छत्तीसगढ़ के आदि संदर्भों के लिए सदैव डॉ.वैरियर एल्विन को याद किया जाता रहा है और इसमें कोई दो मत नहीं है कि वैरियर एल्विन नें छत्तीसगढ़ के आदि संदर्भों का जिस प्रकार से शोधात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है वैसा अध्ययन आजतक किसी अन्य के द्वारा प्रस्तुत नहीं किया जा सका है. इसीलिए प्राय: हर किताबों, शोधग्रंथों, लेखों, भाषणों में डॉ.वैरियर एल्विन जीवंत रहते हैं.मैं स्वयं भी डॉ.वैरियर एल्विन को संदर्भित करते रहा हूं, किन्तु मेरे समाजशास्त्री व मानवविज्ञानी मित्र कहते हैं और स्वयं मैं भी स्वीकार करता हूं कि बार बार इनकों संर्दभित करने, इनके लिखे पुस्तकों का नाम अपने लेखों, शोधों में सम्मिलित करने की प्रवृत्ति लेख को बेवजह तथ्यात्मक व सत्यता के करीब ले जाने की थोथी कोशिस प्रतीत होती है. पर करें तो क्या करें आदि संदर्भों पर यह हमारी विवशता है. मैं अगरियों पर एक लेख लिखने का प्रयास कर रहा हूं. बहुत कुछ लिख चुका हूं किन्तु जमीनी तौर पर अगरियों के पास जाकर उनसे मिले बिना इसे पूरा नहीं कर पा रहा हूं. छत्तीसगढ में रहने का फायदा यह है कि मुझे अगरियों के संबंध में बहुत कुछ जानकारी कई लोगों से मिली है कुछ अगरियों से व्यक्तिगत संपर्क भी कर चुका हूं पर जमीनी तौर से उनसे मिले बिना यदि मुझे यह लेख परोसना है तो निश्चित है कि मैं डॉ.वैरियर एल्विन के संदर्भों पर ही निर्भर रहूंगा.
मैं डॉ.वैरियर एल्विन का विरोधी नहीं हूं ना ही मैं किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हूं. किन्तु मैं डॉ.वैरियर एल्विन एवं तदसमय के अंग्रेज लेखकों के लेखन को नि:स्वार्थ लेखन कहने का सदैव विरोधी रहा हूं. मैनें इसके पहले भी कई बार लिखा है कि वैरियर एल्विन नें अपने लेखों-शोधों-अध्ययनों का व्यवसाय किया है. वे हमारे जैसे स्वांतः सुखाय लेखन नहीं कर रहे थे उन्होंनें बाकायदा अपने ज्ञान और अध्ययन का कीमत वसूला है और आज भी उनके वारिसान रायल्टी के रूप् में उनके पुस्तकों के विक्रय से प्राप्त अंश पूंजी का उपभोग कर रहे हैं. उन्होंनें या उनके अग्रज अंग्रेजों नें छत्तीसगढ़ केन्द्रित जो भी लिखा है वह ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यावसायिक उदेश्य को पूरा करने का अंग रहा है.
उन्होंनें छत्तीसगढ़ी भाषा, व्याकरण पर इसलिए लिखा क्योंकि उन्हें इस क्षेत्र के जीवन से जुडना था और अपने शासन के झंडे के तले हमारा दोहन करना था. उन्होंनें हमारे लोकगीतों पर लिखा क्योंकि उन्हें आदिवासी बालाओं के उधडे वक्षों के रिदम को निहारना था उन्होंनें जनजातियों पर कलम चलाई क्योंकि उन्हें उन अनछुये प्रकृति के परमसुख को भोगना था इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के गर्भ में छुपे हुए अकूत खनिज संपदा व वन संपदा का दोहन करना था. आंध्र, महाराष्ट्र व छत्तीसगढ व अन्य रियासतें से जो जानकारी इन्हें मिलती थी उस पर ये विश्वास नहीं करते थे और स्वयं उसका परीक्षण निरीक्षण करते थे. इसके लिये चतुर अंग्रेज अपने ही किसी प्रतिभावान व्यक्ति को इन अध्ययनों व शोधों के लिए आगे बढाते थे और ये चतुर व बुद्धिशील अंग्रेज देशी तहसीलदारों का भी विश्वास न करते हुए स्वयं क्षेत्र में जाकर अध्ययन करते थे इन्हीं में से वैरियर एल्विन भी थे. अगरियों के अध्ययन के लिये आधुनिक भारत के लौह शिल्पी सर दोराबजी टाटा नें वैरियर एल्विन को धन उपलब्ध कराया था क्योंकि उन्हें भारत में टाटा स्टील के लिए लौह अयस्क की उपलब्धता को जानना था.'छत्तीसगढ के असुर : अगरिया' पर मेरी कलम घसीटी के अंश
संजीव तिवारी