2008/03/09

कविता का उद्देश्य : गंगा

कविता का उद्देश्‍य : गंगा

जमुना प्रसाद कसार

एक संत नें तुलसीदास से पूछा कि कविता का उद्देश्‍य क्‍या होना चाहिए ? तुलसीदास जी नें कहा कि काव्‍य को गंगा के समान सर्वहितकारी होना चाहिए –

कीरति भनिति भूति भलि सोई ।

सुरसरि सम सब कहुँ हित होई ।।

कीर्ति, कविता और सम्‍पत्ति वही उत्‍तम है जो गंगा की तरह सबका हित करने वाली हो । गोस्‍वामी जी नें गंगा की धारा की परंपरा को मानस में स्‍वीकार किया है । भारतीय संस्‍कृति में दो परंपरायें हैं । एक है मंदिर की परंपरा और दूसरी है गंगा की परंपरा । मंदिर में प्रवेश करने के पूर्व हमें स्‍नान करके पवित्र होना पडता है और गंगा के पास हम जाते हैं, स्‍नान करके पवित्र होने के लिए । इसे हम प्रकारांतर से यों कह सकते हैं कि मंदिर की परंपरा पिता की प्रकृति की है और गंगा की परंपरा माता की शैली की ।

पिता अपने बालक को अपने साथ घुमाने ले जाना चाहता है । पिता बालक को गंदा देखकर कहता है अरे, तुम जाओ अपनी मॉं के पास । पिता के इस कथन को मॉं भी सुनती है । वह उस गंदे बालक को बुलाती है, गोद में बिठाती है, बिना इसकी परवाह किये कि उसके स्‍वत: के कपडे गंदे हो जायेंगें । मॉं उसे साफ सुथरा कर अच्‍छे कपडे पहनाकर बाप के पास भेज देती है । अब यदि मॉं भी बच्‍चे से कहे कि तुम गंदे हो, मेरे पास मत आओ, तब तो हो गया काम । इसीलिये हमें किसी पात्र के संबंध में गंगा की धारा का ध्‍यान रखना होगा जो गन्‍दगी तो स्‍वत: स्‍वीकार कर लेता है और अन्‍य व्‍यक्तियों को पावन बना देता है ।


शोध ग्रंथ ‘माता कैकेयी : एक रूपांकन’ लेखक जमुना प्रसाद कसार के अंश

3 (टिप्‍पणी) यहां क्लिक कर मुझे सुझाव देवें:

रंजू said...

अच्छा लगा इसको पढ़ना शुक्रिया

mahendra mishra said...

कविता को गंगा के समान सर्वहितकारी और सर्वसुखंत होना चाहिए बढ़िया विचार प्रस्तुत करने के लिए आभार

Udan Tashtari said...

बहुत सुखकर वाचन रहा-प्रस्तुति का बहुत आभार..यह आपका कार्य भी सर्वहितकारी ही कहलायेगा. और लाईये ऐसी प्रस्तुतियाँ.

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