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अप्रैल, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

जे बहु गणा गता सो पंथा : अजीत जोगी (Ajit Jogi)

छत्तीसगढ में किसी छत्तीसगढिया का पहला नाम सम्मान से मेरे जहन में कौंधता है तो वह पहला नाम है, अजीत प्रमोद कुमार जोगी । हॉं, अजीत जोगी एक व्यक्ति नहीं एक संस्था, एक विचार । हमारी अस्मिता को नई उंचाईयॉं प्रदान करने वाले पेंड्रा के सुविधविहीन छोटे से गांव में जन्म लेकर एस पी, कलेक्टर फिर सांसद व छत्तीसगढ के प्रथम मुख्य मंत्री बनने के गौरव के बावजूद छत्तीसगढिया सहज सरल व्यक्तित्व के धनी, अजीत प्रमोद कुमार जोगी । छत्तीसगढ के जनजातीय इतिहास को यदि हम खंगालें तो हमें परिगणित समुदाय की सत्ता का विस्तृत रूप नजर आता है, सत्ता व प्रतिभा का यह आग बरसों से राख में दबा गौरेला के गांव में पडा था जो छत्तीसगढ की सत्ता का असल हकदार था । खडखडिया सायकल से मोहन, शंकर व राजू के साथ आठ किलोमीटर सायकल ओंटते हुए स्कूल जाकर पढाई करने, मलेनियां नदी के बहाव को घंटों निहारने के साथ ही ठाकुर गुलाब सिंह के सिखाये संस्कृत श्लोंकों को आज तक हृदय में बसाये अजीत जोगी जी नें खाक से ताज तक की यात्रा अपनी मेहनत व अपनी असामान्य प्रतिभा के सहारे तय की है । मौलाना अबुल कलाम आजाद अभियांत्रिकी महाविद्यालय, भोपाल स

क्या पलाश के वृक्ष से एकत्रित किया गया बान्दा आपको अदृश्य कर सकता है?

18. हमारे विश्वास , आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक , कितने अन्ध-विश्वास ? - पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय क्या पलाश के वृक्ष से एकत्रित किया गया बान्दा आपको अदृश्य कर सकता है? मुझे इस बात का अहसास है कि शीर्षक देखकर ही आप कहेंगे कि यह सब बेकार की बाते है क्योकि मि.इंडिया बनना तो सम्भव ही नही है। पर ग्रामीण अंचलो मे अभी भी इस तरह की बाते प्रचलित है। मै वर्षो से ग्रामीण हाटो मे जाता रहा हूँ। वहाँ जडी-बूटियो की दुकानो मे अक्सर जाना होता है। इन दुकानो मे बहुत बार दुर्लभ वनस्पतियाँ भी दिख जाती है। ऐसी ही दुर्लभ वनस्पतियाँ है पलाश नामक वृक्ष के ऊपर उगने वाले पौधे। इन्हे आम बोलचाल की भाषा मे बान्दा कहा जाता है पर विज्ञान की भाषा मे इन्हे आर्किड कहा जाता है। पलाश के वृक्ष से वांडा प्रजाति के आर्किड को एकत्र कर लिया जाता है फिर इस दावे के साथ बेचा जाता है कि इसे विशेष समय मे धारण करने से अदृश्य हुआ जा सकता है। वशीकरण और शत्रुओ से निपटने के लिये भी इसके प्रयो

आदिवासी समाज : पहचान का संकट (Adivasi samaj)

डॉ. परदेशीराम वर्मा छत्तीसगढ़ की पहचान देश के बाहर इसके लोक कलाकारों के कारण भी बनी है । देश भर में छत्तीसगढ़ के कलाकार प्रदर्शन देकर यश अर्पित करते हैं । प्रदर्शनकारी मंचीय विधाओं में अधिकांश आदिवासी संस्कृति से जुड़ी है । छत्तीसगढ़ भर के मैदानी गांवों में भई गौरा - गौरी पूजन होता है । सुरहुती अर्थात् दीपावली के दिन गौरा - गौरी की पूजा होती है । यह गोड़ों का विशेष पर्व है । इस दिन वे अपनी बेटियों को उसकी ससुराल से विदा कर मायके लाते है । इसी तरह शैला , करमा आदि नृत्य हैं । अब तो मैदानी इलाके में कलाकार भी शैला करमा नृत्य में प्रवीण हो चुके हैं । आदिवासियों के देवता हैं बूढ़ादेव । बूढ़ादेव भगवान शंकर के ही स्वरूप है । रायपुर का बूढ़ा तालाब वस्तुत : आदिवासी राजा द्वारा निर्मित है । बूढ़ापारा भी वहां बसा है । लेकिन यह दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि बूढ़ा तालाब का नाम बदल कर विवेकानंद सरोवर कर दिया गया है

क्या ड्रुपिंग अशोक का वृक्ष गृह वाटिका मे लगाने से व्यापार मे घाटा होने लगता है?

17. हमारे विश्वास , आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक , कितने अन्ध-विश्वास ? - पंकज अवधिया प्रस्तावना यहाँ पढे इस सप्ताह का विषय क्या ड्रुपिंग अशोक का वृक्ष गृह वाटिका मे लगाने से व्यापार मे घाटा होने लगता है? आधुनिक वास्तु शास्त्री गृह वाटिका मे ड्रुपिंग अशोक की उपस्थिति को अशुभ बताते है। वे तर्क देते है कि इसकी पत्तियाँ नीचे की ओर झुकी हुयी होती है। इससे धन की कमी होती जाती है। निराशा पैदा हो जाती है। वे किसी भी कीमत पर इसे हटाने की सलाह देते है और इसकी जगह दूसरे पेडो को लगाने पर जोर देते है। जैसा कि आपने पहले पढा है अशोक दो प्रकार के होते है। सीता अशोक का वर्णन भारतीय ग्रंथो मे मिलता है और इसके विभिन्न पौध भागो का प्रयोग बतौर औषधी होता है। ड्रुपिंग अशोक सजावटी पौधा है और इसी कारण इसे विदेश से भारत लाया गया है। इसका वर्णन प्राचीन ग्रंथो मे नही मिलता है। आधुनिक वास्तुविदो का दावा पहली ही नजर मे गलत लगता है। यदि वे प्राचीन वास्तुशास्त्र के आधार पर यह दावा कर रहे है तो इसके कोई मायने नही है। ड्रुपिंग अशोक

अट्ठन्‍नी चवन्नी तैं गिनत रहिबे गोई, एड सेंस के पईसा नई मिलै फटा फट

कोहा पथरा झन मारबे रे टूरा मोर बारी के आमा ह फरे लटा लट । गरमी के भभका म जम्‍मो सागे नंदा गे आमा अथान संग, बासी तिरो सटा सट । हमर भाखा के मेछा टेंवा गे, अब छत्‍तीसगढी म चेटिंग तुम करौ फटा फट । अक्‍कल के पइदल मैं निकल गेंव सडक म तिपै भोंमरा रे तरूआ जरै चटा चट । अट्ठन्‍नी चवन्‍नी तैं गिनत रहिबे गोई एड सेंस के पईसा नई मिलै फटा फट । पेट बिकाली के चिंता म संगी बिलाग लिखई तो बंद होही कटा कट । पागा बांधे बांधे टूरा मन निंगे, मूडी ढांके ढांके टूरी । कईसे मैं लिखौं नवां पोस्‍ट गोरी, इही हे मोर मजबूरी ।। (टोटल ठट्ठा है, लईका मन गर्मी के छुट्टी में धर में सकलाया है, ताश में रूपिया पइसा अउ चींपो गदही खेल रहा है, संगे संग रंग रंग के गाना बना रहा है, मोला कम्पोटर में बईठे देख कर । हा हा हा ..............) Tags: Chhattisgarh , गूगल एड सेंस , चींपो गदही

श्री हीरा सिंह देव मांझी उर्फ कंगला मांझी सरकार (kangala Majhi)

डॉ. परदेशी राम वर्मा प्रारंभिक परिचय - कंगला मांझी यह नाम छत्तीसगढ़ में आज भी गूजंता है । छत्तीसगढ़ के बुजुर्ग नेताओं ने कंगला मांझी के संगठन कौशल को देख कर उन्हें भरपूर सहयोग भी दिया । घनश्याम सिंह गुप्ता, डॉ. खूबचंद बघेल, ठाकुर प्यारे लाल सिंह, विश्वनाथ तामस्कर, चंदूलाल चंद्राकर जैसे नामी गिरामी नेता और छत्तीसगढ़ के सपूत कंगला मांझी के मित्र, हितचिंतक, हमसफर और सहयोगी थे । दुर्ग जिले के जंगल में कंगला मांझी ने अपना क्रांतिकारी मुख्यालय बनाया । लेकिन यह बहुत बाद की बात हैं । १९१० से १९१२ तक कंगला मांझी ने तप किया । एकान्त चिंतन और प्रार्थना का यह समय उनके लिए बहुत मददगार सिद्ध हुआ । वे १९१२ के बाद सार्वजनिक जीवन में ताल ठोंक कर उतर गए । लगभग सौ वर्ष का अत्यंत सक्रिय समर्पित, राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत जीवन जीकर वे ५ दिसंबर १९८’ का इस लोक से विदा हो गए । पंडित जवाहर लाल नेहरू को नये भारत का मसीहा मानने वाले कंगला मांझी का असली नाम हीरासिंह देव मांझी था । छत्तीसगढ़ और आदिवासी समाज की विपन्न और अत्यंत कंगाली भरा जीवन देखकर हीरासिंह देव मांझी ने खुद को कंगला घोषित कर दिया । इसील