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राष्ट्रीय जनजातीय नाट्य अभिव्यक्ति उत्सव : आदि परब – 2

छत्तीसगढ़, आदि कलाओं से संपन्न राज्य है, यहां सदियों से जनजातीय समुदाय के लोग निवास करते आ रहे हैं। बस्तर, सरगुजा एवं कवर्धा क्षेत्र सहित यहॉं की संपूर्ण मिट्टी में आदिम संस्कृति एवं कलाओं के पुष्प सर्वत्र बिखरे हुए हैं। जनजातीय अध्येताओं का मानना है कि दक्षिण भारत के जनजातीय समूहों से सांस्कृतिक आदान प्रदान के फलस्वरूप एवं कला एवं परम्पराओं में विविधता के बावजूद, छत्तीसगढ़ की जनजातियों की अपनी एक अलग पहचान कालांतर से विद्यमान है। भौगोलिक रूप से देश के हृदय स्थल में स्थित होने के कारण यहॉं के इन्हीं जनजातियों के जनजातीय कला एवं संस्कृति का एक अलग महत्व है। इसीलिए जनजातीय आदि कलाओं के अध्ययन के उद्देश्यो से, देश के नक्शे में छत्तीसगढ़ को प्रमुखता दी जाती है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के द्वारा पारंपरिक नाट्य विधा के शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ ही विगत वर्षों से इन जनजातीय आदि कलाओं और नृत्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आदि कलाओं से संपन्न छत्तीसगढ़ में संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ के सहयोग से ‘आदि परब’ का आयोजन पिछले वर्ष से आरंभ किया गया है। इस वर्ष यह आयोजन 27 से 29 नवम्‍बर को रायपुर के मुक्ताकाशी मंच में आयोजित हुआ था।

तीन दिन तक चले इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ सहित तेलंगाना, झारखण्ड, ओड़ीशा, महाराष्‍ट्र व मध्य प्रदेश के जनजातीय प्रदर्शनकारी कलाओं का प्रदर्शन किया गया। जिसमें छत्तीसगढ़ के जनजातीय प्रदर्शनकारी कला भतरा नाट, धुरवा डंडार नाट, माओपाटा, ककसाड़, कमार नृत्य, बैगानी करमा, सैला, रास करमा, सरहुल आदि की प्रस्तुति आयोजित थी। जनजातीय प्रदर्शनकारी कला के अतिथि प्रस्तुतियों में तेलंगाना के कोया, झारखण्ड के छाउ एवं मुंडारी, उड़ीसा के ढाप, परजा, महाराष्ट्र के ढोल, बोहाड़ा एवं तड़पा, मध्य प्रदेश के भगोरिया एवं भड़म की पारम्परिक जनजातीय नृत्य प्रस्तुति दी गई।

‘आदि परब -2’ के शुभारम्भ पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक प्रो. वामन केंद्रे ने कहा कि हम आज ग्लोबलाईजेशन के दौर में हैं और विश्व के पैमाने पर हमारी संस्कृति और परम्परायें एक जैसी होती जा रही है, ऐसे में हमारे सामने अपने मूल रूप को धरोहर के रूप में बचाये रखने का दायित्व है। वनों से बेदखल होते आदिवासी और जमीनों से जुदा होते गाँव-वासी अपनी जीवन शैली खोते जा रहे हैं, हम उन्हें और उनकी जीवन शैली को धरोहर के रूप में बचाने जुटे हैं। यह बात हम सभी जान रहे हैं कि, देश के अन्य सभी लोगों के साथ साथ जनजाति के लोगों को भी बहुत सी सामाजिक और आर्थिक विषमताओं का सामना करना पड़ता है, उसके बाद भी जनजाति समुदाय अपनी कलाओं और संस्कृति को जीवित रखे है, ये उनके लिए गौरव और सम्मान की बात है। किसी देश की असली धरोहर वही समुदाय होता है जो देश की कलाओं और मूल संस्कृति को जीवित रखे और जनजाति के लोग इस मायने में देश के धरोहर हैं।

जनजातीय चित्रकला कार्यशाला : आदि सर्जना

देश के कई राज्यों में जनजातीय समाजों के पारंपरिक चित्रकला का एक सुदीर्घ इतिहास है, जिसके अंतर्गत उस जनजाति के लोग वानस्पतिक, जैविक, मानवकृति एवं ज्यामितीय आकृतियों का उपयोग कर चित्रांकन करते हैं। इन जनजातियों में मध्यप्रदेश के भील और गोंड, छत्तीसगढ़ के मुरिया और उरांव, उड़ीसा की सावरा, महाराष्ट्र की वारली, गुजरात की राठवा तथा मणिपुर की कबुई जनजातियां विशेष उल्लेखनीय है। इन्ही जनजातीय चित्रकारों में से भील, गोंड, मुरिया, उरांव, वारली तथा सांवरा चित्रकारों की प्रतिभागिता के साथ इस कार्यक्रम में एक चित्रकला शिविर भी आयोजित की गई, जिसमें इन कलाकारों द्वारा सृजित कलाकृतियों को इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया। आदि सर्जना में प्रस्तुपत कलाकृतियां जनजातीय मिथक कथाओं, गृह सज्जा, अनुष्ठानों तथा कल्पना की उड़ानों के चित्रित प्रतिमा थी, जो हमें जनजातीय कलाकारों की कलात्मक अभिव्यक्ति के स्वर्णिम संसार से परिचित कराते हैं।

इस कार्यशाला में देश के प्रसिद्ध जनजातीय चित्रकला के सिद्धस्थ् कलाकार जिसमें पाटनगढ़ मध्यप्रदेश से दिलीप श्याम, रामसिंग उर्वेती, गरीबा सिंग टेकाम, निक्की सिंह उर्वेती नें गोण्ड चित्रकारी प्रस्तुत की। महाराष्ट्र के धुन्दलवाड़ी के अशोक रामजी वरण, डाहनू के राजेंद्र वायडा, निलेश रामजी राजड और बायेडा के मीनाक्षी वासूदेव नें वारली चित्रकारी प्रस्तुवत की। झाबुआ मध्यप्रदेश के जाम्बू सिंगाड एवं सूरज बारिया नें भील चित्रकारी प्रस्तुत की। उड़ीसा के लिबेस्टन गांमागो, रविन्द्रकनाथ साबर व जुनेश गोमांगो नें सौरा चित्रकारी प्रस्तुीत की। गढ़बेंगाल बस्तर से बलदेव मंडावी, शंकर मंडावी, जयराम मंडावी, बेलगूर मंडावी व पिसाडू सलाम नें मुरिया चित्रकारी प्रस्तुत की। जशपुर छत्तीसगढ़ के सुमन्ती देवी भगत एवं अनामिका भगत नें उरांव (बन्ना) चित्रकारी प्रस्तुत की। इन जनजातीय चित्रकारों के द्वारा बनाये गए चित्रों की यहॉं प्रदर्शनी भी लगाई गई। यह जनजातीय चित्रकला की कार्यशाला महंत घासीदास संग्रहालय परिसर के आर्ट गैलरी में 20 से 29 नवम्बर तक आयोजित थी। मीडिया एवं जनता के बीच इस कार्यकाशाला की बेहद प्रशंसा हुई।

आदि सर्जना एवं राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा प्रयोजित ‘आदि परब -2’ के इस संपूर्ण कार्यक्रम की रूपरेखा एवं कार्यक्रम संयोजन की जिम्मेदारी संस्कृति संचालनालय द्वारा प्रसिद्ध मानवविज्ञानी, संस्कृतिकर्मी एवं भारत सरकार के मानव संग्रालयों के आधार निर्माता अशोक तिवारी जी को प्रदान की गई थी। उन्होंनें इस कार्यक्रम को बेहतर तालमेल एवं उत्कृष्‍ट प्रबंधन से सफलतापूर्णक आयोजित किया। आदिपरब-2की यादें स्मृति में, प्रकृति से साक्षात्कार के पलों के एहसास की तरह दिनों तक महकती रहेंगी।
-संजीव तिवारी

राजीव रंजन जी के उपन्यास का अंश - लौहंडीगुडा गोलीकांड पर आधारित

बस्‍तर हालात बत्‍तर, बदतर और  बदतर ! हॉं आप सही पढ़ रहे हैं, भारत के छोटे से राज्‍य छत्‍तीसगढ़ के संपूर्ण बस्‍तर क्षेत्र में अब बारूदों की गंध छाई है। विष्‍फोट और गोलियों की आवाजें आम है, घोटुल सूना है, धनकुल नि:शव्‍द है, करमा के मांदर की थापों में कुत्‍तों के रोने की आवाजें निकलती हैं। अनहोनी का नाद जैसे हर तरफ छाया है, ऐसा तो नहीं था यह .....। इतिहास के परतों को उधेड़ते हुए बस्‍तर के रूपहले परदे को मेरे सामने लाला जगदलपुरी, हीरालाल शुक्‍ल, निरंजन महावर, वेरियर एल्विन आदि नें तथ्‍यात्‍मक रूप से तो गुलशेर अहमद 'शानी' और मेहरून्निशा परवेज नें कथात्‍मक रूप में प्रस्‍तुत किया है। इसके अतिरिक्‍त बहुतों के हाट बस्‍तर पर बहुत कुछ लिखा जो कुछ याद है कुछ याद नहीं है। इंटरनेट के हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में व्‍यथित बस्‍तर के दर्द को बांटते मेरे साथियों में राजीव रंजन जी का नाम अहम है। राजीव जी नें अपने ब्‍लॉग सफर राजीव रंजन प्रसाद में नक्‍सल मसले पर बेबाक लेखन किया है, राजीव जी  साहित्‍य शिल्‍पी  के संपादक हैं और बस्‍तरिहा हैं। सुदूर दिल्‍ली (वर्तमान में देहरादून) में भी बैठकर इनका दिल बस्‍तर के लिए धड़कता है, बस्‍तर के हर स्‍पंदन में इनका भावुक मन रोता है। बस्तर में जारी नक्सलवाद के समर्थकों के खिलाफ जब राजीव जी  हजार पच्यासीवें का बाप लिखते है तब उसमें इनका मुखर विरोध और बस्‍तर के प्रति इनका स्‍नेह शव्‍दों में प्रदर्शित होता है। राजीव जी “बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ” जैसे आलेख श्रंखला में इन्‍होंनें  नक्सलवाद और महाराज प्रबीर चंद भंजदेव की हत्या: थोडा आज, कुछ इतिहास व नक्सलवादी या उनके समर्थक - सुकारू के हत्यारे कौन? एवं बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ  जैसे संस्मरण के साथ ही बस्तर भारत का हिस्सा नहीं है? जैसा संवेदनशील आलेख लिखते है। कविताओं के अतिरिक्‍त बस्तर के आदिवासी महिलाओं के शोषण की दास्तां पर उनकी भावनाप्रद कहानी  ढीली गाँठ ब्‍लॉग जगत में काफी चर्चित रही है। इन्‍होंनें बस्‍तर में रूदाली रोते मानवाधिकार वादियों का भी स्‍पष्‍ट रूप से विरोध किया है और हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में जहां भी बस्‍तर नक्‍सल मसले पर पोस्‍ट प्रकाशित हुई है, वहां नक्‍सलियों व नक्‍सल समर्थित मानवाधिकारवादियों के समर्थन पर अपना दमदार विरोध प्रकट किया है।
राजीव रंजन प्रसाद अपने परिचय में लिखते हैं कि इनको कविता विरासत में मिली है. इनके शैशवकाल में ही पिता का देहांत हो गया था. उनका मानना है कि पिता की लेखनी ही उनमें जीवंत है। इनका जन्म बिहार के सुलतानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु बचपन व प्रारंभिक शिक्षा छत्तीसगढ राज्य के अति पिछडे जिले बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई. विद्यालय के दिनों में ही उन्होनें एक अनियतकालीन-अव्यावसायिक पत्रिका "प्रतिध्वनि" निकाली....ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने. आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकशित भी हुए किन्तु अपनी रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित करनें का प्रयास उन्होनें कभी नहीं किया. राजीव जी नें स्नात्कोत्तर की परीक्षा भोपाल से उत्तीर्ण की और उन दिनों वे भोपाल शहर की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय हिस्सा लेते रहे. इन दिनों वे एक प्रमुख सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में सहा. प्रबंधक (पर्यावरण)के पद पर कार्यरत हैं. अभी उनका स्‍थानांतरण देहरादून हो गया है। राजीव जी लम्‍बे समय से अपने इस उपन्‍यास को पूरा करने में जुटे हैं, उनके पास साहित्‍य शिल्‍पी के निरंतर प्रकाशन का बहुत बड़ा दायित्‍व है। नौकरी और परिवार के बीच सामन्‍जस्‍य बिठाते हुए इन्‍होंनें बहुत मेहनत से बस्‍तर पर आधारित अपने पहले  उपन्‍यास को पूरा किया है, यह उपन्‍यास शीघ्र ही आने वाली है।
बस्‍तर के बारूदी हालात पर अपनी एक कविता में वे लिखते हैं - देखो बिखरी है भूख वहाँ, परती हैं खेत बारूद भरे/ हर लाश है मेरी, कत्ल हुई / मेरे ही नयना झरे झरे। इन्‍हें मलाल है कि रोजी रोटी नें इन्‍हें बस्‍तर से दूर कर दिया है किन्‍तु वे निरंतर स्‍वयं को बस्‍तर से अलग नहीं कर पाते, वे लिखते हैं - मैं अब हूँ दूर जंगल से, बहुत वह दौर भी बदला / मेरे साथी वो दंडक वन के, कुछ टीचर तो कुछ बाबू / मुझे मिलते हैं, जब जाता हूँ, बेहद गर्मजोशी से.. / वो यादें याद आती हैं, वो बैठक फिर सताती है / मगर जंगल न जानें की हिदायत दे दी जाती है / यहाँ अब शेर भालू कम हैं, बताया मुझको जाता है / कि भीतर हैं तमंचे, गोलियाँ, बम हैं, डराया मुझको जाता है / तुम्हारा दोस्त “सुकारू” पुलिस में हो गया था / मगर अब याद ज़िन्दा है...

प्रस्‍तुत है राजीव जी के उपन्‍यास का एक अंश

उपन्यास अंश - लौहंडीगुडा गोलीकांड पर आधारित
“हमारी आवाज कैसे नहीं सुनी जायेगी, ये अंग्रेज का राज नहीं है” भीड में से एक उत्तेजित ग्रामीण की आवाज थी। थाने पर लगातार भीड बढती जा रही थी और एसा प्रतीत होता था मानों गामीणों नें चारो ओर से थाने को घेर रखा हो। भीड से सौ मीटर की दूरी पर ही पुलिस जीप खडी थी जिसपर लाउडस्पीकर लगाया गया था। रह रह कर घोषणा की जा रही थी “सरकार द्वारा विजय चंद्र भंजदेव को बस्तर का महाराजा घोषित किया गया है, अब वे ही आप सब के महाराजा है”
“हमारे महाराजा प्रबीरचंद ही हमारे सरकार हैं हम और कोई सरकार नहीं जानते” एक युवक लगभग चीखते हुए बोला।
“महाराज प्रबीर चंद को आज यहाँ लाया जाना था? कहाँ हैं हमारे महाराज?”
लाउडस्पीकर से फिर घोषणा हुई “ पीछे हट जायें। भीड इक्ट्ठी करना गैर कानूनी है। सरकार द्वारा विजय चंद्र भंजदेव को बस्तर का महाराजा घोषित किया गया है, अब वे ही आप सब के महाराजा है”
“हमारा राजा सिर्फ हम तय कर सकते हैं”। भीड में से एक आवाज आयी। भीड लगातार बढती जा रही थी।
“राव साहब नें मुझसे कहा था कि आज महाराजा साहब को लौहण्डीगुडा लाया जायेगा। हम कुछ नहीं चाहते अपने महाराज का हाल जानना चाहते हैं” यह आवाज अजाम्बर की थी। लगभग बीस हजार आदिवासियों के हुजूम को चीरता हुआ वह एक नेता की तरह आगे आया।
“पीछे हटें, थाने की ओर भीड न लगाये। प्रबीर चंद्र भंजदेव इस समय नरसिंहपुर में हैं जो यहाँ से 800 मील दूर हैं उन्हे तत्काल यहाँ नहीं लाया जा सकता।“
”क्यों नहीं लाया जा सकता? बात हुई है हमसे। हमसे कलेक्टर साब नें खुद कहा था कि महाराज साब यहाँ मिलेंगे। विजय चंद्र को हम राजा नहीं मानते” अजाम्बर को अपनी बात करने के लिये लगभग चीखना पड रहा था। साथ ही साथ उसके दिमाग में किसी अनहोनी की आशंका भी घिरने लगी थी। भीड के लिये यहाँ कई समस्याये थीं। हिन्दी आधी अधूरी समझी जा रही थी और उसके अपने अपने मायने निकाल कर लोग उद्वेलित हो रहे थे। आदिवासियों को चीखते, सिर पटकते यहाँ तक कि दहाड मार कर रोते भी देखा जा सकता था। अपने शासक को अधिकार दिलाने की यह कोशिश भर नहीं थी, उनके प्रति अपर श्रद्धा का विशाल प्रदर्शन था।
भीड का अपना व्यवहार शास्त्र होता है। यह भीड आंदिलित नहीं उद्वेलित थी। इस भीड की कहीं आग लगाने की या तोड फोड करने की मंशा नहीं थी। यह भीड केवल अपने महाराजा प्रबीर चंद भंजदेव के लिये इकट्ठी हुई थी विशेष कर उनका कुशलक्षेम जानने। आदिमों की इस भीड के साथ उनकी परंपरा भी थी, बाजार का दिन होने के कारण युवक युवतियों का सामान्य दिन से अधिक साज सज्जा के साथ पहुँचना उतना ही स्वाभाविक था जितना टंगिया, फरसा, तीर-कमान और लाठी का इस हुजूम से साथ होना।
इस भीड की तकलीफ़ और उत्तेजना का बडा कारण विजयचंद भंजदेव का लौहण्डीगुडा थाने में उपस्थित होना भी था।
“सरकारी राजा हमें मान्य नहीं हैं” बार बार भीड से उठती इस आवाज से विजयचंद्र अपना संयम खो बैठते। आजाद भारत के इस अधिकार विहीन, केवल नाम के राजा की महत्वाकांक्षा ही थी कि वह अपने खिलाफ़ इस जनाक्रोश को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। भीड जिसे शांत कराने की चेष्टा वे करने में लगे थे वह उन्हे देखते ही उनकी ओर मुखातिब हो कर प्रतिवाद में उतारू हो जाती। इंस्पेक्टर जनरल पुलिस, पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर, सरकार द्वारा नव-नियुक्त राजा विजयचंद्र भंजदेव के अतिरिक्त अनेकों उच्चाधिकारी लौहण्डीगुडा थाने के पास मौजूद थे। इन सभी के भीतर की बेचैनी चेहरे से ही पढी जा सकती थी विशेष कर विजय चंद भंजदेव रह रह कर टहलने लगते। आजाद भारत सरकार के द्वारा प्रदत्त इस अधिकारविहीन पद की प्राप्ति के साथ ही विजयचंद “महाराजा” हो जाने वाली प्रवृत्ति से ग्रसित हो उठे थे। उन्हे यकीन था कि बस्तर की भोली-भाली आवाम उन्हें अपने हृदय में मान्यता देगी।
बस्तर की रिआया भोली भाली अवश्य है किंतु उसे नादान समझने की भूल प्रशासन से हो गयी थी। जनता आजाद भारत में भी अब तक रिआया ही थी और उनके हृदय साम्राज्य के स्वामि थे प्रबीरचंद भंजदेव।
“साब! अंग्रेज लोग भी आप से बेहतर हमारी बात समझते थे। हमारी इच्छा के खिलाफ हमारा राजा कैसे हो सकता है? इस बार अजाम्बर सीधे कलेक्टर से मुखातिब था। इस प्रश्न के जवाब में खामोशी ही रही लेकिन विजयचंद्र का तमतमाया हुआ चेहरा देखा जा सकता था।
“आप लोग शांति बना कर रखें। आपके महाराजा विजचंद्र आप से बात करेंगे” एक उच्चाधिकारी संवाद बनाने की स्थिति देख आगे आये।
“विजयचंद्र हमारा राजा नहीं है” एक पैनी सी आवाज आयी और फिर शोर उमडने लगा। कई आदिवासी पीछे मुड कर अपने ही साथियों को थाने की ओर बढने से रोकने में भी लगे थे।
“आप हमारी एक उंगली तोड कर उसकी जगह पर दूसरी उंगली कैसे लगा सकते हो? महाराज के रहते विजय राजा नहीं बन सकते” अजाम्बर नें थोडी तल्खी दिखायी।
“क्या चाहते हो आप लोग” विजयचंद्र लगभग आक्रामक मुद्रा में आगे आया। इस आक्रामकता का कोई प्रभाव उस भीड पर नहीं था। बल्कि विजय चंद्र का ही कोई प्रभाव बस्तर की रिआया पर नहीं था। वह जानती थी, तो केवल अपने महाराजा प्रबीरचंद्र को जो इस समय नरसिंहपुर जेल में कैद कर लिये गये थे। माहौल उग्र तो नहीं कहा जा सकता था किंतु पूरी तरह शांत भी नहीं। रह रह कर गूंजता स्वर “दंतेश्वरी माई की जय” दहशत भरता था।
यह सब कुछ अचानक आरंभ नहीं हुआ था। प्रवीरचंद की गिरफ्तारी के साथ ही नागरिक स्वत: प्रेरित स्थान स्थान पर एकत्रित होने लगे थे। सिरिस गुडा की देवगुडी में तथा बड़ांजी में बडी बडी सभायें हुई थी जिसमें हजारों आदिवासियों ने हिस्सा लिया था। कलेक्टर आर. एस. राव के हवाले से खबर थी कि महाराज प्रबीरचंद 31 मार्च को लौहण्डीगुडा लाये जायेंगे। बडांजी की सभा को संबोधित करते हुए अजाम्बर नें बेनियापाल मैदान में सब को एकत्रित होने की गुजारिश की थी। बस्तर के आदिवासी समुदाय से अधिक जागरुक कौम कम ही दृष्टिगोचर होगी; यह आह्वाहन फैलता गया जैसे जंगल की आग फैल जाती है। और आज यह दावानल बन कर प्रशासन को चुनौती देने तत्पर थी कि हमारे कौन तुम? जंगल हमारा, जमीन हमारी, पानी हमारा, पंछी हमारे और राजा भी हमारा ही होगा। अगर आजादी है तो हम भी आजाद हैं। अगर लोकतंत्र है तो शासक भी हमारा ही हो फिर किस अधिकार से विजयचंद्र?
चित्रकोट की ओर आने वाली सडक एक दिन पहले ही किसी गडबडी या विरोध की आशंका से बंद कर दी गयी थी। प्रसाशन नें भीड न जुटने देने के यथासंभव प्रयत्न किये थे लेकिन कारवाँ कब रुका है, धुन को कौन हरा सका है? जगह जगह घोषणाये भी होती रहीं लेकिन शोर में या तो उन्हे सुनना असंभव था या हिन्दी अधिकांश के लिये समझना मुश्किल। विभिन्न दिशाओं से उमडता जन सैलान और बहुत से समूहों में जोश भरती मांदर की थाप सुबह से ही बेनियापाल के मैदान में जुटने लगी थी। बाजार भी लगा और सल्फी भी साधी गयी लेकिन हर पल प्रतीक्षा कि महाराज लाये जा रहे होंगे। महाराज की तबीयत ठीक नहीं है। उन्हे यातनायें दी जा रही हैं। जितने मुँह उतनी ही बातें।
एसा भी नहीं था कि विजयचंद्र को समर्थन नहीं मिला। प्रशासन तो उनके साथ था ही, कुछ जगहों पर कोशिश भी हुई कि माहौल सरकारी राजा के पक्ष में बनाया जाये। “सरकारी राजा” यह संबोधन आम हो गया था और वितृष्णा से आदिवासियों द्वारा लिया जाता रहा। विजयचंद्र के पक्ष में जो इक्कादुक्का सभायें हुई भी लेकिन विरोध वहाँ भी रहा। आदिवासियों नें एसे आयोजनों के खिलाफ न केवल मोर्चा खोला बल्कि आयोजकों को दंडित करने को भी तत्पर हो गये थे। जगदलपुर के पास ही गाँव नारायण पाल में एसी ही एक सभा सूर्यपाल तिवारी नें भी आयोजित की थी। सिर मुडाते ही ओले पड गये। यह बस्तर के महाराज के पतन का समारोह बोहरानी कहा जा रहा था। हुजूम उमड पडा, पंडाल उखाड फेंके गये और आदिम युवक सूर्यपाल तिवारी को घर घर तलाश कर रहे थे। महाराज प्रवीरचंद का पतन एक कार्यक्रम से और दो चार घोषणाओं से हो पाता तो फिर बात क्या थी? सूर्यपाल तिवारी का ही पतन हो गया। सर पर पाँव रख कर वे कहाँ नदारद हुए कोई नहीं जान सका।
राजा का पद ही समाप्त कर दिया जाता तो यहाँ एक सोच हो सकती थी लेकिन नये राष्ट्र में नयी नीति नें बहुत जल्द राज करना सीख लिया था। अकर्मण्य और अयोग्य व्यक्ति बस्तर में तभी वास्तव में सत्तासीन हो सकते हैं जब योग्य विकल्प ही न रहे अर्थात प्रबीर को कुचल दिया जाना आवश्यक था। प्रबीर एक व्यक्ति नहीं एक सोच थे और उन्हे कुचलने के लिये निश्चित ही बहुत सी राजनीतिक सोच नें गटबंधन कर लिया था। कितनी जल्द अंग्रेजों की राजनीति से हिन्दोस्तान नें सबक ले लिया यह देखने लायक था। आजाद भारत की नियति को फिर भेडियों और गिद्धों नें लिखना आरंभ कर दिया, क्या इससे बडा दुर्भाग्य हो सकता था? विजयचंद को सरकार द्वारा राजा बनाये जाने की जो घोषणा की गयी थी वह साजिश तो थी लेकिन आजादी और स्वच्छंदता के बीच की बारीख रेखा जिसे अनुभवहीन राजनीति नहीं समझ सकी उसे भावावेश भरी जनता क्या समझती? यह भी एक सत्यता थी कि बस्तर की राजनीति न भोपाल से संभव थी न दिल्ली से। आजादी से पहले अंग्रेजों का शासन अवश्य रहा लेकिन क्षेत्रीय कानून और शासन जगदलपुर में ही बने और यहीं से संचालित होते रहे। कैसा दुर्भाग्य कि बस्तर के आदिम अब केवल समस्या की तरह देखे जा रहे थे जब कि समाधान यही था कि राजनीति की नयी मुख्यधारा यह समझती कि अनेकों संस्कृतियों से समृद्ध इस देश की जड को पानी चाहिये न कि पत्तियों को दवा का छिडकाव। बस्तर अपनी आवाज निरंतर खोता जा रहा था और शायद यही कुंठा आदिवासियों को अपनी आवाज प्रतीत होते प्रवीरचंद भंजदेव के पक्ष में लामबंद करती थी। 11 फरवरी 1961 को प्रबीर गिरफ्तार हुए थे और 12 फरवरी 1961 को उन्हे महाराजा की पदवी से अपदस्थ कर दिया गया था। प्रजातांत्रिक देश में राजा भी क्या राजा और उसपर आश्चर्यजनक यह कि सरकार ही राजा घोषित भी करे, तो कैसी लोक शाही थी यह? चुनाव नहीं हुए थे, लोकचर्चा नहीं की गयी थी, आदिवासी नेताओं को विश्वास में नहीं लिया गया था और केवल एक ‘सोच’ के दमन के लिये तुगलकी फरमान यह सोचने को अवश्य मजबूर करता था कि सही मायनों में अभी आजादी आयी नहीं है। अब सत्ता पर काले अंग्रेज काबिज हो गये हैं शेष क्या बदला है?
मानने वालों की कमी नहीं कि सत्ता बंदूख की गोली से निकलती है। जिस तेजी से प्रशासन का विरोध आरंभ हुआ उसी तीव्रता से दमन भी। तोकापाल में एक सभा चल रही थी। तीन चार सौ आदिवासियों की बैठक। चैतू बहुत जोश में भाषण दे रहा था।
“हमारे महाराज के खिलाफ साजिश हो रही है। हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते।“
पेडों की छाँव में तितर-बितर बैठे आदिवासी चिंतित नजर आ रहे थे। महाराजा के लिये कुछ न कर पाने की पीडा चैतू के भाषण में भी थी और उसे सुन रही भीड के चेहरे पर भी। अचानक ही पुलिस वैन मैदान से लगे मुख्य सडक पर रुकी। दन-दन कर सिपाही उतरने लगे और भीड पर टूट पडे जैसे उन्हे पता हो करना क्या है, किसी आदेश की आवश्यकता ही नहीं थी। चैतू के बाल पकड कर खींचता हुआ एक सिपाही वैन तक ले आया। अंदर बैठे अधिकारी से उसे मौन सहमति मिली हुई थी। केवल लट्ठ ही नहीं लात घूंसे और थप्पड भी। चैतू का कोई प्रतिरोध नहीं था वह मार खाता रहा, दर्द से बिलबिलाता रहा।...। अब चैतू सुन नहीं पाता।
बहरा तो प्रशासन भी हो गया था। उसका दमन जारी था, लेकिन इसके पीछे जुनूनी होती एकता की आहट उसे सुनायी नहीं पडी और स्थिति विस्फोटक हो गयी। चैतुओं की कोई कमी नहीं थी अपने महाराज के लिये जान देने को तत्पर हजारो मुरिया-माडिया इशारे भर में तैयार थे। पुलिसिया सितम जोरों पर था और इससे इंकलाब ही परवान चढने लगा। लॉरियों में भर भर आदिवासी थाने लाये जाते। जानवरों की तरह उन्हे पीटा जाता। कमोवेश पूरे बस्तर में एसा ही माहौल हो गया था। इसी माहौल से स्वप्रेरित हुआ हुजूम जिसनें लौहण्डीगुडा थाने को घेर रखा था बिगुल था कि अब खुला आंदोलन होगा। आर या पार।
धैर्य जवाब देने लगा था। विजयचंद्र का भी और उपस्थित प्रसाशनिक अधिकारियों का भी। सोचो तो लगता है जनरल डायर किस मानसिकता का रहा होगा जिसकी निहत्थों पर गोलियाँ चलवाते हुए आवाज न काँपी। यह मानसिकता क्या सत्ता के नशे से पनपती है? इस मानसिकता के पीछे क्या स्वयं को लोगों का भाग्य-विधाता समझने की खुशफ़हमी होती है? लेकिन यह मानसिकता बारह साल के हो चुके लोकतंत्र में भी? आश्चर्य तो यही था। प्रश्न तो उठता ही है कि कौन था इन आदिमों का माई-बाप - क्या प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू? क्या मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू? या कलेक्टर या फिर कमिश्नर या कि सरकार द्वारा घोषित महाराजा ऑफ बस्तर विजयचंद्र भंजदेव?
लाउडस्पीकर की अब उपयोगिता नहीं रह गयी थी। बीस हजार से अधिक की भीड को एक लाउडस्पीकर से संबोधित नहीं किया जा सकता था वह भी तब जब भीड में उत्तेजना भी हो; कई कई लोग एक साथ बोल रहे हों लेकिन सुनने को कोई तैयार न हो। कैसी अनूठी थी यह भीड। कई युवक तीर-कमान लादे थे तो कई फरसे और कुल्हाडी के साथ थे, पर ये सारे अस्त्र-शस्त्र केवल आभूषण भर ही रहे। यह भीड यदि असंयमित हो जाती तो मुट्ठी भर सिपाही उनका मुकाबला नहीं कर पाते। लेकिन “हमारे महाराज को उपस्थित करो” की एक सूत्रीय माँग के साथ खडी यह भीड किसी भी समय अराजक नहीं हुई थी। यहाँ तक कि जब जब उत्तेजना की लहर भी फैली तो आदिवासी नेताओं ने खुद भीड को पीछे धकेलने का काम भी किया। इन्हीं आदिवासी नेताओं में जोगा भी थे। पारापुर गाँव से आये जोगा को सामाजिक कार्यकर्ता कहना अधिक उचित होगा। जोगा जागरुक आदिवासी थे और अपनी राजनीतिक चेतना के लिये जाने भी जाते थे। भीड को नियंत्रित कर आदिवासी नेंता दल बना कर प्रशासनिक प्रतिनिधियों से मिलने अग्रसर हुए लेकिन तब तक एक भयंकर निर्णय ले लिया गया था। जोगा नें देखा कि अजाम्बर का हाँथ पकड कर उसे थाने के भीतर ले जाया जा रहा है, उसने महसूस किया कि सिपाही भीड को सुरक्षित दूरी से घेरने का यत्न कर रहे हैं, उसने पाया कि माहौल में उत्साह की फिर भी कोई कमी नहीं है, कहीं कोई डर नहीं है। जोगा को लग गया था कि जल्द ही भीड पर लाठी चलायी जायेगी और उन्हे तितर-बितर करने का प्रयास किया जायेगा। वह आगे आया और विजयचंद्र के सम्मुख आ खडा हुआ। जोगा अपनी बात कह देना चाहता था।
“महाराज के साथ तुम लोग क्या कर रहे हो?” जोगा नें यह प्रश्न विजयचंद्र से आँख मिला कर किया।
यह जोगा का अंतिम-वाक्य था। एक गोली उसका सिर खोलते हुए गुजर गयी। पीठ के बल जोगा जमीन पर गिरा, दो-एक बार जमीन पर पैर रगडे फिर शांत हो गया। एक पल की शांति के बाद हाहाकार मच गया। मोर्चे पर तैनात सिपाहियों नें अचानक गोली चलाना आरंभ कर दिया था। यह आजाद भारत में विरोध का बदला था। यह जनतंत्र की तानाशाही थी। भगदड मच गयी थी। औरते और बच्चे कुचले गये, बुजुर्ग चोटिल हो रहे थे, किसे परवाह? कुम्हली गाँव का भगतू कश्यप एकदम से भागा नहीं। शायद वह स्थिति का पूरा आँकलन नहीं कर सका था। जब तक समझता एक गोली उसके सीने के पार हो गयी थी।
बीस हजार की भीड को छटने में भी समय लगता, अनायास हुए इस हमले से अफरातफरी ही होनी थी और इसलिये चोटिल और घायलों की तादाद का अनुमान लगाना भी कठिन ही होगा। आंजर गाँव से आया आयतु अचानक हुई इस अराजकता में भी बिना संयम खोये मानों एक कोशिश कर लेना चाहता था। उसने गोली चलाते एक सिपाही की ओर हाँथ उठा कर रुकने का अनुरोध किया और रायफल उसकी ओर घूम गयी। निशाना लगा कर उसके गुप्तांग पर गोली मारी गयी थी।
गोली लगातार चल रही थी। अगर भीड को हटाना ही मक्सद था तो हवाई फायर या पैरों पर गोली मारने से भी स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सकता था लेकिन गोलियाँ बरसती रहीं, लाशें बिछती रहीं। सोनधर, टांगरू, हडमा, अंतू, ठुरलू, रयतु, सुकदेव; हर मौत के साथ लौहण्डीगुडा का बेनियापाल मैदान खाली होता गया। घायलों की कराहों और लाशों को स्तब्ध नजरों से निहारता प्रसाशन अब अपनी करनी के निशान मिटाने में जुट गया था। “विजय चंद्र भंजदेव महाराजा ऑफ बस्तर” खामोशी खिलखिला कर हँस रही थी; आओ महाराज शासन करो यह लाशों की बस्ती तुम्हारी ही रियासत है।

बेकसूरों की हत्याओं पर कलम का मौन दर्ज करेगा इतिहास : कनक तिवारी


बस्तर में सुकमा-दंतेवाड़ा मार्ग पर यात्री बस को बारूदी सुरंग विस्फोट से उड़ाकर नक्सालियों ने निर्दोष नागरिकों सहित 36 लोगों (संख्या परिवर्तनीय है) की निर्मम हत्या कर दी। यह एक माह में तीसरी बड़ी घटना है। राज्य का पुलिस और खुफिया तंत्र सवालों के घेरे में है। पूरी सरकारी मशीनरी बेबस और लाचार तो नहीं लेकिन किंकर्तव्यविमूढ़ ज़रूर नजर आ रही है। केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय भी पसोपेश में नजर आता है। प्रदेश के गृहमंत्री सेना को बुलाने की मांग करते हैं। मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) उनसे सहमत नहीं हैं। केद्रीय गृह मंत्री वायु सेना के सीमित उपयोग की बात करते हैं। वायु सेनाध्यक्ष की अपनी ढपली है। म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्वविजय सिंह केद्रीय गृह मंत्री को इस मामले में केवल राज्य सरकार को सहायता देने तक सीमित रहने की सलाह देते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सीमित समय के लिए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे हैं। राज्य कांग्रेस पार्टी विधान सभा का विशेष अधिवेशन बुलाए जाने की मांग कर चुकी है। राज्यपाल अनिर्णय में हैं। प्रधानमंत्री नक्सल वाद को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दे चुके हैं। गांधीवादी शांति यात्री भी असफल अभियान से लौट चुके हैं। उकसाए गए थोड़े से युवकों और बस्तर के व्यापारियों ने उनके खिलाफ पुलिस की सांठगांठ से विरोध करने की पिकनिक भी कर ली। मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की तत्काल प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई है।
बुद्धिजीवी, लेखक, कवि, कलाकार, संस्कृति कर्मी चुप हैं। कुछ निर्विकार हैं, कुछ अल्पसूचित हैं, कुछ सहमे हुए हैं, कुछ भाग्यवादी हैं, कुछ हलचल में हैं, कुछ सरकारी सूचनातंत्र पर निर्भर हैं, कुछ टी.वी. चैनलों से चिपके हुए हैं, ब्रेक होने पर इंडियन आयडल देख लेते हैं। कुछ सरकारी बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक आकाओं के महिमा मंडन में व्यस्त हैं। अफसरी बुद्धि चातुर्य के किस्से अलग गढ़े जा रहे हैं। सामचार पत्रों में खबरों के लिए जगह है, विचारों के लिए नहीं। सेक्स, दुर्घटना, डकैती, हत्या , भ्रष्टाचार, क्रिकेट, फिल्मी लटकों झटकों के तड़कों की प्रथम पृष्ठ की खबरों का मुकाबला बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों से ही होता है। वहां भी एम.डी. साहब या जी.एम. साहब सम्पादकों के ऊपर हैं। वे अधिकतर मंत्रियों और अफसरों के दीवानखानों, निजी पार्टियों और सरकारी उडऩ खटोले में व्यस्त होते हैं।
ये तस्वीर की मोटी मोटी रेखाएं हैं। बारीक अभिव्यक्तियां तो जनता को पता ही नहीं होतीं। बस्तर का क्या भविष्य है-यह बुनियादी सवाल है। नक्सल वाद नासूर नहीं नासूर का एक कारण है। वैश्विक पूंजीवाद के प्रसार के कारण बस्तर जैसे देश के सभी आदिवासी अर्थात वन संस्कृति के इलाके नक्सलियों के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं। जंगल नक्सलियों के छिपने के स्थान हैं। आदिवासी वहां सदियों से रह रहे हैं। नक्सली उनके मसीहा बनकर नहीं आए हैं। उनकी तो इतने सीधे सादे, मन- वचन-कर्म के प्रति ईमानदार आदिवासियों को पाकर लॉटरी खुल गई है। विनाश का मूल कारण तो विकास की वह थ्योरी है जो व्हाइट हाउस, वर्ल्ड बैंक या 10 डाउनिंग स्ट्रीट वगैरह से पैदा होकर नई दिल्ली की संसद के मार्फत बस्तर जैसे जंगलों तक विस्तृत हो गई है।
पिछले चालीस पचास बरस से राज्य और केद्र सरकारें आदिवासियों पर नीयतन या लापरवाही से अत्याचार कर रही हैं। उनके प्राकृतिक, संवैधानिक, जातीय और नागरिक अधिकार कम किए जा रहे हैं। कूढ़मगज सरकारी सोच ने अंगरेजों के बनाए गए जालिम कानूनों जैसे भारतीय वन अधिनियम 1927, भू अर्जन अधिनियम 1894, भारतीय सुखभोग अधिनियम, पंचायत और भू राजस्व कानून वगैरह को आदिवासी जरूरतों, माली हालत, संस्कृति आदि के अनुकूल नहीं बनाया है। अलबत्ता उनसे जंगल का परिवेश, संरक्षण, उपयोगिता आदि को कम ही किया जाता रहा। तथाकथित जातीय आरक्षण से भी आदिवासियों का एक मलाईदार तबका ही तैयार हो पाया जो राजनीति के ब्राम्हण ठाकुर मालिकों के दरबारी की भूमिका में मुस्तैद रहा। आज बाजार का आदिवासी खुद को ठगा हुआ या विस्थापित पाता है। इससे निजात के लिए टाटा, एस्सार, एन.एम.डी.सी. शराब, खनिज और जंगल के ठेकेदार या चिदंबरम योजना के अनुसार बस्तर चुने हुए पांच हजार नौजवानों को महानगरों में ट्रेनिंग के नाम पर गुम कर देना नहीं है।
बदहाल नक्सल वाद जैसे राजनीतिक आदोलन के नाम पर हत्यारों का एक गिरोह डाकुओं की तरह जंगलों में हुकूमत कर रहा है। वह बीच बीच में राज्य-व्यवस्था को चुनौती भी देता रहता है। लोकतांत्रिक राज्य की अपनी प्रतिबद्धताएं, मर्यादाएं और न्याय तंत्र होते हैं। नक्सली हिंसक पशुओं की तरह मनुष्यता का ही शिकार कर रहे हैं। इसे समर्थन कैसे दिया जा सकता है? यह एक राज्यद्रोह की चुनौती है। यह संविधान को धमकी देने का विध्वंसक ऐलान है। इसका मुकाबला किए बिना लोकतंत्र, संविधान और राज्य संस्थाएं इतिहास में अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाएंगी। जब युद्ध चल रहा हो तो संविधान जनित संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर सरकारों को बदलने का कोई सवाल नहीं है।
पुलिस तंत्र की असफलता या धीरे धीरे मिलने वाली सफलता पर विचार हो ही रहा होगा। यह वक्त सभी विचार धाराओं के सम्मिलित प्रयास से राज्य में उस वातावरण को बनाए जाने से है जिससे नक्सलवाद के नासूर को सुखाया जा सके। नक्सलवाद को वैचारिक फोकस में रखने के बदले आदिवासी विकास और संरक्षण नागरिक चिन्‍ता का विषय होना चाहिए। यह देश केवल सभ्य शहरी समाजों का नहीं है। भारत के वनवासी उतने ही संवैधानिक और नागरिक अधिकारों से निर्मित हैं जो तथाकथित कुलीन लोगों को उपलब्ध हैं। नक्सली आज निर्दोष नागरिकों के जीने के संवैधानिक अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं। यह बौद्धिक प्रतिकार का भी वक्त है। समाज कैसे निरपेक्ष रह सकता है? जो मारे जा रहे हैं, वे भी आदिवासी हैं, गरीब हैं, सिपाही हैं, अनजान देश-भाई हैं। नक्सली अब कथित अन्यायी अधिकार तंत्र से लडऩे के बाद खुद अधिकार तंत्र के रूपक बन रहे हैं।
समाज चुप क्यों है? सरकार तो समाज का प्रतिनिधित्वत करती है। उसे समाज के जीवंत समर्थन की जरूरत होगी। यह वक्त नक्सली और सरकारी हिंसा को तराजू के दो पलड़ों पर रखकर तौलने का भी नहीं है। गांधी को बार बार याद करने वाले जानते होंगे कि बापू ने जरूरत होने पर हिंसा को समाप्त करने के लिए जायज बड़ी हिंसा की पैरवी की थी। यह समय छत्तीसगढ़ के लिए सबसे बड़ी चुनौती लेकर आया है। एक दूसरे की ओर दोष की उंगली उठाए बिना नक्सल चुनौती से प्रदेश और उनके चंगुल में फंसे आदिवासियों को बचाने का यही वक्त है। पूर्व मुख्यमंत्रियों, गृहमंत्रियों, प्रभारी मंत्रियों, अधिकारियों वगैरह का अनुभव परीक्षा की घड़ी में है। वक्तव्य बहादुरों के बदले मैदानी बहादुरों की हौसला अफजाई का यही समय है। मैंने नक्सलियों और नक्सल समर्थकों की बीसियों कविताएं पढ़ी हैं। नक्सलवाद के विरोध में उतनी कविताएं नहीं। क्या नक्सली-हत्या में मारे गए सिपाही और निर्दोष नागरिक कवियों की संवेदना का विषय नहीं हैं?
एक पक्षी युगल की बहेलिए ने हत्या? क्या कर दी, भारत का पहला डाकू आदि कवि में तब्दील हो गया। बस्तर की पहाड़ी मैना भी तो राज्य पक्षी है। उसकी बहेलिए हत्या कर रहे हैं। क्या मनुष्य की मृत्यु पशु- पक्षी की मौतों से कमतर है जो उनके समर्थन में कलमें खामोश रहेंगी? पुलिस या सेना की बंदूक का भौतिक प्रदर्शन समयबद्ध ऑपरेशन है। कलम की ताकत समयातीत होती है। निर्दोष नागरिकों के शव यही सवाल हमसे पूछ रहे हैं।

I am Animesh Tiwari,son of Mr. Sanjeeva Tiwari, presenting this post. Sorry for unicode conversion and typing mistakes

आलेख व चित्र छत्‍तीसगढ़ से साभार, उपर जो चित्र है वह अस्थिकलश का नहीं, विष्‍फोट में बिखर गए मानव मांस कलश का है।

तथाकथित मानवाधिकार वादियों बस्‍तर के आदिवासियों को मुहरा बनाना बंद करो

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के गलियारों से एवं समाचार पत्रों से प्राप्‍त जानकारी छत्‍तीसगढ़ के लिए तो चौंकाने वाला नहीं है किन्‍तु यह उन तथाकथित वनवासियों के शुभचिंतकों के लिए अवश्‍य चौंकाने वाला है. इस समाचार से यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि तथाकथित मानवाधिकार वादी बस्‍तर के आदिवासियों को मुहरा बनाकर किस प्रकार से सरकार के विरूद्ध खेल खेल रहे हैं. इस समाचार नें उन सभी याचिकाओं की पोल खोल दी है जो तथाकथित मानवाधिकार वादियों के द्वारा हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक विभिन्‍न न्‍यायालयों में दायर की गई हैं. यह समाचार छत्‍तीसगढ़ के विभिन्‍न समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है जिसे हमने अपने ब्‍लॉग जूनियर कौंसिल में भी प्रकाशित किया है. समाचार यह है -

नक्‍सल क्षेत्र दंतेवाड़ा जिले के एर्राबोर थाने का मामला

छत्तीसगढ हाईकोर्ट के १० वर्षों के न्यायालयीन इतिहास में यह पहला मामला है जब याचिकाकर्ता ने कोर्ट में उपस्थित होकर किसी तरह की याचिका दायर करने से ही इनकार कर दिया। जिस याचिका पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में सुनवाई हो रही है उसमें एर्राबोर पुलिस पर आरोप लगाया है कि उसके पिता व बहन को गायब कर दिया गया है। पिछले सात महीने से इस याचिका पर डिवीजन बेंच में सुनवाई चल रही थी।

  • कोर्ट में आया अनुवादक

सिन्ना चूंकि हिंदी न तो बोल पाता है और न ही समझ पाता है। वह गोडी बोली बोलता और समझता है। इसे देखते हुए कोर्ट ने अनुवादक की व्यवस्था करने के निर्देश शासन को दिए थे। लिहाजा, अनुवादक के माध्यम से कोर्ट ने अपना सवाल किया। इस दौरान उन्होंने इस तरह का खुलासा किया।
यह चर्चित मामला दंतेवाड़ा जिले के एर्राबोर थाने की लेदरा ग्राम पंचायत के ग्राम दरभागुड़ा का है। यहां के निवासी विंगोसिन्ना ने १८ सितंबर २००९ को अपने वकील के जरिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। याचिका में पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा था कि अप्रैल-मई २००८ को उसके पिता वेकोदुल्ला व बहन वेको बजरे को पुलिस बलात्‌ उठाकर ले गई। याचिकाकर्ता ने कहा कि जिस वक्त पुलिस वहां पहुंची तो उसके परिवार के अन्य सदस्य जंगल की ओर भाग गए। लिहाजा, पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई। याचिका में पिता व बहन को पुलिस के चंगुल से छुड़ाने के लिए पुलिस महानिदेशक व पुलिस अधीक्षक से शिकायत करने पर कोई कार्रवाई नहीं करने का आरोप भी लगाया गया है। इस मामले की सुनवाई डिवीजन बेंच में चल रही थी। इसी बीच १ फरवरी २०१० को याचिकाकर्ता के वकील ने हाईकोर्ट में इस बात की जानकारी दी कि याचिकाकर्ता से उसका कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है।

  • चेतना परिषद पर लगाया आरोप

सिन्ना ने आदिवासी चेतना परिषद के पदाधिकारियों पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसके अलावा कई और आदिवासियों को चेतना परिषद के पदाधिकारी दो बार बिलासपुर लेकर आए थे। इसी दौरान कई दस्तावेजों पर उसके हस्ताक्षर लिए गए थे। किस बात के लिए हस्ताक्षर लिए गए थे इसकी जानकारी उसे नहीं है।
वकील की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता की खोजबीन करने व कोर्ट में उपस्थित करने के लिए शासन को नोटिस जारी किया था। डिवीजन बेंच के निर्देश के बाद पुलिस ने २३ मार्च २०१० को याचिकाकर्ता विंगोसिन्ना को डिवीजन बेंच के समक्ष पेश किया। याचिकाकर्ता के वकील ने अपने मुवक्किल के रूप में उसकी पहचान की। डिवीजन बेंच द्वारा पूछताछ के दौरान याचिककर्ता ने कोर्ट के समक्ष सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि उसने किसी तरह की कोई याचिका हाईकोर्ट में दायर ही नहीं की है। और न ही पुलिस पर किसी तरह का आरोप लगाया है। विंगोसिन्ना ने इस बात की जानकारी कोर्ट को दी कि उसके पिता व बहन पिछले कुछ दिनों से गायब हैं। इस पर जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा व जस्टिस आरएन चंद्राकर की डिवीजन बेंच ने दंतेवाड़ा एसपी को सिन्ना के पिता व बहन की खोजबीन करने के निर्देश दिए। साथ ही याचिका को निराकृत कर दिया है।

इस समाचार की सत्‍यता जानने के बाद सुप्रीम कोर्ट में लगाए गए बस्‍तर संबंधी विभिन्‍न याचिकाओं पर भी मन में शंका हो रही है कि वे इसी तरह से फर्जी तो नहीं हैं. हांलांकि इस समाचार के विरोध में तथाकथित मानवाधिकार वादी यह भी कहने से नहीं चूकेंगें कि सरकार व पुलिस किसी अन्‍य व्‍यक्ति को न्‍यायालय में प्रस्‍तुत कर याचिकाकर्ता के रूप में प्रस्‍तुत कर रही है, या याचिकाकर्ता को धमकाया गया है. 6/4 के निर्मम घटना के बाद भी  विदेशों में व दिल्‍ली में बैठे बुद्धजीवी इन फर्जी मानवों के खून चूसने वालों पर विश्‍वास करती है तो बौद्धिकता पर शर्म आती है.

संजीव तिवारी

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...