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अप्रैल, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

जस्टिस जगदीश भल्ला : छत्तीसगढ के बासी मे उबाल

छत्तीसगढ समाचार के २७ अप्रेल के अंक में शुभ्राशु चौधरी ने एक सार्गर्भित व जन मानस को झकझोर देने वाला आलेख लिखा है “क्या छत्तीसगढ दोयम दर्जे का राज्य है” उसी के अंश व दूसरे साईट के जुगाड खोज कर छत्तीसगढ के सुधियो के लिये प्रस्तुत कर रहे हैं, छत्तीसगढ समाचार सांध्य दैनिक होने के कारण सबेरे के अखबार से कम पढा जाता है जिसके कारण इतना गम्भीर लेख सब के सम्मुख प्रस्तुत करने के उद्देश्य से हम इसे इस चिठ्ठे मे पेश कर रहें हैं छत्तीसगढ उच्च न्यायालय में एक नये न्यायाधीश की नियुक्ति से बहुत सारे सवाल उठ खडे हुए हैं क्योंकि इस न्यायाधीश को लेकर पहले से काफी विवाद चल रहे थे औरा उन विवादों को वजन इस बात से आंका जा सकता है कि इस न्यायाधीश को पदोन्नति देने की फाईल राष्ट्रपति नें वापस कर दी थी । वे इस पदोन्नति से सहमत नही थे । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में इन प्रशासनिक कार्यों के लिए जो कमेटी है उसने राष्ट्रपति की आपत्ति से असहमति जताते हुए फिर से इस जज का नाम भेजा है - शुभ्राशु चौधरी का आलेख प्रस्तुत करते हुए सांध्य दैनिक छत्तीसगढ , रायपुर नें लिखा है । सम्पुर्ण लेख छत्तीसगढ समाचार के २७ अप्रेल के अंक

प्रशंगवश

अभिब्यक्ति के प्रत्येक माध्यमो पर आरंभ से ही छीटाकशी होते रही है खासकर उन लोगों के द्वारा ही यह सब होते आया है जिन पर भाषा व भावनाओं को अभिब्यक्त करने का दायित्व रहा है । कालांतर में यही छीटाकशी जो मर्यादाओं मे बंधी थी, आलोचना समलोचना की रंगीली चुनरी बन गई । जहां तक साहित्य जगत का प्रश्न अभिब्यक्ति पर मर्यादित आलोचना, समलोचना व टिप्प्णियों एवं रचनाकारों के बीच मानसिक मतैक्य का है तो वह आधुनिक हिंदी काल में कभी भी नही रहा । आजादी के उपरांत भी साहित्य एवं संस्कृति के नेहरू वादी सरकारी शब्द्कोश के झंडाधारी गांधी एवं टैगोर जी के बीच वैचारिक मतभेद सर्वविदित है यद्यपि ऐसे मतभेद लिखित रूप में कभी भी प्रस्तुत नहीं हुये । अस्सी के दसक में मैं थोडा बहुत अभिब्यक्ति के चितेरों के सम्पर्क मे रहा उस समय की बातों का प्रसंगवश उल्लेख करना चाहुंगा । अस्सी के दसक के हिंदी के ध्वजा धारी प्रगतिशील, जनवादी, वामपंथी अलग अलग विचारों के थे उनमें समय समय पर वैचारिक मद्भेद होते रहते थे जो पत्र पत्रिकाओं के माध्यम व कुछ व्यक्तिगत माध्यमों से पाठकों के बीच उजगर होते रहते थे । भारत भवन के कमान सम्हालने से लेकर हिं

पौरुष की कापीराईट

धुर बस्तर में एक आदिवासी जनजाती मुरिया (मुडिया )निवास करती है । जिनमें विवाह के पूर्व युवा लडके एवं लडकियां गांव में स्थित घोटुल में अपने आप को दाम्पत्य के लिये तैयार करते हैं एवं प्रेम का पाठ सीखते हैं छत्तीसगढ के आदिवासियों की यह परंपरा अर्वाचीन है यह परंपरा उनकी अस्मिता है जिस पर कई लोगों ने लिखा है पर आज मेरे बस्तर के एक मित्र ने मुझे बस्तर की एक युवती का चित्र दिया जिसमे कापीराईट कोई सुनील जान के नाम से लिखा था मैने नेट पे ईसे खोजा तो पाया कैसे हमारे अस्मिता का व्यवसायीकरण हो रहा है । अब वो दिन भी दूर नहीं जब हमारे पौरुष का कापीराईट सुदूर अमेरिकन के पास होगा और हमें अपने बच्चे को अपना कहने के लिये कापीराईट ओनेर को रायल्टी देनी होगी । जान साहेब का लिंक है : http://members.aol.com/sjanah2/archive/tribals/index.htm

हेडर के रूप में चित्र को बीटा ब्लागर में जोडना – नये चिटठाकारों के लिये

१ सबसे पहले फोटोशाप या अन्‍य ग्राफिक साफटवेयर से अपना हेडर बनाये, ब्‍लागर में लागईन करें, पहले अपने टेम्पलेट का बेकअप डाउनलोड फुल टेम्पलेट या चेंज यूवर टेम्पलेट से उपयोग विधि अनुसार ले लेवें । २ अपने इच्छित चित्र को गूगल पेज, फोटो बकेट जैसे मुफत होस्ट में अपलोड करें एवं यु आर एल की कापी प्राप्त कर लेवें । ३ ब्लागर बीटा में लागइन करें डेशबोर्ड से अपना ब्लाग चयन करें लेआउट चयन करें यह आपको एड एण्ड अरेंज पेज में ले जायेगा एडिट एच टी एम एल को क्लिक करें व निम्नलिखित कोड के आते तक नीचे जायें :- यहां तक div id="header-wrapper" ?xml:namespace prefix = b / b:section class="header" id="header" showaddelement="no" maxwidgets="1" b:widget id="Header1" title="The Widgets of Beta Blogger. (Header)" type="Header" locked="false" /b:widget /b:section /div उपरोक्त कोड में निम्नलिखित बदलाव करें :- maxwidgets="1" की जगह maxwidgets="2" एवं showaddelement="no" की जगह showaddelement=&quo

नर नारी . . समाधि-सुख के . . शिखर पर : उर्वशी

महाकवि रामधारी सिंह दिनकर की उर्वशी के कुछ अंश कवि चिट्ठाकारों के मन में जोश व उत्साह लाने के उद्देश्य से प्रस्तुत कर रहा हूं, मैं ये नहीं जानता कि इससे कापीराईट कानून का उलंघन होता है कि नहीं किन्तु उर्वशी को बार बार पढने का मन होता है, नेट पर यह उपलब्ध नही है अस्तु :- नर के वश की बात, देवता बने कि नर रह जाये रूके गंध पर या बढकर फूलों को गले लगावे । सहधर्मिणी गेह में आती कुल पोषण करने को, पति को नही नित्य नूतन मादकता से भरने को । किन्तु पुरूष चाहता भींगना मधु के नये कणों से नित्य चूमना एक पुष्प अभिसिंचित ओसकणों से । हाय मरण तक जीकर मुझको हालाहल पीना है जाने इस गणिका का मैनें कब क्या सुख छीन लिया था जिसके कारण भ्रमा हमारे महाराज की मति को, छीन ले गयी अधम पापिनी मुझसे मेरे पति को । ये प्रवंचिकाएं जाने, क्यों तरस नहीं खाती हैं, निज विनोद के हित कुल वामाओं को तडफाती हैं । जाल फेंकती फिरती अपने रूप और यौवन को, हंसी हंसी में करती हैं आखेट नरों के मन का । किन्तु बाण इन व्याधिनियों के किसे कष्ट देते हैं, पुरूषों को दे मोद, प्राण वधुओं के लेते हैं । इसमें क्या आश्चर्य प्रीति जब प्रथम प्रथम जगत

छत्तीसगढ के हिन्दी ब्लागर्स निराश न होवें : संजीव तिवारी का मूंछों वाला खानदानी दवाखाना आरंभ

अंतरजाल में हिन्दी चिटठाजगत, हिन्दी भाषियों का स्वर्ग है पूरे विश्व में नित नये चिट्ठाकार हिन्दी में चिट्ठा लिख रहें हैं, साहित्यकार साहित्य श्रृजन कर रहें हैं जो साहित्य जगत से परिचित नही है एवं हिन्दी के पारंपरिक रचनाकार नही हैं, जिन्हें शब्दशिल्प का ज्ञान नही है, वे भी इस महायज्ञ में आहुति दे रहे हैं । हिन्दी रचनाकारों के रचनाशिल्प का यह एक नया युग है चिट्ठा काल, वैसे ही जैसे साहित्य में रचनाशीलता एवं रचनाकारों के समय के अनुरूप समय समय पर विधा का व काल का जन्म हुआ । संपूर्ण विश्व जब चेटिंग फेटिंग छोड के एक सार्थक पहल कर रहा है, ऐसे समय में मेरे छत्तीसगढ के सभी कम्प्यूटर सेवी व प्रेमियों से सानुरोध आग्रह है कि वे भी इस पुण्य में सहभागी बने अपने प्रदेश एवं देश की अस्मिता को अपनी शैली में चिट्ठे के द्वारा प्रदर्शित करें । इस कार्य में आपके समक्ष आने वाली समस्याओं से मैं भलीभांति परिचित हूं, आपका जी मेल में खाता है और आप ब्लाग खाता भी खोल चुके हैं किन्तु आपकी मूल समस्या है हिन्दी में लिखने की, आप हिन्दी सहायता वाले ढेरों साईटों पर जा चुके हैं उनके सुझावों पर अमल भी लाये हैं किन्तु सब

छत्तीसगढ के नगाडे की धूम : संपूर्ण विश्व में

गिनीज बुक आफ वल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने छत्तीसगढ के लोक कलाकार स्पात नगरी के रिखी क्षत्रीय ने सौ घंटे अनवरत नगाडा बजाने का छत्तीसगढिया जजबा को फलीभूत करने के लिये स्थानीय कला मंदिर में शुक्रवार, १३ अप्रैल की सुबह ९.२५ को छत्तीसगढी लोकगीतों के साथ गायन व वादन का रिकार्ड तोडू सफर का आरंभ किया । (आलोक प्रकाश पुतुल का लेख पढें बी बी सी हिंदी में) नगाडा दुनिया का सबसे पुराना वाद्य यंत्र है, इसका रुप और इसके बजाने की शैली अलग अलग देशों मे अलग अलग प्रकार से है रिखी ने छत्तीसगढ के इस पारम्परिक वाद्य यंत्र की घटती लोकप्रियता को बढाने एवम छत्तीसगढ की संस्कति, अस्मिता व स्वाभाविकता, सरलता को विश्व में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से यह बीडा उठाया है । गिनीज बुक में ८४ घंटे तक लगातार ड्रम बजाने का रिकार्ड फिलहाल स्विटजरलैंड के अरूलानाथन सुरेश के नाम दर्ज है जिन्होंने यह शराहनीय कार्य वर्ष २००४ में किया था । भाई रिखी क्षत्रीय छत्तीसगढ के लोक कलाकार हैं इन्होंने छत्तीसगढ के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों का अनोखा संग्रह किया है जिसकी प्रदर्शनी समय समय पर देश व विदेश में भिलाई स्पात संयंत्र के सह

छतीसगढी लघु कथा : कोंन नामवर सिंह ?

पुन्नी के दिन मोर घर सतनरायेन के कथा होये रहिस. वोमा मोर परोसी बलाये के बाद घलव नई आये रहिस. मोर सुवांरी बने मया कर के परसाद ल मोर टेबल में माढे कागज में पुतिकिया के रौताईन (शहर में काम करईया बाई मन ल हमन अपन मन मढाये बर अईसनहे रौताईन कथन काबर कि बम्हनौटी बांचे रहे कहि के) के हांथ परोसी के घर भेज दिस. कथा पूजा के बाद मैं हर हरहिंछा उपरोहिता बाम्हन ल दान दक्षिणा देके बने खुश करा के अउ टें टें के अपन आप ल बकिया तिवारी वेदपाठी बाम्हन बतात बतात उपरोहिता बाम्हन के चेहरा म अपन आप ल एक आंगुर उपर बैठारत भाव ल खोजत अपन कुर्सी टेबल म बैठेंव त मोर होश उठा गे. मोर जम्मो लिखना ल तो मोर सुवांरी बोहायेच दे रहिस फेर मोर इंदौर के इतवारी भास्कर में छपे जुन्न्टहा एक ठन कहानी के बारे म टीका टिपनी डा नामवर सिंह हा मोला भेजे रहिस तउन चिट्ठी ला मैं ह अपन टेबल के उपरेच में रखे रेहेंव काबर कि कथा सुनईया अवईया मन ह ओला देखही त मोर बर उखर सम्मान बाढही कहि के, टेबल ले चिटठी गायब ! घर के जम्मो मनखे मन ल पूछ डारेंव पता चलिस परसाद ह चिट्ठी के पुतकी म बंधा के परोसी घर पहुंच गे हे तुरते परोसी घर चल देंहेंव फेर कई

छत्तीसगढी राजभाषा दिवस

३० मार्च २००२ को छत्तीसगढ विधानसभा में छत्तीसगढी भाषा को राजभाषा घोषित करने के अशासकीय संकल्प के पारित होने के यादगार क्षणों को अविश्मरणीय बनाने एवं छत्तीसगढ राज्य के अपने पहचान को स्थापित करने के उद्देश्य से ३० मार्च २००७ को छत्तीसगढी भाषा दिवस के रूप में मनाया गया । पूरे राज्य में छुटपुट क्रियाकलापों के अतिरिक्त एक बडा आयोजन छत्तीसगढ की राजधानी में देखने को मिला । रायपुर में राज्य स्तरीय संगोष्ठी के आयोजन में राज्य के लगभग सभी छत्तीसगढी भाषा के सुधी उपस्थित थे । डा सुधीर शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक छत्तीसगढी राजभाषा का सामर्थ्य का विमोचन भी इस अवसर पर किया गया, डा सुधीर शर्मा की आयोजन अविध् में प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पुस्तक को जन जन तक पहुंचाना भी एक प्रकार से छत्तीसगढी की सेवा ही होगी । एक बोली को भाषा व भाषा को राजभाषा के रूप् में स्थापित करने के सफर में उसके तकनीकि पहलू व राजनेताओं में इसके लिये अदम्य संकल्प शक्ति के विकास के पहल के लिये ऐसे अध्ययन की आवश्यकता हम सभी को है । श्रीमान रमेश नैयर का यह कथन वर्तमान परिवेश में सर्वाधिक उचित है कि छत्तीसगढी भाषा को स्थापित करने क

छपास ले मन भले भरत होही पेट ह नई भरय - संजीव तिवारी

इंटरनेट म हिन्दी अउ छत्तीसगढी के भरमार ल देख के सुकालू दाऊ के मन ह भरभरा गे वोखर बारा बरिस पहिली कोठी म छाबे भरूहा काडी ल गौंटनिन मेंर हेरवाइस, तुरते सियाही घोरे ल कहिस गौंटनिन कहे लागिस का गौंटिया तोर सियाही घोरे के किस्सा तोर बहिनी भाई मन बिक्कट करथे जब तुमन छोट कन रेहेव त हमार सास चोरभठ्ठिन ल बड पदोवव, हंउला हंडा म सियाही घोरे ल कहव उहू ह कम पर जही कहि के रोवव अब फेर मोर मेर घोरवांंहू का सियाही ल. जईसे तईसे सुआंरी के मुह ला बंद करा के लईका के सियाही के बोदल म भरूआ काडी ल बोरिस अउ का लिखव का लिखव कहि के सोंचे लागिस भरूहा काडी के सियाही सुखा गे फेर का के जवाब नई सूझिस. बारा बछर पहिली के मन भौंरा अब नई नाचे ल करे, रहे सहे लिखे के समरथ ओखर मंत्री कका के समाजवादी सोंच ल बेगारी म टाईप कर कर के अउ अरथ ल गुन गुन के, अपन खातिर कानून के बडका बडका पुस्तक मन ला चांट चांट के चकबका के कुंदरू बन गे हे खाली पक्षकार, आवेदक, अनावेदक, धारा, यह कि .. . के सिवाय अउ कुछू बर दिमाक चलय नही. थोर बहुत बांचे आसा ल अउ लिखईया मन बर सुकालू दाऊ के हिरदे म बसे सम्मान ल, दिल्ली के एक झन राजस्थानी अडबड बडका

मोर सोंच मोर छत्तीसगढी

छत्तीसगढी भासा बोलैया समझैया मन ला मोर जय जोहारमोर मन हा छत्तीसगढी बोले पढे लिखे म अडबड गदगद होथे, काबर नई जानव ? फ़ेर सोचथो मोर जनम इहि छत्तिसगढ के कोरा मा होये हवय गाव, गौठन, गाडा रावन के धुर्रा संग खेलत औउ ब्यारा के पैरा मा उलानबादी खेलत लईकई बिते हे सुआ ददरिया फ़ाग अउ माता सेवा गात नाचा गम्मत खेलत पढई के दिन बिते हे तेखरे सेती मोर छत्तिसगढ अंतस ले कुहुक मारथे ।इहा भिलाई में मोर छत्तीसगढी परेम मा पर्रा डारे ला लागथे काबर कि भेलई तो मोर भारती बुढी दाई के रुप ये, इहा मोर सब्बे २७ मोसी बढी दाई के बेटा मन मिल जुर के रहिथे । उमन ला मोर भासा ला समझे मा थोरिक तकलिभ होथे, तकलिभ होवय के झींन होवह फ़ेर मोर भासा ला सुन के उकर मन मा निपट अनपढ गवांर - अढहा अउ मरहा मनखे के छबि छा जथे अउ उहि छबि जईसे उंखर हमर मन बर ब्यवहार परगट होथे ।तेखर सेती मोला हिंदी बोले ला लागथे, फ़ेर कहां जाही माटी के छाप हा, परगट होइच जाथे । जईसे बिहारी भाई के लाहजा, बंगाली भाई के लहजा हिंदी हर माटी ला बता देथे ।मोर माटी के लहजा वाले हिंदी ले काम चलाथों जईसे कोनो मोर भासा वाले मिलथे छत्तीसगढी में गोठ बात करथों मोर ईहि परेम ला

एक यायावर : हीरानंद सच्चिदानंद वात्सायन ‘‘अज्ञेय’’

आज लेखक कवि अज्ञेय की महानता के सम्बंध में विशेष रूप से कुछ कहने की आवश्यकता बाकी नही है । हिंदी सहित्य के वे अपने ढंग के मूर्धंय लेखक व सर्वधिक चर्चित रचनाकार थे ।१९२४ में “सेवा” नामक पत्रिका में अज्ञेय जी की पहली रचना प्रकशित हुई तब वे मात्र १३ वर्ष के थे, उसके बाद वे कभी मुड के नहीं देखे ईसी के बल पर् वे लगभग १५ कविता संग्रह, ७ कथा संग्रह, ४ उपन्यास सहित ७५ कृतियों के श्रृष्ठा बने । वे पिछले लगभग ५ दसकों से हिंदी कविता को लगातर प्रभावित किये रहने वाले और हिंदी उपन्यास लेखन पर अनेकों प्रश्न चिंह व विवाद खडे करने वाले नई शैली के श्रृष्ठा थे। अज्ञेय जी के अद्भुत वाक्य संयोजन ने मुझे “नीलम का सागर पन्‍ने का द्वीप” मे प्रभावित किया, इसे पढने के बाद इस विशिष्‍ठ लेखक के सम्बंध में जानकारी इकट्ठे करना प्रारंभ कर दिया था, यह लग्भग २४ वर्ष पूर्व की बात थी, किंतु यह ऐसा लेखक था कि इसकी जीवनी अस्पस्ट होती थी। इन्‍होंने आज तक कहीं अपने बारे में कुछ् लिखा व कहा नहीं, वे स्वभावत: मौन ही रहते थे। अज्ञेय जी एक क्रांतिकारी थे, इनके क्रांतिकारी मित्र राजकमल राय अपने पुस्तक “शिखर से सागर तक” में इनक

रोजगार की विवशता और संभावनायें - संजीव तिवारी

बेरोजगारी एवं रोजगार के अपरिमित संभावनाओं के छल के इस दौर में मेरे जैसे लाखों लोग छले जा रहे हैं । मैं उन सभी की बात कर रहा हूं जो ट्रेडिंग, रिटेल, सेवा के अन्य व्यवसाय में निचले दर्जे से उपर तक सिर्फ अपने हुनर व अनुभव के बल पर नौकरी पेशा हैं । ग्लोबलाईजेशन की बातें समाचार पत्रों व दूरदर्शन में बढ चढ के नजर आ रही हैं रिलायंस, वालमार्ट जैसे समूह छोटे से छोटे व्यवसाय को अपने कार्यक्षेत्र में शामिल करते जा रहे हैं । इन छोटे छोटे व्यवसाय के व्यवसायी के बेरोजगार होने की प्रबल संभावना तो है ही किन्तु उनके अंतस में निहित उद्यमशीलता उन्हे संघर्ष करते रहने की क्षमता अवश्य प्रदान करेगी दुखों का दौर उनका होगा जो उद्यम करने का पौरूष इन उद्यमियों के उद्यम को बरकरार रखने के कारण खो चुके हैं। मैं उनकी ही बात कर रहा हूं जो अपना सब कुछ, अपना सारा श्रम एवं समय छोटे एवं मघ्यम दर्जे के इन उद्यमियों के लिये बतौर नौकर, मुशी, मैनेजर बन कर, लगा चुके हैं अब जबकि उन्हें इनके लम्बे अनुभव के चलते अच्छे स्थान व धन मिलने की संभावना बन रही थी वह भी समाप्त होते प्रतीत होती है क्योंकि मौजूदा उद्यमियों का उद्यम तो ताल

मेरी फटी पुरानी डायरी के शेष पन्नों से मेरी प्रकाशित छत्तीसगढी कवितायें

दाई मोला सुरता आथे - संजीव तिवारी खदर के छांधी अउ झिपरा के ओधा म तिंवरा के दार संग गुरमटिया चाउंर के भात जेमा सुकसी चिंगरी के साग अउ उहू म नून मिरचा कम डारे हस कहि के तोर संग लडई दाई मोला सुरता आथे इंहां रहत हंव रोजी बर कभू बापो पुरखा नई देखे रेहेंव तइसनेहे बिल्डिगं के तिपत कुरिया म गिलगोटहा भात के बोरे तहां बासी अउ उहू म सुख्खा मिरचा के भुरका संग तिबासी खात रात कन भभकत कुरिया म पसीना संग आंसू ह मिल के तिबासी म जब टप ले टपकथे दाई मोला सुरता आथे आघू बाघू रेंगत मोर उदंत भंईसा पाडू म पटकू भर पहिरे भंईसा कस तने देंह के मोर ददा जेखर खांध म नांगर अउ ओखर पाछू म मोर पढई बर गहना धरे लहलहावत हमर खेत के पीक दाई मोला सुरता आथे मोर घर के ओदरत भिथिया ददा के माखुर बर पईसा मंगई गौंटिया घर के देहे तोर चिरहा अंडी के लुगरा अउ उहु म तोर सूंता पहुची पहिरे के सौंउख दाई मोला सुरता आथे होत बिहिनिया रांध खा के सेठ के दुकान म बहिरी मारथौं त सेठ के गोड के धुर्रा संग मोर जम्मों पढई ह उडा जथे सं कर बे ! ओ कर बे ! इंहां जा बे ! उहां जा बे ! अउ उहू म सेठ अपन चाय पिये जूठा कप ल जब धोवाथे दाई मोला सुरता आथे अउ सु

ग्रह दोष : निवारक टोटके लाल किताब (Lal Kitab) से - संजीव तिवारी

लाल किताब आधुनिक ज्योतिष जगत में काल सर्प के पहले सर्वाधिक चर्चित विषय रहा है, लाल किताब को भारतीय ज्योतिष का फ़ारसी भाषा में उप्लब्ध यवन संस्करण माना जा सकता है । लाल किताब जैसे महत्वर्पूण ज्योतिष साहत्यि का फारसी एवं उर्दु में लिखा होना इस बात का पुख्ता सबूत है कि भारतीय ज्योतिष का सफर बगदाद आदि खाड़ी देशों से होता हुआ पुन: यवनों के प्रभाव से भारत आया । यवनों का ज्योतिष ज्ञान उस समय में काफी सराहनीय था, इसका उहेख लगभग इ. सन् ५०० में भारतीय ज्योतिष के पितृ पुरुष वराहमिहरि नें कुछ इस तरह से उद्घृत किया था :- म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यक् शास्त्रमिदं स्थितम् । ऋषिवत्ते पि पूज्यन्ते किं पुनदैवविद् द्विज: ।। ऋषि तुल्य पूजने का सुझाव देने के पीछे इब्राहीम अलफजारी के मुस्लिम चान्द्र वर्ष सारणी एवं सिंद हिंद जैसे ग्रंथ रहे हैं । रमल और ताजिक जैसे ज्योतिष के अंग अरब के प्रभाव को प्रस्तुत करते ही हैं । इकबाल, अशरफ जैसे यवनाचायो को भारतीय ज्योतिष के सभी मूल सिद्धांत ज्ञात थे इन्होनें इसे फारसी भाषा में लिख कर इस ज्ञान के प्रसार में योगदान किया । इन्हीं विद्वानों की तरह किसी गुमनाम