ब्लॉग छत्तीसगढ़

08 July, 2013

किसानों की जमीन छीनकर उसी से व्यवसाय कर रही सरकार

पिछले दिनों नया रायपुर विकास प्राधिकरण के संचालक मंडल की हुई बैठक के बाद समाचार पत्रों में तथाकथित समाचार प्रकाशित हुए कि सरकार अब नया रायपुर में किसानों से ली जाने वाली भूमि का मुआवजा 75 लाख रूपया हैक्टेययर देगी। इस समाचार से किसानों के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोगों को कुछ सुकून मिला। 

आत्महत्या करने के लिए विवश किसानों के इस देश में जमीन का तीन गुना मुआवजे का बढ़ना, सचमुच में सुखद है। हमने मामले की पड़ताल करनी चाही तो पता चला कि नया रायपुर विकास प्राधिकरण के पक्ष में पिछले मार्च में कई कई पन्नों के भू अर्जन अधिसूचना विज्ञापन समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए। यह विज्ञापन नया रायपुर विकास प्राधिकरण के योजना क्षेत्र में भू अर्जन के अंतिम किश्त के रूप में प्रकाशित हुई थी। प्राधिकरण नें पहले तो आपसी समझौता से लगभग नब्बे प्रतिशत भूमि हथियाया, फिर कई चरणों में सम्पन्न कानूनी भू अर्जन के बाद लगभग दो तीन प्रतिशत बचत भूमि को अर्जित करने के लिए अधिसूचना प्रकाशित करवाई । इस प्रकार माने तो विकास योजना की लगभग पूरी भूमि कम दरों पर पूर्व में ही अधिग्रहित कर ली गई थी। कुछ बची भूमि जिसकी मात्रा बहुत कम है, उसके लिए दरियादिली दिखाते हुए तीन गुना दर तय कर देना किसानों के हितैसी होने का दिखावा मात्र है।

इन समाचारों से निकल कर आ रहे तथ्यों में प्राधिकरण के व्यासवसायिक सोच का आंकलन कीजिए, प्राधिकरण नें किसानों की भूमि लगभग 25 रू. फिट या इससे भी कम में खरीदी है और बेचनें का निर्णय लिया है लगभग 2500 रू. फिट में। यानी किसानों की भूमि से 1000 गुना कमाई की जा रही है, कौड़ी के मोल जमीन खरीदकर हीरे के दाम पर बेंची जा रही है। अपनी ही भूमि से किसान विस्थापित हो रहे हैं और प्राधिकरण उनकी जमीनों का व्यवसाय कर रही है। किसान जब वाजिब मुआवजे की बातें करते हैं तो उनकी बातें अनसुनी कर दी जाती है। आन्दोंलन की राह यदि अपनायें तो पुलिस और प्रशासन किसानों के वाजिब मांग को दबाने के लिए हर संभव प्रयास करती है। अब यदि इस व्यावसायिक सोच की बात प्राधिकरण से की जाए तो वे कहेंगें कि हमने अधोसंरचना विकास पर खर्च किए है किन्तु क्या। इसके लिए इस कदर कमाई किया जाना उचित है, यदि कमाई हो रही है तो उसे किसानों को लाभाशं के तौर पर बांटा जाना चाहिए।

न्यायालयीन प्रक्रिया से गुजरते हुए हमने देखा है कि, पिछले मार्च में प्राधिकरण के अधिकारी किसानों के भूमियों के भू अर्जन के लिए किस कदर उतावले थे। सूचना के अधिकार के तहत इन पंक्तियों के लेखक को प्राधिकरण की एक अभिप्रमाणित नोटशीट प्राप्त हुई जिसमें लिखी गई टिप्पिणी पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, नया रायपुर विकास प्राधिकरण कितनी जल्दी में किसानों की भूमि का अर्जन करना चाहती है यह उक्त नोटशीट से ज्ञात होता है। उक्ती नोटशीट में एक अधिकारी नें मार्च के अंतिम सप्ताह में ही अधिग्रहण प्रकाशन की प्रक्रिया 'अभियान चलाकर' पूर्ण करनें का आदेश दिया है। बाकायदा अगले छुट्टियों के दिनांकों का उल्लेख करते हुए अधिकारी नें लिखा है कि अधिसूचना का प्रकाशन 31 मार्च तक हो जाना चाहिए। नोटशीट में त्वररित कार्यवाही करते हुए कार्यालयीन व न्यायालयीन कार्यवाही को चुटकियों में निबटाने व शीध्र कार्यवाही के आदेश दिये गए हैं। यहां मैं ध्याब दिलाना चाहूंगा कि किसानों के अनुरोधों व आवेदनों पर प्राधिकरण सालों ध्यान नहीं देती है वहीं भूमि छीनने के लिए किस कदर जल्दबाजी मचती है । प्राधिकरण के द्वारा भूमि स्वामियों व जनता के हितों से ज्यादा प्राधिकरण के हितों के संरक्षण की बात उक्त आर्डर शीट में की गई है एवं स्पष्ट लिखा गया है कि मार्च के बाद अधिसूचना प्रकाशित होने पर नये दर पर भुगतान करना होगा जिससे प्राधिकरण को काफी नुकसान होगा। भूमि स्वामियों के संवैधानिक हक का कतई परवाह किए बगैर प्राधिकरण का अभिप्राय व आशय देखिए प्राधिकरण को नुकसान ना हो भले जनता, भू स्वामी, किसान का नुकसान हो जाए। सर्वोच्च न्यायालय अपने न्याय निर्णयों में भूमि स्वा्मियों के भूमि से हक समाप्त होने पर उन्हें अधिकाधिक मुआवजा एवं राहत देने की बात कर रही है और प्राधिकरण के अधिकारी जल्दी से जल्दी कार्यवाही चाहते है ताकि भूमि स्वामियों को अधिकाधिक नुकसान पहुचें। अलोकतांत्रिक व दमनकारी सोच व असंवैधानिक आशय का यह एक नमूना मात्र है, ऐसे कई नमूनें होगें जो प्राधिकरण के किसान विरोधी छवि को स्पष्ट कर देगें।

विकास के नाम पर जमीनों की लूट एवं नित नये विवादों को ध्यान में रखते हुए केन्द्र नें सालों पहले बने भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की अनुसंशा की है। इस नये कानून में पुर्नवास एवं मुआवजे की अच्छी व्यवस्था की गई है, भूमि का दो से चार गुना मुआवजा देने का प्रावधान इस नये कानून में बनाया गया है। बाजार मूल्य के निर्धारण के लिए भी राज्य के भर्राशाही को इसमें नियंत्रित किया गया है एवं वास्तविक बाजार मूल्य के आंकलन के प्रावधान दिए गए हैं। संवैधानिक समिति के सुझावों पर आस करें तो इसमें मुआवजे का कट आफ डेट जो तय किया जा रहा है उसमें वे सभी अर्जन के प्रकरण आयेंगें जिनमें मुआवजा तय नहीं किया गया है। संसद में नया भूमि अधिग्रहण कानून पेंडुलम की तरह पास होने की आस में लटका हुआ है। इधर सरकारें जल्दी से जल्दी अर्जन कर लेना चाह रही हैं कि उनके खजाने पर अर्जित भूमि का अतिरिक्त भार ना पडे, किसानों के हित की परवाह किसे है।

इसी तरह के और भी कई मुद्दे हैं जिसके लिए अपनी तरफ से किसान संघर्ष समिति के सदस्य लगातार संघर्ष कर रहे हैं। किन्तु देखा यह जा रहा है कि प्राधिकरण के अंतिम ब्रम्हास्त्र अधिग्रहण कानून के चक्रव्यूह के आगे सभी सघर्ष भोथरे हो जाते हैं। धरना प्रदर्शन, विज्ञप्ति ज्ञापन से कुछ नहीं हो पाता इसके लिए विधिवत दस्तावेजी कार्यवाही की आवश्यअकता होती है जो किसानों के द्वारा अज्ञानता या अकुशलता के कारण प्रभावी ढ़ग से नहीं किया जाता। राजधानी प्रभावित गांवों के किसान अपने पुरखों की जमीन को खोकर, अपना भविष्य होम कर प्राधिकरण के फेंके रोटी के चंद तुकडों में नई दुनिया बसाने के ताने बाने में उलझे हैं और नया रायपुर विकास प्राधिकरण इन्हीं किसानों की भूमि को कम दर में क्रय कर अधिक दर में बेंचने का व्यवसाय करते हुए लाभ कमाने में लगी है।

संजीव तिवारी

7 comments:

  1. यदि सरकार कमाई कर रही है तो उसका लाभांश किसानों को भी दिया जाना चाहिए.

    पूर्णत: न्यायोचित,अनुकरणीय,तत्काल सामूहिक विरोध होना ही चाहिए.मेरा सम्पूर्ण समर्थन मानें

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  2. किसान हमेशा घाटे में रहता है,,,सरकार की स्पष्ट नीति नहीं है

    RECENT POST: गुजारिश,

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  3. छीनकर ? छीनकर? सच में ऐसी पागलों वाली बात कृपया ना करें, किसानो को भरपूर पैसे दिए जाते यह बस उनकी पौराणिक मानसिकता है जो बेवकूफों वाली है । ऐसे लोग देश की प्रगति में बाधा दाल रहे है और मुझे लगता है की ऐसों को कुचल कर आगे बढ़ना ही बेहतर है

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  4. श्री राजेश सिंह के कमेन्ट को मेरा भी माना जाये . त्रासद स्थिति

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  5. राजीनीति...सरकार और सभी नेता इतने क्रूर क्यों होते हैं ????

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  6. अंग्रेजों की संवेदनहीनता का प्रभाव उतर रहा है, पर बहुत धीरे धीरे।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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