साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा शताब्दी की कालजयी कहानियों का चयन किया गया है। चयनित कहानियां किताब घर प्रकाशन से ४ खण्डों में प्रकाशित हुई है। विगत सौ वर्षों से कथा लेखकों में छत्तीसगढ़ के गांव लिमतरा से निकले डॉ. परदेशीराम वर्मा के महत्व को साहित्य अकादमी ने आंका है। इस चयन में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रथम कथा संग्रह "दिन प्रतिदिन" की प्रतिनिधि कहानी को डॉ. परदेशीराम वर्मा की कालजयी कहानी का सम्मान मिला है।शताब्दी की चयनित कहानियों में डॉ. वर्मा की भी कहानी
साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा शताब्दी की कालजयी कहानियों का चयन किया गया है। चयनित कहानियां किताब घर प्रकाशन से ४ खण्डों में प्रकाशित हुई है। विगत सौ वर्षों से कथा लेखकों में छत्तीसगढ़ के गांव लिमतरा से निकले डॉ. परदेशीराम वर्मा के महत्व को साहित्य अकादमी ने आंका है। इस चयन में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रथम कथा संग्रह "दिन प्रतिदिन" की प्रतिनिधि कहानी को डॉ. परदेशीराम वर्मा की कालजयी कहानी का सम्मान मिला है।सद्भावना के शिल्पी भाई गिरीश पंकज : डॉ. परदेशीराम वर्मा
जनवादी कवि नासिर अहमद सिकंदर पन्द्रह वर्ष पूर्व कवियों पर एक स्तंभ लिखते थे । नवभारत में वे प्रति सप्ताह एक कवि से साक्षात्कार लेते थे । यह लोकप्रिय स्तंभ था । नासिर का सीना वैसे भी चौड़ा है मगर उन दिनों इस स्तंभ के कारण उसके सीने की चौड़ाई में कुछ और इजाफा सा हुआ दिखता था । एक दिन उसने मुझे भी रायपुर चलकर नवभारत में कार्यरत अपने मित्र से मिलने का न्यौता दिया । हम तेलघानी नाका के पास तब के नवभारत में पहुंचे । नवभारत में कार्यरत आशा शुक्ला जी भर को मैं पहचानता था । वे रायपुर के समाचार पत्र जगत में धमाके से आई एक मात्र युवती थी । इसलिए भी उन्हें हम सब आदर देते थे । कुछ विस्मय भी होता था कि पुरूषों से भरे समाचार पत्र के दफ्तर में वे अकेली महिला होकर भी किस तरह सफलतापूर्वक और सम्मानजनक ढंग से काम कर लेती हैं । सोचा उनसे भी भेंट हो जायेगी । नासिर ने मुझे पान ठेले पर ही रोक दिया । जिनके नाम पर बसा बिलासपुर : बिलासा दाई
बात पुरानी है । तब दोनों ओर घने जंगल थे । बीच में बहती ती अरपा नदी । नदी में पानी था भरपूर । जंगल में कहीं-कहीं गांव थे । छोटे-छोटे गांव । नदी किनारे आया एक दल । यह नाव चलाने वालों का दल था । इसके मुखिया थे रामा केंवट । रामा के साथ सात आठ लोग थे । अरपा नदी के किनारे डेरा लगा । सबने जगह को पसंद किया । नदी किनारे पलाश के पेड़ थे । आम, महुआ के पेड़ थे । कुछ दूरी पर छोटा सा मैदान था । शाम हुई । रामा ने सबको समझाया । उसके साथ उसकी बेटी थी । सुन्दर, जवान । नाम था बिलासा । बिलासा ने भात पकाना शुरू किया । सभी डेरों से धुंआ उठा । खाकर सब डेरों में सो गए ।पंडवानी की पुरखिन दाई श्रीमती लक्ष्मी बाई
झाडूराम देवांगन की प्रस्तुति देखकर पूनाराम निषाद आगे बढ़े। ठीक उसी तरह 60 वर्षीय लक्ष्मीबाई का प्रभाव महिला कलाकारों पर रहा। जब लक्ष्मीबाई कीर्ति के शिखर पर थीं तब तीजनबाई मात्र आठ नौ वर्ष की रही होगी। अपने कई साक्षात्कार में पद्मभूषण तीजनबाई ने इस तथ्य को स्वीकारा है कि लक्ष्मीबाई से उन्हे भी प्रेरणा मिली। लेकिन लक्ष्मीबाई मंच की पहली पंडवानी गायिका नहीं है। उनसे पहले सुखियाबाई पंडवानी गाती थी। रायपुर के पास स्थित 'मुनगी’ गांव की सुखियाबाई मर्दों के वेश में मंच पर आती थी। तब पंडवानी के विख्यात कलाकार रावनझीपन वाले मामा-भांजे ही चर्चा में आये थे। सुखियाबाई को लगा होगा कि यह महाभारत की लड़ाई का किस्सा है इसलिए यह मर्दाना विधा है। इसीलिए वे मर्दों के वेश में मंच पर आती थीं। श्रीमती लक्ष्मीबाई पहली ऐसी साधिका हैं जिहोंने स्त्री के रूप में ही महासंग्राम की कथा का गायन मंच पर किया।'मंगनी के बइला, घरजियां दमान्द,
मरे ते बांचय, जोते से काम।’
तो वे दाढ़ी लहराकर खूब हंसे। बच्चो की तरह नि:श्छल राजीवनयन जी झुमका, मजीरा बजाते हैं। कलाकारों के दलों में दाढ़ीधारी सदस्य प्राय: होते हैं। ऋतु वर्मा के पिता की दाढ़ी है तो लक्ष्मीबाई के पति की। पद्मभूषण तीजनबाई के पूर्व हरमुनिया मास्टर तुलसीराम की भी युवकोचित दाढ़ी थी। राजीवनयन 'दढिय़ारा’ भी जब मंच पर लक्ष्मीबाई के साथ बैठते हैं तो शोभा देखते ही बनती है। 

'सोना तो बाजय नहीं, कांच पीतल झन्नाय,
'आया है सो जायेगा, राजा रंक फकीर,
एक सिंहासन चढि़ चले, एक बंधे जंजीर।’
डॉ. परदेशीराम वर्मा
एल.आई.जी.18 हुडको, भिलाई (छ.ग.) मोबा. नं. 9827993494
प्रख्यात पंडवानी गायिका रितु वर्मा छुटपन में कीर्तिमान
10 जून 1979 को भिलाई की श्रमिक रूआबांधा में जन्मी कु. रितु वर्मा ने अगस्त 1989 में विदेशी मंच पर अपना पहला कार्यक्रम दिया। मात्र दस वर्ष की उम्र में जापान में अपना कार्यक्रम देकर रितु ने वह गौरव हासिल किया जो बिरले कलाकारों को मिलता है। रितु छतीसगढ़ की पहली ऐसी प्रतिभा संपन्न कलाकार है जिसने इतनी छोटी उम्र में ऐसा विलक्षण प्रदर्शन दिया। घुटनों के बल बैठकर और एक हाथ में तंमूरा लेकर रितु ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कार्यक्रम दिया। कार्यक्रम में आये जापानी दर्शक गोरी चिट्टी छुई हुई सी लगने वाली इस पंडवानी विधा की गुडिय़ा के प्रदर्शन पर देर तक तालियां बजाते रहे। संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली द्वारा महोत्सव के लिए जापान प्रवास का यह सुअवसर रितु को लगा। तब से वह लगातार विदेश जा रही है। 1991 में आदिवासी लोक कला परिषद भोपाल ने उसे जर्मनी एवं इंग्लैंड भेजा। तब तक रितु की कला और निखर चुकी थी। वहां उसे खूब वाहवाही मिली।
मंगेश ही सब कुछ सम्हालते हैं। कार्यक्रम की तिथियों से लेकर सिंगार की सभी सामग्री, सुंडरा, ककनी, पुतरी से लेकर टिकली फुंदरी तक की सार सम्हाल करते हैं मंगेश। रितु अब पांचवीं की परीक्षा दे चुकी है। वह अब केवल हस्ताक्षर ही नहीं करती, बाकायदा अखबार बांच लेती है। रितु ने साक्षरता अभियान के तहत अक्षर ज्ञान प्राप्त किया। भिलाई नगर परियोजना की कक्षायें रूआबांधा में भी चलीं। रूआबांधा के अक्षर सैनिकों ने उसे पढऩा लिखना सिखाया।डॉ.परदेशीराम वर्मा
छत्तीसगढ़ी नाचा के दधीचि दुलारसिंह साव मदराजी
मदराजी दाऊ सर्वस्व अर्पित करने वाले महान भक्तों की परंपरा के छत्तीसगढ़ी कलाकार थे । वे ही सबसे पहले हारमोनियम लेकर छत्तीसगढ़ी लोकमंच पर अवतरित हुए । वे स्वयं विलक्षण हारमोनियम वादक थे । जीवन की संध्या में जब बारी बारी सब साथ छोड़ गये तब भी उनके पास हारमोनियम रह गया । जमीन-जायदाद सब लुट गए रह गया हारमोनियम । उस्ताद वादक कलाकार मदराजी दाऊ अंतिम दिनों में छोटे छोटे नाचा दलों में हारमोनियम बजाते थे । वह भी अनुरोध के साथ । बुलवाराम, ठाकुरराम, बोड़रा जैसे महान नाचा कलाकारों को एक जगह रिंगनी रवेली साज के मंच पर एकत्र कर मदराजी दाऊ ने नाचा का वो रिंगनी रवेली साज खड़ा किया कि छत्तीसगढ़ दीवाना हो गया । ‘तोला जोगी जानेंव रे भाई तोला साधू जानेंवगा ..... राजा लंकापति रावन ला मंय साधू जानेंव ‘ यह अमर गीत उन्हीं के मंच पर गूंजा । बुलवा राम यादव परी बनकर जब यह गीत गाते थे तब सीता पर आई विपत्ती का चित्र शब्द और ध्वनि से कुछ इस तरह मंच पर खिंच जाता था कि स्त्रियां विलाप कर उठतीं ।
बुलवाराम ने यही गीत बाद में विश्व के कई देशों में जाकर गाया और भरपूर मान प्राप्त किया । बुलवाराम को राज्य शासन ने २००४ में मंदराजी सम्मान दिया ।
मदराजी दाऊ वचन के पक्के थे । एक अवसर पर वे नाचा प्रस्तुति के लिए नारियल झोंक कर वचन दे बैठे । बच्चा बीमार था । ठीक प्रस्तुति के लिए निर्धारित दिन बच्चा चल बसा । बच्चे की लाश को घर में छोड़कर वे उस गांव तक गए जहाँ प्रस्तुति देनी थी । रात भर हारमोनियम बजाने के बाद वे सुबह रोते हुए घर आये । तब लोगों ने जाना की विरागी राजा जनक ही नहीं थे हमारे लोकमंच के पुरोधा भी वीत रागी हैं ।
इस विलक्षण कलाकार की स्मृति में छत्तीसगढ़ शासन ने दो लाख का पुरस्कार घोषित कर सही निर्णय लिया । जो कला के लिए सब कुछ लुटाकर फकीर हो गए उनके नाम पर ईनाम से मालामाल होकर प्रतिवर्ष एक कलाकार दो लाख धारी बनता है । जीवन भर वे मंच पर थिरकते कलाकारों के हित के लिए छायादार वृक्ष की तरह तने रहे जाने के बाद भी उनका परोपकारी स्वरूप विस्तारित होता जा रहा है ।
हम साया पेड़ जमाने के काम आये,
मदराजी दाऊ का रिंगनी रवेलीसाज १९२८ में खड़ा हुआ । १९५३ तक वह चला । हारमोनियम के साथ मदराजी दाऊ चिकारा, तबला वादक एवं गायन में भी सिद्ध थे । मशाल नाच में वे चिकारा बजाते रहे । चिकारा बजाने वाले हाथों ने ही हारमोनियम को साधा और नाचा का नई ऊँचाई मिली ।
१९११ में ग्राम रवेली जिला राजनांदगांव में जन्में दाऊ मदराजी का निधन २४ दिसंबर १९८४ में हुआ । उनकी परंपरा को चंदैनी गोंदा के माध्यम से आज तक श्री खुमान साव सींच रहे हैं ।
शब्द संपदा के संग्रहकर्ता : अजय चंद्राकर
आवारा - बंजारा के संजीत त्रिपाठी जी नें कल छत्तीसगढ राज्य के स्कूल शिक्षामंत्री अजय चंद्राकर जी पर देख भाई देख, ज़रा ज़बान संभाल के! लिखा मेरे सहित बारह लोगों नें चुटीले टिप्पणियों से पोस्ट को नवाजा हमने भी स्वीकारा कि नेताओं को तो जबान सम्हाल कर ही बोलना चाहिए । रात को हमने उन पर केन्द्रित विभिन्न लेखों को पढा तो लगा क्षेत्र के ख्यातिनाम साहित्यकार कहानीकार डॉ.परदेशीराम वर्मा की नजरिये से भी अजय चंद्राकर जी को प्रस्तुत करें -डॉ.परदेशीराम वर्मा
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद हुए चुनाव में भाजपा के तीन दाढ़ीधारी उर्जावान नौजवान विधायक बने । तीनों ही महत्वपूर्ण पद पर आसीन हुए । भिलाई के विधायक श्री प्रेमप्रकाश पाण्डे विधान सभाध्यक्ष बने । दुर्ग के विधायक श्री हेमचंद यादव तथा कुरूद के विधायक श्री अजय चंद्राकर केबिनेट मंत्री बने । बाद में हेमचंद यादव दाढ़ी से मुक्त हो गए मगर शेष चेहरों पर आज भी दाढ़ी है । खिचखिची दाढ़ी, रौबदार आवाज, त्वरित निर्णय और स्पष्टवादिता के लिए विख्यात ।
४४ वर्षीय श्री अजय चंद्राकर कुर्मी पारा कुरूद के बांशिदे हैं मगर इनके पुरखों का गांव अर्जुन्दा भी है । अपने समय के बेहद अध्ययनशील जनप्रतिनिधि श्री भागवत चंद्राकर अजय जी के चाचा हैं । अजय चंद्राकर विधान सभा सदस्यों में सर्वाधिक पढ़ाकू व्यक्ति माने जाते हैं । पढ़ने लिखने और ज्ञानार्जन की सतत भूख उनमें आज भी है । वे इन दिनों बाकायद अंग्रेजी के विद्वान से रोज घंटे भर आंग्ल भाषा की दीक्षा ले रहे हैं । पूछने पर उन्होंने सटीक कारण बताया कि राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में जाने पर अंग्रेजी की अल्पज्ञता आड़े आती है । अंग्रेजी पर अधिकार जरूरी है यह जिस पल उन्होंने महसूस किया उसी क्षण अंग्रेजी पढ़ने का उन्होंने संकल्प ले लिया । वे नियमित अंग्रेजी पढ़ रहे हैं । उनके शिक्षक को शुरू में तो थोड़ा तनाव हुआ कि मंत्री हैं पता नहीं किस तरह के विद्यार्थी सिद्ध होंगे लेकिन धीरे-धीरे गुरू को लगा कि अजय जी गुरू शिष्य परंपरा की मर्यादा को जानते और मानते हैं । पढ़ते समय वे जिज्ञासु विद्यार्थी के सिवाय कुछ नहीं होते । प्राय: मंत्री जैसे बड़े पदों की मसरूफियत के मारे लोगों को सुस्ताने और सांस लेने की फुरसत नहीं मिलती, हालत चचा गालिब की तरह हो जाती है ...
हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती.
लेकिन अध्ययनशील अजय चंद्राकर जी पढ़ने के लिए समय निकाल लेते हैं । लगातार अध्ययन से बढ़ती रूचि के कारण ही वे यह निर्णय ले पाये । आजकल वे नियमित रूप से गुरूजी से अंग्रेजी पढ़ रहे हैं ।
हन्दी साहित्य में एम.ए. करने के बाद उन्होंने ३विष्णु प्रभाकर के नाटकों का अनुशीलन४ विषय शोध के लिए चुना । लेकिन उन्हीं दिनों राजनैतिक सरगर्मी बढ़ गई और शोध पर अवरोध आ गया । लेकिन पढ़ने लिखने की गति यथावत् रही ।
अजय चंद्राकर १९९८ में पहली बार विधायक बने लेकिन इसके पूर्व वे अनेकों जन आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके थे ।
१९८७ में आंदोलन के चलते वे सात दिन जेल में भी रहे । इस एक सप्ताह के जेल जीवन को वे अपनी विशेष उपलब्धि मानते हैं । यह है भी एक विशिष्ट अनुभव । वे भाजपा विधायक दल के सचेतक ९८ में भी थे और आज भी हैं । पंचायत एवं ग्रामीण विभाग तथा संसदीय कार्य मंत्री के रूप में वे २००३ में वे छत्तीसगढ़ सरकार में शामिल हुए । २००४ में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तकनीकी शिक्षा एवं जनशक्ति नियोजन का काम भी जुड़ गया । २००७ में श्री अमर अग्रवाल जब पुन: मंत्रीमंडल में शामिल हुए तब कुछ विभागों की अदला-बदली हुई । वे पंचायत एवं ग्रामीण विकास संसदीय कार्य तथा स्कूल शिक्षा मंत्री हैं । कुरूद के दाऊ श्री कलीराम चंद्राकर के इस सपूत ने अपनी जाति को पूर्ण सम्मान देते हुए भी सभी जातियों को एक समान महत्व दिया है । इन चार वर्षो में अजय चंद्राकर अपनी जाति के आयोजनों में बहुत रूचि लेते हुए नहीं दिखे । यह चंदूलाल चंद्राकर की विशिष्ट शैली है । वे भी लाख प्रयत्न के बावजूद जातीय संगठन से जुड़े ध्वजधारकों के प्रभाव में कभी नहीं आये । बल्कि कई अवसरों पर वे झिड़क भी देते थे कि संकीर्णता ठीक नहीं है । सांसद सबका होता है । सबसे प्राप्त वोट से जीतने के बाद जातिवादी पहल शोभा नहीं देता । मगर है यह कठिन साधना । इसे चंदूलाल चंद्राकर के बाद श्री अजय चंद्राकर ने सफलतापूर्वक साधा है ।
अजय चंद्राकर पारिवारिक रिश्तेदारी के कलात्मक फंदों को भी तोड़ने में सफल रहे हैं । परिवार का वास्ता देकर वरिष्ठ जनों ने भी अगर अजय चंद्राकर को प्रभावित करने का प्रयास किया तो उन्हें रंचमात्र सफलता नहीं मिली । इस दृष्टि से एक किस्सा चंद्राकर पट्टी में बहुत मशहूर है । अजय चंद्राकर परिवार के एक कांग्रेसी बुजुर्ग ने उन्हें कुछ पढ़ाने का प्रयत्न किया । कुछ देर हां-हूँ कहने के बाद अजय जी ने लगभग उखड़ते हुए कहा कि अब मैं भी काफी उम्र का हो गया हूँ । आप निरा बच्चा ही मत समझिए । ऊंच नीच मैं भी खूब समझता हूँ । अपनी अपनी यात्रा है । आप अधिक पढ़ाने का प्रयत्न मत करिए । बुजुर्ग उनके अंदाज से हक्के-बक्के रह गये । खिचखिची दाढ़ी वाले अजय चंद्राकर यूं तो अट्टहासों के लिए भी मित्रों में बेहद लोकप्रिय हैं मगर मंद मंद मुस्कारने की अपनी विशेष अदा से वे माहौल को तनावमुक्त बनाये रखते हैं ।
अनुशासन प्रिय अजय चंद्राकर को गुस्सा दबाना पड़ता है । गुस्से को बार-बार दबाने का प्रयत्न अंतत: शरीर पर असर दिखाता है । खेल एवं मंच के प्रेमी अजय चंद्राकर किशोरावस्था में दुबले पदले थे, आज भी शारीरिक सधाव के प्रति सचेत हैं लेकिन स्वास्थ्य थोड़ा ढ़ीला भी हुआ है ।
वे स्वयं स्कूली जीवन से ही नेतृत्व के गुणों से लबालब थे । स्कूली जीवन काल में ही तत्कालीन मंत्री से उन्होंने साहस के साथ कुछ मांग लिया था । सार्वजनिक हित की मांग एक किशोर के द्वारा संभवत: पहली बार मिली थी । मंत्री ने भी सहर्ष उनकी मांग को स्वीकार कर लिया था । संभवत: उसी घटना से अजय चंद्राकर के व्यक्तित्व में नया मोड़ आया हो । मित्रों से उन्हें तब खूब शाबाशी मिली ।
कुरूद क्षेत्र की नहरें विशाल हैं । मित्र मंडली के साथ नहरों के विराट फालों में नहाने का सुख उन्हें आज भी भुलाये नहीं भूलता । जो देहाती बच्चे बड़े नहर के गोदगोदा में गिर रहे पानी के भीतर जाकर छुपने का सुख जानते हैं वही नहर में नहाने का आनंद समझ सकते हैं । पानी उपर से जब नीचे गिरता है तब बीच धारा और दीवार के बीच जगह बच जाती है जहां घटों खड़ा रहा जा सकता है । पानी की पर्देदारी क्या है यह नहर में नहाकर की समझा जा सकता है । पर्दे के अंदर शरीर और संवेदना की अनगिनत कथाएं होती हैं । हर देहाती नौजवान जो बाद में शहर आकार बस जाता है, जब कभी नहरों के करीब पहुंचता है - नहर के कगारों में सर पटकती फिर रही नाजुक कहानियां उसे कई दशक पीेछे ले चलती हैं ।
अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन कर्ता अजय चंद्राकर स्थानीय मीडिया से शुरू से ही सहजता पूर्वक बातचीत करते थे ।
कबीर पंथी डॉ. चरणदास महंत ने कबीर पर पुस्तिका का प्रकाशन किया उसमें मोरपंख धारी कबीर का चित्र है । यह मोरपंख कबीर को श्री कृष्ण से भी जोड़ता है । कबीर ने खुद को राम की बहुरिया कहा । कबीर साहित्य में श्री कृष्ण से जुड़ी कम चर्चित पदावलियां होंगी । लेकिन वह कमी मोरपंख से पूरी होती है । श्रीकृष्ण के सिर पर भी मोरपंख है और कबीर की पगड़ी में भी यह शोभित है । उस दौर में सगुण भक्ति के उपासक कवि राम और कृष्ण भक्ति शाखा में विभाजित थे । कबीर ने निराकर ब्रम्ह और सर्वव्यापी ईश्वर की महिमा का गान किया और इन दोनों से अलग अपनी विशिष्ट शैली में चिंतन का प्रतिपादन किया । उन्होंने हिन्दु-मुस्लिम, राम-कृष्ण, राजा-रंक, ऊंच-नीच के आधार पर समाज को बांटने की प्रवृत्ति पर चोट करते हुए कहा - अरे, इन दोनों राह न पाई ।
निर्गुनिया कबीर ने भी श्री जगन्नाथ जी का यशगान किया और उसे छत्तीसगढ़ ने समझा । छत्तीसगढ़ी लोकमंच पर यह भजन सर्वाधिक चर्चित रहा है ।
उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में श्री जगन्नाथ जी समान रूप से समाद्य्त हैं । सारंगढ़, रायगढ़ क्षेत्र के गांवों में श्री जगन्नाथ जी के मंदिर हैं तो पाटन, रायपुर और भिलाई जैसे बड़े कस्बों और शहरों में भी जगन्नाथ मंदिर की भव्यता और श्रृंखला देखते ही बनती है । पाटन क्षेत्र में श्री जगन्नाथ मंदिर का संचालन मनवा कूर्मि समाज द्वारा होता है । हर जाति के व्यक्ति को श्री जगन्नाथ अपने पास बुलाते हैं । वे सबके हैं । छत्तीसगढ़ के गांवों में रथयात्रा के दिन दो बैलगाड़ी को जोड़कर रथ बना लेने की परंपरा हम देखते आये हैं । उस रथ में बैठकर पंडित जी गजामुंग का प्रसाद बांटते हैं । मितान बदने वाले गजामूंग के आदान प्रदान से भी जीवन भर की मितानी का संकल्प लेते हैं । भोजली, जवांरा की तरह गजामूंग भी मितानों को जोड़ता है । छत्तीसगढ़ में रथयात्रा के दिन को रथदूज भी कहते हैं ।
छत्तीसगढ़ से छोटे बड़े सभी जगन्नाथ की यात्रा के लिए जाते हैं । अपने छत्तीसगढ़ी उपन्यास “आवा” में छत्तीसगढ़ के स्वामी जगन्नाथ जी के महात्म्य पर मैंने एक पूरा परिच्छेद लिखा है ।
पहले भजन गाते हुए, छेना लकड़ी, चावल, दाल लेकर पैदल ही लोग पुरी की यात्रा के लिए निकलते थे । फिर रेलगाड़ी सुलभ हुई । १९५२ में अंगुल में एक चमत्कारी बाबा के प्रागट्य की कथा छत्तीसगढ़ में कुछ इस तरह पहुँची कि समूचा छत्तीसगढ़ उड़ीसा में स्थित अंगुल की ओर चल पड़ा । तब भीषण हैजा के कारण लाखों लोग काल कवलित भी हुए थे । तब अंगुल का मतलब था श्री जगन्नाथ जी के करीब पहुंचना । एक पंथ दो काज ।
लेकिन इस सबके बावजूद वर्तमान समय में जिन जन-प्रतिनिधियों की पकड़ अपने क्षेत्र में जगजाहिर है उसमें अजय चंद्राकर अग्रगण्य हैं । कुरूद क्षेत्र के लोग उन्हें बेहद प्यार करते हैं और यह प्यार इन्हीं गुणों के कारण है । अजय चंद्राकर चलने के लिए तैयार होते हैं तो रास्ता कांटों भरा है या सुगम यह नहीं सोचते । वे समझते हैं कि....
राह में कांटे बिछे होंगे कि फूल,
जिसको थी यह फ्रिक वह बैठा रहा ।
वरिष्ठ, कनिष्ठ के पचड़ों से दूर अजय चंद्राकर दिये हुए दायित्वों को पूरा कर महत्व प्राप्त कर लेते हैं । २००२ के बाद दो बार विभाग कम ज्यादा हुए लेकिन एक छोटी सी टिप्पणी भी उनके द्वारा नहीं की गई । स्कूली शिक्षा मिलने पर मीडिया ने उन्हें छोटे गुरूजी कहकर उकसाया मगर वे मुस्कारते रहे । जवाब देने का यह ढ़ंग हमेशा अमोघ अस्त्र की तरह कारगर सिद्ध होता है ।
डॉ.परदेशीराम वर्मा
आप सभी को विक्रम संवत् 2065 वर्ष प्रतिपदा की हार्दिक शुभकामनायें : संजीव तिवारी
छत्तीसगढ की बिटिया : तीजन बाई
इस लेख को पढकर वरिष्ठ हिन्दी ब्लागर आदरणीय संजय तिवारी ने कहा…
कल रात में डिस्कवरी चैनल पर थोड़ी चर्चा तीजनबाई की हुई थी. एकदम से पांडवानी और तीजनबाई की स्मृति जागृत हो गयी. बडी इच्छा हुई कि काश कहीं से कुछ जानकारी ब्लाग पर आ जाती. और आज आपका यह लेख देखकर बहुत सुखद आश्चर्य हो रहा है. वे लोककला की धरोहर हैं.उनकी कला उच्चकोटि की साधना है. उनके बोल और शब्द भले समझ में पूरे न आयें लेकिन कानों में पडते हैं तो आत्मा तक पहुंच जाते हैं. निशब्द कर देते हैं. वे सिर्फ पांडवानी गानेवाली कलाकार नहीं है वे एक अनुभूति हैं.वे गाती हैं तो मन की मैल गलकर बाहर निकल जाती है. उनके चेहरे पर ऐसी मुस्कान हमेशा रहती है जो किसी सिद्ध के चेहरे पर ही दिखती है. वे गाती हैं तो लगता है समूचा वातावरण उनको तन्मय होकर सुन रहा है. उनका गायन हमको हमारे अस्तित्व से जोड़ देता है.
आदरणीय संजय तिवारी जी इस लेख में अपनी भावनाओं को जोडते हुए अपने ब्लाग में
बड़े लोग हमेशा छोटी बातों की चिंता करते हैं के नाम से एक लेख प्रस्तुत कर रहे , इसे भी जरूर पढें
संजीव तिवारी
एक चिंतक रंगकर्मी : राम हृदय तिवारी
आशंका : डा. परदेशी राम वर्मा की कहानी

नेवरिया ठेठवार के आने के बाद पंचायत प्रारंभ होती है । गांव में ब्राहमण, तेली, कुर्मी सब जाति के लोग हैं । मगर सबसे ज्यादा छानही ठेठवारों की है ।
भुरी भंइस के दूध रे भईया, बडे कुआं के पानी,
नफे नफा कमाबो भईया, नइये निच्चट हानी ।
अब काछन निकलते समय नेवरिया के लडके उन्माद में आकर इस तरह के आधुनिक दोहे भी सुनाते हैं । हर साल दिवाली में सबसे पहले नेवरिया के घर से काछन निकलता है । नेवरिया ठेठवार समाज का राजा है । 200 बकरी और 25 एकड खेत के अतिरिक्त 27 भैंसे भी नेवरिया के थान में बंधी दिन भर पगुराती है । हां, रात में जरूर भैंसों की छांद छटक जाती है । साह चराने से नेवरिया को टोकने की जिसने भी कोशिश की है, उसको गांव छोडकर भागते भी नहीं बना है । साह चराना तो नेवरिया हक हो गया है । भैंसे जिधर मुंह उठाकर चल देती हैं, उधर के खेतों को काटने की समस्या से मुक्त कर देती हैं । भैंसों के मालिक नेवरिया की आसपास के गांवों में धाक है । ऐंठ मुरारी पागा बांधे, हांथ में तेंदूसार की लाठी लिए, बजनी पनही की चर्र चर्र आवाज पर झूमते नेवरिया को देखकर बच्चे सहम जाते हैं ।
आज भी नेवरिया का अगोरा है । सब आ गये हैं । लोग जानते हैं कि पंचायत तो प्रारंभ होती है नेवरिया के खखारने के बाद और नेवरिया बियारी करने के बाद पहले एक घंटा तेल लगवाते हैं, उसके बाद ही गुडी के लिए निकलते हैं । जैसे नेवरिया का शरीर मजबूत है, वैसे ही बात भी मजबूती से करते हैं । पंचायत के बीच नेवरिया की बात कभी नहीं कटती । जहां नेवरिया की बात कमजोर होने लगती है, वहां उसकी लाठी चलती है । नेवरिया के पांच लडके हैं जवान सब्बर । सबके हांथ में चमत्कारी लाठी हमेशा रहती है । खास तेंदूसार की लाठी – ‘तेंदूसार के लकडी भईया सेर – सेर घिव खाय रे ।‘
नेवरिया खखारते हुए पांचों लडकों के साथ आ गए । सब चुप हैं । पीपल के पत्ते अलबत्ता डोल रहे हैं । एसमें बैठे कौंए मगर चुपचाप हैं, शायद नेवरिया का भय उन्हें भी खामोश किए हुए है ।
बीच में नेवरिया बैठे हैं, उनके चारो ओर उनके लडके । लडकों के हांथ में लाठी है । लाठी में सेर - सेर घी पीने की तृप्ति है और तृप्ति के बावजूद किसी के भी सिर जम जाने की बेताबी है ।
नेवरिया के हुक्म से पंचायत शुरू हो जाती है । पंचायत हमेशा उनके हुक्म से ही शुरू होती है और उनकी हुंकार से खत्म होती है । कातिक नाई बीडी लेकर बीच में उनके पास जाता है, कभी वे एक बार बीडी निकाल लेते हैं, कभी कातिक को झिडक देते हैं कि बात कितनी जरूरी चल रही है और तुमको बस फुकुर - फुकुर की सूझी है । डांटना नेवरिया का काम है और डांट पर हंसना पंचों का । जहां तक कातिक नाउ का सवाल है, वह तो अपनी पीठ पर जब तक धौल नही पा लेता, कृतार्थ ही नही होता ।
आत खास नेवरिया के लिए पंचायत बैठी है । नेवरिया के लिए नहीं बल्कि उसके मझले लडके जरहू के ,खिलाफ । यह तो जरहू के लाठी में बंधी पीतल की चकाचौंध का कमाल है कि लोग सात माह से चुप हैं वरना ऐसी गलती अगर दूसरे किसी नें की होती तो उसे बहुत पहले ही मार-मुसेट कर दंडित कर दिया होता । मगर बिल्ली के गले में घंटी बांधी होती तो हमारे गांव में भी जरहू को ठिकाने लगा दिया गया होता । ‘समरथ को नहीं दोष गुंसाई .... जेकर खूंटा मजबूत तेकर गाय । ‘
गलती तो भूरी नें की कि आज उसने पंचायत बुलवा ली । अब दिन भी आखिरी है । पानी में गोबर करोगे तो एक दिन तो उसे ऊलना ही है ।
सबसे पहले पूछा गया कि भई, पंचायत किस कारण से एकत्र की गयी है । कुछ देर की निस्तब्धता के बाद भूरी नें रूंधे गले से कहा, ‘ ददा हो, मैं बलाय हंव ’ और फफक फफक कर रोने लगी । गुडी चढाकर भूरी अपने को अपमानित महसूस कर रही थी; उस दिन को कोंस रही थी जब वह नेवरिया के लडके के टेन में गोबर बीनने चली गयी थी । बंभरी पेंड के घने जंगल में टेन हांककर नेवरिया के बेटे जरहू नें चोंगी सुलगा लिया । भूरी भी गोबर बीन कर घर जाने के लिए लौटने लगी तभी उसने देखा कि जरहू उसे बडे मनोयोग से देख रहा है । भूरी थी भी गोरी नारी । कपाट अस देहरन की । बडे बडे स्वजातीय गोंड आए, राजगोंड आये, मगर भूरी नें इनकार कर दिया । अपने ढाई साल के इकलौते बेटे सुकालू को पोसती हुई अपने स्वर्गीय पति लीभू की याद में सब कुछ दुख झेल रही थी । वह भरी जवानी में विधवा हो गयी और चुरपहिरी जात की होने के बावजूद उसने चूरी पहनने से इनकार कर दिया । लोग उसकी इसीलिए इज्जत करते थे । छोटी जाति की होकर भी इतनी चारित्रिक दृढता की यह स्त्री गांववालों के लिए श्रद्धास्पद थी । लीभू को मरे तीन साल हो गए, मगर भूरी नें कहीं भी हांथ लाम नही किया ।
बंभरी बन में अकेली जानकर जरहू नें उसे रोक लिया । भूरी तो सोंच भी नहीं सकती थी कि दिन दहाडे कोई आदमी वैसी अनीयत कर सकता है । मगर जरहू तब आदमी नही, राक्षस बन गया था । उसने भूरी का सब कुछ छीन लिया । रोती हुई भूरी नें तब उसे कहा कि दो दिन पहले ही मुड मिंजाई हुई है, कुछ हो गया तो गोडिंन के साथ ठेठवार की जाति भी बिगड जाएगी । तब मूंछ पर हांथ फेरते हुए जरहू नें कहा था कि देख, मैं सब ठीक कर लूंगा । गांव में कौन है जो हमारे सामने सर उठाकर चले और मुंह खोले, कुछ हो गया तो मैं तुम्हें संभाल लूंगा । हां, इसकी चर्चा कहीं मत करना और आज से मैं मरद के बच्चे की तरह तुम्हारा हाथ पकडता हूं, कोलिहा की तरह नहीं कि रात का हुआ-हुआ और सुरूज के साथ लुडधुंग-लुडधुंग ।
और भूरी मान गयी थी । मानना ही पडता । यह तो जरहू की भलमनसाहत थी कि उसने उसे आश्वासन भी दिया । चाहता तो वहीं नरवा में मारकर फेंक सकता था । मगर दिलवाला है जरहू, प्रेमी भी है, ऐसा भूरी नें उस दिन मान लिया था । आज उसी प्रेमी की परीक्षा है । रूंधे स्वर में भूरी नें अपने सात माह के पेट में पल रहे बच्चे के बाप का नाम लिया, उसने कहा, ‘नेवरिया ददा के मंझला बेटा के ताय ।‘
इतना सुनना था कि नेवरिया उठ खडे हुए । आंखे लाल हो गई । उन्होंने ललकार कर कहा, ‘जरहू तो है सिधवा लडका, सच- सच बता, तूने कैसे फांसा उस भकला को ।‘
भूरी भी जानती थी कि पंचायत से सब कुछ कहना जरूरी है । उसने निडर होकर सब बता दिया । उसने यह भी बताया कि जरहू नें उतरवाने के लिए उस पर दबाव डाला । न जाने क्या कुछ पिलाया भी । मगर ठेठवार की बीज है नहीं उतरा । अब आप सब कर दो नियाब ।
नेवरिया नें डांटकर चुप कराना चाहा, मगर भूरी नें मुंहतोड जवाब दिया, ‘हांथ पकडने के समय तो गरज रहा था तुम्हारा बेटा कि कोई बात नही है । मुडी मींजे हो तो भी संभल लूंगा । अब संभलता क्यों नही, मुडगिडा बना बैठा है पंचायत में ।‘
भूरी की बात जरहू के अंतस में बरछी की तरह जा लगी । उसका हाथ लाठी में चला गया, होंठ फडकने लगे । आंखें ललिया गई । किंतु पंचायत तो पंचायत है, उसे चुप रह जाना पडा । अंत में तय हुआ कि गाय की पूंछ पकडकर भूरी को स्वीकार करना होगा कि बच्चा जरहू के ािथ का ही है । बछिया लाई गयी । भूरी उठ खडी हुई । उपर आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे । भूरी नें सोंचा कि धरती फट जाती तो वह उसमें सीता की तरह जा समाती । मगर धरती फटी नहीं । भूरी को परीक्षा के लिए तैयार होना पडा ।
चारो ओर खामोशी थी । भूरी उठी । उसने साधकर कदम बढाया और ज्यों ही वह बछिया के पास पहुंची, नेवरिया खडे हो गए । उन्होंने चिल्लाकर कहा ‘अधरमिन का क्या भरोसा । छोटी जात की औरत का भरोसा भी हम क्यों करें । यह जरूर छू देगी बछिया के पूंछी । चलो उठो । हमको नही देखना है यह अधर्म ।‘ लोग उठने लगे । लेकिन कुछ लोगों नें विरोध किया और अंत में बात पंचायत पर छोड दी गई । बहुत दिनों के बाद नेवरिया की पगडी धूल धूसरित होने जा रही थी । गांव में हर व्यक्ति की छोटी-छोटी गलतियों के लिए पनही लेकर पंचायत में उठजाने वाले नेवरिया आज स्वयं अपराधी बने बैठे थे । अत: पंचायत की बात उन्हे माननी पडी । नेवरिया को अंदाज नहीं था कि भीतर ही भीतर गांव में किस तरह बदलाव आ गया है ।
अंत में पंचों नें फैसला सुना दिया कि भूरी को पोसने की जिम्मेदारी नेवरिया के मझले बेटे जरहू की होगी ।
पंचायत ख्त्म हो गयी । भूरी पंचों को आशीष रही थी । लोग भी प्रसन्न थे । धर्म की विजय हुई थी, पापी दंडित हुआ था । एक नई शुरूआत हो गयी थी । भूरी अपने आने वाले बच्चे के भविष्य के प्रति आश्वस्त हो गयी थी । जरहू के रूप में अब उसके बच्चों को बाप मिल गया था । लेकिन बात इतनी सीधी नही थी ।
कुम्हारी और गांव के बीच एक खरखरा नरवा है । गांव भर की बरदी वहीं जाती है । बरदी चराने वाले राउत नें एक दिन गांव में आकर बताया कि भूरी नें बंभरी पेड में लटककर फांसी लगा ली है ।
गांव भर के लोग गये । भूरी को बंभरी पेड से उतारा गया । सबने आश्चर्यचकित होकर देखा कि भूरी के गले में भेडी रूआं की मजबूत डोरी थी जिसे नेवरिया को बडे मनोयोग से ढेरा पर आंटते हुए, फिर हाथ से बंटते हुए लोगों नें देखा था । देखा था और सराहा था कि नेवरिया के लडके तो भेडी रूआं कतरने में ही माहिर हैं, किंतु डोरी बुनना तो केवल नेवरिया को आता है ।
यह तो नेवरिया की रस्सी का कमाल है कि भूरी जैसी दुहरी देह की औरत उससे झूल गयी और रस्सी का कुछ नही बिगडा । भूरी की गरदन जरूर टूट गयी । नेवरिया दुखी है तो केवल इसलिए कि लाख समझाने पर भी उसके लडके डोरी बनाने की कला नहीं सीख पाए । नेवरिया आशंकित है कि उसके बाद डोरी के अभाव में न जाने लडकों को किन मुसीबतों का सामना करना पडे ।
सत्वधिकार @ परदेशी राम वर्मा
डा परदेशीराम वर्मा की कहानी “ विसर्जन ”

“ विसर्जन ”
बकरी चराने वाले लडको के लिए यह इलाका एकदम निरापद था । इस पूरे क्षेत्र में बकरी पालन का व्यवसाय इसीलिए तो फूल फल रहा था । चारों ओर जंगल, पास में छोटी छोटी पहाडियां । पहाडियों के बीच छोटे छोटे मैदान । मैदान और पहाडियों से सटकर बहती छोटी सी नदी और नदी के उपरी कछार पर बन गए टीले के उपर स्थ्ति एक नामी गांव ढाबा । ढाबा का मतलब होता है भंडार । मगर यह ढाबा नाम का कोई एक ही गांव नहीं है इस क्षेत्र में । ढाबा नाम के तीन और गांव है, अत: पहचान के लिए हर ढाबा के साथ कोई विशेषण जोड दिया जाता है । मैं जिस ढाबा का जिक्र कर रहा हूँ उसे इस क्षेत्र में बोकरा ढाबा के नाम से जाना जाता है । बकरी पालन का व्यवसाय खूब फूला फला, इसीलिए होते होते इसका नाम बोकरा ढाबा प्रचलित हो गया ।
छत्तीसगढी में बकरे को बोकरा ही कहते हैं । घर धर तो यहां बकरे पलते हैं । सुबह हुई नहीं कि घरों से बकरों के दलों के साथ छोकरे निकल पडते हैं अपने निरापद चरागाह की ओर । इस चरागाह का नाम भी बोकरा डोंगरी है । अब तो गीतों में भी इस डोंगरी का नाम आने लगा है । छत्तीसगढ में एक लोकगीत भी प्रचलित है
“चलो जाबो रे
बोकरा चराय बर जी
बोकरा डोंगरी खार मन ।“
अर्थात चलो साथियों, बोकरा डोंगरी में चले अपने अपने बकरे चराने के लिए आगे वर्णन आता है कि डोंगरी में घास बहुत है । पेडों की छाया है । पास में बहती है नदी ।
यह बात भी सोची जा सकती है कि गांव का नाम “बोकरा ढाबा” ही क्यों पडा । आखिर इस रूप में गांव की पहचान क्यों बनी ?
हुआ यूं कि काशीराम यादव रोज की तरह अपनी बकरियां भेडे लेकर पांच बरस पहले एक दिन बडे फजर निकला डोंगरी की ओर । साथ में उसका पंद्रह बरस का पडका हीरा भी था । हीरा तालापार के स्कूल में आठवीं तक पढकर निठल्ला बैठ गया था । उसके घ्र में पूंजी के रूप में मात्र तीस बकरियां और भेडे थीं । बाप बकरी चराकर उसे आठवीं तक ही पढा पाया । स्कूल तो इस क्षेत्र में दस मील दूर एक ही गांव थ । नदी उस पार तालापार में नदी पार कर वह स्कूल जाता था । ढाबा से सिर्फ दो लडके अब तक आठवीं पास कर सके हैं । एक यह हीरा, दूसरा समारू । दोनों के बाप बकरी चराते थे । दोनों आठवीं पास करने के बाद खाली बैठ गये । नकरी लगती तब कुछ और पढ लेते । घर की हालत इतनी अच्छी नहीं कि उनके बाप को शहर भेजकर उन्हें आगे पढा पाते । इसीलिए वे भी अपने बाप के साथ चल निकलते डोंगरी की ओर ।
उस दिन कांशीराम के साथ हीरा भी जा रहा था । आगे आगे बकरियां चर रही थी बकरियों के गले में टूनुन टुनुन बजती घंटियां । कुछ बडी बकरियों के गले में छोलछोला । एक दो गाऍं भी थीं । बहुत हरहरी थीं और भागती बहुत थी, इसीलिए उनके पावों में काशी ने लकडी का गोडार बांध दिया था । सब जानवर आगे आगे जा रहे थे । अभी मैदान आया ही चाहता था कि दो मोटरसाइकिलों से लंबी लंबी मूँछोवाले चार लोग उतरकर खडे हो गए । उनके हाथें में लाठियां थीं एक के हाथ में चिडियां मारने की बंदूक भी थी । काशी को रोकरकर एक लम्बे से आदमी ने कहा, “रूक बे बोकरा खेदा” । काशी को उसका यह कथन बुरा तो लगा, मगर वह जान गया कि या तो ये जंगल विभाग के आदमी हैं या पुलिस के या पास के कस्बे के दारू के ठेकेदार के बंदे । हीरा के साथ सहमते हुए काशी उन्हें सलाम कर खडा हो गया ।
उनमें से एक नौजवान ने कहा, “भाई मियां, क्या आदमी का शिकार करना है चिडिया तो साली कोई मरी नहीं ।“
मूँछ वाले ने उसकी बात का मजा लेते हुए कहा, “यार तुम भी हो अकल के दुश्मन । अरे भाई, आदमी तो यहां कोई रहता नहीं । बकरी चराते हैं सब साले । सभी जानवर की तरह हैं । तुम भी यार चश्मा लगाओं आंखों में । यह लंडूरा तुम्हें आदमी दिखता है क्या ?“
कहते हुए उसने काशी के हाथ की बॉंसुरी छीन ली । हीरा ने अचानक चिल्लाकर कहा, “बांसुरी क्यों छीनते हैं ? हमने क्या बिगाडा है तुम्हारा ?“ मुछियल ने एक लात हीरा के कूल्हे पर जमाते हुए कहा, “तुम क्या बिगाडोगे साले ? बिगाडने के लिए चाहिए दम ! अब जो भी बिगाडना होगा हम बिगाडेंगे ।“
हीरा मार खाकर जमीन पर गिर गया । उसके मुंह से खून आने लगा । काशी दौड पडा बेटे को उठाने के लिए । तब तक चारों में से सबसे तगडे लगने वाले व्यक्ति ने हुकुम दे दिया । “उठा लो साले के दो बकरे । लोंडा तो लात खाकर सुधर ही गया । चलो डालो रवानगी ।“
बकरों को जब उन्होंने कंधों पर लादा तो बाप बेटे उनके पीछे दोड पडे । बकरे “मैं मैं” कर अपने चरवाहे मालिकों से आर्तनाद कर छुडा लेने का आग्रह करते रह गए । बाप बेटे को दौडते देखा तो उन लोगों ने कुछ छरें भी बंदूक से चला दिए । काशी के पांव में छर्रा जा लगा । वह बांवला हाे गया । उसने उठाकर एक पत्थर पीछे वाले के पीठ पर दे मारा । पत्थर लगते ही पह तिलमिलाकर रूक गया । चारों वहीं मोटर साइकिल रोककर खडे हो गए । उनमें से एक आदमी ने सबको रूक जाने को कहा और अकेला ही लहकते हुए आगे बढा । उसने एक लम्बा सा चाकू निकाला और एक झटके में काशी के पेट में पूरा घुसा दिया । हीरा बाप से लिपटकर रोने लगा । तब तक और चरवाहे भी आने लगे । हत्यारे बकरों को लादकर भाग गए । उसी रात हीरा के सिर से बाप का साया हट गया ।
“बोकरा ढाबा” में हुई यह पहली हत्या थी । चारों तरफ शोर उड गया कि काशी यादव दिन दहाडे मार दिया गया । आसपास के गांवों में बात फैल गई । लोग कुछ दिन तो बोकरा डोंगरी की ओर बकरों के साथ नहीं आए, फिर सब भूल भाल गए ।
अब हीरा ही घर का सयाना हो गया । अपनी विधवा मॉं और छोटे भाई बसंत का पालनहार । वह बकरियां चराता और घर का भार उठाता । साल भर बाद हीरा के गांव में एक दिन मरे हुए जानवर के शरीर से उठने वाली दुर्गंध भर गई । लोग ओक ओक करने लगे । सयानों ने बताया कि नदी के किनारे पर यहां से दस कोस की दूरी पर एक शराब का कारखाना खुला है । उसमें शराब बननी शुरू हो गयी है । तब हीरा को पता चला कि यह जो मरे हुए जानवर के शरीर से उठनेवाली गंध से भी बदबूदार गंध गांव में घुसी है, वह है क्या आखिर । फिर धीरे धीरे एक और मुसीबत आने लगी । नदी का पानी भी दूषीत होने लगा । बहकर जो चमचम चममच पानी आ रहा था वह कुछ कुछ ललहू हो जाता था, मटमैला । उसका स्वाद भी कुछ कसैला होने लगा । बकरियां वह पानी पीकर बीमार होने लगी । कुछ मर भी गई । आसपास के गांव वाले परेशान होने लगे । बोकरा डोंगरी में हलचल कम हो गई । लडके वहां डंडा पचरंगा खेलते, कबडडी खुडवा जमाते थे । मगर अब घुम घामकर ही आ जाते । डोंगरी में लगे जंगली पेडों के पत्ते भी झडने लगे । त्राहि त्राहि मचने लगी । गांववाले अधमरे हो गए । उन्हें कुछ भी न सूझता ।
एक दिन हीरा ने देखा, एक जीप में चार पांच लोग गांव में आए । उनमें वही मुछियल तडंगा जवान भी था जिसके छूरे से उसके बाप की जान गई थी । जीप बीच गांव में रूकी । उस जीप से एक अफसरनुमा व्यक्ति उतरा । अफसर ने कहा, “पास में हमारा कारखाना है । वहां हम आपके गांव के लोगों को नौकरी देंगे । ये हमारे सुरक्षा अधिकारी हैं । आप जाकर इनसे गेट पर मिलिए । ये आपको भीतर भेज देंगे ।“ इतना कहकर मुछियल को साथ लेकर अफसर जीप में बैठने लगा । हीरा में जीप के आगे जाकर कहा, “रूकिए साहब ।“
“क्या बात है भाई ।“ अफसर ने कहा ।
“मैं हूँ हीरा ।“
”तुम भी आ जाना ।“
”मेरे बाप का नाम काशी । “
“उन्हें भी लेते आना ।“
”वो अब नहीं हैं साहब ।“
”ओ हो, मुझे दुख है ।“
“दुख नहीं साहब, आपको काहे का दुख । जो लोगों की जान लेता, वह तो आपका सुरक्ष अधिकारी है । दुख काहे का ? जो मारे जान, उसे तो आप सिर पर चढाए घुम रहे हैं ।“
अफसर अब जीप से उतर गया । मुछियल भी सर नवाए जमीन पर आ खडा हुआ ।
गांव के लोग भी जमीन पर आ खडे हुए । हीरा से सभी बातें सुनकर अफसर ने कहा, “भाई हीरा, तुम हो हिम्मती नौजवान । हम तुमसे खुश हैं । हम तुम्हें अच्छी नौकरी देंगे । बाप तो अब है नहीं । जो हुआ सो हुआ । अब आगे की सोचो । गुस्से में काम नहीं बनता ।”
हीरा ने कहा, “साहब समय से सम्हलना जरूरी है । मुझे वह दिन भूलता नहीं जब इस आदमी ने
छूरे से मेरे बाप को मार गिराया था, इसलिए बाप की लाश कंधे से उतरती नहींं है । मुझे लगता है कि धीरे धीरे पूरा छत्तीसगढ उसी तरह जमीन पर गिरकर तडपेगा, जैसे मेरा बाप तडपा था । और उसकी लाश पर आप लोग एक के बाद एक कारखाने लगाकर मुंह में मिश्री घे।लते हुए कहेंगे कि पीछे की भूलो और आगे बढो । साहब, हम लोग मूरख तो हैं, मगर अंधे नहीं । देख रहे हैं सारा खेल । ऑंखें हमारी देखने भी लगी हैं साहब । लेकिन आप लोग ऑंखों में टोपा बांध रखे हैं ।“
अब साहब उखड गए । उन्होंने कहा, “लडके, देख रहा हूँ कि बहुत चढ गए हो । बाप की गति देखकर भी सुधार नहीं हुआ है । ऐंठते ही जा रहे हो । फूँक देंगे तो सारा इलाका उजड जाएगा ।“
अफसर अभी बात कर ही रहा था कि मुछियल ने निकाल दिया तेंदूसार की लाठी का । धाड की
आवाज हुई और चाकू दूर जा गिरा । मुछियल का हाथ टूटकर झूल गया थ । तब तक अफसर ने अपना पिस्तौल निकाल लिया था, मगर उसने देखा कि सैकडों नौजवान लाठियों से लैस होकर उसकी ओर “मारो मारो” कहते हुए बढ रहे हैं ।
मुछियल को जीप में बैठाकर अफसर वहॉं से भागने लगा । हीरा ने झट दौडाकर गिरा हुआ चाकू उठा लिया । खुली हुई ज ीप थीं । सारे बोकरा ढाबा की बकरियॉं इधर उधर बगरकर चर रही
थी । गांव के लोग तो यहीं उलझे खडे थे गांव टीले पर है इसलिए जीप नीचे की ओर सर्र से भाग रही थी । हीरा को पता नहीं क्या हुआ कि उसने उठाकर चाकू जीप की ओर फेंक दी ।
चाकू लगा ठीक डाइवर के सिर पर । डाइवर का संतुलन बिगड गया । गाडी उलट पलट हो गई और देखते ही देखते सवारों के साथ गहरी नदी में जा गिरी । नदी के जल में शराब का मैल घुला हुआ था । अचेत सवार जल के भीतर समाते चले गए ।
डा. परदेशीराम वर्मा
लेबल
छत्तीसगढ़ की कला, साहित्य एवं संस्कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख
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