ब्लॉग छत्तीसगढ़

05 October, 2017

हेमंत साहू : असम निवासी छत्तीसगढ़ वंशी चित्रकार

हेमंत साहू, असम निवासी छत्तीसगढ़ वंशी ऐसे चित्रकार हैं जो अपनी तूलिका से यथार्थ के विद्रूप, भक्ति और प्रेम आदि की अद्भुत इंद्रधनुषी छटा बिखेरते हैं। ये इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के फाइन आर्ट के ऐसे विद्यार्थी हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय सहित छत्तीसगढ़ और असम का नाम रौशन किया है। इनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी देश के विभिन्न हिस्सों में लगती है। हम प्रत्यक्ष रूप से इनके बनाये दो-चार पेंटिंस ही देख पाए हैं क्योंकि जब हम असम अध्ययन दौरे में थे तब इनसे ज्यादा समय तक इस विषय पर हमारी बात नही हो पाई।
इनके घर मे इनकी बहन जहां सिद्धस्थ गायिका हैं, जो छत्तीसगढ़ी सहित असमी लोकगीत गाती हैं और कुछ असमी फिल्मों में इन्होंने गीत गाया है। वहीं इनके छोटे भाई वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर जिन्हें अभी कुछ माह पूर्व ही पी एचडी अवार्ड हुआ है। उपलब्धियों के आंकड़ों के अनुसार प्रदीप कुमार साहू असम निवासी छत्तीसगढ़ वंशियोँ में पहले डॉक्टरेट होल्डर हैं। यद्यपि मेडिकल डॉक्टरों की संख्या लगभग 30-40 होगी।
यहां फेसबुक पर हमने हेमंत के कुछ और चित्रों को देखा। अपने अल्प चित्र ज्ञान के साथ ही यह पाया कि, हेमंत अद्भुत उदीयमान चित्रकार हैं। इस क्षेत्र के डॉ. सुनीता वर्मा और अतुल पानसे जी से मेरी दुआ-सलाम है जिनके चित्रों को देखकर मार्डन पेंटिंस को बूझने का उदीम करते रहा हूँ। इस लिहाज से हेमंत के चित्रों से कविता फूटती है और रंगों से मधुर संगीत झरता है। यह आंखों से संगीत को अनुभव करना है।

29 September, 2017

नाचा का एक गम्मत : भकला के लगन

छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा में एक गम्मत खेला जाता है। इस गम्मत में नायक की शादी होने वाली रहती है, गांव का एक बुजुर्ग व्यक्ति उनके सामने बहुत सारी लड़कियों को लाकर एक-एक करके पूछता है।
सबसे पहले ब्राह्मण लड़की को सामने लाकर पूछता है कि इससे शादी करोगे? नायक कहता है, नही। इससे शादी करने के बाद दिन भर इसके पांव पड़ते-पड़ते मेरा माथा 'खिया' जाएगा। राजपूत लड़की के लिए कहता है कि, इससे शादी करने पर यह मुझे 'दबकार-दबकार के झोल्टु राम' बना देगी। इसी तरह अन्य समाज की लड़कियोँ को उनके जातिगत विद्रूपों को उधेड़ते हुए, नायक विवाह से इंकार कर देता है। अंत मे एक मैला ढोने वाली की बेटी को उसके सामने लाकर पूछा जाता है कि क्या इससे शादी करोगे?
नायक कहता है कि इसे पहले ही क्यूँ नही लाये, 'लउहे लगन धरावव' मैं इसी से शादी करूँगा। उससे पूछा जाता है कि ऐसी क्या खूबी है इसमें जो ब्राह्मण, ठाकुर जाति की आदि सुंदर लड़कियों को ठुकरा कर इस लड़की से शादी करना चाहते हो?
नायक कहता है क्योंकि यह लोगों को स्वच्छ रखने के लिए, दूसरों के घरों का मैला साफ करती है। 'रोग-राई' दूर करने वाली देवी है।
नायक के भोलेपन से बोले गए संवाद और स्वाभाविक इम्प्रोवाइजेशन से दर्शक हँसते-हँसते लोटपोट होते है। तीक्ष्ण व्यंग्य जाति-समाज में पैठे आडम्बर को परत दर परत उधेड़ता है। देखते ही देखते, गम्मत के क्लाइमेक्स में बावरा सा यह नायक इतना गंभीर संदेश संप्रेषित कर देता है।
हालांकि अब मैला ढोने की प्रथा समाप्त हो गई और बहुत हद तक जाति-पाति का भेद भी मिट गया। इसके बावजूद नाचा में ऐसे पारंपरिक गम्मत आज भी 'खेले' जाते हैं। नाचा के वर्तमान संदर्भों पर चर्चा करते हुए डॉ. परदेशीराम वर्मा कहते हैं कि पिछले सौ साल से छत्तीसगढ़ के लोक में, स्वच्छता अभियान का इस तरह से अलख जगाने का काम, यहां के लोक कलाकार करते रहे हैं। वे कहते हैं कि इस गम्मत को मोदी जी को दिखाना चाहिए।
- संजीव तिवारी

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