ब्लॉग छत्तीसगढ़

Popular Posts

30 October, 2007

मॉं : एक कविता

मॉं तुम्‍हारी गोद, तुम्‍हारा ऑंचल कितना सुकून देता था मेरा जिद, रोना, वह दुलार, वह क्रोध वह नि श् ‍छल प्रेम, तुम पर वह सर्वस्‍व अधिकार, मेरा...

28 October, 2007

हममें होकर गुजरता है वक्त, बेवक्त : यादें सुब्रत बसु

अशोक सिंघई जी द्वारा सुब्रत दा को अर्पित श्रद्धासुमन अखबार ज़िन्दगी की बड़ी जरूरी और गैरजरूरी ज़रूरत है। खबरें अच्छी हों या बुरी, एक ही पन्...

25 October, 2007

दुर्लभ दर्शन और मौन सम्वाद : अशोक सिंघई की दो कवितायें

दुर्लभ दर्शन दिखता नहीं अब चाँद पूरा साफ-साफ आँखें हो चलीं बूढ़ीं अपने मन से बह रही हो हवा ऐसी दिखती नहीं अब खुश़बू हो गई लापता बातें हो चली...

24 October, 2007

समीक्षा “संभाल कर रखना अपनी आकाश गंगा” (काव्य संग्रह) कवि- अशोक सिंघई

अपने समय का सच उलीचती कवितायें एक बार रूस के महान कथाकार दोस्तोवस्की अपने भाई इवान के साथ ईश्‍वर पर बहस कर रहे थे । दोस्तोवस्की ने इवान को ई...

23 October, 2007

बोलियों की दुनिया में छत्‍तीसगढी बोली

आलेख : रामहृदय तिवारी प्रकृति बोलती है , कभी क्रोध से , कभी करूणा से , कभी दुत् ‍ कार से तो कभी दुलार से । भौंचक मनुष् ‍ य ...