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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को बहुत कुछ होता है । अब हमीं कुछ लोग हैं जो थोड़ा-बहुत बता सकते हैं । यह लेख उसी ज़िम्मेदारी के तहत उपजा है...... 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में चंदैनी-गोंदा का प्रथम प्रदर्शन हुआ। उसके बाद से आजपर्यंत छ. ग. ( तत्कालीन अविभाजित म. प्र. ) के लगभग सभी समादृत विद्वानों, साहित्यकारों, पत्रकारों, समीक्षकों, रंगकर्मियों, समाजसेवियों, स्वप्नदर्शियों, सुधी राजनेताओं आदि-आदि सभी ने चंदैनी-गोंदा के विराट स्वरूप, क्रांतिकारी लक्ष्य, अखण्ड मनभावन लोकरंजन के साथ लोकजागरण और लोकशिक्षण का उद्देश्यपूर्ण मिशन, विस्मयकारी कल्पना और उसका सफल मंचीय प्रयोग आदि-आदि पर बदस्तूर लिखा। किसी ने कम लिखा, किसी ने ज़्यादा लिखा, किसी ने ख़ूब ज़्यादा लिखा, किसी ने बार-बार लिखा। तब के स्वनामधन्य वरिष्ठतम साहित्यकारों से लेकर अब के विनोद साव तक सैकड़ों साहित्यकारों की कलम बेहद संलग्नता के साथ चली है। आज भी लिखा जाना जारी है। कुछ ग़ैर-छत्तीसगढ़ी लेखक जैसे परितोष चक्रवर्ती, डॉ हनुमंत नायडू जैसों

प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग की स्थापना - एक परिकल्‍पना Establishment of Migrant Chhattisgarhia Department - a vision by Ashok Tiwari

Establishment of Overseas Chhattisgarhia Department

प्रवासी भारतीय दिवस की शुरुआत विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों और अनिवासी भारतीयों के साथ आर्थिक -सांस्कृतिक संबंध की स्थापना एवं संवर्धन के उद्देश्य के लिए किया गया है। इसकी शुरुआत के लिए भारत सरकार ने पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में एक उच्च स्तरीय समूह का गठन किया था जिसके मुखिया पूर्व राजनयिक डॉ. लक्ष्मी मल्ल सिंघवी थे। उनके द्वारा तैयार प्रतिवेदन के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी ने सन 2002 में इस दिवस को आयोजित किये जाने के बारे में घोषणा की और 2003 से इसे प्रतिवर्ष 9 जनवरी को मनाने की शुरुआत की गई। 9 जनवरी का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि इस दिन महात्मा गांधी सन 1915 में दक्षिण अफ्रीका से वापस भारत लौटे थे। तब से अर्थात 2003 से प्रतिवर्ष 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन देश के किसी न किसी शहर में किया जाता है जिसमें दुनिया भर में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अर्थात पी आई ओ (PIO -Person of Indian Origin) और अनिवासी भारतीय अर्थात एन आर आई (NRI-Non Resident Indian) सम्मिलित होते हैं। आयोजन के अंतर्गत चयनित प्रतिभागियों को प्रवासी भारतीय सम्मान भी प्रदान किया जाता है।

भारतीय मूल के लोग मुख्यतः उन्हें कहा जाता है जिनके पूर्वज सैकड़ों वर्ष पहले ब्रिटिश सरकार द्वारा इंडेंचर्ड लेबर के रूप में मजदूरी करने के लिए भारतवर्ष से ले जाए गए थे और वे लोग कालांतर में उन देशों में ही बस गए और क्रमशः उन देशों के मुखिया भी बने, भाग्य निर्माता बने तथा उन देशों के लिए विकास के सोपान रचे। इस श्रेणी में फिजी, ग्रेनाडा, गयाना, जमाईका, मॉरीशस, सेंट लूसिया, सैंट विंसेंट एंड ग्रैनेडाइंस, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम और त्रिनिडाड और टोबेगो में निवास करने वाले भारतवंशी आते हैं। इस श्रेणी में व्यापार या अन्य कारणों से सैकड़ों वर्षों से कई पीढ़ियों से विदेश में बसे लोग भी आते हैं।दूसरी श्रेणी के भारत लोग जिन्हें अनिवासी भारतीय कहा जाता है वे व्यापार और और शिक्षा के आधार पर बेहतर जीवन यापन के लिए दुनिया के विभिन्न देशों में पिछले लगभग एक शताब्दी से देश से अलग अलग समय में जाने लगे हैं। यह क्रम पिछली तीन चार दशकों में ज्यादा बढ़ा है। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में 3.2 करोड़ भारतीय विदेशों में रहते हैं जो दुनिया भर के 210 देशों में निवासरत हैं, काम करने के लिए अस्थायी निवासी के रूप में या स्थायी निवासी/नागरिक के तौर पर जिसमें सबसे अधिक लोग, लगभग 45 लाख तो अमेरिका में ही रहते हैं। इसके अतिरिक्त संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरेबिया, मलेशिया, म्यानमार, कनाडा, ब्रिटेन, बहरीन, श्रीलंका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, सिंगापुर, फिलीपीन, ओमान, नेपाल, आस्ट्रेलिया इत्यादि देशों में अनिवासी भारतीयों की संख्या लाखों में है।

भारत सरकार ने इन अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के लिए प्रवासी भारतीय दिवस मनाए जाने के साथ ही सन 2004 में एक अलग मंत्रालय की स्थापना की थी जिसे प्रवासी भारतीय मंत्रालय कहा जाता था किंतु बाद में सन 2016 में इस मंत्रालय का विदेश मंत्रालय में संविलियन कर दिया गया और अब यह विदेश मंत्रालय के अधीन एक विभाग के रूप में कार्यरत है ।भारत सरकार के प्रवासी भारतीय मंत्रालय की स्थापना या विभाग के गठन के आधार पर देश के अनेक राज्यों में भी उस राज्य की प्रवासी जनसंख्या जो विदेश जाकर बस गयी या वहां कार्यरत हैं उनके लिए पृथक विभाग या मंत्रालयों की स्थापना की गई जो भारतवर्ष के बाहर और देश के विभिन्न राज्यों में निवास करने वाले उस राज्य विशेष के लोगों के साथ आर्थिक सांस्कृतिक संबंध की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण का कार्य करते है किंतु छत्तीसगढ़ में अभी तक ऐसी किसी व्यवस्था का सृजन नही किया गया है।

मानव के शारीरिक उद्विकास और सामाजिक उद्विकास के अध्येता मानते हैं कि मनुष्य का उद्भव अफ्रीका महाद्वीप में हुआ था जहां से वह धीरे धीरे दुनिया के विभिन्न भागों में फैल कर उन् क्षेत्रों के स्थाई निवासी बन गया। यह सिलसिला जब से मनुष्य इस धरती पर उदविकसित हुआ है तब से शुरू हुआ और अब भी जारी है।

छत्तीसगढ़ के लोग भी इसी तरह के प्रवासन की जीवन पद्धति के बहुत पुराने संवाहक हैं ।लिखित इतिहास से ज्ञात होता है की 19वीं शताब्दी के अंत में सन अट्ठारह सौ पचास के आसपास जब असम में अंग्रेजों ने चाय बागान विकसित करने शुरू किए तब उन्हें कर्मठ मजदूरों की आवश्यकता थी। उन लोगों को छत्तीसगढ़ वासियों में मेहनत और कर्मठता नजर आई और तब अंग्रेजों द्वारा छत्तीसगढ़ के लोग समीपवर्ती छोटा नागपुर के आदिवासी लोगों के साथ मजदूर बनाकर चाय बागान में काम करने के लिए असम ले जाये गए ।यह सिलसिला आज़ादी के कुछ साल पहले तक जारी रहा अर्थात लगभग डेढ़ सौ साल पहले संभवतः छत्तीसगढ़ से लोगों का अन्यत्र प्रवासन प्रारंभ हुआ था जो अब भी जारी है। छत्तीसगढ़ के समूचे इलाकों में, चाहे वह सरगुजा हो या मैदानी छत्तीसगढ़ या बस्तर अंचल, इन सभी क्षेत्रों में कमाने खाने के लिए अन्यत्र जाने का सिलसिला सैकड़ों सालों से चल रहा है और अब भी जारी है। असम के बाद जमशेदपुर या टाटानगर एक ऐसा क्षेत्र था जहां पर जमशेदजी टाटा ने पिछली शताब्दी के आरम्भ में जब इस्पात कारखाना शुरू किया तब छत्तीसगढ़ से लोग वहां काम करने के लिए ले जाए गए। यह कहा जाता है कि आज भी टाटानगर का कारखाना छत्तीसगढ़ी श्रम के बलबूते झंडा बरदार बना हुआ है। अपने देश में असम के चाय की बात कहें या टाटानगर के लोहे की बात करें, इन सब के पीछे वे प्रवासी छत्तीसगढ़िया ही मूल कर्णधार हैं जिनके श्रम से ये पैदा होते हैं। इसके अतिरिक्त धीरे धीरे छत्तीसगढ़ के लोगों ने लगभग पूरे भारत में चाहे वह दिल्ली हो, जम्मू कश्मीर और लद्दाख हो, उत्तर प्रदेश हो या दक्षिण के राज्य हो या कहें तो समीपवर्ती महाराष्ट्र, ओडिशा, बंगाल हो, या फिर उत्तर पूर्व के लगभग सभी राज्य हों, इन सभी क्षेत्रों में जाकर तरह-तरह के काम करने शुरू किए, और फिर उन्होंने उन स्थानों को ही अपना या तो स्थाई निवास बना लिया, या सीजनल माइग्रेशन के आधार पर वहां काम करना शुरू कर दिया ।

छत्तीसगढ़ के लोगों का देश से बाहर काम करने के लिए जाने और वही बसने का भी हमें जो सबसे पुराना उदाहरण प्राप्त होता है उसके अनुसार सन उन्नीस सौ में एक जहाज में बैठकर लगभग 1000 छत्तीसगढ़ वासी फिजी द्वीप गए थे, अंग्रेजों के मजदूर अर्थात इंडेंचर्ड लेबर बन कर, और फिर वे वही बस गए, छत्तीसगढ़ वापस नहीं आए। यदि हम उन अन्य देशों की बात करें जहां पर भारत वर्ष से लोगों को इंडेंचर्ड लेबर के रूप में अंग्रेजों द्वारा ले जाया गया था और जहां फिर वे भारतीय मजदूर स्थाई रूप से बस गए। उन देशों के बारे में यह कहा जाता है कि वहां अधिकतर लोग बिहार और उत्तर प्रदेश से प्रवासन कर गए थे किंतु साथ ही इन सभी देशों के संदर्भ में यह भी लिखा गया है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ ही मध्य भारत से भी कुछ लोग मजदूर के रूप में काम करने के लिए उन देशों में गए थे और फिर वे वहां स्थाई रूप से बस गए।यदि यह मध्यभारत वाली बात प्रमाणित होती है तो सम्भव है वह क्षेत्र छत्तीसगढ़ ही रहा होगा क्योंकि तब मध्यभारत में छत्तीसगढ़ से ही लोग काम के लिए बाहर प्रवासन किया करते थे। इस तरह से हम पाते हैं की सौ डेढ़ सौ साल पहले से ही छत्तीसगढ़ के लोगों ने अंतः प्रवासन अर्थात देश के अंदर अन्य राज्यों में स्थाई रूप से बसना और बाह्य प्रवासन अर्थात देश के बाहर अन्य देशों में जाकर स्थाई रूप से बसना ,ये दोनों ही कार्य किया हुआ है।

दूसरी ओर शिक्षा और तकनीकी प्रचार प्रसार के बाद पिछले 5-6 दशकों से छत्तीसगढ़ के लोगों ने दुनिया के लगभग सभी विकसित देशों में रोजगार के लिए जाना आरंभ किया और वहीं पर अभी भी रह रहे हैं तथा अपना और छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर रहे हैं।मेरी यथेष्ठ जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ से उच्च शिक्षा अर्जित कर विदेश में रोजगार हेतु जाने की शुरुआत पिछली शताब्दी के छठवें-सातवें दशक में हुई थी जब रायपुर के डॉ इंदु भूषण तिवारी, श्री कृष्णकांत दुबे और प्रो खेतराम चंद्राकर तथा बिलासपुर के डॉ श्याम नारायण शुक्ला इंग्लैंड, अमेरिका गए और कालांतर में वहाँ के स्थायी निवासी हो गए। बाद में यह क्रम बहुत घनीभूत हुआ और आज के तकनीकी विशेषज्ञता के युग मे छत्तीसगढ़ के हज़ारों लोग दुनिया के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं।

सभी प्रवासी छत्तीसगढ़िया लोगों के संदर्भ में कुछ स्थाई व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा किया जाए इसका आभास मुझे तब हुआ जब मैं असम में निवासरत छत्तीसगढ़ी लोगों के मध्य लगभग पिछले 5 सालों से जुड़ा हुआ हूँ। वहां लगभग डेढ़ सौ साल से निवास कर रहे हमारे छत्तीसगढ़िया समाज के लोगों के बीच जाकर न केवल मुझे लगा वरन उन सभी का यह प्रेम भरा आग्रह और कामना भी सुना और महसूस किया जिसके अंतर्गत वे चाहते हैं उसे यदि उनके शब्दों में कहा जाए तो छत्तीसगढ़ सरकार, क्योंकि अब एक छत्तीसगढ़ी पहचान वाले एक पृथक राज्य की सरकार है, उस राज्य की जिस राज्य से हम अपने पूर्वजों के आगमन को जोड़ते हैं, हमारी अपेक्षा है कि वह सरकार हमारे लिए कुछ ऐसी स्थाई व्यवस्था करें कि हम अपने पूर्वजों की भूमि से सांस्कृतिक संबंधों को फिर से आरंभ कर सकें। हमारा वहां आना जाना हो सके। हम डेढ़ सौ सालों से जिस संस्कृति को अपने बीच बचाए हुए हैं उसको चिरस्थाई बनाने के लिए हमें छत्तीसगढ़ की सरकार कुछ सहयोग करें। इन सब के लिए एक स्थायी व्यवस्था शुरू की जानी चाहिए ।

ज्ञातव्य है कि देश के अधिकतर राज्यों में वहां की शासन व्यवस्था में उन राज्यों के प्रवासी समुदायों के लिए प्रवासी विभाग कार्य करते हैं। इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करने वाले बिहार और गुजरात के प्रवासी विभागों का संदर्भ देना चाहूंगा जिसके अंतर्गत गुजरात शासन ने नान रेसिडेंट गुजराती अर्थात प्रवासी गुजराती लोगों के लिए एक फाउंडेशन की स्थापना की है जो देश में रहने वाले गुजराती लोगों के साथ गुजरात का संबंध स्थापित करने और उनके बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए तरह-तरह के गतिविधियों का संचालन करती है।इस फाउंडेशन के द्वारा हर वर्ष देश के किसी एक राज्य में सदा-काल गुजरात नामक आयोजन किया जाता है जिसमें पारंपरिक गुजराती संस्कृति से संबंधित कार्यक्रम होते हैं। हजारों की तादात में लोग इन कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए आते हैं। लगभग 4 वर्ष पहले रायपुर में भी सदा-काल गुजरात नामक का आयोजन हुआ था जिसमें गुजरात राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री विजय रूपाणी भी सम्मिलित हुए थे। उन्होंने यहां के गुजराती भाइयों से मुखातिब होते हुए यह कहा था कि आप भले ही गुजरात से हजारों किलोमीटर दूर रह रहे हो पर ऐसा नहीं है कि आप गुजरात से दूर हैं। आपको कभी भी गुजरात की याद आए आपको कभी भी किसी तरह से सांस्कृतिक असमिता को लेकर कोई चिंता आये पर तो आप फिक्र ना करें, एनआरजी है। आप संपर्क करें एन आर जी अर्थात नान रेसिडेंट गुजराती विभाग से जिसे आप जैसे देश दुनिया मे फैले गुजराती लोगों की सेवा के लिए स्थापित किया गया है।

इसी तरह से बिहार सरकार ने भी प्रवासी बिहारी फाउंडेशन नामक एक विभाग की स्थापना की है जो विदेश में रहने वाले बिहारियों के अतिरिक्त देश के अलग-अलग स्थानों में रहने वाले बिहार राज्य के प्रवासी लोगों के बीच उनके सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करती है। इस फाउंडेशन के द्वारा देश के अनेक अनेक राज्यों में जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बनारस, लखनऊ, अहमदाबाद आदि अनेक स्थानों में बिहार प्रवासी बिहार फाउंडेशन के चैप्टर स्थापित किए हुए हैं जो उस क्षेत्र या उस राज्य में रहने वाले प्रवासी बिहारियों के बीच संपर्क का कार्य करता है। इन संदर्भों को यहां पर उल्लेख करने का मेरा एकमात्र अभिप्राय है कि हमारे राज्य से प्रवासन संभवत देश के सबसे पुराने प्रवासनो में से एक है किन्तु हमने अभी तक अपने इन प्रवासी भाइयों के लिए कोई इस तरह की कार्यवाही नहीं की है।और तो और, पहले छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रतिवर्ष जो प्रवासी छत्तीसगढ़ी अलंकरण दिया जाता था उसे भी पिछले कुछ सालों से बंद कर दिया है, इसलिए मेरा विचार है कि छत्तीसगढ़ राज्य में भी एक प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग की स्थापना की जाए जिसके अंतर्गत हम फाउंडेशन का गठन करें या फिर सरकार सीधे सीधे उनके बीच जाकर कार्यवाही करें या जिन स्थानों पर हमारे छत्तीसगढ़िया भाई बंधु रहते हैं वहां स्रोत व्यक्तियों को नामित कर अपने गतिविधियों का संचालन करें। ये तमाम बातें और संचालित की जाने वाली गतिविधियां बाद में निर्धारित की जा सकती हैं। यह भी कोशिश की जा सकती है कि क्या फिजी के साथ ही अन्य देशों में भी इंडेंचर्ड लेबर के रूप में छत्तीसगढ़ के लोग गए थे और यदि गए थे तो किन-किन देशों में गए थे और वहां पर उनकी अभी संख्या क्या है। उन सभी को उनके मूल से जोड़ने के लिए संदर्भ स्रोत के रूप में भी हम मदद कर सकते हैं जिसके माध्यम से भी अपने को पहचान सकते हैं अपने गांव और अपने खानदान को पहचान सकते हैं। ये सब तो वैसे ही कार्यवाही होगी जो अन्य राज्यों के प्रवासी विभाग अपने प्रवासी समुदाय के लिए करती है, खासकर उन लोगों के लिए जो देश के बाहर काम करते हैं।

छत्तीसगढ़ के, अभी हाल के दशकों में अमेरिका में निवासरत प्रवासी छत्तीसगढ़ी लोगों ने उत्तर अमेरिका में नाचा नामक एक संस्था का गठन किया हुआ है जिसके माध्यम से वे छत्तीसगढ़ राज्य के साथ सांस्कृतिक संबंध बनाए हुए हैं और उन्होंने बड़े सम्मान के साथ छत्तीसगढ़ राज्य के पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों को सहेज कर रखा हुआ है और गर्व के साथ उसकी अभिव्यक्ति करते हैं, उसका प्रदर्शन करते हैं। इस तरह की संस्थाएं अभी हाल के दशकों में विदेश गए प्रवासी लोगों के बीच समूची दुनिया के देशों में स्थापित की जा सकती हैं। इसके लिए भी यह प्रस्तावित विभाग ठोस कार्यवाही कर सकता है ।ऐसा डाटा बैंक बना सकता है जिसके माध्यम से हम विदेश में रहने वाले छत्तीसगढ़िया और देश के अलग-अलग राज्यों में रहने वाले छत्तीसगढ़िया लोगों के बारे में आंकड़े एकत्र कर सकते हैं। उनकी पूरी जानकारी का संधारण कर सकते हैं और शायद ऐसा करना इसलिए भी बहुत उपयोगी होगा क्योंकि अभी छत्तीसगढ़ से लाखों की तादात में हर वर्ष लोग बाहर श्रमिक के रूप में काम करने के लिए जाते हैं। उनमे से कुछ वहीं रह जाते हैं और कुछ फिर काम करके अपनी खेती-बाड़ी के काम में हाथ बंटाने छत्तीसगढ़ आते हैं। उनका यह माइग्रेशन, सीजनल होता है।

ऐसे ही लोगों को कोरोनावायरस पर बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था जब वह इस महामारी के दौरान अपने कार्य क्षेत्रों को छोड़कर वापस अपनी मातृभूमि छत्तीसगढ़ लौटे थे। यदि हम प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग की स्थापना करते हैं, तो यह एक ऐसा विभाग होगा जो देश के सभी राज्यों और विदेश में छत्तीसगढ़िया जहां रहते हैं उन सभी देशों में अपने नेटवर्क स्थापित कर सकता है। उस नेटवर्क में ऐसे काम करने के लिए बाहर जाने वाले स्थाई रूप से रहने वाले लोगों की पूरी जानकारी रहेगी और किसी भी तरह की आपदा की स्थिति में राज्य सरकार उनके सहयोग और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम तत्काल उठा सकेगी। शायद ऐसे विभाग की स्थापना से न हम केवल अन्यत्र रहने वाले छत्तीसगढ़िया भाई बहनों के साथ एक सुदृढ़ और स्थाई सांस्कृतिक सेतु का निर्माण कर सकते हैं बल्कि उन सभी छत्तीसगढ़ीया भाई लोगों के हृदय की उस आस को पूरा कर सकते हैं जो उन्होंने अपने मन में संजोकर रखे हुई है, जिन्हें यह याद है कि उनके पूर्वज छत्तीसगढ़ से थे, और उनकी आकांक्षा है कि उनके अपने पूर्वजों की भूमि छत्तीसगढ़ के साथ एक ऐसे संबंध की स्थापना हो जिस संबंध में मिठास हो ,जिस संबंध में स्थायित्व हो और जो संबंध उन्हें अपने मातृभूमि के साथ आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से जोड़ता है। प्रवासी छत्तीसगढ़िया विभाग का गठन एक ऐतिहासिक निर्णय होगा हो हमारे इंटरनल और एक्सटर्नल डायस्पोरा के अनुमानित 30-40 लाख लोगों के लिए उद्देशयित होगी। अर्थात हमारे राज्य की वर्तमान जनसंख्या के आधार पर औसतन लगभग तीन से चार जिलों की जनसंख्या के बराबर।

-अशोक तिवारी

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