ब्लॉग छत्तीसगढ़

11 February, 2011

राजघाट से गाजा तक कारवां - 5

राजघाट से गाजा तक के कारवां में साथ रहे  दैनिक छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र के संपादक श्री सुनील कुमार जी के इस संस्‍मरण के संपादित अंश बीबीसी हिन्‍दी में क्रमश: प्रकाशित किए गए हैं. हम अपने पाठकों के लिए सुनील कुमार जी के इस पूर्ण संस्‍मरण को, छत्‍तीसगढ़ से साभार क्रमश: प्रकाशित करेंगें. प्रस्‍तुत है पांचवी कड़ी ...
(पिछली किस्त से आगे)
गाजा से कुल एक देश, इजिप्ट, की दूरी पर ठहरे हुए हम सीरिया के दो शहरों में वक्त गुजारते रहे और फिलीस्तीनी शरणार्थियों की बस्तियों में जाते रहे। हिन्दुस्तान में आज यह लिखते हुए टीवी पर सामने एक रिपोर्ट है कि किस तरह दिल्ली में शरणार्थी कैम्पों में एक-एक कमरों में वे कश्मीरी पंडित परिवार रह रहे हैं जिन्हें अलगाववादी-आतंकी कश्मीरियों ने वहां से भगा दिया था। यह मिसाल मैंने कारवां के कई लोगों के सामने रखी, लेकिन किसी के पास इस बात का आसान जवाब नहीं था कि भारत के भीतर ऐसा करवां कश्मीर से बेदखल, बेघर हुए लोगों के लिए क्यों नहीं निकलना चाहिए?
लेकिन अभी चर्चा गाजा की।
सीरिया में दमिश्क में डेरा कुछ लंबा रहा और वहीं के एक दूसरे शहर लताकिया में भी। जब बाकी लोग दमिश्क में थे तब कारवां के करीब तीस लोग दो दिनों के लिए लेबनान भी हो आए। लेकिन मेरी बारी उनमें नहीं लगी इसलिए वहां का बखान मुमकिन नहीं।
ईरान से रवाना होते हुए वहां के एक नौजवान साथी रूउल्ला की बीवी और बच्ची भी कारवां में आ गए। एक दूसरा पाकिस्तानी जोड़ा भी अपने तीन बेटों के साथ कारवां में पहुंच गया और यह फैसला धरे रह गया कि कोई परिवार या बच्चे कारवां में नहीं रहेंगे क्योंकि ऐसा पिछला कारवां इजराइली हमले में बीस जानें खो चुका था।
रूउल्ला कश्मीरी है और चार बरस की उम्र में पिता के साथ जो ईरान आया तो यहीं बसा हुआ है। बीवी भी कश्मीरी और बेटी भी। इसलिए आठ महीने की नन्हीं हन्नाने के साथ उन्हें गाजा तक जाने का मौका मिल गया। इजिप्ट ने एक भी ईरानी को गुजरने का वीजा भी नहीं दिया था।
गुडिय़ा सी खूबसूरत और प्यारी हन्नाने पूरे कारवां की गोद में घूमते रहती थी और उसकी वजह से कारवां के लोगों के बीच आपस के कई तनाव भी हवा होते दिखे। रूउल्ला की दमदार लीडरशिप जो कि बहुत पुरूषवादी भी थी, और ईरान की संस्कृति की थी, उससे खफा लोग भी इस बच्ची के आने से पिघल गए। लेकिन बहुत कड़े इस सर्द सफर में ये बच्चे चलते ही रहे।
सीरिया में रहते हुए उन जहाजों का इंतजाम हुआ जो सहायता-सामाग्री लेकिन इजिप्ट के अल अरिश तक जाते और मुसाफिरों को लेकर भी। ऐसे दो बहुत महंगे भाड़े वाले जहाजों का इंतजाम मुस्लिम दुनिया ने यूं किया मानो वे किसी तीर्थयात्रा की सड़क किनारे भंडारा लगा रहे हों। लेकिन 8-10 दिन दो शहरों में गुजारने के बाद जब इजिप्ट की इजाजत मिली तो उसमें किसी ईरानी का नाम नहीं था।
कुछ लोगों की सोच थी कि इसका विरोध करने के लिए, और ईरान के साथ एकजुटता दिखाने के लिए कुछ या सभी साथी वीजा मिलने के बाद भी जाना रद्द कर दें और इजिप्ट का विरोध करें। लेकिन गनीमत कि यह सोच टिक नहीं पाई।
इजिप्ट की सरकार पूरी तरह मेजबान थी और उसके आला अफसर जहाज लदने के वक्त वहां मौजूद थे, गवर्नर भी। कई एम्बुलेंस, सोलर बिजली जनरेटर, दवाएं, चिकित्सा उपकरण और बाकी सामान। करोड़ों का सामान जहाज पर लदा तो घंटों तक कारवां के लोगों को बिना पिए नशा सा रहा और कई देशों के गाने सब मिलकर गाते रहे।
दो दिन बाद इसी जहाज पर आठ चुनिंदा कारवांई भी सवार हुए क्योंकि इजिप्ट ने उतने ही लोगों को जाने की इजाजत दी थी। बाकी करीब सवा सौ लोग एक विशेष विमान पर दमिश्क जाकर सवार हुए और इजिप्ट पहुंचे। पानी के जहाज पर सवार होकर जाने वालों को, शहादत के लिए रवाना होने जैसी बिदाई दी गई क्योंकि हमले का खतरा तो था ही इस खतरे के बाद भी कारवां का हर कोई इन आठ लोगों में जहाज पाने को लगे रहा, मैं भी अपने कैमरों के साथ जाना चाहता था लेकिन नंबर लगा नहीं।
इतने तमाम मुस्लिम या इस्लामी देशों से गुजरते हुए जो सबसे अजीब बात मुझे लगी, वह था अखबारों की गैरमौजूदगी। ईरान के फुटपाथों पर तो बहुत अखबार थे लेकिन बाकी तमाम जगहों पर लगभग नदारद। लोग पढ़ते हुए तो दिखते ही नहीं थे, और तो और होटलों की लॉबी तक में अखबार नहीं थे। मैं पता नहीं क्यों इस पूर्वाग्रह को नहीं छोड़ पाता कि अखबारों की मजबूत मौजूदगी सीधे-सीधे लोकतंत्र की मजबूती से जुड़ी बात है। हालांकि इसके खिलाफ भी मिसालें हैं और पाकिस्तान में तो अखबार निकलते ही हैं।
लेकिन इस पूरी मध्य पूर्व की दुनिया में इंटरनेट तक लोगों की पहुंच खूब दिखी और पूरे देशों में रोक दी गई 'फेसबुक' जैसे वेबसाईटों तक पहुंचने का तोड़ हर किसी के पास था। इन तमाम देशों में हमारे नए बने दोस्त ऐसी वेबसाईटों का रास्ता जबरन खोलकर ही रात-दिन हमारे साथ रहते हैं।
एक दूसरी बात यह कि इन देशों में जहां-जहां भी औरत हिजाब, चादर या बुर्के में कैद है, वहां भी वह घर में कैद नहीं है। वह, कम से कम, शहरों में तो कामकाजी है और देश और दुनिया से बात करना जानती हैं। ईरान की महिला फिल्म निर्देशिकों का काम दुनिया भर में जाना और माना जाता है और ऐसी होनहार महिला से मेरी मुलाकात फिल्म समारोहों में होती ही रहती थी। औरतों से गैरबराबरी बहुत है लेकिन पढ़ाई जैसे दायरों में लड़कियां लड़कों के बराबर, या आगे हैं।
सफर की बात करें, तो हर जगह एक मुल्क से दूसरे की सरहद पार करते वक्त अपना पूरा सामान ढोकर लंबी दूरी तय करनी होती थी। मेरे साथ तो 7-8 किलो का कैमरा बैग और उससे कुछ ही हल्के लैपटॉप बैग थे ही, 15 किलो से अधिक भारी बैक पैक, तमाम जानने के बाद भी मैं सर्द मौसम के खतरे से सामान इससे कम नहीं कर पाया था और पैंतीस किलो के करीब ढोते चल रहा था। लेकिन बहुत नाजुक छोटी युवतियां या बहुत बुजुर्ग भी अपना पूरा बोझ ढोते चल रहे थे। ऐसे ही कारवां इजिप्ट और फिलीस्तीन के गाजा शहर के बीच की रफा चौकी पर पहुंचा। जहां दूसरी तरफ फिलीस्तीनी मेजबान अपनी बसें लिए खड़े थे। 
सुनील कुमार
(बाकी अगली किस्त में।)

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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राजघाट से गाजा तक के कारवां में साथ रहे  दैनिक छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र के संपादक श्री सुनील कुमार जी के इस संस्‍मरण के संपादित अंश बीबीसी हिन्‍दी में क्रमश: प्रकाशित किए गए हैं. हम अपने पाठकों के लिए सुनील कुमार जी के इस पूर्ण संस्‍मरण को, छत्‍तीसगढ़ से साभार क्रमश: प्रकाशित करेंगें. प्रस्‍तुत है पांचवी कड़ी ...
(पिछली किस्त से आगे)
गाजा से कुल एक देश, इजिप्ट, की दूरी पर ठहरे हुए हम सीरिया के दो शहरों में वक्त गुजारते रहे और फिलीस्तीनी शरणार्थियों की बस्तियों में जाते रहे। हिन्दुस्तान में आज यह लिखते हुए टीवी पर सामने एक रिपोर्ट है कि किस तरह दिल्ली में शरणार्थी कैम्पों में एक-एक कमरों में वे कश्मीरी पंडित परिवार रह रहे हैं जिन्हें अलगाववादी-आतंकी कश्मीरियों ने वहां से भगा दिया था। यह मिसाल मैंने कारवां के कई लोगों के सामने रखी, लेकिन किसी के पास इस बात का आसान जवाब नहीं था कि भारत के भीतर ऐसा करवां कश्मीर से बेदखल, बेघर हुए लोगों के लिए क्यों नहीं निकलना चाहिए?
लेकिन अभी चर्चा गाजा की।
सीरिया में दमिश्क में डेरा कुछ लंबा रहा और वहीं के एक दूसरे शहर लताकिया में भी। जब बाकी लोग दमिश्क में थे तब कारवां के करीब तीस लोग दो दिनों के लिए लेबनान भी हो आए। लेकिन मेरी बारी उनमें नहीं लगी इसलिए वहां का बखान मुमकिन नहीं।
ईरान से रवाना होते हुए वहां के एक नौजवान साथी रूउल्ला की बीवी और बच्ची भी कारवां में आ गए। एक दूसरा पाकिस्तानी जोड़ा भी अपने तीन बेटों के साथ कारवां में पहुंच गया और यह फैसला धरे रह गया कि कोई परिवार या बच्चे कारवां में नहीं रहेंगे क्योंकि ऐसा पिछला कारवां इजराइली हमले में बीस जानें खो चुका था।
रूउल्ला कश्मीरी है और चार बरस की उम्र में पिता के साथ जो ईरान आया तो यहीं बसा हुआ है। बीवी भी कश्मीरी और बेटी भी। इसलिए आठ महीने की नन्हीं हन्नाने के साथ उन्हें गाजा तक जाने का मौका मिल गया। इजिप्ट ने एक भी ईरानी को गुजरने का वीजा भी नहीं दिया था।
गुडिय़ा सी खूबसूरत और प्यारी हन्नाने पूरे कारवां की गोद में घूमते रहती थी और उसकी वजह से कारवां के लोगों के बीच आपस के कई तनाव भी हवा होते दिखे। रूउल्ला की दमदार लीडरशिप जो कि बहुत पुरूषवादी भी थी, और ईरान की संस्कृति की थी, उससे खफा लोग भी इस बच्ची के आने से पिघल गए। लेकिन बहुत कड़े इस सर्द सफर में ये बच्चे चलते ही रहे।
सीरिया में रहते हुए उन जहाजों का इंतजाम हुआ जो सहायता-सामाग्री लेकिन इजिप्ट के अल अरिश तक जाते और मुसाफिरों को लेकर भी। ऐसे दो बहुत महंगे भाड़े वाले जहाजों का इंतजाम मुस्लिम दुनिया ने यूं किया मानो वे किसी तीर्थयात्रा की सड़क किनारे भंडारा लगा रहे हों। लेकिन 8-10 दिन दो शहरों में गुजारने के बाद जब इजिप्ट की इजाजत मिली तो उसमें किसी ईरानी का नाम नहीं था।
कुछ लोगों की सोच थी कि इसका विरोध करने के लिए, और ईरान के साथ एकजुटता दिखाने के लिए कुछ या सभी साथी वीजा मिलने के बाद भी जाना रद्द कर दें और इजिप्ट का विरोध करें। लेकिन गनीमत कि यह सोच टिक नहीं पाई।
इजिप्ट की सरकार पूरी तरह मेजबान थी और उसके आला अफसर जहाज लदने के वक्त वहां मौजूद थे, गवर्नर भी। कई एम्बुलेंस, सोलर बिजली जनरेटर, दवाएं, चिकित्सा उपकरण और बाकी सामान। करोड़ों का सामान जहाज पर लदा तो घंटों तक कारवां के लोगों को बिना पिए नशा सा रहा और कई देशों के गाने सब मिलकर गाते रहे।
दो दिन बाद इसी जहाज पर आठ चुनिंदा कारवांई भी सवार हुए क्योंकि इजिप्ट ने उतने ही लोगों को जाने की इजाजत दी थी। बाकी करीब सवा सौ लोग एक विशेष विमान पर दमिश्क जाकर सवार हुए और इजिप्ट पहुंचे। पानी के जहाज पर सवार होकर जाने वालों को, शहादत के लिए रवाना होने जैसी बिदाई दी गई क्योंकि हमले का खतरा तो था ही इस खतरे के बाद भी कारवां का हर कोई इन आठ लोगों में जहाज पाने को लगे रहा, मैं भी अपने कैमरों के साथ जाना चाहता था लेकिन नंबर लगा नहीं।
इतने तमाम मुस्लिम या इस्लामी देशों से गुजरते हुए जो सबसे अजीब बात मुझे लगी, वह था अखबारों की गैरमौजूदगी। ईरान के फुटपाथों पर तो बहुत अखबार थे लेकिन बाकी तमाम जगहों पर लगभग नदारद। लोग पढ़ते हुए तो दिखते ही नहीं थे, और तो और होटलों की लॉबी तक में अखबार नहीं थे। मैं पता नहीं क्यों इस पूर्वाग्रह को नहीं छोड़ पाता कि अखबारों की मजबूत मौजूदगी सीधे-सीधे लोकतंत्र की मजबूती से जुड़ी बात है। हालांकि इसके खिलाफ भी मिसालें हैं और पाकिस्तान में तो अखबार निकलते ही हैं।
लेकिन इस पूरी मध्य पूर्व की दुनिया में इंटरनेट तक लोगों की पहुंच खूब दिखी और पूरे देशों में रोक दी गई 'फेसबुक' जैसे वेबसाईटों तक पहुंचने का तोड़ हर किसी के पास था। इन तमाम देशों में हमारे नए बने दोस्त ऐसी वेबसाईटों का रास्ता जबरन खोलकर ही रात-दिन हमारे साथ रहते हैं।
एक दूसरी बात यह कि इन देशों में जहां-जहां भी औरत हिजाब, चादर या बुर्के में कैद है, वहां भी वह घर में कैद नहीं है। वह, कम से कम, शहरों में तो कामकाजी है और देश और दुनिया से बात करना जानती हैं। ईरान की महिला फिल्म निर्देशिकों का काम दुनिया भर में जाना और माना जाता है और ऐसी होनहार महिला से मेरी मुलाकात फिल्म समारोहों में होती ही रहती थी। औरतों से गैरबराबरी बहुत है लेकिन पढ़ाई जैसे दायरों में लड़कियां लड़कों के बराबर, या आगे हैं।
सफर की बात करें, तो हर जगह एक मुल्क से दूसरे की सरहद पार करते वक्त अपना पूरा सामान ढोकर लंबी दूरी तय करनी होती थी। मेरे साथ तो 7-8 किलो का कैमरा बैग और उससे कुछ ही हल्के लैपटॉप बैग थे ही, 15 किलो से अधिक भारी बैक पैक, तमाम जानने के बाद भी मैं सर्द मौसम के खतरे से सामान इससे कम नहीं कर पाया था और पैंतीस किलो के करीब ढोते चल रहा था। लेकिन बहुत नाजुक छोटी युवतियां या बहुत बुजुर्ग भी अपना पूरा बोझ ढोते चल रहे थे। ऐसे ही कारवां इजिप्ट और फिलीस्तीन के गाजा शहर के बीच की रफा चौकी पर पहुंचा। जहां दूसरी तरफ फिलीस्तीनी मेजबान अपनी बसें लिए खड़े थे। 
सुनील कुमार
(बाकी अगली किस्त में।)
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