राजेश सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजेश सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

... वह

महसूस करने की जमीन पर थोड़ी-बहुत नमी अब भी शेष है, लेकिन उस पर चिन्ता/चिन्‍तन के पत्थर इस तरह लदे हैं कि कुछ कहने या लिख पाने की धारा पूर्व की भांति किसी लघु उत्‍स्फोट के साथ गेसियर की तरह नहीं फूटती वरन इन पत्थरों के बीच किसी उपेक्षित से दरार से रिसने लगती है। पता नहीं यह विस्फोट है या रिसना ...



एक लंबे अरसे बाद कुछ दिनों पूर्व गृहग्राम जाना हुआ। लोगों से मिलते-जुलते और दुकानों से भर गई सड़कों के दोनों किनारों के बीच स्मृतियों की पतली होती जा रही गलियों में से गुजरते हुए चौक के पास एक दृश्य पर निगाह रुकी-
कुछ वर्ष पूर्व की प्राकृतिक सुंदरता भरी कन्या, पांवों के उपर टंगी मुचड़ी सी साड़ी और बोसीदा हालत के साथ, यौवन के समक्ष प्रकट संक्रमण काल में प्रवेश करते, अपने सद्य गत-सौंदर्य को संभालने के असफल प्रयास में, अपनी 4-5 वर्षीय वर्नाकुलर कान्वेंटगामिनी कन्या की उंगली थामे, सड़क के किनारे के ठेले से कुछ सौदा-सुलुफ कर रही थी ...

कुछ पुराने दृश्य याद आए। 7-8 वर्ष पूर्व जब यह गत सौंदर्या सायकल पर कॉलेज के लिए निकलती तब अपने सौंदर्य का अहसास प्रतिपल, पूरे रास्ते उसे जागृत और सजग रखता और सायकल पैडल पर उसके पांवों के दबाव से नहीं उसके अपने सौंदर्य के गुरूर से गतिमान रहती।

फौरी और सटीक टिप्पणियों के लिए जाने जाते वे अक्सर कहते- गीतांजली एक्सप्रेस जा रही है। इस रूपक की कैफियत पर बताते कि जैसे गीतांजली एक्सप्रेस अपनी गति के कारण रेल पांत के किनारे पड़ी हल्की-फुल्की चीजों के साथ-साथ गिट्‌टी के छोटे-छोटे टुकड़ों को भी उड़ाती चलती है उसके सायकिल के गुजरने पर सड़क के दोनों किनारों पर खड़े आशिक छिटक कर दूर जा गिरते हैं। उनकी इस कैफियत पर उस समय जो लाइनें याद आईं, बकौल दुष्यंत कुमार-
तुम किसी रेलगाड़ी सी गुजरती हो
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं

आज जब सड़क किनारे के ठेले से सौदा-सुलुफ करती उस सद्य गत सौंदर्या को याद करता हूं तो उस समय जो फौरी लाइन दिमाग में आई वह थी-
''हाथ ठेले से हाफ डजन केले खरीदती वह''
यह तो थी फौरी टिप्पणी। बाद में विचार करने पर जब इन दो स्थितियों पर लिखना चाहा तो वह कुछ इस प्रकार लिखा गया-

पुनः दृश्य 1
तुम किसी रेलगाड़ी सी गुजरती हो
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं

दृश्य 2
गुजरते वक्त के साथ-साथ, धीरे-धीरे तुम मालगाड़ी बनती जाती हो। सब्जी, अचार, मुरब्बे और पापड़ बनाते, पति, बच्चे, ननद, जिठानी और सास-ससुर के ढेर तुम पर लदते जाते हैं और इस ओवर लोडिंग से मैं किसी कोयले के टुकड़े सा तुमसे अलग छिटक कर रेल पांत के किनारे जा गिरता हूं, जहां कोयला बीनने वाले मुझे बेच आते हैं, जय जगदम्बा स्वीट्‌स और जलपान गृह में और मैं गुलाब जामुन के शीरे, पापड़ी सेव के तेल और समोसे के मसाले को आंच देते-देते जल कर मैं ख्‍वार होता जाता हूं और तुम किसी बड़े से जंक्शन के आउटर सिग्नल पर लंबी-लंबी सीटियां बजाती हांफती खड़ी रहती हो

मन में 9 मार्च 2001
कागज पर 13 मार्च 2001
अंत में शीर्षक ''यादों के बियाबां में जलावन चुनती वह''

राजेश सिंह



इस अतिथि पोस्‍ट के लेखक हैं कवि श्री राजेश सिंह जी, जो बिलासपुर में रहते हैं। राजेश जी अपने प्रोफाईल में अपने संबंध में कहते हैं 'अपनों के साथ देखे सपनों के सेतु पर चल कर जाना है उस पार।' राजेश जी का मोबाईल न. +919229158700 है एवं ई-मेल rajeshakaltara@gmail.com राजेश जी का ब्‍लॉग है तथागत .. 




मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया

देवानंद की पुस्तक 'रोमांसिग विथ लाइफ' तो पूरी तरह पढ़ी नहीं, ... पुस्तकें इतनी महंगी हो गई हैं कि पढ़ने के थोड़ा-बहुत शेष रह गए मोह के बाद भी पसंद की सारी पुस्तकों को खरीद पाना संभव नहीं। कोई अच्छा पुस्तकालय भी पहुंच और जानकारी में नहीं। अलावा इसके इंटरनेट ने पुस्तकों को चलन से बाहर सा कर दिया है। हालांकि पुस्तकें, पुस्तकें होती हैं। किताब में रखे मयूरपंख से पृष्ठ को खोलकर पढ़ना शुरू करना मुझे आज भी आसान लगता है। लैपटॉप ऑन करना फिर एक आवाज सुनना, इंटरनेट कनेक्ट होने का इंतजार, स्क्रीन रोशन होने का इंतजार और बहुत सारी कुजियों को दबाने के बाद वांछित जगह पहुंचना, तब तक पढ़ने का मूड आधा रह जाता है। खैर... 

'रोमांसिग विथ लाइफ' पर अलग-अलग पत्रिकाओं में समीक्षा/टिप्पणी पढ़ने और डेढ़-दो साल पहले 'सीधी बात' में प्रभु चावला के साथ देव साहब की बातचीत सुनने के बाद मुझे जो लगा, वह देवानंद की आमरूप से जानी-पहचानी एक रोमांटिक हीरो की छवि से सर्वथा अलग है। रोमांटिक हीरो से जो छवि बनती है वह है अपनी समकालीन हीरोइनों यथा सुरैया से जीनत अमान तक लगभग सभी हीरोइनों के साथ परदे के बाहर भी किसी हद तक रोमांस में पड़े रहना। ऐसी सोच स्वाभाविक भी है सफल, खूबसूरत, मस्त, कभी नहीं मंद पड़ने वाली ऊर्जा से सराबोर, सदाबहार हीरो के प्रति हीरोइनों का आकर्षित हो जाना बिल्कुल नहीं चौंकाता। 

पर देवानंद स्वयं के अनुसार रोमांस से तात्पर्य किसी इंसानी, शरीरी और दुनियावी रोमांस से नहीं है इसके लिए उनके समकालीन राजकपूर और दिलीप कुमार को संभवतः प्रामाणिक रूप से रोमांटिक कहा जा सकता है, जिनके फिल्म-हीरोइनों के साथ प्रेम-प्रसंग आम होते रहे। देवानंद को रोमांस के लिए किसी विपरीत लिंगी पात्र की आवश्यकता नहीं होती। देवानंद के रोमांस से तात्पर्य किसी व्यक्ति से नहीं, वरन जिंदगी से रोमांस, समग्र अर्थों में जिंदगी से रोमांस, किसी अमूर्त से रोमांस है। रोमांस, जिसमें किसी भौतिक स्वरूप या जिस्मानी अस्तित्व के लिए कोई स्थान नहीं होता। रोमांस के Concept से शब्दशः मतलब है एक सूझ या विचार। ज्यादा साफ अर्थों में देव साहब का रोमांस- रोमांस की अवधारणा Hypothesis से रोमांस है। जिंदगी के साथ प्यार में पड़े रहने से प्यार, उसकी चाल से प्यार, प्यार करने और उसमें स्थाई और सतत रूप से डूबे रहने से प्यार, जिंदगी के हर रंग से प्यार, एक एहसास से प्यार, प्यार की संभावनाओं से प्यार ...। 

नाम के अनुरूप दैवीय आनंद और सतत मोड़ लेते प्रवाहमय जीवन से मुकम्मल तौर पर आत्मीयता, जैसी कि उनके जीवन पर एक नजर डालने से स्पष्ट हो जाता है कि वे सदैव देव+आनंद ही बने रहे, देव+दास कभी नहीं हुए, यह खिताब दिलीप कुमार के नाम रहा। बाद के वर्षों में उनकी फिल्में नहीं चलने के बाद भी वे फिल्में बनाते रहे। जितना पाया उससे आगे खोजने, और आगे जाने की जरूरत समझते रहे। अलग-अलग देश-काल में बदलती राहों पर चलती हुई जिंदगी को देखते और महसूस करते रहे। उसका अपनी निगाह से विश्लेषण कर सेल्यूलाइड के माध्यम से हम तक पहुंचाते, जिंदगी से संवाद करते रहे। ईश्‍वर ने उन्हें एक सुदीर्घ जीवन काल से नवाजा भी और वे अपनी इस नवाजत को पूरी ईमानदारी से एक पर्याप्त सार्थक जिंदगी बनाने में लगाते रहे। उनके साथ के एक और निर्माता, निर्देशक, अभिनेता ने जिंदगी के हर रंग को सेल्युलाइड पर उतार कर हम तक पहुंचाने का बेहतरीन काम किया, चमत्कृत करने की हद तक पहुंचाया- गुरूदत्त ने। अफसोस कि उन्होंने देव साहब के उलट, अपनी जिंदगी बड़ी तेजी और बेदर्दी से खर्च कर डाली। 

जिंदगी के प्रति उन्होंने रोमांस और आकर्षण एक निस्पृहता, बिना किसी मोह के, भावनारहित रोचकता के साथ बनाए रखा, किसी अंत के बारे में सोचे बिना। इसलिए उन्होंने मृत्यु के बारे में कभी बात ही नहीं की, उनकी फिल्मों में सुखांत ही नजर आया, एक अपवाद ''गाइड'' के अलावा, जो उनकी परिपक्वता की सबसे चमकीली मिसाल है, लेकिन इस फिल्म में भी जीवन के बाद के जीवन का विमर्श है। मृत्यु की बात तो वही करेगा, अंत की बात भी वही करेगा, जो शरीर के अंत से दहशतजदा होगा। जिसे जिंदगी से मोह हो, लालच हो, लंबे जीवन की सार्थकता या निरर्थकता के सवाल से परे, परन्तु रोमांस में मृत्यु या अंत जैसी चर्चा के लिए स्थान नहीं होता। 

हमेशा फिल्में बनाते रहना, कुछ नया खोजने और इन सबसे, शायद सब कुछ पाने की उनकी ललक और अदम्य इच्छा ने मुझे ज्यां पाल सार्त्र के अंतिम साक्षात्कार की याद दिला दी- 
सवाल :- जिंदगी से आप खुश हैं?
सार्त्र :- हां, मैं जिंदगी से बेहद खुश हूं। 
सवाल :- क्या इसलिए कि जिंदगी ने आपको वह सब कुछ दिया जिसकी आपको चाह थी?
सार्त्र ने कहा- हां जिदगी ने मुझे बहुत कुछ दिया पर जो कुछ दिया वह सब कुछ नहीं था, पर इसके लिए आप कर भी क्या सकते हैं। 

देवानंद के साथ भी यही बात थी जिंदगी ने उन्हें सब कुछ दिया - रूप, नाम, दौलत, शोहरत, अक्षुण्ण ऊर्जा और सुन्दर स्त्रियों का साथ, एक स्टाइल और एक अलग पहचान पर उन्हें इस जीवन काल में जो भी मिला, उन्होंने उसे सब कुछ नहीं माना। कुछ और, कुछ और पाने की प्यास में जिंदगी से सब कुछ पाने का प्रयास करते रहे। इसी कोशिश ने उन्हें रोमांटिक हीरो बनाया। हीरोईनों से नहीं, जिंदगी से रोमांस करने वाला हीरो। फिल्मों के सफल असफल होने, चलने या न चलने और उनसे लाभ कमाने की प्रत्याशा से अलग, वे अपनी रचनाधर्मिता को अंत तक निबाहते, मांजते और समृद्ध करते रहे, एक संत की भांति, संत (रेणु के लिए निर्मल वर्मा के कथन की तरह) से तात्पर्य - 
''एक ऐसा व्यक्ति जो अपने इस लौकिक जीवन में किसी चीज को त्याज्य, घृणास्पद और अपवाद नहीं मानता। एक जीवित तत्व में पवित्रता और सौदर्य और चमत्कार को खोज ही लेता है, इसलिए नहीं कि वह इस पृथ्वी पर उगने वाली कुरूपता, अन्याय, अंधेरे और आंसुओं को नही, देखना चाहता बल्कि इन सबको समेटने वाली अबाध मानवता को, पहचानता है, दलदल को कमल से अलग नहीं करता, दोनों के बीच रहस्यमय और अनिवार्य रिश्ते को पहचानता है।''

देवानंद ऐसे ही रोमांटिक हीरो का नाम था, जिसका जिंदगी से रोमांस पूरे 88 वर्षों तक पूरी शिद्दत के साथ निर्बाध रूप से बना रहा। आज भी ऐसा नहीं लगता कि वे हमारे बीच नहीं हैं, क्योंकि देवानंद सिर्फ जिस्मानी संज्ञा नहीं। लगता है कि जुहू में पुरानी चन्‍दन टाकीज और इस्कान के हरे रामा हरे कृष्णा मंदिर के बीच किसी एक अलसाई सुबह या सुरमई सांझ, सड़क पर उनसे अचानक मुलाकात हो जाए और हम आश्चर्य से चौंक कर कहें- 
सुनो, तुम्हारा असली नाम क्या है - जी, जॉनी।
और नकली - नकली भी जॉनी। 
इसके अलावा और भी कोई नाम है - जी, ज् ज् ज् ज् जॉनी, ... आपको ज्यादा पसंद है?

राजेश सिंह



इस अतिथि पोस्‍ट के लेखक हैं कवि श्री राजेश सिंह जी, जो बिलासपुर में रहते हैं। राजेश जी अपने प्रोफाईल में अपने संबंध में कहते हैं 'अपनों के साथ देखे सपनों के सेतु पर चल कर जाना है उस पार।' राजेश जी का मोबाईल न. +919229158700 है एवं ई-मेल rajeshakaltara@gmail.com राजेश जी का ब्‍लॉग है तथागत .. 




लेबल

संजीव तिवारी की कलम घसीटी समसामयिक लेख अतिथि कलम जीवन परिचय छत्तीसगढ की सांस्कृतिक विरासत - मेरी नजरों में पुस्तकें-पत्रिकायें छत्तीसगढ़ी शब्द Chhattisgarhi Phrase Chhattisgarhi Word विनोद साव कहानी पंकज अवधिया सुनील कुमार आस्‍था परम्‍परा विश्‍वास अंध विश्‍वास गीत-गजल-कविता Bastar Naxal समसामयिक अश्विनी केशरवानी नाचा परदेशीराम वर्मा विवेकराज सिंह अरूण कुमार निगम व्यंग कोदूराम दलित रामहृदय तिवारी अंर्तकथा कुबेर पंडवानी Chandaini Gonda पीसीलाल यादव भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष Ramchandra Deshmukh गजानन माधव मुक्तिबोध ग्रीन हण्‍ट छत्‍तीसगढ़ी छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म पीपली लाईव बस्‍तर ब्लाग तकनीक Android Chhattisgarhi Gazal ओंकार दास नत्‍था प्रेम साईमन ब्‍लॉगर मिलन रामेश्वर वैष्णव रायपुर साहित्य महोत्सव सरला शर्मा हबीब तनवीर Binayak Sen Dandi Yatra IPTA Love Latter Raypur Sahitya Mahotsav facebook venkatesh shukla अकलतरा अनुवाद अशोक तिवारी आभासी दुनिया आभासी यात्रा वृत्तांत कतरन कनक तिवारी कैलाश वानखेड़े खुमान लाल साव गुरतुर गोठ गूगल रीडर गोपाल मिश्र घनश्याम सिंह गुप्त चिंतलनार छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ वंशी छत्‍तीसगढ़ का इतिहास छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास जयप्रकाश जस गीत दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति धरोहर पं. सुन्‍दर लाल शर्मा प्रतिक्रिया प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट फाग बिनायक सेन ब्लॉग मीट मानवाधिकार रंगशिल्‍पी रमाकान्‍त श्रीवास्‍तव राजेश सिंह राममनोहर लोहिया विजय वर्तमान विश्वरंजन वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह वेंकटेश शुक्ल श्रीलाल शुक्‍ल संतोष झांझी सुशील भोले हिन्‍दी ब्‍लाग से कमाई Adsense Anup Ranjan Pandey Banjare Barle Bastar Band Bastar Painting CP & Berar Chhattisgarh Food Chhattisgarh Rajbhasha Aayog Chhattisgarhi Chhattisgarhi Film Daud Khan Deo Aanand Dev Baloda Dr. Narayan Bhaskar Khare Dr.Sudhir Pathak Dwarika Prasad Mishra Fida Bai Geet Ghar Dwar Google app Govind Ram Nirmalkar Hindi Input Jaiprakash Jhaduram Devangan Justice Yatindra Singh Khem Vaishnav Kondagaon Lal Kitab Latika Vaishnav Mayank verma Nai Kahani Narendra Dev Verma Pandwani Panthi Punaram Nishad R.V. Russell Rajesh Khanna Rajyageet Ravindra Ginnore Ravishankar Shukla Sabal Singh Chouhan Sarguja Sargujiha Boli Sirpur Teejan Bai Telangana Tijan Bai Vedmati Vidya Bhushan Mishra chhattisgarhi upanyas fb feedburner kapalik romancing with life sanskrit ssie अगरिया अजय तिवारी अधबीच अनिल पुसदकर अनुज शर्मा अमरेन्‍द्र नाथ त्रिपाठी अमिताभ अलबेला खत्री अली सैयद अशोक वाजपेयी अशोक सिंघई असम आईसीएस आशा शुक्‍ला ई—स्टाम्प उडि़या साहित्य उपन्‍यास एडसेंस एड्स एयरसेल कंगला मांझी कचना धुरवा कपिलनाथ कश्यप कबीर कार्टून किस्मत बाई देवार कृतिदेव कैलाश बनवासी कोयल गणेश शंकर विद्यार्थी गम्मत गांधीवाद गिरिजेश राव गिरीश पंकज गिरौदपुरी गुलशेर अहमद खॉं ‘शानी’ गोविन्‍द राम निर्मलकर घर द्वार चंदैनी गोंदा छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय छत्‍तीसगढ़ पर्यटन छत्‍तीसगढ़ राज्‍य अलंकरण छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंजन जतिन दास जन संस्‍कृति मंच जय गंगान जयंत साहू जया जादवानी जिंदल स्टील एण्ड पावर लिमिटेड जुन्‍नाडीह जे.के.लक्ष्मी सीमेंट जैत खांब टेंगनाही माता टेम्पलेट डिजाइनर ठेठरी-खुरमी ठोस अपशिष्ट् (प्रबंधन और हथालन) उप-विधियॉं डॉ. अतुल कुमार डॉ. इन्‍द्रजीत सिंह डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव डॉ. गोरेलाल चंदेल डॉ. निर्मल साहू डॉ. राजेन्‍द्र मिश्र डॉ. विनय कुमार पाठक डॉ. श्रद्धा चंद्राकर डॉ. संजय दानी डॉ. हंसा शुक्ला डॉ.ऋतु दुबे डॉ.पी.आर. कोसरिया डॉ.राजेन्‍द्र प्रसाद डॉ.संजय अलंग तमंचा रायपुरी दंतेवाडा दलित चेतना दाउद खॉंन दारा सिंह दिनकर दीपक शर्मा देसी दारू धनश्‍याम सिंह गुप्‍त नथमल झँवर नया थियेटर नवीन जिंदल नाम निदा फ़ाज़ली नोकिया 5233 पं. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकार परिकल्‍पना सम्‍मान पवन दीवान पाबला वर्सेस अनूप पूनम प्रशांत भूषण प्रादेशिक सम्मलेन प्रेम दिवस बलौदा बसदेवा बस्‍तर बैंड बहादुर कलारिन बहुमत सम्मान बिलासा ब्लागरों की चिंतन बैठक भरथरी भिलाई स्टील प्लांट भुनेश्वर कश्यप भूमि अर्जन भेंट-मुलाकात मकबूल फिदा हुसैन मधुबाला महाभारत महावीर अग्रवाल महुदा माटी तिहार माननीय श्री न्यायमूर्ति यतीन्द्र सिंह मीरा बाई मेधा पाटकर मोहम्मद हिदायतउल्ला योगेंद्र ठाकुर रघुवीर अग्रवाल 'पथिक' रवि श्रीवास्तव रश्मि सुन्‍दरानी राजकुमार सोनी राजमाता फुलवादेवी राजीव रंजन राजेश खन्ना राम पटवा रामधारी सिंह 'दिनकर’ राय बहादुर डॉ. हीरालाल रेखादेवी जलक्षत्री रेमिंगटन लक्ष्मण प्रसाद दुबे लाईनेक्स लाला जगदलपुरी लेह लोक साहित्‍य वामपंथ विद्याभूषण मिश्र विनोद डोंगरे वीरेन्द्र कुर्रे वीरेन्‍द्र कुमार सोनी वैरियर एल्विन शबरी शरद कोकाश शरद पुर्णिमा शहरोज़ शिरीष डामरे शिव मंदिर शुभदा मिश्र श्यामलाल चतुर्वेदी श्रद्धा थवाईत संजीत त्रिपाठी संजीव ठाकुर संतोष जैन संदीप पांडे संस्कृत संस्‍कृति संस्‍कृति विभाग सतनाम सतीश कुमार चौहान सत्‍येन्‍द्र समाजरत्न पतिराम साव सम्मान सरला दास साक्षात्‍कार सामूहिक ब्‍लॉग साहित्तिक हलचल सुभाष चंद्र बोस सुमित्रा नंदन पंत सूचक सूचना सृजन गाथा स्टाम्प शुल्क स्वच्छ भारत मिशन हंस हनुमंत नायडू हरिठाकुर हरिभूमि हास-परिहास हिन्‍दी टूल हिमांशु कुमार हिमांशु द्विवेदी हेमंत वैष्‍णव है बातों में दम

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...