गाँधीवादी विचारधारा के छत्तीसगढ़ी साहित्यकार -कोदूराम "दलित"

छत्तीसगढ़ के जन कवि स्व.कोदूराम"दलित" के १०१ वें जन्म दिवस पर विशेष स्मृति

(५ मार्च १९१० को जन्मे कवि कोदूराम "दलित" की स्मृति में हरि ठाकुर द्वारा पूर्व में लिखा गया लेख)
छत्तीसगढ़ की उर्वरा माटी ने सैकड़ो कवियों,कलाकारों और महापुरुषों को जन्म दिया है. हमारा दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें या तो भुला दिया अथवा उनके विषय में कुछ जानने की हमारी उत्सुकता ही मर गई. जिस क्षेत्र के लोग अपने इतिहास, संस्कृति और साहित्य के निर्माताओं और सेवकों को भुला देते हैं, वह क्षेत्र हमेशा पिछड़ा ही रहता है. उसके पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं रहता.छत्तीसगढ़ भी इसी दुर्भाग्य का शिकार है.
छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को विकसित तथा परिष्कृत करने का कार्य द्विवेदी युग से आरंभ हुआ. सन १९०४ में स्व.लोचन प्रसाद पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ी में नाटक और कवितायेँ लिखी जो हिंदी मास्टर में प्रकाशित हुईं. उनके पश्चात् पंडित सुन्दर लाल शर्मा ने १९१० में "छत्तीसगढ़-दान लीला" लिखकर छत्तीसगढ़ भाषा को साहित्यिक संस्कार प्रदान किया. "छत्तीसगढ़ी दान लीला" छत्तीसगढ़ी का प्रथम प्रबंध काव्य है. उत्कृष्ट काव्य-तत्व के कारण यह ग्रन्थ आज भी अद्वितीय है.
पंडित सुन्दर लाल शर्मा के साहित्य के पश्चात् छत्तीसगढ़ी को अपनी सुगढ़ लेखनी से समृद्ध करनेवाले दो कवि प्रमुख हैं- पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी 'विप्र' तथा कोदूराम 'दलित'. विप्र जी को भाग्यवश प्रचार और प्रसार दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हुए. दुर्भाग्यवश उन्हीं के समकालीन और सशक्त लेखनी के धनी कोदूराम जी को न तो प्रतिभा के अनुकूल ख्याति मिली और न ही प्रकाशन की सुविधा.
कोदूराम जी का जन्म ग्राम टिकरी, जिला दुर्ग में ५ मार्च १९१० में एक निर्धन परिवार में हुआ. विद्याध्ययन के प्रति उनमें बाल्यकाल से ही गहरी रूचि थी. गरीबी के बावजूद उन्होंन विशारद तक की शिक्षा प्राप्त की और शिक्षा समाप्त करके प्राथमिक शाला, दुर्ग में शिक्षक हो गए. योग्यता और निष्ठा के कारण उन्हें शीघ्र ही प्रधान पाठक के पद पर उन्नत कर दिया गया. वे जीवन के लिए शिक्षकीय कार्य करते थे, किन्तु मूलतः वे साहित्यिक साधना में लगे रहते थे. साहित्यिक साधना में वे इतने तल्लीन हो जाते थे की खाना, पीना और सोना तक भूल जाते थे. इसके बावजूद वे वर्षों दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति, प्राथमिक शाला शिक्षक संघ, हरिजन सेवक तथा सहकारी साख समिति क मंत्री पद पर अत्यंत योग्यता के साथ कर्तव्यरत रहे.
दलित जी विचारधारा के पक्के गाँधीवादी तथा राष्ट्र भक्त थे. राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए वे सदैव चिंतित रहते थे. हिंदी और हिंदी की सेवा को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था. वे आदतन खादी धारण करते थे और गाँधी टोपी लगाते थे. उनका रहन-सहन अत्यंत सदा और सरल था. सादगी में उनका व्यक्तित्व और भी निखर उठता था.  दलित जी अत्यंत और सरल ह्रदय के व्यक्ति थे. पुरानी पीढ़ी के होकर भी नयी पीढ़ी के साथ सहज ही घुल-मिल जाते थे.  मुझ जैसे एकदम नए साहित्यकारों के लिए उनके ह्रदय में अपर स्नेह था.
दलित जी मूलतः हास्य-व्यंग्य के कवि  थे किन्तु उनके व्यक्तित्व में बड़ी गंभीरता और गरिमा थी. कवि-सम्मेलनों में वे मंच लूट लेते थे. उस समय छत्तीसगढ़ी में क्या, हिंदी में भी शिष्ट हास्य -व्यंग्य लिखने वाले उँगलियों में गिने जा सकते थे. वे सीधी-सादे ढंग से काव्य पाठ करते थे फिर भी श्रोता हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते थे और दलित जी गंभीर बने बैठे रहते थे. उनकी यह अदा भी देखने लायक ही रहती थी. देखने में वे ठेठ देहाती लगते और काव्य पाठ भी ठेठ देहाती लहजे में करते थे.
छत्तीसगढ़ी भाषा और उच्चारण पर उनका अद्भुत अधिकार था. हिंदी के छंदों पर भी उनका अच्छा अधिकार था. वे छत्तीसगढ़ी कवितायेँ हिंदी के छंद में लिखते थे जो सरल कार्य नहीं है. दलित जी मूलतः छत्तीसगढ़ी के कवि थे.
वह तो आजादी के घोर संघर्ष का दिन था. अतः विचारों को गरीब जनता तक पहुँचाने के लिए छत्तीसगढ़ी से अच्छा माध्यम और क्या हो सकता था. दलित जी ने गद्य और पद्य दोनों में सामान गति और समान अधिकार से लिखा.
उन्होंने कुल १३ पुस्तकें लिखी हैं. (१) सियानी गोठ (२) हमर देश (३) कनवा समधी (४) दू-मितान (५) प्रकृति वर्णन (६)बाल-कविता - ये सभी पद्य में हैं. गद्य में उन्होंने जो पुस्तकें लिखी हैं वे हैं (७) अलहन (८) कथा-कहानी (९) प्रहसन (१०) छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ (११) बाल-निबंध (१२) छत्तीसगढ़ी शब्द-भंडार. उनकी तेरहवीं पुस्तक कृष्ण-जन्म हिंदी पद्य में है.
इतनी पुस्तकें लिख कर भी उनकी एक ही पुस्तक  "सियानी-गोठ" प्रकाशित हो सकी. यह कितने दुर्भाग्य की बात है, दलित जी की अन्य पुस्तकें आज भी अप्रकाशित पड़ी हैं और हम उनके महत्वपूर्ण साहित्य से वंचित हैं. "सियानी-गोठ" में दलित जी की ७६ हास्य-व्यंग्य की कुण्डलियाँ संकलित हैं. हास्य-व्यंग्य के साथ दलित जी ने गंभीर रचनाएँ भी की हैं जो गिरधर कविराय की टक्कर की हैं.
दलित जी ने सन १९२६ से लिखना आरंभ किया. उन्होंने लगभग 800 कवितायेँ लिखीं. जिनमे कुछ कवितायेँ तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और कुछ कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी से हुआ. आज छत्तीसगढ़ी में लिखनेवाले निष्ठावान साहित्यकारों की पूरी पीढ़ी सामने आ चुकी है, किन्तु इस वट-वृक्ष को अपने लहू-पसीने से सींचनेवाले, खाद बनकर उनकी जड़ों में समा जानेवाले साहित्यकारों को हम न भूलें.
-हरि ठाकुर


जनकवि कोदूराम 'दलित' के पुत्र श्री अरूण कुमार निगम जी के द्वारा दलित जी की रचनाओं के लिए संचालित ब्‍लॉग  - www.gharhare.blogspot.com 


गुरतुर गोठ : छत्‍तीसगढ़ी में आज दलित जी के दोहे 

जीमेल में ईमेल कैसे भेजें


ई-मेल का उपयोग करना वर्तमान समय में कोई बड़ी बात नहीं है किन्‍तु जो इसके लिये नये हैं उनके लिए जीमेल खाते से ईमेल भेजने की क्रमिक जानकारी हम यहां अपने पाठकों के लिए प्रस्‍तुत कर रहे हैं। इंटरनेट उपयोग करने वालों के लिए यद्धपि इस पोस्‍ट की कोई उपयोगिता नहीं है किन्‍तु मेरे कुछ मित्रों का अनुरोध था इसलिये इसे प्रस्‍तुत किया जा रहा है -
आपके Gmail खाते से ईमेल संदेश कैसे भेजें
1. एक्‍सप्‍लोरर, क्रोम, सफारी या फायर फाक्‍स ब्राउज़र के एड़ेस बार में www.gmail.com टाइप करें और एंटर की प्रेस करें या माउस क्लिक करें।
2. अपना पासवर्ड आईडी डालें।
3. अपने मित्र को ई-मेल भेजने के लिए नीचे दिए गए चित्रानुसार 'कम्‍पोज' बटन को क्लिक करना होगा।

4. यहां सर्वप्रथम जिसे ई-मेल भेजना है उसका पूरा पता लिखना होगा, सब्‍जेक्‍ट खाने में संदेश का विषय लिखना होगा व उसके नीचे दिए गए संदेश बक्‍से में संदेश लिखना होगा, या पहले से किसी फाईल में लिखे संदेश को यहां पेस्‍ट करना होगा-

5. आप अपने संदेश के शब्‍दों को को माउस से सलेक्‍ट कर, रंगबिरंगा एवं बोर्ड, इटालिक आदि रूपों में टैक्‍स्‍ट फारमेटिंग बार का उपयोग कर सजा सकते हैं।  जिसमें बोल्ड और / या इटैलिक. फ़ॉन्ट का आकार और फ़ॉन्ट प्रकार . चयनित पाठ में रंग . पाठ हाइलाइटिंग . वेब पता (URL) लिंक . इमोशन . बुलेटेड आदि -

यहां सामान्‍य टेक्‍स्‍ट में संदेश लिख सकते हैं या  उपर दिये गये टैक्‍स्‍ट फारमेटिंग बार के सहारे संदेश में वेब लिंक, बोलते चित्र और अंग्रेजी के विभिन्न फोंटों का प्रयोग करते हुए संदेश लिख सकते हैं। यहां एक बात उल्‍लेखनीय है कि यदि आप चाहें तो अपने संदेश को बिना भेजे सेव भी कर सकते हैं, जिसे आप बाद में कुछ अतिरिक्‍त जोड़कर या कम करके पुन: भेज सकते हैं। देखें उपर 'सेव नाव' का विकल्‍प है।
जी मेल में मेल पढ़ना - हमें प्राप्‍त सभी मेल सामान्‍यत: हमारे इनबाक्‍स में होते हैं जिसमें से बिना पढ़े या नये आये मेल की संख्‍या लिखी होती है। हमें प्राप्‍त मेल को पढ़ने के लिए इनबाक्‍स को क्लिक करें, यहां मेल भेजने वाले का नाम व उसका सब्‍जेक्‍ट लाईन नजर आता है, यहां नये मेल या एसे मेल जिन्‍हें हम पढ़ नहीं पाये हैं वे बोल्‍ड अक्षरों में नजर आते हैं। 
हमें जिस मेल को पढ़ना है उसे क्लिक करने पर वह मेल खुलता है, उसे पढ़ने के बाद यदि आपको लगता है कि उसका प्रतिउत्‍तर देना है तो मेलबाक्‍स के नीचे रिप्‍लाई मेलबाक्‍स में संदेश लिखकर प्रतिउत्‍तर दिया जा सकता है। कई मेल सेदेश ऐसे होते हैं जो हमारे साथ ही अनेकों लोगों को एक साथ भेजे गए होते हैं ऐसे मेल संदेशों को रिप्‍लाई के लिए जीमेल में एक और विकल्‍प है जिससे आप उन सभी व्‍यक्तियों को एक साथ रिप्‍लाई कर सकते हैं इसके लिए आपको मेलबाक्‍स के उपर रिप्‍लाई के बाजू के डाउन एरो को क्लिक करना होगा जिसमें रिप्‍लाई टू आल विकल्‍प को चुनने से आपके द्वारा लिखा संदेश(प्रतिउत्‍तर) सभी को प्राप्‍त होगा। यदि आप रिप्‍लाई नहीं देना चाहते तो दूसरे मेल को पढ़ने के लिए पुन: इनबाक्‍स को क्लिक करें।

मेल को डिलीट करना - यदि आप अपने मेल बाक्‍स के संदेशों को हटाना चाहते हैं तो इसके लिए दो प्रकार का विकल्‍प उपयोग में लाया जाता है जिसे नीचे के चित्र में समझाया गया है। 1. यदि आप किसी एक मेल को डिलीट करना चाहते हैं तो जिस मेल को डिलीट करना है उस मेल के सामने छोटे से बाक्‍स में क्लिक करें और मेलबाक्‍स के उपर डिलीट की को क्लिक करें। 2. व 3. यहां बल्‍क आप्‍शन भी उपलब्‍ध है जिसके लिए आप आरकाइव के बाये बिलो एरो बटन को क्लिक करें वहां एक छोटा विंडो खुलेगा वहां आप सभी, पढ़े गए, बिना पढ़े गए जैसे मेलों को एक क्लिक से सलेक्‍ट कर सकते हैं और उन्‍हें 4 एकसाथ डिलीट कर सकते हैं -    

मेल में सिगनेचर डालना - यदि आप अपने द्वारा भेजे गए प्रत्‍येक मेल संदेश के साथ अपना नाम, कोई कोटेशन और अपने वेब या ब्‍लॉग का पता डालना चाहते हैं तो इसके लिए जीमेल के सेटिंग में इसे एक बार डालना होता है उसके बाद जब भी आप किसी को मेल करते हैं यह सिगनेचर आपके मेल संदेश के नीचे में जुड़ जाता है। इसके लिये जीमेल के दाहिने कोने पर सेटिंग को क्लिक करें। इसेनीचे दिये गए चित्र में दर्शाया गया है -

इसे क्लिक करते ही सेटिंग पेज खुलेगा जिसमें नीचे दिये गए चित्रानुसार एक बक्‍सा दिखेगा, इस बक्‍से में अपना नाम, कोई कोटेशन और अपने वेब या ब्‍लॉग का पता डाल सकते हैं जैसे मैंनें डाल रखा है -  

यहां सामान्‍य टेक्‍स्‍ट में संदेश लिख सकते हैं या  उपर दिये गये टैक्‍स्‍ट फारमेटिंग बार के सहारे संदेश में वेब लिंक, बोलते चित्र और अंग्रेजी के विभिन्न फोंटों का प्रयोग करते हुए संदेश लिख सकते हैं। यहां एक बात उल्‍लेखनीय है कि यदि आप चाहें तो अपने संदेश को बिना भेजे सेव भी कर सकते हैं, जिसे आप बाद में कुछ अतिरिक्‍त जोड़कर या कम करके पुन: भेज सकते हैं। देखें उपर सेव नाव का विकल्‍प है।
मेरे ब्‍लॉग तकनीक पोस्‍टों को देखने के लिए यहॉं क्लिक करें. 
संजीव तिवारी  

ब्‍लॉग ट्रिक : ब्‍लाग से नवबार (Navigation Bar) को हटाना

How To Remove Blogger Navigation Bar in Draft Template Designer ब्लागर डाट काम में जो ब्‍लॉगर साथी, ब्‍लॉगर के द्वारा उपलब्‍ध कराए गए टैम्‍पलेट का उपयोग कर रहे हैं, उनमें से कई ब्‍लॉगर संगी ब्‍लॉग के उपर में ब्‍लागर के नवबार को हटाने के संबंध में अक्‍सर प्रश्‍न पूछते रहते हैं।



ब्‍लागर के नवबार को हटाने से ब्‍लॉग का लुक कुछ वेबसाईट जैसा लगता है एवं उपर हेडर के लिए कुछ अतिरिक्‍त स्‍थान मिल जाता है। हम इस पोस्‍ट में आपको न्‍यू ब्‍लॉगर टैम्‍पलेट डिजाइनर के माध्‍यम से ब्‍लागर के नवबार को हटाने का जुगाड़ बता रहे हैं -

ब्‍लॉगर में लागइन होवें - डैशबोर्ड (Dashboard) - डिजाइन (Design) - टेम्‍पलेट डिजाइनर (Template Designer) - उन्‍नत (Advanced) - CSS जोड़ें (Add CSS)

यहां नीचे दिये गये कोड को कापी कर, पेस्‍ट कर देवें -
#navbar-iframe {display: none !important;}
अब उपर दायें कोने पर ब्‍लॉग पर लागू करें (Apply to Blog)  को क्लिक करें, देखें आपके ब्‍लॉग से ब्‍लागर नवबार हट गया है -


मेरे जुगाड़ू ब्‍लॉग तकनीक यहां देखें, कोड कापी नहीं हो रहा है ? .. इस पोस्‍ट को मेरे वर्डप्रेस ब्‍लॉग में देखें।

ब्‍लाग ट्रिक Attribution कापीराईट विजेट को हटाना

How to Remove Attribution Widget / Copyright widget line at the bottom on Blogger      यदि आप अपने ब्‍लॉग में ब्‍लॉगर के  Template Designer से टैम्‍पलेट चुन कर लगाया है तो आपके ब्‍लॉग के एकदम नीचे Attribution कापीराईट विजेट नजर आता है ऐसा -



इसमें आप अपना नाम डाल सकते हैं किन्‍तु इसे आप हटाना चाहेंगें तो यह विजेट हटता नहीं है क्‍योंकि इसे एडिट करने पर यहां रिमूव का विकल्‍प नहीं होता -



तो लीजिए हम इसे हटाने का जुगाड़ क्रमिक रूप से बतलाते हैं - अपने ब्‍लॉगर आईडी के साथ लागईन होवें > डैशबोर्ड > डिज़ाइन > एडिट एचटीएमएल यहॉं एक्‍सपांड विजेट टैम्‍पलेट के सामने दिये गये छोटे बाक्‍स को क्लिक करें -



अब  नीचे जो एचटीएमएल कोड नजर आ रहा है उसमें  "attribution" शब्‍द को फाइन्‍ड विकल्‍प से खोजें. यहां Attribution widget code कुछ ऐसा दिखेगा -



यहां "true" के स्‍थान पर  "false" लिखें, अब कोड बाक्‍स के  नीचे दिये गए टैम्‍पलेट सेव बटन को क्लिक कर सेव करें.  पुन: वापस  > पेज इलेमेंट में जाए,  अब Attribution कापीराईट विजेट को एडिट करके देखें -



अब यहां रिमूव बटन का विकल्‍प आ गया है, रिमूव को क्लिक करें  Attribution कापीराईट विजेट हट जायेगा, यदि आप इसे हटाना नहीं चाहते तो यह विजेट आपके ब्‍लॉग के साईड बार या अन्‍य बार में आपके पसंद की जगह मूव भी हो जायेगा.

संजीव तिवारी

मुझे माफ कर मेरे हम सफर ....


दीपक, तुमने मेरे लोगों के विरूद्ध हो रहे निरंतर अत्याचार के विरूद्ध लिखने के लिए बोला और मैं अपनी समस्याओं और मजबूरियों का पिटारा खोल बैठा .. तो क्या करू मेरे भाई मेरे देश का प्रधान मंत्री जब इस कदर निरीह और लाचार होकर राष्ट्रीय प्रसारणों में बोलता है तो मैं तो एक साधारण सा कलमकार हूं, मुझे तो समस्‍याओं से मुह मोड़ने का अधिकार है। हॉं जिस दिन मैं अपने आपको इन सब प्रमेयों से दूर इंसान समझने लगूंगा उस दिन इस मसले पर अवश्य लिखूंगा क्योंकि कलमकारी में भी अब राजनीति हावी है इसलिए इसके अर्थ पर संवेदना की आस मत कर।

संजीव तिवारी

दीपक तुमने आज केवल छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री को पत्र नहीं लिखा है, इसके मजमूनों में तुमने हमस सब को लपेटा है जो किसी ना किसी रूप में इस सिस्टम के मोहरें हैं ... पर क्या करें मेरे भाई, हमारे सामने हमारी बेटियॉं लुट रही हैं और हमारे मुह पर ‘पैरा बोजाया’ हुआ है। हम मजे से मुह में दबे पैरे को कोल्हू के बैल की तरह ‘पगुराए’ जा रहे हैं क्योंकि हममें सिर उठाकर ‘हुबेलने’ की हिम्मत नहीं है, क्योंकि हमारे पेट में दिनों से भूख ने सरकारी जमीन समझ कर एनक्रोचमेंट कर झोपड़ी बना लिया है। हमें शासन व पुलिस के कोडे और कूल्हेू में चुभने वाले ‘तुतारी’ का भी भय है। हम चाहकर भी ‘मरकनहा बईला’ नहीं बन पा रहे हैं और सिर नवाए जुते जा रहे हैं। तुममे माद्दा है, तुममे जोश और उत्साह है तुमने जनता की संवेदना उकेरी है अपने पत्र में। इसके बावजूद मेरे रगो में अपनो के प्रति हो रहे अन्याय के विरूद्ध खून नहीं खौल रहा है। सिस्टम नें हमारे खूंन को फ्रिज करके रखा है, सिर्फ अपने और अपने परिवार वालों के भरण पोषण और विलासिता की चीजें बटोरने के अतिरिक्त कुछ और सोंचने का समय ही नहीं दिया है।

तुमने मेरे अंतरमन में छुपे बैठे कवि और लेखक को भी ललकारा कि, मैं कुछ लिखूं किन्तु क्या करूं मुझे अभी अपनी नई किताब के प्रकाशन के लिए सरकार से मोटी रकम उगाहना है। यदि मैंनें इस पर कुछ लिखा तो मेरी किताब लफड़े मे पड़ जाएगी। सरकार और पुलिस की वक्र दृष्टि से मुझे अगले वर्ष मिलने वाला राज्य पुरस्कार भी नहीं मिल पायेगा। मेरे प्रोपोगंडा के गोष्ठियों में संस्कृति विभाग किसी भी प्रकार की सहायता नहीं देगा, मंत्रीगण मुख्य अतिथि नहीं बनेगें और मुझे अपने महान लेखक और कवि होने का चोला सम्हालना मुश्किल हो जावेगा। .. इसलिये दीपक मेरे भाई मुझे कुछ लिखने को मत बोल।


तुमने मेरे ब्लॉगिंग को ललकार कर मेरी रही सही अस्तित्व पर भी कुल्हाड़ी चला दिया, भाई मैं ब्लॉगिंग अंग्रेजी ब्लॉगों की तरह किसी सार्वजनिक मुहिम के लिए नहीं करता किन्तु निजी मुहिम के लिए करता हूं, मुझे उन्हीं विषयों पर पोस्टे लिखना है जिनसे भेंड बकरियां मेमियाये और टिप्पणियों की बौछार लग जाए। मेरी ब्लॉगिंग भी एक प्रकार की राजनीति है जिसमें मैं जुगाड़ और चापलूसी तकनीकि का प्रयोग करता हूं। छत्तीसगढ़ की ग्रामीण असहाय बालिका के बलत्कार पर लिखने से मेरी पोस्टों को सत्ता के नुमाइंदे पढ़ना बंद कर देंगें, एसी पोस्टें चिट्ठा चर्चों में स्थान भी नहीं पायेंगी ... और मेरे ब्लॉग का रेंक भी बढ़ नहीं पायेगा और प्रदेश में मिलने वाले सम्मान या पुरस्कार जिसमें आजकल पुलिस प्रमुख ही मुख्य अतिथि होते हैं वे पुरस्कार व सम्मान भी मुझे नहीं मिल पायेंगें। सच मान मेरे भाई मुझे इस ब्लॉगिंग के सहारे नोबल पुरस्कार प्राप्त करने की लालसा है इसलिए तू मुझे उस असहाय निरीह बालिका के संबंध में लिखने को मत बोल।


भाषा पर आक्रमण

छत्‍तीसगढि़या सबले बढि़या

क्षेत्रीय भाषा छत्‍तीसगढ़ी पर हो रहे बेढ़ंगे प्रयोग से मेरा मन बार बार उद्वेलित हो जाता है, लोग दलीलें देते हैं कि क्‍या हुआ कम से कम भाषा का प्रयोग बढ़ रहा है धीरे धीरे लोगों की भाषा सुधर जाएगी किन्‍तु क्‍यूं मन मानता ही नहीं, हिन्‍दी में अंग्रेजी शब्‍दों नें अतिक्रमण कर लिया है किन्‍तु उन शब्‍दों के प्रयोग से भाषा यद्धपि खिचड़ी हुई है पर उसके अभिव्‍यक्ति पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा है। किन्‍तु छत्‍तीसगढ़ी के शब्‍दों को बिना जाने समझे कहीं का कहीं घुसेड़ने से प्रथमत: पठनीयता प्रभावित होती है तदनंतर उसका अर्थ भी विचित्र हो जाता है। वाणिज्यिक आवश्‍यकताओं नें धनपतियों व बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों को क्षेत्रीय भाषा के प्रति आकर्षित किया है वहीं गैर छत्‍तीसगढ़ी भाषा-भाषी क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग से प्रदेश के प्रति अपना थोथा प्रेम प्रदर्शित करने की कोशिस कर रहे हैं। मेरा आरंभ से मानना रहा है कि यदि आपको छत्‍तीसगढ़ी नहीं आती है तो इसे सीखने का प्रयास करें किन्‍तु बिना छत्‍तीसगढ़ी सीखे छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों का गलत प्रयोग ना करें। पिछले दिनों प्रदेश के प्रसिद्ध कथाकार सतीश जायसवाल जी नें अमृता प्रीतम की कहानियों में छत्‍तीसगढ़ व ढत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों के प्रयोग के संबंध में लिखा है जिसे पुरातत्‍ववेत्‍ता व संस्‍कृति कर्मी राहुल सिंह जी नें भी प्रवाह दिया है। जिसमें उन्‍होंनें लिखा है कि अमृता प्रीतम जी नें छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दों का सटीक प्रयोग किया है किन्‍तु वर्तमान में देखने में आ रहा है कि लोग कुछ भी कहीं भी छत्‍तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं एवं हमारी भाषा का न केवल अपमान कर रहे हैं बल्कि हमारा भी अपमान कर हे हैं इसके लिये सभी छत्‍तीसगढिया भाषा-भाषी लोगों को विरोध में स्‍वर उठाना चाहिए। मैंनें इसके पूर्व छत्‍तीसगढ़ की विदूषी कथाकारा जया जादवानी की एक कहानी में छत्‍तीसगढ़ी भाषा के गलत प्रयोग के संबंध में 'भाषा के लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व हर भाषा-भाषी के ऊपर है' लिखा था जो क्षेत्रीय समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्‍टों में प्रकाशित भी हुआ था।

कुछ दिन पहले आइडिया मोबाईल नें अभिषेक बच्‍चन के चित्रों के साथ बड़े बड़े होर्डिंग में छत्‍तीसगढ़ी भाषा में विज्ञापन प्रदर्शित किया था उसी की देखा देखी वोडाफोन नें अब छोटी छोटी तख्‍ती अपने फुटकर रिचार्ज वाले पीसीओ, दुकानों व पान ठेलों में लगाया है जिसमें अंग्रेजी के वोडाफोन मोनों के साथ छत्‍तीसगढ़ी में लिखा है ‘एती मिलत हावे.’ छत्‍तीसगढ़ी भाषी एक नजर में इसे नकार देगा। इधर मिलता है, किधर मिलता है भाई, ये कहो जहां तख्‍ती लगा है वहां मिलता है यद्धपि कम्‍पनी इसका मतलब ‘यहां मिलता है’ से लगा रही है। सही भाषा में इसे ‘इहॉं मिलथे’ ‘इहॉं मिलत हावय’ होना चाहिए। ‘एती’ शब्‍द का शाब्दिक अर्थ ‘इधर’ होता है, प्रयोग में यहॉं के लिए ‘एती’ शब्‍द की जगह ‘इंहॉं’ ज्‍यादा प्रचलित है एवं ग्राह्य है। छत्‍तीसगढ़ी हिन्‍दी शब्‍दकोश में डॉ.पालेश्‍वर शर्मा जी ‘एती (विशेषण)’ का ‘एतेक’ के संदर्भ में अर्थ बतलाते हैं  ‘इतना’ व ‘एती (क्रिया विशेषण)’ का मतलब बतलाते है ‘इस ओर’ यानी ‘एती’ किसी निश्चित स्‍थान को इंगित नहीं करता। इसी प्रकार छत्‍तीसगढ़ी शब्‍दकोश में चंद्रकुमार चंद्राकर जी ‘एती (विशेषण)’ का मतलब ‘इधर’ लिखते हैं जो निश्चिचताबोधक नहीं है। अभी बुधवार 16 फरवरी के भास्‍कर के मधुरिमा परिशिष्‍ठ में छत्‍तीसगढ़ी की सुप्रसिद्ध भरथरी (लोकगाथा) गायिका एवं भास्‍कर वूमन ऑफ द ईयर सुरूज बाई खाण्‍डे के संबंध में आशीष भावनानी ने बहुत सुन्‍दर जानकारी प्रकाशित की है किन्‍तु लेखक नें यहां भी वही गलती की है, उन्‍होनें अति उत्‍साह में ‘यही है’ के स्‍थान पर छत्‍तीसगढ़ी भाषा में लिखा ‘ए ही हवै’ सुरूजबाई. जो अटपटा सा लग रहा है। मेरे अनुसार से यहां ‘इही आय’ ही सटीक बैठता है,  ‘हवय’ का मतलब यद्धपि ‘है’ से है किन्‍तु हवय का प्रयोग किसी के पास रखी वस्‍तु के लिए किया जाता है किसी के परिचय के लिए नहीं। अगली पीढ़ी इसे पढेगी और इसे ही सहीं छत्‍तीसगढ़ी मानेगी क्‍योंकि मानकीकरण की बातें अकादमिक रहेंगी व्‍यवहार में जो भाषा आयेगी उसे ये माध्‍यम इसी प्रकार बिगाड़ देंगें, क्‍या हमारी भाषा का ऐसा ही विकास होगा।
संजीव तिवारी

राजघाट से गाजा तक कारवां-7

राजघाट से गाजा तक के कारवां में साथ रहे  दैनिक छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र के संपादक श्री सुनील कुमार जी के इस संस्‍मरण के संपादित अंश बीबीसी हिन्‍दी में क्रमश: प्रकाशित किए गए हैं. हम अपने पाठकों के लिए सुनील कुमार जी के इस पूर्ण संस्‍मरण को, छत्‍तीसगढ़ से साभार क्रमश: प्रकाशित करेंगें. प्रस्‍तुत है सातवीं और अंतिम कड़ी ...
(पिछली किस्त से आगे)
दिल्ली से गाजा तक के सफर में जिस गाजा की हम कल्पना करते पहुंचे थे, वह कुछ मायनों में उससे बेहतर था और कुछ में बदतर। एक तो हमलों के निशाने पर बिरादरी, दूसरी तरफ आसपास के कुछ मुस्लिम पड़ोसी देशों की भी हमदर्दी उसके साथ नहीं है। संयुक्त राष्ट्र जितनी राहत करना चाहता है, वह भी इजराइल की समुद्री घेरेबंदी के चलते मुमकिन नहीं है। लेकिन उम्मीद से बेहतर इस मायने में था कि कई नए मकान और नई इमारतें बनते दिख रही थीं और बच्चे स्कूल-कॉलेज जाते हुए भी।
गाजा में हम एक ऐसे मुहल्ले में गए जहां एक ही कुनबे के 28-29 लोग हवाई हमले में मारे गए थे। पूरा इलाका अब मैदान सा हो गया है और वहीं एक परिवार कच्ची दीवारें खड़ी करके प्लास्टिक की तालपत्री के सहारे जी रहा है। इस बहुत ही  गरीबी में जी रहे परिवार ने तुरंत ही कॉफी बनाकर हम सबको पिलाई।
परिवार की एक महिला को कसीदाकारी करते देखकर मैंने पूछा कि इसका क्या होता है? पता लगा कि बाजार में उसे बेच देते हैं। मेरी दिलचस्पी, और पूछने पर उसने कुछ दूसरे कपड़े दिखाए जिन पर कसीदा पूरा हो गया था। लेकिन कई कपड़े फटे-पुराने दिख रहे थे जो कि इजराइली हवाई हमले में जख्मी हो गए थे। मैंने जोर डालकर दाम देकर ऐसा एक नमूना लिया। परिवार की महिलाओं की आंखों में आंसू थे और आगे की जिंदगी का अंधेरा भी।
यह शहर मलबे के बीच उठते मकानों, उठती इमारतों का है, जिनके ऊपर जाने किस वक्त बमबारी हो जाए। कहने को फिलीस्तीन लोग भी घर पर बनाए रॉकेटों से सरहद पर हमले करते हैं, लेकिन आंकड़े देखें तो फिलीस्तीनी अगर दर्जन भर को मारते हैं तो इजराइली हजार से अधिक। एक गैरबराबरी की लड़ाई वहां जारी है।
फिलीस्तीन में अब सिवाय इतिहास, कोई हिन्दुस्तान की दोस्ती का नाम भी नहीं जानता था। उनकी आखिरी यादें इंदिरा गांधी की हैं जिस वक्त यासिर अराफात के साथ उनका भाई-बहन सा रिश्ता था। अब तो इस दबे-कुचले जख्मी देश से भारत का ही कोई रिश्ता हो, ऐसा गाजा में सुनाई नहीं पड़ता।
गाजा के इस्लामिक विश्वविद्यालय में मैंने एक विचार-विमर्श के बाद, बमबारी के मलबे के बगल खड़े हुए दो युवतियों से भारत के बारे में पूछा, एक का कहना था इंदिरा गांधी को अराफात महान बहन कहते थे।
दूसरी युवती का कहना था कि वह पढऩे के लिए भारत आना चाहती है लेकिन कोई रास्ता नहीं है।
ऐसा भी नहीं कि फिलीस्तीन में इंटरनेट नहीं है। तबाही के बीच भी धीमी रफ्तार का इंटरनेट है और नई पीढ़ी ठीक-ठाक अंगे्रजी में तकरीबन रोज ही मुझसे लिखकर बात कर लेती है। लेकिन इस पीढ़ी ने महज यह कारवां भारत से आते और जाते देखा है। इस कारवां से परे भारत की हमदर्दी का उसे कोई एहसास नहीं है और मुझसे पूछे जाने पर जब जगह-जगह मैंने कहा कि लगभग पूरा हिन्दुस्तान फिलीस्तीन के मुद्दे से नावाकिफ है तो इससे वे लोग कुछ उदास जरूर थे। लेकिन इसके साथ ही हिन्दुस्तान के बारे में कहने के लिए मेरे पास एक दूसरा यह सच भी था कि लगभग पूरा हिन्दुस्तान खुद हिन्दुस्तान के असल मुद्दों से नावाकिफ है और सिर्फ अपनी जिंदगी के सुख या अपनी जिंदगी के दुख ही अमूमन उसके लिए मायने रखते हैं। ऐसे में मैं न सिर्फ फिलीस्तीन की नौजवान पीढ़ी बल्कि रास्ते के देशों में राजनीतिक चेतना के साथ उत्तेजित खड़े मिले नौजवानों से भी यह कहते गया कि ऐसी जागरूकता की जरूरत हिन्दुस्तान को भी बहुत अधिक है।
एक अनाथाश्रम बच्चों से भरा हुआ था जहां फेंके गए जिंदा बच्चे लाकर बड़े किए जा रहे थे। फिलीस्तीन के समाज में औरत मर्द का संतुलन गड़बड़ा गया है, मर्द शहीद और औरतें अकेली। मुस्लिम रीति-रिवाज ही क्यों, आज के भारत में ही कौन अकेली मां को उसके बच्चे पैदा करने पर बर्दाश्त कर सकता है? नतीजन ऐसे बहुत से बच्चे यतीमखाने में थे। समाज में आबादी और पीढ़ी का अनुपात वैसे ही गड़बड़ा गया है जैसे विश्वयुद्धों के बाद कई देशों में गड़बड़ा गया था।
मानवीय सहायता पहुंचाने का मकसद तो वहां पहुंचकर पूरा हो गया, पूरे रास्ते के देशों को देखना तो हो पाया था लेकिन एक अखबारनवीस की हैसियत से फिलीस्तीन को देखना बहुत कम हो पाया। हमारे साथ वहां घूमते कुछ गैरसरकारी नौजवानों के बारे में भी हमारे एक साथी को शक था कि वे सत्तारूढ़ पार्टी हमास के लिए हमारी निगरानी करते हो सकते हैं। इतने कम वक्त में क्या पता चलता है?
लेकिन एक बात तय थी कि चार दिन के हमारे-रहने का अधिक से अधिक वक्त हमास और सरकार के लोग आयोजित कार्यक्रमों में बरबाद करके हमें लोगों से दूर रखना चाहते थे। हो सकता है कि खतरों के बीच चौकन्नेपन की उनकी आदत हो।
फिलीस्तीन की नई पीढ़ी के पास न वहां से बाहर निकलने की राहें हैं, न दुनिया के अधिक देशों में उनके लिए फैली बाहें हैं। बगल के सीरिया में जो फिलीस्तीन शरणार्थी आधी सदी से बसे हैं, वे जरूर दसियों लाख हैं और सीरिया की सरकार उनका ख्याल रखती है, सरकारी नौकरी देती है। लेकिन इजराइली घेरेबंदी के चलते उनको अपनी ही जमीन पर आज तक लौटना नसीब नहीं हो पाया। इस तरह फिलीस्तीन में भीतर रह गए लोग भीतर हैं और बाहर चले गए लोग बाहर।
गाजा में एक जगह हमलों में हुई मौतों और जख्मों की तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी थी। इसमें हमारे साथ की कुछ भारतीय युवतियां बहुत विचलित सी दिखीं। उनकी तस्वीर लेते हुए जब उनके चेहरों पर राख सी पुती दिखी तो उनका कहना था कि ऐसा नजारा उन्होंने कभी नहीं देखा था और ऐसे में मैं उनकी तस्वीर न लूं। लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि मौतों के ऐेसे मंजर को देखकर तो इंसान विचलित होंगे ही और यह तस्वीर सिर्फ उसी को कैद कर रही है। लेकिन अपनी ही साथी इस लड़की से बात करते-करते मैं यह सोचते रहा कि जिस फिलीस्तीन में आए वक्त लोग असल मौतों को न सिर्फ देखते हैं बल्कि भुगतते हैं, जहां घायलों को उठाते हुए गर्म लहू की तपन हाथों को लगती है, जहां लहू की गंध भी देर तक सांसों में बसी रहती है, वहां की नौजवान पीढ़ी कितनी विचलित नहीं होती होगी।
यही वजह थी कि विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में एक हिन्दुस्तानी सवाल के जवाब में एक फिलीस्तीनी छात्रा का कहना था-जिस इजराइल ने हमारे पूरे कुनबे को मार डाला है, उसके पड़ोस में रहना या उसे पड़ोस में रहने देने का तो सवाल ही नहीं उठता।
गाजा में एक कार्यक्रम में ऐसी औरतों और ऐसे बच्चों की भीड़ थी जो इजराइली जेलों में बंद अपने घरवालों की तस्वीरें लिए बंदी थीं। इनमें शहीदों के घरवाले भी थे। लेकिन हिन्दुस्तान में भी पंजाब वगैरह में ऐसी तकलीफदेह जिंदगी होगी जिसे देखना मुझे अब तक नहीं मिल पाया है। दिल्ली में कश्मीरी पंडि़तों के शरणार्थी शिविरों तक जाना भी अभी नहीं हो पाया है और बस्तर में हिंसा से बेदखल लोगों के बीच में महज एक बार मेरा जाना हुआ है।
इसलिए गाजा में जब एक टेलीविजन कार्यक्रम में मुझसे पूछा गया कि इस कारवां की मैं क्या कामयाबी मानता हूं? तो सोचकर मैंने कहा कि डेढ़-दो महीने से फिलीस्तीन के बारे में सोचते-सोचते अब आत्ममंथन से यह भी दिख रहा है कि हिन्दुस्तान के भीतर दबे-कुचले तबकों से बेइंसाफी वाले कितने फिलीस्तीन जगह-जगह बिखरे हुए हैं। अगर यह कारवां गाजा के जख्मों के देखने के बाद भारत के भीतर के ''फिलीस्तीनियों' के जख्म देख पाता है तो वह कारवां की कामयाबी होगी। बिना इजराइली बमबारी और गोलीबारी के भी हिन्दुस्तान के कमजोर तबकों पर रोज हमले हो रहे हैं और बेइंसाफी जारी है।
मतलब यह कि सिर्फ अमरीकी या इजराइली हमलों से गाजा घायल नहीं होता, वह तो हिन्दुस्तान के भीतर भी लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों के हमलों से घायल होता है और यहां की बाजारू ताकतों के हमलों से भी। पांच हफ्तों के इस सफर में दूसरों के जख्म देखते हुए अपनों के जख्मों के बारे में भी सोचने का कुछ मौका मिला और शायद कारवां कुछ दूसरी तरफ भी जा सकेंगे।
गाजा और रास्ते के सफर से जुड़ी कई बातें फिर कभी, किसी और शक्ल में।
सुनील कुमार
यात्रा के फोटो कैप्‍शन के साथ हम अगली पोस्‍ट में प्रस्‍तुत करेंगें. 
कारवां .....
राजघाट से गाजा तक कारवां-1
राजघाट से गाजा तक कारवां-2
राजघाट से गाजा तक कारवां-3
राजघाट से गाजा तक कारवां-4
राजघाट से गाजा तक कारवां-5
राजघाट से गाजा तक कारवां-6

लेबल

संजीव तिवारी की कलम घसीटी समसामयिक लेख अतिथि कलम जीवन परिचय छत्तीसगढ की सांस्कृतिक विरासत - मेरी नजरों में पुस्तकें-पत्रिकायें छत्तीसगढ़ी शब्द Chhattisgarhi Phrase Chhattisgarhi Word विनोद साव कहानी पंकज अवधिया सुनील कुमार आस्‍था परम्‍परा विश्‍वास अंध विश्‍वास गीत-गजल-कविता Bastar Naxal समसामयिक अश्विनी केशरवानी नाचा परदेशीराम वर्मा विवेकराज सिंह अरूण कुमार निगम व्यंग कोदूराम दलित रामहृदय तिवारी अंर्तकथा कुबेर पंडवानी Chandaini Gonda पीसीलाल यादव भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष Ramchandra Deshmukh गजानन माधव मुक्तिबोध ग्रीन हण्‍ट छत्‍तीसगढ़ी छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म पीपली लाईव बस्‍तर ब्लाग तकनीक Android Chhattisgarhi Gazal ओंकार दास नत्‍था प्रेम साईमन ब्‍लॉगर मिलन रामेश्वर वैष्णव रायपुर साहित्य महोत्सव सरला शर्मा हबीब तनवीर Binayak Sen Dandi Yatra IPTA Love Latter Raypur Sahitya Mahotsav facebook venkatesh shukla अकलतरा अनुवाद अशोक तिवारी आभासी दुनिया आभासी यात्रा वृत्तांत कतरन कनक तिवारी कैलाश वानखेड़े खुमान लाल साव गुरतुर गोठ गूगल रीडर गोपाल मिश्र घनश्याम सिंह गुप्त चिंतलनार छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ वंशी छत्‍तीसगढ़ का इतिहास छत्‍तीसगढ़ी उपन्‍यास जयप्रकाश जस गीत दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति धरोहर पं. सुन्‍दर लाल शर्मा प्रतिक्रिया प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट फाग बिनायक सेन ब्लॉग मीट मानवाधिकार रंगशिल्‍पी रमाकान्‍त श्रीवास्‍तव राजेश सिंह राममनोहर लोहिया विजय वर्तमान विश्वरंजन वीरेन्‍द्र बहादुर सिंह वेंकटेश शुक्ल श्रीलाल शुक्‍ल संतोष झांझी सुशील भोले हिन्‍दी ब्‍लाग से कमाई Adsense Anup Ranjan Pandey Banjare Barle Bastar Band Bastar Painting CP & Berar Chhattisgarh Food Chhattisgarh Rajbhasha Aayog Chhattisgarhi Chhattisgarhi Film Daud Khan Deo Aanand Dev Baloda Dr. Narayan Bhaskar Khare Dr.Sudhir Pathak Dwarika Prasad Mishra Fida Bai Geet Ghar Dwar Google app Govind Ram Nirmalkar Hindi Input Jaiprakash Jhaduram Devangan Justice Yatindra Singh Khem Vaishnav Kondagaon Lal Kitab Latika Vaishnav Mayank verma Nai Kahani Narendra Dev Verma Pandwani Panthi Punaram Nishad R.V. Russell Rajesh Khanna Rajyageet Ravindra Ginnore Ravishankar Shukla Sabal Singh Chouhan Sarguja Sargujiha Boli Sirpur Teejan Bai Telangana Tijan Bai Vedmati Vidya Bhushan Mishra chhattisgarhi upanyas fb feedburner kapalik romancing with life sanskrit ssie अगरिया अजय तिवारी अधबीच अनिल पुसदकर अनुज शर्मा अमरेन्‍द्र नाथ त्रिपाठी अमिताभ अलबेला खत्री अली सैयद अशोक वाजपेयी अशोक सिंघई असम आईसीएस आशा शुक्‍ला ई—स्टाम्प उडि़या साहित्य उपन्‍यास एडसेंस एड्स एयरसेल कंगला मांझी कचना धुरवा कपिलनाथ कश्यप कबीर कार्टून किस्मत बाई देवार कृतिदेव कैलाश बनवासी कोयल गणेश शंकर विद्यार्थी गम्मत गांधीवाद गिरिजेश राव गिरीश पंकज गिरौदपुरी गुलशेर अहमद खॉं ‘शानी’ गोविन्‍द राम निर्मलकर घर द्वार चंदैनी गोंदा छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय छत्‍तीसगढ़ पर्यटन छत्‍तीसगढ़ राज्‍य अलंकरण छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंजन जतिन दास जन संस्‍कृति मंच जय गंगान जयंत साहू जया जादवानी जिंदल स्टील एण्ड पावर लिमिटेड जुन्‍नाडीह जे.के.लक्ष्मी सीमेंट जैत खांब टेंगनाही माता टेम्पलेट डिजाइनर ठेठरी-खुरमी ठोस अपशिष्ट् (प्रबंधन और हथालन) उप-विधियॉं डॉ. अतुल कुमार डॉ. इन्‍द्रजीत सिंह डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव डॉ. गोरेलाल चंदेल डॉ. निर्मल साहू डॉ. राजेन्‍द्र मिश्र डॉ. विनय कुमार पाठक डॉ. श्रद्धा चंद्राकर डॉ. संजय दानी डॉ. हंसा शुक्ला डॉ.ऋतु दुबे डॉ.पी.आर. कोसरिया डॉ.राजेन्‍द्र प्रसाद डॉ.संजय अलंग तमंचा रायपुरी दंतेवाडा दलित चेतना दाउद खॉंन दारा सिंह दिनकर दीपक शर्मा देसी दारू धनश्‍याम सिंह गुप्‍त नथमल झँवर नया थियेटर नवीन जिंदल नाम निदा फ़ाज़ली नोकिया 5233 पं. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकार परिकल्‍पना सम्‍मान पवन दीवान पाबला वर्सेस अनूप पूनम प्रशांत भूषण प्रादेशिक सम्मलेन प्रेम दिवस बलौदा बसदेवा बस्‍तर बैंड बहादुर कलारिन बहुमत सम्मान बिलासा ब्लागरों की चिंतन बैठक भरथरी भिलाई स्टील प्लांट भुनेश्वर कश्यप भूमि अर्जन भेंट-मुलाकात मकबूल फिदा हुसैन मधुबाला महाभारत महावीर अग्रवाल महुदा माटी तिहार माननीय श्री न्यायमूर्ति यतीन्द्र सिंह मीरा बाई मेधा पाटकर मोहम्मद हिदायतउल्ला योगेंद्र ठाकुर रघुवीर अग्रवाल 'पथिक' रवि श्रीवास्तव रश्मि सुन्‍दरानी राजकुमार सोनी राजमाता फुलवादेवी राजीव रंजन राजेश खन्ना राम पटवा रामधारी सिंह 'दिनकर’ राय बहादुर डॉ. हीरालाल रेखादेवी जलक्षत्री रेमिंगटन लक्ष्मण प्रसाद दुबे लाईनेक्स लाला जगदलपुरी लेह लोक साहित्‍य वामपंथ विद्याभूषण मिश्र विनोद डोंगरे वीरेन्द्र कुर्रे वीरेन्‍द्र कुमार सोनी वैरियर एल्विन शबरी शरद कोकाश शरद पुर्णिमा शहरोज़ शिरीष डामरे शिव मंदिर शुभदा मिश्र श्यामलाल चतुर्वेदी श्रद्धा थवाईत संजीत त्रिपाठी संजीव ठाकुर संतोष जैन संदीप पांडे संस्कृत संस्‍कृति संस्‍कृति विभाग सतनाम सतीश कुमार चौहान सत्‍येन्‍द्र समाजरत्न पतिराम साव सम्मान सरला दास साक्षात्‍कार सामूहिक ब्‍लॉग साहित्तिक हलचल सुभाष चंद्र बोस सुमित्रा नंदन पंत सूचक सूचना सृजन गाथा स्टाम्प शुल्क स्वच्छ भारत मिशन हंस हनुमंत नायडू हरिठाकुर हरिभूमि हास-परिहास हिन्‍दी टूल हिमांशु कुमार हिमांशु द्विवेदी हेमंत वैष्‍णव है बातों में दम

छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...