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रचनाओं की महक

प्रिय एबीसी,

काफी लम्‍बे अरसे के बाद आज तुम्‍हें फिर पत्र लिख रहा हूं, पिछले तीन माह से तुम्‍हें पत्र लिखना चाह रहा था किन्‍तु लिख नहीं पा रहा था । हंस में 'विदर्भ' कहानी पढने के बाद से ही, पर ...... तुम्‍हारा पता वहां नहीं था । सिर्फ ई मेल एड्रेस था वो भी याहू का जो हिन्‍दी मंगल फोंट को सहजता से स्‍वीकार नहीं करता इस कारण की बोर्ड पर खेलते मेरे हाथ रूक गये थे ।

उस कहानी एवं वहां दिये तुम्‍हारे परिचय से मुझे तुम्‍हारे संबंध में कुछ और जानकारी मिली और मुझे खुशी हुई कि तुम अब कम्‍प्‍यूटर से घोर नफरत करने वाली अपनी प्रवृत्ति बदल चुकी हो इसी लिए तो अपना स्‍थाई पता ई मेल का दिया है । चलो वक्‍त नें सहीं तुम्‍हें बदला तो ...., नहीं तो बदलना तो तुम्‍हारी तासीर में नहीं था ।

तुममें क्‍या क्‍या बदलाव आया है यह मैं जानना चाहता हूं, पर मैं यह भी जानता हूं कि इसके लिये मुझे तुमसे मिलना पडेगा, तुम यूं ही अपने राज खोलती भी तो नहीं हो । मैं तुम्‍हें तुम्‍हारी कहानियों से ही जान पाता हूं या फिर जब तुम मुझसे, आमने सामने बैठकर बातें करती हो । 

इन दिनों किस नगर में बसेरा है तुम्‍‍हारा, परिवार का क्‍या हाल चाल है, विकास को तो अब प्रमोशन भी मिल गया होगा, वैभव भी स्‍कूलिंग खत्‍म कर चुका होगा और कालेज में होगा, हो सकता है तुम्‍हारे सिर के बाल कुछ सफेद भी हो गए हों क्‍योंकि मेरे तो हो गए हैं , कुछ वेट कम किया कि वैसे ही ............। अब तो तुम साडी ही पहनती होगी, बहुत सारे प्रश्‍न हैं एक पत्र में समा नही पायेंगें किन्‍तु भावनायें उन्‍हें इसी पत्र में ही समेंटना चाहती हैं, पता नहीं तुमसे फिर मुलाकात या संवाद की स्थिति बन पायेगी । 

मुझे याद आता है मेरी पहली कविता जो मैंनें अपनी डायरी में लिखी थी उस पर तुमने इत्र का स्‍प्रे डाल दिया था, स्‍याही से लिखे शव्‍द फैल गए थे  तो मैंनें तुमसे कहा था कि रूको ...... ये तो मिट जायेगा । तुमने कहा था नहीं इससे इसकी खुशबू देर तक जीवित रहेगी, रचनाओं की महक । आज भी मेरी डायरी में वे पंक्तियां और खुशबू जीवंत है । 

इधर मैनें लिखना छोड दिया उघर तुमने कलम को अपना साथी बना लिया । लेख, कवितायें, कहानियां लगभग हर सप्‍ताह नजरों से गुजरने लगी । नगर नगर, महानगर में विकास के साथ नौकरी के स्‍थानांतरण का दुख-सुख झेलते हुए तुमने अपने लेखन को सदैव जीवित रखा । 

मेरे लिए तुम्‍हारी लेखनी पढना तुमसे मिलने से कम नहीं होता, मैं तुम्‍हारी लेखनी जब पढता हूं तो मुझे ऐसा लगता है कि तुम कालेज के गार्डन में बैठकर  मुझे दुष्‍यंत को डिक्‍टेट कर रही हो या फिर बाबा नार्गाजुन की रचनाओं पर बहस कर रही हो और मैं तुम्‍हारी बातों को दिलों से आत्‍मसाध कर रहा हूं (दिमाक से तो करता ही था, हा हा हा)।

'सागर मंथन', 'एक अकेली औरत', 'नील गगन', 'मेरी चुभन' और 'शिवनाथ की चपलता' सभी के विमोचन से लेकर समीक्षा तक के प्रकाशित कतरनों को मैं ढूंढ ढूंढ कर संग्रहित करता रहा हूं, इन पुस्‍तकों को भी क्रय करने के लिए प्रकाशकों व मित्रों को मनीआर्डर कर मंगाते रहा हूं । रचनाओं के साथ साथ शायद तुम्‍हारा पता भी मिल जाए । पर हर किताब में तुम्‍हारा पता अलग अलग ही रहा । 

इधर कुछ वर्षों से मैंनें भी कलम उठाने का प्रयास किया है, हो सकता है तुमने एकाक प्रकाशन देखा भी हो । पर ... सब डरते सहमते । तुम्‍हारे रहते मेरे शव्‍द और व्‍याकरण परिस्‍कृत हो जाते थे, भले ही मुझे तुमसे कुछ इर्ष्‍या होती थी किन्‍तु तुम्‍हारी नजर पडते ही आवश्‍यक सुधार के साथ ही भविष्‍य में उन गलतियों की संभावना पर विराम लग जाते थे । अब तुम यहां नहीं हो, मुझे पता नहीं मैं कहां कहां शव्‍द और व्‍याकरण की गलतियां कर रहा हूं । जहां से भी मेरी आलोचना के पत्र आते हैं मैं उत्‍सुकता से उसे निहारता हूं कि तुम तो नहीं । मुझे नहीं लगता कि तुमनें इन दिनों मुझे याद किया है । 

तुमसे मिलने की संभावनाओं के चलते ही मैनें इंटरनेट में अपने आप को विस्‍तार दिया है, मेरे लिए यह सब आसान नहीं है, तुम जानती हो । मेरा कार्य दायित्‍व एवं पारिवारिक दायित्‍व मुझे इसके लिए समय की इजाजत नहीं देता किन्‍तु मैं कुछ स्‍वार्थी सा होकर इसके लिए समय चुराता हूं ताकि तुमसे किसी नेट मोड पर मुलाकात हो जाय । यह भी हो सकता है कि जब तुम्‍हारी नजर मुझ पर पडे तब तक मेरे दीपक का तेल खत्‍म हो चुका हो, यह भी संभव है बुझ भी चुका हो । खैर इन मुद्दों पर बहस जरूरी भी नहीं । 

'इस सदी की नई कहानियॉं' संग्रह में तुम्‍हारी एक कहानी मैंने पढीहै, यह तो बहुत बडा अचीवमेंट है, नहीं नहीं अचीवमेंट को विलोपित करता हूं । तुम्‍हारी कहानियॉं इस संग्रह में आनी ही थी । इसे मेरी ठिठोली मत समझना, मैनें जब इस संग्रह की तीनों मेरे बजट से भी मंहगी किताबें खरीदी थी तब मुझे पता नहीं था कि इसमें तुम होगी । तुम अपनी लेखनी को इस उंचाई तक ले आवोगी खुशी मिश्रित आश्‍चर्य होता है । 

सच पूछो तो तुम्‍हारी पहली प्रकाशित कहानी के संबंध में महेश नें मुझे बतलाया था तो मैनें उस पर कोई उत्‍सुकता जाहिर नहीं किया था, मुझे हुआ भी नहीं था । मैनें सोंचा हॉं लिख दिया होगा और छप भी गया होगा झोंके में । किन्‍तु जब लगातार अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में तुम्‍हारी लेखनी लगभग बरसने लगी, पाठकों के पत्रों पर चर्चा होने लगी तब मैनें, लगभग डेढ साल बाद तुम्‍हारी रचनाओं को संग्रहित करना चालू किया और सच मानों तो तभी मैनें उन्‍हें पढा भी । 

पत्र कुछ ज्‍यादा लम्‍बा हो रहा है, अत: अब विराम देता हूं । वक्‍त मिले एवं यदि तुम्‍‍हें सचमुच मेल खोलना आता हो तो मुझे मेल करना । रचनाओं की महक क्‍या होती है अब मैं महसूस करता हूं ।

तुम्‍हारा 

एक्‍सवाईजेड

प्रथम प्रेम पत्र

मैं तरस रहा था
तू देखे मेरी तरफ
और मुस्‍कुरा दे, हौले से
मैं तेरी इच्‍छा पे नही जाता
कि, तुमने क्‍यू मुस्‍कुराया है ?
पर, इतना जरूर जानता हूं
कि, तुमने मुस्‍कुराया तो है ।




तेरी ये शोख अदा,
इठलाना बुत सा खडे होना,
दांतो में उंगली चबाना
नजरों की चपलता मैं हैरान हूं,
ये मामूली है या गैर मामूली ?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
तेरी आंखों में कुछ तो है
आंखों के सिवा ।

आकांक्षाओं का विशाल समुद्र
किनारों से अठखेलियां करता हुआ
या मैं,
तेरी ओर ताकता हुआ ?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
तुमने मुझे देखा है ।

पहली कविता नही है यह
ऐसे कई लिख चुका हूं,
तुम्‍हारे खातिर
पेश है एक पुष्‍प मेरी बगिया का
तुम्‍हे ये पसंद आया,
या नही आया?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
तुम किसी से मेरा शिकायत नही करोगी ।

कुछ लिखने की तमन्‍ना हो तो ठीक
नही तो सिर्फ अपना पता लिखा
खाली लिफाफा ही सहीं
पत्र का इंतजार रहेगा मुझे
तुम प्रेषक बनोगी या नहीं ?
मैं ये तो नही जानता पर,
इतना जरूर जानता हूं कि,
मैने ये तुम्‍हारे लिए ही लिखा है ।

संजीव तिवारी




कुछ हल्‍का फुल्‍का :-
मैनें यह प्रेम पत्र 1995 में मेरी एक संभावित प्रेमिका को लिखा था। संभावित इसलिये क्‍योंकि उन दिनों नौकरी के आवेदन बनाने के साथ साथ यह प्रयास भी एकाध दो जगह कर चुका था। तो हां उस संभावित प्रेमिका को बहुत हिम्‍मत कर के इसे दिया था। उसके एक घंटे बाद ही उसके भाई नें मुझे चौंक में पकडा और अपने घर ले गया, हम घबराते हुए उसके घर गये कि अब तो पडेगें डंडे। वहां मेरी भावी प्रेमिका के पिता नें मामला सम्‍हाला, मेरा नाम गांव पता सब नोट कर डाला। सकपकाते हुए हम जल्‍दी से जल्‍दी सलट लिये, जान बची लाखो पाये।

इस वाकये के एक महीने बाद ही हमारी उक्‍त भावी प्रेमिका, पत्‍नी बन गयी। हमें न तो पत्र का जवाब मिला ना ही, कुछ और पल, हमने ‘एज ए लवर’ गुजार सके, ना ही लव को एन्‍ज्‍वाय कर पाये। अब लोग हमसे पूछते हैं, भईया आपने तो लव मैरिज किया है ना.. तो हम अपसेट तो हो ही जाते है। आज श्रीमती के निजी सामानों के बक्‍से से यह पत्र मिला तो आंखों में चमक उभर आई . . . सचमुच हमने भी प्‍यार किया है।




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