29 April, 2019

वेदमती पंडवानी पहले कभी होती रही होगी

छत्तीसगढ़ की प्रदर्शनकारी लोककला "पंडवानी" के इतिहास पर इतना कहा जाता है कि यह "भजनहा" से आरंभ होकर नारायणलाल वर्मा, झाड़ूराम देवांगन, पद्मश्री पूनाराम निषाद और पद्मविभूषण तीजनबाई तक सफर करते हुए वर्तमान "पंडवानी" के रूप में स्थापित हुई।




सभी वरिष्ठ पंडवानी कलाकार सबल सिंह चौहान और वाचिक लोकाख्यान को अपने गायन का आधार बताते हैं। इस अवधि में कलाकारों की, प्रस्तुति की अपनी-अपनी शैली को निरंजन महावर ने नया शब्द गढ़ते हुए, वेदमती और कापालिक नाम दिया। इसे अर्थांवित करते हुए उन्होंने कहा कि जो वेद सम्मत गायन है, वह वेदमती है एवं जो लोक सम्मत गायन है वह कापालिक है। इसे उन्‍होंनें विस्‍तार से समझाया है। उनकी किताब और मध्‍यप्रदेश जनजातीय परिषद की पत्रिका 'चौमासा' में प्रकाशित आलेखों को संदर्भित करते हुए लोग धीरे-धीरे पंडवानी विशेषज्ञ बनते गए। छत्‍तीसगढ़ की धरती में इसकी खुशबू कैसे फूटी इसे गिने-चुने स्‍थानीय लोगों के अतिरिक्‍त किसी और ने नहीं किया।



किसी ने गपालिक के सूत्र को और आगे बढ़ाया कि जो अपने कपाल से कथा तैयार कर कथा गाता है वह कापालिक है यानी कल्पना प्रधान। किसी ने कहा कि जो खड़े होकर-नाट्य प्रदर्शन कर कथा गाता है वह कापालिक है, यह भी कहा गया कि, बैठकर जिसे गाया जाता है वह वेदमती। वैसे अधिकतम गायक/गायिका अपने आप को कापालिक गायक/गायिका कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। पद्मविभूषण तीजनबाई स्वयं अपने आप को कापालिक गायिका कहती है। 




आप सभी जानते हैं कि पिछले सत्तर के दसक से प्रत्येक गायक/गायिका अपने साक्षात्‍कार में कहते हैं कि वे, सबल सिंह चौहान और लोक आख्यान के परस्पर मेल से पंडवानी प्रस्तुत करते हैं। इस तथ्य के साथ तथाकथित शैली की परिभाषा मुझे दिग्भ्रमित करती है। मेरे अनुसार से अब पंडवानी मात्र कापालिक है, वेदमती पंडवानी पहले कभी होती रही होगी।
इस पर अभी लिखना जारी है ... साथ बने रहें।
- संजीव तिवारी

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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