प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग की स्थापना - एक परिकल्‍पना Establishment of Migrant Chhattisgarhia Department - a vision by Ashok Tiwari

Establishment of Overseas Chhattisgarhia Department

प्रवासी भारतीय दिवस की शुरुआत विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों और अनिवासी भारतीयों के साथ आर्थिक -सांस्कृतिक संबंध की स्थापना एवं संवर्धन के उद्देश्य के लिए किया गया है। इसकी शुरुआत के लिए भारत सरकार ने पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में एक उच्च स्तरीय समूह का गठन किया था जिसके मुखिया पूर्व राजनयिक डॉ. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी थे। उनके द्वारा तैयार प्रतिवेदन के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी ने सन 2002 में इस दिवस को आयोजित किये जाने के बारे में घोषणा की और 2003 से इसे प्रतिवर्ष 9 जनवरी को मनाने की शुरुआत की गई। 9 जनवरी का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि इस दिन महात्मा गांधी सन 1915 में दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत लौटे थे। तब से अर्थात 2003 से प्रतिवर्ष 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन देश के किसी न किसी शहर में किया जाता है जिसमें दुनिया भर में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अर्थात पी आई ओ (PIO -Person of Indian Origin) और अनिवासी भारतीय अर्थात एन आर आई (NRI-Non Resident Indian) सम्मिलित होते हैं। आयोजन के अंतर्गत चयनित प्रतिभागियों को प्रवासी भारतीय सम्मान भी प्रदान किया जाता है।

भारतीय मूल के लोग मुख्यतः उन्हें कहा जाता है जिनके पूर्वज सैकड़ों वर्ष पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा इंडेंचर्ड लेबर के रूप में मजदूरी करने के लिए भारतवर्ष से ले जाए गए थे और वे लोग कालांतर में उन देशों में ही बस गए और क्रमशः उन देशों के मुखिया भी बने, भाग्य निर्माता बने तथा उन देशों के लिए विकास के सोपान रचे। इस श्रेणी में फिजी, ग्रेनाडा, गयाना, जमाईका, मॉरीशस, सेंट लूसिया, सैंट विंसेंट एंड ग्रैनेडाइंस, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम और त्रिनिडाड और टोबेगो में निवास करने वाले भारतवंशी आते हैं। इस श्रेणी में व्यापार या अन्य कारणों से सैकड़ों वर्षों से कई पीढ़ियों से विदेश में बसे लोग भी आते हैं।दूसरी श्रेणी के भारत लोग जिन्हें अनिवासी भारतीय कहा जाता है वे व्यापार और और शिक्षा के आधार पर बेहतर जीवन यापन के लिए दुनिया के विभिन्न देशों में पिछले लगभग एक शताब्दी से देश से अलग अलग समय में जाने लगे हैं। यह क्रम पिछली तीन चार दशकों में ज्यादा बढ़ा है। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में 3.2 करोड़ भारतीय विदेशों में रहते हैं जो दुनिया भर के 210 देशों में निवासरत हैं, काम करने के लिए अस्थायी निवासी के रूप में या स्थायी निवासी/नागरिक के तौर पर जिसमें सबसे अधिक लोग, लगभग 45 लाख तो अमेरिका में ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरेबिया, मलेशिया, म्यानमार, कनाडा, ब्रिटेन, बहरीन, श्रीलंका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, सिंगापुर, फिलीपीन, ओमान, नेपाल, आस्ट्रेलिया इत्यादि देशों में अनिवासी भारतीयों की संख्या लाखों में है।

भारत सरकार ने इन अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के लिए प्रवासी भारतीय दिवस मनाए जाने के साथ ही सन 2004 में एक अलग मंत्रालय की स्थापना की थी जिसे प्रवासी भारतीय मंत्रालय कहा जाता था किंतु बाद में सन 2016 में इस मंत्रालय का विदेश मंत्रालय में संविलियन कर दिया गया और अब यह विदेश मंत्रालय के अधीन एक विभाग के रूप में कार्यरत है ।भारत सरकार के प्रवासी भारतीय मंत्रालय की स्थापना या विभाग के गठन के आधार पर देश के अनेक राज्यों में भी उस राज्य की प्रवासी जनसंख्या जो विदेश जाकर बस गयी या वहां कार्यरत हैं उनके लिए पृथक विभाग या मंत्रालयों की स्थापना की गई जो भारतवर्ष के बाहर और देश के विभिन्न राज्यों में निवास करने वाले उस राज्य विशेष के लोगों के साथ आर्थिक सांस्कृतिक संबंध की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण का कार्य करते है किंतु छत्तीसगढ़ में अभी तक ऐसी किसी व्यवस्था का सृजन नही किया गया है।

मानव के शारीरिक उद्विकास और सामाजिक उद्विकास के अध्येता मानते हैं कि मनुष्य का उद्भव अफ्रीका महाद्वीप में हुआ था जहां से वह धीरे धीरे दुनिया के विभिन्न भागों में फैल कर उन् क्षेत्रों के स्थाई निवासी बन गया। यह सिलसिला जब से मनुष्य इस धरती पर उदविकसित हुआ है तब से शुरू हुआ और अब भी जारी है।

छत्तीसगढ़ के लोग भी इसी तरह के प्रवासन की जीवन पद्धति के बहुत पुराने संवाहक हैं ।लिखित इतिहास से ज्ञात होता है की 19वीं शताब्दी के अंत में सन अट्ठारह सौ पचास के आसपास जब असम में अंग्रेजों ने चाय बागान विकसित करने शुरू किए तब उन्हें कर्मठ मजदूरों की आवश्यकता थी। उन लोगों को छत्तीसगढ़ वासियों में मेहनत और कर्मठता नजर आई और तब अंग्रेजों द्वारा छत्तीसगढ़ के लोग समीपवर्ती छोटा नागपुर के आदिवासी लोगों के साथ मजदूर बनाकर चाय बागान में काम करने के लिए असम ले जाये गए ।यह सिलसिला आज़ादी के कुछ साल पहले तक जारी रहा अर्थात लगभग डेढ़ सौ साल पहले संभवतः छत्तीसगढ़ से लोगों का अन्यत्र प्रवासन प्रारंभ हुआ था जो अब भी जारी है। छत्तीसगढ़ के समूचे इलाकों में, चाहे वह सरगुजा हो या मैदानी छत्तीसगढ़ या बस्तर अंचल, इन सभी क्षेत्रों में कमाने खाने के लिए अन्यत्र जाने का सिलसिला सैकड़ों सालों से चल रहा है और अब भी जारी है। असम के बाद जमशेदपुर या टाटानगर एक ऐसा क्षेत्र था जहां पर जमशेदजी टाटा ने पिछली शताब्दी के आरम्भ में जब इस्पात कारखाना शुरू किया तब छत्तीसगढ़ से लोग वहां काम करने के लिए ले जाए गए। यह कहा जाता है कि आज भी टाटानगर का कारखाना छत्तीसगढ़ी श्रम के बलबूते झंडा बरदार बना हुआ है। अपने देश में असम के चाय की बात कहें या टाटानगर के लोहे की बात करें, इन सब के पीछे वे प्रवासी छत्तीसगढ़िया ही मूल कर्णधार हैं जिनके श्रम से ये पैदा होते हैं। इसके अतिरिक्त धीरे धीरे छत्तीसगढ़ के लोगों ने लगभग पूरे भारत में चाहे वह दिल्ली हो, जम्मू कश्मीर और लद्दाख हो, उत्तर प्रदेश हो या दक्षिण के राज्य हो या कहें तो समीपवर्ती महाराष्ट्र, ओडिशा, बंगाल हो, या फिर उत्तर पूर्व के लगभग सभी राज्य हों, इन सभी क्षेत्रों में जाकर तरह-तरह के काम करने शुरू किए, और फिर उन्होंने उन स्थानों को ही अपना या तो स्थाई निवास बना लिया, या सीजनल माइग्रेशन के आधार पर वहां काम करना शुरू कर दिया ।

छत्तीसगढ़ के लोगों का देश से बाहर काम करने के लिए जाने और वही बसने का भी हमें जो सबसे पुराना उदाहरण प्राप्त होता है उसके अनुसार सन उन्नीस सौ में एक जहाज में बैठकर लगभग 1000 छत्तीसगढ़ वासी फिजी द्वीप गए थे, अंग्रेजों के मजदूर अर्थात इंडेंचर्ड लेबर बन कर, और फिर वे वही बस गए, छत्तीसगढ़ वापस नहीं आए। यदि हम उन अन्य देशों की बात करें जहां पर भारत वर्ष से लोगों को इंडेंचर्ड लेबर के रूप में अंग्रेजों द्वारा ले जाया गया था और जहां फिर वे भारतीय मजदूर स्थाई रूप से बस गए। उन देशों के बारे में यह कहा जाता है कि वहां अधिकतर लोग बिहार और उत्तर प्रदेश से प्रवासन कर गए थे किंतु साथ ही इन सभी देशों के संदर्भ में यह भी लिखा गया है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ ही मध्य भारत से भी कुछ लोग मजदूर के रूप में काम करने के लिए उन देशों में गए थे और फिर वे वहां स्थाई रूप से बस गए।यदि यह मध्यभारत वाली बात प्रमाणित होती है तो सम्भव है वह क्षेत्र छत्तीसगढ़ ही रहा होगा क्योंकि तब मध्यभारत में छत्तीसगढ़ से ही लोग काम के लिए बाहर प्रवासन किया करते थे। इस तरह से हम पाते हैं की सौ डेढ़ सौ साल पहले से ही छत्तीसगढ़ के लोगों ने अंतः प्रवासन अर्थात देश के अंदर अन्य राज्यों में स्थाई रूप से बसना और बाह्य प्रवासन अर्थात देश के बाहर अन्य देशों में जाकर स्थाई रूप से बसना ,ये दोनों ही कार्य किया हुआ है।

दूसरी ओर शिक्षा और तकनीकी प्रचार प्रसार के बाद पिछले 5-6 दशकों से छत्तीसगढ़ के लोगों ने दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों में रोजगार के लिए जाना आरंभ किया और वहीं पर अभी भी रह रहे हैं तथा अपना और छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर रहे हैं।मेरी यथेष्ठ जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ से उच्च शिक्षा अर्जित कर विदेश में रोजगार हेतु जाने की शुरुआत पिछली शताब्दी के छठवें-सातवें दशक में हुई थी जब रायपुर के डॉ इंदु भूषण तिवारी, श्री कृष्णकांत दुबे और प्रो खेतराम चंद्राकर तथा बिलासपुर के डॉ श्याम नारायण शुक्ला इंग्लैंड, अमेरिका गए और कालांतर में वहाँ के स्थायी निवासी हो गए। बाद में यह क्रम बहुत घनीभूत हुआ और आज के तकनीकी विशेषज्ञता के युग मे छत्तीसगढ़ के हज़ारों लोग दुनिया के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं।

सभी प्रवासी छत्तीसगढ़िया लोगों के संदर्भ में कुछ स्थाई व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा किया जाए इसका आभास मुझे तब हुआ जब मैं असम में निवासरत छत्तीसगढ़ी लोगों के मध्य लगभग पिछले 5 सालों से जुड़ा हुआ हूँ। वहां लगभग डेढ़ सौ साल से निवास कर रहे हमारे छत्तीसगढ़िया समाज के लोगों के बीच जाकर न केवल मुझे लगा वरन उन सभी का यह प्रेम भरा आग्रह और कामना भी सुना और महसूस किया जिसके अंतर्गत वे चाहते हैं उसे यदि उनके शब्दों में कहा जाए तो छत्तीसगढ़ सरकार, क्योंकि अब एक छत्तीसगढ़ी पहचान वाले एक पृथक राज्य की सरकार है, उस राज्य की जिस राज्य से हम अपने पूर्वजों के आगमन को जोड़ते हैं, हमारी अपेक्षा है कि वह सरकार हमारे लिए कुछ ऐसी स्थाई व्यवस्था करें कि हम अपने पूर्वजों की भूमि से सांस्कृतिक संबंधों को फिर से आरंभ कर सकें। हमारा वहां आना जाना हो सके। हम डेढ़ सौ सालों से जिस संस्कृति को अपने बीच बचाए हुए हैं उसको चिरस्थाई बनाने के लिए हमें छत्तीसगढ़ की सरकार कुछ सहयोग करें। इन सब के लिए एक स्थायी व्यवस्था शुरू की जानी चाहिए ।

ज्ञातव्य है कि देश के अधिकतर राज्यों में वहां की शासन व्यवस्था में उन राज्यों के प्रवासी समुदायों के लिए प्रवासी विभाग कार्य करते हैं। इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करने वाले बिहार और गुजरात के प्रवासी विभागों का संदर्भ देना चाहूंगा जिसके अंतर्गत गुजरात शासन ने नान रेसिडेंट गुजराती अर्थात प्रवासी गुजराती लोगों के लिए एक फाउंडेशन की स्थापना की है जो देश में रहने वाले गुजराती लोगों के साथ गुजरात का संबंध स्थापित करने और उनके बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए तरह-तरह के गतिविधियों का संचालन करती है।इस फाउंडेशन के द्वारा हर वर्ष देश के किसी एक राज्य में सदा-काल गुजरात नामक आयोजन किया जाता है जिसमें पारंपरिक गुजराती संस्कृति से संबंधित कार्यक्रम होते हैं। हजारों की तादात में लोग इन कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए आते हैं। लगभग 4 वर्ष पहले रायपुर में भी सदा-काल गुजरात नामक का आयोजन हुआ था जिसमें गुजरात राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री विजय रूपाणी भी सम्मिलित हुए थे। उन्होंने यहां के गुजराती भाइयों से मुखातिब होते हुए यह कहा था कि आप भले ही गुजरात से हजारों किलोमीटर दूर रह रहे हो पर ऐसा नहीं है कि आप गुजरात से दूर हैं। आपको कभी भी गुजरात की याद आए आपको कभी भी किसी तरह से सांस्कृतिक असमिता को लेकर कोई चिंता आये पर तो आप फिक्र ना करें, एनआरजी है। आप संपर्क करें एन आर जी अर्थात नान रेसिडेंट गुजराती विभाग से जिसे आप जैसे देश दुनिया मे फैले गुजराती लोगों की सेवा के लिए स्थापित किया गया है।

इसी तरह से बिहार सरकार ने भी प्रवासी बिहारी फाउंडेशन नामक एक विभाग की स्थापना की है जो विदेश में रहने वाले बिहारियों के अतिरिक्त देश के अलग-अलग स्थानों में रहने वाले बिहार राज्य के प्रवासी लोगों के बीच उनके सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करती है। इस फाउंडेशन के द्वारा देश के अनेक अनेक राज्यों में जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बनारस, लखनऊ, अहमदाबाद आदि अनेक स्थानों में बिहार प्रवासी बिहार फाउंडेशन के चैप्टर स्थापित किए हुए हैं जो उस क्षेत्र या उस राज्य में रहने वाले प्रवासी बिहारियों के बीच संपर्क का कार्य करता है। इन संदर्भों को यहां पर उल्लेख करने का मेरा एकमात्र अभिप्राय है कि हमारे राज्य से प्रवासन संभवत देश के सबसे पुराने प्रवासनो में से एक है किन्तु हमने अभी तक अपने इन प्रवासी भाइयों के लिए कोई इस तरह की कार्यवाही नहीं की है।और तो और, पहले छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रतिवर्ष जो प्रवासी छत्तीसगढ़ी अलंकरण दिया जाता था उसे भी पिछले कुछ सालों से बंद कर दिया है, इसलिए मेरा विचार है कि छत्तीसगढ़ राज्य में भी एक प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग की स्थापना की जाए जिसके अंतर्गत हम फाउंडेशन का गठन करें या फिर सरकार सीधे सीधे उनके बीच जाकर कार्यवाही करें या जिन स्थानों पर हमारे छत्तीसगढ़िया भाई बंधु रहते हैं वहां स्रोत व्यक्तियों को नामित कर अपने गतिविधियों का संचालन करें। ये तमाम बातें और संचालित की जाने वाली गतिविधियां बाद में निर्धारित की जा सकती हैं। यह भी कोशिश की जा सकती है कि क्या फिजी के साथ ही अन्य देशों में भी इंडेंचर्ड लेबर के रूप में छत्तीसगढ़ के लोग गए थे और यदि गए थे तो किन-किन देशों में गए थे और वहां पर उनकी अभी संख्या क्या है। उन सभी को उनके मूल से जोड़ने के लिए संदर्भ स्रोत के रूप में भी हम मदद कर सकते हैं जिसके माध्यम से भी अपने को पहचान सकते हैं अपने गांव और अपने खानदान को पहचान सकते हैं। ये सब तो वैसे ही कार्यवाही होगी जो अन्य राज्यों के प्रवासी विभाग अपने प्रवासी समुदाय के लिए करती है, खासकर उन लोगों के लिए जो देश के बाहर काम करते हैं।

छत्तीसगढ़ के, अभी हाल के दशकों में अमेरिका में निवासरत प्रवासी छत्तीसगढ़ी लोगों ने उत्तर अमेरिका में नाचा नामक एक संस्था का गठन किया हुआ है जिसके माध्यम से वे छत्तीसगढ़ राज्य के साथ सांस्कृतिक संबंध बनाए हुए हैं और उन्होंने बड़े सम्मान के साथ छत्तीसगढ़ राज्य के पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों को सहेज कर रखा हुआ है और गर्व के साथ उसकी अभिव्यक्ति करते हैं, उसका प्रदर्शन करते हैं। इस तरह की संस्थाएं अभी हाल के दशकों में विदेश गए प्रवासी लोगों के बीच समूची दुनिया के देशों में स्थापित की जा सकती हैं। इसके लिए भी यह प्रस्तावित विभाग ठोस कार्यवाही कर सकता है ।ऐसा डाटा बैंक बना सकता है जिसके माध्यम से हम विदेश में रहने वाले छत्तीसगढ़िया और देश के अलग-अलग राज्यों में रहने वाले छत्तीसगढ़िया लोगों के बारे में आंकड़े एकत्र कर सकते हैं। उनकी पूरी जानकारी का संधारण कर सकते हैं और शायद ऐसा करना इसलिए भी बहुत उपयोगी होगा क्योंकि अभी छत्तीसगढ़ से लाखों की तादात में हर वर्ष लोग बाहर श्रमिक के रूप में काम करने के लिए जाते हैं। उनमे से कुछ वहीं रह जाते हैं और कुछ फिर काम करके अपनी खेती-बाड़ी के काम में हाथ बंटाने छत्तीसगढ़ आते हैं। उनका यह माइग्रेशन, सीजनल होता है।

ऐसे ही लोगों को कोरोनावायरस पर बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था जब वह इस महामारी के दौरान अपने कार्य क्षेत्रों को छोड़कर वापस अपनी मातृभूमि छत्तीसगढ़ लौटे थे। यदि हम प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग की स्थापना करते हैं, तो यह एक ऐसा विभाग होगा जो देश के सभी राज्यों और विदेश में छत्तीसगढ़िया जहां रहते हैं उन सभी देशों में अपने नेटवर्क स्थापित कर सकता है। उस नेटवर्क में ऐसे काम करने के लिए बाहर जाने वाले स्थाई रूप से रहने वाले लोगों की पूरी जानकारी रहेगी और किसी भी तरह की आपदा की स्थिति में राज्य सरकार उनके सहयोग और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम तत्काल उठा सकेगी। शायद ऐसे विभाग की स्थापना से न हम केवल अन्यत्र रहने वाले छत्तीसगढ़िया भाई बहनों के साथ एक सुदृढ़ और स्थाई सांस्कृतिक सेतु का निर्माण कर सकते हैं बल्कि उन सभी छत्तीसगढ़ीया भाई लोगों के हृदय की उस आस को पूरा कर सकते हैं जो उन्होंने अपने मन में संजोकर रखे हुई है, जिन्हें यह याद है कि उनके पूर्वज छत्तीसगढ़ से थे, और उनकी आकांक्षा है कि उनके अपने पूर्वजों की भूमि छत्तीसगढ़ के साथ एक ऐसे संबंध की स्थापना हो जिस संबंध में मिठास हो ,जिस संबंध में स्थायित्व हो और जो संबंध उन्हें अपने मातृभूमि के साथ आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से जोड़ता है। प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग का गठन एक ऐतिहासिक निर्णय होगा हो हमारे इंटरनल और एक्सटर्नल डायस्पोरा के अनुमानित 30-40 लाख लोगों के लिए उद्देशयित होगी। अर्थात हमारे राज्य की वर्तमान जनसंख्या के आधार पर औसतन लगभग तीन से चार जिलों की जनसंख्या के बराबर।

-अशोक तिवारी

पंथी का दैदीप्‍यमान सितारा: राधेश्याम बारले Dr R S Barle

विश्व के सबसे तेज नृत्य के रूप में प्रतिष्ठित छत्‍तीसगढ़ के लोक कला पंथी नृत्य के ख्‍यात नर्तक पंथी सम्राट स्व. देवदास बंजारे के साथ डॉ. आर.एस. बारले का नाम देश-विदेश में चर्चित है। सतनामी समाज के धर्म गुरू परम पूज्य गुरु बाबा घासीदास जी ने संपूर्ण मानव समाज को सत्य, अहिंसा, भाईचारा, सद्भावना, प्रेम, दया, करुणा, विश्व बंधुत्व के साथ-साथ 'मनखे-मनखे एक समान' जैसे अद्भुत संदेश दिया है। इन्‍होंनें छुआछुत भेदभाव को मिटाकर संपूर्ण मानव में सत्य का रास्ता दिखाया है। समाज नें बाबा के इन्‍हीं संदेशों को भावभक्ति से पंथीनृत्य के माध्यम से प्रचार प्रसार किया, कालांतर से यह नृत्य प्रदेश के लोकमंच का सिरमौर बना हुआ है। राधेश्याम बारले  लगभग साढ़े चार सौ साल पुरानी विधा, इस पारम्पारिक लोकनृत्य की साधना में विगत 40 वर्षो से साधना रत हैं एवं इसे आगे बढ़ाने हेतु कृतसंकल्पित हैं।
राष्ट्रीय चेतना के विकास मे लोक गीतों उवं नृत्यों की अहम भूमिका रही है। छत्‍तीसगढ़ का पंथी लोक नृत्य गीत लोक जीवन का ऐसा महाकाव्य है जिसमें जीवन धारा के साथ ही अंलकारो की मधुर झंकार भी है। पंथी गीत नृत्य में अतीत के दृश्यपटल में वर्तमान के संघर्षो का रंगबिरंगा चित्र भी है। लोकचेतना के उन्नयन में इसकी उल्लेखनीय भूमिका रही है। छत्तीसगढ़ तथा देश में सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण और संवर्धन में पंथी नृत्य ने एक विशेष पहचान बनाई है। पंथी आज देश ही नहीं विदेशों में प्रख्यात हो चुका है। डॉ. आर.एस. बारले की कला साधना और उसकी मेहनत से आज छत्तीसगढ़ में इस विधा की लगभग 200 से ज्यादा कला मंडलियों के 65 हजार पंथी नृत्य के कलाकार हैं। पंथी नृत्य भारत की नहीं अपितु विश्व के 70 देशों में अपनी पहचान बना चुकी हैं, इसके नेपथ्‍य में डॉ. आर.एस. बारले के कला गुरू पंथी सम्राट स्व. देवदास बंजारे का अहम योगदान है।
डॉ. आर.एस. बारले नें भी अपने कला गुरू की इस मुहिम को आगे बढ़ाया है एवं अमेरिका एवं मैक्सिकों के पर्यटकों को छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति, लोक नृत्य पंथी का विशेष प्रशिक्षण देकर देश एवं प्रदेश का नाम रोशन किया है। इसके अलावा जाट कालेज, रोहतक (हरियाणा), सिक्किम, नामची, असांगथांग, गुवाहाटी, कालाहांडी, संबलपूर, सिद्धि कॉलेज मध्य प्रदेश, नाट्य कॉलेज सतना मध्य प्रदेश आदि शहरों के स्कूली, कॉलेज के छात्र - छात्राओं को लोक कला पंथी नृत्य का प्रशिक्षण देकर कला के प्रति रूची पैदा कर राष्ट्रीयता एवं आत्मसम्मान तथा देश प्रेम की भावना को जागृत करने का अनुकरणीय पहल किया है। इसके साथ ही छत्‍तीसगढ़, महाराष्‍ट्र, उड़ीसा, झारखण्ड आदि राज्यों के नक्सली क्षेत्रों में भी अपनी या से नक्सलियों को सही दिशा में जोड़ने के लिए हजारों कार्यक्रम प्रस्तुत किये हैं। जिससे प्रेरित कर आदिवासी अपने मूल जीवन में लौटकर खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे है।
9 अक्टूबर 1966 को ग्राम खोला, पोस्ट - धमना, तह. पाटन, जिला - दुर्ग में जन्‍में डॉ. आर.एस. बारले का पूरा नाम डॉ. राधेश्‍याम बारले है। इनके पिता का नाम स्व. समारू राम बारले एवं माता का नाम श्रीमती गैंदी बाई बारले है। इनके परिवार में पत्‍नी श्रीमती महेश्वरी बारले के साथ एक बेटी और दो बेटे हैं। वर्तमान में वे एच.एस.सी.एल. कॉलोनी, मड़ोदा स्टेशन, पो. नेवई, जिला दुर्ग में रहते हैं। इन्‍होंनें एम.बी.बी.एस.(बायो.) के साथ ही इंदिरा कला संगीत विश्‍व विद्यालय से लोक संगीत में डिप्लोमा भी किया है। वे आकाशवाणी रायपुर के बी.हाई ग्रेट एवं दूरदर्शन के नियमित कलाकार हैं। इन्‍होंनें पंथी नृत्य की शुरुआत सितम्बर 1978 से किया था। इन्‍हें राज्य अलंकरण गुरु घासीदास सामाजिक चेतना एवं दलित उत्थान सम्मान, राज्य अलंकरण प्रथम देवदास बंजारे सम्मान, राज्य अलंकरण डॉ. भवर सिंह पोते आदिवासी सेवा सम्मान प्राप्‍त हो चुका है। डॉ. आर.एस. बारले को भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा प्रथम देवदास बंजारे सम्मान, सामाजिक समरसता सम्मान, कलासाधक सम्मान, दाऊ महासिंग चंद्राकर सम्मान, जिला युवा पुरस्कार, सामाजिक कार्य एवं जन चेतना सम्मान, कला श्री सम्मान, पंथी रत्न सम्मान, कला रत्न सम्मान, लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, सतनाम फेलोशिप आवार्ड, धरती पुत्र सम्मान एवं छत्तीसगढ़ सतनामी रत्न सम्मान आदि सैकड़ों सम्मान प्राप्‍त हो चुके है।
डॉ. आर.एस. बारले नें विभिन्‍न जनकल्याणकारी कार्यकमों की प्रस्तुति पारंपरिक पंथी के माध्‍यम से दिया है जिसमें नशाबंदी, दहेज प्रथा, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओं-बेटी पढ़ओं, परिवार नियोजन, साक्षरता, कुष्ट उन्मूलन, पर्यावरण, पल्‍स पोलियो, आयोडीन युक्त नमक, राष्ट्रीय सदूभाव, स्तनपान, महिला सशक्तिकरण, आतंकवाद, अलगाववाद, नक्सलवाद, इंद्रधनुश अभियान, पंचायती राज, कैंसर एवं एड्स आदि विषयों पर लगभग 200 मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से प्रेम, दया, अहिंसा, सद्भाव एवं राष्ट्रीय एकता का संदेश प्रदेश एवं देश के कोने-कोने में पहुँचाने का अनुठा कार्य किया है। इसके अलावा गीत एवं नाटक प्रभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, खेल युवा कल्याण विभाग, नेहरु युवा केन्द्र के माध्यम से सैंकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कैंप में सहभागिता के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत कर राज्य एवं देश के नाम को गौरवान्वित किया है।
डॉ. आर.एस. बारले पंथी के साथ ही नाट्य विधा के भी सिद्धस्‍थ कलाकार हैं इन्‍होंनें छत्तीसगढ़ के कई रंगमंचों पर स्‍व. प्रेम साइमन एवं पारकर लिखित सैकड़ों नाटकों का निर्देशन एवं उसमें अभिनय भी किया है। जिसमें पानी की जगह खून बहा, शहीद वीर नारायण सिंह, छत्तीसगढ़ समग्र दर्शन, असकट के दवई, बिन आखर पशु समान (साक्षरता पर अधारित), देश में दहेज की हुकुमत, श्रंगी ऋषि का शिहावा (बस्तर दर्शन), भरम के भूत, लेड़गा देवार की दशमत कैना, प्रेम साइमन की आत्म कथा, देवदास बंजारे की आरुग फूल, सत्य ही सत्य, डाकू विक्रम सिंह, नाम के तहसीलदार आदि नाटकों में रंगमंची प्रशिक्षण एवं अभिनय किया है। देश के प्रमुख महोत्सव एवं राज्यों में भी इन्‍होंनें नाटकों का मंचन किया है जिसमें राजिम कुम्भ, शिरपुर महोत्सव, देवबलोदा महोत्सव, नागोद महोत्सव सतना (म.प्र.), बुरला उत्सव उड़ीसा गोदिंया महाराष्ट्र, नांमची सिक्कीम, सोनारी जमशेदपुर, उत्सव पुर्वाचंल गुवाहाटी, युवा उत्सव आदि महोत्सव प्रमुख हैं।

- संजीव तिवारी 

 संतोष झांजी के ७५ वें जन्मदिन पर :

हिरनी के पांव थमते नहीं हैं

विनोद साव

 वे हमेशा तरोताजा और प्रफुल्लित दिखाई देती हैं जैसी बरसों से दिख रही हैं. अकाल वैधव्य के बाद भी चार बेटियों और एक बेटे के साथ अपने मातृत्व-मय कर्तव्य को पूरा करते हुए अपने संघर्षमय जीवन को उन्होंने गाते गुनगुनाते हुए बिता दिया. गीत लेखन और मंचों पर गायन ने उनके व्यक्तिव को गीतमय बना दिया. जीवन रूपी गाडी के पहियों ने उनके सुर में अपना सुर मिलाया और उनके आसपास को गीत माधुर्य से भर दिया. साहित्य की समालोचना ने नहीं पर जीवन के दर्शन ने जीवन को एक कविता कहा है. यह काव्यमय अभिव्यक्ति संतोष झांजी के पोर पोर से फूटती है.. और यही बन जाती है उनकी शक्ति, हर झंझावात से निपट पाने की.

 ऐसे ही हौसलों के साथ अब वे ७५ पार कर रही हैं लेकिन मैं फकत ३० बरस से उन्हें जानता हूं. वह भी उनकी बाहरी सक्रियता से. मुझे ठीक ठीक याद नहीं कि भिलाई के उनके मकानों में मेरी उपस्थिति कभी हुई हो. वे अक्सर हमारे साथ तब होती हैं जब हम किसी साहित्यिक कार्यक्रमों में जा रहे होते हैं - पहले अशोक सिंघई की कार में और बाद में रवि श्रीवास्तव की कार में. वे अपने घर से निकलकर भिलाई के सेंट्रल एवेन्यू में खड़ी मिलती हैं और कार्यक्रम से आने के बाद वहीँ फिर उतर जाती हैं.. फिर किसी ऑटो में बैठकर घर चली जाती हैं. इन साहित्यिक यात्राओं में तब सहयात्रियों के बीच जो अपने पन से भरी बातें होती हैं उसमें हर किसी के जीवन राग सुनाई दे जाते हैं.

तब उम्र के प्रौढ़ काल में इप्टा के नाटकों में उनकी सक्रियता का दौर कम हो रहा था और लिटररी क्लब की कविता गोष्ठियों में भागीदारी का दौर बढ़ रहा था. इस भागीदारी और भागमभाग में उन्हें कहीं कोई अड़चन हो रही हो ऐसा दिखाई नहीं देता सिवा गर्मी सहन न कर पाने के. अक्सर कार में चढ़ते उतरते समय वे इतना ही कह रही होती हैं कि ‘बड़ी गर्मी है.. और असह्य हो जाने पर वे कार रुकवाकर ठण्डे पानी की बोतल खरीद लेती हैं.

पिता का संगीत, पति का रंगमंच, बेटे का अभिनय, बहू का नृत्य और पोते की चित्रकला सबको अपने आसपास आकार लेता हुआ वे देखती रहीं और कला के इन अलग अलग प्रतिरूपों को अपनी प्रस्तुतियों में अजमाती रहीं. पंजाबी की मातृभाषा, बांग्ला की जन्मभूमि, छत्तीसगढ़ की हिन्दी और भिलाई की छत्तीसगढ़ी. इन सबकी खूबियों को अपने गीतों में पिरोती रहीं और उनमें नई आभा व चमक पैदा करती रहीं.

 कार्यक्रमों में संतोष जी की उपस्थिति से रौनक बढ़ जाती है. वे अपने समय में समय से पहले तैयार एक आधुनिक दृष्टि संपन्न सुघड़ महिला रही हैं - जिनके पास लिखने, पढने, बोलने और अपनी बातों को रखने का सलीका रहा है. इस सलीकेपन ने उनकी कविताओं और गीतों को नई पहचान दी है. जिस प्रभाव के साथ वे गोष्ठियों में अपनी कविताओं का पाठ कर लिया करती थीं उनसे कई गुना अधिक संप्रेषणीयता से वे कवि सम्मेलनों में अपने गीतों की बानगी पेश कर छा जाया करती थीं. यह छा जाने वाली कूबत उनके सदाबहार व्यक्तित्व में अब भी दिखाई दे जाती है. उस पर तुर्रा ये कि जब उनके समकालीन कवि गण एक के बाद एक इस जीवन जगत से कूच कर रहे थे या आयोजनों में शिथिल दिखाई दे रहे हैं तब उनके असंख्य भतीजे अपनी झांझी आंटी को उत्साह से लबरेज अपनी सक्रिय भागीदारी में देख पा रहे हैं. यह सब उनकी अनुवर्ती पीढ़ी के लिए एक सीख और सबक होना चाहिए कि साहित्य से रचनाकार को कैसे संबल प्राप्त होता है और उन्हें जीवन के अनेक उहापोहों के बीच किसी भी कलाकर्म की रचनात्मकता टूटने से कैसे बचाती है.

 इस तरह संतोष झांजी की सक्रियता ने भिलाई में महिला रचनाकारों के बीच कला व रचना की ज़मीन पर निरंतर कीर्तिमान गढ़े. वे एक साथ नाटक, फिल्म, कविता, कहानी, उपन्यास लेखन और संगठन कर्म में सक्रिय रही हैं. इन तमाम इलाकों में उनकी चहलकदमी ने उनके व्यापक और विलक्षण व्यक्तित्व का निर्माण किया है. उनके मिज़ाज को अलग अलग भंगिमाएँ दी हैं. उनकी आवाज को कई स्वर दिए हैं. उनके व्यवहार को आस्वाद दिए हैं. वे जब बोलती हैं तब नाटक का कोई चरित्र बोलता है, वे जब गाती हैं तब कविता की कोई ऋचा बोलती है. सामाजिक आचार-व्यवहार में कोई मृदुभाषिणी मुखर हो उठती हैं. परिवार के बीच एक स्वाभाविक पारंपरिक गृह-स्वामिनी की आत्मीय तरलता होती है. परायों के बीच वे अपनेपन से सराबोर हो उठती हैं.

 उनके व्यक्तित्व में कहीं भी अजनबीपन दिखाई नहीं देता. वे अपनेपन की ताजगी से भरी मिलती हैं. प्रतिभा की प्राथमिकी में चलने वाली संभावनाएं उनके महाविद्यालीन ह्रदय में समाहित हो जाती हैं. वे व्यक्तित्व विकास की एक जीती जागती पाठशाला बन जाती हैं. उन्होंने लिखा तो गद्य की दूसरी विधाओं में भी है पर उनके जीवन और व्यक्तिव को तराशा है उनकी कविताओं ने, कविता में उनके गीतों ने. गीत माधुर्य से मन भरा होता है. इसलिए गीतों का यह वसंत उनकी रचनाओं में हर कहीं गूंज रहा होता है – ‘हिरनी, मौसम, इन्द्रधनुष, परछाइयाँ, आई लव यू दादी’ जैसे वासंती शब्द. वे हमेशा और हर पल किसी गीत यामिनी के दीप प्रज्वलन की तरह प्रदीप्त होती हैं..और यह गीतमय व्यक्तित्व उनकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है. उनका एक कविता संग्रह है ‘हिरनी के पांव थम गए, पर उनकी सक्रियता और भागीदारी को देखकर लगता है कि हिरनी के पांव कभी थमते नहीं हैं.


    

सुरता चंदैनी गोंदा - 3 Surata Chaindaini Gonda

Hanumant Naidu
चंदैनी गोंदा की स्मारिका के मुख-पृष्ठ की हालत जर्जर हो गई है। स्मृतियां भी धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही हैं। ऐसे में नई पीढ़ी तक चंदैनी गोंदा की जानकारी को स्थानांतरित करना आवश्यक हो गया है। आज की श्रृंखला में डॉ हनुमंत नायडू (हिन्दी के प्रोफेसर और प्रथम छत्तीसगढ़ी फ़िल्म "कहि देबे संदेश" के गीतकार) के आलेख के कुछ अंश प्रस्तुत हैं, जिन्हें पढ़कर नई पीढ़ी को कुछ और नई जानकारियां मिलेंगी। श्रृंखला-1 में कुछ पात्रों के नाम का उल्लेख किया गया था। उन पात्रों की भूमिका, इस आलेख को पढ़ने के बाद कुछ और अधिक स्पष्ट होगी। साथ ही यह भी ज्ञात होगा कि चंदैनी गोंदा के पात्र, महज पात्र नहीं बल्कि प्रतीक हैं। तो लीजिए! डॉ. हनुमंत नायडू के आलेख - "छत्तीसगढ़ी लोक मंच-एक नया सांस्कृतिक संदर्भ", "छत्तीसगढ़ी आंसुओं का विद्रोह-चंदैनी गोंदा", इस शीर्षक से स्मारिका में प्रकाशित आलेख के कुछ अंश -

"चंदैनी गोंदा"
चंदैनी गोंदा यथार्थ में एक विशेष प्रकार के नन्हे नन्हे गेंदे के फूलों का नाम है जो छत्तीसगढ़ में बहुतायत पाए जाते हैं। चंदैनी गोंदा भी धरती की पूजा का फूल है। श्री देशमुख के ही शब्दों में चंदैनी गोंदा पूजा का फूल है। चंदैनी गोंदा छोटे-छोटे कलाकारों का संगम है। चंदैनी गोंदा, लोकगीतों पर एक नया प्रयोग है। दृश्यों, प्रतीकों और संवादों द्वारा गीतों को गद्द देकर छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के माध्यम से एक संदेश पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रस्तुतीकरण --- यही चंदैनी गोंदा है। जिन्होंने इसे नाटक, नौटंकी या नाचासमझकर देखा होगा वह अवश्य ही निराश हुए होंगे लेकिन जिन्होंने इसे लोकगीतों पर एक नए प्रयोग के रूप में देखा होगा वह अवश्य ही हर्षित हुए होंगे।

गेहूं के क्षेत्रों में तो हरित क्रांति हो चुकी है परंतु धान के क्षेत्रों में नहीं हो पाई। यही तथ्य चंदैनी गोंदा के प्रस्तुतीकरण की प्रेरणा का प्रमुख स्रोत रहा है। चंदैनी गोंदा का सर्वप्रथम प्रदर्शन बघेरा गांव के एक खलिहान में सन 1971 को हुआ था इसके बाद तो पैरी, भिलाई, राजनाँदगाँव, धमधा, नंदिनी, धमतरी, झोला, टेमरी, जंजगिरी आदि अनेक स्थानों में पचास-पचास हजार दर्शकों के समक्ष यह सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा चुका है। चंदैनी गोंदा में छत्तीसगढ़ी जीवन के जन्म से मरण तक के सभी सांस्कृतिक पक्षों को सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इन सब तथ्यों को गूँथने के लिए कथा का एक झीना-सा तन्तु लिया गया है।

प्रमुख पात्र दुखित और मरही किसान दंपत्ति, भारत के किसानों के प्रतीक हैं। गंगा, गांव की बेटी है जो गांव की पवित्रता को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करती है। शिव, गांव का बेटा है जो गांव की आस्था का प्रतीक है। चांद-बी, शोषित का प्रतीक ही नहीं भावनात्मक एकता की अभिव्यंजना भी है। बटोरन लाल, एक शोषक है जो छत्तीसगढ़ में ही नहीं, देश के किसी भी कोने में पैदा हो सकता है। "किसान ही भारत की आत्मा है" - इस तथ्य की व्यंजना, दुखित के इस संवाद से बड़े ही सशक्त ढंग से होती है - "मैं रोहूं तो मरही रो देही, मरही रो देही तो गांव रो देही गांव रो देही तो भारत रो देही। भारत माता ला मैं रोते नहीं देख सकंव। (मैं रो दूंगा तो मरही (पत्नी) रो देगी। मरही रो देगी तो गांव रो देगा और गांव रो देगा तो भारत रो देगा और भारत-माता को रोते मैं नहीं देख सकता)

शिव, युवक है अतः वह सब पहले भोपाल और दिल्ली में प्रजातांत्रिक ढंग से शोषितों की समस्या को हल करना चाहता है परंतु असफल होने पर तेलंगाना (साम्यवाद का प्रतीक) जाने की धमकी देता है परंतु छत्तीसगढ़ी धरती का प्रेम, त्याग और बलिदान उसके कदम सेना की ओर मोड़ देते हैं। वह देश की रक्षा करते हुए युद्ध में मारा जाता है। दुखित भी इस आघात को सहन नहीं पाता। शिव के रूप में गांव की आस्था मरती नहीं बल्कि देश के लिए बलिदान होकर अमर हो जाती है, परंतु हरित क्रांति और शोषकों पर किए गए तीखे व्यंग हृदय को चीरते चले जाते हैं। चंदैनी गोंदा की एक विशेषता यह है कि इसका प्रारंभ छत्तीसगढ़ी के साहित्यकारों के सम्मान से प्रारंभ होता है। इसके अनेक दृश्यों में "दौरी" ( बैलों से धान के सूखे पौधों को खुंदवा कर धान अलग करना) हरित-क्रांति, गोरा पूजा (पार्वती पूजन) गम्मत तथा फौज आदि प्रमुख हैं। अभिनेताओं में दुखित के रूप में श्री रामचंद्र देशमुख और शिव के रूप में छत्तीसगढ़ी फिल्मों और रंगमंच के कलाकार शिव कुमार एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। शिवकुमार के "हरित क्रांति" लमसेना (घर जवाई) जैसे बहु-प्रशंसित, एक पात्रीय लघु नाटकों को चंदैनी गोंदा में गूँथ दिया गया है। "रविशंकर शुक्ल" तथा "लक्ष्मण मस्तूरिया" आदि के गीत और खुमान साव का संगीत, चंदैनी गोंदा की एक प्रमुख विशेषता है -- उसमें मानो प्राण फूंक देते है।
("छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा"स्मारिका से साभार)
प्रस्तुतकर्ता - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (9907174334)

सुरता चंदैनी गोंदा - 2 What is Chandaini Gonda

चंदैनी गोंदा क्या है ? इस प्रश्न को अनेक विद्वानों से अनेक आलेखों में उत्तरित किया है। सबके अपने अपने दृष्टिकोण हैं। चंदैनी गोंदा क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं दाऊ जी के शब्दों में पढ़िए। अकाशवाणी द्वारा लिए गए साक्षात्कार को चंदैनी गोंदा स्मारिका में साभार प्रकाशित किया गया था। जिन्होंने यह स्मारिका नहीं पढ़ी है, उनके लिए यह पोस्ट महत्वपूर्ण और उपयोगी हो सकती है -

चंदैनी गोंदा क्या है ? : श्रद्धेय रामचंद्र देशमुख के शब्दों में
प्रश्न 1 - चंदैनी गोंदा क्या है ?
उत्तर : चंदैनी गोंदा पूजा का फूल है।चंदैनी गोंदा छोटे-छोटे कलाकारों का संगम है। चंदैनी गोंदा लोकगीतों पर एक नया प्रयोग है। दृश्य प्रतीकों और संवादों द्वारा गद्दी देकर छत्तीसगढ़ी लोक गीतों के माध्यम से एक संदेश पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रस्तुतीकरण - यही चंदैनी गोंदा है। जिन्होंने इसे नाटक, नौटंकी या नाचा समझकर देखा होगा, वे अवश्य ही निराश हुए होंगे लेकिन जिन्होंने लोकगीतों पर एक नए प्रयोग के रूप में देखा होगा वे अवश्य ही हर्षित हुए होंगे।
प्रश्न 2 - आपको इसके लिए प्रेरणा कहां से मिली?
उत्तर : आपको स्मरण होगा कि भारतीय स्वतंत्रता की 24 वी वर्षगांठ पर 15 अगस्त 1971 को राष्ट्रपति महोदय ने देश के नाम अपने संदेश में कहा था कि गेहूं के इलाके में तो हरित क्रांति हो चुकी लेकिन धान के इलाकों में नहीं हो पाई। यह एक बहुत बड़ा सत्य है और भारत का धान उगाने वाला हर औसत किसान इसकी पुष्टि करेगा। गेहूं और धान के इलाकों के भूगोल पर मैं नहीं जाता, उपलब्ध सुविधाओं पर मुझे कुछ नहीं कहना है लेकिन इतना तो अवश्य है कि स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के पश्चात धान के इलाकों का किसान जहां का तहां है। अभी भी उसके शोषण का चक्र जारी है। उसके अनेक अवतार हैं। चंदैनी गोंदा में यदा-कदा प्रसंगवश हरित क्रांति के उद्घोषक के स्वार्थ, कुचक्र और दूरदर्शिता पर व्यंग किया गया है। इसके पीछे एक औसत किसान की व्यथा ही कर्मशील है तो "राष्ट्रपति के भाषण का अंश ही चंदैनी गोंदा की प्रेरणा भूमि है"।
प्रश्न 3 - आपने अपने कलाकार विभिन्न भाषा-भाषी चुने हैं। साथ ही चंदैनी गोंदा प्रारंभ होने पहले आपने विभिन्न प्रांतों के लोकगीत प्रस्तुत किए हैं। ऐसा क्यों ?
उत्तर : भावनात्मक एकता भी हमारे उद्देश्यों में से एक है इसलिए चंदैनी गोंदा विभिन्न भाषा-भाषियों का संगम है। छत्तीसगढ़ी लोक गीतों को हम भारतीय लोक-जीवन के एक खंड विशेष के लोक गीत के रूप में नहीं देखते, हम उसे भारतीय लोकजीवन में व्याप्त लोकगीतों को विशाल शृंखला में एक प्रतिनिधि लोकगीत के रूप में मान्यता देते हैं। लोकगीत भारत के जिस अंचल के हैं, उनमें जो लोक तत्व हैं, उन्हें किसी भी भारतीय लोकगीत में देखा जा सकता है।




प्रश्न 4 - चंदैनी गोंदा का प्रदर्शन आपने गांव में ही करने का निश्चय क्यों किया ?
उत्तर : भारत के किसी भी अंचल का कोई सा भी गांव अपनी पूरी पहचान के साथ भारत का हर गांव हो सकता है। फिर यह एक महत्वपूर्ण बात है कि आधुनिक जीवन-बोध और आमतौर से शहरी जीवन-बोध जब हमें भारतीय गंध नहीं दे पा रहा है, हमें तलाश है एक निजी भारतीय जीवन स्पंदन की जो अपनी शैली एवं संगीत में हमें एक देसी छुअन दे सके। तब हमें ग्राम-धरा की जीवनधारा की ओर लौटना पड़े तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। भारतीय संस्कृति के अजस्र स्रोत ये गांव आज की संभावना है। जरूरत है रचनाशील जीवन दृष्टि की। चंदैनी गोंदा के लोकगीत लोकपाय और लोकजीवन की अभिव्यक्ति इसी के आसपास की चीजें हैं। इस कार्यक्रम को मैंने गांव के खलिहान स्थल पर ही मंचित करने का निर्णय क्यों लिया ? उत्तर स्पष्ट है कि "झील के सौंदर्य को बेलबूटे युक्त किसी तश्तरी के जल में कैसे देखा जा सकता" ?
प्रश्न 5 - आपने लोकगीतों पर ही इतना ज्यादा परिश्रम किस उद्देश्य से किया ?
उत्तर : भारतीय लोकजीवन को लोकगीतों के माध्यम से अधिक सार्थकता के साथ संदेश पहुंचाया जा सकते है। लोक बोलियां लोक भाषा जिन अनुभूतियों एवं संवेदनाओं को जितनी अधिक सटीक व्यंजना दे सकती हैं, संभवतः उतनी कोई अन्य भाषा नहीं।
दूसरी बात यह है कि फिल्मों के माध्यम से आए हुए पश्चिमी-बोध या फिल्मों में ओढ़े गए पूर्वी-बोध की तुलना में चंदैनी गोंदा दर्शक को विशुद्ध ग्राम-बोध प्रदान कराता है। ग्राम-बोध इसलिए भी क्योंकि इसमें आज के एक भारतीय गांव के खेतिहर जीवन की कथा-व्यथा है।
प्रश्न 6 - चंदैनी गोंदा, जबकि लोकगीतों का कार्यक्रम है। संवाद दृश्यों और प्रतीकों को किसलिए स्थान दिया गया है ?
उत्तर : यही तो हमारा नया प्रयोग है। संवाद, दृश्य और प्रतीकों के माध्यम से लोकगीतों को ज्यादा प्रभावकारी बनाया गया है। इसके द्वारा निहितार्थ को भी संप्रेषित करने का प्रयास किया गया है।
प्रश्न 7 - चंदैनी गोंदा का और कोई उद्देश्य हो तो स्पष्ट करिए।
उत्तर : बहुत से उद्देश्यों में से एक यह भी है कि श्रेष्ठ कवियों की रचनाएं उनकी कॉपियों और कवि सम्मेलन तक सीमित रह जाती हैं, उन्हें सुंदर स्वर देकर आम जनता को सौंपने का प्रयास किया गया है। अकाल का दृश्य और तत्त्संबंधित लोकगीत किसी कारणवश हम प्रस्तुत नहीं कर सके। उनके माध्यम से हमने सिंचाई व्यवस्था को ज्यादा सुदृढ़ और व्यापक बनाने की मांग की है। सब लोगों के स्नेह और आशीर्वाद का संबल लेकर, अनेक विघ्न बाधाओं को पार कर मैं "चंदैनी गोंदा" का विनम्र उपहार माटी को समर्पित करने का साहस जुटा सका हूं और साथ ही मैंने माटी के ऋण से उऋण होने का प्रयास किया है।
(आकाशवाणी से साभार)

प्रस्तुति - अरूण कुमार निगम

सुरता चंदैनी गोंदा - 1

दाऊ रामचंद्र देशमुख के चंदैनी-गोंदा की कथावस्तु

उद्घोषक -  मूल कार्यक्रम प्रारंभ करने के पहले हम यह बतला देना आवश्यक समझते हैं कि चंदैनी गोंदा कोई नाटक गम्मत या तमाशा नहीं है। चंदैनी गोंदा एक दर्शन है, एक विचार है जो कि एक औसत भारतीय किसान के इर्द-गिर्द घूमता है। यह हमारी मान्यता है कि छत्तीसगढ़ का कोई भी औसत किसान अपने सारे परिवेश में भारत के किसी भी शोषित, पीड़ित और उपेक्षित क्षेत्र का किसान हो सकता है। इस दृष्टिकोण से चंदैनी गोंदा प्रतीकात्मक ढंग से एक भारतीय किसान के जीवन के चित्रण का प्रयास है।

कृषक जीवन को चंदैनी गोंदा में प्रस्तुत करने के लिए हमने प्रधानतः छत्तीसगढ़ी लोक गीतों और कवियों की रचनाओं का आश्रय लिया है जो धरती और धरतीपुत्र से संबंधित हैं। इन गीतों को किसी कथानक के सूत्र में न गूँथते हुए हमने इसे ऐसी क्रमबद्धता प्रदान कर दी है कि यही क्रमबद्धता आपको कथानक का आनंद देने लगती है। साथ ही छत्तीसगढ़ की अंतर-वेदना को भी साकार करती है और अंत में एक व्यथा, कथा का रूप ले लेती है । गीतों को प्रतिभाशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए हमने दृश्यों, प्रतीकों, संवादों आदि का आश्रय अवश्य लिया है किंतु हमारा पुनः अनुरोध है कि इसके कारण आप चंदैनी गोंदा को नाटक की दृष्टि से न देखें। हम अभिनय की उच्चता का कोई दावा नहीं करते। नाटकीयता से दूर रहने के कारण हम रूप-सज्जा, वस्त्र परिवर्तन, मंच व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान नहीं देते। इसका कारण है कि हमें स्वाभाविक और प्रतीकात्मक रूप से एक औसत किसान को चंदैनी गोंदा में प्रस्तुत करना है।

आपके मन में सहज ही एक जिज्ञासा उठती होगी कि इस कार्यक्रम का नाम चंदैनी गोंदा क्यों रखा गया है? दरअसल गेंदे दो प्रकार के होते हैं। पहला प्रकार बड़े गेंदे का होता है जो प्रधानतः श्रृंगार के काम आता है। गेंदे का दूसरा प्रकार छत्तीसगढ़ में चंदैनी गोंदा कहा जाता है जो आकार में छोटा होने के कारण ग्रामीण युवतियों के जुड़े की शोभा तो नहीं बन सकता किंतु देवी देवताओं के चरणों में चढ़ने का श्रेय उसे अवश्य प्राप्त है।

छत्तीसगढ़ में ऐसे अनेक अज्ञात कलाकार भी पड़े हैं जो चंदैनी गोंदा की तरह आकार में छोटे तो अवश्य हैं किंतु उनमें प्रतिभा है, लगन है, कला की ऊंचाई है। इनकी कला से वास्तव में सरस्वती की पूजा की जानी चाहिए किंतु ऐसा हो नहीं पाता। हमने भागीरथ प्रयास करके छत्तीसगढ़ की माटी से कुछ कलाकार रूपी चंदैनी गोंदा चुनकर एक सूत्र में पिरोया है। इस सूत्रबद्ध पुष्पमाला को हम चंदैनी गोंदा के नाम से संबोधित करते हैं और यही कारण है कि परिवार द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम को "चंदैनी गोंदा" की संज्ञा दी है। इस तरह चंदैनी गोंदा, गीतों की माला है और छोटे-छोटे कलाकारों की माल्य है।

 लोग रत्नों की खोज में छत्तीसगढ़ आते हैं और प्राप्त कर लेने पर भोपाल, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, आगरा के बाजारों में भुना लेते हैं। श्री रामचंद्र देशमुख ने कुछ रत्न पाए हैं। परखने के लिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

 फूल खिलते हैं, मुरझाते हैं और धूल में मिल जाते हैं किंतु 7 नवंबर 1971 को जिस चंदैनी गोंदा के पौधे को दुर्ग के निकटस्थ ग्राम बघेरा में रोपा गया है उसे न मुरझाने देने का संकल्प छत्तीसगढ़ की जनता ने कर लिया है। इस लंबी भूमिका के बाद अपने परिवार की इष्ट देवी सरस्वती की वंदना, भारत माता को समर्पण और दर्शकों के अभिनंदन के साथ अपना कार्यक्रम प्रारंभ करते हैं
सुमन का प्रवेश:
 कमेंट्री:  मन की बात जानने वाला केवल मन है
           सबसे अच्छा फूल की जिसका नाम सुमन है
दुखित का प्रवेश:
 कमेंट्री:  हँसमुख प्रसून सिखलाते पल भर जो हँस पाओ
          अपने उर के सौरभ से जग का आंगन भर जाओ
गीत:  देखव फूलगे -
        चंदैनी गोंदा फूलगे
कमेंट्री:  गांव में फूल घलो गोठियाथे, जब सब किसान सो जाथे। आज भारत-वासियों की आत्मा स्वतंत्रता के पवित्र पर्व में प्रकाशित है परंतु 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में दिन में भी अंधियारी रात थी। 1857 में स्वतंत्रता आंदोलन की जो ज्योति हमारे पूर्वजों ने प्रज्वलित की वह 1942 में विकराल रूप धारण कर ब्रिटिश शासन को जलाने पर तुल गई थी। भारत का आकाश करो या मरो, अंग्रेजों भारत छोड़ो, इंकलाब जिंदाबाद, महात्मा गांधी की जय, तिरंगे झंडे की जय से गूंज उठा था। वंदे मातरम की एक आवाज पर गोलियों की बौछारों को रोकने के लिए हजारों सीने अड़ जाते थे।
गीत: वंदे मातरम
कमेंट्री:  फिर आया 15 अगस्त 1947, अंधियारा छटा। स्वतंत्रता का सूरज उदित हुआ। पूर्वजों का बलिदान सार्थक हुआ। तिरंगा भारत के स्वतंत्र आकाश में लहराने लगा। झूम गया सारा भारत, झूम गया सारा गाँव।
गीत: आगे सुराज के दिन रे संगी
कमेंट्री:  नवजात स्वतंत्रता के साथ जिन बच्चों ने जन्म लिया था वह एक अर्थ में बहुत भाग्यशाली थे। उनके माथे पर गुलामी का कलंक नहीं था। इन्हीं के हाथों में आगे चलकर भारत की बागडोर सौंपी जानी थी इसलिए माताओं ने उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।

गीत : सोहर गीत
         देवार गीत
कमेंट्री: नवजात शिशु की उम्र थोड़ी बढ़ी, साथ ही नई पीढ़ी की उम्र भी। उसी समय दंगों की आग से भारत माता का आँचल जल रहा था। रो पड़ी आजादी, रो पड़ा नई पीढ़ी का बचपन,  उसकी आँच सहन न कर सकने के कारण। माताओं को उनका रोना सहन नहीं हुआ। लोरियां फूट पड़ी कंठ से।
गीत:  लागे झन काकरो नजर
कमेंट्री: आजाद भारत में जन्मी नई पीढ़ी ने अभी होश भी नहीं संभाला था। उसके दूध के दाँत टूटे भी नहीं थे कि आई 30 जनवरी 1948 की काली संध्या। कहीं से तीन गोलियां आई और धँस गई बापू के कलेजे में। मानवता कराह उठी। भारत मां की आंखों से बहुत गंगा जमुना की धाराएं।
गीत:  ओ पापी ओ बइरी
कमेंट्री:  गांधी जी की मौत के साथ गांधी के सपनों के भारत की भी हत्या हो गई। दिन पर दिन बीते गए। आजाद पूरी जवान हो चली उसकी जवानी गांव में बसने वाले भारत की ओर नहीं, शहर में बसने वाले भारत की ओर आकर्षित हो गई। काश कि तुलसी के अनगढ़ बिरवे उसे गांव की ओर आकर्षित कर पाते। काश, बहन की राखी उसे गांव में रोक पाती ।
गीत: चल शहर जातेन
कमेंट्री: आजादी के बाद योजना, परियोजना बनती गई मगर गांधी के सपनों का रामराज्य नहीं आया। गाँवों में जाने वाला भारत, अन्न के लिए दूसरे के सामने झोली फैलाता रहा क्योंकि औसत भारतीय किसान दुखित रहा।
दुखित का प्रवेश -
कमेंट्री: लोग यह क्यों नहीं सोचते कि भारत हमारी माता है, यदि भारत का कोई भी भाग शोषण से कमजोर होता है तो भारत माँ का ही कोई अंग तो कमजोर होता है।
 हाँ, यही तो है हमारा छत्तीसगढ़, भारत माँ के पेट के पास। इसका शोषण भारत माँ के उदर का शोषण है।
हर आँख यूं तो बहुत रोती है
हर बूँद मगर अश्क नहीं होती है
पर देखकर जो रो दे जमाने का गम
उस आँख से आँसू जो गिरे मोती है।
दुखित इन मोती के दानों को यूं ना बह जाने दो, सहेजो इन्हें,  निराश होकर बैठो मत। उठो अपनी शक्ति को पहचानो। यदि तुम्हारे भोलेपन के बदले तुम्हें तिरस्कार पूर्ण संबोधन मिलता है तो तुम भयानक विषधर भी बन सकते हो मगर शायद तुम विषधर बनना पसंद नहीं करोगे
गीत:  मैं छत्तीसगढ़िया अँव
        मोर संग चलो रे
कमेंट्री: भारत भर में आपको छत्तीसगढ़ के इस दुखित की तरह अनेक दुखित मिलेंगे जिन्हें किसी भी प्रकार का शोषण उत्पीड़न और तिरस्कार कर्तव्य पथ से डिगा नहीं सकता। माटी के प्रति उसके आकर्षण को कम नहीं कर सकता। जेठ की दुपहरी में जब गाँव में मरघट जैसा सन्नाटा छाया रहता है, तब भी किसान की कर्तव्य पथ की यात्रा निर्बाध गति से चलती रहती है।
गीत:  रेंगव रेंगव रे रेंगइया
कमेंट्री:  जेठ के बाद आषाढ़ में जैसे ही काले काले मेघा मंडराते हैं, किसान का मन मयूर नाच उठता है। वर्षा की बूँदों से जब धरती गूंजती है तो किसान का तन मन धन सब खुशी से भींज उठता है। धरती से उठती माटी की सोंधी गंध उसे खेतों की ओर आकर्षित करती है।  होठों पर गीत थिरक उठते हैं और किसान कंधे पर हर रखे चल पड़ता है खेतों की ओर, जो उसका कर्म क्षेत्र है

गीत:  चल चल गा किसान बोए चली धान
कमेंट्री: किसी समर्थ पुरुष ने यह तो माना कि धान के क्षेत्र में हरित क्रांति आना बाकी है। तो वह कौन सी फाइल में दबी पड़ी है ? लो वह स्वयं आ रही है अपनी व्यथा कहते -
हरित क्रांति बाई का एक-पात्रीय अभिनय:
कमेंट्री: प्यासी धरती जब सावन में पूरी तरह तृप्त हो जाती है तब हरे भरे खेत किसान के कठोर श्रम की मांग करते हैं। किसान की जिंदगी एक अंतहीन श्रम की कथा है। श्रम की कठोरता में घिरा हुआ किसान का मन उल्लास और नवीन स्फूर्ति पाने के लिए लोकगीतों के लालित्य की ओर मुड़ पड़ता है। श्रम की घुमड़ती हुई घटनाओं के बीच जब ददरिया की तान छिड़ती है तब चारों ओर संगीत झरने लगता है और किसान का थका मन श्रृंगार-पूरित हो उठता है।
गीत: मोर खेती खार रुमझुम
कमेंट्री: सावन के बाद आता है भादो। भादो का महीना छत्तीसगढ़ में औरतों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। तीज त्यौहार के कारण किसान की पत्नियों के मन में मायके जाने की ललक, पति से नई साड़ी लाने का अनुरोध और पति पत्नी की नोक झोंक से सिक्त भादो।
गीत:  मोला मइके देखे के साध, धनी मोर बर लुगरा ले दे
कमेंट्री: कभी-कभी ऐसा होता है कि तीज में मायके जाने की किसानिन की साध मन में ही रह जाती है। उसे कोई लिवाने नहीं आता। मायके से केवल साड़ी भेज दी जाती है। वह साड़ी उसके अतीत के पृष्ठों को एक-एक करके सामने रखने लगती है।
गीत: दाई के दया दादा के मया
कमेंट्री: भादो में ही आता है गणेश पक्ष। गांव में गणेश की प्रतिमा जहां स्थापित हो जाती है वहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ जाती है इसी बाढ़ में प्रायः चंदैनी नाच भी देखने को मिलता है। सतनामियों के नाचने की अपनी विशिष्ट शैली, अमर्यादित मस्ती और अक्खड़पन इसकी विशेषता होती है।

चंदैनी नाच:
कमेंट्री: तीज त्यौहार के बीच भादो बीतने लगता है किंतु कृषक समुदाय अपने कर्तव्य को भूलता नहीं है। निंदाई का दूसरा दौर भादो में चलता है। खड़े हो जाइए आप खेतों की मेड़ पर ददरिया की तान आपके मन को आल्हादित कर देगी।
 गीत: झन आंजबे टूरी आँखी म काजर
कमेंट्री: कुंवार निंदाई के तीसरे दौर का महीना।  जुआर फूलने लगता है। ह्रदय के भाव गीत बनकर बिजली की तरह कौंध जाते हैं ।
गीत:  चिरई चले आबे
कमेंट्री:  दीपावली अपनी समस्त प्रभाव के साथ कार्तिक में आती है।बच्चों बूढ़ों सब में एक अपूर्व उल्लास भर जाता है। लक्ष्मी पूजा की रात छत्तीसगढ़ के गांव में शिव के रूप में गौरा की पूजा होती है। घर घर से कलश एकत्रित कर गांव में किसी सार्वजनिक स्थान पर रखे जाते हैं, फिर गौरा की सेवा की जाती है। गौरा गीत से वातावरण मुखरित हो जाता है।
गीत: जोहर जोहर मोर
कमेंट्री: दिन बीतते जाते हैं, बीतते जाते हैं। अगहन आता है किसान के श्रम की पूजा स्वीकार होती है। महीनों के कठिन परिश्रम की कमाई खेतों में धान के रूप में खड़ी है। पीले पीले धान के खेत जब हवा में लहराते हैं तब किसान को ऐसा लगता है कि मानो उसे शीघ्र आने का इशारा कर रहे हैं। वह आतुर हो उठता है, उसे खलिहान में लाने के लिए
गीत: भैया का किसान हो जा तैयार
       छन्नर छन्नर पैरी बाजय
कमेंट्री: जब भी मौका मिलता है गांव की अल्हड़ किशोर बालाएं बड़े बूढ़ों से मजाक और छेड़खानी करने से नहीं चूकती।
गीत: हर चांदी हर चांदी
कमेंट्री: फसल कट चुकी है। दुखित और मरही भारा लिए खेतों की ओर से आ रहे हैं। दुखित जलोदर का मरीज है और मरही दमा की मरीज है किंतु भरपूर फसल को देखकर दोनों अपनी पीड़ा भूल चुके हैं।
गीत:  तोला देखे रहेंव गा
कमेंट्री: दुखित की फसल खलिहान में पहुंच चुकी है।धान की मिंजाई होने वाली है। दुखित अपनी संतान-हीनता के दुख को गांव के बच्चों को देखकर भूल जाता है। गांव के बच्चे भी छुट्टी का घंटा बजते ही उसके खलिहान की ओर दौड़ पड़ते हैं।
गीत: चंदा बनके जीबो हम
कमेंट्री: यह कैसा अनर्थ है, किसने इन मासूम बच्चों के मन में सांप्रदायिक घृणा का विष बो दिया है। इस भावना को लेकर यदि बच्चे जवान होंगे तो देश का भविष्य क्या होगा?
गीत: धरती के अंगना मा
कमेंट्री: दौरी में जुते सात लड़के सात दिनों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो दुखित के जीवन के यथार्थ से संबंधित है। सात लड़कियां इंद्रधनुष के सात रंगों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जो मरही के जीवन का स्वप्न है। मेड़वार कानून और गर्दन में फंसी रस्सी नियति का प्रतीक है। किसान का यथार्थ और किसानिन का स्वप्न वर्ष भर इस कानून के डंडे के चारों ओर घूमता रहता है।
गीत: आज दौरी  मा बइला मन घूमत हें
       जुच्छ गरजे मां बने नहीं
कमेंट्री: छत्तीसगढ़ में यह मान्यता है कि जब तक औरत के शरीर में गोदने का निशान नहीं होता तब तक उसे मुक्ति नहीं मिलती। भागवती एक संतान-हीन विधवा औरत है, जिसे दुखित ने चाँद-बी को सौंप दिया है। वह चाँद-बी को गोदना गुदवाना चाहती है।
गीत:  तोला का गोदना ला गोदँव
कमेंट्री: इधर शिव की पत्नी विरह वेदना से पीड़ित है कर्तव्य बोध तो उसे है किंतु पति से दूर रहने का दुख भी तो उसे है। बगैर शिव के उसे गांव, घर, खलिहान सब सूने लगते हैं।
गीत:  मोर कोरिया सुन्ना रे
कमेंट्री: उधर शिव मोर्चे पर घायल हो जाने के कारण शिविर में भेज दिया जाता है।वहां उसे पत्नी का पत्र प्राप्त होता है और अक्षर, पत्नी की छवि में परिणित होते जाते हैं।
गीत: वा रे मोर पड़की मैना
कमेंट्री:  फागुन का महीना, नगाड़े की आवाज और उल्लास का महीना। खरीफ की फसल तो मिली पर रबी की नहीं मिल पाई
।गांव के अधिकांश लोग रोजी रोटी की चिंता से, दूर चले गए मगर दुखित ने गांव नहीं छोड़ने का निश्चय किया।
गीत:  नरवा के तीर मोर गांव
कमेंट्री:  दूसरे साल और भी भयानक अकाल पड़ गया। धरती की छाती फट गई।  प्यासी धरती की पीड़ा उसके हृदय की पीड़ा बन गई। आज पौष-पूर्णिमा है। दान दक्षिणा का पुण्य-पर्व।

गीत:
कमेंट्री: दुखित की बची शक्ति नष्ट हो जाती है। दुखित जेब से डिब्बा निकालता है। मिट्टी खाता है।  मिट्टी का चंदन लगाता है। ईमान की तिजोरी भर चुकी थी। काँटों से डिब्बा भर चुका था। अब कोई जगह शेष नहीं थी। काँटों से मुक्ति का अवसर था। उसने मिट्टी का महाप्रसाद खाया। आँसुओं का गंगाजल पिया। मस्तक पर मिट्टी का चंदन खुद अपने हाथों लगा लिया। सन्यास की अवस्था में उसे बच्चे रूपी चंदैनी गोंदा दिखाई देते हैं। वर्षा का आह्वान करते हुए।
गीत:  घानी मुनी घोर दे
कमेंट्री:; बटोरन लाल की बद्दुआ सच हो रही है। अंतिम समय, दुखित के पास ना मरही है , न शिव,  न गंगा, न भागवती और न चांद-बी। केवल उसका मन उस पर न्योछावर है। सुमन, सुंदर मन।
कमेंट्री: अरे ! यह कौन आ रहा है दुखित की लाश के पास ? गिद्ध की नाईं बटोरन लाल।  बटोरन लाल ! अकाल की काली छाया ने तुम्हें भी नहीं बख्शा? अब क्या लेने आए हो यहां? सब कुछ खत्म हो गया। दुखित के तन को बटोरन लाल ने अपने सीने से लगा लिया।  काश!  बटोरन लाल का यह भाव सर्वव्यापक हो पाता। वह गिद्ध की नाईं आया और राजहंस की भांति जा रहा है। दुखित की पीड़ा व्यर्थ नहीं गई। उसने बटोरन लाल का हृदय परिवर्तन कर दिया। अब बटोरन लाल को दूसरा नाम देना होगा। कौन कहता है कि दुखित मर गया है?  मरता वह है जो जिंदगी के टूटे,  थके हारे या जो पराए दर्द के काँटे न बुहारे । दुखित मानवता है । प्रदीप्त है।  अटूट है। अतीत है। बेशक तुमने देखा है उसको, उसकी जिंदगी को हिम्मत और मस्ती को, तुम अवाक रह गए हो कि वह असाधारण रूप से साधारण है। एक औसत भारतीय किसान का उदाहरण है। आओ तुम्हें आमंत्रित करता हूँ, दुखित जैसा बनो, कुछ माटी में सनो,  फिर चाहो तो कह देना कि दुखित मर गया। किंतु मुझे अमरत्व पर विश्वास है क्योंकि उसका अहिंसक बलिदान बटोरन लाल को अपना सुमन सौंपने का संदेश देकर गया है। कौन कहता है दुखित मर गया ? मानवता की मिसाल लिए माटी का बेटा सदा के लिए सो चुका है। उसकी चिता की अग्नि मशाल बन गई ऐसा लगता है।
छत्तीसगढ़ महतारी इस वियोग की बेला में फफक-फफक कर रो पड़ी है। अपनी निराशा बेबसी और एकाकीपन के बीच वह अपने सोए हुए बेटों की ओर ताकते हुए इधर ही आ रही है। उनकी तंद्रा भंग करने।

जीवन की लहर-लहर से हँस खेल खेल रे नाविक
जीवन के अंतस्थल में नित बूड़-बूड़ रे नाविक
हँसमुख प्रसून इकलौते, पल भर है जो हाथ पाओ
अपने डर के सौरभ से जग का आंगन भर जाओ।
उपर्युक्त संपूर्ण कथानक के साथ लोक धुनों में आबद्ध छत्तीसगढ़ी के अनेक गीतों छत्तीसगढ़ के नयनाभिराम दृश्यों और ग्रामीणों तथा नागर संस्कृति के लोक-नाट्यों के मिश्रित स्वरूप में प्रस्तुत चंदैनी गोंदा की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ में एक वैचारिक क्रांति उत्पन्न की। दाऊ रामचंद्र जी देशमुख अपने श्रम को सार्थक स्वरूप प्रदान कर पाने में पूरी तरह सफल रहे।
(डॉक्टर सन्तराम देशमुख "विमल" की किताब "छत्तीसगढ़ी लोक नाटक के विकास में दाऊ रामचंद्र देशमुख का योगदान",  से साभार)
प्रस्तुतकर्ता - अरुण कुमार निगम

चंदैनी-गोंदा की स्मृतियाँ

एक बार फिर चंदैनी-गोंदा की स्मृतियाँ ताजी हो गई और कुछ लिखने की इच्छा जाग गई. सत्तर के दशक की शुरुवात में ग्राम- बघेरा, दुर्ग के दाऊ राम चन्द्र देशमुख ने ३६ गढ़ के 63 कलाकारों को लेकर "चंदैनी-गोंदा" की स्थापना की. "चंदैनी-गोंदा" किसान के सम्पूर्ण जीवन की गीतमय गाथा है. किसान के जन्म लेने से लेकर मृत्यु होने तक के सारे दृश्यों को रंगमंच पर छत्तीसगढ़ी गीतों के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया गया कि यह मंच एक इतिहास बन गया.

चंदैनी गोंदा की प्रथम प्रस्तुति दाऊ रामचंद्र देशमुख के गृहग्राम बघेरा में हुई। दूसरी प्रस्तुति ग्राम पैरी (बालोद,जिला दुर्ग के पास) छत्तीसगढ़ के जन कवि स्व.कोदूराम "दलित" को समर्पित करते हुए दाऊ जी ने मंच पर उनकी धर्म-पत्नी को सम्मानित किया था. इस आयोजन की भव्यता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि चंदैना गोंदा देखने सुनने के लिए लगभग अस्सी हजार दर्शक ग्राम पैरी में उमड़ पड़े थे. इस प्रदर्शन के बाद जहाँ भी चंदैनी-गोंदा का आयोजन होता,आस -पास के सारे गाँव खाली हो जाया करते थे. सारी भीड़ चंदैनी-गोंदा के मंच के सामने रात भर मधुर गीतों और संगीत की रसभरी चांदनी में सराबोर हो जाया करती थी. इसके बाद छत्तीसगढ़ के कई स्थानों पर चंदैनी-गोंदा के सफल प्रदर्शन हुए.चंदैनी-गोंदा के प्रदर्शन छत्तीसगढ़ के बाहर भी कई शहरों में हुआ.

चंदैनी-गोंदा के उद्घोषक सुरेश देशमुख की मधुर और सधी हुई आवाज दर्शकों को भोर तक बाँधे रहती थी.चंदैनी गोंदा के मधुर गीतों को स्वर देने वाले प्रमुख गायक-गायिका थे रविशंकर शुक्ल, लक्ष्मण मस्तुरिया, भैय्या लाल हेडाऊ, केदार यादव, अनुराग ठाकुर, संगीता चौबे, कविता हिरकने (अब कविता वासनिक) साधना यादव, संतोष झाँझी, लीना,किस्मत बाई आदि. प्रमुख गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया के आलावा रवि शंकर शुक्ल, पवन दीवान, स्व.कोदूराम "दलित", रामेश्वर वैष्णव, नारायणलाल परमार, रामरतन सारथी, द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, भगवती सेन, हेमनाथ यदु आदि। पारंपरिक गीत भी रहे. इन गीतों को संगीतबद्ध करने वाले संगीतकार थे खुमान लाल साव. खुमान लाल साव के साथ बेन्जो पर गिरिजा शंकर सिन्हा, बांसुरी पर संतोष टांक, तबले पर महेश ठाकुर आदि. मंच पर सशक्त अभिनय का लोहा मनवाते थे- दाऊ रामचंद्र देशमुख, भैया लाल हेडाऊ, शिव कुमार दीपक (हास्य), सुमन, शैलजा ठाकुर आदि. साउंड-सिस्टम पर नियंत्रण रहता था स्वर-संगम, दुर्ग के बहादुर सिंह ठाकुर का. (गायक, गीतकार, वादक, अभिनय के नाम अपनी याददाश्त के अनुसार लिख रहा हूँ, इन नामों के आलावा और भी बहुत से कलाकारों का संगम था चंदैनी-गोंदा में. यदि किसी पाठक के पास जानकारी उपलब्ध हो तो मेरे लेख को पूर्ण करने में मदद करेंगे,मैं आभारी रहूँगा.)

छत्तीसगढ़ी गीतों से सजे चंदैनी-गोंदा के मधुर गीतों का उल्लेख किये बिना यह लेख अधूरा ही रह जायेगा. चल - चल गा किसान बोये चली धान असाढ़ आगे गा में जहाँ आसाढ़ ऋतु का दृश्य सजीव होता था वहीँ आगी अंगरा बरोबर घाम बरसत हे -गीत ज्येष्ठ की झुलसती हुई गर्मी का एहसास दिलाती थी. छन्नर –छन्नर पैरी बजे, खन्नर-खन्नर चूरी गीत में धान-लुवाई का चित्र उभर आता था, आज दौरी माँ बैला मन... गीत अकाल के बाद किसान की मार्मिक पीड़ा को उकेरता था. किसान कभी अपना परिचय देता है...मयं छत्तीसगढ़िया हौं गा. मयं छत्तीसगढ़िया हौं रे, भारत माँ के रतन बेटा बढ़िया हौं गा.....कभी अपनी मातृ- भूमि को नमन करते हुए गा उठता है... मयं बंदत हौं दिन-रात,मोर धरती-मैय्या जय होवै तोर.. चंदैनी-गोंदा में बाल मन में-चंदा बन के जिबो हम,सुरुज बनके जरबो हम, अनियाई के आगू भैया, आगी बरोबर बरबो हम जैसे गीत के माध्यम से देश प्रेम की भावना का संचार किया गया तो कभी आगे सुराज के दिन रे संगी ... के द्वारा आजादी का आव्हान किया गया.. संयोग श्रृंगार में नायक-नायिका ददरिया गाते झूमते नजर आते थे-मोर खेती-खार रुमझुम, मन भँवरा नाचे झूम-झूम किंदर के आबे चिरैया रे... नई बाँचे चोला छूट जाही रे परान, हँस-हँस के कोन हा खवाही बीड़ा पान. छत्तीसगढ़ी श्रृंगार -गीत में खुमान लाल साव ने अद्भुत संगीत से इस गीत को संवारा-बखरी के तुमा नार बरोबर मन झूमे.... अपने नायक की स्मृति में कभी नायिका कह उठती है... तोला देखे रहेवं गा, तोला देखे रहेवं रे,धमनी के हाट माँ बोइर तरी... नायिका अपने घर का पता कुछ तरह से बताती है.. चौरा माँ गोंदा, रसिया मोर बारी माँपताल.... प्रेम में रमी नायिका को जब मुलाकात में हुई विलम्ब का अहसास होता है तो घर लौटने का मनुहार कभी इस प्रकार से करती है... अब मोला जान दे संगवारी, आधा रत पहागे मोला घर माँ देही गारी रामा... और कभी कहती है.... मोला जावन दे ना रे अलबेला मोर, अब्बड़ बेरा होगे मोला जावन दे ना.. नायिका के विरह गीतों में काबर समाये रे मोर बैरी नयना मा,  मोर कुरिया सुन्ना से,बियारा सुन्ना रे,मितवा तोर बिना का बेहतरीन मंचन किया गया..

चंदैनी-गोंदा में पारंपरिक गीतों में सोहर, बिहाव-गीत, गौरा-गीत, करमा, सुवा-गीत, राउत नाचा, पंथी नृत्य तथा अन्य लोक गीतों का समावेश भी खूबसूरती से किया गया था. गौरा गीत मंचन के समय बहुत बार कुछ दर्शकों पर तो देवी भी चढ़ जाती थी जिसे पारंपरिक तरीकों से शांत भी किया जाता था. चंदैनी-गोंदा के मंच के सामने पता ही नहीं चलता  था की रात कैसे बीत गई.

चंदैनी-गोंदा के मुख्य गायक- गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया हैं. उपरोक्त अधिकांश गीत उन्ही के द्वारा रचित हैं सन 2000 के दशक के प्रारंभ से शुरू हुई अनेक छत्तीसगढ़ी फिल्मों में उनके गीत लोकप्रिय हुए.. संगीतकार खुमान लाल साव ने छत्तीसगढ़ी गीतों को नया आयाम दिया. आपने भी छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अपना योगदान दिया है. चंदैनी-गोंदा के बाद छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य परिष्कृत रूप में बनने प्राम्भ हो गए. बाद के अन्य संगीतकारों की संगीत रचनाएँ भी काफी मशहूर हुई किन्तु उनमें कहीं न कहीं खुमान लाल साव की शैली का प्रभाव जरुर होता था.बंगाल में जैसे रविन्द्र-संगीत का प्रभाव है उसी तरह खुमान - संगीत पर भी विचार किया जाना चाहिए. भैयालाल हेडाऊ ने  सत्यजीत रे की फिल्म सद्गति में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी.शैलजा ठाकुर भी रुपहले परदे पर नजर आई. सन १९८२ में तेरह इ.पी.रिकार्ड के जरिये चंदैनी गोंदा के बहुत से गीतों ने छत्तीसगढ़ में धूम मचाई, आज भी अच्छे सुनने वालों के पास ये गीत उनके संकलन में हैं.

दाऊ रामचंद्र देशमुख ने चंदैनी गोंदा के बाद "देवार- डेरा" और "कारी" का भी सफल मंचन किया. इनमें संवाद लेखक प्रेम साइमन थे। चंदैनी गोंदा के प्रदर्शन के लगभग साथ-साथ ही दुर्ग के दाऊ महा सिंह चंद्राकर ने "सोनहा-बिहान" और "लोरिक चंदा" को मंच पर प्रस्तुत कर छत्तीसगढ़ को अनमोल भेंट दी. इनके बाद छत्तीसगढ़ में बहुत से कलाकारों ने इस दिशा में प्रयास किये हैं किन्तु चंदैनी गोंदा और सोनहा बिहान ही सर्वाधिक सफल मंच रहे. केदार यादव के " नवा-बिहान" ने भी काफी लोकप्रियता हासिल की. दुर्ग के संतोष जैन के  मंच "क्षितिज रंग शिविर" ने छत्तीसगढ़ तथा भारत के अनेक प्रदेशों में अपने उत्कृष्ट से अभिनय को नई उँचाईयां प्रदान की हैं. छत्तीसगढ़ के रंगमंच को जीवंत करने में अर्जुन्दा के दाऊ दीपक चंद्राकर और दुर्ग के दाऊ विनायक अग्रवाल की महत्वपूर्ण भूमिका भी कभी भुलाई नहीं जा सकती।
(समस्त चित्र लोकप्रिय पत्रिका-धर्मयुग -25 मार्च 1979 में प्रकाशित श्री परितोष चक्रवर्ती के आलेख से साभार)

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...