- विनोद साव
सड़क की दोनों ओर शाल के हरे भरे पेड़ थे। यह दिसंबर की आखिरी दोपहरी थी पर नये साल के उल्लास में थी। सड़क के किनारे खड़े पेड़ों को मानों प्रतीक्षा थी उन राहगीरों की जो नव वर्ष में प्रवेश उसके सामने बिछी सड़क से करें। सड़क बिल्कुल सूनी थी इसलिए साठ किलोमीटर की दूरी साठ मिनट में ही पूरी हो गई थी। जंगल की सूनी और चमकदार सड़क पर ड्रायविंग प्लेरजर का यह सुनहरा मौका था जिसे हाथ से जाने नहीं देना था ‘‘... याहू... चाहे कोई मुझे जंगली कहे...’’ कार के भीतर शम्मीकपूर थे और हमारे भीतर रायल स्टेग।
धमतरी से नगरी की यह दूरी तय हो गई थी। बस स्टेंड पर नरेन्द्र प्रजापति ने पहचान लिया था जिसने सिहावा-नगरी घुमा देने को आश्वस्त किया था। अभी कुछ दिनों पहले ही उसने एक पाठक के रुप में मोबाइल किया था कि ‘सर ! मैंने आपका यात्रा-वृतांत ‘केसरीवाड़ा’ पढ़ा ... कलम का जादू है सर आपके पास ... आपके साथ साथ मैं भी घूमता रहा।’’ पाठक नरेन्र् अब हमारे मार्ग दर्शक हो गए थे। सिहावा नगरी में वे आगे आगे थे और हम उनके पीछे पीछे।
‘नगरी में आप रहते कहां हैं?’
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लगता है हम छत्तीसगढ़ की धरती पर नहीं पोर्ट-ब्लेयर में खड़े हैं। सामने अंतहीन जल सागर है। दोपहरी में भी हल्के कोहरे के बीच अनेक टापुनुमा शिलाखण्डों को समेटे हुए यह विराट दृश्य है। 1964 में बना यह दुधावा बांध है जिसमें 625 वर्ग किलोमीटर का जल क्षेत्र है। एक उठी हुई चट्टान पर कर्व ऋषि का आश्रम है। इस चट्टान तक हम अपनी कार चढ़ा लेते हैं। सिहावा की पहाड़ियां घुमावदार आकार में है ऊन के गोलों की मानिंद। पहाड़ी इलाका होने के बाद भी यहां के रहवासियों में कोई मानसिक पिछड़ापन नहीं है। हर आदमी चैतन्य और समझदार है नरेन्र्य प्रजापति की तरह।
बांध के कई पाइण्ट हैं जहां से अलग अलग नजारे देखे जा सकते हैं। बांध के निर्माण के समय विस्थापित हुए जन मानस को सामने बसा दिया गया था और अब यहां एक भरा पूरा गांव है जिसके साप्ताहिक बाजार भर जाने का आज दिन है। बाजार में हरी सब्जियों के बीच वह लाल सेमी दिखी जो लगभग लुप्त हो चुकी थी पर अब फिर उसकी आवक होने लगी है। डांग कांदा और लाल रंग का झुरगा पहली बार देखा। नरेन्र्ब कहते हैं कि ‘इन दोनों को उबालकर एक साथ बनाया जाता है मसालेदार... खूब अच्छा लगता है।’
दूसरे दिन अल्सुबह ही हम उस पहाड़ी की लम्बी सीढ़ियों को लांघ गए थे जहां महानदी का उद्गम स्थल माना जाता है। अचंभा होता है यह देखकर कि धान कूटने का बहाना जैसे छेद पर थोड़ा जल भरा है और इसी छेद से महानदी का उद्गम हुआ है। यह ऋंगऋषि की तपोभूमि है जिनकी तपस्या से त्रेता के महानायक राम का भी जनम हुआ माना जाता है। यहां एक पालतू मोरनी को विचरण करते देखा जिसे निकट बसे एक पंडित ने पाला है। पहाड़ी के नीचे झांकने पर सिहावा नगर की सुन्दरता खण्डाला से भी कहीं अधिक आकर्षक जान पड़ती है। नीचे आकार लेती नन्ही महानदी है जो सोलह किलोमीटर की यात्रा कर और फिर वहां से लौटकर पश्चिम से पूर्व की ओर बह चली है। नीचे उतरकर हमने नदी में स्नान कर लिया था।
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ई मेल -vinod.sao1955@gmail.com
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वाह, ऐसा परिवेश हो तो क्यों न कोई घुमक्कड़ी सीख जाये।
जवाब देंहटाएंइतिहास बसे हे सच म सँगी महानदी के तीर म संस्कृति-सोन समाए हावै महानदी के नीर म ।
जवाब देंहटाएंएहर छत्तीसगढ के गँगा सब ल निर्मल कर देथे लइका-मन के मैल ल धोथे धो के उज्जर कर देथे ।
आगम-निगम समाए सब्बो महानदी के क्षीर म संस्कृति सोन समाए हावै महानदी के नीर म ।