भाषा के लिये आवश्‍यक है योग्‍य व्‍याकरण (Grammer) का होना

मानक छत्‍तीसगढी व्‍याकरण एवं छत्‍तीसगढी शव्‍दकोश

छत्‍तीसगढ राज्‍य के निर्माण के साथ ही छत्‍तीसगढी भाषा को राजभाषा का दर्जा भी दे दिया गया । अब इस भाषा के विकास के लिये सरकार की सुगबुगाहट के साथ ही स्‍वैच्छिक रूप से क्षेत्र के विद्वानों के द्वारा सहानुभूतिपूर्वक सक्रियता दिखाई जा रही है । भाषा के मानकीकरण के लिये ख्‍यात भाषाविद डॉ.चित्‍तरंजन कर एवं प्रदेश की एकमात्र नियमित छत्‍तीसगढी भाषा की पत्रिका ‘लोकाक्षर’ नें अपने प्रयास आरंभ कर दिये हैं । छत्‍तीसगढ में भाषा के विकास के लिये ‘व्‍याकरण’ एवं ‘शव्‍द कोश’ पर निरंतर गहन शोध व संशोधन हुआ है एवं समय समय पर छत्‍तीसगढी व्‍याकरण व शव्‍द कोश का प्रकाशन भी होते रहा है । व्‍याकरण के लेखक चाहे जो भी हों किन्‍तु प्रत्‍येक प्रकाशन के साथ ही इसमें निखार आता गया है । छत्‍तीसगढ में छत्‍तीसगढी सहित अन्‍य कई बोलियां बोली जाती है, छत्‍तीसगढी भाषा में भी स्‍थान स्‍थान के अनुसार से किंचित भिन्‍नता है इस कारण छत्‍तीसगढी के मानक व्‍याकरण की बहुत समय से प्रतीक्षा थी । इस प्रतीक्षा को दूर किया चंद्र कुमार चंद्राकर जी की कृति ‘मानक छत्‍तीसगढी’ नें ।

छत्‍तीसगढ की क्षेत्रीयता और जातिभेद से उपजी सभी उप बोलिंयों के मानक रूप पर आधारित यह ‘मानक छत्‍तीसगढी व्‍याकरण’ महज एक श्रेष्‍ठ कृति नहीं, आज की आवश्‍यकता है एवं भविष्‍य में भाषा के विकास के लिये एक आवश्‍यक अंग है । इस कृति में व्‍याकरण के सभी पक्षों पर सोदाहरण गहन विवेचना किया गया है । इस ग्रंथ में समानार्थी, विरूद्धार्थी, पर्यायवाची, अनेकार्थी, अनेक शव्‍दों के स्‍थान पर एक शव्‍द तथा शव्‍दों के लिंग-भेद की विस्‍तृत विवेचना, विविध प्रकार के वाक्‍य दोष तथा मुहावरों एवं लोकोक्तियों के वाक्‍य प्रयोग के साथ कोश देने से ‘मानक छत्‍तीसगढी व्‍याकरण’ का महत्‍व और बढ गया है । भाषा के विकास में चंद्र कुमार चंद्राकर जी का यह योगदान अत्‍यंत प्रसंशनीय है ।

इस व्‍याकरण के साथ ही चंद्र कुमार चंद्राकर जी की कृति  ‘छत्‍तीसगढी शव्‍दकोश’ भी अत्‍यंत सराहनीय एवं संग्रहणीय है । चंद्राकर जी का यह शव्‍दकोश, छत्‍तीसगढी में अब तक का सबसे बडा शव्‍दकोश है, इसमें 27000 शव्‍द हैं । शव्‍दों के सहीं अर्थ अभिव्‍यंजित होने के कारण सुविज्ञ पाठकों नें इसे ‘श्रेष्‍ठ कोश’ के रूप में स्‍वीकारा हैं । अनेकों विलुप्‍त शव्‍दों को जीवंत करनेवाला यह कोश छत्‍तीसगढी भाषा प्रेमियों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के लिए अनुपम उपहार है ।
इस कोश का संशोधित एवं परिर्वधित रूप अतिशीध्र प्रकाशन को जा रहा है, जिसमें शव्‍द-संख्‍या में श्री वृद्धि भी हुई है साथ ही शव्‍दों की उत्‍पत्ति भी दर्शाई गई है ताकि अर्थ में विश्‍वसनीयता बढे । इसमें शब्‍दों के उदाहरण भी दिये गये हैं, इन सब के कारण व मुहावरों के प्रयोग आदि से अभिधा, लक्षणा एवं व्‍यंजना तीनों शव्‍दशक्तियों में अर्थ का द्योतन होने लगा है ।इनके व्‍याकरण की ही तरह यह शव्‍दकोश भी निश्‍चय ही छत्‍तीसगढी भाषा-विकास के पथ का ‘मील का पत्‍थर’ होगा ।
संजीव तिवारी

‘श्री चंद्राकर नें यह शब्‍दकोश पूर्ण समर्पण भाव से तैयार कर के छत्‍तीसगढी की प्रतिदिन होती जा रही आधिकारिक प्रगति के यज्ञ में अपने सार्थक परिश्रम की हवि प्रस्‍तुत की है । चूँकि यह कोश छत्‍तीसगढी के अभी तक प्रकाशित शब्‍दकोशों में सर्वाधिक शब्‍दों को अपने कलेवर में समेटे हुए है, इसलिये इस का स्‍वागत छत्‍तीसगढ की सारी मेजों द्वारा किया जाना निश्चित है । इस की सार्वजनिक उपयोगिता को नकारना किसी के लिए भी संभव नहीं है, क्‍योंकि यह छत्‍तीसगढी-भाषियों के लिए ही नहीं, अन्‍यों के लिये भी वक्‍त की माँग को पूरा करता है ।‘ डॉ.(प्रो.) रमेश चंद्र महरोत्रा


मानक छत्‍तीसगढी व्‍याकरण 
लेखक – चंद्र कुमार चंद्राकर
प्रकाशक – शताक्षी प्रकाशन, रायपुर
मूल्‍य – 395/- रूपये

छत्‍तीसगढी शव्‍दकोश
लेखक – चंद्र कुमार चंद्राकर
प्रकाशक – श्री प्रकाशन, दुर्ग
मूल्‍य – 505/- रूपये

लेखक परिचय
 
नाम : चंद्र कुमार चंद्राकर
जन्‍म तिथि : 23.01.1962 जन्‍म स्‍थान : ग्राम चौरेल, तह. गुण्‍डरदेही, जिला दुर्ग (छ.ग.)
माता : स्‍व.श्रीमती गिरिजा बाई चंद्राकर पिता : श्री गंगा प्रसाद चंद्राकर
संगिनी : श्रीमति उपासना चंद्राकर
शिक्षा : एम.ए., एम.फिल (भूगोल)
कृतियॉं : 1. छत्‍तीसगढी व्‍याकरण 2. छत्‍तीसगढ की वर्तनी 3. छत्‍तीसगढी कहावतें एवं लोकोक्तियॉं 4. छत्‍तीसगढी हंसौला संग्रह
संप्रति : प्राचार्य, संत राजाराम शदाणी नागरिक महाविद्यालय, डौंडी लोहारा, जिला दुर्ग, (छ.ग.)
संपर्क : ग्राम अरजुन्‍दा, तह. गुण्‍डरदेही, जिला दुर्ग (छ.ग.)
मो. : 094241 14632

दण्‍डक वन का ऋषि : लाला जगदलपुरी

बस्‍तर के लोक जीवन का चित्र जब जब हमारे सामने आता है तब तब एक शख्‍श का नाम उभरता है और संपूर्णता के साथ छा जाता है वह नाम है लाला जगदलपुरी का । साहित्‍य और संस्‍कृति के क्षेत्र में बस्‍तर के पहचान के रूप में लाला जी बिना हो हल्‍ला के पिछले पचास वर्षों से लगातार इस पर अपना छाप छोडते रहे हैं । उनके लेख व किताबें बस्‍तर के एतिहासिक दस्‍तावेज हैं । बस्‍तर के अरण्‍य वनांचल के गोद में छिपे लोक जीवन, साहित्‍य व संस्‍कृति के संबंध में सर्वप्रथम एवं प्रामाणिक जानकारी संपूर्ण नागर जगत को लाला जी के द्वारा ही प्राप्‍त हो सका है । इसके बाद तो लाला जी के सानिध्‍य एवं लेखनी व उनके सूत्रों का उपयोग कर अनेकों लोगों नें रहस्‍यमय और मनोरम बस्‍तर को जनता के सामने लाया और अपनी राग अलापते हुए अपने ढंग से प्रस्‍तुत भी किया जो आज तक बदस्‍तूर जारी है । 


बस्‍तर की लोक संस्‍कृति, लोक कला, लोक जीवन व लोक साहित्‍य तथा अंचल में बोली जाने वाली हल्‍बी–भतरी बोलियों एवं छत्‍तीसगढी पर अध्‍ययन व इन पर सतत लेखन करने वाले लाला जी निर्मल हृदय के बच्‍चों जैसी निश्‍छल व्‍यक्ति हैं । सहजता ऐसी कि सांसारिक छल छद्म से परे जो बात पसंद आयी, उस पर लिखलखिला उठते हैं । मन के अनुकूल कोई बात न हुई, तो तुरंत विरोध करते हैं । स्‍पष्‍टवादिता ऐसी कि गलत बात वे बर्दाश्‍त नहीं कर पाते इसी के कारण कोई उन्‍हें तुनकमिजाज भी कह देता है । धीर-गंभीर व्‍यक्तित्‍व, सदैव सब को अपने ज्ञान दीप से आलोकित करता एवं अपने प्रेम रस में आकंठ डूबोता हुआ ।
 

लाला जी का जन्‍म 17 दिसम्‍बर 1920 में जगदलपुर में हुआ था । शैशवकाल में ही के इनके पिता की मृत्‍यु हो गई एवं इनके उपर विधवा मॉं दो छोटे भाई एवं एक छोटी बहन का दायित्‍व आ गया, पढाई बीच में ही छूट गई । रोजी रोटी के इंतजाम के साथ ही लाला जी अपने रचना संसार में गीत, गजल, नई कविता, छंद, दोहों के साथ बस्‍तर की लोक कला, संस्‍कृति, इतिहास, आदिम जाति के जन जीवन पर गहराई से अध्‍ययन कर सूक्ष्‍म विवेचन प्रस्‍तुत करते रहे । इनके प्रयासों से ही भतरी व हल्‍बी बोलियों को जन के सामने अभिनव रूप में लाया जा सका । आदिम मुहावरों व लोकोक्तियों पर लालाजी नें खोजपूर्ण परिश्रम किया । बस्‍तर का पर्व जगार इनका सदैव हमसफर रहा, जगार को उन्‍होंनें अपने स्‍पर्श से सुगंधित किया और भूमकाल के नायक गूंडाधूर को उन्‍होंनें नई पहचान दी । इतना विशद लेखन एवं कार्य के बावजूद वे एक संत की भांति महत्‍वाकांक्षा से सदैव दूर रहे जिसके कारण उनके कार्यों का समयानुसार मूल्‍यांकन नहीं हो सका । अन्‍य साहित्‍यानुरागियों व विद्वानों की तरह, अपने निच्‍छल व सहज भाव के कारण समय को बेहतर ढंग से भुना नहीं सके, दरअसल वे इसे कभी भुनाना ही नहीं चाहे । वे संपूर्ण जीवन संघर्ष करते रहे एवं लिखते रहे हैं । वे स्‍वयं अपनी एक कविता में स्‍वीकारते हैं ‘जितना दर्द मुझे दे दोगे / उतने भाव संजो लूंगा मैं / जितने आंसू दोगे दाता / उतने मोती बो दूंगा मैं / जितनी आग लगा दोगे तुम / उतनी ज्‍योति जगा दूंगा मैं ...।’ बस्‍तर के संसाधनों की तरह इनके भी बौद्धिक अधिकारों की लूट मची रही है और ये सच्‍चे फकीर की भांति सबकुछ बांटकर भी मस्‍त मौला गुनगुनाते रहे हैं, बस्‍तर के दर्द को प्राथमिकता से महसूस करते हुए । बस्‍तर की पीडा को सच्‍चे मन से स्‍वीकारते हुए शोषण के हद तक दोहन पर उनके गीत मुखरित होते हैं – ‘यहां नदी नाले झरने सब / आदिम जन के सहभागी हैं / यहां जिंदगी बीहड वन में / पगडंडी सी चली जा रही / यहां मनुजता वैदेही सी / वनवासिन है वनस्‍थली में / आदिम संस्‍कृति शकुन्‍तला सी / प्‍यार लुटाकर दर्द गा रही ...’
 

इनके समकालीन अनेक सहयोगी एवं साहित्‍यकार स्‍वीकारते हैं कि लाला जी की सरलता एवं सभी पर विश्‍वास करने व ज्ञान बाटने की प्रवृत्ति के बावजूद उनकी  साहित्तिक उपेक्षा की गई है । अपनी सादगी, शांत प्रकृति, किसी के प्रति अविश्‍वास नहीं करने की प्रवृत्ति, परदुखकातरता और विशाल हृदयता के अतिरिक्‍त उदारता नें लाला जी जैसे विद्वान और शीलवान रचनाकार को हासिये पर ढकेले रखा । अपनी एक कविता में वे इस बात को पूर्ण आत्‍मस्‍वाभिमान से प्रस्‍तुत करते हैं – ‘चाहते मुझको न गाना / अप्रंशेसित गेय हूं / चाहते मुझको न पाना / मैं अलक्षित ध्‍येय हूं / चाहते जिसको न लेना / वह प्रताडित श्रेय हूं / मैं स्‍वयं अपने लिये / उपमान हूं, उपमेय हूं / दृश्‍य हूं / दृष्‍टा स्‍वयं हूं / पर अमर ...।‘ उन्‍होंनें सब पर विश्‍वास किया । यह तो एक सामान्‍य सी बात है । भ्रष्‍ट राजनेता और उनकी राजनैतिक पैतरेबाजी किसी को भी हासिये पर डाल सकती है । परन्‍तु लालाजी के साथ राजनितिकों नें शायद कुछ नहीं किया । अलबत्‍ता उनका दोहन तो उन बुद्धिजीवियों नें किया जो छल-कपट के लिये आज भी सराहे जाते हैं । इसके बावजूद लाला जी बैरागी भाव से कहते हैं ‘मैं इंद्रावती नदी के बूंद-बूंद जल को / अपने दृग-जल की भंति जानता आया हूं / दुख पर्वत-घाटी जैसे मेरे संयोगी / सबकी सुन-सुन, जिनकी बखानता आया हूं ...।’
 


नाटक, रूपक, निबंध और कहानी आदि अन्‍यान्‍य विधाओं में इनका लेखन रहा है । इनकी अब तक दो कविता संग्रह प्रकाशित हुई हैं - ‘मिमियाती जिन्‍दगी: दहाडते परिवेश’ एवं ‘पडाव 5’ । लोक साहित्‍य विषयक शोध एवं सर्वेक्षण के ग्रंथ बस्‍तर:लोकोक्तियॉं, बस्‍तर की लोककथांए, हल्‍बी लोककथांए, वन कुमार के साथ ही सर्वाधिक चर्चित शोध ग्रंथ – बस्‍तर : इतिहास एवं संस्‍कृति का प्रकाशन हुआ है । इसके अतिरिक्‍त इनके ढेरों लेख व कवितायें स्‍थानीय पत्र-पत्रिकाओं, चांद, विश्‍वामित्र, सन्‍मार्ग, प्रहरी, युगधर्म, वातायन, नवनीत, हिन्‍दुस्‍तान व कादम्बिनी आदि में प्रकाशित हुए हैं व आकाशवाणी से प्रसारित हुए हैं ।
 

इनको मिले पुरस्‍कारों की पडताल करते हुए मुझे इनकी एक कविता याद आती है – ‘वह / प्रकाश और अंधकार / दोनों को कान पकडकर नचाता है / जिसके कब्‍जे में / बिजली का स्विच आ जाता है ...।‘ इनको मिलने योग्‍य पुरस्‍कारों की जब-जब बारी आई, शायद बिजली का स्विच लालाजी के कार्यों से अनभिज्ञ व्‍यक्तियों के हाथ में रहा, इसे विडंबना के सिवा कुछ भी नहीं कहा जा सकता ।

अप्रतिम शव्‍द शिल्‍पी लाला राम श्रीवास्‍तव जी बस्‍तर के लोक भाषा व संस्‍कृति के प्रकाण्‍ड विद्वान हैं वे स्‍वयं इस बात को जानते हैं इसके बावजूद महत्‍वाकांक्षा तो उनकी कभी कोई नहीं रही, मामूली और जरूरी इच्‍छाओं तक को उन्‍होंनें हंकाल दिया । पिता की मृत्‍यु के बाद स्‍कूल से विलग हो जाने वाले लालाजी नें शिक्षा स्‍वाध्‍याय से प्राप्‍त की । गुलशेर खॉंन शानी, प्रो.धनंजय वर्मा जैसे कई योग्‍य एवं प्रसिद्ध साहित्‍यकारों का इन्‍होंनें शव्‍द संस्‍कार किया है एवं इनके आर्शिवाद से अनेकों शव्‍द सेवक आज देश के विभिन्‍न भागों में साहित्‍य सृजन कर रहे हैं ।
 


लाला जी बस्‍तर के दोहन व शोषण से सदैव दुखी रहे, अपनी रचनाशीलता के लिए उन्‍हें सतत संघर्ष भी करना पडा । आज तक वे दुख से उबर नहीं पाये पर वे इस पीडा को अपना साथी मानते आये हैं, वे कहते हैं ‘पीडायें जब मिलने आतीं हैं मेरे गीत संवर जाते हैं ...’
 

उनकी एक हल्‍बी गीत ‘उडी गला चेडे’ मुझे बहुत पसंद है । आज उनकी 78 वीं जन्‍म दिन के अवसर पर उनके दीर्धायु होने की कामना के साथ इसे प्रस्‍तुत कर रहा हूं – ‘राजे दिना/धन धन हयं/उछी उडी करी आयते रला/बसी-बसी करी खयते रला/सेस्‍ता धान के पायते रला/केडे सुन्‍दर/चटेया चेडे/सरी गला धान/भारी गला चेडे/एबर चेडे केबे ना आसे/ना टाक सेला/कमता करबिस/एबर तुय तो ‘खड’ होयलिस/एबर तोके फींगीं देयबाय/गाय खयसी/चेडे गला/आउरी गोटे ‘सेला’ उगर ।‘ लटक झूल रहा था नीचे धान की बालियों का एक झालर । टंगा हुआ था ‘सेला’ दरवाजे के चौंखट पर । अपनी शुभ शोभा छिटकाये दर्शनीय । एक दिन एक सुन्‍दर गौरैया आई, और उसने दोस्‍ती गांठ ली ‘सेला’ से । रोज रोज वह उड उड कर बार बार आती रही थी । बैठ कर सेला धान को खाती रही थी । भूख बुझाती रही थी । एक सुन्‍दर गौरैया । धीरे धीरे कम होते गये सेला के लटकते झूलते दाने । और एक दिन ऐसा आया कि सेला के पास शेष नहीं रह गया एक भी दाना । चिडिया उड गई । ‘चिडिया अब कभी नहीं आएगी रास्‍ता मत देख सेला ‘ सेला से उसकी आत्‍मा कह रही थी ‘अब तो तू रह गया है केवल घांस गौरैया के लिए अब रखा क्‍या है तेरे पास तेरे इस अवशिष्‍ट भाग से गौरैया को क्‍या लेना देना उसे चाहिए दाने गौरैया की दोस्‍ती तुझसे नहीं तेरे दानों से थी अब तुझे चौखट से उतार कर बाहर फेंक देंगें गइया खा जायेगी गौरैया गई एक नए ‘सेला’ की खोज में । उन्‍होंनें अपने कवि निवास में बस्‍तर ज्ञान भंडार से भरे हजारों ‘सेला’ लटकाए हैं और हजारों पिपासु गौरैयों नें सेला का इसी तरह उपभोग किया है ।
  
लाला जी शतायु हों, दीर्धायु हों । इन्‍हीं कामनाओं के साथ .......
संजीव तिवारी

सत्‍य की जीत या हार ... ?

 छत्‍तीसगढ का जनादेश आ चुका है, रमन सिंह के नेतृत्‍व वाली भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश में सरकार बनाने की क्षमता हासिल कर चुकी है । इस चुनाव परिणाम के पीछे विकास एवं रमन की छबि है । कांग्रेस नेतृत्‍व में आपसी कलह व भितरधात नें भी इस परिणाम को भरपूर प्रभावित किया है । पूरा राज्‍य रमन के तीन रूपिया किलो चांउर में तुलता हुआ प्रतीत होता है एवं उनकी वर्तमान व भविष्‍य की योजनाओं को जनता की स्‍वीकृति मिलती दीख पडती है । 

इस परिणाम में चौकाने वाला तथ्‍य यह हैं कि प्रदेश में सत्‍ता का समीकरण तय करने वाले आदिवासी क्षेत्रों में भी भाजपा नें अपनी बढत कायम रखी है जबकि समझा यह जा रहा था कि भाजपा सरकार के ‘सडवा जूडूम’ की योजना से आदिवासी त्रस्‍त हैं । सर्वोच्‍च न्‍यायालय में प्रस्‍तुत याचिका एवं दुनिया भर के तथाकथित विचारकों द्वारा यही प्रचारित भी किया जा रहा था । इसके बावजूद आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा की बढत यह सिद्ध करती है कि ‘सडवा जूडूम’ प्रदेश के हित में है ।

प्रचारित यह भी किया जा रहा था एवं कुछ हद तक हमें भी यह लगता था कि इससे आदिवासियों के प्राकृतिक आवास से उन्‍हें विलग कर अन्‍यत्र शरणार्थी की तरह बसाना जिससे वहां उन‍की स्‍वाभाविक रीति रिवाज, परम्‍पराओं पर अघोषित बंदिसें लग रही थी एवं संस्‍कृति पर संकट गहरा रहे थे । किन्‍तु यदि ऐसा था, उन्‍हें वह स्थिति पसंद नहीं थी, तो वे इस व्‍यवस्‍था के विरोध में जनादेश देते ।

नेपाल में प्रजातांत्रिक तरीके से सत्‍ता प्राप्‍त कर लेने के बाद छत्‍तीसगढ में भी नक्‍सलियों या नक्‍सल विचार समर्थित लोगों के आगे आने एवं जीतने की संभावना देखी जा रही थी इसके बावजूद नक्‍सलियों के द्वारा चुनाव का बहिष्‍कार, वोट डालने वालों के अंगुलियां काट देने का एलान उनके खीझ को दर्शाता है । उनके पास व्‍यापक जनाधार तो है ही नहीं, शोषण और बंदूक के बल पर समानांतर शासन । कुल मिला कर ‘दादा’ लोगों की दादागिरी ही है । उनके इस दादागिरी के बावजूद लोगों नें मतदान किया यह भी उनके दिलों में ‘दादा’ लोगों के प्रति विरोध को भी स्‍पष्‍ट दर्शित करता है । 

बात उमड घुमड कर पुन: जूडूम शिविर की उपादेयता पर केन्द्रित हो जाती है । सडवा जूडूम शिविरों में हालात यद्धपि बदतर होंगें किन्‍तु जब इस शिविर के अस्तित्‍व का फैसला देने का अवसर आया तब आदिवासियों नें स्‍वयं इसके पक्ष में ही फैसला दिया । यह स्‍पष्‍ट करता है कि ‘सडवा जूडूम’ छत्‍तीसगढ के हित में है । किन्‍तु वहां का हालात सुधारा जाना आवश्‍यक है जिन्‍होंनें रमन को जिताया है उनकी सुरक्षा के साथ ही उनके जीवन स्‍तर का ख्‍याल रखना अब रमन का दायित्‍व है । 

बस्‍तर के परिणामों और मतों के आंकडों को देखते हुए मुझे यह लगता है कि, मैदानी इलाकों में बैठे हम लोग कलम से कितने ही मार्मिक तस्‍वीर उकेर लेंवें वह सत्‍यता के करीब हो सकती है, पर पूर्ण सत्‍य नहीं ।

चलते चलते .... खबर यह भी है कि रायपुर ग्रामीण से कलमकारों के संरक्षक और कलमकारों को नई उंचाईयां देने में सहयोगी, आका-काका, पूर्व मंत्री सत्‍यनारायण शमों जी चुनाव हार चुके हैं ।


संजीव तिवारी

राजीव काला जल और शानी

उस दिन दौंडते भागते दुर्ग रेलवे स्टेशन पहुचा । गाडी स्टैंड करते ही रेलगाडी की लम्बी सीटी सुनाई देने लगी थी । तुरत फुरत प्लैटफार्म टिकट लेकर अंदर दाखिल हुआ । छत्तीसगढ एक्सप्रेस मेरे स्टेशन प्रवेश करते ही प्लेटफार्म नं. 1 पर आकर रूकी । चढने उतरने वालों के हूजूम को पार करता हुआ मैं एस 6 के सामने जाकर खडा हो गया । राजीव रंजन जी और अभिषेक सागर जी मेरे सामने खडे थे । साहित्य शिल्पी और छत्तीसगढ के साहित्यकारों पर संक्षिप्त किन्तु महत्वपूर्ण चर्चा के बीच ही राजीव जी नें सागर जी को सामने की पुस्तक दुकान से शानी का ‘काला जल’ पता करने को कहा, पुस्तक वहां नहीं मिली । तब तक गाडी की सीटी पुन: बज गई और राजीव जी एवं सागर जी से हमने बिदा लिया देर तक हाथ हिलाते हुए बब्बन मिंया स्मृति में आ गए ।

राजीव जी से क्षणिक मुलाकात उनका व्यक्तित्व‍ मेरे लिए उनके बस्तर प्रेम के कारण बहुत अहमियत रखता है तिस पर शानी की याद । शानी नें तो बस्तर को संपूर्ण हिन्दी जगत में अमर कर दिया है, सच माने तो हमने भी बस्तर को शानी से ही जाना । उनकी कालजयी कृति ‘काला जल’ नें तो अपने परिवेश से प्रेम को और बढा दिया ।

‘काला जल’ या शानी का उल्लेख जब जब होता है जगदलपुर का वह तालाब स्मृति में जीवंत हो उठता है, उसके पात्र व कथानक गड्ड मड्ड रूप में कई कई बार मन में उमडते हैं पर ठीक से याद नहीं रह पाते । राजीव जी के याद दिलाने पर मुझे उसे पढने की इच्छा पुन: जागृत हो गई । यह उपन्यास मेरी नजरों में लगभग 1982-83 में आई थी और 1983 की गर्मियों में मैंने इसे पढा था । यह मेरे गांव में मेरी मां की सहेजी गई निजी लाईब्रेरी में थी । मेरी मॉं हंस व सारिका की अनियमित पाठक थी एवं धुर गांव में भी जिसे मैंनें बाद में समझा कि इसे साहित्य कहा जाता है, ऐसे किताबों की भी पाठक थीं और संग्रह भी करती थीं । अत: मैं ‘काला जल’ को पाने के लिए पिछले रविवार को गांव जा पहुचा जहां उनकी किताबें नहीं मिल पाई किन्तु हंस व सारिका के कुछ फटे पुराने अंक व अन्य पत्रिकायें ही मिल पाई पुस्तनकें नदारद थी ।

मेरी मॉं एवं मेरे पिता की मृत्यु के बाद गांव का घर लगभग सराय सा हो गया है और जिन्हें जो अच्छा लगा वे बहुत पहले ही ले गए । सो ‘काला जल’ मुझे वहां नहीं मिल सका । घर की देररेख के लिये जिसे हमने गांव में रखा है उसने जब हमें कागजों की ढेर में जूझते देखा तो पूछा ‘दाउ का खोजत हावस?’ उसे बताने का कोई औचित्य नहीं था किन्तु उसने एक कमरे में ले जाकर मुझे दो तीन पुस्तकें दिखाई जिसे किसी मेहमान नें मेरे पिताजी के मृतक कार्यक्रम के समय पढ कर वहीं रख दिया था और कमरा बरसों से ताले में बंद था । मेरी खुशी का ठिकाना न रहा, धूल में अटा ‘काला जल’ वहां मिल गया ।

ऐसी कृतियों को पढने के प्रति रूचि जागृत करने का पाठ मैंनें अपनी मॉं से सीखा था । मॉं मिडिल स्कूल तक ही पढी थी और इसी बीच में वह बहू बनकर मेरे दादा के गांव में आ गई थी जहां महिलाओं को पढाने का रिवाज नहीं था । मेरे दादा की मालगुजारी थी और बीसियों लठैतों के साथ पच्चीसों हल चलते थे आवश्यक संस्कृत के अतिरिक्त अन्य शिक्षा को तनिक भी महत्व नहीं दिया जाता था । ऐसी परिस्थितियों में भी मॉं की ऐसी रूचि, मानसिक क्षमता एवं साहित्तिक अभिरूचि को देखकर मुझे आश्चर्य होता था । भीष्म साहनी की तमस जब पहली बार प्रकाशित होकर बाजार में आई और मॉं के हाथ लगी तब की कुछ बातें स्मृति में हैं । मेरे बडे भाई बताते हैं, उन दिनों वो तमस के कथानकों एवं उस समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों को तमस के कथानक में जोडने, उसमें उभारने एवं कुछ चरित्रों पर कम प्रकाश डालने के लेखक के उद्देश्यों पर चर्चा करती थी पर हमें यह सब समझ में नहीं आता था और जब तमस टीवी में आई तो उसे देखने में जो आनंद आया उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ।

कथानक व कृति की तत्कालीन उपादेयता पर उनका ध्यान व बहस हमेशा केन्द्रित रहता था । ऐसे समय पर भी वे गंभीर चिंतन करती जब किसी पुस्तक का पुर्नप्रकाशन हुआ हो । संस्करणों के बीच की अवधि को अपने मोटे चश्में से निहारते हुए पहले बुदबुदातीं और हमें बतलातीं कि यह पुस्तक फलां से फलां सन् तक सर्वाधिक बिकी है । इसका भी क्या मतलब होता है यह हम नहीं जानते थे यद्धपि वह भारतीय परिस्थितियों , किताब के कथानक या विषय को उन वर्षों से जोडकर समझाती थीं पर हमारे पल्ले नहीं पडती थी । आज इन बहुत सारी यादों को संजोंना उन पर चर्चा करना अच्छा लगता है । ‘काला जल’ के कथानक की तरह ।

मेरे गांव से मेरे वर्तमान निवास दुर्ग तक का लगभग 125 किलोमीटर का सफर इन्हीं यादों में कट गया । यहां आते ही ‘काला जल’ को एक ही बैठक में पी गया । गुलशेर अहमद ‘शानी’ के इस काला पानी रूपी जीवन प्रणाली में अमानवीय और प्रगतिविरोधी मानों और मूल्यों की असहनीय सडांध में डूबते उतराते बब्बन, मिर्जा करामत बेग, बी दरोगिन, रज्जू मिंया, रोशन, मोहसिन, छोटी फूफी, सल्लो आपा नें पुन: बस्तर को जीवंत कर दिया ।

आपको भी यदि अवसर मिले तो अवश्य पढें शानी की सर्वश्रेष्ठ कृति  ‘काला जल’ ।


संजीव तिवारी

'पहल' के बंद होने पर महावीर अग्रवाल जी की त्‍वरित टिप्‍पणी

"पहल के प्रवेशांक से लेकर अभी-अभी प्रकाशित 90 अंक तक का एक-एक शव्‍द मैंने पढा है । पहल मेरे लिए एक आदर्श पत्रिका प्रारंभ से लेकर आज तक रही है । पहल के संपादक ज्ञानरंजन से प्रेरणा लेकर ही मैंने 'सापेक्ष' पत्रिका प्रारंभ की थी जिसके अभी तक 50 अंक छप चुके हैं । 

पहल का बंद होना मेरे लिए सिर्फ एक दुखद घटना नहीं है वरण मैं यह मानता हूं कि पहल के बंद होने से सुधी पाठकों की दुनियां में एक शून्‍यता और निराशा आयेगी । मेरी ज्ञानरंजन जी से दूरभाष पर चर्चा हुई उन्‍होंनें कहा - अब लिखेंगें पढेंगें और मित्रों से भेंट मुलाकात करेंगें । मुझे लगता है नई पीढी में कोई न कोई आयेगा और ''पहल'' के काम को आगे जरूर बढायेगा । "


डॉ. महावीर अग्रवाल 
संपादक - सापेक्ष

सापेक्ष 47 - हबीब तनवीर का रंग संसार, सापेक्ष 48 - उत्‍तर आधुनिकता और द्वंदवाद, सापेक्ष 49 विज्ञान का दर्शन (फ्रेडरिक एंगेल्‍स का योगदान), सापेक्ष 50 - हिन्‍दी आलोचना पर

इस ब्‍लाग पर कल पढें - 'राजीव रंजन, शानी और काला जल'  
 

सरखों में श्याम कार्तिक पूजा : प्रो. अश्विनी केशरवानी

छत्‍तीसगढ आदि काल से अपनी परम्परा, समर्पण की भावना, सरलता और उत्सवप्रियता के कारण पूरे देश में आकर्षण का केंद्र रहा है। यहां के लोगों का भोलापन और प्रकृति का निश्छल दुलार का ही परिणाम है कि यहां के लोग सुख को तो आपस में बांटते ही हैं, दुख में भी विचलित न होकर हर समय उत्सव जैसा महौल बनाये रखते हैं। किसी प्रकार का दुख इनके उत्सवप्रियता में कमी नहीं लाता। झूलसती गर्मी में इनके चौपाल गुंजित होते हैं, मूसलाधार बारिश में इनके खेत गमकते हैं और कड़कड़ाती ठंड में इनके खलिहान झूमते हैं। ''धान का कटोरा'' कहे जाने वाले इस अंचल के लोगों के रग रग में पायी जाने वाली उत्सवप्रियता, सहजता और वचनबद्धता कई तरीके से प्रकट होते हैं। ''श्याम कार्तिक महोत्सव ' उनमें से एक है जो छत्‍तीसगढ में अपनी तरह का अनूठा आयोजन है। नवगठित जांजगीर-चांपा जिले का एक छोटा सा गांव सरखों में मुझे यह अनूठा आयोजन देखने को मिला।

जांजगीर जिला मुख्यालय के नैला रेल्वे स्टेशन से मात्र ३-४ कि.मी. की दूरी पर एक छोटा सा गांव सरखों स्थित है। पक्की सड़क और निजी बस इस गांव को अन्य गांवों से जोड़ती है। सड़क के दोनों ओर खेत और खेतों में कटने के लिए तैयार धान की फसल। धान की सोंधी महक मेरे मन को प्रफुल्लित कर रही थी.. और हमारी मोटर सायकल धीरे धीरे प्रकृति के इस आनंद उत्सव का आनंद लेती जा रही थी। शंकर भाई गाड़ी चला रहे थे और बीच बीच में मेरे उल्टे सीधे प्रश्नों का उत्‍तर भी देते जा रहे थे। दिन भर के इंतजार के बाद शाम को सरखों जाने का संयोग बना था। कार्तिक पूर्णिमा का दिन वैसे भी छत्‍तीसगढ वासियों के लिये महत्वपूर्ण होता है। श्याम कार्तिक महोत्सव का अंतिम दिवस होने के कारण सड़कों में जबरदस्त भीड़ थी-औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े और मनचले युवकऱ्युवतियां पैदल, साइकिल, भैंसा गाड़ी, बस, टे्रक्टर और जीप में बैठकर जा रहे थे। सबकी एक ही मंजिल थी- सरखों। मेरी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी, मन में कई प्रकार के प्रश्न उठ रहे थे...।

जांजगीर जिला कृषि के क्षेत्र में अत्यंत समृद्ध है और उनकी समृद्धतता यहां के खेतों में दो बार फसल होने के कारण है। यही नहीं बल्कि इस जिले में सरखों, जर्वे, सिवनी आदि गांवों में अनेक प्रतिभाएं छत्‍तीसगढ को गौरवान्वित करती रही है। उच्च शिक्षा, भारतीय प्रशासनिक सेवा, चिकित्सा आदि महत्वपूर्ण पदों पर यहां की प्रतिभाएं पदस्थ रही है। इससे यह गांव शुरू से चर्चित रहा है। ये बात अलग है कि ये प्रतिभाएं अपने गांव की ओर मुड़कर नहीं आये और उनकी उपेक्षा भाव माता पिता की बूढ़ी आंखों को जी भरकर रूलाया है और बूढ़ेपन में बिना सहारे जीने को मजबूर कर दिया है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहें....?

शंकर भाई ने मोटर सायकल अचानक रोक दी- सरखों आ गया भई ! मेरी विचार श्रृंखला अचानक टूट गयी और मैं अपने को सरखों के भीड़ में पाया। शाम गहराती जा रही थी और रोशनी के बावजूद अंधेरापन महसूस हो रहा था। मुझे लगा दिन में आते तो अच्छा होता ? हम लोग एक भीड़ भरे घर में दाखिल हुए। लोगों ने वहां हमारा बड़ा आत्मीय स्वागत किया। एक महिला आगे आकर हमारा स्वागत करती हुई साधिकार बैठक में ले गई और मना करने के बावजूद जलपान करने के लिए ले आयी। शंकर भाई मेरा उनसे परिचय कराते हैं- ये अश्विनी केशरवानी हैं, चांपा के कालेज में पढ़ाते हैं और पेपर में लिखते भी हैं...श्याम कार्तिक महोत्सव देखने आये हैं..और ये इस गांव की सरपंच हैं- श्रीमती कुमारी बाई राठौर। मैंने हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया। उनकी सहजता, सादगी और आत्मीयता देखकर मैं अभिभूत हो गया। आज के स्वार्थी दुनियां में ऐसे लोग भी हैं जो नि:स्वार्थ होते हैं। पूरा गांव इसी भाव से से बाहर से आये मेहमानों, रिश्तेदारों के स्वागत सत्कार में लगा हुआ था। गांव में त्योहार जैसा माहौल था। गांव का ऐसा कोई भी घर नहीं था जहां मेहमान न आया हो ? वैसे भी कार्तिक मास सनातन धर्मी लोगों के लिए महत्वपूर्ण मास है। इस मास में सार्वाधिक व्रतोत्सव होते हैं। कार्तिक मास की कथाओं या पौराणिक प्रसंगों के कारण ही नहीं बल्कि भौगोलिक, पर्यावरण, वैज्ञानिक और ज्योतिष कारणों से भी महत्वपूर्ण है। कृतिका नक्षत्र जिस पूर्णिमा को होता है वह मास कार्तिक का होता है। चंद्रमा उच्च का होता है अर्थात् पितर प्राण पृथ्वी पर दूरी पर होते हैं और सौर प्राण पृथ्वी के करीब होता है। मास का प्रत्येक दिन, प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण होता है।

...और हम जब गांव के गुड़ी में पहुंचे तब श्री श्याम कार्तिक महाराज की शोभायात्रा निकल चुकी थी और गांव के बड़े बुजुर्ग इस आयोजन में सहभागी बने गुड़ी में उपस्थित थे। इस गांव का गुड़ी गांव के बीच में स्थित है। सामने पंचायत भवन है। गांव के चारों ओर छोटे बड़े तालाब हैं। तालाबों की उपादेयता पहले दैनिक उपभोग, स्नान-ध्यान और खेतों की सिंचाई आदि के लिए थी। छत्‍तीसगढ के गांव तालाबों के मामले में जरूर सम्पन्न है। लेकिन इन तालाबों से सिंचाई अब नाम मात्र को होता है। अब उसमें नहाने भी कोई नहीं जाता बल्कि उसमें मछली की खेती होती है। इससे ग्राम पंचायत की आमदनी होती है। शायद खेत इसीलिए सूखते जा रहे हैं? उसकी निर्भरता या तो वर्षा के पानी अथवा बिजली की मदद से बोरिंग पर है। बहरहाल, सरखों में नहर से सिंचाई होती है। यहां एक से पांच एकड़ खेत वाले किसान अधिक हैं और चांपा जमींदारी से जुड़े मालगुजार लाल अमीरसिंह जी का परिवार और कुछ ''पोठ किसान'' हैं। सभी सुसम्पन्न और तन, मन और धन से इस महोत्सव में अपनी भागीदारी देते हैं। गांव के बड़े बुजुर्ग श्री दादूराम साव, श्री झाड़ूराम साव, पूर्व सरपंच श्री भरतलाल राठौर ने मुझे बताया कि सब गांव की तरह हमारे गांव में भी दीपावली में गौरी पूजा किया करते थे। बरसों की इस परंपरा में एक बार ऐसा मोड़ आया कि श्री सोनाऊ केंवट का प्रस्ताव-'' हमारे गांव में क्यों न श्याम कार्तिक महाराज की मूर्ति स्थापित करके पूजा-अर्चना किया जाये..'' को गांव वालों ने आज से लगभग ४०-४२ साल पहले मान लिया था। तब से आज तक श्री श्याम कार्तिक महाराज की पूजा हम करते आ रहे हैं। बहुत दिनों तक श्री श्याम कार्तिक महाराज को एक लोहार के दुकान में बैठाते थे। कुछ ही वर्ष पहले सबकी सहमति से अब गांव के गुड़ी में श्री श्याम कार्तिक महाराज को बिठाने लगे हैं। एक वर्ष सरखों में तो दूसरे वर्ष बोड़सरा में यह महोत्सव होता है। जिस वर्ष सरखों में यह महोत्सव होता तो बोड़सरा में नवधा रामायण होता है। इसी प्रकार जिस वर्ष बोड़सरा में यह महोत्सव होता है तो सरखों में नवधा रामायण होता है। लेकिन सरखों में ही केवल श्री श्याम कार्तिक महाराज की मूर्ति स्थापित करके पूजा अर्चना की जाती है। कार्तिक मास के दूसरे पाख के छट से पूर्णिमा तक नौ दिन तक श्री श्याम कार्तिक महाराज की मयूर में विराजित छ: सिरों और बारह हाथ वाले मनमोहक मूर्ति की स्थापना की जाती है। साथ में शिव पार्वती और उसकी परिक्रमा करते श्री गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं। अन्य झांकी में श्री कृष्ण जी की माखन खिलाते यशाोदा जी की मूर्ति होती है। ये मूर्तियां गांव के ही मूर्तिकार स्व. श्री शिवलाल श्रीवास, घासीराम आदि बनाते थे। वर्तमान में बलराम साव बनाते आ रहे हैं। इस उत्सव में नवयुवकों की पर्याप्त हिस्सेदारी होती है। श्री श्याम कार्तिक महोत्सव के अध्यक्ष श्री अजय सिंह राठौर, ने बताया कि इस महोत्सव मंे पूरा गांव एकजूट होकर कार्य करता है। स्वस्फूर्त होकर नवयुवक वालिंटरी करते हैं। घर की औरतें बाहर से आये बहू-बेटियों, रिश्तेदारों और मेहमानों की खातिरदारी करने में पूरा सहयोग करती हैं। इतने बड़े आयोजन में पुलिस की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती।

इस गांव में श्री श्याम कार्तिक महाराज की पूजा का प्रथम अधिकार पूर्व मालगुजार लाल अमीरसिंह के परिवार को प्राप्त है। नौ दिन तक चलने वाले इस महोत्सव में आप-पास के गांवों के सभी नागरिकों को सम्मिलित होने का निमंत्रण भेजा जाता है और सरखों में उनका आत्मीय स्वागत किया जाता है, जो अमूमन दूसरी जगह देखने को नहीं मिलता। चार वार्डो में निवासरत अनुसूचित जाति की बस्ती में स्वजातीय बंधुओं की मेहमान नवाजी भी उल्लेखनीय है। छोटे-बड़े हर प्रकार के दुकान, होटल आदि यहां लगता है। कार्तिक पूर्णिमा इस उत्सव का अंतिम दिन होता है। दोपहर में पूजा, हवन आदि के बाद श्री श्याम कार्तिक महाराज की शोभायात्रा निकलती है जो पूरे गांव की गलियों में भ्रमण करके पुन: गुड़ी में लायी जाती है और नवा तालाब में नाव खेलने के बाद रात्रि में उसे विसर्जित कर देते हैं। इस दृश्य को हजारों-लाखों आंखें अपलक निहारते हैं। पंचायत द्वारा जल ग्रहण मिशन के सहयोग से इस तालाब को बंधाने का कार्य किया गया है। लेकिन चारों ओर से सर्च लाइट लगाकर नांव खेलने के दृश्य को फोकस किया जाये तो यह दृश्य और आकर्षक बन सकता है। लेकिन प्रशासन, दैनिक समाचार पत्रों और मीडिया की नजरों से दूर इस गांव की यह अनूठी परंपरा स्वस्फूर्त रूप से बदस्तूर जारी है। शोभायात्रा के दौरान हर घर के सामने उनकी पूजा-अर्चना कर आरती उतारी जाती है। सबके सहयोग से श्री श्याम कार्तिक महाराज की शोभायात्रा निर्विघ्न सम्पन्न होती है। कवि किशोर पांडेय गाते हैं :-

जय स्कंद कारतिक स्वामी। चराचरन के अंतर जामी।।
सकल परानी के हिय कंदर। बइठे नित गुह बनके उज्जर।।
कउनो आरो तब नहिं पावैं। नांव ठांव सब गुपुत बतावैं।।
तैं हस स्वयं गुपुत के ज्ञाता। जय जय हे गनपति के भ्राता।।
मइहन परम अनु ले जादा। हव महान तुम कतका गादा।।
जानकार करन कारज के। तन अवतरिस पझरिहा रज के।।
गरभ ले खसल परै उमा के। पाय सरूप परम अतमा के।।

स्कंद पुराण के अनुसार श्री गणेश के अग्रज कार्तिक महाराज आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने और शिव भक्ति का दक्षिण भारत में प्रचार करने के लिए जप तप करने लगे। दक्षिण भारत में कार्तिक भगवान को ''श्री मुरगुन स्वामी'' के रूप में पूजा जाता है। कवि किशोर की बानगी पेश है :-

देउता तीरिथ रिसि अउ मुनी। दउड़य करौंच कातिक पुन्नी।।
दक्खन परमुख देव कहावैं। मुरगुन स्वामी नाव धरावैं।।
ब्रह्मचर्य के शक्ति देवैया। शुभदानी अउ पाप हरैया।।
हवै मंजुर के तुंहर सवारी। जै शिखि ध्वज अखंड ब्रह्मचारी।।

ब्रह्मचर्य, शक्ति और श्री रूद्रायामल तंत्र के अन्नो बढ़ाने वाले श्री श्याम कार्तिक महाराज के बखान इन शब्दों में सुनिये :-
छह मुखमंडल कमल हे प्रमुदित। बारह विशाल नयन आनंदित।।
बाजू बारह उठे अकाशा। बारह धरय अस्त्र अघनाशा।।
शांत चतुरभुज रूप तव सुघरा। हाथ अभय वर शक्ति अउ कुकरा।।
तैं उन मंगलवार के राजा। बाधा नाश तुंहर हे काजा।।
परम पबित हे तोर सरूपा। जय जय सुर सिरमोर युधूपा।।

दक्षिण भारत में पूजित श्री श्याम कार्तिक स्वामी यूं अचानक जांजगीर क्षेत्र में कैसे पूजे जाने लगे यह प्रश्न आज भी अनुत्‍तरित है। लेकिन इनकी पूजा की अनूठी परंपरा से सरखों, बोड़सरा और खोखरा और इस क्षेत्र के लोगों में आपसी भाईचारा का संदेश लोकहित में उचित भी है। मुझे सरपंच काकी की बात ''...कारतिक महराज के दरसन करा, घर में खाहा-पीहा, रथिया मा गम्मत देखिहा अउ बिहना जाहा..। में महोत्सव का सारा निचोड़ दिखता है। उन्हें मेरा साधुवाद।

रचना, आलेख, फोटो एवं प्रस्तुति -

प्रो. अश्विनी केशरवानी
''राघव'' डागा कालोनी,
चांपा-४५६७१ ( छत्‍तीसगढ )

नया मेहमान

कल रात  को घर आकर फ्रेश होकर बैठा तो मेरा बालक नारियल हाथ में लेकर खडा हो गया ।  अगरबत्‍ती लगाकर इसे तोडे, हमने बिना त्‍यौहार कारण पूछा तो उसनें बतलाया । हमारे कालोनी के मकानों में गार्डनिग के लिए भरपूर जगह दिये गये हैं जिसमें कईयों नें बागवानी के अपने शौक को पूरा किया है जिसमें से किसी के गार्डन में एक बिल्‍ली नें चार बच्‍चे दिये थे और बच्‍चों के आंख खुलने के बाद से वह पूरे कालोनी में कभी यहां तो कभी वहां अपने बच्‍चों को छोड कर घूमती रही है ।

अब खबर यह थी कि बिल्‍ली अपने एक एक बच्‍चों को अलग अलग घरों के गार्डन में छोड आयी है और बच्‍चे दिन भर अपनी मॉं से मिलने की आश में चिल्‍ला रहे हैं ऐसा ही एक बच्‍चा पिछले दो दिन से हमारे घर के बाउंड्री में रखे कबाडों के पीछे छुपा चिल्‍ला रहा था, मेरा बालक इससे अतिआकर्षित व उत्‍साहित हो रहा था वहीं मेरी श्रीमतीजी को इस आवाज से काफी गुस्‍सा आ रहा था पर उसे बंद कराने का जरिया मात्र उसे उसकी मॉं से मिलाना था जो संभव नहीं दिख रहा था, अब उसके क्रोध नें भक्ति का सहारा लिया जो स्‍वाभाविक तौर पर महिलाओं में देखी जाती है, उसके मॉं से उसे मिलाने की मन्‍नत स्‍वरूप नारियल 'चढाया गया और चमत्‍कार स्‍वरूप अगले दिन उसकी मां शाम को पिछवाडे वाले खण्‍डेलवाल आंटी के गार्डन में आयी तो श्रीमतिजी नें हमारे घर में छूटे बच्‍चे को भी उसके पास पहुँचा दी । बच्‍चे को पूरे तीन दिन बाद मॉं का दूध व साथ मिला था ।
उमंग व उत्‍साह को मेरे घर में पाकर मैं मुदित था ।

मेरे संस्‍था प्रमुख की कृपा से मेरे दुर्ग निवास का लगभग संपूर्ण समय कम्‍पनी के द्वारा ही उपलब्‍ध कराए गए आवास में बीत रहा है । इस आवास से मेरा लगाव इसलिये कुछ ज्‍यादा है कि मैं जब गांव में रहता था तब भी शिवनाथ नदी मेरे घर के करीब बहती थी और यहां मीलों दूर शहर में भी शिवनाथ मेरे घर के करीब ही बहती है और बरसात के दिनों में जब वह अति उत्‍श्रृंखल हो जाती है तो उसी तरह मेरे इस शहर के घर में भी घुसती है जैसे वह गांव के घर में बेरोकटोक घुस आती है, पर यहां ऐसी स्थिति दो-तीन साल में एकाध बार ही होता है सो हम जैसे तैसे सामानों को सम्‍हालते हैं और उपर व्‍यवस्थित करने की जुगत में लगते हैं कभी कभी इस जुगत में लगने वाले समय तक शिवनाथ वापस चली जाती है और हमें इसी बहाने घर के सामानों को पुन: दीपावली के पूर्व ही व्‍यवस्थित करने का बहाना मिल जाता है ।

अब बरसात और दीपावली दोनों अपने उमंग की खुशबू बिखेरती हुई गुजर गई है पर मेरे कालोनी की गलियों में अब भी फटाकों की चुट-पुट जारी है । फटाका चलाते बच्‍चों और पटाकों से बचते बंचाते कल रात आफिस से घर पहुंचा, तो घर में उत्‍साह व उमंग के साथ एक नये मेहमान को देखकर मैं चकराया । मेरा पुत्र अति उत्‍साहित नजर आ रहा था किन्‍तु श्रीमतीजी कुछ चिंतित । मेहमान महोदय को जब हम देखे तो हमारा भी प्‍यार उमड पडा । हमने श्रीमतीजी से पालतू जानवरों से चिढने वाले अपने स्‍वभाव के बावजूद बिल्‍ली के बच्‍चे को अचानक अपने घर में पनाह देने का कारण पूछा तब उसनें बतलाया कि  बिल्‍ली आज भी अपने बच्‍चे को दूध पिलाने नहीं आई है और यह दिन भर चिल्‍लाई है मेरे कान पक गये हैं इसकी आर्तनाद सुनकर मुझसे नहीं रहा गया तो इसे घर के अंदर ले आई  । स्‍वाभाविक मानवीय भावनाओं को जीवंत देखने में आनंद आता है आज भी मोगैम्‍बो खुश हुआ ।

मैं अपने ग्रामीण पन को जीवित रखने के प्रयास में ठंड आते ही सुबह-सुबह गार्डन एरिया में इंटो को चूल्‍हे का शक्‍ल देकर आग 'तापता' हूं और उसका सदुपयोग करते हुए पत्‍नीश्री उसी से सभी के लिए नहाने का पानी भी गरम कर देती है । सुबह उठकर देखा तो श्रीमतीजी ड्रापर से उस बिल्‍ली के बच्‍चे को दूध पिलाने में मगन थी,चूल्‍हा ठंडा था । सो हमने सेल्‍फ सर्विस का मंत्र बुदबुदाते हुए चाय की गंजी उठाई पर उसकी आवाज ने श्रीमतीजी के तंद्रा को तोडा और हमारी चाय से लेकर सुबह के नास्‍ते की व्‍यवस्‍था हो पाई । ड्रापर में दूध पीने के बाद इस बिल्‍ली के बच्‍चे नें घर में खूब उधम मचाया । उसे खेलते देखकर बरबस चेहरे पर मुस्‍कान आ जाती थी । देर तक उसके खेल को देखने के बाद आज वोट डालकर लेट से आफिस के लिए निकला ।
रास्‍ते में उस बिल्‍ली के बच्‍चे की यादें छाई रही । लगता है लोग इसीलिये पालतू जानवर घर में रखते हैं,  व्‍यस्‍त जिन्‍दगी में अटैचमैंट के लिए भावनाओं का बयार मनुष्‍य को छूकर नहीं निकलती । पर इन भावनाओं को महसूस  मनुष्‍य ही करता है ................ 

संजीव तिवारी

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

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