनामा’।
      
इस कविता में जिसे तथाकथित तानाशाह के ओहदों से नवाजा गया है उसकी गलबंइहा लेनें इस माह के 23-24 जुलाई को साहित्‍य जगत के ही कुछ विशेष नामधारी जिनमें प्रो. कृष्ण दत्त पालीवाल, श्री प्रफूल्ल कोलख्यान, श्री नरेन्द्र श्रीवास्तव, मधुरेश, श्रीभगवान सिंह, श्री दीपक पाचपोर, जयप्रकाश मानस, शंभुलाल शर्मा वसंत, जया केतकी राज्य के 200 से अधिक साहित्यकार, कवि, शिक्षाविद, डॉ. सुशील त्रिवेदी, सर्वश्री गोपाल राय, रमेश कुंतल मेघ, नंदकिशोर आचार्य, प्रो. अजय तिवारी, जानकी प्रसाद शर्मा, कुमार पंकज, रेवती रमण, सुरेन्द्र स्निग्ध, शंभु गुप्त, विजय शर्मा, अजय वर्मा, डॉ. रोहिताश्व, श्रीप्रकाश मिश्र, ज्योतिष जोशी, डॉ. शशिकला राय, प्रो. चन्द्रलेखा डिसूजा, श्रीभगवान सिंह, भारत भारद्वाज, प्रभात त्रिपाठी, अश्वघोष, पंकज पराशर, गंगा प्रसाद बरसैंया, कालू लाल कुलमी एवं राज्य के आलोचकगण प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान के कार्यक्रम में रायपुर पधार रहे हैं।

विश्‍वरंजन अपने समूचे कार्यकाल में अन्‍य राज्‍य पुलिस प्रमुखों से ज्‍यादा चर्चा के केन्‍द्र में रहे। विश्‍वरंजन के छत्‍तीसगढ़ में पदभार ग्रहण करने  के बाद उनके साहित्यिक क्रियाकलापों में लगातार जुड़े रहने पर देश व प्रदेश से विरोध 
के स्‍वर लगातार उठते रहे, किन्‍तु तमाम विरोधों के बावजूद मुख्‍यमंत्री जी को विश्‍वरंजन प्रिय रहे। डॉ.रमन को यह भरोसा हो चला था कि नक्‍सल मोर्चे पर दोतरफा वार विश्‍वरंजन ही कर सकते हैं। इसीलिये वे पुलिस प्रमुख के पद पर लगातार तब तक बने रहे जब तक भाजपा की अंर्तशक्ति संघ नें नहीं कहा। डॉ.रमन सरकार के विश्‍वरंजन के साहित्यिक क्रियाकलापों पर विरोध के बावजूद रोक लगाने के बजाए बढ़ावा देना इस बात की साक्षी थी कि सरकार स्‍वयं यह चाहती है कि नक्‍सलवाद से बंदूक के साथ ही वैचारिक ढ़ग से भी निबटा जाए। क्‍योंकि धुर जंगल में मारकाट कर रहे नक्‍सलियों के पीछे शहर में बैठे तथाकथित वैचारिक लोगों का अज्ञात समूह मानसिक रूप से उन्‍हें बल देता है। जिन्‍हें गोली से नहीं विचारों से शिकश्‍त दिया जा सकता है। 

राज्‍य के प्रश्रय में चल रहे सलवा जुड़ुम आन्‍दोलन के मुख्‍य सारथी के रूप में विश्‍वरंजन समय समय पर मीडिया व बुद्धिजीवियों के सम्‍मुख उपस्थित होते रहे हैं। वे अपनी तर्कपूर्ण उत्‍तरों से सदैव इस तथाकथित स्‍वस्‍फूर्त आन्‍दोलन का पक्ष लेते रहे हैं। मानवाधिकार वादियों के छत्‍तीसगढ़ में रूदाली मचाये जाने पर भी उन्‍होंनें सदैव सामने आकर बयान दिया और उनका प्रमुखता से प्रतिरोध भी किया है। छत्‍तीसगढ़ में हो रहे नक्‍सल नरसंहार व संविधान की खुले आम अवहेलना पर वे न केवल एक पुलिस मुखिया के रूप में डटे रहे बल्कि वैचारिक क्रांति लाने के उद्देश्‍य से वैचारिक प्रहार भी करते रहे। नरसंहार व नक्‍सलियों के अमानवीय कृत्‍यों को जनता तक पहुचाने हेतु वे प्रयासरत रहे एवं नरसंहार व बर्बरता के साक्ष्‍य के रूप में चित्र प्रदर्शनियॉं भी जगह-जगह लगवाते रहे ताकि जनता पुलिस व नक्‍सलियों के कृत्‍यों को समझ सके और पुलिस को वैचारिक रूप से जनता का सहयोग मिले। प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान की स्‍थापना व विश्‍वरंजन के पद पर रहते हुए संस्‍थान के संपादित विविध आयोजनों व संचालन का विरोध भी गाहे बगाहे होते रहा है। प्रदेश के साहित्‍यकार विश्‍वरंजन के इस रथ में कुछ शामिल हुए और कुछ स्‍पष्‍ट रूप से विरोध में खड़े रहे तो कुछ अपनी तटस्‍थता में चुप रहे। 

साहित्‍यकारों-विचारकों के आपसी गुटबाजी से परे सोंचें तो प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान नें प्रदेश को साहित्यिक क्षितिज पर एक पहचान दी है। संस्‍थान नें लेखक बिरादरी को व नये कलमकारों को अलग-अलग विधा में पारंगत करने के लिए कार्यशाला का आयोजन किया है और साहित्यिक विषयों पर गंभीर विमर्श करवायें हैं। प्रमोद वर्मा की समग्र रचनायें ग्रंथावली के रूप में प्रकाशित कर संस्‍थान नें बहुत सुन्‍दर कार्य किया। संस्‍थान नें अनेक अन्‍य साहित्‍यकारों की कृतियों को भी प्रकाशित कराने में सहयोग दिया है जिससे साहित्‍यकारों में एक आशा की किरण फूटी है। प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान द्वारा प्रकाशित पत्रिका पाण्‍डुलिपि हिन्‍दी साहित्‍य जगत में एक महत्‍वपूर्ण पत्रिका के रूप में उभरी है।

विश्‍वरंजन के छत्‍तीसगढ़ के साहित्यिक क्षितिज में 
धमाकेदार अवतरण एवं उल्‍लेखनीय अवदान को देखते हुए आशावादियों का मानना था कि इनके मौजूदा कार्यकाल में छत्‍तीसगढ़ शासन इन्‍हें सेवावृद्धि भी देगी और विश्‍वरंजन का साथ दो-तीन वर्ष और मिल पायेगा। बल्कि कुछ साहित्‍यकारों का मानना था कि वैचारिक व्‍यूह जल्‍द ही ध्‍वस्‍त हो जावेंगें। यद्धपि नक्‍सल उन्‍मूलन के लिए सरकार के.पी.एस.गिल जैसे धुरंधर को भी बतौर सलाहकार लेकर आई पर सरकार को कोई फायदा नहीं हुआ। विश्‍वरंजन को स्‍वयं मुख्‍यमंत्री आईबी से लेकर आये तब धमाकेदार प्रवेश नें सबको चौंकाया। इनकी कार्यशैली व चुस्‍ती की जितनी प्रशंसा हुई उतनी ही गजलकार के नाती के रूप में इन्‍हें प्रतिष्ठित करने के प्रोपोगंडे का विरोध भी हुआ। उनके व्‍यक्तित्‍व में एक कवि व चित्रकार के रूप को अनावश्‍यक उभार देने के कार्य से कइयों का मन भी आहत हुआ। हमने भी एक लम्‍बी कविता दे मारी थी। हालांकि इसके बाद जयप्रकाश मानस जी नें इसे कविताई कहा और हमें सुन्‍दर पदों से विभूषित भी किया। मेरे जैसे विरोध के स्‍वरों पर विश्‍वरंजन नें कई-कई बार कहा कि वे इन छोटी-मोटी बातों में अपना दिमाग खराब नहीं करते और अपना समय भी नहीं गंवाते। 

इन दिनों डीजीपी एवं प्रदेश के गृह मंत्री के बीच वैचारिक मदभेद की खबरें भी लगातार समाचार पत्रों में आती रही पर लगता था कि विश्‍वरंजन इन सब बातों से परे शिव बने हुए हैं। अचानक उन्‍हें हटाया जाना यद्यपि अप्रत्‍याशित रहा ...  किन्‍तु विश्‍वरंजन ... विश्‍वरंजन. बने रहे.



संजीव तिवारी

राजीव रंजन जी के उपन्यास का अंश - लौहंडीगुडा गोलीकांड पर आधारित

बस्‍तर हालात बत्‍तर, बदतर और  बदतर ! हॉं आप सही पढ़ रहे हैं, भारत के छोटे से राज्‍य छत्‍तीसगढ़ के संपूर्ण बस्‍तर क्षेत्र में अब बारूदों की गंध छाई है। विष्‍फोट और गोलियों की आवाजें आम है, घोटुल सूना है, धनकुल नि:शव्‍द है, करमा के मांदर की थापों में कुत्‍तों के रोने की आवाजें निकलती हैं। अनहोनी का नाद जैसे हर तरफ छाया है, ऐसा तो नहीं था यह .....। इतिहास के परतों को उधेड़ते हुए बस्‍तर के रूपहले परदे को मेरे सामने लाला जगदलपुरी, हीरालाल शुक्‍ल, निरंजन महावर, वेरियर एल्विन आदि नें तथ्‍यात्‍मक रूप से तो गुलशेर अहमद 'शानी' और मेहरून्निशा परवेज नें कथात्‍मक रूप में प्रस्‍तुत किया है। इसके अतिरिक्‍त बहुतों के हाट बस्‍तर पर बहुत कुछ लिखा जो कुछ याद है कुछ याद नहीं है। इंटरनेट के हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में व्‍यथित बस्‍तर के दर्द को बांटते मेरे साथियों में राजीव रंजन जी का नाम अहम है। राजीव जी नें अपने ब्‍लॉग सफर राजीव रंजन प्रसाद में नक्‍सल मसले पर बेबाक लेखन किया है, राजीव जी  साहित्‍य शिल्‍पी  के संपादक हैं और बस्‍तरिहा हैं। सुदूर दिल्‍ली (वर्तमान में देहरादून) में भी बैठकर इनका दिल बस्‍तर के लिए धड़कता है, बस्‍तर के हर स्‍पंदन में इनका भावुक मन रोता है। बस्तर में जारी नक्सलवाद के समर्थकों के खिलाफ जब राजीव जी  हजार पच्यासीवें का बाप लिखते है तब उसमें इनका मुखर विरोध और बस्‍तर के प्रति इनका स्‍नेह शव्‍दों में प्रदर्शित होता है। राजीव जी “बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ” जैसे आलेख श्रंखला में इन्‍होंनें  नक्सलवाद और महाराज प्रबीर चंद भंजदेव की हत्या: थोडा आज, कुछ इतिहास व नक्सलवादी या उनके समर्थक - सुकारू के हत्यारे कौन? एवं बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ  जैसे संस्मरण के साथ ही बस्तर भारत का हिस्सा नहीं है? जैसा संवेदनशील आलेख लिखते है। कविताओं के अतिरिक्‍त बस्तर के आदिवासी महिलाओं के शोषण की दास्तां पर उनकी भावनाप्रद कहानी  ढीली गाँठ ब्‍लॉग जगत में काफी चर्चित रही है। इन्‍होंनें बस्‍तर में रूदाली रोते मानवाधिकार वादियों का भी स्‍पष्‍ट रूप से विरोध किया है और हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में जहां भी बस्‍तर नक्‍सल मसले पर पोस्‍ट प्रकाशित हुई है, वहां नक्‍सलियों व नक्‍सल समर्थित मानवाधिकारवादियों के समर्थन पर अपना दमदार विरोध प्रकट किया है।
राजीव रंजन प्रसाद अपने परिचय में लिखते हैं कि इनको कविता विरासत में मिली है. इनके शैशवकाल में ही पिता का देहांत हो गया था. उनका मानना है कि पिता की लेखनी ही उनमें जीवंत है। इनका जन्म बिहार के सुलतानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु बचपन व प्रारंभिक शिक्षा छत्तीसगढ राज्य के अति पिछडे जिले बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई. विद्यालय के दिनों में ही उन्होनें एक अनियतकालीन-अव्यावसायिक पत्रिका "प्रतिध्वनि" निकाली....ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने. आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकशित भी हुए किन्तु अपनी रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित करनें का प्रयास उन्होनें कभी नहीं किया. राजीव जी नें स्नात्कोत्तर की परीक्षा भोपाल से उत्तीर्ण की और उन दिनों वे भोपाल शहर की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय हिस्सा लेते रहे. इन दिनों वे एक प्रमुख सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में सहा. प्रबंधक (पर्यावरण)के पद पर कार्यरत हैं. अभी उनका स्‍थानांतरण देहरादून हो गया है। राजीव जी लम्‍बे समय से अपने इस उपन्‍यास को पूरा करने में जुटे हैं, उनके पास साहित्‍य शिल्‍पी के निरंतर प्रकाशन का बहुत बड़ा दायित्‍व है। नौकरी और परिवार के बीच सामन्‍जस्‍य बिठाते हुए इन्‍होंनें बहुत मेहनत से बस्‍तर पर आधारित अपने पहले  उपन्‍यास को पूरा किया है, यह उपन्‍यास शीघ्र ही आने वाली है।
बस्‍तर के बारूदी हालात पर अपनी एक कविता में वे लिखते हैं - देखो बिखरी है भूख वहाँ, परती हैं खेत बारूद भरे/ हर लाश है मेरी, कत्ल हुई / मेरे ही नयना झरे झरे। इन्‍हें मलाल है कि रोजी रोटी नें इन्‍हें बस्‍तर से दूर कर दिया है किन्‍तु वे निरंतर स्‍वयं को बस्‍तर से अलग नहीं कर पाते, वे लिखते हैं - मैं अब हूँ दूर जंगल से, बहुत वह दौर भी बदला / मेरे साथी वो दंडक वन के, कुछ टीचर तो कुछ बाबू / मुझे मिलते हैं, जब जाता हूँ, बेहद गर्मजोशी से.. / वो यादें याद आती हैं, वो बैठक फिर सताती है / मगर जंगल न जानें की हिदायत दे दी जाती है / यहाँ अब शेर भालू कम हैं, बताया मुझको जाता है / कि भीतर हैं तमंचे, गोलियाँ, बम हैं, डराया मुझको जाता है / तुम्हारा दोस्त “सुकारू” पुलिस में हो गया था / मगर अब याद ज़िन्दा है...

प्रस्‍तुत है राजीव जी के उपन्‍यास का एक अंश

उपन्यास अंश - लौहंडीगुडा गोलीकांड पर आधारित
“हमारी आवाज कैसे नहीं सुनी जायेगी, ये अंग्रेज का राज नहीं है” भीड में से एक उत्तेजित ग्रामीण की आवाज थी। थाने पर लगातार भीड बढती जा रही थी और एसा प्रतीत होता था मानों गामीणों नें चारो ओर से थाने को घेर रखा हो। भीड से सौ मीटर की दूरी पर ही पुलिस जीप खडी थी जिसपर लाउडस्पीकर लगाया गया था। रह रह कर घोषणा की जा रही थी “सरकार द्वारा विजय चंद्र भंजदेव को बस्तर का महाराजा घोषित किया गया है, अब वे ही आप सब के महाराजा है”
“हमारे महाराजा प्रबीरचंद ही हमारे सरकार हैं हम और कोई सरकार नहीं जानते” एक युवक लगभग चीखते हुए बोला।
“महाराज प्रबीर चंद को आज यहाँ लाया जाना था? कहाँ हैं हमारे महाराज?”
लाउडस्पीकर से फिर घोषणा हुई “ पीछे हट जायें। भीड इक्ट्ठी करना गैर कानूनी है। सरकार द्वारा विजय चंद्र भंजदेव को बस्तर का महाराजा घोषित किया गया है, अब वे ही आप सब के महाराजा है”
“हमारा राजा सिर्फ हम तय कर सकते हैं”। भीड में से एक आवाज आयी। भीड लगातार बढती जा रही थी।
“राव साहब नें मुझसे कहा था कि आज महाराजा साहब को लौहण्डीगुडा लाया जायेगा। हम कुछ नहीं चाहते अपने महाराज का हाल जानना चाहते हैं” यह आवाज अजाम्बर की थी। लगभग बीस हजार आदिवासियों के हुजूम को चीरता हुआ वह एक नेता की तरह आगे आया।
“पीछे हटें, थाने की ओर भीड न लगाये। प्रबीर चंद्र भंजदेव इस समय नरसिंहपुर में हैं जो यहाँ से 800 मील दूर हैं उन्हे तत्काल यहाँ नहीं लाया जा सकता।“
”क्यों नहीं लाया जा सकता? बात हुई है हमसे। हमसे कलेक्टर साब नें खुद कहा था कि महाराज साब यहाँ मिलेंगे। विजय चंद्र को हम राजा नहीं मानते” अजाम्बर को अपनी बात करने के लिये लगभग चीखना पड रहा था। साथ ही साथ उसके दिमाग में किसी अनहोनी की आशंका भी घिरने लगी थी। भीड के लिये यहाँ कई समस्याये थीं। हिन्दी आधी अधूरी समझी जा रही थी और उसके अपने अपने मायने निकाल कर लोग उद्वेलित हो रहे थे। आदिवासियों को चीखते, सिर पटकते यहाँ तक कि दहाड मार कर रोते भी देखा जा सकता था। अपने शासक को अधिकार दिलाने की यह कोशिश भर नहीं थी, उनके प्रति अपर श्रद्धा का विशाल प्रदर्शन था।
भीड का अपना व्यवहार शास्त्र होता है। यह भीड आंदिलित नहीं उद्वेलित थी। इस भीड की कहीं आग लगाने की या तोड फोड करने की मंशा नहीं थी। यह भीड केवल अपने महाराजा प्रबीर चंद भंजदेव के लिये इकट्ठी हुई थी विशेष कर उनका कुशलक्षेम जानने। आदिमों की इस भीड के साथ उनकी परंपरा भी थी, बाजार का दिन होने के कारण युवक युवतियों का सामान्य दिन से अधिक साज सज्जा के साथ पहुँचना उतना ही स्वाभाविक था जितना टंगिया, फरसा, तीर-कमान और लाठी का इस हुजूम से साथ होना।
इस भीड की तकलीफ़ और उत्तेजना का बडा कारण विजयचंद भंजदेव का लौहण्डीगुडा थाने में उपस्थित होना भी था।
“सरकारी राजा हमें मान्य नहीं हैं” बार बार भीड से उठती इस आवाज से विजयचंद्र अपना संयम खो बैठते। आजाद भारत के इस अधिकार विहीन, केवल नाम के राजा की महत्वाकांक्षा ही थी कि वह अपने खिलाफ़ इस जनाक्रोश को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। भीड जिसे शांत कराने की चेष्टा वे करने में लगे थे वह उन्हे देखते ही उनकी ओर मुखातिब हो कर प्रतिवाद में उतारू हो जाती। इंस्पेक्टर जनरल पुलिस, पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर, सरकार द्वारा नव-नियुक्त राजा विजयचंद्र भंजदेव के अतिरिक्त अनेकों उच्चाधिकारी लौहण्डीगुडा थाने के पास मौजूद थे। इन सभी के भीतर की बेचैनी चेहरे से ही पढी जा सकती थी विशेष कर विजय चंद भंजदेव रह रह कर टहलने लगते। आजाद भारत सरकार के द्वारा प्रदत्त इस अधिकारविहीन पद की प्राप्ति के साथ ही विजयचंद “महाराजा” हो जाने वाली प्रवृत्ति से ग्रसित हो उठे थे। उन्हे यकीन था कि बस्तर की भोली-भाली आवाम उन्हें अपने हृदय में मान्यता देगी।
बस्तर की रिआया भोली भाली अवश्य है किंतु उसे नादान समझने की भूल प्रशासन से हो गयी थी। जनता आजाद भारत में भी अब तक रिआया ही थी और उनके हृदय साम्राज्य के स्वामि थे प्रबीरचंद भंजदेव।
“साब! अंग्रेज लोग भी आप से बेहतर हमारी बात समझते थे। हमारी इच्छा के खिलाफ हमारा राजा कैसे हो सकता है? इस बार अजाम्बर सीधे कलेक्टर से मुखातिब था। इस प्रश्न के जवाब में खामोशी ही रही लेकिन विजयचंद्र का तमतमाया हुआ चेहरा देखा जा सकता था।
“आप लोग शांति बना कर रखें। आपके महाराजा विजचंद्र आप से बात करेंगे” एक उच्चाधिकारी संवाद बनाने की स्थिति देख आगे आये।
“विजयचंद्र हमारा राजा नहीं है” एक पैनी सी आवाज आयी और फिर शोर उमडने लगा। कई आदिवासी पीछे मुड कर अपने ही साथियों को थाने की ओर बढने से रोकने में भी लगे थे।
“आप हमारी एक उंगली तोड कर उसकी जगह पर दूसरी उंगली कैसे लगा सकते हो? महाराज के रहते विजय राजा नहीं बन सकते” अजाम्बर नें थोडी तल्खी दिखायी।
“क्या चाहते हो आप लोग” विजयचंद्र लगभग आक्रामक मुद्रा में आगे आया। इस आक्रामकता का कोई प्रभाव उस भीड पर नहीं था। बल्कि विजय चंद्र का ही कोई प्रभाव बस्तर की रिआया पर नहीं था। वह जानती थी, तो केवल अपने महाराजा प्रबीरचंद्र को जो इस समय नरसिंहपुर जेल में कैद कर लिये गये थे। माहौल उग्र तो नहीं कहा जा सकता था किंतु पूरी तरह शांत भी नहीं। रह रह कर गूंजता स्वर “दंतेश्वरी माई की जय” दहशत भरता था।
यह सब कुछ अचानक आरंभ नहीं हुआ था। प्रवीरचंद की गिरफ्तारी के साथ ही नागरिक स्वत: प्रेरित स्थान स्थान पर एकत्रित होने लगे थे। सिरिस गुडा की देवगुडी में तथा बड़ांजी में बडी बडी सभायें हुई थी जिसमें हजारों आदिवासियों ने हिस्सा लिया था। कलेक्टर आर. एस. राव के हवाले से खबर थी कि महाराज प्रबीरचंद 31 मार्च को लौहण्डीगुडा लाये जायेंगे। बडांजी की सभा को संबोधित करते हुए अजाम्बर नें बेनियापाल मैदान में सब को एकत्रित होने की गुजारिश की थी। बस्तर के आदिवासी समुदाय से अधिक जागरुक कौम कम ही दृष्टिगोचर होगी; यह आह्वाहन फैलता गया जैसे जंगल की आग फैल जाती है। और आज यह दावानल बन कर प्रशासन को चुनौती देने तत्पर थी कि हमारे कौन तुम? जंगल हमारा, जमीन हमारी, पानी हमारा, पंछी हमारे और राजा भी हमारा ही होगा। अगर आजादी है तो हम भी आजाद हैं। अगर लोकतंत्र है तो शासक भी हमारा ही हो फिर किस अधिकार से विजयचंद्र?
चित्रकोट की ओर आने वाली सडक एक दिन पहले ही किसी गडबडी या विरोध की आशंका से बंद कर दी गयी थी। प्रसाशन नें भीड न जुटने देने के यथासंभव प्रयत्न किये थे लेकिन कारवाँ कब रुका है, धुन को कौन हरा सका है? जगह जगह घोषणाये भी होती रहीं लेकिन शोर में या तो उन्हे सुनना असंभव था या हिन्दी अधिकांश के लिये समझना मुश्किल। विभिन्न दिशाओं से उमडता जन सैलान और बहुत से समूहों में जोश भरती मांदर की थाप सुबह से ही बेनियापाल के मैदान में जुटने लगी थी। बाजार भी लगा और सल्फी भी साधी गयी लेकिन हर पल प्रतीक्षा कि महाराज लाये जा रहे होंगे। महाराज की तबीयत ठीक नहीं है। उन्हे यातनायें दी जा रही हैं। जितने मुँह उतनी ही बातें।
एसा भी नहीं था कि विजयचंद्र को समर्थन नहीं मिला। प्रशासन तो उनके साथ था ही, कुछ जगहों पर कोशिश भी हुई कि माहौल सरकारी राजा के पक्ष में बनाया जाये। “सरकारी राजा” यह संबोधन आम हो गया था और वितृष्णा से आदिवासियों द्वारा लिया जाता रहा। विजयचंद्र के पक्ष में जो इक्कादुक्का सभायें हुई भी लेकिन विरोध वहाँ भी रहा। आदिवासियों नें एसे आयोजनों के खिलाफ न केवल मोर्चा खोला बल्कि आयोजकों को दंडित करने को भी तत्पर हो गये थे। जगदलपुर के पास ही गाँव नारायण पाल में एसी ही एक सभा सूर्यपाल तिवारी नें भी आयोजित की थी। सिर मुडाते ही ओले पड गये। यह बस्तर के महाराज के पतन का समारोह बोहरानी कहा जा रहा था। हुजूम उमड पडा, पंडाल उखाड फेंके गये और आदिम युवक सूर्यपाल तिवारी को घर घर तलाश कर रहे थे। महाराज प्रवीरचंद का पतन एक कार्यक्रम से और दो चार घोषणाओं से हो पाता तो फिर बात क्या थी? सूर्यपाल तिवारी का ही पतन हो गया। सर पर पाँव रख कर वे कहाँ नदारद हुए कोई नहीं जान सका।
राजा का पद ही समाप्त कर दिया जाता तो यहाँ एक सोच हो सकती थी लेकिन नये राष्ट्र में नयी नीति नें बहुत जल्द राज करना सीख लिया था। अकर्मण्य और अयोग्य व्यक्ति बस्तर में तभी वास्तव में सत्तासीन हो सकते हैं जब योग्य विकल्प ही न रहे अर्थात प्रबीर को कुचल दिया जाना आवश्यक था। प्रबीर एक व्यक्ति नहीं एक सोच थे और उन्हे कुचलने के लिये निश्चित ही बहुत सी राजनीतिक सोच नें गटबंधन कर लिया था। कितनी जल्द अंग्रेजों की राजनीति से हिन्दोस्तान नें सबक ले लिया यह देखने लायक था। आजाद भारत की नियति को फिर भेडियों और गिद्धों नें लिखना आरंभ कर दिया, क्या इससे बडा दुर्भाग्य हो सकता था? विजयचंद को सरकार द्वारा राजा बनाये जाने की जो घोषणा की गयी थी वह साजिश तो थी लेकिन आजादी और स्वच्छंदता के बीच की बारीख रेखा जिसे अनुभवहीन राजनीति नहीं समझ सकी उसे भावावेश भरी जनता क्या समझती? यह भी एक सत्यता थी कि बस्तर की राजनीति न भोपाल से संभव थी न दिल्ली से। आजादी से पहले अंग्रेजों का शासन अवश्य रहा लेकिन क्षेत्रीय कानून और शासन जगदलपुर में ही बने और यहीं से संचालित होते रहे। कैसा दुर्भाग्य कि बस्तर के आदिम अब केवल समस्या की तरह देखे जा रहे थे जब कि समाधान यही था कि राजनीति की नयी मुख्यधारा यह समझती कि अनेकों संस्कृतियों से समृद्ध इस देश की जड को पानी चाहिये न कि पत्तियों को दवा का छिडकाव। बस्तर अपनी आवाज निरंतर खोता जा रहा था और शायद यही कुंठा आदिवासियों को अपनी आवाज प्रतीत होते प्रवीरचंद भंजदेव के पक्ष में लामबंद करती थी। 11 फरवरी 1961 को प्रबीर गिरफ्तार हुए थे और 12 फरवरी 1961 को उन्हे महाराजा की पदवी से अपदस्थ कर दिया गया था। प्रजातांत्रिक देश में राजा भी क्या राजा और उसपर आश्चर्यजनक यह कि सरकार ही राजा घोषित भी करे, तो कैसी लोक शाही थी यह? चुनाव नहीं हुए थे, लोकचर्चा नहीं की गयी थी, आदिवासी नेताओं को विश्वास में नहीं लिया गया था और केवल एक ‘सोच’ के दमन के लिये तुगलकी फरमान यह सोचने को अवश्य मजबूर करता था कि सही मायनों में अभी आजादी आयी नहीं है। अब सत्ता पर काले अंग्रेज काबिज हो गये हैं शेष क्या बदला है?
मानने वालों की कमी नहीं कि सत्ता बंदूख की गोली से निकलती है। जिस तेजी से प्रशासन का विरोध आरंभ हुआ उसी तीव्रता से दमन भी। तोकापाल में एक सभा चल रही थी। तीन चार सौ आदिवासियों की बैठक। चैतू बहुत जोश में भाषण दे रहा था।
“हमारे महाराज के खिलाफ साजिश हो रही है। हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते।“
पेडों की छाँव में तितर-बितर बैठे आदिवासी चिंतित नजर आ रहे थे। महाराजा के लिये कुछ न कर पाने की पीडा चैतू के भाषण में भी थी और उसे सुन रही भीड के चेहरे पर भी। अचानक ही पुलिस वैन मैदान से लगे मुख्य सडक पर रुकी। दन-दन कर सिपाही उतरने लगे और भीड पर टूट पडे जैसे उन्हे पता हो करना क्या है, किसी आदेश की आवश्यकता ही नहीं थी। चैतू के बाल पकड कर खींचता हुआ एक सिपाही वैन तक ले आया। अंदर बैठे अधिकारी से उसे मौन सहमति मिली हुई थी। केवल लट्ठ ही नहीं लात घूंसे और थप्पड भी। चैतू का कोई प्रतिरोध नहीं था वह मार खाता रहा, दर्द से बिलबिलाता रहा।...। अब चैतू सुन नहीं पाता।
बहरा तो प्रशासन भी हो गया था। उसका दमन जारी था, लेकिन इसके पीछे जुनूनी होती एकता की आहट उसे सुनायी नहीं पडी और स्थिति विस्फोटक हो गयी। चैतुओं की कोई कमी नहीं थी अपने महाराज के लिये जान देने को तत्पर हजारो मुरिया-माडिया इशारे भर में तैयार थे। पुलिसिया सितम जोरों पर था और इससे इंकलाब ही परवान चढने लगा। लॉरियों में भर भर आदिवासी थाने लाये जाते। जानवरों की तरह उन्हे पीटा जाता। कमोवेश पूरे बस्तर में एसा ही माहौल हो गया था। इसी माहौल से स्वप्रेरित हुआ हुजूम जिसनें लौहण्डीगुडा थाने को घेर रखा था बिगुल था कि अब खुला आंदोलन होगा। आर या पार।
धैर्य जवाब देने लगा था। विजयचंद्र का भी और उपस्थित प्रसाशनिक अधिकारियों का भी। सोचो तो लगता है जनरल डायर किस मानसिकता का रहा होगा जिसकी निहत्थों पर गोलियाँ चलवाते हुए आवाज न काँपी। यह मानसिकता क्या सत्ता के नशे से पनपती है? इस मानसिकता के पीछे क्या स्वयं को लोगों का भाग्य-विधाता समझने की खुशफ़हमी होती है? लेकिन यह मानसिकता बारह साल के हो चुके लोकतंत्र में भी? आश्चर्य तो यही था। प्रश्न तो उठता ही है कि कौन था इन आदिमों का माई-बाप - क्या प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू? क्या मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू? या कलेक्टर या फिर कमिश्नर या कि सरकार द्वारा घोषित महाराजा ऑफ बस्तर विजयचंद्र भंजदेव?
लाउडस्पीकर की अब उपयोगिता नहीं रह गयी थी। बीस हजार से अधिक की भीड को एक लाउडस्पीकर से संबोधित नहीं किया जा सकता था वह भी तब जब भीड में उत्तेजना भी हो; कई कई लोग एक साथ बोल रहे हों लेकिन सुनने को कोई तैयार न हो। कैसी अनूठी थी यह भीड। कई युवक तीर-कमान लादे थे तो कई फरसे और कुल्हाडी के साथ थे, पर ये सारे अस्त्र-शस्त्र केवल आभूषण भर ही रहे। यह भीड यदि असंयमित हो जाती तो मुट्ठी भर सिपाही उनका मुकाबला नहीं कर पाते। लेकिन “हमारे महाराज को उपस्थित करो” की एक सूत्रीय माँग के साथ खडी यह भीड किसी भी समय अराजक नहीं हुई थी। यहाँ तक कि जब जब उत्तेजना की लहर भी फैली तो आदिवासी नेताओं ने खुद भीड को पीछे धकेलने का काम भी किया। इन्हीं आदिवासी नेताओं में जोगा भी थे। पारापुर गाँव से आये जोगा को सामाजिक कार्यकर्ता कहना अधिक उचित होगा। जोगा जागरुक आदिवासी थे और अपनी राजनीतिक चेतना के लिये जाने भी जाते थे। भीड को नियंत्रित कर आदिवासी नेंता दल बना कर प्रशासनिक प्रतिनिधियों से मिलने अग्रसर हुए लेकिन तब तक एक भयंकर निर्णय ले लिया गया था। जोगा नें देखा कि अजाम्बर का हाँथ पकड कर उसे थाने के भीतर ले जाया जा रहा है, उसने महसूस किया कि सिपाही भीड को सुरक्षित दूरी से घेरने का यत्न कर रहे हैं, उसने पाया कि माहौल में उत्साह की फिर भी कोई कमी नहीं है, कहीं कोई डर नहीं है। जोगा को लग गया था कि जल्द ही भीड पर लाठी चलायी जायेगी और उन्हे तितर-बितर करने का प्रयास किया जायेगा। वह आगे आया और विजयचंद्र के सम्मुख आ खडा हुआ। जोगा अपनी बात कह देना चाहता था।
“महाराज के साथ तुम लोग क्या कर रहे हो?” जोगा नें यह प्रश्न विजयचंद्र से आँख मिला कर किया।
यह जोगा का अंतिम-वाक्य था। एक गोली उसका सिर खोलते हुए गुजर गयी। पीठ के बल जोगा जमीन पर गिरा, दो-एक बार जमीन पर पैर रगडे फिर शांत हो गया। एक पल की शांति के बाद हाहाकार मच गया। मोर्चे पर तैनात सिपाहियों नें अचानक गोली चलाना आरंभ कर दिया था। यह आजाद भारत में विरोध का बदला था। यह जनतंत्र की तानाशाही थी। भगदड मच गयी थी। औरते और बच्चे कुचले गये, बुजुर्ग चोटिल हो रहे थे, किसे परवाह? कुम्हली गाँव का भगतू कश्यप एकदम से भागा नहीं। शायद वह स्थिति का पूरा आँकलन नहीं कर सका था। जब तक समझता एक गोली उसके सीने के पार हो गयी थी।
बीस हजार की भीड को छटने में भी समय लगता, अनायास हुए इस हमले से अफरातफरी ही होनी थी और इसलिये चोटिल और घायलों की तादाद का अनुमान लगाना भी कठिन ही होगा। आंजर गाँव से आया आयतु अचानक हुई इस अराजकता में भी बिना संयम खोये मानों एक कोशिश कर लेना चाहता था। उसने गोली चलाते एक सिपाही की ओर हाँथ उठा कर रुकने का अनुरोध किया और रायफल उसकी ओर घूम गयी। निशाना लगा कर उसके गुप्तांग पर गोली मारी गयी थी।
गोली लगातार चल रही थी। अगर भीड को हटाना ही मक्सद था तो हवाई फायर या पैरों पर गोली मारने से भी स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता था लेकिन गोलियाँ बरसती रहीं, लाशें बिछती रहीं। सोनधर, टांगरू, हडमा, अंतू, ठुरलू, रयतु, सुकदेव; हर मौत के साथ लौहण्डीगुडा का बेनियापाल मैदान खाली होता गया। घायलों की कराहों और लाशों को स्तब्ध नजरों से निहारता प्रसाशन अब अपनी करनी के निशान मिटाने में जुट गया था। “विजय चंद्र भंजदेव महाराजा ऑफ बस्तर” खामोशी खिलखिला कर हँस रही थी; आओ महाराज शासन करो यह लाशों की बस्ती तुम्हारी ही रियासत है।

'नक्सल हिंसा,लोकतंत्र और मीडिया' विषय पर राष्ट्रीय परिचर्चा

छत्‍तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सिविल लाइन स्थित न्यू सर्किट हाउस में रविवार को "नक्सल हिंसा, लोकतंत्र और मीडिया" पर राष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मीडियाकर्मी, समाजसेवी, साहित्यकार, नक्सली वार्ताकारों ने हिस्सा लिया। परिचर्चा के विषय पर उन्होंने बेतकल्लुफी से अपने विचार रखें।
नक्सल मामलों के विशेषज्ञ प्रकाश सिंह ने भी कहा कि प्रशासन की विफलता के कारण नक्सली समस्या पैदा हुई है। शांतिवार्ता के लिए नक्सलियों के साथ कभी भी कोई गंभीर पहल नहीं की गई। इस समय वार्ता नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि यह कैसा लोकतंत्र है जहां अपराधी और करोड़पति ही सांसद के रूप में चुने जा रहे हैं। भ्रष्टाचार एक सीमा तक ही बर्दाश्त किया जा सकता है। विकास का यह पैमाना दोषपूर्ण है। असमान विकास को कारण बतलाते हुए इंडियन ब्रोडकास्ट एसोसिएशन के महासचिव एनके सिंह ने कहा कि मीडिया के लिए मानक और कायदे बनाने की दिशा में काम हो रहा है। बड़े मुद्दों पर चर्चा करने की परंपरा समाप्त हो गई है। मध्यवर्ग डांस इंडिया डांस देखने में मस्त है। सार्थक मुद्दों पर चर्चा की परंपरा बंद हो गई है। हमारे देश में विकास का गलत मॉडल चल रहा है। लगभग 84 करोड़ लोग 20 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से अपना गुजारा करते हैं, वहीं 25 हजार लोग ऐसे भी हैं जिनके पास 2 करोड़ की गाड़ियाँ हैं। इस तरह के असमान विकास से नक्सली समस्या पैदा होना लाजिमी है।
साहित्यकार रमेश नैयर ने कहा कि आदिवासी अंचलों का शोषण पहले पुलिस व फॉरेस्ट रेंजरों ने किया अब नक्सली उन्हें लूट रहे है। यह व्यवस्था बदलनी होगी। हमें विकास का कोई दूसरा उपाय ढूँढ़ने की जरूरत है। मीडिया की बेबाकी ही उसकी सफलता और लोकतंत्र की सेवा है। स्वामी अग्निवेश ने लिंकन की परिभाषा बाई दी पीपुल, फॉर दी पीपुल, आफ दी पीपुल के बाई दी रिप्रजेंटेटिव, फॉर दी रिप्रजेंटेटिव और आफ दी रिप्रजेंटेटिव में परिवर्तित होने पर जानकारी दी। नक्सल वार्ताकर स्वामी अग्निवेश ने नक्सलियों से बातचीत का समर्थन किया। उन्होंने कहा केन्द्र सरकार व नक्सली बातचीत करने के पक्ष में है। इसके लिए माहौल नहीं बन पा रहे हैं। दुनिया की हर समस्या बात से ही सुलझी है, गोली चलाने से किसी भी समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता है। इससे केवल हिंसा की प्रवृति बढ़ती है। आनंद प्रधान ने हिंसा के सवाल पर राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक ढांचे में होने वाली हिंसा को समझने की जरूरत पर बल दिया। गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने कहा कि मीडिया मध्यस्थता की भूमिका निभा सकता है। नक्सलवाद केवल प्रदेश की नहीं, वरन् पूरे देश की समस्या है।
नंद कुमार साय ने पुलिस को नक्सलवाद का जनक बताते हुए कहा कि पुलिस, पब्लिक और प्रशासन को एक लाइन में खड़ा करने से आदिवासियों में विश्वास पैदा होगा। अरविंद मोहन ने आदिवासियों के साथ हिंसा के इतिहास को लंबा बताते हुए कहा कि विकास के मॉडल और हिंसा पर लंबी चर्चा होनी चाहिए। छापामार लड़ाई से प्रदेश या देश पर काबिज करने की बात बेमानी है। लोकतंत्र सशक्त माध्यम है।
इस अवसर पर आईबीएन 7 के एमडी आशुतोष ने कहा कि नक्सली समर्थक कभी किसी के हितैषी नहीं हो सकते। इतिहास गवाह है कि उन्होंने अपने परिवार के लोगों को ही नहीं बख्शा, तो देश का क्या भला करेंगे। उन्‍होंनें कहा समाज की सोच परिवर्तन में मीडिया की अहम भूमिका है, जनता मीडिया से इन्सपार हो समाज की कुरीतियों को खत्म करने के अभियान में संलग्न हैं। देश के लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के बाद भी यदि गरीबी है, तो सोचना होगा कि यह क्यों है। उन्‍होंनें आगे कहा कि आज देश अपने पैरों पर खड़ा है और इसका भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। लोकतंत्र की विफलता और स्टेट की विफलता को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि हमें भारत को पश्चिमी संस्कृति के हिसाब से देखना बंद करना चाहिए। अमर उजाला के संपादक अरविंद मोहन ने कहा कि मीडिया से लोग काफी अपेक्षा रखते हैं, लेकिन नक्सली या सरकार मीडिया से दोहरा व्यवहार करते हैं। युद्ध क्षेत्र में सेना बल अपनी कस्टडी में पत्रकारों को लेकर जाते हैं। वे वही छपवाते हैं, जो चाहते हैं। उस पर कोई सवालिया निशान खड़ा नहीं करता, लेकिन यदि नक्सली पत्रकारों को अपने साथ ले जाते हैं और पत्रकार कुछ लिखता है तो उसके चरित्र व मंशा पर सवाल खड़े किए जाते हैं। इतनी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि पत्रकार खुद जाकर सच जाने या पत्रकार पर आरोप लगाना बंद करें। आनंद प्रधान ने हिंसा के सवाल पर राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक ढांचे में होने वाली हिंसा को समझने की जरूरत पर बल दिया। समाज में 30 करोड़ लोग भूखे हैं, आर्थिक विषमता की खाई गहरी हो गई है। नक्सलवाद को रोग का लक्षण बताते हुए इसे राज सत्ता की विफलता का परिणाम बताया। हरिवंश ने समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक पहल न होने को समस्या का कारण बताया। पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनी और राजनीतिक कार्यकर्ता पेड वर्कर बन गए हैं। मीडिया इस समस्या को समाप्त नहीं कर सकता। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति पाश्चात्य देशों से अलग है, इसकी तुलना नहीं होनी चाहिए। स्कूलों, पुलों और सड़कों को उड़ाना कौन सी विचारधारा है। सात राज्यों की सीमाओं से घिरे होने के कारण छत्तीसगढ़ में नक्सली समस्या अधिक है। कार्यक्रम में मंच संचालन पत्रकार राजकुमार सोनी ने किया। इस कार्यक्रम में ब्‍लॉगर ललित शर्मा जी भी विशेष रूप से उपस्थित थे ।
साधना न्यूज चैनल की इस परिचर्चा में सांसद नंद कुमार साय, गृहमंत्री ननकीराम कंवर, लोक निर्माण मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, बीएसफ के पूर्व डीजी और पद्मश्री प्रकाश सिंह, प्रभात खबर के समूह संपादक हरिवंश, सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, आईबीएन 7 के प्रबंध संपादक आशुतोष, अमर उजाला के वरिष्ठ संपादक अरविंद मोहन, इंडियन ब्रॉडकास्ट एसोसिएशन के महासचिव एनके सिंह, आईआईएमसी (दिल्ली) के प्रोफेसर आनंद प्रधान सहित सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया।

रिपोर्टिंग - बड्डे बड्डे.... लोगों के पीछे पीलर के आड़ में बैठा 3जी धारी गुमनाम रिपोर्टर


बेकसूरों की हत्याओं पर कलम का मौन दर्ज करेगा इतिहास : कनक तिवारी


बस्तर में सुकमा-दंतेवाड़ा मार्ग पर यात्री बस को बारूदी सुरंग विस्फोट से उड़ाकर नक्सालियों ने निर्दोष नागरिकों सहित 36 लोगों (संख्या परिवर्तनीय है) की निर्मम हत्या कर दी। यह एक माह में तीसरी बड़ी घटना है। राज्य का पुलिस और खुफिया तंत्र सवालों के घेरे में है। पूरी सरकारी मशीनरी बेबस और लाचार तो नहीं लेकिन किंकर्तव्यविमूढ़ ज़रूर नजर आ रही है। केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय भी पसोपेश में नजर आता है। प्रदेश के गृहमंत्री सेना को बुलाने की मांग करते हैं। मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) उनसे सहमत नहीं हैं। केद्रीय गृह मंत्री वायु सेना के सीमित उपयोग की बात करते हैं। वायु सेनाध्यक्ष की अपनी ढपली है। म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्वविजय सिंह केद्रीय गृह मंत्री को इस मामले में केवल राज्य सरकार को सहायता देने तक सीमित रहने की सलाह देते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सीमित समय के लिए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे हैं। राज्य कांग्रेस पार्टी विधान सभा का विशेष अधिवेशन बुलाए जाने की मांग कर चुकी है। राज्यपाल अनिर्णय में हैं। प्रधानमंत्री नक्सल वाद को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दे चुके हैं। गांधीवादी शांति यात्री भी असफल अभियान से लौट चुके हैं। उकसाए गए थोड़े से युवकों और बस्तर के व्यापारियों ने उनके खिलाफ पुलिस की सांठगांठ से विरोध करने की पिकनिक भी कर ली। मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की तत्काल प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई है।
बुद्धिजीवी, लेखक, कवि, कलाकार, संस्कृति कर्मी चुप हैं। कुछ निर्विकार हैं, कुछ अल्पसूचित हैं, कुछ सहमे हुए हैं, कुछ भाग्यवादी हैं, कुछ हलचल में हैं, कुछ सरकारी सूचनातंत्र पर निर्भर हैं, कुछ टी.वी. चैनलों से चिपके हुए हैं, ब्रेक होने पर इंडियन आयडल देख लेते हैं। कुछ सरकारी बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक आकाओं के महिमा मंडन में व्यस्त हैं। अफसरी बुद्धि चातुर्य के किस्से अलग गढ़े जा रहे हैं। सामचार पत्रों में खबरों के लिए जगह है, विचारों के लिए नहीं। सेक्स, दुर्घटना, डकैती, हत्या , भ्रष्टाचार, क्रिकेट, फिल्मी लटकों झटकों के तड़कों की प्रथम पृष्ठ की खबरों का मुकाबला बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों से ही होता है। वहां भी एम.डी. साहब या जी.एम. साहब सम्पादकों के ऊपर हैं। वे अधिकतर मंत्रियों और अफसरों के दीवानखानों, निजी पार्टियों और सरकारी उडऩ खटोले में व्यस्त होते हैं।
ये तस्वीर की मोटी मोटी रेखाएं हैं। बारीक अभिव्यक्तियां तो जनता को पता ही नहीं होतीं। बस्तर का क्या भविष्य है-यह बुनियादी सवाल है। नक्सल वाद नासूर नहीं नासूर का एक कारण है। वैश्विक पूंजीवाद के प्रसार के कारण बस्तर जैसे देश के सभी आदिवासी अर्थात वन संस्कृति के इलाके नक्सलियों के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं। जंगल नक्सलियों के छिपने के स्थान हैं। आदिवासी वहां सदियों से रह रहे हैं। नक्सली उनके मसीहा बनकर नहीं आए हैं। उनकी तो इतने सीधे सादे, मन- वचन-कर्म के प्रति ईमानदार आदिवासियों को पाकर लॉटरी खुल गई है। विनाश का मूल कारण तो विकास की वह थ्योरी है जो व्हाइट हाउस, वर्ल्ड बैंक या 10 डाउनिंग स्ट्रीट वगैरह से पैदा होकर नई दिल्ली की संसद के मार्फत बस्तर जैसे जंगलों तक विस्तृत हो गई है।
पिछले चालीस पचास बरस से राज्य और केद्र सरकारें आदिवासियों पर नीयतन या लापरवाही से अत्याचार कर रही हैं। उनके प्राकृतिक, संवैधानिक, जातीय और नागरिक अधिकार कम किए जा रहे हैं। कूढ़मगज सरकारी सोच ने अंगरेजों के बनाए गए जालिम कानूनों जैसे भारतीय वन अधिनियम 1927, भू अर्जन अधिनियम 1894, भारतीय सुखभोग अधिनियम, पंचायत और भू राजस्व कानून वगैरह को आदिवासी जरूरतों, माली हालत, संस्कृति आदि के अनुकूल नहीं बनाया है। अलबत्ता उनसे जंगल का परिवेश, संरक्षण, उपयोगिता आदि को कम ही किया जाता रहा। तथाकथित जातीय आरक्षण से भी आदिवासियों का एक मलाईदार तबका ही तैयार हो पाया जो राजनीति के ब्राम्हण ठाकुर मालिकों के दरबारी की भूमिका में मुस्तैद रहा। आज बाजार का आदिवासी खुद को ठगा हुआ या विस्थापित पाता है। इससे निजात के लिए टाटा, एस्सार, एन.एम.डी.सी. शराब, खनिज और जंगल के ठेकेदार या चिदंबरम योजना के अनुसार बस्तर चुने हुए पांच हजार नौजवानों को महानगरों में ट्रेनिंग के नाम पर गुम कर देना नहीं है।
बदहाल नक्सल वाद जैसे राजनीतिक आदोलन के नाम पर हत्यारों का एक गिरोह डाकुओं की तरह जंगलों में हुकूमत कर रहा है। वह बीच बीच में राज्य-व्यवस्था को चुनौती भी देता रहता है। लोकतांत्रिक राज्य की अपनी प्रतिबद्धताएं, मर्यादाएं और न्याय तंत्र होते हैं। नक्सली हिंसक पशुओं की तरह मनुष्यता का ही शिकार कर रहे हैं। इसे समर्थन कैसे दिया जा सकता है? यह एक राज्यद्रोह की चुनौती है। यह संविधान को धमकी देने का विध्वंसक ऐलान है। इसका मुकाबला किए बिना लोकतंत्र, संविधान और राज्य संस्थाएं इतिहास में अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाएंगी। जब युद्ध चल रहा हो तो संविधान जनित संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर सरकारों को बदलने का कोई सवाल नहीं है।
पुलिस तंत्र की असफलता या धीरे धीरे मिलने वाली सफलता पर विचार हो ही रहा होगा। यह वक्त सभी विचार धाराओं के सम्मिलित प्रयास से राज्य में उस वातावरण को बनाए जाने से है जिससे नक्सलवाद के नासूर को सुखाया जा सके। नक्सलवाद को वैचारिक फोकस में रखने के बदले आदिवासी विकास और संरक्षण नागरिक चिन्‍ता का विषय होना चाहिए। यह देश केवल सभ्य शहरी समाजों का नहीं है। भारत के वनवासी उतने ही संवैधानिक और नागरिक अधिकारों से निर्मित हैं जो तथाकथित कुलीन लोगों को उपलब्ध हैं। नक्सली आज निर्दोष नागरिकों के जीने के संवैधानिक अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं। यह बौद्धिक प्रतिकार का भी वक्त है। समाज कैसे निरपेक्ष रह सकता है? जो मारे जा रहे हैं, वे भी आदिवासी हैं, गरीब हैं, सिपाही हैं, अनजान देश-भाई हैं। नक्सली अब कथित अन्यायी अधिकार तंत्र से लडऩे के बाद खुद अधिकार तंत्र के रूपक बन रहे हैं।
समाज चुप क्यों है? सरकार तो समाज का प्रतिनिधित्वत करती है। उसे समाज के जीवंत समर्थन की जरूरत होगी। यह वक्त नक्सली और सरकारी हिंसा को तराजू के दो पलड़ों पर रखकर तौलने का भी नहीं है। गांधी को बार बार याद करने वाले जानते होंगे कि बापू ने जरूरत होने पर हिंसा को समाप्त करने के लिए जायज बड़ी हिंसा की पैरवी की थी। यह समय छत्तीसगढ़ के लिए सबसे बड़ी चुनौती लेकर आया है। एक दूसरे की ओर दोष की उंगली उठाए बिना नक्सल चुनौती से प्रदेश और उनके चंगुल में फंसे आदिवासियों को बचाने का यही वक्त है। पूर्व मुख्यमंत्रियों, गृहमंत्रियों, प्रभारी मंत्रियों, अधिकारियों वगैरह का अनुभव परीक्षा की घड़ी में है। वक्तव्य बहादुरों के बदले मैदानी बहादुरों की हौसला अफजाई का यही समय है। मैंने नक्सलियों और नक्सल समर्थकों की बीसियों कविताएं पढ़ी हैं। नक्सलवाद के विरोध में उतनी कविताएं नहीं। क्या नक्सली-हत्या में मारे गए सिपाही और निर्दोष नागरिक कवियों की संवेदना का विषय नहीं हैं?
एक पक्षी युगल की बहेलिए ने हत्या? क्या कर दी, भारत का पहला डाकू आदि कवि में तब्दील हो गया। बस्तर की पहाड़ी मैना भी तो राज्य पक्षी है। उसकी बहेलिए हत्या कर रहे हैं। क्या मनुष्य की मृत्यु पशु- पक्षी की मौतों से कमतर है जो उनके समर्थन में कलमें खामोश रहेंगी? पुलिस या सेना की बंदूक का भौतिक प्रदर्शन समयबद्ध ऑपरेशन है। कलम की ताकत समयातीत होती है। निर्दोष नागरिकों के शव यही सवाल हमसे पूछ रहे हैं।

I am Animesh Tiwari,son of Mr. Sanjeeva Tiwari, presenting this post. Sorry for unicode conversion and typing mistakes

आलेख व चित्र छत्‍तीसगढ़ से साभार, उपर जो चित्र है वह अस्थिकलश का नहीं, विष्‍फोट में बिखर गए मानव मांस कलश का है।

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है

कल बस्‍तर में हुए बारूदी विष्‍फोट में क्षत-विक्षत 50 मानव लाशो से टीवी के द्वारा आपका भी सामना हुआ होगा। दिन प्रतिदिन घट रही ऐसी दर्दनाक घटनाओं,  करूणा और आक्रोश के स्‍थानीय हालातों में हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में भी रहने का मन नहीं लग रहा है, कुछ दिनों के लिए विदा दोस्‍तों. .......
क्षमा करेंगें, मैं आपसे व्‍यक्तिगत तौर पर मोबाईल वार्ता आदि में व्‍यवहारिकता के कारण कुछ ना बोल पांउ किन्‍तु वर्तमान हालात में मुझे चुप रहने का मन हो रहा है।  आपमें से बहुतों की कुछ ना कुछ अपेक्षाओं को शेष छोड़कर जा रहा हूँ . ...... एक छोटे से अवसादी समय को पार करने के लिए.
छत्‍तीसगढ़ के साथियों से पुन: क्षमा सहित ................
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कविता में गहरे से डूबता उतराता हुआ -
बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |
बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !
आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब
केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।
फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।
विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

संजीव ठाकुर जी की यह कविता अजय वार्ता से साभार

कौन झूठ बोल रहा है ... ??

मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार या पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा : जलता बस्‍तर 

आई गूगल में पसंदीदा समाचारों को खंगालते हुए  जागरण  का एक समाचार नजर आया जो इस प्रकार है - माओवादियों से लोहा लेने का सिरदर्द पुलिसकर्मियों के लिए काफी नहीं है क्योंकि छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान में जुटी पुलिस को एक और मोर्चे पर जूझना पड़ता है तथा काफी समय अदालतों के चक्कर काटते गुजरता है। शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने आज कहा कि पुलिस को अक्सर विभिन्न अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। उनके खिलाफ दायर मानवाधिकार हनन के कथित मामलों से जूझना पड़ता है जिससे नक्सल प्रभावित राज्य में अभियान में लगी पुलिस को मानव संसाधनों को किसी दूसरी जगह लगाना पड़ता है।
उहापोह की स्थिति किसी और की नहीं, बल्कि खुद राज्य के पुलिस महानिदेशक विश्व रंजन की है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के माध्यम से फैलाए जा रहे दुष्प्रचार के कारण राज्य के पुलिसकर्मियों को वकीलों के साथ अधिक समय बिताना पड़ता है। पुलिस के पक्ष पर जोर देने के लिए माओवादियों के गढ़ दंतेवाड़ा कांड का उदाहरण दिया गया। जिले के पुलिस अधीक्षक अमरेश मिश्रा को दायर की गई एक जनहित याचिका के कारण अपना आधा समय वकीलों के साथ दिल्ली के चक्कर लगाने में बिताना पड़ता है। मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने यह याचिका उच्चतम न्यायालय में दाखिल की। उनका आरोप है कि फर्जी मुठभेड़ों में 13 लोगों की हत्या कर दी गई। रंजन ने कहा कि सचाई यह है कि 13 लोग जीवित हैं और उनके बयान दिल्ली की एक अदालत में दर्ज कराए गए हैं। उन्होंने प्रेस ट्रस्ट से कहा, ''इन आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मेरे पुलिस अधीक्षक को वकीलों को सूचना देने के लिए दिल्ली के चक्कर लगाने पड़ते हैं।''
इसके पूर्व छत्‍तीसगढ़ हाईकोर्ट में प्रस्‍तुत फर्जी याचिकाओं के संबंध में भी कुछ इसी प्रकार की जानकारी पिछले दिनों समाचार पत्रों में पढने को मिली थी जिसको हमने यहां प्रस्‍तुत किया था। छत्‍तीसगढ़ में व्‍याप्‍त अशांति के नेपथ्‍य में इन समाचारों व विरोधाभाषी बयानों की सत्‍यता में जनता उलझी रहती है और न्‍यायालयों में पेंडेंसी के चलते सुनवाई के लिए डेट पे डेट पड़ते रहते हैं. लंबित प्रकरणों को आधार बनाकर समाचारों को अपने अपने हित के लिए भुनाया जाता है और बौद्धिकता को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है।

माओ के पोतो, तुम कायर-बटमार हो... : दीपक शर्मा

पिछले दिनों बस्तर के चिंतलनार में हुई भयानक घटना की खबर इंटरनेट अखबार में पढ़ी तब से अब तक रह-रह यह विचार दिल को कुरेदते हैं कि जिन परिजनों को अपने प्रिय को खोने का दुख हुआ होगा उन पर क्या बीत रही होगी। उनके आंखों के आंसू सूखेंगे या नहीं। वस्तुत: यह घटना सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा करती है कि नक्सलवाद नाम के इस उपद्रव को क्या आंदोलन या क्रांति मान लिया जाए? और इनके तथाकथित वैचारिक दलालों से भी ये जानने का समय है कि क्या आप इस वीभत्स कायराना हरकत पर कुछ कहेंगे या सिर्फ मौन हो कर इंतजार करेंगे कि किसी तरह फिर सत्ता की कोई गलती हाथ लग जाए जिस पर हाईकोर्ट तक डंका बजाया जाए। 
यह प्रकृति का नियम है कि आप जिससे लड़ते है, धीरे-धीरे आप उसी तरह हो जाते है इसलिए अगर मुकाबला बटमारों और कायर-कपटी लोगों से हो तो बगैर छल-कपट आप उससे जीत नहीं सकते। इतनी भारी संख्या में जवान इसलिए शहीद हुए क्योकि वो लड़ाई संवैधानिक तरीके से लड़ रहे है, कोई बेकसूर न मारा जाए इस बात का ध्यान रखकर नीतियां बनाई गई हैं, इसी का फायदा खुद को क्रांतिकारी कहने वाले ये बटमार उठा रहे है, जिन्होने बंदूक को जैसे आखिरी शस्त्र मान लिया हो। इन्हे यह जरूर याद रहे कि लोकतंत्र लाख लचीला हो मगर उसके लचीलेपन की भी एक सीमा है, इसलिए जिस दिन यह सीमा टूटेगी और हवाई-हमले जैसे अनेक तरीके उपयोग में लाए जाएंगे तब किसी पत्थर या झाड़ी के पीछे ये कथित क्रांतिकारी छुपते और अपनी जान बचाते नजर आएंगे। 
ये कैसी क्रांति है, जिसे लाने के लिए ये अराजक उन्मादी मासूम बच्चो का गला रेत रहे हैं। जिन बच्चो को स्कूल में बारहखड़ी पढऩा चाहिए वो एंबुश बिछा रहे है। जिस जवान के कंधों पर घर और समाज की जिम्मेदारी होनी चाहिए वो कंधे बंदूक लिए घूम रहे हैं। लोगों के हिस्से से उनका उजाला छीना जा रहा है और ये सारे काम कनपटी पर बंदूक रखकर कराए जा रहे हैं। जवानों के खून से बस्तर को लाल किया जा रहा है। क्या ये जवान उसी आम-जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते जिनके हक कि लड़ाई का कथित दम ये कायर भरते है। क्या जंगल के अंदर और जंगल के बाहर रहने वाले आम-जनता में भी इन फिरौतीखोरों को फर्क दिखता है? 
76 जवानों की शहादत, सचमुच दिल को दुखाने वाली है...मगर यह नक्सलियों की वीरता का सबूत नहीं है, यह कोई साहस नहीं है, यह सिर्फ मुंह बिचकाने वाली बात है। मै यहां तक कहूंगा कि ये कायर है और इनकी कायरता का सबूत है इनके कंधों पर लटकी बंदूक, इन्हे पता है कि इनकी सारी तानाशाही सिर्फ और सिर्फ बंदूक के बल पर चल सकती है मगर, इन्हे शायद पता नहीं इसी बंदूक की दम पर गरजने वाले लिट्टे का इसी बंदूक ने क्या हाल किया। जो लिट्टे का अतीत है वही इनका भविष्य है। 
लोकतंत्र  का लचीलापन इसलिए होना चाहिए कि कोई बेगुनाह अन्याय का शिकार न हो मगर, जब इसी लचीलेपन का कुछ मक्कार फ़ायदा उठाने लगे तब मेरा मानना है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए अगर तानाशाह भी होना पड़े और इन जैसे सिरफिरों के सफाए के लिए कड़े कदम भी उठाए जाने से परहेज नहीं किया जाना चाहिए। लोकतंत्र के वो सारे हिस्से जो उसकी विशेषता हैं उसको उसकी कमजोरी बनने से रोकना लोकतंत्र को बचाये रखने के लिए अत्यंत  आवश्यक दिखता है। खुद को क्रांतिकारी कहने वाले लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि क्रांति व्यवस्था बदलने का नाम है और यह विशुद्ध रूप से उसे बदलने के लिए अपनाए गए तरीकों पर निर्भर करती है। आज आप बंदूक और संगठन के दम पर सत्ता और ताकत अपने हाथ मे लेंगे, कल कोई दूजा प्यादा बड़ा संगठन और बंदूक लेकर आपको बाहर फेंक देगा और अंततोगत्वा हर चीज का फैसला वहा सिर्फ बंदूक से होगा। 
इन तथाकथित क्रांतिकारियों का यह समाज कितना वीभत्स हो सकता है इसकी कल्पना तक असंभव सी दिखती है। इसलिए यह आवश्यक है लोकतंत्र खुद बंदूक उठा ले और बंदूक से दुनिया बदलने वालों को यह दिखा दे कि बंदूक के बल पर न कभी कुछ बदला है न ही कुछ बदलेगा। किसी हत्यारे को लोकतंत्र यह छूट नहीं दे सकता कि जाइए हमारा भरोसा तो बंदूक में नहीं है इसलिए आप खुलेआम लोगों का गला काटते फिऱें। मेरी पूरी सिफारिश है कि लोकतंत्र को भी तलवार चलाना आना चाहिए, जरूरी नहीं कि इसका उपयोग कर किसी पर आक्रमण करना है मगर, इसलिए जरुरी है कि जब कोई सिरफिरा तलवार लेकर आपको चुनौती दे तब लोकतंत्र और निर्दोष जनता की रक्षा के लिए आप इसका उपयोग करने में समर्थ हों । 
माओ और लेनिन का दम भरने वाले उनके पोतों को ये पता होना चाहिए कि माओ और लेनिन के अच्छे होने से इनके अच्छे और बुरे होने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तुम्हारे अच्छे अतीत से तुम्हारा कलंकित वर्तमान नहीं धुलता और वर्तमान चीख- चीख कर यह कह रहा है कि तुम एक कायर बटमारों का संगठन हो जो फिरौती खाने और लोगों के खून से होली खेलने का आदी हो गया है। 
नक्सलवाद जैसी विकराल और जटिल समस्या पर कांग्रेस की राजनीतिक कबड्डी अत्यंत निराश करने वाली है। नेता देश के सबसे मौकापरस्त लोग होते है यह बात इन्होने कल उपद्रव करके सिद्ध किया। आज नौटंकी करने वाली कांग्रेस को यह याद नहीं आता कि इस पार्टी ने सलवा- जुडूम जैसे मुद्दे पर तटस्थ रहने का निर्णय लिया था (?) तब ये चिल्लपों सुनाई नहीं देती थी। दर-असल एक कुर्सी बचाने में लगा है तो दूजा कुर्सी हथियाने में। और इस बीच जवान-निरीह आदिवासी पिसे जा रहे हैं। इनका विरोध बस इतना है कि उसे कुर्सी से उतारो और हमें कुर्सी में बिठा दो। आज लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तंत्र बनाया तो जनता के इस्तेमाल के लिए गया मगर, आज जनता ही इस तंत्र के हाथों इस्तेमाल हो रही है। ऐसी ही खामियों के चलते नक्सलवाद जैसा अराजक उपद्रव यहां अपनी जगह बना पाता है। इसलिए एक तरफ़ तो यह जरूरी है कि नक्सलवाद जैसे अराजक उपद्रव को हथियार के दम पर ही सही मगर, माकूल जवाब दिया जाए और उन्हे याद दिलाया जाए कि लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं कि कोई उन्मादी इसे बंदूक कि नोंक पर खत्म कर देगा। साथ ही दूसरी तरफ लोकतंत्र की सारी खामियों को चुन-चुन कर ठीक किया जाए और जरूरत पड़े तो संविधान के सारे पन्ने खंगाले जाएं और तंत्र के ढांचे मसलन न्याय, मीडिया इत्यादि को समय की मांग के अनुरूप सुधारा जाए। जनता भी चौकन्नी होकर यह देखे कि नक्सलवाद जैसे मुद्दे पर राजनीति नहीं हो और अगर कोई ऐसा करे तो जनता को अपने सारे पुराने जूते इन कुर्सी के जोंकों पर अर्पण करने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए। 
इस भयानक घटना में जिन्होने अपने परिजन खोए उनका दुख मेरे ये शब्द दूर नहीं कर सकते फिर भी शब्द के सहारे वह रखने कि कोशिश कर रहा हूं जो शायद उनको दिलासा दे। प्रेम शब्द नहीं है वह शब्द से कहीं आगे की बात है मगर अभिव्यक्ति शब्द से ही होती है। उन अमर जवानों को विनम्र श्रद्धांजलि। इस आशा के साथ कि अपने हक के पैसे के लिए कम से कम इन जवानों के परिवार वालों को घूस ना देनी पड़े?
संयुक्त अरब अमीरात
दीपक शर्मा छत्तीसगढ के राजिम नगर के पास एक गांव के मूल निवासी है वर्तमान मे संयुक्त अरब अमीरात के सीमेंट प्लांट मे कार्यरत है. इनका "विप्लव" नाम से एक ब्लाग था जिसे इन्होने डिलीट कर दिया. दीपक भाई बहुसक्रिय हिन्दी ब्लागर थे. दीपक भाई आजकल छत्तीसगढ के मुद्दो पर पैनी नजर रखते है और क्षेत्रीय समाचार पत्रो के सम्पादकीय पन्ने पर इनके विचार आलेख प्रमुखता से प्रकाशित होते है. मेरे जैसे छत्तीसगढ के अतिसक्रिय हिन्दी ब्लागरो को दीपक भाई से सीख लेनी चाहिये. ..... संजीव तिवारी

क्या इंटरनेट परोस रहा है नक्सल विचार धारा ??

गूगल सर्च में यदि आप अंग्रेजी एवं हिन्दी में ‘नक्सल’ शब्द को खोंजें तो लगभग पांच लाख पेज की उपलब्धता नजर आती है. इन पांच लाख पेजों पर सैकडों पेजों के लिखित दस्तावेज, चित्र व फिल्मो के क्लिपिंग्स उपलब्ध हैं जिनमें से कईयों मे, लाल गलियारे को स्थापित करने वाली विचारधारा को हवा दी गई है. इन पेजों में घृणा का बीज बोंते लोग भी हैं तो मावोवादी विचारधारा के विरूद्ध आवाज उठाने वाले लोग भी हैं जो टिमटिमाते दिये के सहारे इस हिंसक विचारधारा के अंधेरे को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं.

सैकडों व हजारों की संख्या में प्रतिदिन क्लिक होने वाले. खूब पढे जाने वाले इन ब्लागों में शहीद कामरेडों के चित्रों, छत्तीसगढ में हुए तथाकथित पुलिस बर्बरता के किस्से, फर्जी मुठभेडों व शोषण के शब्द चित्रों, बलत्कार के वाकयों को बयां करते लेखों व विचारों की अधिकता है. इसके साथ ही मानवतावा‍दी विचारधारा वाले व हिंसा से विरत रहने के अपील करते लेखों व नक्सल समस्या पर सार्थक विमर्श करते ब्लागों की भी कतारें  हैं. इसके अतिरिक्त नेट में फैले तथाकथित मानवतावादी, खालिस मावोवादी, नक्सलवादी व जनवादियों एवं बस्तर, नक्सल व छत्तीसगढ के मुद्दों पर बहस करने वालों या इन पर कलम चलाने वालों की भी लम्बी फेहरिश्त है. समाचार सूचना के अन्य माध्यम व पिंट मीडिया को जिसके लिये सेंसर, नैतिक कर्तव्य व सरकारी मंशा के साथ ही बहुसंख्यक जनता का ध्यान रखते हुए लेखन व प्रकाशन करना पडता है. वहीं इन पोर्टलों व ब्लागों में सीधे जमीन से उपजे समाचार व आन्दोलित कर देने वाले विचारों का पुलिंदा वीडियों, आडियो व फोटो सहित नेट में प्रतिदिन प्रकाशित हो रहे हैं. पुलिस संभावित आरोपियों के घरों से नक्सल साहित्य के नाम पर तलासी में सिर खपाती रही है और यहां ये हाईटेक लोग अपने दस्तावेज आनलाईन कर मुफ्त में हर किसी के लिए उपलब्ध करा रहे हैं. खून को खौलाने के हर हथकंडे अपनाए जा रहे हैं और वाद व विचारधारा के शब्दजाल बुनकर जनमानस को अपने पक्ष में करने का चक्र-कुचक्र जारी है.

वर्तमान में छत्तीसगढ व नक्सली मुद्दों पर ज्यादातर अंग्रेजी में पोर्टल व ब्लाग उपलब्ध हैं. जिनमें ब्लागों की संख्या अधिक है. विश्व सुलभ भाषा अंग्रेजी में होने के कारण बस्तर या छत्तीसगढ के नक्सल व सलवा जुडूम के संबंध में जो जानकारी यहां है वह संपूर्ण विश्व के पाठकों तक उसी रुप मे सर्वसुलभ हो जा रही है. यह भी हो सकता है कि ये ब्लाग के लेखक छत्तीसगढ में ही बैठकर अपना विरोध और अपने चिंतन को तथ्यात्मक रूप से सप्रमाण (ऐसा उनका मानना है) वहां परोस रहे हों. जैसा वहां प्रस्तुत हो रहा है वैसा ही विश्व बौद्धिक समाज उसे ग्रहण कर रहा है और छत्तीसगढ शासन व पुलिस के विरूद्ध मानसिकता तैयार हो रही है. इंटरनेट में फैलाये जा रहे इस तथाकथित वैचारिक क्रांति की संवेदनशीलता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि विगत दिनों पुलिस प्रमुख व नक्सली प्रवक्ता गुडसा उसेडी एवं सुभ्रांशु चौधरी के बीच जो विमर्श का दौर छत्तीसगढ समाचार पत्र में प्रकाशित हो रहे थे उसमें पुलिस प्रमुख विश्वरंजन जी नें लिखा था कि उन्हे इंटरनेट में हो रहे छत्तीसगढ शासन व पुलिस विरोधी हलचलों की जानकारी गूगल रीडर व एलर्ट से त्वरित रूप से हो जाती है. यानी डीजीपी स्वयं नक्सल विचारधारा के नेट दस्तक के प्रति संवेदनशील हैं. और ... नेट में ऐसे दस्तक प्रतिदिन हो रहे हैं.

सलवा जुडूम,डॉ.बिनायक सेन, अजय जीटी का मसला संपूर्ण विश्व में किस कदर छाया इसका उदाहरण बर्कले मे सामने आया. अमेरिका के सर्वाधिक प्रतिष्ठित बर्कले विश्वविद्यालय में आयोजित एक सम्मेलन मे  संपूर्ण विश्व के चिंतको के सामने छत्तीसगढ के डीजीपी विश्वरंजन जी के विरूद्ध वहां के छात्रो ने ‘विश्वरंजन वापस जावो’ जैसे नारे लगाए और तख्तियां टांगनें पर उतारू हो गए. यह सब पूर्वनियोजित तरीके से नियमित रूप से इंटरनेट के माध्यम से छत्तीसगढ विरोधी खबरें विश्व के कोने कोने में फैलाये जाने से हुआ. बर्कले विश्वविद्यालय कैलीफोर्नियां में दक्षिण एशियाई संगठन के छात्र, प्रिस्टन, हार्वड, येल और अन्य जानेमाने विश्वविद्यालयों के छात्र व शिक्षक एक सुर में छत्तीसगढ शासन व पुलिस के विरोध में खडे हो गए. हालांकि छत्तीसगढ से उस कार्यक्रम में शिरकत करने वाले डीजीपी एवं छत्तीसगढ के संपादक सुनील कुमार जी नें दमदारी से अपना पक्ष रखा था. विदित हो कि संपूर्ण विश्व में इस बडे आयोजन का हो – हल्ला हुआ था, विश्व के प्रबुद्ध समाज इससे वाकिफ हुआ था या इससे वाकिफ कराया गया था. विदेशों में खासकर इंडोनेशिया के महीदी, सीयरालियोन के कामजोर, सूडान के जंजावीद, रवांडा, चाड, आफ्रीका व विश्व के तमाम जन मिलिशियाओं के चिंतकों व शुभचिंतकों तक बस्तर की संवेदनाओं को बांटने एवं उनके समर्थकों/विचारकों को बस्तर के विषय में गंभीर होने एवं अपना समर्थक बनाने में कारगर माध्यम बनने के लिए इंटरनेट बेताब है, यह बर्कले में स्पष्ट हो गया.

इन परिस्थितियो मे नेट मे सक्रिय छत्तीसगढ के हितचिंतको का चिंतन आवश्यक है. क्योकि वर्तमान मावोवादी विचारधारा किसी भौतिक बारी बखरी से सुविधाविहीन नेतृत्व के द्वारा आरंभ होकर अब पूर्णतया सुविधा सम्पन्न एवं तकनीकि सूचना तंत्रों के बेहतर जानकार लोगों के नेतृत्व में फल-फूल रही है. अब नक्सल विचारधारा के पोषक इंटरनेट के द्वारा संपूर्ण विश्व में अपने वाद को उचित ठहराने के उद्देश्य से सक्रिय हैं. यह विश्वव्यापी त्वरित प्रभावी सूचना तकनीकि बहुत ही सहज व सरल है इस कारण उनकी बातों को स्वीकारने वाले एवं उनके पक्षधर पाठकों की संख्या में दिनो दिन इजाफा हो रहा है. वे अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए बस्तर एवं देश के अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्र की तस्वीर जिस रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, उनके पाठक उसी रूप में उसे स्वीकार कर रहे हैं और तथाकथित क्रांति के इस यज्ञ में अपने अपने सामर्थनुसार हबि डालने को उत्सुक नजर आ रहे हैं. दूसरी तरफ इस बात की सच्चाई उजागर करने वालों की जमात इंटरनेट की दुनिंया में कम है. यदि है भी तो वे स्पष्ट रूप से सरकार या पुलिस से प्रायोजित प्रतीत हो रहे हैं जिसके कारण उनकी विश्वसनीयता सामान्य पाठक के लिए संदिग्ध है.

पिछले दिनों भिलाई के आसपास छुपाये गए हथियारों के जखीरों के मिलने पर पूर्व मंत्री भूपेश बघेल जी द्वारा शासन व पुलिस की भर्त्सना एवं न‍क्सलियों के विरूद्ध वैचारिक क्रांति का जो शंखनाद किया था उस वक्त समाचार पत्रों नें हथियारों के इस खेल को ‘नक्सलियों के शहरी नेटवर्क’ का नाम दिया था. डीजीपी विश्वरंजन जी नें भी पिछले दिनों भोपाल में कहा था कि भारत में कुल हिंसक वारदातों में से 95 प्रतिशत हिस्सा मावोवादी हिंसा है. इसके साथ ही उन्होनें यह भी कहा कि नक्सलियों के दो तरह के कार्यकर्ता होते हैं एक पेशेवर और दूसरे जो अंशकालिक तौर पर और कोई दूसरा काम करते हुए उनका शहरी नेटवर्क. मेरी समझ के अनुसार यह शहरी नेटवर्क संचार तंत्र का भरपूर उपयोग करता है और सहीं मायनों में यही धुर जंगल में कैम्प कर रहे लोगों तक विचारों को थोपता है. व्यापक रूप से इन्ही शहरी नेटवर्कों का माइंड वाश किया जाना आवश्यक है. क्योकि शहरी नेटवर्क के बिना नक्सली पंगु हो जावेंगें. शायद इसे ही विगत दिनों विचारकों के द्वारा ‘स्‍ट्रेटेजिक हैमलेटिंग’ कहा-समझा गया. मेरा विचार है कि इन शहरी नेटवर्कों के द्वारा जिस प्रचुरता से इंटरनेट में नक्सल व मावो समर्थित लेख व सलवा जुडूम के विरोध में लेख परोसे जा रहे हैं उसी प्रचुरता से उन विचारधाराओं के समीक्षात्मक व वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करते हुए विचार व समाचार नेट में भी उपलब्ध हों. ताकि दुनिया में छत्तीसगढ की सही तस्वीर प्रस्तुत हो सके.

संजीव तिवारी

विश्वरंजन या तो मारे जाएंगे या जेल जाएंगे - सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख जनहित वकील प्रशांत भूषण ने आक्रोश में कहा


विशेष संवाददाता, रायपुर, 11 जनवरी (छत्तीसगढ़)। प्रसिद्ध सुप्रीम कोर्ट वकील और अनेक जनवादी संगठनों की ओर से विभिन्न मामलों में पैरवी करने वाले प्रशांत भूषण छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन पर जमकर बरसे। उन्होने आपरेशन ग्रीन हंट को तत्काल रोकने की मांग करते हुए कहा कि जिस हिसाब से छत्तीसगढ़ पुलिस निर्दोष आदिवासियों का खून बहा रही है उसके चलते जल्द ही या तो विश्वरंजन गोली से मार दिए जाएंगे अथवा वे जेल के भीतर होंगे।

उन्होने चेतावनी दी कि ग्रीन हंट से सिविल वार का अंदेशा है और यह गृह युद्ध छत्तीसगढ़ के शहरी क्षेत्रों को भी अपनी लपेट में ले लेगा। उन्होने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में एमनेस्टी इंटरनेशनल भेजे जाने की मांग भी की। उन्होने विश्वरंजन को छद्म साहित्यकार निरूपित करते हुए छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की इस बात को लेकर आलोचना की कि वे विश्वरंजन को साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित कर उन्हे सिर पर उठाए घूम रहे हैं।

एक कार्यक्रम के सिलसिले में बिलासपुर आए प्रशांत भूषण कल प्रसिद्ध वकील कनक तिवारी के कार्यालय में शहर के कुछ चुनिंदा पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के साथ बातचीत कर रहे थे। उन्होने इस बात को मानने से इंकार कर दिया कि नक्सलवादियों द्वारा भी निर्दोष आदिवासियों के कत्ल किए जा रहे हैं। उन्होने कहा कि हो सकता है नक्सलियों की ओर से कुछ लोग मारे गए हों परंतु इसका अनुपात एक के मुकाबले सौ ही है। यानि अगर पुलिस वाले सौ बेगुनाहों को मार रहे हैं तो एकाध आदिवासी नक्सलियों की ओर से मारा जा रहा होगा। हालांकि उन्होने कहा कि इस बात की उन्हे ज्यादा जानकारी नहीं है कि नक्सली क्या कर रहे हैं।

उन्होने कहा कि ग्रीन हंट के नाम पर विश्वरंजन जंगलों में जो कर रहे हैं वह उन्हे 'सबसे बड़ा अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त है और उचित समय पर वे जेल जाएंगे। उन्होने बताया कि इस ऑपरेशन से नक्सलियों की तादाद बढ़ेगी। जिन निर्दोषों को सताया जा रहा है उनमें से कम से कम एक फीसदी तो नए नक्सली बनेंगे।

प्रशांत भूषण का मानना है कि ग्रीन हंट का असर कम से कम दो लाख आदिवासियों पर होगा पर इनमें से दो हजार लोग निश्चित ही नक्सली बनेंगे। इस तरह डीजीपी नए नक्सली पैदा कर रहे हैं और माओवादियों का कैडर विस्तारित कर रहे हैं। उन्होने चेतावनी दी कि ग्रीन हंट के खिलाफ इतना भीषण रोष है कि यह गृह युद्ध में तब्दील हो जाएगा। उन्होने चेतावनी दी कि शहर वाले ये न समझें कि वे इस युद्ध से अछूते रह जाएंगे। जंगलों से निकलकर नक्सली शहरी इलाकों में भी कार्रवाई करेंगे।

प्रशांत भूषण ने इस बात पर रोष जताया कि आदिवासियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले और मानवाधिकार की चिंता करने वाले हर किसी को विश्वरंजन नक्सली बताने पर तुले हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं। डॉ. बिनायक सेन, हिमांशु आदि इसी नीति के शिकार हो रहे हैं। उन्होने बताया कि इन तमाम परिस्थितियों पर विचार-विमर्श करने के लिए दिल्ली में एक बैठक इसी शनिवार को बुलाई गई है जिसमें अनेक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी, मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ता आदि शामिल होंगे।

यह पूछे जाने पर कि क्या नक्सलियों को भी बातचीत के लिए आगे नहीं आना चाहिए, उन्होने कहा कि आखिर वे (नक्सली) किस विषय पर बातचीत करेंगे। उनका तो लोकतंत्र में विश्वास ही नहीं है और वे इस राज्य की सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। प्रशांत भूषण ने तत्काल राज्य की ओर से युद्ध विराम की मांग करते हुए कहा कि इसके साथ ही तीन काम किए जाने अत्यंत आवश्यक हैं, वे हैं-भूमि सुधार लागू करना, खदान माफिया खत्म करना और एसईजेड के नाम पर होने वाले गैर कानूनी भूमि अधिग्रहण व निजीकरण को रोकना।

प्रशांत भूषण का दावा है कि इतना भी अगर किया जाता है तो माओवादियों की गतिविधियां काफी सीमित हो जाएंगी। जब उनके ध्यान में लाया गया कि छत्तीसगढ़ में एसईजेड जैसी कोई चीज ही नहीं है और निजीकरण भी माओवादियों की गतिविधियों के मुकाबले हाल ही में लागू हुआ है तो उन्होने कहा कि किसी भी रूप में जमीनों का हो रहा अधिग्रहण रोका जाना चाहिए क्योकि इससे आदिवासियों में व्यापक असंतोष फैल रहा है और उनके जीवन-यापन के साधन छिन रहे हैं।

उन्होने पूरे लाल गलियारे (माओवादियों के प्रभाव वाला पट्टा) में एसईजेड के कारण नक्सली गतिविधियों के बढऩे की बात कही। उन्होने कहा कि एसईजेड दरअसल पैसे वालों के लिए अनैतिक और गैर सांवैधानिक तरीके से जमीन हथियाने की सरकारी चाल है जिसमें जनता का कोई फायदा नहीं है। यहां बड़े-बड़े व्यवसायिक प्रतिष्ठान आएंगे और उसके बाद आदिवासियों और ग्रामीणो के लिए कोई भी विकल्प नहीं बचेगा। वे या तो अपनी जमीनें छोडक़र भाग जाएंगे अथवा नक्सली बनकर लड़ते रहेंगे। माओवादियों के इलाकों में खदानों के निजीकरण पर तत्काल रोक की मांग करते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि इससे सरकार को कोई विशेष फायदा नहीं हो रहा है।

कर्नाटक में सरकार को लौह अयस्क में प्रति टन रायल्टी 27 रुपए मिलती है जबकि उसे उद्योगपति छह सौ रुपए प्रति टन की दर से खुले बाजार में बेचते हैं। उड़ीसा में स्टरलाईट इंडस्ट्रीज ने कई लाख टन बाक्साइट भंडार वाले नियामगिरी खदानों पर गैर कानूनी तरीके से कब्जा कर लिया है जिससे वहां के आदिवासियों में व्यापक असंतोष फैला हुआ है। उन्होने आरोप लगाया कि इसमें गृह मंत्री पी. चिदंबरम का भी शेयर है।

प्रशांत भूषण के अनुसार यह खदान माफिया लगातार फल-फूल रहा है और लगभग सभी राजनैतिक दलों की इसमें हिस्सेदारी है। इसीलिए सरकार ने उनसे जमीनें अधिग्रहित कर इन कंपनियों को दे दी है। इसी के चलते माओवादियों का प्रभाव क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है तथा कोई भी सरकार उन पर प्रभावशाली ढंग से अंकुश नहीं कर पा रही है। इसका कारण उन्होने यह भी बताया कि पुलिस का मनोबल अत्यंत गिरा हुआ है जबकि माओवादी कई वर्षों से इतने बड़े क्षेत्र में बढ़ते मनोबल के साथ संघर्षरत है।

हालांकि प्रशांत भूषण ने यह भी माना कि नक्सलियों का कोई संगठित नेतृत्व नहीं है और जो बुद्धिजीवी व सामाजिक कार्यकर्ता उनके बीच काम करने जा रहे हैं वे भी उन्हे प्रभावित करने की स्थिति में नहीं है और न ही किसी बातचीत में उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। उन्होने कहा कि सबसे पहले आदिवासियों को बराबरी के स्तर पर लाया जाए तभी कोई बातचीत अर्थर्पूण रहेगी। गैर बराबर पक्षों के बीच कोई बातचीत नहीं हो सकती। इस दिशा में उन्होने राज्य और लोगों के सहयोग को भी आवश्यक बताया।

प्रशांत भूषण ने यह मानने से इंकार किया कि नक्सलवादी भी निर्दोष आदिवासियों का बड़े पैमाने पर कत्ल कर रहे हैं। उनका दावा था कि जिस पैमाने पर पुलिस आदिवासियों को मार रही है उसके मुकाबले नक्सलियों द्वारा निर्दोषों को काफी कम तादाद में मारा जा रहा है। उन्होने कहा कि हो सकता है कुछ मुखबिर आदि उनके हाथों मारे गए हों। लेकिन इस बारे में उन्हे ज्यादा जानकारी न होने से उन्होने किसी तरह की टिप्पणी करने से इंकार किया। उन्होने मांग की कि इस क्षेत्र में एमनेस्टी इंटरनेशनल या राष्ट्रसंघ द्वारा नियुक्त कोई एजेंसी या व्यक्तियों को भेजा जाना चाहिए जो वहां जाकर वस्तुस्थिति की निष्पक्ष जांच करे और निदान सुझाए।

सलवा जुडूम को पूरी तरह से गैर कानूनी और असंवैधानिक सशस्त्र बल बताते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि अगर यहां हिंसा को रोकना है तो सलवा जुडूम को तत्काल खत्म करना होगा। इन क्षेत्रों के चुनावों को भी उन्होने छद्म बताया।

स्कूल और अन्य विकास कार्यों में नक्सलियों द्वारा अवरोध पैदा करने और उन पर हमले किए जाने की ओर ध्यान दिलाने पर प्रशांत भूषण ने कहा कि नक्सली उन्ही स्कूलों को अपना निशाना बना रहे हैं जहां पर कोई पढ़ाई नहीं होती और उनमें माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे सशस्त्र बल ने अपना ठिकाना बना रखा है। उन्होने कहा कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योकि वे तो पुलिस वालों के खिलाफ युद्ध कर रहे हैं सो उन पर वे हमले तो करेंगे ही। उन्होने यह भी माना कि मुख्य सडक़ों से ज्यादा अंदर विकास कार्य होने संभव ही नहीं है। सरकारी एजेंसियां और मुलाजिम उनमें घुस ही नहीं सकते क्योकि वहां माओवादियों ने बारूदी सुरंगे बिछा रखी हैं।

छत्तीसगढ़ के मीडिया के कामकाज पर भी उन्होने असंतोष जताते हुए कहा कि राष्ट्रीय मीडिया और स्थानीय समाचार पत्रो में उन्हे एकदम अलग तरह की रिपोर्टिंग इस विषय पर देखने को मिली है। राष्ट्रीय मीडिया ज्यादा सही और जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग कर रहा है जबकि यहां का मीडिया पुलिस के खौफ से अथवा किसी अन्य प्रभाव से पुलिस के पक्ष में लिख रहा है। प्रशांत भूषण ने बताया कि इन स्थितियों को देखते हुए कहा कि यहां के मीडिया पर बहुत विश्वास नहीं किया जा सकता और वे कोई मानवाधिकार आयोग अथवा उच्चा स्तरीय समिति लाने की कोशिश करेंगे ताकि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जो हो रहा है उसकी वस्तुस्थिति का पता चल सके।

न्यायपालिका को पुलिस विभाग के बाद दूसरा सबसे बड़ा भ्रष्ट विभाग बताते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि यह कोई सोच ही नहीं सत्ता कि सुप्रीम कोर्ट जैसे प्रतिष्ठान में भी पचास फीसदी से ज्यादा जस्टिस भ्रष्ट हैं। उन्होने कहा कि अगर कोई यह कहता है कि ज्यादा भ्रष्टाचार नीचे स्तर पर है और ऊपर के स्तर पर कम तो ऊपर की कोर्ट निचली कोर्ट के भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कोई कदम क्यो नहीं उठाती? उन्होने कहा कि गाजियाबाद प्रकरण से तो यह स्पष्ट हो गया है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे चलता है तथा उस स्तर पर भ्रष्टाचार की राशि का एक बडा हिस्सा उपर तक जाता है।

मेरी मौत कैसे होगी, यह प्रशांत भूषण तय नहीं करेंगे : विश्वरंजन


प्रशांत भूषण के इस बयान पर कि छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन या तो गोली से उड़ा दिए जाएंगे अथवा जेल में होंगे, खुद श्री विश्वरंजन का कहना है कि आदमी की मौत सिर्फ एक बार होती है और वे इस बात की परवाह नहीं करते कि उनका सामना मौत से कैसे होगी। उन्होने पूछा कि आखिर प्रशांत भूषण यह तय करने वाले कौन होते हैं कि उन्हे नक्सली गोली मारेंगे या नहीं?


प्रशांत भूषण के बयान को पूरी तरह एकतरफा बताते हुए विश्वरंजन ने कहा कि छत्तीसगढ़ के बारे में उनके पास पर्याप्त जानकारी नहीं है। पुराने बस्तर का कुल क्षेत्रफल करीब 40 हजार वर्ग किलोमीटर है जिसमें से बामुश्किल दो सौ वर्ग किलोमीटर पर खनिज पट्टे हैं और यहां निजी औद्योगिक घरानों को खदाने देने के काफी पहले से माओवाद पनप चुका है।

बस्तर में तो 1980 से माओवादी निर्दोषों का खून बहा रहे हैं, विकास रोक रहे हैं तथा स्कूल-सडक़ों को ध्वस्त कर रहे हैं। प्रशांत भूषण को चाहिए कि वे छत्तीसगढ़ खनिज विभाग से जानकारी लेकर अपने बयान को खुद ही सच्चाई की कसौटी पर कसें। निजीकरण और एसईजेड प्रदेश के लिए माओवाद के इतिहास के मुकाबले काफी नए हैं।

विश्वरंजन का कहना है कि ग्रीन हंट ऑपरेशन को रोकने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होने कहा कि ग्रीन हंट के अंतर्गत सिर्फ नक्सली ही निशाने पर हैं और इसके साथ ही आदिवासियों के बीच ग्रीन हंट ऑपरेशन इस बात का जनजागरण कर रहा है कि पुलिस उनकी रक्षा में तत्पर है तथा वे अपनी सुरक्षा संबंधी समस्याएं लेकर पुलिस के पास आएं। पुलिस उनकी पूरी हिफाजत करेगी। उन्हे हमसे डरने की जरूरत नहीं है।

डीजीपी ने दावा किया कि इसका व्यापक असर हुआ है और आदिवासी खुद को पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं तथा पुलिस को स्वस्फूर्त सहयोग दे रहे हैं। उन्होने प्रशांत भूषण के इस बयान को भी गलत बताया कि पुलिस के हाथों सौ निर्दोषों की हत्या के मुकाबले नक्सली एक बेगुनाह आदिवासी को मार रहे हैं। उन्होने कहा कि पिछले कई वर्षों से नक्सली निर्दोष आदिवासियों के खून-खराबे का घिनौना खेल खेलते आ रहे हैं। हाल ही में एक प्रदर्शनी लगाई गई थी जिसमें प्रदर्शित चित्रों में स्पष्ट दिखाई देता है कि नक्सली किस हद तक हिंसा का इस्तेमाल कर रहे हैं और निर्दोष आदिवासियों और नागरिकों के प्राण ले रहे हैं।

प्रशांत भूषण द्वारा एमनेस्टी इंटरनेशनल की ओर से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किए जाने के प्रस्ताव पर श्री विश्वरंजन ने कहा कि कोई भी व्यक्ति या एजेंसी आकर देख सकती है कि इन क्षेत्रों में क्या हो रहा है। ऐसे किसी भी व्यक्ति या एजेंसी का स्वागत है।

पुलिस महानिदेशक का कहना है कि अगर बातचीत के लिए नक्सलियों के पास कोई मुद्दा ही नहीं है तो इतनी लंबी लड़ाई आखिर वे किस आधार पर लड़ रहे हैं यह उनके बीच जाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं,
मानवाधिकार संगठनों और उनके प्रतिनिधियों के सोचने की बात है। इसी से साबित होता है कि वे हिंसा में विश्वास रखते हैं और शांति प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे।

प्रशांत भूषण के इस बयान पर कि 'विश्वरंजन छद्म साहित्यकार हैं, उन्होने कहा कि यह तय करना साहित्यिक बिरादरी और पाठकों का काम है न कि प्रशांत भूषण का। इसके बारे में उन्हे बहुत ज्यादा कुछ नहीं कहना है।



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(यह रपट हम छत्तीसगढ से साभार प्रस्तुत कर रहे है)

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

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