ब्लॉग छत्तीसगढ़

01 January, 2009

नहीं बिखरा, अधिक निखरा, बस सघन हूं मैं .....

शब्‍द तो सभी बोलते हैं
छापते हैं
मूल्‍यवान होते हैं
शब्‍दकोश में तो
शब्‍दों की सर्वाधिक
भीड ही होती है
लेकिन कवि के द्वारा
प्रयुक्‍त कविता के शब्‍द
कुछ भिन्‍न ही हुआ करते हैं
क्‍योंकि समय आने पर
कवि तो मर जाता है
परन्‍तु कविता के शब्‍द
अनन्‍त काल तक
मुखर बने रहते हैं ।
नारायण लाल परमार
01.01.1927 - 27.04.2003
कोई अफसोस नहीं बीत गई रात का 
मुझको विश्‍वास बहुत इस नये प्रभात का 
गत पांच दशकों में हिन्‍दी गीत की परम्‍पराओं के साथ समकालीन भावबोध का कुशल संयोजन करके अपार सफलता एवं प्रतिष्‍ठा अर्जित करने वाले प्रदेश के वरिष्‍ठ गीतकार आदरणीय स्‍व.नारायण लाल परमार जी को नमन, वंदन ... श्रद्धासुमन  ..
संजीव तिवारी

4 comments:

  1. सृजन के प्रारम्भ में शब्द था। अंत में भी शब्द बचेगा। कवि जीवित रहेगा कविता में।

    बहुत सुन्दर।

    ReplyDelete
  2. जी नमस्कार,
    सबसे पहले तो नए साल पे आपको ढेरो बधाई और मंगलकामनाएं ,और साथ में इतनी खुबसूरत और साफ-सुथरी kvita के लिए आपको ढेरो आभार...


    अर्श

    ReplyDelete
  3. भावपूर्ण हिन्दी गीतों की परम्परा को शब्दों में जीवंत रखने वाले साहित्यकार को शत-शत वंदन .

    संजीव जी आपको शुभ कामनाएं .............

    ReplyDelete
  4. वाकई कवि रहे या न रहे , उसकी रचनाएँ अमर हो जाती हैं ,,
    श्रद्धेय परमार जी को मेरा भी नमन, विनम्र श्रद्धांजली
    आपका
    विजय

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

Popular Posts