27 June, 2011

फेसबुकिया कविता : उनकी हर एक कविता मेरी है

कवितायें भी लिखते हो मित्र
मुझे हौले से उसने पूछा
कवितायें ही लिखता हूँ मित्र
मैने सहजता से कहा.

भाव प्रवाह को
गद्य की शक्‍ल में ना लिखकर
एक के नीचे एक लिखते हुए
इतनी लिखी है कि
दस-बीस संग्रह आ जाए.

डायरी के पन्‍नों में
कुढ़ते शब्‍दों नें
हजारों बार मुझे आतुर होकर
फड़फड़ाते हुए कहा है
अब तो पक्‍के रंगों में
सतरंगे कलेवर में
मुझे ले आवो बाहर
पर मैं हूँ कि सुनता नहीं
शब्‍दों की .

शायद इसलिए कि
बरसों पहले मैंनें
विनोद कुमार शुक्‍ल से
एक अदृश्‍य अनुबंध कर लिया था
कि आप वही लिखोगे
जो भाव मेरे मानस में होंगें
और उससे भी पहले
मुक्तिबोध को भी मैंने
मना लिया था
मेरी कविताओं को कलमबद्ध करने.

इन दोनों नें मेरी कविताओं को
नई उंचाईयां दी
मेरी डायरी में दफ्न शब्‍दों को
उन तक पहुचाया
जिनके लिये वो लिखी गई थी
उनकी हर एक कविता मेरी है
क्‍या आप भी मानते हैं कि
उनकी सारी रचनांए आपकी है.

संजीव

8 comments:

  1. बहुत सही,
    मन मेरा और शब्द तुम्हारे,
    मंजिल अब भी दूर है प्यारे।

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  2. उत्तम है जी! अच्छा किया इन लोगों से अनुबंध कर लिया। कम से कम आपका लिखा सामने तो आ गया। :)

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  3. अप कहते हैं तो मानना ही पडेगा। बेहतरीन।

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  4. ऐसा महसूस हो, वही और तभी लेखन सार्थक.

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  5. प्रिय अनुज ,
    सबसे पहले छाया चित्र देखा ! अब सवाल ये कि आपकी बात सुनकर / पढकर ये कौन साहब हैं जिन्होंने सिर पीट लिया :)

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  6. परकाया गमन के माध्यम से ऐसा संभव है.

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  7. बहुत बढि़या संजीव बढ़े रहो ... ।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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