छत्तीसगढ़ में अस्मितावादी लेखन - विनोद साव

विचार गोष्ठी में बाएं से मुख्य वक्ता विनोद साव, डा.जे.आर.सोनी, बी.एल.ठाकुर, मुख्य अतिथि डा.संजय अलंग(IAS), दिनेंद्र दास, छत्तीसगढ़ी वंशी असम निवासी शंकरचंद्र साहू, परदेशीराम वर्मा, अशेश्वर वर्मा.
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर ‘अगासदिया’ भिलाई में ‘छत्तीसगढ़ में अस्मितावादी लेखन पर’ विचार गोष्ठी संपन्न हुई. बुद्ध ने कहा था कि ‘परम्पराओं को इसलिए मत मानो कि इसे मैं मानता हूं या हमारे पूर्वज मानते थे. बरसों पुरानी परंपराओं को अपनाने से पहले यह देख लो कि यह आज भी अपनाने योग्य है या नहीं?.’ जाहिर है बुद्ध का यह कथन परंपराओं और रीति-रिवाजों पर लकीर के फ़कीर बने रहने से समाज को सावधान करना था.  इन परम्पराओं में हमारी अस्मिता निहित होती है. इस अस्मिता की रक्षा को लेकर भी न केवल सामान्यजनों में बल्कि लेखक बुद्धिजीवियों के बीच भी बहस हो जाती है.
हम अपनी अस्मिता को भिन्न माध्यम से तलाशते हैं: इसमें हमारी जातीय स्मृतियों, लोक-गाथाओं, मिथकों, पौराणिक चरित्रों कथाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. ये काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक लगती हैं. योग शास्त्र के अनुसार यह पाँच क्लेशों में से एक है. राग, द्वेष की तरह मन का यह भाव या मनोवृत्ति कि ‘मेरी एक पृथक् और विशिष्ट सत्ता है’.. और यही इसकी सीमा है. कभी अस्मिता रक्षा की भावना इतनी आवेग युक्त हो जाती है कि यह पृथकतावादी आन्दोलन की ओर रूख कर जाती है. यह किसी क्षेत्रीय और साम्प्रदायिक मांग की तरह अपनी अलग ‘टेरिटरी’(भू-भाग) की मांग करने लग जाती है.
बहरहाल छत्तीसगढ़ में अपनी अस्मिता के लिए आवाज़ दीगर राज्यों की तरह उग्र और आक्रामक नहीं रही है. यह छत्तीसगढ़ के रहवासियों की तरह सहृदयता पूर्ण है जिसमें उसके निजपन के आनंदमय संसार की चाहत है जिसमें वह सदा मगनमय होता आया है. छत्तीसगढ़ की अस्मिता की पहचान उसके लोकतत्व के रचे बसे संसार में है जहां से वह अपने जीवन के लिए अतिरिक्त उत्साह और उर्जा प्राप्त करता रहता है. इन्हीं लोकतत्वों की उपज है तीजनबाई, देवदास, सूरजबाई खांडे, रामचंद देशमुख – ये छत्तीसगढ़ी संस्कृति के ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं.
डा.हीरालाल शुक्ल, डा.रमाकांत श्रीवास्तव जैसे अनेक आलोचकों के अनुसार यह माना जाता है कि १५ वीं सदी में खैरागढ़ के राजाश्रित कवि दलपत साय ने अपने संरक्षक लक्ष्मीनिधि राय जो उस समय खोलवा के जमींदार थे - को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ को एक पृथक ईकाई माना था. दलपत साय ने भरी सभा में हुंकारते हुए कहा था कि
‘लक्ष्मीनिधिराय सुनो चित्त दै, गढ़ छत्तीस में न गढैया रही
मरदुमी रही नहि मरदन में, फेर हिम्मत से न लड़ैया रही
भयभाव भरे सब कांप रहे, भय है नहि जाय डरैया रही
दलराम भने सरकार सुनो, नृप कोउ न ढाल अडैया रही‘
इस हुंकार की परिणति चार सौ साल बाद छत्तीसगढ़ राज्य के पृथक अस्तित्व में आने पर हुई.  इन पंक्तियों से यह भी स्पष्ट होता है कि ‘छत्तीसगढ़’ जैसे अंचल का एक चित्र मानस पटल पर उभरने लगा था. छत्तीसगढ़ शब्द का प्रयोग दूसरी बार रतनपुर के कवि गोपाल मिश्र ने अपने काव्य ‘खूब तमाशा’ में सन १६८० में किया.. तब यह क्षेत्र दक्षिण कोसल कहलाता था. ‘छत्तीसगढ़ी’ संज्ञा अस्तित्व में कब आई इस पर इतिहासकार डा.संजय अलंग जैसे प्रबुद्धजन चर्चा करते रहे हैं. उनकी किताब ‘कोसल से छतीसगढ़ तक’में छत्तीस’ क्या है ‘गढ़’ क्या है?‘ इसका पुराना नाम ‘कोसल’ क्यों प्रचलित नहीं हो पाया है क्यों नहीं अपनाया गया. छत्तीसगढ़ का वर्तमान स्वरुप कैसे विकसित हुआ. इन सभी प्रश्नों पर सामूहिक चर्चा वे निरंतर कर रहे हैं.
यहां कुछ उन लेखकों के संदर्भ में बातें की जा सकती हैं जिन्होंने विगत दशकों में इतिहास, कविता और गद्य लेखन के प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवाई हैं. इनमें हैं हरि ठाकुर, लक्षमण मस्तुरिया और परदेशीराम वर्मा. इन तीनों रचनाकारों ने हिन्दी छत्तीसगढ़ी दोनों में लेखन किया है. हरि ठाकुर जब बोलते थे तब बहुधा इन पंक्तियों से आरम्भ करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ की भाषा संस्कृति के प्रति मुझे बड़ा मोह है.’  परदेशी राम वर्मा ने लिखा है कि ‘छत्तीसगढ़ को जानना है तो हरि ठाकुर को पढ़ो.’ छत्तीसगढ़ की गाथा, जल, जंगल और ज़मीन के संघर्ष की शुरूआत, छत्तीसगढ़ का प्रांरभिक इतिहास और सांस्कृतिक विकास, कोसल की भाषा कोसली जैसे नामों से हरि ठाकुर की दर्ज़नों कृतियाँ हैं जिनमें छत्तीसगढ़ का वे तुलनात्मक रूप से अधिक प्रामाणिक इतिहास परोसते हैं. राष्ट्र स्तर पर होने वाले महाविद्रोह में छत्तीसगढ़ के राजाओं और जमीदारों ने भी हिस्सा लिया था. इस राष्ट्रीय अस्मिता को वे रेखांकित करते हैं :
‘छत्तीसगढ़ भी ठोंकिस ताल, अठरा सौ सन्तावन साल।
गरजिस वीर नारायण सिंह, मेटिस सबे फिरंगी चिन्ह।‘  
छत्तीसगढ़ के पहले क्रांतिकारी शहीद वीर नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने पम्फलेट छपाकर ‘लाल जोहार किया है’
परदेशीराम वर्मा ने हिन्दी छत्तीसगढ़ी में आपने विपुल गद्य लेखन से इस अस्मिता की आवाज़ में ऐसा चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न किया कि उनके अनेक समकालीन व परवर्ती लेखक उनका अनुसरण करने लग गए. उन्होंने अपनी कहानियों में छत्तीसगढ़ी लोक-मान्यता से ओतप्रोत परिवेश बुनकर, पात्र व चरित्र खड़े कर, हिन्दी कथाओं में आंचलिक बोली व उनके हाने-मुहावरों का जमकर प्रयोग कर अपनी रचनाओं को और भी संप्रेषणीय बना लिया है.
इनमें लक्ष्मण मस्तुरिया ने जितना लेखन किया उससे ज्यादा अपने गीतों की मंचों पर प्रभावी प्रस्तुति से अपने अस्मितापूर्ण लेखन का अलग प्रभाव उन्होंने जना है और वे लगभग असम के भूपेन हज़ारिका की तरह छत्तीसगढ़ के जनमानस में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले कवि गीतकार हो गए. उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में छंद के स्तर पर भी प्रयोग किए हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां असम ने अपने सृजनकार भूपेन हजारिका को पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कारों तक पहुँचाया वहीं लक्ष्मण मस्तुरिया की यहां के शासन-प्रशासन और यहां की जनता ने कितनी सुधि ली है इसकी भनक लोगों को नहीं हो पायी, न ही उन्हें किसी पुरस्कार अलंकरण से कभी नवाज़ा गया.

 -  विनोद साव


20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जनमे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व विभाग में सहायक प्रबंधक हैं। fहंदी व्यंग्य के सुस्थापित लेखक विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, अक्षरपर्व, वसुधा, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं। उनके दो उपन्यास, तीन व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों व कहानियों के संग्रह सहित अब तक कुल बारह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल के लिए भी चित्र-कथाएं उन्होंने लिखी हैं। वे उपन्यास के लिए डाॅ. नामवरfसंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी सम्मानित हुए हैं। उनका पता है: मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001 मो.9301148626 ई-मेलः vinod.sao1955@gmail.com

यशश्वी गीतकार संत की कृति मउँहा झरे

"26 जनवरी 2014 को राजपथ नई दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस के मुख्य समारोह में जब मउँहा झरे रे.. मउँहा झरे रे.. गीत की पंक्तियां गूंजी और इस छत्तीसगढ़ी लोकगीत पर जब असम के कलाकारों ने भाव नृत्य कर वहां उपस्थित हजारों दर्शकों की तालियां बटोरी तो नि:संदेह हर छत्तीसगढ़िया का सीना चौड़ा हो गया। लोगों के मन में जिज्ञासा थी कि इस गीत के रचनाकार कौन हैं?.. और जब लोगों को पता चला कि इस गीत के रचयिता संस्कारधानी राजनांदगांव के श्री हर्ष कुमार बिंदु है तो लोग चौंक उठे।" किताब के शुरुआती पन्नो में 'लोकगीतों का अविराम यात्री..' में इस किताब के सर्जक से हम सब का परिचय कराते हुए मउँहा झरे किताब के प्रेरक भाई वीरेंद्र बहादुर सिंह की कलम से ऐसा लिखा हुआ पढ़ा तो यकबक मुझे भी विश्वास नहीं हुआ। मैं अब तक इस गीत को पारंपरिक लोकगीत समझ रहा था और संग्रह मेरे हाथ मे होने के बावजूद शीर्षक को लोक प्रतीक के रूप में कवि के द्वारा उपयोग किया हुआ मान रहा था। हर्ष हुआ कि, हर्ष कुमार बिंदु जी की किताब मउँहा झरे मेरे हाथ में है। 
इस किताब में अपने परिवेश से पाठकों को परिचित कराते हुए अपने लेखकीय में स्वयं हर्ष कुमार बिंदु ने लिखा कि छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी राजनांदगांव कला, साहित्य और संगीत की त्रिवेणी है। वे उसी संस्कारधानी के निवासी हैं और उसी संस्कारधानी से यह किताब प्रकाशित हुई है। वे आगे लिखते हैं कि पारंपरिक देवी जस गीत का संस्कार इन्हें अपने पिता बंशीलाल गढ़वाल से प्राप्त हुआ। छत्तीसगढ़ी जस गीतों के वर्तमान स्वरूप और इसके विकास को भी इसमें इन्होंने चित्रित किया है। साथ ही अपनी रचना एवं संगीत यात्रा को भी इस में रेखांकित किया है। इन्होंने छत्तीसगढ़ी देवी जस गीत के प्रथम रचनाकार खैरागढ़ रियासत के राजा कमल नारायण सिंह को बताया है। 
बिंदु जी ने चंदैनी गोंदा, अनुराग धारा, स्वर धारा जैसे सुप्रसिद्ध कलामंचों के साथ भी काम किया है। इनके द्वारा लिखी गई माता पाताल भैरवी की आरती नित्यप्रति राजनांदगांव के पताल भैरवी मंदिर में गायी जाती है। इनके लिखे गीतों के कई कैसेट भी जारी हो चुके हैं। जिनमें मां पाताल भैरवी महिमा एवं नई माने काली कैसेट प्रमुख हैं। जिसे कविता वासनिक एवं लाली ठाकुर आदि ने स्वर दिया है। जस गीत के साथ ही इन्होंने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक गीतों का भी सृजन किया है जिसे ख्यात गायकों ने स्वर दिया स्वर दिया है। 
प्रस्तुत पुस्तक मउँहा झरे बिंदु जी की ऐसे ही रचनाओं का संकलन है। जो यत्र-तत्र बिखरी हुई थी किंतु प्रकाशित नहीं हुई थी। इन्हें संकलित कर प्रकाशित कराने के संबंध में उन्होंने सोचा भी नहीं था। बेहद संकोची एवं अल्पभाषी बिंदु जी ने इसके लिए सही मायनों में कोई प्रयास ही नहीं किया था। व्‍याख्‍याता एवं कलानाट्य धर्मी मुन्‍ना बाबू एवं सवेरा संकेत के वरिष्ठ सह-संपादक और लोक समीक्षक ठाकुर वीरेंद्र बहादुर सिंह की प्रेरणा से यह संकलन तैयार हो पाया। वीरेंद्र भाई और मुन्‍ना बाबू के उदीम से ही बिंदु जी के इन उत्कृष्ट गीतों से हमारा साक्षात्कार हो पाया। वीरेंद्र भाई ने इसी किताब में राजनांदगांव की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए लिखा भी कि 'संस्कारधानी के रचना कर्म करने वाली साहित्य एवं संगीत की नई पीढ़ी हमेशा अपना बेहतर ही देने का प्रयास करती है।' ..और उन्होंने इस बेहतर रचना को बेहतरीन ढंग से हमे दिया।
डॉ पीसी लाल यादव ने इस किताब की भूमिका में अनेक उदाहरणों के साथ, इस कृति का समीक्षात्मक विवेचन किया है। डॉ यादव इस कृति की उपयोगिता को बहुत सरल शब्दों में स्पष्ट करते हुए लिखते है कि "मउँहा झरे लोक जीवन के ऐना ये, लोक परंपरा के गुरतुर बैना ये। ये मा जिंदगी के मरम, दया-धरम, करमइता के पोठ करम सबो के सुघरई  समाये हे।" और यह भी "मोला भरपूर विश्वास हे जेन गीत जन-जन के कंठ म बसे हे ओ गीत मन ल पाठक किताब के रूप म पढ़ के अउ आनंदित होही।"
इस संग्रह में 110 गीत संग्रहित हैं, जो लोक छंद में छत्तीसगढ़ी के सांस्कृतिक पहलुओं को उद्घाटित करते हैं। इसमें छत्तीसगढ़ी फिल्म बीए फस्ट ईयर ईयर के गीत- आ जाना तै मोला झन तरसा ना रे, सब झन कहिथें तोला कतको हे तोरे सही,  नइ माने रे मन गोरिया, मोरे मन के सजनी तै, सन सनासन सनन सनन पवन चले, खनके रे कंगना, बेरा पहाति अंगना मा मोरे, छम छम पैजन बाजे, आदि के साथ ही अन्य गीत संग्रहित हैं। जिनमें जस गीतों की संख्‍या ज्‍यादा है। छत्‍तीसगढ़ में जस गीत गायन की परम्‍परा बहुत पुरानी है। जस गीत गीतों में लोक में प्रचलित आराध्य के आख्यानों का संदर्भ होता है जो हमें रोमांचित करता है। इसी रोमांच को पकड़ते हुए बिन्‍दु जी लोक भाषा में लोक के मन की बात कहते हुए प्रेम गीत, करमा, व्यंग गीत, खेल गीत, काया खंडी भजन, सुवा गीत, पंथी गीत,  होली गीत और जस गीत तक अपनी लेखनी को विस्तार देते हैं। जो अभिजात्य के बंधनों को तोड़कर नाचने को विवश करते हैं। शायद इसीलिए इन लोक गीतों के साहित्यिक स्‍थापना पर अपनी टिप्पणी देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ जीवन यदु ने लिखा कि "मेरा मानना है कि बिंदु जी का उद्देश्य साहित्य सृजन ना होकर लोग रंजन का सृजन करना है। लोकरंजन भी बहुमूल्य है इसे हमें बिसराना नहीं चाहिए।" हर्ष कुमार बिंदु ऐसे ही लोकरंजनी रचनाओं के लोकप्रिय रचनाकार हैं। जिनके अनेक गीत ऑडियो कैसेट के माध्यम से लोककंठ में तरंगित हैं। आप सब जानते हैं कि इस किताब के शीर्षक गीत 'मउँहा झरे' को तो व्यापक लोकप्रियता प्राप्त हुई है और यह गीत छत्तीसगढ़ के आंगन से देश विदेश में लोकप्रिय हो गया है। कवि को इससे बड़ा रिवार्ड और क्या चाहिए।

मउँहा झरे का विमोचन डॉ.रमन सिंह के द्वारा पिछले वर्ष किया गया था। इस किताब को बैगा ग्रुप राजनांदगांव नें प्रकाशित करवाया है। किताब का मूल्‍य 150 रू. है। इसकी प्रति के लिए आप श्री हर्ष कुमार बिन्‍दु मो. 9589039768, राजनांदगांव से संपर्क कर सकते हैं।
- संजीव तिवारी
#Mahuaa Jhare Re Mahuaa Jhare, #महुआ झरे रे महुआ झरे

कला तपस्‍वी की यात्रा का समग्र

छत्तीसगढ़ के ख्‍यातिलब्ध रंग निर्देशक राम ह्रदय तिवारी जी की रंग यात्रा का समग्र अभी हाल ही में, लोक रंगकर्मी दीपक चंद्राकर के द्वारा, राजेंद्र सोनबोईर के संपादन में प्रकाशित हुआ है। सात सर्गों में विभक्त इस ग्रंथ में राम ह्रदय तिवारी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व, साक्षात्कार, उनके आलेख, उनके नाटकों की समीक्षा, उनका आत्मथ्‍य व अन्य संग्रहणीय सामग्री संकलित है। इस ग्रंथ में राम ह्रदय तिवारी जी की सुदीर्ध कला यात्रा को विभिन्न विद्वानों ने अपनी-अपनी दृष्टि से प्रस्तुत किया है। जिनमें जयप्रकाश, डॉ. परदेशी राम वर्मा, महावीर अग्रवाल, राजकुमार सोनी, विनोद साव, सरला शर्मा, संतोष झांझी आदि प्रमुख हैं। इस सर्ग में 'एक दर्द भरा संगीत है घना जी का जीवन' शीर्षक से राजन शर्मा जी द्वारा लिखा गया आलेख महत्वपूर्ण है। राजन शर्मा जी न केवल राम ह्रदय तिवारी जी के संबंधी हैं बल्कि उनके सच्चे मित्र एवं मार्गदर्शक हैं। इसके साथ ही वे धर्म के वैश्विक क्षितिज में एक वरिष्ठ चिंतक और विद्वान के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने अपने परिवार के साथ बालक राम ह्रदय तिवारी की इलाहाबाद तीर्थ यात्रा से अब तक के सफर का रोचक वर्णन किया है। सहज और सरल भाषा में गंभीर बात करते हुए वे राम ह्रदय तिवारी जी की भौतिक अस्तित्व के साथ ही उनके हृदय की गहराइयों तक यात्रा करते हैं, और उसे ज्यों का त्यों बिना लाग-लपेट प्रस्तुत करते हैं। इस पूरे सर्ग में यह एक अकेला आलेख रामह्रदय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को जानने के लिए काफी है। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि अन्य संग्रहित आलेखों की उपादेयता नहीं है। प्रत्येक आलेख उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं एवं उनके द्वारा निर्देशित व लिखित नाटक आलेखों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है जैसे विनोद साव नें उनके बेरा नई हे को बहुत सुन्‍दर विश्‍लेषित किया है। कुछ आलेख रामह्रदय तिवारी जी के संबंध में पूर्व प्रकाशित जानकारियों का दोहराव नजर आता है। किंतु यह संपादक के विवेकाधिकार का मसला होने के कारण हम इस पर चर्चा नहीं करना चाहते।
राम ह्रदय तिवारी जी से लिए गए साक्षात्कार सर्ग में उनकी कला यात्रा का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है साक्षात्कारों में प्रकाशित विचार एवं तथ्‍य स्वयं उनके द्वारा बताए गए हैं इस कारण क्षेत्रीय नाट्य एवं नागरी लोकनाट्य के इतिहास का यह महत्‍वपूर्ण दस्‍तावेज बन गया है। इस सर्ग में भी महावीर अग्रवाल, आसिफ इकबाल, चंद्रशेखर चकोर एवं आशीष ठाकुर आदि के द्वारा लिया गया साक्षात्कार उल्लेखनीय है। डॉ. श्रद्धा चंद्राकर के द्वारा रामह्रदय तिवारी जी के कला यात्रा के पथिकों से लिए गए साक्षात्कारों का पूरा एक सर्ग इस ग्रंथ में संग्रहित है। जिसमें उनके आपसी समझ और व्यक्तित्व का बहुत सुंदर विवरण प्राप्त होता है। तिवारी जी द्वारा लिखित आलेख व नाटकों का सर्ग, साहित्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण खण्‍ड है। उनकी भाषा की शास्त्रीयता के पतवार के साथ गहरे ज्ञान के समुंदर में विचरण कराती उनकी लेखनी अद्भुत है। छत्तीसगढ़ी लोक के वे आधिकारिक विश्लेषक हैं, उन्होंने इस सर्ग में छत्तीसगढ़ के विभिन्न प्रदर्शनकारी लोक कलाओं एवं कलाकारों का प्रामाणिक व सुंदर विश्लेषण किया है। पांचवें सर्ग में रामहृदय तिवारी जी द्वारा निर्देशित विभिन्न नाटकों, लोकनाट्यों एवं फिल्मों की समीक्षा संग्रहित है। क्षितिज रंग शिविर दुर्ग से आरंभ उनकी कला यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर चर्चा करते हुए समीक्षकों ने उनकी कालजई प्रदर्शनों को रेखांकित किया है। जिसमें अंधेरे के उस पार, भूख के सौदागर, भविष्य, अश्वस्थामा, झड़ी राम सर्वहारा, मुर्गी वाला, घर कहां है, हम क्यों नहीं गाते, अरण्य गाथा से लेकर टेली फिल्म कसक, संवरी, फीचर फिल्म गम्मतिहा, लोकनाट्य लोरिक चंदा, कारी, मैं छत्तीसगढ़ महतारी हूं से शहंशाह सन्यासी विवेकानंद तक समाहित हैं। इस ग्रंथ में इन प्रदर्शनों के कई दुर्लभ चित्र भी संग्रहित हैं।
व्यक्तिगत रूप से मैं, इस ग्रंथ के अधिकांश आलेखों को पूर्व में ही कई-कई बार पढ़ चुका हूं। तो मेरे पास उपलब्ध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, किताबों में संग्रहित हैं, किंतु इन सब को एक ही जगह संकलित कर प्रकाशित करने का यह पुनीत कार्य संपादक एवं प्रकाशक ने किया है वह सराहनीय है। मेरी समझ में, इतनी विस्तृत जानकारियों से परिपूर्ण यह ग्रंथ राम ह्रदय तिवारी जी के संपूर्ण कला यात्रा को जानने समझने का आरंभिक ट्रेलर है। इससे छत्तीसगढ़ के नाट्य को समझने, छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य को बूझने और छत्तीसगढ़ पर गर्व करने के सभी तत्व मौजूद हैं। रामह्रदय तिवारी जी छत्तीसगढ़ के ऐसे बहुआयामी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति हैं जिन पर अभी हजारों अध्याय लिखा जाना शेष है। उनके कलागत ज्ञान एवं छत्तीसगढ़ी प्रदर्शनकारी लोक कलाओं की दृष्टि पर कई शोध होना शेष है। यह ग्रंथ रंगकर्मियों, लोक कलाकारों, अध्येताओं, शोधार्थियों एवं छत्तीसगढ़ी अस्मिता बोध के प्रति सजग पाठकों के लिए पठनीय एवं संग्रहणीय है। इस किताब में लगभग साढ़े सात सौ पृष्ठ हैं जो चिकने रंगीन पेपर से सुसज्ज है। हार्ड बउंड इस किताब की कीमत 500 रूपया है, जिसे आप श्री दीपक चंद्राकर जी मो. नं. 8839500485 या श्री रामह्रदय तिवारी जी 9685366570 से बात कर प्राप्त कर सकते हैं। मैंनें इस किताब की दो प्रतियां रू. 1000 में ली थी जिसमें से एक श्रद्धेय खुमान लाल साव जी को दिया हूं और एक मेरे संग्रह में है। इसे मुझसे पढ़ने के लिए मांगने के बजाय आप क्रय कर लें यह मेरे लिए उपयुक्‍त होगा।
 -संजीव तिवारी

इस ब्‍लॉग में इस ग्रंथ से संबंधित संग्रहित आलेख-
एक चिंतक रंगकर्मी : राम हृदय तिवारी 
रामहृदय तिवारी रंगकर्म और भाषा के आगे-पीछे का संघर्ष 
बोलियों की दुनिया में छत्‍तीसगढी बोली
छत्‍तीसगढ की बिटिया : तीजन बाई
अंचल की पहिचान के पर्याय: रामचन्‍द्र देशमुख
संगीत और शौर्य का संगम : पंडवानी

रामहृदय को 11वां रामचंद्र देशमुख सम्मान
ऑंसुओं से जन्‍मे कहकहों का कला संसार : नाचा
गौरा : घुमडते मादर के बीच गीतों की रिमझिम

छत्‍तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ संगोष्‍ठी

17 एवं 18 फरवरी 2018 को आयोजित कार्यक्रम की रिर्पोटिंग

दूध मोंगरा छत्तीसगढ़ी सांस्कृति समिति, गंडई, जिला राजनांदगांव छग. द्वारा दिनांक 17 एवं 18 फरवरी 2018 को शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय शंकर नगर, रायपुर के सभागार में राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था- ‘छत्‍तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ’ संगोष्ठी अपने निधार्रित समय प्रातः 10.30 बजे प्रारंभ हुई। उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि माननीय डॉ. सियाराम साहू अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग आयोग छ.ग. थे। काय र्क्रम की अध्यक्षता डॉ. सोमनाथ यादव भूतपूर्व अध्यक्ष छ.ग. राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र, अध्यक्ष बख्शीसृजन पीठ छ.ग., श्री राहुल सिंह जी पुरातत्व विभाग छ.ग., श्री योगेश शिवहरे प्राचार्य शा.शिक्षा महाविद्यालय, रायपुर और डाइर्ट के प्राचार्य श्री आर.के. वर्मा जी मंच पर उपस्थित थे। मंच संचालन श्री बलदाऊराम साहू सचवि पिछड़ा वर्ग आयोग छ.ग. ने किया। अतिथियों के स्वागत काय र्क्रम पश्चात स्वागत भाषण करते हुए श्री पीसी लाल यादव (अध्यक्ष दूधमोंगरा समिति) ने बताया कि गंडई राजनांदगांव के इस समिति को 41 वर्ष हो गए हैं। इसको लम्बे समय तक जिन्दा रखना कठिन काम है, दूध मोंगरा में चार पीढ़ी के कलाकार हैं। इस स्वागत भाषण और संक्षिप्त परिचय उपरान्त दूधमोंगरा सांस्कृति समिति के कलाकारों द्वारा मधुर गीतों के माध्यम से अतिथ्यिं का स्वागत किया। गीत के बोल थे -
‘पहुना पधारे हे द्वार, हम गाएँ  मंगलचार विधुन हागे मनवा रे, मगन हागे मनवा रे।’ टेकऽ
इस संगोष्ठी में दिल्ली से मो. मुस्तफा खान, बस्तर से श्री रूद्रनारायण पाणीग्रही और सरगुजा से श्री मोहन साहू की विशेष उपस्थिति रही। इस तरह राज्य के सभी क्षेत्रों का समुचित प्रतिभागिता रही। संगोष्ठी में पुरातत्व विभाग छ.ग. से आए हुए विशिष्ट अतिथि ने उद्बोधन में कहा कि ‘लोकगीतों में रस छूट रहा है और सामाजिक संदर्भ भारी हो रहा है। यदि ऐसा हुआ तो लोकगीतों का स्वाभाविकता नष्ट हो जाएगी। आज लोकगीत पी.एच.डी. का विषय बन रहा है। लोकगीत तो रस भरे दूहना है, इसका कहॉं-कहॉं बाँट सकते हैं यह विचारणीय प्रश्न है।’

डॉ. योगेश शिवहरे ने कहा कि- लोक शिक्षण में इसका उपयोग होना चाहिए। इसके पश्चात डॉ. बलदाऊ राम साहू रचित गजल संग्रह- ‘सुरूज नवा उगइया हे’ का विमोचन किया गया। इस पर चर्चा करते हुए भाषाविद् डॉ. चितरंजन कर ने बताया कि इस गजल संग्रह में ग़ज़ल हैं। आशिका व मासूका का विवरण न हो कर वर्तमान को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया गया। डॉ. प्रभंजन शास्त्री व रामेश्वर वैष्णव ने ग़ज़ल विधा को छ.ग. में नई ऊंचाईयां दी है, परवान चढ़ाया है। इसी कड़ी में बलदाऊ राम साहू जी ने प्रयास किया है। इन ग़ज़लों में सरलता है, तरलता है, निश्छलता है। समकालीन छ.ग. का पूरा परिदृश्य इन ग़ज़लों में है। उन्होंने एक ग़ज़ल को उद्घृत
किया-
‘स्कूल सब व्यापारी हांगे, ला इलाज बिमारी हांगे।’
मुख्य अतिथि- डॉ. सियाराम साहू ने अपने उद्बोधन में कहा कि विविधता में एकता छ.ग. की विशेषता है। लोकगीतों में लोक जीवन के सर्वांगीण क्षणों की अभिव्यक्ति है, छ.ग. के लोकगीत रसों से भरपूर हैं। इसके बाद 15 मिनट का लघु विश्राम जलपान उपरान्त 12.30 बजे संगोष्ठी का विमर्श सत्र प्रारंभ हुआ। सत्र की अध्यक्षता डॉ. चितरंजन कर ने की। मंच पर डॉ. सोमनाथ यादव, डॉ. अशोक तिवारी, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र, डॉ. जीवन यदु, डॉ. पी.सी. लाल यादव, डॉ. महेन्द्र मिश्रा, डॉ. गोरेलाल चंदेल, डॉ. अरुण निगम जी उपस्थित रहे। डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र ने संदर्भित विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सर्वप्रथम डॉ. हीरालाल काव्योपाध्याय ने लोकगाथा, लोकगीत को अपने व्याकरण में लाया। लोकगीतों में हमारा इतिहास, हमारी संस्कृति, हमारा समाज छुपा है। इसके पश्चात दूध मोंगरा समिति के लोक कलाकारों द्वारा गाथा गीत ‘भरथरी’ की मनमोहर प्रस्तुति दी गई।
डॉ. जीवन यदु ने ‘छत्‍तीसगढ़ी लोकगीतों में सामाजिक संदर्भों के बिम्ब’ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति की जड़ में एक आत्मीयता है, यही सामाजिक संबंधों को जन्म देती है। रिस्तों की डोर में हम बंध जाते हैं। लोकगीतों में रागी कहता है ‘काका’। इसी तरह लोकगीतों में ‘भैया’ शब्द बहुत आया है. यह संबोधन हमारे रिश्तों से आया है, संस्कार से आया है। लोकगीतों का प्रकार बताते हुए उन्होंने कहा कि लोकगीत मुख्यतः दो प्रकार के हैं - 1. जातीय स्तर पर केन्द्रित गीत, 2. सम्पूर्ण समाज को लेकर चलने वाला लोकगीत उदाहरणार्थ- बांसगीत, राऊत समाज, देवार गीत-इसमें देवार जाति का चरित्र खुलकर सामने आता है। ‘दशमत कैना’ गीत। इसमें लोक गायक इतना क्रियाशील होता है कि वह स्वयं रचनाकार हो जाता है। सामाजिकता की बात तब आती है जब पारिवारिकता होती है।
पारिवारिकता के संदर्भ अनेक लोकगीतों में आया है, जैसे - 
साजा सुखागे सरई बिना ओ, देवार सूखागे भाजाई बिना ओ।
सामाजिकता की बात ‘भड़ानी गीत’ में आती है, उदा.-
सब पारा जावे फेर तेलीनपारा झन जाबे ओ, तेली छाकरा मदन माहनी, ताला घानी मं राखे लोभाय ।।
लोक समाज में एक संबंध जाति धर्म से ऊँचा हाता है। गंगाजल, गजामूंग, महाप्रसाद, मितान, सखी बद लिया जाता है।
गाड़ा में संगी ठांका ले पटिया, गंगा
बाबू आवत हे बिछा ले खटिया ।
वहीं पर यह भी कहा जाता है।
सान के हे लाटा, साने के खटिया,
मार गंगा बाबू आवथे, बिछा ले खटिया ।।
यह सामाजिक संबंध पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। एक सामाजिक संबंध मनुष्यता को पारकर के निकल जाती है जैसे सुआगीत में बिरही नायिका सुआ से कहती है -
तार अंगना में चारा बंधाले,
ये तुलसा ल लेबे लगाय।।
डॉ. पीसी लाल यादव ने पंडवानी का सामाजिक संदर्भ बतलाते हुए कहा कि पंडवानी दो शैलियों में गायी जाती है- 1. वेदमति शैली, 2. कापालिक शैली। पंडवानी में लोक दृष्टि समायी हुई है। विवाह मंडप में मंगलकाष्ठ गड़ा होता है, जिसे ‘मंगरोहन’ कहा जाता है, यह गूलर की लकड़ी का बना होता है। यह महाभारत काल से चला आ रहा है। गांधारी का विवाह पहले गूलर वृक्ष (डूमर वृक्ष) से किया गया था। वह परंपरा आज भी जीवित है। इससे विवाह में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आता । जब लाखा महल जलाया गया था वहां एक तेली का निवास था, वह उस वक्त घानी चला रहा था, लाखा महल के जलने से वह वहाँ से भागा, उस दिन से वह ‘रंगहा तेली’ हो गया। रंगहा तेली की पत्नी एक हाथ में रांगा पहनती है और एक हाथ में चूड़ी पहनती है। इस तरह का सामाजिक संदर्भ है।
अरुण निगम ने ‘दशमत कैना’ की लोकगाथा का सामाजिक संदर्भ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए बताया कि 09 लाख उडिया स्त्री पुरुष तालाब खोदने चम्पक भांठा दुर्ग आए थे उन्हीं में से दशमत नाम की अत्यन्त सुदर कन्या थी, उस पर राजा मोहित होकर उससे विवाह करना चाहता है। राजा महानदेव ब्राह्मण था, कन्या अछूत थी । उन्होंने कथा के माध्यम से छत्‍तीसगढ़ में गाये जाने वाले इस लोकगाथा का सामाजिक संदर्भ को स्पष्ट किया। डॉ. सोमनाथ यादव ने बांस गीत का सामाजिक संदर्भ बतलाते हुए कहा कि बांस गीतों में मुक्त और प्रबंध काव्यात्मक गीत गाए जाते  हैं। प्रबंध कथागीत कई महीनों तक चलते हैं। यह चरवाहा संस्कृति की देन है, इसमें शौर्य, वीरता, पराक्रम, प्रेम-विरह, नीति, उपदेश इत्यादि कई प्रकार के गीत मिलते हैं।
डॉ. महेन्द्र मिश्र जी ने कहा कि उड़ीसा और छ.ग. का संपर्क राजनीतिक नहीं सांस्कृति है। 400 साल पूर्व का बिंद्रानवागढ़ का राजा कचना धु्रवा शिव पावर्ती बनकर पूजा पा रहा है। ये गोड़ राजा था। भारतीय संस्कृति की चर्चा करते हुए उन्होंने बतलाया कि कुलाचार, लोकाचार, देशाचार और शिष्टाचार इस प्रकार चार प्रकार की संस्कृति है- कुलाचार (जातीय संस्कृति) लोकाचार में क्षेत्रीयता या आंचलिकता, देशाचार पूरे भारत भर में और शिष्टाचार संस्कृति में ज्यादा होता है। 1980-90 के दशक से भारत में पाश्चात्य संस्कृति का आगमन हुआ है। उड़ीसा के दक्षणि क्षेत्र में मिट्टी खोदने वाली जाति को ‘कलिंगा’ कहा जाता है इन्हें ‘ओड़ो’ भी कहा जाता है। इसी ओड़ो से उड़ीसा हुआ। नुआपाड़ा जिले में छत्‍तीसगढ़ी बोलने वाले लोग हैं। सीमावर्ती क्षेत्र में दोनों संस्कृतियों सुन्दर समन्वय देखा जाता है।
इस दिवस विमर्श के द्वितीय सत्र में डॉ. चितरंजन कर ने लोकगीतों के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर बात की, डॉ. बिहारीलाल साहू ने छत्‍तीसगढ़ी लोकगीतों के अस्तित्व पर चर्चा की और डॉ. गोरेलाल चंदेल ने ‘ददरिया’ लोकगीत के सौंदर्य पक्ष पर प्रकाश डाला तत्पश्चात लोक कलाकारों द्वारा एक लोक भजन प्रस्तुत किया गया। श्री सीताराम साहू श्याम ने लोकगीतों का आध्यात्मिक पक्ष पर चर्चा करते हुए अनेक लोक भजन सुनाए और उनकी व्याख्या भी की। श्री कुबेर साहू जी ने लोकगीतों में आकांक्षा की अभिव्यक्ति पर चर्चा की।
इसी कड़ी में डॉ. स्वामीराम बंजारे ने छ.ग. के पारम्परिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाते हुए कहा कि लोकगीत जन जीवन का उल्लास और उच्छवास है, यह आदिम युग से चली आ रही है। यह भाषागत नहीं भावगत होते हैं। उन्होंने सोहरगीत, भोजली गीत, सुआगीत, पंथीगीत के कई उदाहरण देकर लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ को रेखांकित किया।
उसके पश्चात् लोक कलाकार श्रीमती प्रभा यादव का मंच पर सम्मान किया गया, इसके बाद श्री नवरतन साव ने बस्तर में प्रचलित मंत्र गीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। अंत में मंचस्थ इन सभी वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित कियागया।
भोजनावकाश के उपरान्त तृतीय सत्र 3.15 बजे प्रांरभ हुआ। श्रीमती शैल चन्द्रा ने गोदना प्रथा, गोदनागीत, ददरिया गीत का मर्म बतलाया और कहा कि लोकगीत परम्परा के संरक्षण पर विद्वान गण चिंतन करें। श्रीमती सरला शर्मा ने लोरी गीत, सुआगीत का संदर्भ बतलाते हुए कहा कि सुआ गीत में किसी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं होता। इसके मध्य में हीरामन तोता होता है जो परमात्मा का प्रतीक है शेष पांच सुआ पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांच कमेर्न्द्रियों का प्रतीक है। श्री वीरेन्द्र सरल ने व्यंग्य गीत पर चर्चा करते हुए कहा कि व्यंग्य गीत पीड़ा का प्रतीकारात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें प्रतिरोध के कई स्वर मुखरित होते हैं। श्रीमती शकुन्तला ‘तरार’ ने हल्बी के संस्कार गीतों में लोकरंजन के तत्व विषय पर चर्चा करते हुए जगार गीत, चखना गीत, शोक गीत के बारे में बतलाया। बस्तर में विवाह के समय हल्दी कूटने की प्रथा है। बस्तर की महलिएँ मानियाघर याने विवाह वाले घर जाकर हल्दी कूटती हैं और गीत गाती हैं। शोक गीत में महिलाएं रात-रात भर गाती हैं और श्मशान घाट तक जाती हैं। कवि श्री डूमनलाल धु्रव ने गोंड़ जनजातियों द्वारा गाए जाने वाले गीतों के विषय में बतलाया साथ ही देवारी गीत प्रस्तुत किए अन्त में इन सभी वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया। इस तरह प्रथम दिवस का संगोष्ठी कायर्क्रम रात 7.30 बजे तक अनवरत चलता रहा।

द्वितीय दिवस 18 फरवरी 2018 को संगोष्ठी कायर्क्रम
निर्धारित समय 10.30 बजे प्रारंभ हुआ. मंचस्थ वक्ताओं में श्री राहुल सिंह पुरातत्व विभाग छ.ग., डॉ. महेन्द्र मिश्र, डॉ दादूलाल जोशी, डॉ. रचना मिश्र, डॉ. नरसी यादव, डॉ. संध्या भोई थे। डॉ. जोशी जी ने पंथी लोकगीतों में सामाजिक चेतना व संदर्भ को रेखांकित किया वहीं बौद्ध संदेश धर्माश्रित व आज अर्थाश्रित होता चला गया है। डॉ. रचना मिश्र ने विवाह व ददरिया लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। डॉ. संध्या भोई ने कहा कि मैंने लगभग 200 लोकगीतों का संग्रह किया है। सुआ गीत स्त्री प्रधान है। इसमें स्त्रियों की पराधीनता की पीड़ा की अभिव्यक्ति है। डॉ. नरसी यादव जी ने कुछ सामान्य बातें बतलायी। व्यक्तिगत परिचयात्मक अभिव्यक्ति की। दूध मोंगरा के लोक कलाकारों ने कर्मा गीत की मनमोहक प्रस्तुति दी-
डांगरी पहाड़े जाबा, महुआ बीने ल जाबा, तेंदू अऊ चार खाबो,
चला-चला डांगरी पहाड़े जाबा न ।
डार मं बैठे-बैठे काइेर्ली गावत हावय गाना, चलै पुरवाही झुलै डारा पाना ।।
डॉ. महेन्द्र मिश्र ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि व्यक्ति का परिचय समूह देता है और व्यक्ति समूह देता है बौद्धि अकमर्ण्यता घातक है, अन्याय हो रहा है कहता रहेगा लेकिन प्रतिकार नहीं करेगा, विरोध नहीं करेगा। अनुष्ठानिकता से लोकगीत, लोक संस्कृति सरकार के साथ जुड़ गया, सरकार ही सब कुछ करेगा ये अपेक्षा रहती है। पश्चिमी सभ्यता लोक साहित्य को खतम कर रहा है। सामाजिक विवेक खतम हो रहा है। सामाजिक विवेक भारत की आत्मा से निकला हुआ था। लोक साहित्य अपना रंग परिवर्तन कर के आगे बढ़ता रहेगा। आज मशीन ही जीवन हो गया है, बौद्धिकता मशीन का दास है। आज भाषाएँ विलुप्त हो रही हैं, मानव की कल्पना का संकुचन हो रहा है, श्रुति व स्मृति भी संकुचित हो रही है। लिखित साहित्य को लोक साहित्य से सीख लेने की जरूरत है, क्योंकि लोक साहित्य प्रकृति से जुड़ा हुआ है। भारतीय संस्कृति स्थान प्रधान होता है समय प्रधान नहीं है। लोक साहित्य की प्रविधि पर काय र्शाला आयोजित करने की हमारी योजना है। इसके बाद लोक कलाकारों ने होलीगीत गाकर लोककला की प्रस्तुति से सबको अभिभूत कर दिया।
18.02.2018 को विमर्श के द्वितीय दिवस की प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. चितरंजन कर ने की। मंचस्थ वक्तागणों में डॉ. मांगीलाल यादव, डॉ. रघु, डॉ. राजन यादव, डॉ. राहुलसिंह, डॉ. पीसी लाल यादव, डॉ. विजय शंकर गौतम थे। छत्‍तीसगढ़ी लोकगीतों की सी.डी. का विमोचन किया गया। डॉ. राजन यादव ने लोकगीतों का दार्शनिक संदर्भ पर विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने होली में गाए जाने वाले फाग गीतों के तीन प्रकार बतलाएँ- सड़ फाग, करिया फाग और झूल फाग। इन फाग गीतों में उद्दाम प्रेम की मनोरम अभिव्यक्ति होती है। कालचक्र की धुरी पर ऋतुएं नर्तन करती है उनमें एक ऋतु बसंत ऋतु में ही ये गीत गाए जाते हैं। वंदना गीतों का कथानक गुम्फित होता है। उन्होंने आल्हा गीत गाकर सबका मन मोह लिया। डॉ. मांगीलाल यादव ने छग. के नाचा गीतों में लोक चेतना पर अपने विचार रखते हुए निर्गुण भजन की चर्चा की। डॉ. विजय शंकर गौतम भाषा अध्ययन शाला पं.र.शु.वि.वि. रायपुर ने कहा कि लोकोत्सव ही जीवनोत्सव है।
शास्त्र भी लोक से शक्ति अजिर्त करता है। लोक साहित्य मार्गदर्शक बने बिना हमारा मार्गदर्शन करता है। श्री संजीव तिवारी जी ने शेख हुसैन के गाए गीतों पर केन्द्रित विचार व्यक्त किए। डॉ. चित्तरंजन कर ने अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए कहा कि संगीत एक भाव है उसकी अभिव्यक्ति गीत, नृत्य, नाटक आदि में हो सकता है। लोक गायक भाव के आधार पर ‘सुर’ बनाता है, शास्त्रीय ज्ञान पर नहीं चलता। कालचक्र और ऋतुचक्र रेखिक नहीं होती चक्रीय होता है। ‘कालो न याति’ समय नहीं बीतता हम बीतते हैं, लोक नहीं मरता, शास्त्र मर जाएगा। लोक के लिए खुली दृष्टि चाहिए, लोक परिमाजर्न करता है।
अगले विमर्श सत्र में-अध्यक्षता डॉ. राजन यादव (खैरागढ़ संगीत वि.वि.) ने की। इस सत्र के वक्ताओं में श्री हरिहर वैष्णव, रुद्रनारायण पाणीग्रही, शिव कुमार पाण्डेय, तुलसी पाणीग्रही, जयमती कश्यप, सभी बस्तर से और श्री मोहन साहू, अजय चतुवेर्दी सरगुजा से उपस्थित थे। श्रीमती जयमती कश्यप ने गोड़ी जनजाति के लोकगीत स्वागत गीत, छेरता गीत, देवगीत, कुर्रुपाटा गीत, पर्यावरण गीतों का सामाजिक संदर्भ को रेखांकित किया ।
श्री तुलसीराम पाणीग्रही ने बस्तर अंचल के पारम्परिक लोकगीत- ‘छेरता गीत’ के संबंध में बतलाया कि ‘छेरता गीत’ ‘भतरी’ बोली में गाया जाता है। यह समूह में लडके-लड़कियों की टोली बनाकर गाया जाने वाला गीत है। पौष पूर्णिमा के पांच-छः दिन पूर्व छेरता या छेरका नाच शुरु होता है। बांस की तुंबी पर केला के पत्ते लगाकर, फूंकमार कर बजाते हैं। घरेलू हिंसा को भी इसमें रेखांकित किया जाता है। लोकगीतों की रानी ‘ददरिया’ कर्मा, चौत परब, जगार गीत, और धंगड़ी नाच के बारे में भी बताया। श्री मोहन साहू (सरगुजा) ने बताया कि जन्म से लेकर मृत्यु संस्कार तक सरगुजा में महादेव की सुमरनी गीत गाया जाता है। सरगुजा गांजर गूंजा है यहां पहाड़ों की पूजा की जाती है। श्री अजय चतुवेर्दी ने सरगुजा अंचल के लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। श्री हरिहर वैष्णव (कोण्डागांव) ने लक्ष्मी जगार गीत का लोक संदर्भ बताते हुए कहा कि इसमें 39 हजार 39 पंक्तियां हैं जिनमें धान की लक्ष्मी की प्रशंसा में गायी गई है। श्री शिवकुमार पाण्डेय ने गोंड़ी लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ बतलाया। मुरिया जनजाति की लोकभाषा गोंड़ी है। गोंड़ी में गीत को पाटा कहा जाता है। महला पाटा-सगाई गीत है। देव संस्कृति को गोंड़ी में ‘पेंगहाना’ कहते हैं। पुटुल-जन्मगीत है। शहरदायना बच्चे को कंधे पर बैठाकर दादी द्वारा शहर घुमाना है। ससुर को गोंड़ी में मामा कहा जाता है। घोटुल एक सामाजिक संस्था है। शादी के दिन नजदीक आने पर लडकी को घोटुल से विदाई दे दी जाती है और सिखानी गीत गाया जाता है।
श्री रुद्र कुमार पाणीग्रही ने चौत परबगीत, विवाहगीत, लेजा गीत (पत्ते तोड़ते समय गाया जाने वाला गीत) के बारे में बतलाया। पान बूटानी लोकगीत भतरी बोली में है। सभी वक्ताओं को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया। इसके पश्चात दूध मोंगरा के
लोक कलाकारों द्वारा मनमोहक लोकगीत प्रस्तुत किए गए।
भोजनावकाश उपरान्त समापन सत्र 3.30 बजे प्रारंभ हुआ। इस सत्र के मुख्य अतिथि श्री जी.आर. राणा (अध्यक्ष, अनुसूचित जनजाति आयोग छ.ग. थे। अध्यक्षता डॉ. विनय कुमार पाठक (अध्यक्ष छत्‍तीसगढ़ राजभाषा आयोग) ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच पर डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र बख्सी सृजन पीठ, श्री रामजी भारती (अध्यक्ष, अनुसूचित जाति आयोग एवं भूतपूर्व विधायक), डॉ. सोमनाथ यादव (भूतपूर्व अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग आयोग), श्री सोनवानी जी, श्री बलदाऊ राम साहू (सचिव पिछड़ा वर्ग आयोग) प्रमुख रुप से उपस्थित थे।
समापन सत्र का मंच संचालन बी. रघु कुमार ने किया। स्वागत भाषण श्री पीसी लाल यादव ने किया। इस अवसर पर बालगीत पुस्तक का विमोचन किया गया। श्री बलदाऊ राम साहू सचिव पिछड़ा वर्ग आयोग एवं संयोजक दूध मोंगरा छत्‍तीसगढ़ी सांस्कृतिक समिति गंडई, राजनांदगांव में संगोष्ठी प्रतिवेदन में जानकारी देते हुए बतलाया कि इस दो दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी में 180 प्रतिभागियों ने भाग लिया एवं 35 प्रतिभागियों ने आलेख भेजा है। संगोष्ठी पर समीक्षात्मक विचार डॉ. चितरंजन कर ने रखे। सभा को श्री रामजी भारती,
डॉ. सोमनाथ यादव, श्री रमेन्द्र नाथ सिंह ने भी संबोधित किया। मुख्य अतिथि की आसंदी से बोलते हुए श्री जी.आर. राणा जी ने बतलाया कि बस्तर में ‘माटी कि रियाखाना’ सबसे बड़ा कसम है।
बस्तर में प्रधान उसे कहा जाता है जो देवी-देवता की पूजा करने के बदले में धान लेता है। उन्होंने स्वरचित कविता ‘मोर गाँव गँवागे संगी, मैं कहां रिपोट लिखावौं’ सुनाकर सबको सोचने पर मजबूर कर दिया और अपने कवित्त प्रतिभा का लोहा मनवाया। कु. नेमी निषाद ने गीत प्रस्तुत किए। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. विनय कुमार पाठक ने कहा कि छ.ग. के लोकगीतों में सारी संभावनाएं हैं। शिष्ट साहित्य में बनावटीपन है लोक साहित्य प्राकृतिक है। उन्होंने देवारगीत में विकलांगों में सौंदर्य शास्त्र का उदाहरण भी दिए -
कानी आंखी मं काजर आंज के, बूचा कान भंदार ।
लोकगीतों में हमें देखना पड़ेगा कि उनमें प्रकृति एवं संस्कृति बचा है कि नहीं । इसे विकृति से बचाना है तभी लोक बचेगा, हम बचेंगे, समाज बचेगा। लोकगीतों का संरक्षण व संवर्धन बहुत आवश्यक है। अ ंत में सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। आभार प्रदर्शन संयोजक श्री बलदाऊ राम साहू जी ने किया। इस प्रकार दो दिवसीय राज्य स्तरीय संगोष्ठी के समापन की घोषणा की गई। इस संगोष्ठी की विशेषता यह रही कि एक-एक मिनट किमती समय का सदुपयोग किया गया, विषय के विमर्श पर विशेष ध्यान दिया गया। दोनों दिन संगोष्ठी प्रातः 10.30 बजे प्रांरभ होकर शाम 7.30 बजे सम्पन्न हुई। मैं इस संगोष्ठी का साक्षी बना ये मेरा सौभाग्य है।
- डॉ. स्वामीराम बंजारे ‘सरल’
सहायक प्राध्यापक हिंदी
भा.प्र.दे.शास. स्नातकोत्तर महा.

अपने ही कल्‍याण का बाट जोहता सन् 1938 का बाल कल्याण केंद्र

लिखित इतिहास को मिटाने उसे दबाने-छुपाने के कई उदाहरण आप लोगों ने देखा होगा, किन्‍तु यहां छत्‍तीसगढ़ के जिला मुख्‍यालय दुर्ग में एक बड़े भवन को, छुपा लिया गया था। अवैध कब्जाधारियों की स्वार्थपरक लोलुपता ने इसे ढांप लिया था, लोगों का कहना है कि कई बार कब्जा हटाया गया, व्यवस्थापन में कब्जेदार दूसरे स्थानों में दुकान पे दुकान आबंटित कराते गए पर कुछ दिन बाद ये भी मेरा वो भी मेरा कहते हुए फिर उसी स्थान पर कब्जा जमा लिए। तथाकथित रूप से भूमंडलीकरण का सुन्‍दर उदाहरण प्रस्‍तुत करते हुए इनकी पीढ़ियां एक-एक करोड़ शादी में लुटाती रहीं फिर भी ये गरीब लाचार बने राजनैतिक सहानुभूति पाते रहे। अबकी बार भोज राम ने इनके इरादों पर पानी फेर दिया। पहले हाथ जोड़ा, नहीं माने तो तोड़ दिया।
नई पीढ़ी इस एतिहासिक भवन से अनजान थी। इंदिरा मार्केट के सूर्या जूस पार्लर के आस-पास कब्जा हटने के बाद से अनावृत हुए इस भवन में लगे पट्टिका से ज्ञात हुआ कि 11 जून, सन 1938 को छत्तीसगढ़ डिवीजन के कमिश्नर की पत्नी श्रीमती जी.सी.एफ. रेम्सडॅन के द्वारा बाल कल्याण केंद्र के रूप में इस भवन को जनता को समर्पित किया था। सियान लोग बताते हैं कि यह क्षेत्र दुर्ग के रेलवे स्टेशन जाने वाले काफी चौड़े मुख्य नगर मार्ग के किनारे स्थित था। उस समय यहां अंग्रेजी सरकार के कर्मचारियों के कुछ आवास भी थे। इसके पीछे काफी बड़ा खुला स्थान था, उसके बाद दुर्ग की बसाहट थी। दिल्ली दरवाजा या एडवर्ड मेमोरियल हाल या हिंदी भवन से यह भवन एक पहुंच मार्ग से सीधे संपर्क में था, जो दुर्ग की बसाहट की ओर जाता था। 
बहुत-बहुत धन्यवाद दुर्ग जिला प्रशासन और नव पदस्थ सीएसपी (ट्रेनी आई पी एस) भोज राज पटेल का, जिनके प्रयासों से, दुर्ग के हृदयस्थल में, बरसों से कब्जा जमाए अतिक्रमणकारियों को हटाया गया और दुर्ग के इस एतिहासिक भवन को हम-आप देख सके। 


घनश्याम सिंह गुप्त के बहाने

घनश्याम सिंह गुप्त के अवदानों का अध्ययन करते हुए हम तत्कालीन परिस्थितियों में वर्चस्ववादी राजनेताओं की राजनैतिक चालों से भी परिचित होते रहे। जिसमें पंडित रविशंकर शुक्ल और पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र जैसे सिद्धस्त राजनीतिज्ञों के बीच सामंजस्य बिठाते हुए वे अपनी विद्वता व प्रतिभा के बल पर दायित्वों का निर्वहन कैसे करते रहे होंगे? घनश्याम सिंह गुप्त के लिए तदकालीन परिस्थितियां कितनी कठिन रही होगी ? यह हम उस समय के खाँटी राजनीतिज्ञों के द्वारा लोगों को हाशिये में ले जाने के जुबत के उदाहरणों से समझ सकते हैं। इसी तुष्‍टीकरण के चलते घनश्याम सिंह गुप्ता और ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर के नाम का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के लिए बार-बार प्रस्तावित हुआ किंतु उन्हें हमेशा द्वितीयक पद प्रदान किया गया।

उस समय के बड़े नेताओं में पं. रविशंकर शुक्ल की राजनैतिक कुशलता के बहुत से सुनी-सुनाई किस्से हैं। तथाकथित रूप से वे या उनके सिपहसालार रायपुर में अपने सामने परवाज भरने वालों का पर कतरने का यथासंभव प्रयत्न करते रहते थे। यह राजनीति का तकाजा था या सिद्धांत, यह हमें नहीं पता किंतु, ठाकुर प्यारेलाल सिंह सहित कांग्रेस के प्रतिद्वंदी प्रजा सोसलिस्ट पार्टी के अनेक व्यक्ति उनके दांव से पीड़ित रहे, जिसे आप भली-भांति जानते ही हैं।



ऐसा ही एक वाकया रायपुर के कमल नारायण शर्मा का है। कमल नारायण वही व्यक्ति थे जिन्होंने सन 1963 के उपचुनाव में कसडोल से मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री डी. पी. मिश्र को पटखनी दिया था। पटखनी ऐसा कि सन 1963 के उप चुनाव में कमल नारायण शर्मा हार गए थे, किंतु उनकी शिकायत पर इलेक्शन ट्रिब्यूनल ने डी. पी. मिश्र को, चुनाव में गलत ढंग से मतदाताओं को प्रभावित करने का दोषी पाया और उन्हें 6 साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दिया था। यह फैसला ऐसे समय मे सन 1968 में आया जब कांग्रेस के 36 विधायकों को फोड़कर विजयराजे सिंधिया द्वारा बनाये संविद सरकार 19 माह बाद असफल हो गई थी।  अब डी. पी. मिश्र फिर मुख्यमंत्री बनने वाले थे, इस फैसले के बाद वे हाशिये में चले गए।  कांग्रेस के गाल पर पड़ा यह तमाचा सालों तक सालता रहा।

सन 1956 दिनांक 13 मई को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भिलाई आने वाले थे। इसी तिथि में कमल नारायण शर्मा ने ब्राह्मण पारा चौक में गांधी जी की प्रतिमा स्थापित कर उस का अनावरण डॉ. राजेंद्र प्रसाद से करवाने की स्वीकृति राष्ट्रपति भवन से प्राप्त कर ली थी। कमल नारायण को शुक्ल जी के प्रतिद्वंदियों में गिना जाता था, पं. रविशंकर शुक्ला मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वे नहीं चाहते थे कि कमल नारायण शर्मा इसका श्रेय ले। इस कारण स्थानीय शासन ने राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल में इस कार्यक्रम को शामिल नहीं किया। राष्ट्रपति रायपुर से सीधे भिलाई चले गए। दिन में भिलाई इस्पात संयंत्र के धमन भट्टी का उद्घाटन करने के बाद रात वे अपने दामाद, जो तत्कालीन BSP के महाप्रबंधक थे उनके घर 32 बंगला में रुके। (भिलाई में डॉ.राजेन्‍द्र प्रसाद) यहां रायपुर में राष्ट्रपति जी के नहीं रुकने पर  कमल नारायण शर्मा ने गांधी जी की प्रतिमा का अनावरण नियत तिथि को एक हरिजन कन्या से बड़े धूमधाम से करवा दिया। दूसरे दिन राष्ट्रपति के वापसी के समय उनके स्वागत के लिए भीड़ ब्राह्मण पारा में जमा हो गई। पं. रविशंकर सोच रहे थे कि बला टल गई है, अब मात्र स्वागत के लिए यह भीड़ है। राष्ट्रपति का काफिला वहां रुका, कमल नारायण शर्मा और अन्य लोगों ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को याद दिलाया कि आपने गांधी जी की प्रतिमा के अनावरण की स्वीकृति दी थी, कल आप नहीं रुके। हमने हरिजन कन्या से अनावरण करवाया। डॉ. प्रसाद के निजी सचिव ने भी इसे सही बताया। डॉ. प्रसाद, पं. रविशंकर की राजनीति को समझ गए। उन्होंने वही पं. रविशंकर से इसके लिए नाराजगी व्यक्त की और उस मूर्ति तक गए और फूल माला चढ़ाई।



हम यह छेपक कथा यही छोड़कर मूल कथा की ओर चलते हैं। हमने पहले ही बताया कि कांग्रेस ने घनश्याम सिंह गुप्ता को सदैव द्वितीयक पद से संतुष्ट रहने के लिए बाध्य किया। बाद में कांग्रेस के मुख्यमंत्री डी. पी. मिश्र द्वारा घनश्याम सिंह गुप्ता के अनुरोध के बावजूद उनके पुत्र धर्मपाल गुप्ता के साथ भी यही किया गया। जब वे मंत्री पद के दावेदार थे तो उन्हें सचेतक के पद से ही संतुष्ट होना पड़ा। इसके पीछे की राजनीति में कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले दाऊ वासुदेव चंद्राकर का नाम लिया जाता है। लोगों का कहना है कि यह एक किस्म से वर्चस्ववादी बदला था। कथा है कि सन 1930 में जब घनश्याम सिंह गुप्ता अन्य नेताओं के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गए फिर छूटे। तब दुर्ग में रैली निकाल कर उनका भव्य स्वागत किया गया। रैली के लिए आमदी के मालगुजार और अंग्रेजी शासन के आनरेरी मजिस्ट्रेट दाऊ माधो चंद्राकर का हाथी मांगा गया। जिसमें चढ़कर अंग्रेजो को चिढ़ाया गया।
'मोर हाथी मां चढ़ के शान बघारत हे!' दुर्ग रेल्वे स्टेशन के सामने अपने द्वारा बनवाये जा रहे आमदी धर्मशाला की छत पर चढ़कर ऐसा ही कुछ मुस्‍कुराते हुए बुदबुदाया था, दाऊ माधो चंद्राकर नें। आनरेरी मजिस्ट्रेट दाऊ माधो चंद्राकर के यशस्वी पीढ़ी के राजनीति के महारथी, किंगमेकर दाऊ वासुदेव चंद्राकर ने समय आने पर सत्‍ता की उंचाई वाले गुप्‍ता परिवार के वर्चस्‍व वाले हाथी से उतार दिया, धर्मपाल के लिए भोपाल में गोटी खेल दिया। डी. पी. मिश्र ने घनश्याम सिंह गुप्ता की लंबी मित्रता और निजी संबंधों को धता बताते हुए उनके पुत्र को तवज्जो नहीं दिया।

संयमी, सिद्धांतवादी और मितभाषी दाऊ घनश्याम सिंह गुप्ता का संयम यहीं से टूटा। पुत्रमोह में उन्होंने कांग्रेस के इस तुष्टिकरण की राजनीति के विरोध में पहली बार हल्ला बोला। भाजपा (जनसंघ) में शामिल होने की सार्वजनिक घोषणा की किंतु यह बूढ़े शेर की दहाड़ थी, जिसके पास सत्ता की सांसें सीमित थी। क्रमशः
-संजीव तिवारी
(विधान पुरुष : घनश्याम सिंह गुप्ता की कड़ी)

भाजपा (जनसंघ) में शामिल होने की घोषणा के संबंध में अधिक्‍ता श्री अशोक अग्रवाल का कहना है कि उन्‍होंनें ऐसी कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की थी। हालांकि जीवन के अंतिम दिनों में वे वृद्धावस्‍था के चलते मानसिक विभ्रम में थे किन्‍तु वे अपने जीवन के अंत तक कट्टर कांग्रेसी बने रहे। 

छत्तीसगढ़ के नवान्वेषित कतिपय विलक्षण मूर्ति-शिल्प

ज्ञान-प्रवाह, वाराणसी के तत्त्वावधान में मैं डा० नीलकण्ठ पुरुषोत्तम जोशी (पूर्व निदेशक मथुरा तथा लखनऊ संग्रहालय) के साथ मिलकर एक शोध परियोजना ''शिल्प-सहस्रदल : डायरेक्टरी आफ यूनीक, रेयर ऐण्ड अनकामन ब्रह्मैनिकल स्कल्पचर्स'' पर विगत 2004-2005 से कार्य कर रहा हूं । त्रिखण्डी इस योजना के दो खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं और तृतीय खण्ड पर कार्य चल रहा है। प्रथम खण्ड में गणेश, स्कन्द और शिव तथा द्वितीय खण्ड में विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, दिक्पाल, उपदेवता एवं देवपट्ट सम्बन्धी मूर्तियों का सचित्र संकलन है।  देवी-सम्बन्धी तृतीय खण्ड में मातृकाएँ, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती तथा अन्य देवियों की असामान्य मूर्तियों का सचित्र संकलन रहेगा। उपर्युक्त शोध-परियोजना में हमने छत्तीसगढ़ के भी नवान्वेषित कतिपय विलक्षण मूर्ति-शिल्प सम्मिलित किये हैं। इस लघु आलेख में  उन्हीं मूर्तियों की विशेषताओं पर प्रकाश डालने का प्रयास है।
मयूरारूढ़ स्कन्द - डीपाडीड डीपाडीह (सरगुजा) से प्राप्त और 7वीं - 8वीं शती ई. में निर्मित एक लम्बे फलक में अपने वाहन मयूर की पीठ पर स्कन्द को आँका गया है। मयूर की पीठ पर दोनों ओर पैर लटकाकर अथवा मयूर के खुले पंखों पर टिकाकर बैठे स्कन्द की कई मूर्तियाँ मिल चुकी हैं। परन्तु सुखासन में बैठे स्कन्द की यह मूर्ति विरल है। अपने दाएँ हाथ में शक्ति (शूल) पकड़कर कंधे पर टिकाये तथा दाएँ हाथ से मयूर की ग्रीवा को सहलाते स्कन्द की यह मूर्ति अत्यन्त सुन्दर बन पडी़ है। इस मूर्ति की सर्वाधिक उल्लेखनीय विलक्षणता फलक के निचले भाग पर मुष्टिका-युद्ध करते हुए दो वानरमुख योद्धाओं में सन्निहित है। ये दोनों योद्धा सपुच्छ हैं। 
दोनों ने अपना एक हाथ प्रतिद्वन्दी की जंघा पर टिकाया है और दूसरे ऊपर उठे हाथ की मुष्टिका से प्रहार करने को उद्यत हैं। फलक के दायीं ओर के योद्धा के पीछे एक नारी-आकृति तथा बायीं ओर के योद्धा का पैर पकडे़ हुए भी एक आकृति है। इस फलक को जी. एल. रायकवार ने इं.क.संगीत वि.वि. खैरागढ की शोधपत्रिका 'कला-वैभव' (अंक 15, 2005-06) में प्रकाशित किया है और निचले फलक के योद्धाओं की पहचान वालि-सुग्रीव से की है। मयूर की पीठ पर इस आसन में बैठने तथा वानरमुख योद्धाओं के मुष्टिका-युद्ध आकने वाली स्कन्द की यह अद्वितीय प्रतिमा है। स्कन्द के संसर्ग में वालि-सुग्रीव युद्ध भी विश्लेषनीय है।
उमामहेश्वर - मल्हार एवं सिलीपचराही उमामहेश्वर : ऐन आइक्नोग्रैफिक स्टडी ऑफ द डिवाइन कपल' नामक अपनी पुस्तक (सूकरक्षेत्र शोधसंस्थान, कासगंज, उ०प्र०, 2004) में छत्तीसगढ़ की एकाध प्रतिमाओं का उल्लेख अवश्य किया है, किन्तु प्रकाशित केवल एक ही  कर पाया था। वह प्रतिमा मल्हार की थी। बाद में छत्तीसगढ़ आने और 29 मार्च, 2013 को महाकोसल इतिहास परिषद रायपुर के तत्त्वावधान में संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, छ.ग. के श्रोतृशाला में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में रहने के बाद उमामहेश्वर की विशिष्ट कई प्रतिमाएँ हमारे संज्ञान में आयीं। 'कला वैभव' के एक अंक में तथा संस्कृति-पुरातत्त्व विभाग की पचराही शोध-संगोष्ठी में उन विशिष्टताओं पर मैंने प्रकाश डाला था। यों तो देशभर में पायी जाने वाली उमामहेश्वर की प्रतिमाओं जैसी ही प्रतिमाएँ छत्तीसगढ़ में आँकी गयी थीं, तथापि चतुर्भुजी उमा का अंकन छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रदेश या क्षेत्र में नहीं मिला है। और तो और सभी शिल्पग्रंथों में शिव को चतुर्भुज और उमा को द्विभुजा बनाने का ही विधान है। इस विधान के होते हुए भी छत्तीसगढ के शिल्पी ने उमा के दो अन्य हाथ बनाये और उनमें अंजनशलाका तथा कंधा पकडाये। इस विशेष लक्षण से जहाँ एक ओर नर और नारी को समान समझा गया वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की नारी की शृंगार-प्रियता भी दर्शायी गयी है। राजनांदगांव के जिला पुरातत्त्व संग्रहालय तथा भोरमदेव मन्दिर के परिसर में बने संग्रहालय में लक्ष्मीनारायण की प्रतिमाओं में लक्ष्मी को और ब्रह्मा-सावित्री की आलिंगन प्रतिमाओं में सावित्री को भी चतुर्भुजी बनाया गया है। 
उपर्युक्त चतुर्भुजाओं और उनके हाथों के उपकाणों को दर्शाने वाली दो प्रतिमाओं के विवरण इस प्रकार हैं - उमा का सामान्य दायॉ हाथ शिव के दाए स्कंध पर अतिरिक्त दाएँ हाथ में अंजनशलाका, सामान्य बाएँ हाथ में दर्पण और बाएँ अतिरिक्त हाथ में कंधा है। ये प्रतिमाए क्रमश: मल्हार से प्राप्त और संप्रति डॉ. हरिसिंह गौड वि.वि. के संग्रहालय में तथा सिलीपचराही से प्राप्त और संप्रति खैरगढ वि. वि. के संग्रहालय में प्रदर्शित हैं।
वृषभारूढ उमामहेश्वर - बिरखा (कवर्धा) तथा अन्यत्र बिरखा (कवर्धा) से प्राप्त तथा संप्रति खैरागढ विश्वविद्यालय के संग्रहालय वाली इस प्रतिमा में उमा के चतुर्भुजा होने की विशेषता तो है ही, एक अन्य विशेषता है वृषभ के ऊपर बैठने का आसन। यों तो वृषभारूढ उमामहेश्वर की मूर्तियाँ हिंगलाजगढ़ समेत पूरे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा आदि से भी पायी गयी हैं, पर उनमें वृषभ के शीश के पास आगे शिव प्राय: अपने बाएँ पैर को मोडकर वृषभ की पीठ पर रक्खे दिखाए गए हैं जिस पर उमा को बैठा दर्शाया गया है। परन्तु बिरखा से मिलने वाली इस मूर्ति में शिव आगे बैठे हैं और चतुर्भुजा उमा पीछे बैठी हैं। यही नहीं, इससे भी अधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि शिव और उमा दोनों वृषभ की पीठ के दोनों ओर अपने-अपने पैर लटकाकर वैसे ही बैठे हैं जैसे अश्वारोही बैठता है। ऐसी एक उमामहेश्वर की मूर्ति बेलसर (सरगुजा) के शिवमंदिर के सिरदल पर भी पायी गयी है। इसी प्रकार वृषभ पर बैठनेवाली एक मूर्ति भेडाघाट (जबलपुर) के गौरीशंकर मंदिर में भी है जिसे किसी छत्तीसगढ़ के शिल्पी ने ही गढा़ होगा, ऐसा अनुमान स्वाभाविक है।
चतुर्मुख-चतुर्भुज ब्रह्मा युवक रूप में - डीपाडीह (सरगुजा) से प्राप्त ब्रह्मा की इस मूर्ति की विशेषताएँ हैं - द्रष्टव्य तीनों शीश के जटाजूटों को उपर एक में गूँथना एवं तुन्दिल न होकर सामान्य अंगों का होना। ब्रह्मा के हाथों में अध:क्रम से अक्षमाला, पोथी (वेद), सुक एवं कमण्डलु है। यज्ञोपवीत में वक्ष के ऊपर टंका मृगमुख कृष्णाजिन का होना भी विशेष है। 
निर्कति - राजनांदगांव अष्टदिक्‍पालों में दक्षिण-पश्चिम कोण दिशा का दिक्पाल निर्ऋति माना जाता है। प्राय: सभी शिल्पग्रंथ निर्ऋति को दिक्पाल यानी पुरुष देव के रूप में बनाने का विधान करते हैं और मंदिरों के उस कोण में पुरुष देव की मूर्तियाँ ही मिलती हैं। परन्तु राजनांदगांव से मिली यह मूर्ति एक देवी की है। इसे प्रकाश में लाने का श्रेय इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में कलाविभागाध्यक्ष डॉ. आर. एन. विश्वकर्मा को जाता है जिन्होंने इसे अपनी शोधपत्रिका 'कला-वैभव' के 17वें अंक में प्रकाशित किया था। निर्ऋति को तो पुरुष रूप में होना चाहिए, ऐसा विचार करके इस आलेख के रचयिता ने निर्ऋति के इतिहास को खंगाला। ऋग्वेद, अथर्ववेद, महाभारत, मार्कण्डेयपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, अमरकोश सभी ने निर्कति को नारी बताया है, परन्तु मेदिनीकोश में कहा गया है कि "निर्ऋति पहले अलक्ष्मी स्त्री थी जो बाद में पुरुष दिशापाल हो गयी'' - ''निर्ऋति: स्यादलक्ष्मी स्‍त्री दिशापालान्तरे पुमान्''। इस आधार मेरी मान्यता है कि जिस शिल्पी ने यह मूर्ति बनायी यह निर्ऋति के पूर्ण इतिहास से सुपरिचित रहा होगा। उसने निर्ऋति के प्रारंभिक स्वरूप के आधार पर उसे नारी - रूप में आँका, करालदंष्ट्रा बनाया और पादपीठ पर ऊंट बनाए जो निर्ऋति के पुरुष हो जाने के लक्षण खड्ग, खेटक तथा नरमुण्ड भी बना दिये। सभी दिशाएँ स्‍त्री और दिक्पाल उनके पुरुष पति हैं। इसे ध्यान में रखकर इस मूर्ति को निर्ऋति दिशा की मूर्ति मानना अधिक तर्कसंगत होगा। इस देवी के प्रतिमालक्षण के लिए लेखक के निम्न शोधपत्र अवलोकनीय है -''राजनांदगाँव से प्राप्त एक अनूठी देवी प्रतिमा : पर्यालोचन एवं विवेचन'' चित्रफलक शिल्प-सहस्रदल सन्दर्भ
शिवानी - बारसूर (बस्तर) पद्मासन में कमलासन परं बैठी चतुर्भुज देवी, ऊंची कई स्तरीय शिरोभूषा, शीश के पीछे प्रभामण्डल, मस्तक पर त्रिनेत्र, स्तनहार, भुजबन्ध, कंकण, मेखला, पाद-कटक से सुसज्जित, सामान्य दायाँ हाथ खण्डित (वरदमुद्रा ?), ऊपरी हाथ में डमरू शीर्ष वाला दण्ड, ऊपरी बाएँ हाथ में त्रिशूल तथा सामान्य बाएँ हाथ में चषक (2)। मूर्ति की विशेषता है पादपीठ के दोनों किनारों पर बने मानव मुख। 
महिषासुरमर्दिनी - डीपाडीह ( सरगुजा ) अष्टभुजा देवी के चार हाथ खण्डित; अवशिष्ट बाएँ निचले सामान्य तथा एक ऊपरीदाएँ हाथ में शूलदण्ड का ऊपरी भाग, एक बाएँ हाथ में महिष का शीश और सामान्य दायाँ हाथ तरकश से बाण निकालने की मुद्रा में। सामान्य आभूषणों से सज्जित देवी आलीढ मुद्रा में दाएँ पैर को थोडा बाहर को प्रसारित तथा मुडे बाएँ पैर को महिष की पीठ पर अवस्थित किये हुये; महिष का शीश नीचे भूलुण्ठित; महिष की कटी हैग्रीवा से निकले और खड्ग लिए असुर की खडी आकृति। सौम्यवदना देवी की सुन्दर आकृति उल्लेखनीय। नीचे दूसरे स्वतंत्र फलक में देवी को असुर के दोनों सींगों को पकडकर द्वन्द्व युद्ध करते प्रदर्शित किया गया है। असुर का महिषमुखी मानव शरीर भूमि पर के बल गिए हुआ है। दाएँ देवी के पीछे खड्ग और खेटक लिए सहायिका नारी खडी़ है और दूसरे पार्श्व की पुरुष आकृति विस्मित मुद्रा में बाएँ हाथ को अपर किये खडी़ है।
इस मूर्ति की विलक्षणता दोहरे अंकन में सन्निहित है। अन्य किसी भी महिषमदिनी का ऐसा दोहरा अंकन अद्यावीधि हमारे संज्ञान में नहीं आया है। इसीलिए इस मूर्ति को शिल्प-सहस्रदल में सम्मिलित किया गया है। इस मूर्ति को भी जी. एल. रायकवार ने 'कला-वैभव' के अंक 15 , 2005-06 में प्रकाशित किया था।
एकपदा तपस्विनी गौरी - सिरपुर : कई वर्षों से सिरपुर के पुरतात्विक उत्खनन से वहाँ 7 वीं शती से लेकर 12वीं शती तक की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं। कई विरल मूर्तियों को जी० एल० रायकवार ने ज्ञानप्रवाह, वाराणसी के रिसर्ज जर्नल (खण्ड 15, 2010-11) में प्रकाशित किया है। उनमें से दो का उल्लेख उनकी विलक्षणताओं के साथ यहाँ प्रस्तुत है। इनमें से एक तपस्विनी गौरी की है। गौरी का बायाँ पैर भूमि पर टिका है और दायाँ पैर किंचित् घुटने से मुडकर ऊपर ऊठा है। उसका घुटने के नीचे का थोडा़ भाग खण्डित है। फलक में शीर्ष पर सूर्य, पंचाग्नियाँ और चन्द्र पंवितबद्ध हैं। अग्नियाँ यहाँ मानव मुख में रूप में प्रदर्शित हैं जो अन्यत्र इस रूप में नहीं मिली हैं। देवी के दाएँ पार्श्व में सूर्य के नीचे दोहरी पीठिका पर शिवलिंग तथा उसके नीचे एक चौकोर अग्निकुण्ड है। देवी के दाएँ पार्श्व में उसकी भुजा के पीछे एक गोधा ऊपर चढती हुयी बनी है। गोधा के पीछे केले का एक वृक्ष है। संभवत: गोधा उसी पर चढ रही है। द्वादश गौरियों में एक गौरी का सम्बन्ध कदली वन से है। केले के वृक्ष के बाएँ पार्श्व में गणेश और उनके नीचे एक कुण्डलित नाग की आकृतियाँ है।
जटाजूटधारिणी देवी के शरीर पर मात्र उपवीतसूत्र और कौपीन जैसा अधोवस्त्र है। उनके उठे हुए दाएँ हाथ की हथेली में कोई गोलवस्तु है जो फल अथवा पुष्पगच्छ हो सकती है। देवी का बायाँ हाथ कोहनी से नीचे खण्डित है। देवी के बाएँ पैर के निकट एक बैठे सिंह की मूर्ति है जिसका अग्रभाग खण्डित है। उसके पीछे गौरी की एक सखी खडी दृष्टव्य है। इस प्रतिमा का सर्वाधिक उल्लेखनीय पक्ष पंचाग्नियों का है जो परम्परा से हटकर मानवमुख के रूप में उकेरी गयी हैं। 
चामुण्डा - सिरपुर सिरपुर-उत्खनन से प्राप्त दूसरी विवेच्य मूर्ति चामुण्डा की है। इसका विवरण भी जी० एल॰ रायकवार ने उपर्युक्त जर्नल में सचित्र प्रस्तुत किया है। देवी शीश-विहीन शव पर अर्द्धपर्यकासनस्था, विकरालवदना, निर्मासा और लम्बस्तना है। उसका जटाभार सर्पफण से और मस्तक पट्टिका कपाल से सज्जित है। देवी के पीछे विशाल प्रभामण्डल है। षड्भुजा देवी अपने दोनों सामान्य हाथों से शव की बडी आँत का अंकन विलक्षण है। अतिरिक्त एक दाएँ हाथ में देवी ने एक फणयुक्त सर्प को तथा एक बाएँ हाथ में उलूकध्वज को पकड रखा है। एक अन्य बाएँ हाथ में नीचे पडे़ शव का शीश पकडा हुआ है। देवी के आसन के निकट दायीं ओर दो शुगाल तथा बायीं और एक गीध शव-भक्षण के लिए उद्यत हैं। मस्तक पर त्रिनेत्र धारण करने वाली देवी के खुले विशाल मुख और बडी आँत को हाथों से खींचकर मुख में विकरालता की पराकाष्ठा है।
-डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव
उत्तर प्रदेश में, जन्मे ए.एल. श्रीवास्तव ने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1964 ई. में बी.ए., 1966 ई. में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं  सस्कृति में एम. ए. (प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान) तथा 1976 ई. में 'लाईंफ ऐज डेपिक्टेड इन साँची स्कल्पचर' विषयक शोध प्रबन्ध पर पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। 1969 से 1996 ई. तक उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सी.एम.पी. कालेज में अध्यापन
किया।
डॉ. श्रीवास्तव ने अब तक लगभग 20 पुस्तकों का एवं लगभग 200 निबन्धों का प्रणयन किया है। उनके शोध निबन्ध देश-विदेश के स्तरीय जर्नल्स में प्रकाशित हुए हैं। 'श्रीवत्स' तथा "भारतीय कला-प्रतीक' नामक पुस्तकों पर डॉ. श्रीवास्तव को पुरस्कृत भी किया जा चुका है।
डॉ. श्रीवास्तव देश-विदेश के विभिन्न प्राच्य विद्या संस्थानों के सम्मेलनों तथा राष्ट्रीय संगोष्ठियों में अपने शोधपत्र प्रस्तुत करते रहे हैं। 1985 ई. में माण्टियाल वि.वि. (कनाडा) में आयोजित 'लर्नेड सोसाइटीज ऑव कनाडा' के वार्षिक अधिवेशन में "कनैडियन एशियन स्टडीज एसोसिएशन' तथा 'हिन्दी लिटरेरी सोसाइटी ऑव कनाडा' के तत्वावधान में उन्होंने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए जो 'साउथ एशियन होराइजन्स' नामक जर्नल (ओटावा वि.वि.. अंक 4, 1986) में प्रकाशित हुए थे।
कला-प्रतीकों के अध्ययन में विशेष अभिरुचि वाले डॉ. श्रीवास्तव आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से अनेक वार्ताएँ भी प्रसारित कर चुके हैं। उन्होंने शोध संस्थान, कानपुर) तथा 'कला' (इण्डियन आर्ट हिस्टरी कांग्रेस, गुवाहटी) नामक जर्नल्स का सम्पादन भी किया है। संप्रति वे पांचाल शोध संस्थान, कानपुर के अध्यक्ष हैं।
 डॉ. ए.एल.श्रीवास्‍तव जी, सेवानिवृत्ति के पश्‍च्‍यात भिलाई  छत्‍तीसगढ़ में निवास करते हैं।  मोबाईल संपर्क :  9827847377
सभी चित्र साभार : प्रभात कुमार सिंह

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...