छत्तीसगढ़ की ब्रांड एम्बेसडर पंडवानी गायिका तीजनबाई - विनोद साव


दोस्तों.. विगत ३१ अगस्त को छत्तीसगढ़ की मशहूर पंडवानी गायिका पद्मभूषण तीजन बाई सेवानिवृत्त हो गईं. वे भिलाई इस्पात संयंत्र के सामुदायिक विकास विभाग तथा बाद में कीड़ा एवं सांस्कृतिक समूह में लंबे समय तक सेवारत रहीं. महाभारत की कथा कहने की एक दुर्लभ लोकविधा पंडवानी गायन में वे पारंगत हैं. अपनी इस विलक्षण कला के लिए वे जगप्रसिद्ध हैं. इसके लिए उन्हें पहले पद्मश्री मिला फिर पद्मभूषण से वे अलंकृत हुईं. तीजन बाई का जन्म दुर्ग जिले के पाटन तहसील के पास अटारी गांव में हुआ था. तीजा त्यौहार में जन्म लेने के कारण उनका नाम तीजन पड़ा था और वे तीज पर्व में सेवानिवृत्त हुईं हैं. मैं उनके बचपन से लेकर आज तक की कलायात्रा का साक्षी रहा हूं. उन पर मैंने एक जीवित किवदंती के आसपासशीर्षक से एक आलेख भी कभी लिखा था जो अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था.

सही मायनों में तीजनबाई छत्तीसगढ़ की ब्रांड एम्बेसडरहैं. वे एक जीवित किवदंती के बन गईं हैं. वे छत्तीसगढ़ की अकेली हस्ती हैं जिन्हें देश की जनता जानती है और जिनकी विदेशों में भी पहचान है. एक दिन ऐसा भी आया जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और तबसे तीजनबाई का जीवन बदल गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से लेकर अनेक अतिविशिष्ट लोगों के सामने देश-विदेश में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

उन्होंने सोवियत संघ में हुए भारत महोत्सवमें शिरकत की थी. फ़्रांस-पेरिस के एफिल टावर के नीचे भी उन्होंने अन्तराष्ट्रीय मंच में प्रस्तुति दी थी. वे मंचों से जब प्रोग्राम करके नीचे उतरतीं थीं तब लोग हज़ार और पांच-सौ के नोटों में उनके आटोग्राफ माँगा करते थे. उन्हें श्याम बेनेगल ने दूरदर्शन के प्रसिद्द धारावाहिक भारत एक खोजमें प्रस्तुत किया था. विगत दिनों मुंबई से रणवीर कपूर अपने एक निर्देशक इम्तियाज अली को लेकर तीजन बाई से मिलने भिलाई आए थे. उन्हें अपनी फिल्म के लिए साइन करना चाहते थे पर स्वास्थ्यगत कारण से वे उसमें शामिल नहीं हो सकीं. उनकी शिक्षा नहीं हुई पर उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें अनेक संस्थाओं द्वारा डाक्टरेटकी मानद उपाधि दी गईं है. उनकी सफल कलायात्रा और सेवायात्रा के लिए हमारी हार्दिक बधाइयाँ इस उम्मीद के साथ कि आगे भी छत्तीसगढ़ और उसकी विराट लोककला तीजनबाई के नाम से रौशन होती रहेगी.

तीजन पंडवानी की ‘हिज हाइनेस’ हो गईं:

उस समय महिला पंडवानी गायिकाएँ केवल बैठकर गा सकती थीं जिसे वेदमती शैली कहा जाता है। पुरुष खड़े होकर कापालिक शैली में गाते थे। तीजनबाई ऐसी पहली महिला थीं जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन किया।  बाद में तीजनबाई की शैली का ज्यादा अनुसरण हुआ और ज्यादा से ज्यादा महिलाएं पंडवानी गायन के क्षेत्र में आने लगीं. पंडवानी को ग्लैमर से भर देने वाली तीजनबाई पंडवानी कला की ‘हिज हाइनेस’ हो गईं.
                                                                                                                       
तब तीजन ने पानी पिलाना बंद किया :
भिलाई इस्पात संयत्र में तीजनबाई की नियुक्ति प्रबंध निदेशक संग्मेश्वरम के कार्यकाल में हुई थी. संगमेश्वरम साहब की ये आदत थी कि वे किसी भी आगन्तुक से दो बातें पूछते थे, पहला ‘‘आपने कारखाना देखा है या नहीं..यदि नहीं तो जरूर देखिये..दूसरा..अमुक साहित्यकार, संगीतकार, कलाकार, खिलाड़ी जो हमारे संयंत्र में काम करते हैं आप उन्हें जानते हैं कि नहीं..?’’ उन्हें जब ये जानकारी हुई कि सामुदायिक विकास विभाग में तीजनबाई पानी पिलाने का काम कर रही है तब तत्कालीन अधिकारीयों को उन्होंने हडकाया और आदेश दिया कि ‘तीजन बाई से पानी मत पिलवाना।‘ साथ ही तीजनबाई से भी कहा कि ‘तुम पानी नहीं पिलाना. इससे पहले कि मेरी नौकरी जाये मैं तुम्हारी नौकरी समाप्त कर दूंगा.’ उस दिन से तीजनबाई ने अफसरों को पानी पिलाना बंद किया और बड़े बड़े उस्तादों को अपनी प्रतिभा की बानगी से पानी पिलाना शुरू कर दिया था.

एक्के घांव में निपटा देंव :
यह वह समय था जब दूरदर्शन पर प्रसिद्द फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल का महान धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ खूब देखा जा रहा था. मैंने एक दिन पहले ही दूरदर्शन पर भारत एक खोज देखा. जिसमें महाभारत के युद्धपर्व में कीच्चक वध का प्रसंग था. तीजनबाई अपने तमूरे को लेकर सन भाई कहते हुए कैमरे के सामने आई और भीमसेन जैसी मुद्रा बनाकर ताल ठोंक कर अपना ज़न्नाटेदार शाट देते हुए निकल गई. देखने वाले उसकी ओजपूर्ण भाव-भंगिमाओं को किंकर्तव्यविमूढ़ होकर देखते रह गए.

दूसरे दिन मैं भिलाई के सामुदायिक विकास विभाग में किसी से मिलने गया तब दफ्तर में सन्नाटा था और एक खाली कुर्सी पर मैं बैठ गया था. थोड़ी थकान थी तो मैंने ऑंखें बंद कर ली थीं.. और जब ऑंखें खुलीं तो खुलीं की खुलीं रह गई .. मेरे सामने वही चेहरा था जिसे कल टी.वी.पर मैंने देखा था. बड़े चेहरे पर काजर पारी हुई बड़ी बड़ी ऑंखें, माथे में बीचोंबीच मीनाकुमारी ब्रांड बड़े आकार की टिकली. बड़ी नाक में एक बड़ी फूल्ली, और मुस्कराहट में भीगे तथा पान से रचे हुए उसके होंठ. मुझे लगा कि मैं फिर एक बार ‘भारत की खोज’ सीरिअल तो नहीं देख रहा हूं. अब तक जिस    दरअसल जिस खाली कुर्सी पर मैं बैठ गया था वह तीजन बाई की थी. मैंने धारावाहिक वाली बात उन्हें बताई. तब उन्होंने बम्बई में शूटिंग का सारा वृत्तांत कह सुनाया छत्तीसगढ़ी में कि बस ओतके बर श्याम बेनेगल हा मोला आठ दिन बार बलाए रहिस..में काए करतेंव बम्बई में आठ आठ दिन. मेंहा श्याम बेनेगल ला एक्के घांव में निपटा देंव.
०००                                                             लेखक संपर्क : 9009884014 



रामेश्वर वैष्णव जी के गीत को याद करते हुए, एक तमंचा फायर (मने बकबक)


आज पेट कुछ ख़राब था, रायपुर जाने के लिए सहयात्रियों का ख्याल रखते हुए, एसी सिटीबस के बजाय सामान्य सिटीबस में चढ़ा।
सामान्य सिटी बस दुर्ग से सीधे रायपुर के लिए नहीं है। दुर्ग वाली बस कुम्हारी तक जाती है, कुम्हारी में लगी गाड़ी रायपुर रेलवे स्टेशन के लिए मिल जाती है।
कुम्हारी से उतर कर, कवि सम्मेलनों में रामेश्वर वैष्णव जी की लोकप्रिय पैरोडी 'बस में कबके ठाढ़े हँव, बइठे बर जघा देदे..' गुनगुनाते हुये जब दूसरी सिटी बस में चढ़ा तो उसमे डबल सीट में एक सीट खाली था। मैं वहां जाकर बैठ गया। सीट में जगह कुछ कम लगी, क्योंकि बाजू सीट वाले यात्री ने खिड़की की ओर सीट में अपना बैग रख कर बैठा था। बाजू सीट में जो सहयात्री बैठे थे वे लगातार नान एंड्राइड फोन से किसी 'सर' से बात कर रहे थे।
मैंने ऊँगली के इशारे से उन्हें उस आफिस बैग को गोद में लेने को कहा। उन्होंने बैग सीट से नहीं हटाया, उल्टा थोड़ा और पसर कर बैठ गया अब लगभग आठ इंच की जगह मुझे मिल पाई। मुझे बैठने में दिक्कत होने लगी, मैंने कंडक्टर को बोला, कंडक्टर ने उनसे अनुरोध किया। वो मोबाईल पर बात करते हुए मुझे व मेरे कपडे को इस तरह देखा मानो मुझे तौल रहे हों (?)। बस जब स्पीड पकड़ती या ब्रेक मारती तब मैं सीट से नीचे गिरने को होता। मेरा मन हो रहा था कि, उसके मोबाईल को छीनकर बस के फर्श पर पटक दूँ और दो-चार झापड़ उसे दूँ। कुम्हारी से टाटीबंद तक सहता रहा, भारत माता स्कूल के सामने के स्पीड ब्रेकर में क्रोध अपान वायु के रूप में निकल गया। सहयात्री कसमसाया, खिड़की का शीशा-उसा चेक किया। अनजाने में हुए मिसफायर का असर देख कर मैंने दो-चार फायर और किया। अब सहयात्री ने फोन रख दिया, बैग अपने गोद में ले लिया और मुस्कुराते हुए कहा मुझे उतरना है। मैंने लजाने का भाव मुख पर लाते हुए, उसे निकलने दिया और खिड़की की ओर जाकर इत्मीनान से बैठ गया।
वह दरवाजे के पास जाकर खड़ा हो गया, स्टापेज आते गए वह नहीं उतरा। मैं घडी चौक में उतरा, वह दरवाजे के पास खड़ा बेहद सभ्रांत और कुलीन नज़र आ रहा था। .. और मैं जाहिल, गंवार ..?
-तमंचा रायपुरी

निंदा सबद रसाल


बात कड़वी जरूर लगेगी, किन्तु आंचलिक साहित्य के विकास और प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है। सो, राजन सुनें! हमारे बीच वैचारिक मतभेद जरूर हो सकते हैं किन्तु मनभेद न रहे अतः अंगन्यास करते हुए यह लिख रहा हूँ। हिमांशु देव सहाय करें और देवाधि देव विनय-विवेक देवें।

हरिभूमि द्वारा प्रदेश की भाषा, साहित्य और संस्कृति का सम्मान करते हुए चार पृष्ठों का, पाक्षिक परिशिष्ठ 'चौपाल' निकाला जा रहा है। प्रदेश के लोक अंचलों में इसकी विशाल पाठक संख्या है। इस परिशिष्ट में छपने वाला लेखक अपार लोकप्रियता प्राप्त कर, आर्यावर्त के लेखन बिरादरी में पूजे जाते हैं। तद् अस्मिन् पत्रम्-पुष्पम्-पुंगीफलम् के अधिकारी होते हुए, छपने-छपाने 200-500 का दक्षिणा भी प्राप्त करने लग जाते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में माई पहुना बनाये जाते हैं और तमंचा जैसे ठोठक-ठोठक कर गोठियाने पर भी, प्रखर वक्ता बुलाये जाते हैं।

ऐसे परिशिष्ट के पुस्तक चर्चा (समीक्षा?) स्तम्भ में, पिछले सप्ताह विवेक तिवारी जी द्वारा लिखी चर्चा जैसे कुछेक लेखकों की चर्चाओं को अपवाद मान ले तो, बहुधा चर्चा, स्तरीय नहीं लगती हैं। यहाँ तक कि परिशिष्ठ संपादक के द्वारा लिखी गई चर्चा भी, ऐसा मेरा मानना "था"। किन्तु ..

आज के हरिभूमि के रविवारीय परिशिष्ठ में डॉ. दीनदयाल साहू द्वारा पुस्तक दीर्घा स्तम्भ में साहित्य अमृत पत्रिका के स्वाधीनता विशेषांक का परिचय पढ़ा, दिल खुश हो गया। कुल जमा ग्यारह लाइनों में दीनदयाल की भाषा, शब्द सामर्थ्य, दृष्टी और मेधा झलक रही है। यानि कि, निंदा की कोई गुंजाइस नहीं। सच्ची में .. बधाई ले ले मेरे यार। अब से चौपाल में तुम खुद पुस्तक चर्चा लिखो, ताकि नए प्रकाशित साहित्य से हम परिचित हो सकें।

हालाँकि, हिन्दी भाषा, भाषागत-व्याकरणिक त्रुटि और उच्चारण दोष तमंचा में विद्दमान है फिर भी, चौपाल परिशिष्ठ या उसके संपादक के सम्बन्ध में तंज कसने का कोई मौका मैं चूकता नहीं हूँ ???? .. आप सही हैं।

लेखक बिरादरी में निंदा-पुराण में तमंचा जैसे बिरले उजबक लोगों को ही रूचि होती है। जिसमे से कुछ मात्र लेखन में तो कुछ वाक् में निंदा-गॉसिप करते हैं, तो कुछ लोग अपने घर में जुरिया कर निंदा करते-कराते हैं। कुछ लोग फेसबुक-व्हॉट्सएप में तुतारी-कोचक कर या आभा-मारकर निंदा करने का मौका भी लपकते हैं। मैं इस आखिरी श्रेणी का निंदक हूँ। .. और तब से हूँ जब से यह ज्ञात हुआ है कि, हमारे जैसे लोगों के आँगन-कुटी को छवाने का टेंसन दूसरों का रहता है।
-तमंचा रायपुरी

दाऊद खां कहते, हनुमान की तरह सीना चीर दिखा दूँ, मेरे रोम-रोम में बसते हैंं राम

नहीं रहें हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक रामायणकर्ता दाऊद खां

-पं. वैभव बेमेतरिहा

सिर्फ जुबां नहीं अंतर्मन में सिर्फ एक ही नाम था, हनुमान की तरह जीवन में जिनके बसा राम था। वे कहते रामकथा करते निकले जान, मौत से पहले अंतिम वाक्य हो हे राम ..इस कलयुग में छत्तीसगढ़ में हनुमान की तरह ही ऐसा ही भक्त था दाऊद खां। जी हां हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक रहें दाऊद खां अब हमारे बीच नहीं रहा। गृह नगर धमतरी स्थित आवास में ९४ साल की उम्र में शुक्रवार ९ सितंबर को उन्होंने अंतिम सांस ली। जानकरी के मुताबिक मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह दाऊद खां का नाम पद्मश्री सम्मान के लिए प्रस्तावित किया था। मुस्लिम धर्म से होने के बाद भी हिन्दु संस्कार से राम को अपनी जिंदगी में समाहित करने वाले दाऊद खां को हम विमन्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

जन्म-शिक्षा
दाऊद खां का जन्म धतमरी जिले के कुरूद ब्लॉक स्थित अंवरी गाँ में २५ जुलाई १९२३ को हुआ था। यह वह दौर जब देश अंगरेजी हुकूमत थी। जब देश में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई चल रही थी। इस दौर में चल रहा था हिन्दुओँ-मुस्लिमों के बीच खूनी संघर्ष। ऐसे वक्त में पले-बढ़े दाऊद खां। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा धमतरी जिले में हुई। आठवीं तक की शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे शिक्षक बन गए। अध्यापन कार्य के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए बीए की शिक्षा पूरी की। इस दौरान वे धमतरी सहित कई जिलों में शिक्षक रहें।

७० साल पहले हुई थी रामकथा की शुरुआत
जब दाऊद खां सिर्फ २४ साल के थे तभी उनके जीवन में राम समाहित हो चुके थे। अपने गुरु साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और सालिकराम द्विवेदी की प्रेरणा से उन्होंने रामायण का अध्ययन शुरू किया था। २४ साल की उम्र में उन्होंने पहली बार रामकथा कहीं और इसके बाद तो लगातार वे रामायण का प्रवचन देने लगे। । 1947 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उन्होंने रामायण पर प्रवचन दिया और उसके बाद तो वह उनका जुनून बन गया। १९७० में उन्हें राष्टपति शिक्षक सम्मान मिला। उन्होंने देश कई शहरों में रामायण पर प्रवचन दिया। यहां तक राष्टपति भवन में उन्होंने रामयण पर प्रवचन दिया।

समाज सेवा में भी रहें आगे
दाऊद खां महीने ४ से ५ रामायण का प्रवचन करतें। और इससे होने वाली आय को वो गरीब बच्चों की शिक्षा व बाकी अन्य सहयोग में लगाते थे। उन्होंने कई बच्चों की आर्थिक मदद करने उन्हें अच्छी शिक्षा दी। कुछ विद्यार्थी इनमें से डॉक्टर बने , तो कुछ इंजीनियर भी।

दाऊद खां का परिवार
दाऊद खां की पत्नी का निधन हो चुका है। उनके परिवार में एक लड़का और दो लड़कियां हैं। बेटी कमरुन्निशा हाल ही में रायपुर के डिप्टी कमिश्नर पद से रिटायर हुई हैं।

राजभवन में आयोजित था रामयाण का पाठ
अंतिम सांस तक रामयाण का प्रवनच करने की बात कहने वाले दाऊद खां का आज १० सितंबर को राजभवन में प्रवचन होना था। राज्यपाल बलरामजी दास टंडन की ओर से रामायण पाठ रखा गया था। लेकिन जिस राजभवन में राज्यपाल से लेकर तमाम लोग दाऊद खां का इंतजार कर रहे थे वहां उनकी मौत की खबर आई और राजभवन में मायूसी छा गई।

'रामायण मुझे नहीं छोड़ेगी’
दाऊद खां जब तक जीवित रहे वेम हँसकर यहीं कहते रहे रामायण पाठ को लेकर समुदाय के लोग जमकर विरोध करते रहें, उन्हें कई कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। सामाजिक बहिष्कार की धमकियां मिलती। लोग जान से मारने की बात कहते। बावजूद इसके उन्होंने कभी राम से नाता नहीं तो रामायण पाठ करना नहीं छो़ड़ा। वे सब से बस कहते थे 'मैं तो छोड़ दू पर रामायण मुझे नहीं छोड़ेगी’।



रामायाणी के नाम से थे प्रसिद्ध

दाऊद खां वर्ष 1949 से 1960 तक लगातार ११ साल तक रायपुर में मानस प्रवचन । रामचरित मानस पर प्रवचन करने पर माता-पिता और भाई ने विरोध किया था। वर्ष 1970 में हिन्दी, संस्कृत और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के विद्वान थे। राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली, 1972 में मुख्यमंत्री निवास भोपाल और 1974 में राजभवन भोपाल प्रवचन। रामायण, कुरान, बाईबिल और गुरूग्रंथ साहिब जैसे पवित्र धर्मग्रंथों का गहरा अध्ययन।

दाउद खॉं से लिया गया एक अनौपचारिक साक्षात्‍कार यू ट्यूब में यहॉं है।



खुमान, मुक्तिबोध और दिवाकर


बात उन दिनों की है जब राजनांदगांव के नगर निगम द्वारा संचालित सर्वेश्वरदास उच्चतर माध्यमिक शाला में खुमान साव शिक्षक थे। दिवाकर नाम का एक बालक उसी स्कूल में पढ़ता था और खुमान सर उसके क्लास टीचर थे। अंग्रेजी के पहले पीरियड में खुमान साव जब भी दिवाकर का नाम हाजरी के लिए पुकारते वह अनुपस्थित रहता। दूसरा पीरियड हिन्दी का होता जिसे कोई और शिक्षक पढ़ाता था। तीसरे पीरियड में खुमान साव पुनः उसी क्लास में गणित पढ़ाने आते तब तक दिवाकर कक्षा में आ गया रहता।
यह क्रम कई कई दिनों तक चलता रहा, कभी-कभी दिवाकर पहले पीरियड के अंतिम समय में आता। खुमान साव उसे कक्षा में आने नहीं देते वह बाहर खड़े रहता। ऐसे ही एक दिन पहले पीरियड के अंतिम समय में जब दिवाकर कक्षा में आया और "मे आई कम इन सर" बोला, खुमान साव ने उसे डांटते हुए कहा कि तुम रोज-रोज देरी से कक्षा आते हो, अब मैं तुम्हें तभी स्कूल में घुसने दूंगा जब तुम अपने पिताजी को बुला कर लाओगे। पीरियड समाप्त हो गया इसके बाद खुमानसाव दूसरी कक्षा में पढ़ाने चले गए।
दिवाकर स्कूल से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर दौड़कर राजनांदगांव के दिग्विजय कालेज पहुंचा, जहां उसके पिता प्राध्यापक थे। उसने अपने पिता से कहा कि क्लास टीचर सर बुला रहे हैं, क्यों-क्या पूछने पर बालक ने सब बातें बताई।
साइकल में पिता-पुत्र मुनिसिपल स्कूल पहुंचे। स्कूल के टीचर्स रूम में पिता के पहुंचते ही वहां उपस्थित शिक्षक उठ खड़े हुए और बड़े सम्मान के साथ उन्होंने दिवाकर के पिता को बैठाया। टीचर्स रुम में उपस्थित शिक्षक प्रसन्न थे कि 'पिता' उनके स्कूल में आए हैं और उन्हें इनका सानिध्य मिल रहा है। इधर खुमान साव तीसरे पीरियड में बालक दिवाकर के क्लास में गणित पढ़ाने पहुंच गए। दिवाकर ने बताया कि उसने अपने पिताजी को बुला लिया है और वह टीचर्स रूम में बैठे हैं। तब तक चपरासी बुलाने भी आ गया।
खुमान साव जब टीचर रूम पहुंचे तब वहां उपस्थित शिक्षक अयोध्या प्रसाद शुक्ल ने दिवाकर के पिता का परिचय दिया कि ये दिवाकर के पिता गजानन माधव मुक्तिबोध हैं। यद्यपि, इतने बड़े व सम्माननीय व्यक्ति को इस तरह क्यूँ बुला लिया यह प्रश्न शुक्ल के चेहरे में उभरी खीझ से स्पष्ट झलक रही थी। शुक्ल के खीझ से परे, मुक्तिबोध को सामने पाकर खुमान साव के चेहरे पर खुशी और सम्मान का भाव उभर आया। मुक्तिबोध ने दोनों हाथ जोड़कर खुमान को नमस्कार किया। खुमान साव, मुक्तिबोध के नाम से परिचित थे, वे जानते थे कि मुक्तिबोध हिंदी के बड़े साहित्यकार हैं और राजनांदगांव में ही रहते हैं किंतु कभी उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हो पाई थी। हाजिरी रजिस्टर में बालक दिवाकर के पिता का नाम गजानन माधव लिखा था, किंतु कभी उस पर उनका ध्यान नहीं गया था। खुमान साव ने तो बालक के हित के लिए, बालक के रोज रोज देर से आने की सजा के तौर पर एक पिता को बुलाया था किंतु यहां तो पिता के रूप में मुक्तिबोध हाजिर था। लंबा मौन कमरे में पसर गया, आरोप पढ़े जाते उसके पहले ही सहजता से मुक्तिबोध ने अपने बच्चे की गलती स्वीकार कर ली, और खुमान साव से निवेदन किया कि आगे से बालक समय पर स्कूल आएगा। यह भी कहा कि कभी समय निकालकर उनके घर आयें। खुमान साव ने प्रत्युत्तर में अपने हाथ जोड़े उधर मुक्तिबोध साइकिल में पैडल मारते स्कूल कैंपस से बाहर निकल गए।
दिवाकर लगभग प्रत्येक दिन अंग्रेजी का एक पीरियड छोड़ रहा था जिससे उसकी पढ़ाई निश्चित रूप से प्रभावित हो रही थी फिर भी दिवाकर जान बूझकर रोज देर क्यों कर रहा है इस बात की चिंता खुमान साव को थी। दिवाकर पढ़ाई में तेज था, वह अन्य बच्चों के मुकाबले मेधावी था, मुक्तिबोध का पुत्र था इसके बावजूद वह देर से आकर अनुशासनहीनता क्यों कर रहा है यह प्रश्न भी उनको सता रही थी। खुमान साव उस रात सो न सके, दिवाकर और मुक्तिबोध उनके मानस में छाए रहे। अलसुबह वे पठान मोहल्ले में मुक्तिबोध के घर जा पहुंचे जहां मुक्तिबोध किराए से रहते थे। एक छोटा सा कमरा जिसमें एक पुराना खाट और एक चेयर पड़ा था। बाहर एक पुरानी सायकल खड़ी थी जिस पर ताला नहीं था, सायकल की हालत चुराने लायक भी नहीं थी। एक जोड़ी पजामा कुर्ता सूख रहा था जो अभी-अभी धोया गया था। एक छोटा किचन कमरे का ही हिस्सा था जिसमें नाम मात्र के बर्तन और चूल्हा अपनी कहानी खुद कह रहे थे। मुक्तिबोध ने हाथ जोड़कर खुमान साव का स्वागत किया। कमरे के अंदर उन्हें चेयर में बैठाया, खुद खाट में बैठे। राजनांदगांव की तत्कालीन परिस्थितियों और लोक संस्कृति व परंपराओं पर संक्षिप्त फिर दिवाकर की पढ़ाई के संबंध में विस्तृत बात हुई। खुमान साव सीमित उत्तर देते हुए मुक्तिबोध को तौलते रहे (शायद मुक्तिबोध भी खुमान को)।
मुक्तिबोध ने अपनी पारिवारिक स्थिति स्पष्ट करते हुए दिवाकर के रोज देर से स्कूल जाने का कारण बताया। मुक्तिबोध ने बताया कि उनकी पत्नी और छोटा बेटा एक साथ दूसरे गांव में रहते हैं। उनकी पत्नी अक्सर बीमार रहती है जिसका देखभाल छोटा बेटा करता है। उसके साथ उसका बड़ा बेटा दिवाकर रहता है। उनके स्वयं का स्वास्थ्य आजकल ठीक नहीं है और सुबह से उन्हें कॉलेज में पढ़ाने जाना होता है इसलिए घरेलू कामकाज के लिए समय थोड़ा कम पड़ जाता है। उन्होंने बिना हिचकिचाहट बताया कि उनके पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े हैं, कल पहने हुए दोनों के कपड़े सुबह दिवाकर धोता है, घर का झाड़ू पोछा करता है और नहा कर तैयार हो जाता है। रात का लिखा-पढ़ा-छूटा सुबह लिखकर वे खाना बनाते हैं, दोनों खाना खा कर तैयार होकर स्कूल और कॉलेज के लिए निकलते हैं। इसके चलते दिवाकर को रोज-रोज देर हो जा रही है इस बात का एहसास उन्हें नहीं था। उन्होंने खुमान साव को आश्वस्त किया कि आगे ध्यान रखेंगे और दिवाकर अब सही समय में स्कूल पहुंचेगा। मुक्तिबोध ने खुमान के मना करने के बावजूद स्वयं चाय बनाया और खुमान को पिलाया। कृशकाय मुक्तिबोध रुग्ण होने के बावजूद आत्मविश्वास से पूर्ण सधे शब्दों में बोलते रहे और खुमान साव इस महाकवि को निहारते रहे।
(खुमान साव के अवदानों पर संजीव तिवारी द्वारा लिखे जा रहे कलम घसीटी में से एक पाठ का ड्राफ्ट)

मोबाईल-मोबाईल

कल शाम बिलासपुर हाई कोर्ट से वापस दुर्ग आने के लिए स्टेशन पंहुचा। भगत की कोठी आने वाली थी, टिकट लिया, रात होने के कारण स्लीपर नहीं कट पाया, गाड़ी प्लेटफार्म नं. 3 में आ गई। स्टेशन में दाहिने तरफ की सीढ़ी रिपेयरिंग के लिए बंद है सो बाएं तरफ की सीढ़ी और एस्केलेटर से प्लेटफार्म आते तक गाड़ी छूट गई। अगले प्लेटफार्म पर शिवनाथ देरी हो जाने के बाद, नहा-धो के 15 मिनट में छूटने वाली थी। मैं उसमे बैठ गया, बेसमय चलने के कारण उसमे सवारी बहुत कम थे।
गाड़ी छूटने के पहले टीटी दल आया, मैंने टिकट उन्हें दिखाया और स्लीपर काट देने के लिए बोला। टीटी ने टिकट को देर तक देखा तब ध्यान आया कि मेरी टिकट तो मेल-एक्सप्रेस की है और यह सुपर फ़ास्ट है। टीटी ने अंतर का टिकट और जुर्माना लिया, स्लीपर के लिए कोच एस 6-7 में जाने के लिए बोला जिसमें स्लीपर चार्ज नहीं लगता।
एस 6 में कुल जमा 5 यात्री थे, खिड़की के तरफ वाले बर्थ पर एक लड़की बैठी थी और बाजू वाले बर्थ पर एक महिला बैठी थी। दो लड़के अलग-अलग बर्थ पर बैठे थे। मैं आगे बढ़ कर कोच के बीच वाले किसी बर्थ पर जाकर बैठ गया।
गाड़ी चली, अचानक आवाज आई 'चोर! चोर! जंजीर खींचो! चोर!' लड़की बदहवास चिल्ला रही थी। जंजीर खीचने पर भी गाड़ी रुकी नहीं, तब तक एक लड़का दूसरे कोच से आ गया और हम चारो उस लड़की के पास पहुँच कर कारण पूछने लगे।
सिसकियों के बीच लड़की ने बताया कि ट्रेन जब चलने लगी तो वह अपने पर्स से मोबाईल निकाली, अपने पिता को फोन लगाने को थी वैसे ही बाजु के बर्थ पर बैठे लड़के ने मोबाईल छीना और ट्रेन से कूद गया।
अपने नए मोबाईल, उसमे संग्रहित चित्र और ओपन आईडी की उसे चिंता थी। हम सबने उसको ढांढस बंधाया, बाद में स्क्रीन लॉक होने की बात पर वह कुछ नार्मल हुई। उसके छीन लिए गए मोबाईल नंबर पर मैंने रिंग किया तो उधर से किसी ने फोन उठाया, मैंने फोन रेलवे थाने में जमा करने कहा तो उसने हाँ कहा। मतलब छीनी गई मोबाईल फोन आन था, हम लोगों ने 182 में पुलिस को यह बात बताई। लड़की लगातार विलाप करते हुए रो रही थी, उसके हाँथ पैर अकड़ रहे थे। हमने उसकी माँ से बात कराई, उसकी माँ ने उसे भाटापारा तक सुरक्षित छोड़ने को कहा। बातें करते-करते भाटापारा आ गया जहाँ उसे लेने उसके पापा, बड़े पापा और भाई आ गए थे। गाड़ी चलते ही रेलवे पुलिस भी आ गई जिन्हें हमने उनके पास भेज दिया।
तो क्या हुआ, यह तो आये दिन होते रहता है इसे हमें पढ़वा कर, लिख कर हमारा और अपना समय क्यूँ ख़राब किया?
वो इसलिए कि, जब लड़की बदहवास विलाप कर रही थी तो उसे मैंने समझाते हुए कहा कि बेटा मोबाईल ही गया, शुक्र करो कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, वो आपका बैग, पर्स छीन सकता था, आपको शारीरिक क्षति पंहुचा सकता था जिससे तुम बच गई। तो उसने रोते हुए भोलेपन से कहा जो भी होता, मेरा मोबाईल तो बच जाता न।
.. यानि, मोबाईल के लिए इस कदर मोह?
आजकल के बच्चों के मोबाईल प्रेम का यह प्रत्यक्ष उदाहरण है।
... और यह भी कि, 182 में फोन करने पर अगले स्टेशन पर सहायता पहुँचती है।
©तमंचा रायपुरी के बक-बक

व्हाट्स-एपिया रोमांस


मुहब्बत का इज़हार, मुहब्बत के पैग़ाम और मुहब्बत की वो हसीन तकरारें वक्त के साथ अपना तरीका बदल लिया करती हैं !! आज सोशल मीडिया के दौर में वाट्स एप पर मुहब्बतें परवान चढ़ रही हैं ! तकनीकी दौर की इस मुहब्बत को बड़ी खूबसूरत कहानियों में गूंथकर समीर ने वाट्स एपिया रोमांस की शक्ल में इस किताब में पेश किया है ! समीर प्रेम कहानियां लिखते हुए सबसे सहज होते हैं ! हमारी जिंदगियों में रोमांस के जो छोटे छोटे लम्हे बिखरे रहते हैं , उन्हें समीर बेहद संवेदनाओं के साथ अपनी कहानियों में उकेरते हैं ! उनकी अपनी एक ख़ास शैली है जिससे आज के आधुनिक युवा अपने आप को एकदम से कनेक्ट कर पाते हैं ! समीर की कहानियां दरअसल पारम्परिक कहानियां नहीं बल्कि दृश्यों का एक बड़ा खूबसूरत कोलाज होती हैं ! समीर के वाट्स एपिया रोमांस में प्रतीक्षा हैं , तड़प है , चहकते इमोजीज़ हैं , इकरार है, इज़हार है , रूठना मनाना है और मुहब्बत के नीले हरे रंग हैं गोया मोबाइल की स्क्रीन एक चमकीला आसमान हो और उसमे मुहब्बत के परिंदे उड़ान भरते हों ! समीर की कहानियों की जो सबसे लाजवाब बात मुझे नज़र आती है वो रिश्तों के जटिल धागों की बुनावट को इस कदर सरलता से प्रस्तुत करते हैं कि हर पाठक कहीं न कहीं उन रिश्तों को जीने लगता है ! कथा का घटना क्रम हमें हमारी जिंदगी से रूबरू कराता हुआ दिखाई देता है ! सर्वथा मौलिकता के साथ कही गयी ये छोटी छोटी कहानियां हम सभी की कहानियां हैं ! इन कहानियों के चरित्र हमारे आसपास ही जी रहे हैं ! ये कहानियां हमारे ठीक बगल में उन स्क्रीनों पर घट रही हैं जिनके साथ हमारी स्क्रीन सेम सिग्नल शेयर कर रही हैं !
- पल्लवी त्रिवेदी
कुछ अलग प्रकार की पुस्‍तकों को शिवना प्रकाशन से प्रकाशित करने की योजना के तहत यह पुस्तक आई है। प्रेम के नये रूप का प्रस्तुत करती हुई इन कहानियों के लेखक हैं समीर यादव । इन कहानियों में नये युग का प्रेम है। नाम 'व्हाट्स-एपिया रोमांस' व्हाट्स अप पर जन्म लेनी वाली प्रेम कहानियाँ। लेकिन इन कहानियों में भी वही बेकरारी है, वही इंतज़ार है जो प्रेम में हमेशा से रहता है। पुस्तक में शामिल कहानियाँ
1) समझे बस वो... 2) एबाउट टू डाय 3) बट लीव इट 4) व्हाट्स-एपिया परवाने 5) पुरजा-पुरजा प्रेम पर्चियाँ 6) क्या यही प्यार है 7) WiFi Zone में लौट आओ 8) ग्रैंड सेल्यूट.. 9) इंद्रधनुषी और इंस्टेंट 10) आर यू देअर ? 11) दो काली टिक 12) मुहब्बत वाली जगह 13) आज मिल न.. 14) आख़िरी कश 15) नो स्टेटस 16) न सूखने देती हो, न भीगने 17) पिछली सदी का मैसेज 18) दोनों टिक नीली 19) गोल्डन रिट्रीवर 20) तारीख़ 21) उसे भी मालूम है .. 22) चपटी तिकोने वाली प्लेट 23) तुम बेवजह याद रहती भी कहाँ हो 24) इसमें मैं कहाँ ... 25) जा कुलच्छनी...... सब बरी हो गए।
यह पुस्‍तक आज से ऑनलाइन शॉपिंग स्टोर्स पर उपलब्‍ध रहेगी

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

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