ब्लॉग छत्तीसगढ़

23 March, 2010

छत्‍त‍ीसगढी भाषा में शौर्य गान का नाम है जस गीत

शहरों में नवरात्रि की धूम चारों ओर है, मंदिरों और माता के दरबार में आरती के बाद जस गीत व सेवागीत गाए जा रहे हैं। शीतला मंदिर, चंडी मंदिर, महामाया, दंतेश्वरी, दुर्गा मंदिर, सहित ग्रामीण क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों में दिन रात माता सेवा में भक्त लीन हैं। पुरुषों एवं महिलाओं सहित बच्चों की सेवा मंडली दूर-दूर से आकर अपनी प्रस्तुति दे रही है। हर गली-मोहल्ले में जसगीत व सेवागीत गाये जा रहे हैं, लाउड स्पीकरों में भी यही गीत बज रहे हैं। वहीं गांवों में शीतला मंदिर, महामाय व कुछ घरों में ज्योति जंवारा स्थापित कर माता सेवा का अनुष्ठान किया जा रहा है। गांव की सेवा मंडली रोजाना शाम को इन स्थानों में पहुंचकर सेवागीत प्रस्तुत कर रही हैं। मैं भी इन सेवा एवं जस गीत मंडली का बरसों बरस सदस्‍य रहा हूं और रात-रात भर जस गीत गाते रहा हूँ .
पिछले दिनों छत्‍तीसगढ के नवरात्री मे गाये जाने वाले माता का एक जसगीत ललित शर्मा जी नें प्रस्‍तुत किया उसके बाद उन्‍होंनें जस गीत के आडियो भी प्रस्‍तुत किए. आजकल सीडी दुकानों में सहजता से जस गीत उपलब्‍ध हैं किन्‍तु इन बाजारू सीडीयो में हमारा पारंपरिक जसगीत कहीं खो गया है. मैनें ललित भाई को इस प्रयास के लिए यद्यपि बधाई दिया कि हमारी भाषा एवं संस्‍कृति का कुछ अंश उन्‍होंनें लोगों के बीच लाने का प्रयास किया किन्‍तु आजकल जो गीत सीडी में बाजार में प्रस्‍तुत हो रहे हैं उन्‍हें मैं जस गीत के नाम पर प्रपंच मानता हूं, ऐसे गीत पारंपरिक जस गीत है ही नहीं बल्कि पारंपरिक गीत व धुन एवं लय के विपरीत हैं. पारंपरिक गीत के सीडी मार्केट में उपलब्‍ध हैं कि नहीं हैं मै नहीं जानता, मैं तो मांदर और झांझ-मजीरे के संगीत के साथ गाये जाने वाले छत्‍त‍ीसगढी भाषा के शौर्य गान को जस गीत मानता हूँ जिसके पारंपरिक लय व ताल के नियम हैं. गांवों में रात-रात भर गाये जाने वाले जस गीत टीम में इन नियमों को तोडने पर एक नरियर का डांड भी देना पडता है यानी सजा की व्‍यवस्‍था है. पर शहरी माहौल में यह सब खो गया है.
मैं ललित शर्मा जी से क्षमा चाहता हँ, उनका उत्साह इसी प्रकार बना रहे. और पाठकों को अपनी वास्‍तविक परंपराओं से अवगत कराना चाहता हँ. आज भी यदि आप खोजें तो पारंपरिक गायन वाले मिल जायेंगें, जस गीत के संकलन पर इस प्रदेश में बहुज काम हुआ है, जसगीत के कई संकलन प्रकाशित हुए हैं किन्‍तु सीडी बेंचने वाले लोग इन पारंपरिक गानों के स्‍थान पर नये गीत प्रस्‍तुत किए हैं. इन नये गीतों का भी हम स्‍वागत करते हैं किन्‍तु हमें अपनी परंपराओं पर गर्व है. हमने छत्‍तीसगढ के जस गीत पर एक पोस्‍ट लिखा है जो स्‍थानीय विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुआ है जिसका अवलोकन करने से छत्‍तीसगढ़ के जस गीत को जाना पहचाना जा सकता है. जस गीत संबंधी लेख की कडी है -

http://aarambha.blogspot.com/2007/10/chhattisgarhi-folk-jasgeet.html

बोलो हिंगलाज मईया की जय !

संजीव तिवारी

ललित भाई नें आज जसगीत अपने ब्‍लाग 'शिल्‍पकार के मुख से' में लगयाया है. 

6 comments:

  1. आप बढ़िया काम कर रहे हैं ! अच्छी जानकारी के लिए शुभकामनायें !

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  2. सही कहा आपने..पैरोडी बस रह गई है,.

    -

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  3. baat to sahi kaahat has ga .. lekin hamar asan bahar rahiya man la nava purana jo bhi mil jaay sune me aanand aathe ..

    me ha lalit ji ke blog me ye jasgeet ke audio ke link khoj darenv fer milis nahi .. lalit ji ha agar jasgeet ke link dusar jaga de hohi te mail karake jarur bhejabe ..

    abbadh din hoge eko than nava Jas Geet nai sune haabon ..

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  4. संजीव भाई,
    शीतला मा जाके रिकार्ड करे के टैम नई मिलत हे।
    तेखरे सेती इही गीत मन ला देवत हंव,अउ हो सके तो देखहुं आज टैम मिल जाए त रिकार्ड करहुँ।

    जोहार ले।

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  5. आपको और ललित को साधुवाद .
    सही कहा आपने जितना हम अपनी परंपरा का मखौल उड़ाते हैं शायद ही कोई और करता होगा .

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  6. सही कहा आपने..,अच्छी जानकारी के लिए शुभकामनायें !

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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