नया ब्लागर टैम्पलेट : अपने ब्लाग को नया रूप देवें

लगातार बढ रहे ब्लागरों की संख्या एवं उनमें अपने ब्लाग को न्यू लुक देनें की चाहत नें ब्लाग टेम्पलेट्स के ढेरों साईट को जन्म दिया है जहां नये पुराने ब्लागर्स अपने ब्लाग के थीम व टेम्पलेट्स को समय समय पर बदलते रहते हैं । ब्लागर्स डाट काम के द्वारा आरंभिक चरण में सामान्य टेम्पलेट्स के चयन की सुविधा प्राप्त होती है उसके बाद उसमें आवश्यक व इच्छानुसार बदलाव किये जा सकते हैं ।




हम यहां http://www.finalsense.com के द्वारा प्रदान किये जा रहे मुफ्त ब्लाग टेम्पलेट्स में से तीन कालम वाला सुन्दर ब्लाग टेम्पलेट्स को अपने ब्लाग में लगाने के संबंध में क्रमिक जानकारी नये ब्लागरों के लिए प्रदान कर रहे हैं ।




सबसे पहले अपना ब्लागर्स आईडी व पासवर्ड डाल कर ब्लागर्स डेशबोर्ड में प्रवेश करें ।



डेशबोर्ड में लेआउट को क्लिक करें ।


यहां एडिट एचटीएमएल को क्लिक करें । नये पेज खुलने पर दिये गये डाउनलोड फुल टेम्पलेट को क्लिक कर अपने पुराने ब्लाग लेआउट व ब्लाग टेम्पलेट्स को सुरक्षा के तौर पर अपने हार्डडिस्क में सेव कर लेवें ।


ब्लाग टेम्पलेट्स के सभी अवयवों को एचटीएमएल प्रारूप में बाक्स में प्रस्तुत करने के लिये एक्सप्लेंड विजिट टेम्पलेट को क्लिक करें । अब इस पेज को मिनिमाईज कर लेवें ।



अब एक नया पेज या न्यूटैब में Finalsense.com को खोले, अपनी इच्छानुसार कोई ब्लाग टेम्पलेट्स चुने व वहां दिये गये मोर डिटेल की को क्लिक करें यहां एचटीएमएल कोड दिखाई देगा, संपूर्ण एचटीएमएल को कापी कर लेवें ।


अब पुन: ब्लागर्स में अपने पूर्व में खोले गये व मिनिमाईज किये गये पेज में आयें । इसमें दिये गये एचटीएमएल बाक्स के सभी शव्दों को आरंभ से अंत तक सलेक्ट करें और Finalsense.com में से कापी किये गये कोड को यहां पेस्ट कर देवें ।


अब बिना सेव किये ही अपने ब्लाग का पूर्वावलोकन करें, इस वेब साईट द्वारा उपलब्ध प्राय: सभी ब्लाग टेम्पलेट्सों में शव्दों को जस्टीफाई कर दिया गया है इस कारण ब्लाग के लेख फायर फाक्स में गारबेज नजर आते हैं इसलिये टेक्स्ट जस्टीफाई आप्शन को हटाकर हमें लेफ्ट करना होगा । इसके लिये सबसे सुविधाजनक तरीका यह है कि एचटीएमएल को पेस्ट करने के बाद एक्सप्लोरर या फायर फाक्स के एडिट टैब में दिये गये फाइंड आप्शन का प्रयोग करें यहां फाईड में justify लिखें और फाईंड करें , शव्द मिलने पर उसे हटाकर left कर देवें । पुन: पूर्वावलोकन करें, लेआउट से संतुष्टि होने पर सेव टेम्पलेट्स करें ।


यहां हो सकता है कि आपके पूर्व में साईडबार में लगाये गये कई एलीमेंट इस एचटीएमएल में सपोर्ट न करे ऐसी अवस्था में आपका टेम्पलेट सेव नहीं होगा और नये एचटीएमएल विजिट सेटिंग के साथ टेम्पलेट को सेव करने के लिए संदेश प्राप्त होगा तब आप इसे स्वीकारें और लाल सेव बटन को क्लिक कर सेव करें । पुन: सेव टेम्पलेट्स को क्लिक करें ।



अब आपके ब्लाग नें नया चोला पहन लिया है इसे देखने के लिये व्यू को क्लिक कर आप अपना ब्लाग देख सकते हैं ।




इसके बाद आप लेआउट में जाकर अपने पसंद से पेज एलीमेंट एड कर ब्लाग को सजा सकते हैं ।


मैनें इस टेम्पलेट को अपने छत्तीसगढी ब्लाग में लोड किया है आप इसका अवलोकन कर सकते हैं । टेम्पलेट लोड करने की प्रक्रिया में कोई समस्या हो तो यहां टिप्पणी कर अपनी समस्यायें लिख सकते हैं ताकि हम सहायता कर सकें ।

रचना, रचनाकार को तलाश लेती है : कथबिंब

साहित्तिक कहावत है कि लेखक उपन्‍यास में आत्‍मकथा और आत्‍मकथा में उपन्‍यास लिखता है । वह ऐसा क्‍यों करता है ? मुझे लगता है कि वह ऐसा इसलिये करता है क्‍योंकि वह दोहरा चरित्र जीता है – एक वह, जो वह जीना चाहता है और एक वह, जो वह जीता है । आज के परिवेश में, बल्कि मैं तो कहूंगा कि प्रत्‍येक काल में, आदर्श और व्‍यवहार के मध्‍य समन्‍वय किये बिना सामाजिक जीवन संभव नहीं । आदर्श से समाज नहीं चलता और यथार्थवादी व्‍यवहार से मनुष्‍य-भाव नहीं बचता । इसलिये दोनों में तालमेल जरूरी है । ....... रचना - प्रक्रिया के संबंध में लेखकों से अधिकतर यही सुना गया है कि परिवेश में व्‍याप्‍त विसंगतियां उसे उद्धेलित करती है और वह रचनात्‍मक होना शुरू हो जाता है । अध्‍ययन मनन, विचार – विमर्श आदि के बाद एक दो सिटिंग में रचना का ड्राफ्ट फाईनल हो जाता है । फिर उसमें संशोधन संपादन, यानी जोड घटाव और परिर्वतन के पश्‍चात, रचना पाठकीय स्‍वरूप में आ जाती है ।


यह वाक्‍यांश कथाप्रधान त्रैमासिक पत्रिका ‘कथाबिंब’ में अमृतलाल नागर के प्रिय एवं ‘नाच्‍यो बहुत गोपाल’ के पांडुलिपि टंकक व लखनउ से पूर्व में प्रकाशित ‘अविरल मंथन’ के संपादक कथाकार राजेन्‍द्र वर्मा के हैं ।

रचनाकारों के इसी अंदाज को प्रस्‍तुत करती पत्रिका ‘कथाबिंब’ अविरल गति से सन् 1979 से संस्‍कृति संरक्षण संस्‍था मुम्‍बई के सौजन्‍य से भाभा परमाणु केन्‍द्र के वैज्ञानिक व बहुचर्चित कथाकार साहित्‍यकार श्री डॉ. माधव सक्‍सेना ‘अरविंद’ जी के संपादन में प्रकाशित हो रही है ।


मुझे प्राप्‍त जनवरी-मार्च 2008 अंक में संकलित सामाग्रियों के संबंध में श्री अरविंद जी अपने संपादकीय में स्‍वयं लिखते हैं - पहली कहानी ‘हे राम’ (सुशांत प्रिय) भागीरथी प्रसाद की कहानी है जो अपनी कॉलोंनी की गंदगी की सफाई करना चाहता है लेकिन इसके चलते पागल करार कर दिया जाता है । मंगला रामचंद्रन की कहानी ‘सजायाप्‍ता’ उस बेटे की कहानी है जो एक गलत धारणा को मन में पाल कर अपने पिता को गंगा घाट पर छोड आता है लेकिन इस भयंकर गलती की सजा से बच नहीं पाता । अगली कहानी ‘बस चाय का दौर था ... ‘ में राजेन्‍द्र पाण्‍डेय नें रेखांकित किया है कि तथाकथित बुद्धिजीवी अधिकांशत: चाय के दौर के साथ तमाम मुद्दों पर मात्र चर्चा ही करते हैं , बस इससे अधिक कुछ नहीं । डॉ.वी.रामशेष की कहानी ‘मध्‍यान्‍तर’ एक अजीब स्थिति की कहानी है, दोस्‍त की मृत्‍यु के कारण एक खुशनुमा शाम बिताने की आकाश की सारी प्‍लानिंग धरी की धरी रह जाती है, या फिर यह दुखद हादसा एक मध्‍यांतर ही था । राजेन्‍द्र वर्मा की कहानी ‘रौशनी वाला’ उस व्‍यक्ति की कहानी है जो पढाई में अच्‍छा होने के बावजूद गरीब होने के नाते अपनी जिन्‍दगी में रोशनी नहीं भर सका । यह गौरतलब है कि इस अंक में श्रीमति मंगला रामचंद्रन को छोडकर अन्‍य रचनाकारों की कहानियां ‘कथाबिंब’ में पहली बार जा रही है ।


साहित्‍य के इतिहास में संपादन कला का सूत्रपात ‘सरस्‍वती’ से प्रारंभ है और अन्‍यान्‍य पत्रिकाओं के माध्‍यम से आज तक जीवित है । इन्‍हीं पत्रिकाओं नें हिन्‍दी साहित्‍य को पुष्पित व पल्‍लवित किया है एवं सृजन को आयाम दिया है । इस संबंध में श्री अरविंद जी का प्रयास सराहनीय है । प्रसिद्ध रचनाकार हरदयाल नें ‘विषयवस्‍तु’ के लघुपत्रिका मूल्‍यांकन अंक सितम्‍बर 86 में लिखा है ‘अक्‍सर बडी पत्रिकाओं नें बडे लेखकों की छोटी रचनाएं और लघु पत्रिकाओं नें छोटे लेखकों की बडी रचनाएं छापी हैं । बडी पत्रिकाएं तो इतनी ज्‍यादा बासी पडती हैं कि रद्दी में बिकना ही उनकी नियति है, इसलिये सहीं अर्थों में लघु पत्रिकाओं का ही प्रसार होता है और वही लेखक को यशस्‍वी बनाती है ।' मुम्‍बई से प्रकाशित यह पत्रिका इतने कम कीमत में इतनी अच्‍छी सामाग्री प्रस्‍तुत कर रही है जिसके लिये प्रधान संपादक श्री अरविंद जी को हमारी शुभकामनायें ।



कथाबिंब – कथा प्रधान त्रैमासिक
प्रधान संपादक – डॉ. माधव सक्‍सेना ‘अरविंद’
सदस्‍यता शुल्‍क – आजीवन 500 रू., त्रैवार्षिक 125 रू.,
वार्षिक 50 रू.

(वार्षिक शुल्‍क 5 रू. के डाक टिकटों के रूप में भी स्‍वीकार्य)
संपर्क –
kathabimb@yahoo.com
ए 10, बसेरा, आफदिन क्‍वारी रोड, देवनार, मुम्‍बई 400088
फोन – 25515541, 09819162648




प्रस्‍तुति – संजीव तिवारी

अश्लीलता : शर्मसार अंतर्कथा

रेलवे क्रासिंग बंद होते ही मैनें बाईक में ब्रेक लगाया, बाईक गेट के पास आकर रूक गई । बाईक में मेरे पीछे बैठे मित्र नें मेरे कमर में अपने हाथ को दबाते हुए धीरे से कहा ‘ये देख !’ मेरी नजर वहीं पडी जिसे वह दिखाना चाहता था । मेरे बाईक के आगे एक लडकी अपने स्‍कूटी में बैठी थी और क्रासिंग बंद होने के कारण इत्‍मीनान से मोबाईल में बतिया रही थी । मैनें उस पर उडती नजर डालते हुए मित्र से कहा ‘हॉं देख लिया !


‘अरे नहीं देखा यार, ठीक से देखो !’ उसने फिर बुदबुदाया । अब मैनें उसे ध्‍यान से देखा, नई स्‍कूटी में वह अपने दोनों पैरों को सडक में जमाए बैठी थी, कान में मोबाईल चिपका था । जीन्‍स जैसा कुछ उसने पहन रखा था, उपर जो पहनी थी उसे आजकल शार्ट शर्ट कहा जाता है । उसकी पीठ हमारी ओर थी, शार्ट शर्ट कुछ ज्‍यादा ही शार्ट थी, जींस के उपर का पीठ पूरा उघडा हुआ दिख रहा था और जींस के कमर पट्टे के नीचे का अंडरवियर भी सीट में बैठने और टांग के फैलने के कारण नजर आ रहा था, कूल्‍हे की विभाजन रेखा स्‍पष्‍ट नजर आ रही थी । मैनें नजर दूसरी ओर करते हुए मित्र से कहा ‘बडी खराब सोंच है यार तेरी, बच्‍ची है, यह कोई बडी चीज नहीं आजकल यह तो आम है !’ मित्र हंसने लगा ‘ये तुझे बच्‍ची लगती है, 24-25 साल से कम नहीं है !


तब तक ट्रेन गुजर गई और क्रासिंग खुल गया । मैं गाडी स्‍टार्ट कर आगे बढ गया, वह लडकी भी फर्राटे फरते हुए ट्रैफिक के बीच से युवा बाईक सवार की तरह कट मारते हुए चली गई । मैनें विषय को वासना से दूर होने पर राहत की सांस ली ।


आफिस में कुछ अतिरिक्‍त समय मिलने पर अपनी कलम घसीटी डायरी में लिखने लगा इसी बीच मेरा जूनियर किसी काम से मेरे पास आया तभी एक फोन आ गया और मैं फोन में व्‍यस्‍त हो गया । डायरी यू हीं खुली पडी थी, जूनियर नें खुले पन्‍नो का रस लिया । फोन रखने के बाद मैनें जूनियर की ओर देखा, वह मुस्‍कुराने लगा । मैनें पूछा ‘क्‍या हुआ ?’ ‘कुछ नहीं सर आपकी लेखनी पढ रहा था !’ उसने कहा । ‘तो ?’ मैनें कहा । ‘शर्म आ रही है पढते हुए !’ उसने कहा । ‘किस पर ? अपने आप पर .... उस लडकी पर ..... मेरे मित्र पर .... या मुझ पर .... ?’ मैंनें मुस्‍कुराते हुए पूछा । वह भी मुस्‍कुराता रहा उसने जवाब नहीं दिया । उसका मौन कह रहा था कि उसे शर्म मुझ पर आ रही थी जो ऐसा अश्‍लील लिख रहा था ।


उससे बहस करना निरर्थक था सो मैं अपने आप से बात करने लगा । ‘इसे पढते हुए मेरे पाठक को शर्म आ रही है !’ ‘इस हकीकत को देखते हुए मुझे भी शर्म आ गई थी !’ ‘इसे लिखते हुए शायद मुझे शर्म नहीं आई वो इसलिये कि जिसका शरीर उधडा वह उसी हालत में फर्राटे भरते स्‍कूटी में चली गई अब शर्मसार मुझे क्‍यों होना चाहिए ?’ ‘क्‍या इसे, मुझे नहीं लिखना चाहिए ?’ ‘हॉं, क्‍योंकि यह अश्‍लील लेखनी होगी !’ ‘..... पर ऐसे लडकियों को कौन समझायेगा जो खुलेआम अश्‍लीलता परोस रही हैं ?’ काफी हलचलों के बाद अंत में मैनें इसे अपने ब्‍लाग में पब्लिश करने का फैसला कर ही लिया ।

संजीव तिवारी

मोटीवेशन : अंर्तकथा

‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहता, तीस तारीख तक मुझे हर ब्‍लाक से एक केस चाहिए ।‘ रौबदार आवाज में युवा जिलाधीश नें विकास विभाग के बैठक में आये कर्मचारियों एवं स्‍वयंसेवकों को अपना अंतिम शव्‍द कहा और उठ कर चले गये । देर तक मीटिंग हाल में खमोशी छाई रही, फिर मर्यादित शांति पुन: भंग हुई । ‘चार दिन बचा है तीस तारीख को कैसे हो पायेगा ?’ विकास विभाग के निचले स्‍तर के अधिकारी नें टेबल में लगे माईक के बटन को पुश करते हुए कहा । अब मीटिंग का जिम्‍मा उप जिलाधीश स्‍तर के अधिकारी के पाले में था उसने बात को अनसुना करना चाहा पर दूसरे अन्‍य अधिकारियों नें भी इसपर असहमति जताई, सो उन्‍हें उसी मुद्दे पर फिर आना पडा ।


‘क्‍यों नहीं हो पायेगा ? .... दस लाख के रोलर के लिये उन्‍हें अस्‍सी प्रतिशत अनुदान हम दे रहे हैं यानी आठ लाख रूपये......... बाकी की राशि बैंक ऋण के रूप में दे रही है । रोलर को ग्रामीण सडक योजनाओं में काम पर लगाकर बरसात के पहले ही इस काम के बदले लगभग दो लाख के भुगतान का मौखिक आश्‍वासन कलेक्‍टर साहब ने दे ही दिया है उसके बाद का इनकम समूह का है आप लोगों को कनविंस करें । बार बार मुझे यह बात कहना न पडे आप सभी लोगों को पहले भी बतलाया जा चुका है ।‘ छोटे साहब के शव्‍दों में भी वही आदेशात्‍मक पुट था । बैठक में शामिल सरकारी कर्मचारी व अधिकारी अपने सरकारी चितपरिचित व्‍यक्तित्‍व और स्‍वभाव के साथ अनमने से अपने छोटे छोटे से बैग थामें बैठे थे जबकि वहां संपूर्ण जिले के विकास से संबंधित आवश्‍यक मीटिंग चल रही थी ।


मीटिंग तीस तारीख को पुन: मिलने के आदेश के साथ समाप्‍त हो गई । मीटिंग हाल के सामने विकास विभाग के ग्रामीण स्‍तर के अधिकारी इस आदेश के विरोध में एक दूसरे से बतियाते रहे पर खुल कर विरोध प्रदर्शित करने का साहस किसी में नहीं था सो सब अपनी अपनी गरीबी का स्‍वांग भरते पुरानी मोटर साईकिलों को स्‍टार्ट कर अपने घर की ओर चले गये ।


दूसरे दिन मैं भी सुबह से अपने नगर के लिये निकला, रास्‍ते में लगभग एक दो किलोमीटर सडक खराब था, वहां उसका संधारण कार्य चल रहा था, निर्माण में मजदूर, रोलर व ट्रक लगे थे । मैं उत्‍सुकतावश गाडी खडी कर सुस्‍ताते मजदूरों के पास चला गया । नाम गांव एवं कार्य के विभाग के संबंध में पूछते हुए मैनें ठेकेदार व रोलर ट्रक मालिकों के संबंध में भी पूछा । मजदूरों में से डामर लगे लांग बूट पहने एक तेज ग्रामीण मजदूर नें मेरी उत्‍सुकता को देखकर बतलाने लगा कि दस लाख का यह रोलर है और यह पिछले साल लिया गया था, अब तक इस रोलर के सहारे ठेकेदार नें पांच लाख कमा लिया है । मैनें मजाक में ही उस रोलर के मालिक का नाम पूछा । उसने इस रोलर और काम में लगे दो ट्रकों के मालिक का नाम बताया । नाम सुनकर मैं चकरा गया, ये उसी व्‍यक्ति के थे जिसने अपने व्‍यक्तित्‍व में सारे जहां की गरीबी लादे कलेक्‍टर मीटिंग में कहा था कि कैसे हो पायेगा ।


मैं उन मजदूरों से आत्‍मीयता बढा कुछ और प्रश्‍न पूछता रहा और उनको उत्‍साहित करते हुए कहा कि तुम लोग स्‍वयं ऐसे रोलर के मालिक क्‍यों नहीं हो सकते ? उन लोगों नें मेरी बात हंसी में उडा दी । मेरे जोर देने पर दूर में बैठी एक महिला पास आकर बोली ‘जानते हैं बाबू, सरकार इसके लिये मुफत में आठ लाख रूपिया देगी पर........ इसे पाने के लिये फारम भरना होगा .... और फारम भरने का साहब एक लाख रूपिया मांग रहे हैं ........ हम गरीब लोग कहां से पायेंगें साहेब इतना रूपिया ? साहब कहते हैं कि फोकट में तुमको आठ लाख दिलवाउंगा तो मुझे भी तो कुछ मिलना चहिए !’ मैनें उन्‍हें समझाया कि पैसे सरकार दे रही है बिना घूस दिये खुद खोज रही है तुम लोगों को । ‘...... पर कागज तो वही साहेब बनायेगा ना ?’ उस महिला मजदूर नें कहा । ‘हॉं वही बनायेगा लेकिन एक लाख तो क्‍या एक रूपया भी नहीं देना होगा ।‘ मैनें कहा । ‘......... जाओ बाबू ऐसे कहने वाले कितने आये कितने गये, मुझे इस रोलर के चक्‍के में पानी डालते मजूरी करते बरसों गुजर गए, हम ऐसे ही ठीक हैं ।‘ उस महिला नें कहा ।



तीस तारीख, मीटिंग हाल में सभी लोग सिर झुकाये बैठे थे, युवा जिलाधीश नें झटके के साथ दरवाजा खोलकर हाल में प्रवेश किया । सीट पर बैठते ही उन्‍होंने पूछा ‘कितने केस आये ?’ सभी चुप थे । उन्‍होंनें फिर अधिकारियों का नाम ले लेकर पूछा, सभी अपनी अपनी समस्‍यायें गिनाते रहे कि वे कैसे दिन रात एक कर दिये पर लोग ‘मोटीवेट’ हुए ही नहीं । ‘अब कैसे करेंगें ? पंद्रह तारीख को सीएम साहब का कार्यक्रम है उसमें हमें चार रोलर की चाबी सीएम साहब के हाथों दिलवाना है ?’ सभी के सिर झुके ही थे सब नें अपने अपने चेहरों पर पूरी निष्‍ठा से कार्य करने के बाद भी कार्य नहीं बन पाने के विषाद को चिपकाया हुआ था ।

युवा जिलाधीश नें गहरी सांस ली और घंटी बजाई । मैं चार ग्रामीण महिलाओं के साथ मीटिंग हाल में आया । ‘नमस्‍ते साहेब !’ चार में से एक महिला नें विकास विभाग के उस अधिकारी और अपने तथाकथित मालिक को पहचान कर सकुचाते हुए बोली और चारो कोने में खडे हो गये मैं गोलमेज के एक सीट पर जाकर बैठ गया । वह कर्मचारी कुछ सकुचा गया किन्तु उस महिला को नहीं पहचानता ऐसी मुद्रा में बैठा रहा ।


‘ये चारो केस जीवित आप लोगों के सामने हैं, पता नहीं क्‍यूं आप लोगों के अथक प्रयास के बावजूद भी ये कैसे ‘मोटीवेट’ नहीं हो पाये, जबकि ये तो बरसों से अपनी गरीबी से संघर्ष कर रहे हैं । मुझे शर्म आती है आप लोगों को अपना मातहत कहते हुए ........ जानते हो मैं आप लोगों को सस्‍पेंड कर सकता हूं ...... पर तुम क्‍या जानों सस्‍पेंड होने की सजा क्‍या है और दुख क्‍या .......’ जिलाधीश तैश में बहुत कुछ बोलते रहे जैसे ही उनकी वाणी नें विराम लिया । कोने में खडी एक महिला नें पैर के अंगूठे से टाईल्‍स के फर्श को कुरेदने का प्रयास करते हुए कहा ‘गरीब के पईसा ल खाहू त कीरा पर के मरहू !


पूरा हाल हंसी से गूंज गया, महिलायें सहम गयीं । जिलाधीश नें अपनी मुस्‍कुराहट को मर्यादाओं में समेटते हुए दो ट्रक और रोलर मालिक उस सरकारी अधिकारी की ओर देखा । वह मुह खोलकर अट्टहास लगा रहा था ।

संजीव तिवारी

तीन करोड ............. पर्यावरण दिवस का ये कैसा तोहफा

हैलो.... हैलो..... हॉं क्या हुआ ?, कहॉं का ..... बारसूर फीडर का ? ..... अरे बाप रे .....
बातें लम्बी चलती रही बीच बीच में कई कई बार फोन कटा और बातें चलती रही कि कहां कहां का लाईन ध्वस्त हुआ । एयर कंडीशन्ड रेस्तरॉं में भी पसीने से भर भर जा रहे माथे को एक अंगुली से बार बार पोंछते हुए वह अपने दोनों मोबाईलों से अपने मातहतों को निर्देश देता रहा एवं उधर से प्राप्त जवाबों से बार बार झुंझलाता रहा ।

'क्या हुआ साहब' मैंनें पूछा । यद्यपि फोन में हो रहे चर्चा के अनुसार मुझे बाकया सब समझ में आ गया था ।
'फिर उडा दिये यार बिजली टावर को ....' उसने बदहवासी के साथ कहा ।
मैनें पानी का गिलास उनकी ओर बढाते हुए उन्हें संयत रहने का निरर्थक सलाह दिया । वे उठने लगे ।
'सर खाना लग रहा है ।'

'नहीं भाई सब मूड खराब हो गया' उसने उठते हुए कहा और अपने साथ आये चार कर्मचारियों को भी चलने को कहा । मेरे खाने पर अनुनय नें उन्हें रोक लिया ।
'सर पिछली बार भी तो उडा दिये थे ना इन लोगों नें टावर को .... ब्लैक आउट ........ बस्तर ।' मैनें बात को कुछ सामान्य करने के उम्मीद से कहा ।
'हां यार कुछ वैसा ही बडा लफडा हुआ है ।' साहब नें कहा ।
'क्या मिलता होगा सर इन्हें बिजली टावरों को उडा कर ?' मैनें पूछा ।
'पिछली बार पांच करोड रूपये खर्च हुए थे, बिजली को पुन: बहाल करने में .... ' साहब नें बताया ।


'हॉं वो तो हुआ ही होगा ... पर इससे इन्हें क्या, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुचाना आजकल विरोध का अच्छा माध्यम है ।' मैनें कहा ।
' यही तो तो मूल है बाबू, जानते हो पिछली बार जो बिजली की बहाली में पैसे खर्च हुए वे यदि अन्य इलाके में खर्च होता तो कितना होता ? .... ज्यादा से ज्यादा दो करोड ठेकेदारों के अधिकतम लाभ सहित ।'
'तो तीन करोड ? ..... ' मेरे आंखों में प्रश्न थे ।
' हॉं ये तीन करोड उन्हें ही गये, ठेकेदारों के माध्यम से ।'
मैंनें पनीर चिल्ली का प्लेट उनकी ओर सरकाया और चटनी अपनी ओर खींच लिया

भाषा की लडाई कब तक : बीच बहस में संस्कृत

अभी कुछ दिनों से छत्‍तीसगढ में प्राथमिक स्‍तर पर भाषा के अध्‍ययन की अनिवार्यता पर एक विमर्श की शुरूआत समाचार पत्रों के सम्‍पादकीय पन्‍ने से हो रही है जो सराहनीय है । इस सम्‍बंध में पहला लेख दैनिक भास्‍कर में वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंदकिशोर शुक्‍ल जी का प्रकाशित हुआ जिसमें उन्‍होंनें अपने शीर्षक से ही विमर्श को जन्‍म दिया । ‘संस्‍कृत के बजाय शिक्षा छत्‍तीसगढी में क्‍यों नहीं ?’ इस लेख में नंदकिशोर जी शुक्‍ल नें पहली से लेकर पांचवीं तक अनिवार्य विषय के रूप में संस्‍कृत पढाये जाने के सरकारी निर्णय का विरोध किया गया है । उनका मानना है कि ऐसा ही निर्णय छत्‍तीसगढी भाषा के लिये क्‍यों नहीं लिया गया जबकि 10 अक्‍टूबर 2007 को मुख्‍यमंत्री के नेतृत्‍व में हुए बैठक में यह सर्वसम्‍मति से निर्णय ले लिया गया कि क्षेत्रीय बोलियां जिनमें हल्‍बी, गोडी, गुडखू, भतरी व जसपुरिहा में पढाई प्राथमिक स्‍तर पर आरंभ की जायेगी । इस लेख में नंदकुमार शुक्‍ल जी नें सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्‍यक्ष व राष्‍ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद के राष्‍ट्रीय पाठ्यक्रम समिति के अध्‍यक्ष प्रोफेसर यशपाल के उस वाक्‍यांश का भी उल्‍लेख किया जिसमें यशपाल जी नें गुदडी के लालों को बाहर निकालने वाली शिक्षा व्‍यवस्‍था पर बल दिया है । छत्‍तीसगढी भाषा को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा में लेने के बजाय संस्‍कृत व अन्‍य क्षेत्रीय बोलियों को प्राथमिक स्‍तर पर अनिवार्य किया गया है जिसके लिये उन्‍होंनें लेख में दुख जताया है कि छत्‍तीसगढ के दो करोड निवासियों के साथ यह षडयंत्र है ।


इस लेख के बाद हरिभूमि के यशश्‍वी युवा संपादक व हिन्‍दी के विचारवान लेखक संजय द्विवेदी जी नें अपने समाचार पत्र हरिभूमि के संपादकीय पन्‍ने पर एक लम्‍बा लेख ‘भारतीय भाषाओं को लडाएं, अंग्रेजी को राजरानी बनांये’ लिखा जिसमें नंदकुमार शुक्‍ल के लेख पर विरोध जताते हुए संस्‍कृत के विरोध में उठते स्‍वरों की आहट व छत्‍तीसगढी के लिये क्षेत्रीय भाषाओं से छत्‍तीसगढी के टकराव की मानसिकता की निंदा की वहीं देव भाषा संस्‍कृत के लिये, लिये गए निर्णय को उचित ठहराया । इसी क्रम में साहित्‍यकार व शिक्षाविद एवं वरिष्‍ठ हिन्‍दी ब्‍लागर जय प्रकाश ‘मानस’ का लेख भी आया जिसमें उन्‍होंनें भाषा, बोली व भाषा परिवार के बीच सामन्‍जस्‍य पर अपने तर्क रखे हैं । भारतीय भाषा परिदृश्‍य, भाषिक विविधता एवं मातृभाषा के अध्‍ययन के साथ द्विभाषी शिक्षा पर जोर देते हुए उन्‍होंनें भी नंदकिशोर शुक्‍ल जी के संस्‍कृत विरोध की निंदा की है इसके साथ ही उन्‍होंनें जनजातीय क्षेत्रीय बोलियों के विरोध के फलस्‍वरूप वनांचल में स्थिति के और बिगड जाने का अंदेशा जाहिर किया है ।


इस लेख विमर्श में आज मुझे आशा थी कि कोई तो होगा जो नंदकिशोर शुक्‍ल के उक्‍त लेख के पक्ष में, किंचित समर्थन में अपना विचार प्रस्‍तुत करेगा किन्‍तु आज इस श्रृंखला में संस्‍कृत के प्रकाण्‍ड विद्वान एवं छत्‍तीसगढ में संस्‍कृत के ध्वज वाहक मनीषी डॉ. महेश चंद्र शर्मा जी का दमदार आलेख आया । इसमें कोई दो मत नहीं कि उन्‍होंनें संस्‍कृत अध्‍ययन के संबंध में तर्कपूर्ण तथ्‍य प्रस्‍तुत किये हैं एवं छत्‍तीसगढी व संस्‍कृत के आपसी अंतरसंबंधों को स्‍पष्‍ट किया है । एक संस्‍कृत के विद्वान से ऐसे लेख की अपेक्षा की ही जा सकती है । लेखक नें अपनी प्रसंशा का शक्‍कर व संस्‍कृत के नीबू से हरिभूमि के संपादक संजय द्विवेदी का पक्ष लेते हुए शरबत पेश किया है एवं नंदकिशोर शुक्‍ल के संस्‍कृत विरोधी स्‍वर का विरोध किया है । लेख रोचक है पूरी तरह मिठास समेटे डॉ.शर्मा जी के व्‍यक्तित्‍व जैसा ही ।


छत्‍तीसगढी भाषा आंदोलन को संवैधानिक मान्‍यता दिलाने के लिये प्रयासरत विभिन्‍न गुटों में से कथाकार डॉ.परदेशीराम वर्मा जी के भीड का मैं भी हिस्‍सा रहा हूं । इस वैचारिक आंदोलन में मेरे कुछ मित्रों नें मेरा खुल कर विरोध किया था उनका तर्क यह था कि छत्‍तीसगढी को संवैधानिक दर्जा देने के पहले यहां के दो करोड निवासियों के दिलों में छत्‍तीसगढी को मान्‍यता दिलाना ज्‍यादा आवश्‍यक है । मेरा मानना यह रहा है कि इस दो करोड निवासियों में से अस्‍सी प्रतिशत जनता गांवों में रहती है और वहां अब भी यह भाषा राज करती है इसलिये बाकी बचे बीस प्रतिशत जो हिन्‍दी भाषी हैं वे शहरों में रहते हैं और जब संपूर्ण छत्‍तीसगढ के संबंध में हम विचार कर रहे हों तो हमें गांवों के संबंध में ही सोंचना है । फलत: मैं स्‍वयं अपने तर्कों को बिना विमर्श के स्‍वीकार कर लेता था । तब हमें यह अंदेशा भी नहीं था कि राजभाषा घोषित होने के बाद छत्‍तीसगढी भाषा पर इस कदर छीछालेदर आरंभ हो जायेगी, यद्धपि यह आभास तो था कि आंदोलन के लिए गुट और भीड के पीछे कुछ न कुछ राजनैतिक स्‍वार्थ तो अवश्‍य है ।


इस श्रृंखला में जिन भाषा परिवारों का बार बार उल्‍लेख आया है वे आरण्‍यकी संस्‍कृति के भाषा परिवार के अंग हैं । आर्य, द्रविड के साथ मुंडा भाषा परिवारों के द्वारा अपने भौगोलिक स्थिति में उपस्थिति के साथ ही सर्वमान्‍य रूप से छत्‍तीसगढी भाषा को एक महानद के रूप में स्‍वीकार किया गया है जिसमें अन्‍य बोलियां एवं भाषायें छोटी छोटी नदियों के रूप में अपनी सांस्‍कृतिक तरलता उडेल रही हैं ।


छत्‍तीसगढी के सामने हल्‍बी, गोडी, गुडखू, भथरी व जसपुरिया भाषाओं को खडा करना विरोध को अनावयश्‍क बढाना है । हमें अपनी इन बोलियों का सम्‍मान करना चाहिये एवं इसे समृद्ध करने हेतु हर संभव प्रयास करना चाहिए । वर्तमान दौर में आरण्‍यक संस्‍कृति अपने मूल अरण्‍य से दूर होती जा रही है । वनों में नागरी संस्‍कृति का निरंतर प्रहार हो रहा है यदि हम अपनी इन भाषाओं की ओर ध्‍यान नहीं देंगें तो मुंडा भाषा परिवार की बोली ‘गदबी’ का छत्‍तीसगढ से जिस प्रकार ह्रास हो गया वैसे ही हमारी अन्‍य बोलियां भी समाप्‍त हो जायेगी । भाषा विज्ञानियों नें माना है कि द्रविड परिवार की बोली ‘परजी’ व ‘ओराव’ तो अपनी अंतिम यात्रा पर है वहीं ‘गोडी’ को भी समय रहते बचाने का प्रयास नहीं किया गया तो वह भी समाप्‍त हो जायेगा इसलिये इसके संरक्षण एवं विकास के लिए हर संभव प्रयास किये जाने चाहिए न कि इन भाषा परिवारों का विरोध ।


संस्‍कृत के विरोध का संभवत: भारत भर में यह पहला मामला है । लोग अंग्रेजी के विरोध लिये लिखते लिखते थक गये हैं, जुटते जुटते बिखर गये हैं । हिन्‍दी प्रेमियों नें बडे उत्‍साह के साथ अपनी आदि भाषा संस्‍कृत पर अपनी श्रद्धा प्रस्‍तुत की है पर हिन्‍दी से ही पल्‍लवित व पुष्पित छत्‍तीसगढी के लिए संस्‍कृत भाषा के विरोध के स्‍वर छत्‍तीसगढ उठे यह कुछ अटपटा सा लगता है ।


हमें आशा है आगे इस कडी में एक से एक विद्वानों के लेख हरिभूमि में पढने को मिलेंगें एवं सभी के पक्षों पर जानकारी प्राप्‍त होगी किन्‍तु देखने में यह आता है कि समाचार पत्रों के माध्‍यम से साहित्‍यकारों की यश पताका चहुं ओर फैलती है इस कारण साहित्‍यकार सामान्‍यत: समाचार पत्र से वैचारिक मतभेद मोल नहीं लेता । इस मसले में समाचार पत्र नें सराहनीय मुद्दे को उठाया है इस कारण उनसे मतभेद या उनके विपक्ष में विचार तो प्रस्‍तुत होने से रहे किन्‍तु वैचारिक मंथन के लिये इस विमर्श में बतौर पाठक शामिल होने में भी आनंद है ।

संजीव तिवारी

मछली का मायका : मन और देह की संवेदनाओं का संग्रह

‘इन कथाओं के देर से प्रकाशित होने का एक बडा कारण इनमें ‘देह’ की उपस्थिति भी है । बीसवीं सदी के पांचवें दशक तक हिन्दी कहानी में दैहिक संवेदनाओं से परहेज ही किया जबकि उस समय भी उर्दू कथा नें देह को ‘मन’ की तरह ही तरजीह दी । हिन्‍दी कथा में देह छठवें दशक में प्रवेश पा सकी लेकिन अपने समग्र प्रभाव में वह उर्दू की तरह संवेदनात्मक आज तक नहीं हो सकी । अपने लेखन से मैं संवेदनात्मक धरातल पर मन और देह को अलग नहीं कर पाया । मुझे लगा कि दैहिक समीकरणों से उपजने वाली संवेदनायें किसी भी स्तर पर जीवन की अन्य विडम्बनाओं से उपजने वाली उंवेदनाओं से कम पीडादायक नहीं होती ।‘ यह शव्द हैं पंजाबी एवं हिन्दी के कवि, व्यंगकार व कथाकार गुलबीर सिंह भाटिया के जिन्होंनें अपने सर्वश्रेष्ठ 19 कहानियों का संग्रह ‘मछली का मायका’ विगत दिनों प्रकाशित किया है । मंटो और बलराज मेनरा की कहानियों के नजदीकी का एहसास कराती इन कहानियों में श्री भाटिया जी नें देह और मन के समीकरणों का बेहतर चित्र खींचा है ।
हरसूद के उजडे जीवन का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती कहानी ‘मछली का मायका’ को इस संग्रह का नाम दिया गया है संग्रहित सभी कहानियों में जीवन हरसूद के इंशान और मछलियों की तरह तडफती नजर आती है । इस संग्रह में संग्रहित अधिकांश कहानियां सातवे व आठवें दशक में सारिका, नागमणि, प्रीत लडी, पंजाबी डाईजेस्ट, नंवा साहित्य, कंवल, सरदल आदि हिन्दी एवं पंजाबी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं । श्री भाटिया जी की कहानियों पर पंजाबी एवं हिन्दी साहित्यकार कृष्ण कुमार रत्तू जी नें समीक्षात्मक उद्बोधन देते हुए कहा था ‘श्री भाटिया उन रचनाकारों में से हैं जो अपने पात्रों का केवल चित्रण ही नहीं करते बल्कि उनकी पीडा को जीते भी हैं । उनकी कहानियां दर्द के रिश्तों के ऐसे कोलाज हैं जिन्हें नमन करने को जी चाहता है ।‘
संग्रहित कहानियों में कथाकार संवेदनाओं का ऐसा अजश्र धार बहाता है कि हृदय इसमें बार बार डूबता उतराता है । इन कहानियां में उर्दू, पंजाबी और हिन्दी की मिलीजुली परम्पराओं का दर्शन होता है । इनकी चर्चित कहानियों में 1976 में लिखी गई और अमृता प्रीतम की प्रिय कहानी ‘वह और वह’ एवं नारी संवेदनाओं की मार्मिक कहानी ‘चिथडा’ से कई कई बार हमारा साक्षातकार हुआ है व गुलबीर सिंह भाटिया के नाम के साथ ही साहित्य बिरादरी के लोगों के जुबान पर कई कई बार इन कहानियों का नाम उभरा है ।
इस संग्रह में विविध आयामों में समाज के विभिन्न वर्गों के विद्रूपों पर प्रहार करते हुए गुलबीर सिंह जी नें नारी संवेदनाओं के साथ ही बाल मन का भी हृदयस्पर्शी चित्रण किया है जिनमें 1983 में लिखी गई ‘फूफाजी फिर आये हैं’, 1976 में लिखी गई ‘मोंगरी’ व 2006 में लिखी गई ‘एक काफी एक चाय’ जैसी कालजयी कहानियां हैं । अलग अलग समय पर लिखी इन कहानियों में कथाकार के उम्र का प्रभाव कहीं भी नहीं झलकता चाहे वह युवावस्था 1977 में लिखी गई कहानी ‘आखरी मौसम’ हो या साठवें पडाव 2005 में लिखी गई कहानी ‘मछली का मायका’ हो ।
इन कहानियों में प्रेम के भाव, ढलते उम्र के पात्रों में भी अपने पूर्ण युवा रूप में उपस्थित है वहीं परिपक्वता अपने मूल उम्र के अनुसार ही प्रदर्शित है । यद्यपि गुलबीर सिंह जी ‘एक काफी एक चाय’ में उम्र के अंतिम पडाव में अपनी अपनी गृहस्थी बसा चुके प्रेमी प्रेमिका के काफी हाउस में मिलन पर कहते हैं ‘जब भविष्य के प्रति मोह समाप्त होने लगे तब मनुष्य अतीत की ओर झांकता है ।‘ गुलबीर सिंह जी की ये कहानियां वास्तव में अतीत के दस्तावेज हैं, जिसमें उन्होंनें संपूर्ण मनुष्यता को न केवल झांका है बल्कि दर्द और उत्पीडन को खुले आसमान में सरेआम किया है ।
प्रस्तुति - संजीव तिवारी


कहानी संग्रह – मछली का मायका
कहानीकार – गुलबीर सिंह भाटिया (मो. 094255 55519)
प्रकाशक – श्री प्रकाशन, दुर्ग
वितरक – भाटिया बुक सेंटर, कचहरी रोड, दुर्ग फोन – 0788 232323236
मूल्य - 125 रूपये

लेबल

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