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सितंबर, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

सुब्रत बसु : रंगकर्म के एक अध्‍याय का अंत

छत्‍तीसगढ अंचल के प्रख्‍यात रंगकर्मी एवं कई सिरियलों के निर्माता व निर्देशक, हिन्‍दी फिल्‍मों के शीर्ष निर्देशक अनुराग बसु के पिता सुब्रत बसु का निधन छत्‍तीसगढ सहित पूरे देश के लिए दुख का समाचार है । रायपुर फाफाडीह व रायपुर से भिलाई स्‍पात संयंत्र की सेवा स्‍वैच्छिक अवकाश लेकर 1987 से निरंतर मुम्‍बई में निवास करते हुए सुब्रत दादा नें देश में एक से बढकर एक नाटकों का मंचन किया है । उनके स्‍वयं के रंगमंचीय ग्रुप ‘अभियान’ के द्वारा कई महत्‍वपूर्ण नाटकों का मंचन किया गया है । छत्‍तीसगढ के भिलाई स्‍पात संयंत्र की कहानी पर आधारित स्‍टील बैले में सुब्रत दा का काम यादगार रहा है । भिलाई की जनता को इसके 40 से भी अधिक शो देखने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है वहीं इस बैले का मंचन देश के अलग अलग शहरों में सफलता पूर्वक किया गया है जहां इसे बेहद सराहा गया है । सुब्रत बसु एवं अनुराग बसु लंबे समय तक भिलाई में रहे है उनके परिवार के अन्‍य सदस्‍य भिलाई में ही रहते हैं इस कारण पारिवारिक कार्यक्रमों में सुब्रद दादा व अनुराग बसु अक्‍सर भिलाई आते जाते रहे हैं । उनके स्‍थानीय निवासी बडे भाई शम्‍भूनाथ बसु का

आदिवासियों पर आधारित एनिमेशन फिल्‍म

मघ्‍य भारत के आदिवासियों की कहानियों पर आधारित पांच एनिमेशन फिल्‍मों का निर्माण ब्रिटेन निवासी तारा डगलस नें किया है जिसका प्रदर्शन पूरे विश्‍व में रोड शो के द्वारा किया जा चुका है एवं सराहा जा चुका है । इस फिल्‍म को नेशनल जियोग्राफिक फिल्‍म फेस्टिवल, नेहरू सेंटर, स्‍कूल आफ ओरियंटल एंड अफ्रिकन स्‍टडीज, द रैडिकल बुक फेयर एडिनबरा और स्‍कार्टलैण्‍ड में दिखाया जा चुका है । हिन्दी, अंग्रेजी और हल्‍बी समेत आठ भाषाओं में उपलब्‍ध इन फिल्‍मों को भारत के विभिन्‍न आदिवासी क्षेत्रों में ब्रायन गिनीज चैरिटेबल ट्रस्‍ट द्वारा अप ने आदिवासियों के लिए सर्मपित कार्यक्रम द टालेस्‍ट स्‍टोरी काम्‍पीटिशन के तहत उपलब्‍ध कराया गया है । छत्‍तीसगढ में यह आयोजन छत्‍तीसगढ पर्यटन एवं आर्ट होम संस्‍था के सहयोग से 27 सितम्‍बर को राजधानी रायपुर के राजभवन के पीछे स्थित ऐतिहासिक ‘मेसानिक लाज’ में किया गया । पूरे समाचार की जानकारी हमें मिल नहीं पाई है, आज नया रायपुर से भिलाई वाप स आते समय हमारे एक मित्र नें इसकी जानकारी दी । घर आकर हमने इस सीमित जानकारी को नेट में खगालना आरंभ किया एवं जितनी जानकारी उपलब्‍ध हो सकी आप ल

24 सितम्‍बर विश्‍व हृदय दिवस : क्‍या धडकता है आपका भी दिल

भारत में भी अब कम उम्र के लोग बडी तेजी से हृदयाघात से शिकार हो रहे हैं । भारी तादात में एंजियोग्राफी और बाईपास सर्जरी की जा रही है । बस थोडी सी सतर्कता से रख सकते हैं आप अपने दिल को चुस्‍त दुरूस्‍त । दिल का सबसे बडा दुश्‍मन है, स्‍ट्रेस । स्ट्रेस से बचना आसान नहीं है । स्‍ट्रैस के कारण मस्तिष्‍क से जो जैव रसायन स्‍त्रावित होते हैं, वे हृदय की पूरी प्रणाली को खराब कर देते हैं । स्‍ट्रैस से उबरने में भारतीय पारंपरिक योग चिकित्‍सा सौ प्रतिशत कारगर है । स्‍ट्रैस से उबरने में 'भ्रामरी प्राणायाम' एक चमत्‍कार की तरह कार्य करता है । हृदय को स्‍वस्‍थ रखने में ध्‍यान, धारणा प्रार्थना, सत्‍संग, मुद्रा आदि का भारी योगदान है । यह वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चुका है कि आध्‍यात्मिक जीवन प्रणाली हृदय को स्‍वस्‍थ रखने की सबसे ठोस गारंटी है । बाईपास एवं एंजियोप्‍लास्‍टी आपको केवल लक्षणो से निजात दिलाती है । यह पुन: हार्ट अटैक नहीं होने की गारंटी नहीं है । तो हो जाएं तैयार आज विश्‍व हृदय दिवस है आज से भ्रामरी को अपने नित्‍यकृयाकलाप में कर लेवें शामिल ।

एक लडाई नंगे पांव : जिंदगीनामा

हरियाणा एवं छत्‍तीसगढ से एक साथ प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र हरिभूमि में प्रत्‍येक दिन समाचारों के साथ कुछ न कुछ फीचर पेज होता ही है, श्री द्विवेदी जी के हाथों में इस पत्र का कमान है । इसमें प्रत्‍येक दिन उत्‍कृष्‍ठ पठनीय सामाग्री का संकलन होता है प्रत्‍येक दिन अलग अलग विषयों में नियत एक पूरे पेज में सोमवार को क्षितिज में हमारे छत्‍तीसगढ के वरिष्‍ठ चिट्ठाकार जयप्रकाश मानस जी का एक कालम वेब भूमि भी आता है जिसमें इंटरनेट व अन्‍य तकनीकि जानकारी होती है, इसके गुरूवार को प्रकाशित चौपाल में हमारे एक और ब्‍लागर प्रो. अश्विनी केशरवानी का पूरे एक पेज का आलेख भी आया था । मैं समय समय पर इन पेजों को पढते रहता हूं इसी के बुधवार को जिंदगीनामा में ये मेरी लाईफ है कालम के अंतरगत सतीश सिंह ठाकुर के द्वारा लिखा एक जीवन वृत्‍त देखा, पढा और लगा कि इसे आप लोगों के लिए भी प्रस्‍तुत किया जाय । वैसे आपकी जानकारी के लिए मैं यह बता दूं कि नंगे पांव के इस सत्‍याग्रही से मैं चार वर्ष पूर्व रायपुर में बाल श्रमिकों पर आयोजित गैर सरकारी संगठनों के राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में मिला था उसके बाद बाल श्रमिक समस्‍या

दिल्‍ली सुख से सोई है नरम रजाई में : दिनकर

मेरे पास उपलव्‍ध 1967 की एक कविता संग्रह से मैं दिनकर जी की यह कविता उपलव्‍ध करा रहा हूं, इसके पन्‍ने फटे हुए थे इसलिए कविता जो अंश अस्‍पष्‍ट थे उसे मैं यहां प्रस्‍तुत नहीं कर पाया । यह कविता तत्‍कालीन परिस्थिति में लिखा गया था, दिल्‍ली वालों से क्षमा सहित प्रस्‍तुत है :- भारत का यह रेशमी नगर – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ XXX XXX XXX दिल्‍ली फूलों में बसी, ओस कणों से भींगी, दिल्‍ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है । प्रेमिका कंठ में पडी मालती की माला, दिल्‍ली सपनो की सेज मधुर रस-भीनी है । XXX XXX XXX रेशम के कोमल तार, क्रांतियों के धागे, हैं बंधे उन्‍हीं से अंग यहां आजादी के । दिल्‍ली वाले गा रहे बैठ निश्‍चेत मगन, रेशमी महल में गीत खुरदुरी खादी के । XXX XXX XXX भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्‍याकुल विपत्ति के घेरे में । दिल्‍ली में तो है खूब ज्‍योति की चहल पहल पर, भटक रहा है सारा देश अंधेरे में । रेशमी कलम से भाग्‍य – लेख लिखने वालों, तुम भी अभाव से कभी ग्रस्‍त हो रोये हो ? बीमार किसी बच्‍चे की दवा जुटाने में, तुम भी क्‍या घर भर पेट बांध कर सोये हो ? असहाय किसानों की किस्‍मत को

बहुराचौथ व खमरछठ : छत्‍तीसगढ के त्‍यौहार

भाद्रपद (भादो) का महीना छत्‍तीसगढ के लिए त्‍यौहारों का महीना होता है, इस महीने में धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्‍तीसगढ में किसान धान के प्रारंभिक कृषि कार्य से किंचित मुक्‍त हो जाते हैं । हरेली से प्रारंभ छत्‍तीसगढ का बरसात के महीनों का त्‍यौहार, खमरछठ से अपने असली रूप में आता है । इसके बाद छत्‍तीसगढ में महिलाओं का सबसे बडा त्‍यौहार तीजा पोला आता है जिसके संबंध में संजीत त्रिपाठी जी आपको जानकारी दे चुके हैं । छत्‍तीसगढ का त्‍यौहार खमरछठ या हलषष्‍ठी भादो मास के छठ को मनाया जाता है, यह त्‍यौहार विवाहित संतानवती महिलाओं का त्‍यौहार है । यह त्‍यौहार छत्‍तीसगढ के एक और त्‍यौहार बहुराचौथ का परिपूरक है । बहुरा चौथ भादो के चतुर्थी को मनाया जाता है यह गाय व बछडे के प्रसिद्व स्‍नेह कथा जिसमें शेर के रूप में भगवान शिव गाय का परीक्षा लेते हैं, पर आधारित संतान प्रेम का उत्‍सव है इस दिन भी महिलायें उपवास रखती हैं एवं उत्‍सव मनाती हैं । बहुरा चौथ के दो दिन बाद छठ को खमरछठ आता है, यह त्‍यौहार कुटुम्‍ब प्रेम का त्‍यौहार है । इस दिन प्रचलित रीति के अनुसार महिलायें हल चले हुए स्‍थान में नहीं जाती, हल चल

लालकिला और ऋगवेद विश्‍व धरोहर एवं क्रूज पर्यटन : समाचार

लालकिला और ऋगवेद विश्‍व धरोहर की सूची में ताज को विश्‍व के सात अजूबों में पहला स्‍थान मिलने के बाद जब यूनेस्‍कों ने दिल्‍ली के प्रसिद्ध लालकिले को विश्‍व धरोहर का दर्जा प्रदान किया है यह भारत के लिये गौरव का विषय है । भारतीय प्राचीन संस्‍कृति की एक और धरोहर ऋगवेद को यूनेस्‍को ने विश्‍व की धरोहर के रूप में स्‍वीकार किया है । विश्‍व की प्राचीन संस्‍कृतियों की साहित्यिक धरोहरों का खाता रखने वाले यूनेस्‍को के विश्‍व मेमोरी रिकॉर्ड में ऋगवेद की 30 पाण्‍डूलिपियों को शामिल किया गया है । यह हर भारतीयों के लिये गर्व की बात है । क्रूज पर्यटन का तेजी से बढता आकर्षण नौका विहार के माध्‍यम से जल क्रीडाओं का आनंद अब तेजी से बढते हुए औद्योगिकीकरण के चलते धुंधला पडते जा रहा है । भारत सरकार क्रूज टूरिज्‍म को बढावा देने एवं विदेशी पर्यटकों के साथ साथ घरेलू पर्यटकों को भी आकर्षित करने के लिये कई कदम उठाने जा रही है । देश में साढे सात हजार किलोमीटर लम्‍बी तट रेखा पर बसे लगभग दो सौ बंदरगाह शीध्र ही पोत विहार के जरिये अपनी कमाई में इजाफा करेगा । पर्यटन मंत्रालय ने वर्ष 2010 तक हर साल दस लाख क्रूज पर्यटकों का

आलोक पुराणिक रविवारीय हरिभूमि पर

अपने चितपरिचित व लोकप्रिय व्‍यंगकार स्‍थापित चिट्ठाकार आलोक पुराणिक जी का एक व्‍यंग हरियाणा व छत्‍तीसगढ से एक साथ प्रकाशित दैनिक हरिभूमि के रविवारीय अंक में प्रकाशित हुआ है । इस प्रकाशन से छत्‍तीसगढ के सुधी पाठकों को आलोक जी के विशेष शैली के व्‍यंग को जानने व समझने को मिलेगा, हरिभूमि से साभार एवं आलोक जी को धन्‍यवाद सहित हम इसे चित्र रूप में प्रस्‍तुत कर रहे हैं

कृष्ण स्मृति के कुछ अंश : कृष्‍ण जन्‍म का रहस्‍य

कल रात से आचार्य रजनीश द्वारा लिखित 'कृष्‍ण स्‍मृति' धर में ढूढता रहा पर नही मिला, शायद किसी नें पढने लिया हो और लौटाया नहीं है । इस पुस्‍तक यानी चिंतन सागर नें मुझे सहज व सरल भाषा में कृष्‍ण से साक्षातकार कराया था, आज इसे पुन: पढने व पढाने की लालसा नें नेट में खोज किया तो वेबदुनिया में ही इसके कुछ अंश पा गया, प्रस्‍तुत है वेबदुनिया व ओशो इंटरनेशनल से साभार सहित :- कृष्ण का जन्म होता है अँधेरी रात में, अमावस में। सभी का जन्म अँधेरी रात में होता है और अमावस में होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती, सब कुछ जन्म अँधेरे में ही होता है। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अँधेरे में जन्मता है। फूल खिलते हैं प्रकाश में, जन्म अँधेरे में होता है। असल में जन्म की प्रक्रिया इतनी रहस्यपूर्ण है कि अँधेरे में ही हो सकती है। आपके भीतर भी जिन चीजों का जन्म होता है, वे सब गहरे अंधकार में, गहन अंधकार में होती है। एक कविता जन्मती है, तो मन के बहुत अचेतन अंधकार में जन्मती है। बहुत अनकांशस डार्कनेस में पैदा होती है। एक चित्र का जन्म होता है, तो मन की बहुत अतल गहराइयों में जहाँ कोई रो