ब्लॉग छत्तीसगढ़

01 November, 2009

छत्‍तीसगढ के प्रसिद्व राउत नाच के कुछ दोहे भावार्थ सहित


आवत देवारी ललहू हिया, जावत देवारी बड़ दूर।
जा जा देवारी अपन घर, फागुन  उडावे  धूर ।।

भावार्थ - दीवाली का त्‍यौहार जब आता है तब हृदय हर्षित हो जाता है, और जब दिवाली आकर चली जाती है तो उसका इंतजार बहुत कठिन होता है, साल भर उसका इंतजार करना पडता है। हे दीपावली, उत्‍सवधर्मी हमने आनंद मना लिया अब तुम जावो और फागुन को अपनी धूल उडाने दो यानी हमें होली की तैयारी में मगन होने दो।

भांठा देखेंव दुमदुमिया, उल्‍हरे देखेंव गाय हो।
ओढे देखेंव कारी कमरिया, ओही नंनद के भाय हो।।

(भांठा - उंची सपाट भूमि, दुमदुमिया - बिना कीचड का सूखा, भाय - भाई)
भावार्थ - अपने पति का परिचय देनें की काव्‍यात्‍मक प्रस्‍तुति तुलसीदास जी नें सीता के मुख से रामचरित मानस में जैसे की है वैसे ही छत्‍तीसगढी महिला अपने पति का परिचय दे रही है। गांव के बाहर भांठा में गायों की भीड है वहां काले कम्‍बल ओढा हुआ जो छबीला पुरूष है वही मेरी नंनद के भईया अर्थात मेरे पति हैं।

धन गोदानी भुईया पावा, पावा हमर असीस।
नाती पूत लै घर भर जावे, जीवा लाख बरीस।।

भावार्थ - आर्शिवचन देते हुए कहता है कि आपका घर धन,गायों  और भूमि सम्‍पत्ति से परिपूर्ण रहे, आप हमारा आशीष प्राप्‍त करें। आपका घर नाती-पोते से भर जाए और आप लाखो वर्ष जींए। यह अंत: करण से शुभकामना देना है।
छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य का आनलाईन कोश - गुरतुर गोठ : छत्तीसगढ़ी (Chhattisgarhi) छत्तीसगढ़ी भाषा की पहली नियमित, सामयिक, साहित्यिक व सांस्कृतिक वेब पत्रिका

3 comments:

  1. वा भइया मजा आ गे. एखर वीडियो आडियो होही त कोनो कहीं चढ़ा देव

    ReplyDelete
  2. बने लगीस औ होही त बताबे ..॥

    ReplyDelete
  3. अच्छा लगा राउत नाच से परिचय पाने पर!
    धन्यवाद।

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

Popular Posts

01 November, 2009

छत्‍तीसगढ के प्रसिद्व राउत नाच के कुछ दोहे भावार्थ सहित


आवत देवारी ललहू हिया, जावत देवारी बड़ दूर।
जा जा देवारी अपन घर, फागुन  उडावे  धूर ।।

भावार्थ - दीवाली का त्‍यौहार जब आता है तब हृदय हर्षित हो जाता है, और जब दिवाली आकर चली जाती है तो उसका इंतजार बहुत कठिन होता है, साल भर उसका इंतजार करना पडता है। हे दीपावली, उत्‍सवधर्मी हमने आनंद मना लिया अब तुम जावो और फागुन को अपनी धूल उडाने दो यानी हमें होली की तैयारी में मगन होने दो।

भांठा देखेंव दुमदुमिया, उल्‍हरे देखेंव गाय हो।
ओढे देखेंव कारी कमरिया, ओही नंनद के भाय हो।।

(भांठा - उंची सपाट भूमि, दुमदुमिया - बिना कीचड का सूखा, भाय - भाई)
भावार्थ - अपने पति का परिचय देनें की काव्‍यात्‍मक प्रस्‍तुति तुलसीदास जी नें सीता के मुख से रामचरित मानस में जैसे की है वैसे ही छत्‍तीसगढी महिला अपने पति का परिचय दे रही है। गांव के बाहर भांठा में गायों की भीड है वहां काले कम्‍बल ओढा हुआ जो छबीला पुरूष है वही मेरी नंनद के भईया अर्थात मेरे पति हैं।

धन गोदानी भुईया पावा, पावा हमर असीस।
नाती पूत लै घर भर जावे, जीवा लाख बरीस।।

भावार्थ - आर्शिवचन देते हुए कहता है कि आपका घर धन,गायों  और भूमि सम्‍पत्ति से परिपूर्ण रहे, आप हमारा आशीष प्राप्‍त करें। आपका घर नाती-पोते से भर जाए और आप लाखो वर्ष जींए। यह अंत: करण से शुभकामना देना है।
छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य का आनलाईन कोश - गुरतुर गोठ : छत्तीसगढ़ी (Chhattisgarhi) छत्तीसगढ़ी भाषा की पहली नियमित, सामयिक, साहित्यिक व सांस्कृतिक वेब पत्रिका
Disqus Comments