होसियार खबरदार आपका बेबसाईट हैक हो सकता है

खबर है कि छत्‍तीसगढ के पूर्व मंत्री बदरूद्दीन कुरैशी नें कल दुर्ग में प्रेस वार्ता लेकर आरोप लगाया कि दुर्ग लोकसभा की प्रत्‍यासी सुश्री सरोज पाण्‍डेय नें अपने वेबसाईट में भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू के संबंध में झूठा एवं मनगढंत आरोप लगयाया है । बदरूद्दीन कुरैशी नें आगे कहा कि यह साजिस के तहत् पं.नेहरू पर झूठा आरोप लगा कर नेहरू परिवार को बदनाम  करने की कोशिस की जा रही है । उन्‍होंनें यह भी कहा कि सरोज पाण्‍डेय की वजूद भी भिलाई स्‍टील प्‍लांट के कारण है एवं भिलाई स्‍टील प्‍लांट का वजूद पं.नेहरू के कारण है । 

बदरूद्दीन कुरौशी नें यह स्‍वीकार किया कि वेब साईड एक अंतर्राष्‍ट्रीय मंच है जिसमें पं. नेहरू को बदनाम किया गया है इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की जावेगी एवं कांग्रेस व क्षेत्र की जनता के द्वारा आन्‍दोलन किया जायेगा। 

अब बदरू भईया को कौन समझाये कि कंच कुमारी सरोज पाण्‍डेय के वेबसाईट के संबंध में बयानबाजी कर वे अप्रत्‍क्ष रूप से उस साईट का प्रचार कर रहे हैं और अपने स्‍वाभिमान को ठेस पहुचा रहे हैं । 

पुछल्‍ला - 

एक पूर्व सांसद के खेमे से नेट में सक्रिय मित्र का मजाकिया फोन आया 
- भईया क्‍या सरोज पाण्‍डेय के बेब साईट को हैक कर उसमें ताराचंद साहू को वोट देने की अपील डाली जा सकती है ?
हमने भी हा हा कहते हुए उस साईट की नब्‍ज टटोली, कुण्‍डली पढी सुरक्षा लूपों को चेक किया । 
खतरा बरकरार था, हमने कहा 
- भाई अवैधानिक काम करने वाले हैकर जरूर कर सकते हैं जिसके संबंध में मुझे जानकारी नहीं है । 
मित्र और हम दोनो देर तक ठहाका लगाते रहे । 

इस साईट के दीप को अमन से जलने दें क्‍योंकि दीप तले अंधेरा होता ही है और इसी अंधेरे में अमन चैन से सोता है । 

संजीव तिवारी

सर्वश्रेष्‍ठ टिप्‍पणीकार ब्‍लागर डॉ.चंद्रकुमार जैन

एक अप्रैल को प्रकाशित छत्‍तीसगढ के एक समाचार पर बरबस निगाहें जम गई क्‍योंकि समाचार हमारे ब्‍लाग जगत के प्रिय, राष्ट्रपति-पदक एवं छत्तीसगढ़ राज्य शिखर सम्मान से विभूषित  डॉ.चंद्रकुमार जैन जी से संबंधित था । डॉ.जैन के ब्‍लाग का अवलोकन मैं उनके दूसरे पोस्‍ट से ही कर चुका था उसके बाद मेरे नेट पर सक्रिय रहने तक लगभग प्रत्‍येक दिन मैं उनके ब्‍लाग का अवलोकन करता था एवं अपेक्षा करता था कि उनकी टिप्‍पणी मुझे मिले, उनकी दो चार टिप्‍पणिया मुझे आर्शिवाद के रूप में प्राप्‍त भी हुई हैं फिर मैं अनियमित रहने लगा सो उनके ब्‍लाग का अवलोकन नियमित नहीं कर पाया । उनके संबंध में मुझे पहले-पहल संजीत त्रिपाठी जी नें यह जानकारी दी कि वे उनके पुराने पोस्‍टों पर भी टिप्‍पणियां कर रहे हैं और संजीत जी नें मुझसे उनका फोन नम्‍बर भी मांगा, किन्‍तु मैं इन मामलों में बिल्‍कुल मस्‍त मौला हूं ब्‍लागों के उदगम समय से निरंतर अवलोकन करने के बावजूद भी ब्‍लागर से तात्‍कालिक संबंध बना पाने में किंचित सुस्‍त । अत: मेरे पास उनका नम्‍बर नहीं था । बाद में संजीत जी को उनका नम्‍बर भी मिला और अजीत वडनेरकर सहित सभी ब्‍लाग मित्रों से संजीत जी की बातें भी होती रही है ।

छत्‍तीसगढ के साहि‍त्तिक बिरादरी में डॉ.जैन जी का नाम सम्‍मान से लिया जाता है, सो उनके संबंध में संक्षिप्‍त जानकारी मुझे थी । उनके ब्‍लाग की कविताओं एवं दमदार टिप्‍पणियों नें उनका पूर्ण परिचय करा दिया था। उनके संबंध में छपे समाचार को देखकर उत्‍सुकता हुई और मन हुआ कि इस खुशी को मित्रों के साथ बांटा जाए । समाचार ज्‍यों का त्‍यों प्रस्‍तुत है –

राजनांदगांव, 1 अप्रैल । कालेज के डॉ.चंद्रकुमार जैन को अंतरजाल के लोकप्रिय सर्च इंजन गूगल के नियमित पाठक समूह का सदस्‍य बनाया गया है । इसके साथ ही सतत् सार्थक लेखन करते हुए समसामयिक विमर्श में शसक्‍त और प्रभावशाली हस्‍तक्षेप के आधार पर उन्‍हें वर्ष 2008-09 का सर्वश्रेष्‍ठ टिप्‍पणीकार घोषित किया गया है । गौरतलब है कि भोपाल, नई दिल्‍ली, मुम्‍बई, बैंगलूर, कोलकाता सहित विदेशों में रहने वाले कई भारतीय कवि लेखक तथा पत्रकारों नें डॉ.चुद्रकुमार जैन की मर्मस्‍पर्शी लेखनी, कथन शैली के अलावा उनकी संक्षिप्‍त सारगर्भित और व्‍यंजना गुण युक्‍त टिप्‍पणियों को मील का पत्‍थर करार दिया है । प्रिंट और इलैक्‍ट्रानिक मीडिया से ढाई दशक से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जुडे अजित वडनेरकर नें इन तमाम खूबियों का जिक्र करते हुए डॉ. जैन का परिचय नेट पर जारी किया है । उधर प्रख्‍यात कवि-लेखक उदय प्रकाश नें भी डॉ.जैन को संदेश प्रेषित कर उनकी लीक से अलग क्षमता की सराहना की है ।
डॉ.चंद्रकुमार जैन जी को हमारी भी बहुत बहुत शुभकामनायें ।

पुछल्‍ला -

देश के प्राय: सभी समाचार पत्रों में अब ब्‍लागों के संबंध में नियमित स्‍तंभ प्रकाशित हो रहे हैं जिनमें से छत्‍तीसगढ में भी कुछ समाचार पत्र आते हैं किन्‍तु छत्‍तीसगढ से सक्रिय ब्‍लागों का जिक्र छत्‍तीसगढ के प्रिंट मीडिया वाले बहुत कम करते हैं या करना ही नहीं चाहते ।  यहां मैं आदरणीय अनिल पुसदकर जी से क्षमा सहित कहना चाहूंगा कि कुछ फीचर विभाग के तथाकथित पत्रकार  भले ही हिन्‍दी ब्‍लागों के समाग्रियों को कापी कर या फिर उसके विषय वस्‍तु का सहारा लेकर समाचार या कवर स्‍टोरी को रंग दे देंगें किन्‍तु एकाध समाचार पत्र को छोडकर अधिकतम समाचार पत्र वाले संदर्भो  की जानकारी ही नहीं देंते।  ऐसी परिस्थितियों में डॉ.जैन के इस समाचार को समाचार पत्र में पढ कर खुश होना लाजमी है ।

छत्‍तीसगढ में ब्‍लागिया क्रांति

हिन्‍दी ब्‍लागों के द्वारा वैचारिक विमर्श की संभावना के संबंध में लगातार ब्‍लागों में लिखा जा रहा है और ब्‍लाग की इस शक्ति का अंदाजा अब सबको नजर आने लगा है । राजनैतिक हलकों में  भी इस प्रभावशाली माध्‍यम को भुनाने का जुगाड तोड अब आरंभ हो गया है । हाईटेक प्रचार माध्‍यमों के रूप में राजनैतिक दलों के वेब पेज पहले भी अस्तित्‍व में थे जिन्‍हें हाईलाईट करने व उन साईटों में ट्रैफिक बढानें के लिए एडसेंस का भरपूर उपयोग वर्तमान में किया जा रहा है । वेब पेजों के साथ ही प्रत्‍याशियों के ब्‍लाग भी नजर आ रहे हैं, इसी क्रम में छत्‍तीसगढ के रायपुर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्‍याशी भूपेश बघेल का ब्‍लाग अचानक अस्तित्‍व में आया है । हम आशा करते हैं कि भूपेश का यह ब्‍लाग चिरंतन रहे । वैचारिक रूप से जहां तक मैं उन्‍हें जानता हूं इसके अनुसार से वे अध्‍ययनशील व्‍यक्ति है, साहित्‍य  से  उनका जुडाव  रहा है  इस कारण से वे यदि अपने इस दायित्‍व को निभाने का सोंचें तो महीने में आठ दस पोस्‍ट स्‍वयं लिख सकते हैं । पिछले विधानसभा चुनाव में बृजमोहन अग्रवाल  का ब्‍लाग आरंभ हुआ था जिसके संबंध में प्रिंट मीडिया नें भी चर्चा कर हो हल्‍ला किया था किन्‍तु दो चार पोस्‍टों के बाद वह ब्‍लाग भी टांय टांय फिस्‍स हो गया । कम से कम ऐसा तो न हो । 

छत्‍तीसगढ के राजनैतिक गलियारों से जुडे अमित जोगी अरसों से ब्‍लाग लिख रहे हैं जो नियमित है एवं उसके बहुसंख्‍यक पाठक भी हैं । अमित जोगी स्‍वयं नेट प्रयोक्‍ता हैं एवं ब्‍लाग के पोस्‍ट स्‍वयं लिखते हैं, वे अपने ब्‍लाग में छत्‍तीसगढ के ज्‍वलंत मुद्दों व पार्टी के कार्य व्‍यवहार की भी गंभीर समीक्षा करते हैं ।  विगत माह से छत्‍तीसगढ के पूर्व मुख्‍य मंत्री अजीत जोगी नें भी ब्‍लाग लिखना आरंभ कर दिया हैं  जिससे कुछ आश बन पडी है कि अमित जोगी की भांति वे भी अपने ब्‍लाग पर नियमित पोस्‍ट लिखेंगें और हमे शीर्षस्‍थ राजनैतिज्ञों के विचार बिना रिपोर्टरी लाग लपेट के पढने को मिलेगा ।अमित जोगी या अजित जोगी के ब्‍लाग पर नियमिता पर विश्‍वास किया जा सकता है क्‍योंकि वे न केवल ब्‍लाग पर वरन सोसल नेटवर्किंग साईट आरकुट पर भी सक्रिय है ।

भूपेश के अतिरिक्‍त दुर्ग से लोकसभा की प्रत्‍यासी सरोज पाण्‍डेय का वेब साईट भी अचानक अस्तित्‍व  में आया है और बडी खुशी की बात यह है कि इस वेब साईट के प्रमोशन के लिये दैनिक भास्‍कर के मुख्‍य पृष्‍ट पर बाकायदा विज्ञापन भी छपवाया गया है । धीरे धीरे संचार क्रांति का फैलाव विस्‍तृत हो रहा है, शहरों व कस्‍बों के युवा अब अपना अधिकतम समय नेट व पीसी में ही दे रहे है ऐसे में भारी भरकम खर्चे से स्‍टार प्रचारकों की सभा करवा कर, समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवाकर अपनी बात जनता तक पंहुचाने के अतिरिक्‍त प्रचार का कुछ हिस्‍सा इंटरनेट में तो होना ही चाहिए ताकि नेट सेवी जन तक प्रत्‍याशियों की बात पहुच सके ।

पुछल्‍ला - 
आज इस पर गंभीर ब्‍लाग चिंतन करते हुए एक ब्‍लागिया मित्र नें बतलाया कि, पिछले विधान सभा चुनाव के समय कुछ लोगों नें  राजनैतिक दलों के प्रचार प्रमुखों से भेट कर समाचार पत्रों की भांति ब्‍लागों को भी 'मैनेज' करवाने का आफर दिया था  और ब्‍लागों की ताकत समझाने का प्रयास किया गया था किन्‍तु छत्‍तीसगढ के राजनैतिक दलों के मीडिया प्रभारियों को रत्‍ती भर भी भरोसा नहीं था कि ब्‍लाग 'मैनेज' करने के कारण अमेरिका में 'बराक ओबामा' राष्‍ट्रपति बन गये थे  और समाचार पत्रों के सामने ब्‍लागों की कोई अहमियत भी होती है सो ब्‍लागों को घास नहीं डाला गया । और पिछले पोस्‍ट में मैनें लिखा ही था कि छत्‍तीसगढ में बैल घास खाने की जगह नोट खा रहे हैं इसलिये मैने और मित्र नें सोंचा कि बिचारे बैलों के लिए राजनैतिक पार्टियों के प्रचार प्रमुखों का घास सुरक्षित रखा जाए क्‍योंकि रमन सरकार पर आरोप है कि उसने गरीब किसानों को मुफ्त में जो बैल बांटे थे वे बेहद कमजोर थे ।

बैल ने खाये 15 हजार रूपए

खबर है कि छत्‍तीसगढ के नक्‍सल प्रभावित क्षेत्र के दुर्गूकोंदल इलाके के गांव कोडेकुर्से में एक किसान लक्ष्‍मण चुरेन्‍द्र ने अपने खेतों के फसलों को बेंचकर बैंक में पैसा जमा करवाया था । अपनी पत्‍नी के इलाज के लिये उसने विगत दिनों बैंक से बीस हजार रूपया निकाला और गांव जाकर अपनी पत्‍नी को दे दिया । उसकी पत्‍नी उसी समय घर के बैल को बांधने लग गई पैसे को उसने अपने आंचल में बांध लिया, बैल, रूपये उसकी आंचल से मुह मार कर खाने लगा, बैल के मुंह से बडी मुस्किल से लक्ष्‍मण की बीबी पांच हजार छीन पाई बाकी के पंद्रह हजार बैल हजम कर गया ।

बस्‍तर में राजकीय अनुदान व सहायता के संबंध में पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी जी का आंकलन था कि दिल्‍ली से सहायता के रूप में चला सौ रूपया, बस्‍तर के आदिवासियों के हाथों तक पहुंचते पहुंचते अट्ठारह रूपये रह जाता है । यानी बाकी के 82 रूपये आदिवासियों के हित के लिए  स्‍वांग रचने वाले नेता, अफसर व एनजीओ खा जाते हैं, । अब इस बैल को कौन समझाये कि जो नोट इसने खाये वो सरकारी सहायता के नहीं थे आदिवासी के मेहनत से कमाये नोट थे ।


पुछल्‍ला -
पिछले दिनों पूर्व गृह राज्‍य मंत्री चिन्‍मयानंद जी के साथ पूरे एक दिन बिताने को मिला । चर्चा में यह भी 'ज्ञात' हुआ कि पिछले विधान सभा चुनाव में उनके प्रयास से बस्‍तर के ग्‍यारह सीट रमन के झोली में पडे और रमन की सरकार बन सकी । अब जो भी हो कम से कम एक दिन उनके साथ रहने पर बस्‍तर के मौजूदा हालात पर केन्‍द्रीय गृह मंत्रालय की सोंच की आंशिक जानकारी प्राप्‍त हुई । फिर कभी इस मसले पर विस्‍तृत लिखुगा, तब तक के लिए इस माईक्रो पोस्‍ट से अपनी निरंतरता कायम रखने का प्रयास कर रहा हूं । 
  
संजीव तिवारी

मेरे गांव की होली और फाग

छत्‍तीसगढ सहित भारत के सभी गांवों में होली का पहले जैसा माहौल अब नहीं रहा, विकास की बयार गांवों तक पहुच गई है किन्‍तु उसने समाज में स्‍वाभाविक ग्रामीण भाईचारा को भी उडा कर गांवों से दूर फेंक दिया । इसके बावजूद रंगों के इस त्‍यौहार का अपना अलग मजा है और गांव में तो इस पर्व का उल्‍लास देखने लायक रहता है । गांव मेरे रग-रग में बसा हैं इसलिए मेरे 13 वर्षीय पुत्र के ना-नुकुर के बावजूद हम छत्‍तीसगढ के शिवनाथ नदी के तीर बसे अपने छोटे से गांव में चले गये होली मनाने ।

मुझे अपने बीते दिनों की होली याद आती है जब हम सभी मिलजुल कर गांव के चौपाल में होली के दिन संध्‍या नगाडे व मांदर के थापों के साथ फाग गाते हुए होली मनाते थे । समूचा गांव उडते रंग-अबीर के साथ नाचता था । तब न ही हमारे गांव में बिजली के तारों नें प्रवेश किया था और न ही ध्‍वनिविस्‍तारक यंत्रों का प्रयोग होता था । गांव में प्रधान मंत्री पक्‍की सडक के स्‍थान पर ‘गाडा रावन’ व एकपंइया (पगडंडी) रास्‍ता ही गांव पहुचने का एकमात्र विकल्‍प होता था फिर भी इलाहाबाद, आसाम, जम्‍मू, कानपूर, लखनउ और पता नहीं कहां कहां से कमाने खाने गए गांव के मजदूर होली के दिन गांव में इकत्रित हो जाते थे । अद्भुत भाईचारे व प्रेम के साथ एक दूसरे के साथ मिलते थे और ‘फाग’ गाते हुए रंग खेलते थे । नशा के नाम पर भंग के गिलास बंटते थे और अनुशासित उमंग व मस्‍ती छाये लोगों का हूजूम मिलजुलकर होली खेलता था ।

अब गांव में वो बात नहीं रही, आधुनिकता नें परंपराओं को पछाड दिया, बडे बुजुर्ग अपने गिर चुके दांतों और ढीली पड गई लगाम का रोना रोते हुए इसे त्‍यौहार के रूप में स्‍थापित करने पर तुले हुए हैं पर गांवों में गली-गली खुले शराब के अवैध दुकान के प्रभाव से गांव के लोगों को अब यह लगने लगा है कि होली, शराब के बिना अधूरी है । शराब से मदमस्‍त गांव में होली का मतलब सिर्फ हुडदंग रह गया है । रंग में सराबोर गिरते-पडते, उल्टिंयां करते, लडते-झगडते लोगों का अमर्यादित नाट्य प्रदर्शन ।

इन सब का दंश झेलते होली के दिन संध्‍या तीन बजे मेरे चौपाल पहुंचने से अंधेरे घिर आने तक तीन जोडी सार्वजनिक नगाडे फूट चुके थे । शराब में धुत्‍त लोग ‘फाग’ के नाम पर नगाडों पर, अपनी शक्ति आजमाइश कर रहे थे । शिकायतों व लडाईयों में समय सरकता जा रहा था । सार्वजनिक चौपाल में ‘फाग’ सुनने को उद्धत मन को तब सुकून मिला जब मित्रों नें मौखिक शक्ति प्रदर्शन किया और ईश्‍वर नें भी शराबियों को पस्‍त किया । और सभी रंजों को भुलाकर धुर ग्रामीण ‘फाग’ का मजा हमने लिया । 

उडि उडि चलथे खंधेला अब गोरि के उडि उडि चलथे खंधेला रे लाल SSSSS
पवन चले अलबेला अब गोरि के
उडि उडि चलथे खंधेला रे लाल SSSSS
(बसंत में गोरी के बाल कंधों से उड-उड रहे हैं क्‍योंकि अलबेला पवन चल रहा है)

पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष बहुत इंतजार व उदासी के बाद प्राप्‍त इन्‍हीं क्षणों से बार-बार साक्षातकार के बाद सोंचता हूं कि अब अगले साल गांव नहीं आउंगा । पर जडों को पकडे रहना पता नहीं क्‍यूं अच्‍छा लगता है और हर साल गांव पहुच जाता हूं । 

(हमने गांव के फोटो और फाग की क्लिपिंग ली थी पर होली के रंगों नें हमारे कैमरे को भी रंगीला बना दिया, सो सभी चित्र दैनिक छत्‍तीसगढ से साभार )

संजीव तिवारी

लोक कला के ध्वज वाहक : पद्म श्री गोविन्‍दराम निर्मलकर (Govindram Nirmalkar, Charandas Chor)

देश के अन्‍य प्रदेशों के लोक में प्रचलित लोकनाट्यों की परम्‍परा में छत्‍तीसगढी लोक नाट्य नाचा का विशिष्‍ठ स्‍थान है । नाचा में स्‍वाभाविक मनोरंजन तो होता ही है साथ ही इसमें लोक शिक्षण का मूल भाव समाहित रहता है जिसके कारण यह जन में रच बस जाता है । वाचिक परम्‍परा में पीढी दर पीढी सफर तय करते हुए इस छत्‍तीसगढी लोकनाट्य नाचा में हास्‍य और व्‍यंग के साथ ही संगीत की मधुर लहरियां गूंजती रही है और इस पर नित नये प्रयोग भी जुडते गये हैं । इसका आयोजन मुख्‍यत: रात में होता है, जनता ‘बियारी’ करके इसके रस में जो डूबती है तो संपूर्ण रात के बाद सुबह सूरज उगते तक अनवरत एक के बाद एक गम्‍मत की कडी में मनोरंजन का सागर हिलोरें लेते रहता है । गांव व आस-पास के लोग अपार भीड व तन्‍मयता से इसका आनंद लेते हैं और इसके पात्रों के मोहक संवादों में खो जाते हैं । नाचा की इसी लोकप्रियता एवं पात्रों में अपनी अभिनय क्षमता व जीवंतता सिद्ध करते हुए कई नाचा कलाकार यहां के निवासियों के दिलों में अमिट छाप बना गए है । मडई मेला में आवश्‍यक रूप से होने वाले नाचा को इन्‍हीं जनप्रिय कलाकरों नें गांव के गुडी से महानगर व विश्‍व के कई देशों के भव्‍य नागरी थियेटरों तक का सफर तय कराया है । जिनमें से सर्वाधिक लोकप्रिय नाम है गोविन्‍दराम निर्मलकर, जिन्‍हें इस वर्ष पद्मश्री पुरस्‍कार प्रदान किया गया है ।

छत्‍तीसगढ में शिवनाथ नदी के तट पर बसे ग्राम मोहरा में 10 अक्‍टूबर 1935 को पिता स्‍व. गैंदलाल व माता स्‍व. बूंदा बाई के घर में जन्‍में गोविन्‍दराम के मन में नाचा देख-देखकर ऐसी लगन जागी कि वे 20 वर्ष की उम्र में पैरों में घुघरू बांधकर नाचा कलाकार बन गये । उन्‍होंनें अपना गुरू बनाया तत्‍कालीन रवेली रिंगनी साज के ख्‍यात नाचा कलाकार मदन निषाद को । इनके पैरों के छन-छन व कमर में बंधे घोलघोला घांघर नें पूरे छत्‍तीसगढ में धूम मचा दिया । इन्‍हीं दिनों 50 के दशक के ख्‍यात रंगकर्मी रंग ऋषि पद्म भूषण हबीब तनवीर नें छत्‍तीसगढी नाचा की क्षमता को अपनाते हुए इनकी कला को परखा और नया थियेटर के लिए मदन निषाद, भुलवाराम यादव, श्रीमति फिदाबाई मरकाम, देवीलाल नाग व अन्‍य सहयोगी कलाकार लालू, ठाकुर राम, जगमोहन आदि को क्रमश: अपने पास बुला लिया ।

गोविन्‍दराम निर्मलकर जी 1960 से नया थियेटर से जुड गये । उन दिनों हबीब तनवीर जी के चरणदास चोर नें संपूर्ण भारत में तहलका मचाया था । अभिनय को अपनी तपस्‍या मानने वाले गोविन्‍दराम निर्मलकर नया थियेटर में आते ही नायक की भूमिका में आ गए वे मदनलाल फिर द्वारका के बाद तीसरे व्‍यक्ति थे जिसने चरणदास चोर की भूमिका को अदा किया । अपनी अभिनय क्षमता के बूते पर उन्‍होंनें सभी प्रदर्शनों में खूब तालियां एवं संवेदना बटोरी । इसके साथ ही हबीब तनवीर जी की दिल्‍ली थियेटर की पहली प्रस्‍तुति आगरा बाजार (1954) में भी गोविन्‍दराम निर्मलकर जी नें अभिनय शुरू कर दिया । इसके बाद गोविन्‍दराम निर्मलकर जी नें हबीब तनवीर के प्रत्‍येक नाटकों में अभिनय किया और अपने अभिनय में निरंतर निखार लाते गए । लोकतत्‍वों से भरपूर मिर्जा शोहरत बेग (1960), बहादुर कलारिन (1978), चारूदत्‍त और गणिका वसंतसेना की प्रेम गाथा मृच्‍छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978), पोंगा पंडित, ब्रेख्‍त के नाटक गुड वूमेन ऑफ शेत्‍जुवान पर आधारित शाजापुर की शांतिबाई (1978), गांव के नाम ससुरार मोर नाव दंमांद (1973), छत्‍तीसगढ के पारंपरिक प्रेम गाथा लोरिक चंदा पर आधारित सोन सरार (1983), असगर वजाहत के नाटक जिन लाहौर नई देख्‍या वो जन्‍मई नई (1990), शेक्‍सपियर के नाटक मिड समर्स नाइट ड्रीम पर आधारित कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना (1994) आदि में गोविन्‍दराम जी नें अभिनय किया ।
गोविन्‍दराम जी के अभिनय व नाटकों के अविश्‍मरणीय पात्रों में चरणदास चोर की भूमिका के साथ ही आगरा बाजार में ककडी वाला, बहादुर कलारिन में गांव का गौंटिया, मिट्टी की गाडी में मैतरेय, हास्‍य नाटकों के लिए प्रसिद्ध मोलियर के नाटक बुर्जुआ जेन्‍टलमेन का छत्‍तीसगढी अनुवाद लाला शोहरत बेग (1960) में शोहरत बेग जैसी केन्‍द्रीय व महत्‍वपूर्ण भूमिकायें रही । इन्‍होंनें बावन कोढी के रूप में सोन सागर में सर्वाधिक विस्‍मयकारी और प्रभावशाली अभिनय किया । महावीर अग्रवाल जी इस संबंध में तत्‍कालीन ‘चौमासा-1988’ में लिखते हैं ‘ एक-एक कदम और एक-एक शव्‍द द्वारा गोविन्‍दराम नें अपनी शक्ति और साधना को व्‍यक्‍त किया है । मुडी हुई अंगुलियों द्वारा कोढ का रेखांकन अद्भुत है ।‘में तोर संग रहि के अपने जोग ला नी बिगाडों’ जैसे संवादों की अदायगी के साथ-साथ ‘चंदा ला लोरिक के गरहन लगे हे’ संवाद सुनकर आंखों में उतर जाने वाले यम रूपी क्रोध को, वहशीपन को अपनी विलक्षण प्रतिभा द्वारा प्रभावित किया है । शुद्ध उच्‍चारण और मंच के लिये अपेक्षित लोचदार आवाज द्वारा गोविन्‍दराम चरित्र से एकाकार होने और संवेदनाओं को सहज उकेरने की कला में दक्ष हैं ।‘ मृच्‍छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978) में नटी और मैत्रेय की भूमिका में चुटीले संवादों से हास्‍य व्‍यंग की फुलझडी बिखेरने वाले एवं पोंगा पंडित में लोटपोट करा देने वाले पोंगा पंडित की भूमिका में निर्मलकर जी नें जान डाल दिया था । मुद्राराक्षस में जीव सिद्धि, स्‍टीफन ज्‍वाईग की कहानी देख रहे हैं नैन में दीवान, कामदेव का अपना वसंत ऋतु में परियों से संवाद करने वाला बाटम, गांव के नाम ससुरार मोर नाव दंमांद(1973) में दमांद की दमदार भूमिका, जिन लाहौर नई देख्‍या वो जन्‍मई नई (1990) में अलीमा चायवाला, वेणीसंघारम में युधिष्ठिर, पोंगवा पंडित में ‘पईसा म छूआ नई लगे कहने वाले’ पंडित की जोरदार भूमिका में गोविन्‍दराम निर्मलकर छाये रहे हैं ।
अंतर्राष्‍ट्रीय नाट्य समारोह, एडिनबरा लंदन में गोविन्‍दराम अभिनीत चरणदास चोर का प्रदर्शन 52 देशों से आमंत्रित थियेटर ग्रुपों के बीच हुआ और चरणदास चोर को विश्‍व रंगमंच का सर्वोच्‍च सम्‍मान प्राप्‍त हुआ । इस प्रसिद्धि के बाद चरणदास चोर का मंचन विश्‍व के 17 देशों में हुआ । गोविन्‍दराम को पहलीबार हवाई जहाज चढने का अवसर एडिनबरा जाते समय प्राप्‍त हुआ उसके बाद वह निरंतर हबीब तनवीर और साथी कलाकारों के साथ हवा एवं यथार्थ के लोक अभिनय की उंचाईयों पर उडते रहे । चरणदास चोर की प्रसिद्धि के चलते श्‍याम बेनेगल नें फिल्‍म ‘चरणदास चोर’ बनाया जिसमें गोविन्‍दराम जी नें भी अभिनय किया है ।

2005 से लकवाग्रस्‍त गोविन्‍दराम जी को विगत दिनों बहुमत सम्‍मान दिये जाने के समय उन्‍होंनें अपने द्वारा अभिनीत आगरा बाजार के ककडी वाले के गीत को सुनाया, यह नाटक और उनका अभिनय ‘आगरा बाजार’ की जान है । आगरा बाजार में पतंगवाला हबीब तनवीर के साथ इस ककडी वाले के स्‍वप्‍नो को सामंतशाही सवारी नें रौंद दिया था, उस दिन भी वही कसक पद्म श्री गोविंदराम निर्मलकर जी के हृदय से हो कर आंखों से छलकी जा रही थी । मध्‍य प्रदेश सरकार के तुलसी सम्‍मान व छत्‍तीसगढ सरकार के मदराजी सम्‍मान के बावजूद 1500 रूपये पेंशन से अपनी गृहस्‍थी की गाडी खींचते गोविंदराम छत्‍तीसगढिया स्‍वाभिमान और संतोष के पारंपरिक स्‍वभाव के धनी हैं, पैसा नहीं है तो क्‍या हुआ जिंदादिली तो है । बरसों गुमनामी की जिन्‍दगी जीते इस महान कलाकार की सुध पुन: सरकार नें ली है, गोविन्‍दराम नें अपनी परम्‍परा व संस्‍कृति के प्रति आस्‍था का डोर नहीं छोडा है । उसी तरह जिस तरह आगरा बाजार में रौंदे जाने के बाद भी रोते ककडी वाले के अंतस को अपूर्व उर्जा से भर देने वाले जस गीत व मांदर के थापों नें दुखों को भूलाकर ब्रम्‍हानंद में मगन कर दिया था । वह ककडी वाला आज भी हमारे बीच जीवन में आशा का संचार करता हुआ हमारी संस्‍कृति और परम्‍परा के ध्‍वज को सर्वोच्‍च लहराता हुआ अडा खडा है ।

संजीव तिवारी
(Govindram Nirmalkar, Charandas Chor)

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...