ब्लॉग छत्तीसगढ़

20 June, 2017

चांपा-जांजगीर साहित्य महोत्सव

         विनोद साव


राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, दिल्ली के संपादक ललित लालित्य ने कुछ महीनों पहले मुझसे छत्तीसगढ़ के कुछ साहित्यकारों के नाम पते पूछे थे. मैंने हर विधा के कुछ कुछ लेखक कवियों के नाम व संपर्क नंबर उन्हें दे दिए थे. इसका नतीजा दिखा चांपा-जांजगीर साहित्य महोत्सव में जिसका आयोजन वहां २३-२४  फ़रवरी को रखा गया था. दुर्ग से मैं और भिलाई से लोकबाबू दोनों ही कार्यक्रम में शामिल होने साथ ही निकल पड़े थे. रवि श्रीवास्तव और विद्या गुप्ता दूसरे दिन पहुंचे. शब्द के साथ इंटरनेट की चुनौतियों पर बोलने के लिए संजीव तिवारी पहले दिन के सत्र में शामिल हुए थे. कथाकार लोकबाबू के साथ यह पहली यात्रा थी. सीधे सपाट रास्ते पर वे टेढ़ी-मेढ़ी बातों से चुटकियाँ लेते रहे. हम आजाद हिन्द एक्सप्रेस में थे जो जांजगीर आने पर नहीं रूकती और दस कि.मी.बाद चांपा-जक्शन पर जाकर रूकी. हम ऑटो करके फिर पीछे की ओर जांजगीर आए. जांजगीर के स्टेशन का नाम नैला-जांजगीर है. चांपा-नैला-जांजगीर ये तीनों कस्बे मिलकर सड़क के किनारे किनारे एक लंबे फैले पसरे शहर में तब्दील हो गए हैं जिसका जिला मुख्यालय जांजगीर है. अपने पुरातात्विक महत्त्व के विष्णु मंदिर के लिए यह प्रसिद्द रहा है. यह नगर आज भी अपनी साहित्य साधना में मशगूल रहता है. यहां साहित्यिक आयोजन व सम्मान समारोह होते रहते हैं.  लगभग पांच छः बरस पहले मुझे भी यहां सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था तब मैंने समकालीन व्यंग्य पर अपनी बात कही थी.

हमें दीवान रिसॉर्ट पहुँचने के आदेश थे. हम शाम सात बजे पहुँच गए थे, रिसॉर्ट में सन्नाटा था. रिसेप्शन में बताया गया कि आज पहले दिन के सत्र में आमंत्रित साहित्यकार गए हुए हैं, बस आते ही होंगे. हम कमरे के भीतर आ गए थे और रेस्तरां को फोन कर गरमागरम पोहा खाने और काफी मंगाकर पीने लगे थे. थोड़ी ही देर में लेखकों का समूह आ पहुंचा और एक दूसरे के कमरे में मिलने बैठने का उत्साह उनमें दिखने लगा. छत्तीसगढ़ी व हिन्दी की लेखिका महासमुंद की प्रो.अनुसूईया अग्रवाल अपनी बिटिया के साथ दिखीं. उन्होंने आज लेखक से मिलिए कार्यक्रम में अपने टिप्स दिए. हमसे मिलने गीतकार नरेंद्र श्रीवास्तव और कवि विजय राठौर व कार्यक्रम संचालक सतीश सिंह आ गए थे. तीनों जाजंगीर के हैं. वे युवकों को साथ लेकर अपने नगर में साहित्यिक समरसता बनाए हुए हैं. शाम को मैं और लोकबाबू शहर की शाम देखने निकल पड़े थे फिर रात रेस्तरां में सभी साहित्यकार साथ खाते-पीते बतियाते हुए समय बिताए.

दूसरे दिन हम सुबह साढ़े पांच बजे उठकर ‘सुबह की हवा लाख रूपये की दवा’ खाने निकल पड़े थे. जब लौटकर रिसॉर्ट के पास ही यादव होटल में चाय पीने बैठे तब वहां नोएडा से पधारे दिविक रमेश, लखनऊ अट्टहास सम्मान समारोह के संयोजक अनूप श्रीवास्तव और आज के आयोजन के मुख्य सूत्रधार ललित किशोर मंडोरा (जिन्हें साहित्य जगत ललित लालित्य के नाम से जानता है) सभी बड़ी गर्मजोशी से मिले. ललित जी से बरसों पुराना परिचय है, वे बड़े हंसमुख और जिंदादिल इन्सान हैं. वे कविता और व्यंग्य लिखते हैं. यहां धमतरी की ड़ा.सरिता दोशी, माझी अनन्त, बेमेतरा के दिनेश गौतम और कवर्धा के नीरज मंजीत दिखे. सब चाय दूध पीते हुए मौज में थे. एक साहित्यिक पिकनिक का वातावरण बन गया था.

दूसरी सुबह हमने तैयार होकर आलू पराठे और दही का नाश्ता कर लिया और अपने अपने सत्र में भाग लेने के लिए निकल पड़े. दो दिवसीय चांपा-जांजगीर साहित्य महोत्सव ‘शील साहित्य परिषद’ के सभागार में था. यह नगर के साहित्य प्रेमियों के लिए बना एक सुविधायुक्त भवन है जिसमें लगभग सवा सौ लोग कुर्सियों पर बैठ सकते हैं. इतना तो छत्तीसगढ़ के दूसरे नगरों में दिखाई नहीं देता. आज तक दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति का अपना कोई भवन नहीं बन सका है और न आगे भी बनने के कोई आसार दिख रहे हैं.

यहां उपस्थित श्रोताओं के लिए भी चाय-नाश्ते व भोजन की व्यवस्था थी. आयोजक गण लोगों का हाथ पकड़कर उन्हें नाश्ते के लिए ले जा रहे थे. सभी मिर्च-टमाटर की चटनी के साथ ब्रेड-पकौड़ा खाने में भिड गए थे. आज तीन सत्र थे जिसमें सबसे पहले कहानी का पाठ किया जाना था फिर व्यंग्य सत्र और अंत में कविता सत्र था. निबंधकार विजय कुमार दुबे के स्वागत उदबोधन के बाद कहानी पाठ का आरम्भ जांजगीर की ही कहानीकार श्रद्धा थवाईत से हुआ फिर लोकबाबू ने कहानी पढ़ी. बिलासपुर के खुर्शीद हयात ने अपने उर्दू अफसाने को बड़ी उर्दू अदब के साथ पढ़ा. बिलासपुर से पधारे यायावर कथाकार सतीश जायसवाल ने अपनी एक लंबी कहानी पढ़ी जो यहां चर्चित हुई.

व्यंग्य पाठ सत्र में सबसे पहले बिलासपुर पत्रिका समाचार पत्र के संपादक युवा लेखक वरूण श्रीवास्तव सखाजी ने अपनी रचना का पाठ किया फिर भिलाई के रवि श्रीवास्तव ने और अंत में मैंने अपना व्यंग्य ‘मिलना नहीं मिलना केमेस्ट्री का’ पाठ किया जिसे तालियों की गडगडाहट के साथ सुना गया तब रचना पूरी होने के बाद संचालक महोदय ने मुझे मंच के बीच खड़ा करवाकर फिर श्रोताओं से तालियों से अभिवादन करवाया. दूसरे दिन जब हम सुबह घूमने निकले तब अख़बारों में से एक में यह समाचार देखा ‘जांजगीर में दो दिवसीय साहित्य महोत्सव संपन्न, कविता और कहानी का पाठ, व्यंग्य ने बांधा समा और दुर्ग से आए व्यंग्यकार विनोद साव ने अपने व्यंग्य पाठ से श्रोताओं को चकित कर दिया.’ समाचार पत्र में यह पढ़कर हम भी चकित हुए और मस्ती से भरे हुए सब नैला-जांजगीर स्टेशन की ओर दौड़ पड़े जहां हमें जनशताब्दी एक्सप्रेस पकड़कर अपने शहर लौटना था.


लेखक संपर्क मो. 9009884014 

02 June, 2017

जो जमीन सरकारी है वह जमीन हमारी है

छत्तीसगढ़ के किसी भी गांव में चले जाईये वहां आपको सरकारी जमीन में "अवैध कब्‍जा" नजर आयेगा। गांव की सरकारी जमीन जिसे आम बोलचाल की भाषा में 'घास जमीन' कहा जाता है उसके अधिकांश हिस्‍से को गांव के लोगों ने कब्जा किया है। वे उस पर "मालिकाना हक" की तरह कृषि कार्य कर रहे हैं, गांव में "निस्‍तार भूमि" की कमी हो गई है इससे उन्‍हें कोई मतलब नहीं है। गांव की सहज संरचना और पर्यावरणीय संतुलन इन सार्वजनिक/सरकारी भूमियों पर टिकी हुई थी जो अब समाप्‍त हो रही है।  
छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता में गांवों के समुचित निस्तार के लिए "दखल रहित भूमि" को, "निस्तार पत्रक" में अभिलिखित किए जाने का उल्लेख है। गांव में मनुष्य की निस्तारी के लिए भूमि की प्रतिशतता भी निश्चित की गई है कि कितने जमीन पर चारागाह होगा, कितने जमीन पर गौठान, कितने में मरघट आदि सार्वजनिक उपयोग के लिए खाली स्थान होगा। यह भी प्रावधान है कि जब गांव में इस निस्तारी की भूमि अधिक हो और गांव के भूमिहीन कृषकों को इसकी आवश्यकता हो, तो राजस्व अधिनियम के तहत विकास खंड अधिकारी के द्वारा उन निस्‍तार भूमियों को 'काबिल काश्त' घोषित कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया ग्राम पंचायत के सामान्य सभा में अनुमोदन के बाद तय किया जाता है कि सरकारी भूमि में जो व्यक्ति काबिज हैं उन्हें काश्तकार घोषित कर दिया जाए, "काबिल कास्त" शब्द का भावार्थ भी यही है।
मुस्लिम शासकों के द्वारा राजस्व भूमियों के प्रबंधन के लिए बनाए गए कानूनों का पालन आज तक हो रहा है। पूरे देश की राजस्व संहिता मुस्लिम शासकों के द्वारा बनाए गए नियम और पद्धतियों पर आधारित है। आप राजस्व अधिनियम में ज्यादातर उर्दू और फारसी के शब्द प्रयोग को स्‍पष्‍ट देख सकते हैं। नक्शा, खसरा, खतौनी, काबिल कास्त जैसे शब्द उर्दू और फारसी से ही आए हैं। गांव की भूमि के बेहतर प्रबंधन के लिए जो रजिस्टर संधारित किए जाते हैं वह भी मुस्लिम शासकों के समय से संधारित किए जा रहे हैं। ऐसा ही एक रजिस्टर है जिसे "वाजिब-उल-अर्ज" कहा जाता है, इसमें उन भूमियों की प्रविष्टि होती है जो गांव के निस्तारी के लिए आवश्यक होते हैं और जिनका मालिकाना हक राज्य शासन पर निहित होता है। इसमें दर्ज भूमि पर यदि किसी व्‍यक्ति के द्वारा अवैध कब्‍जा भी किया जाता है तो उसकी प्रवृष्टि की जाती है एवं उसे बेदखल किया जाता है। 
जन हित में, ऐसे अवैध कब्जाधारियों को समय-समय पर मालिकाना हक प्रदान किए जाने का प्रावधान भी है। राज्य में जनसंख्या की वृद्धि पर आवास की आवश्यकता एवं जनता को जीवन जीने के लिए रोजगार के साधन मुहैया कराने के उद्देश्य से कृषि भूमि उपलब्ध किए जाते रहे हैं। वनाच्छादित क्षेत्रों में भी वनभूमियों के पट्टे अवैध कब्जा धारियों को समय समय पर मालिकाना हक प्रदान किया जाता है। ऐसे राजस्व भूमि, दखल रहित भूमि (विशेष उपबन्ध) अधिनियम 1970, छत्तीसगढ़ भू राजस्व संहिता 1959 के सरकारी पट्टा संबंधी धारा 181 और कुछ अन्य नियम/अधिनियमो के तहत व्यक्तियों को दी जाती है। यह परंपरा बाद में चारागान भूमि के रूप में भी विकसित हुआ। 
बीच के वर्षों में ऐसी भूमि जो गांव की निस्तारी भूमि है और वाजिब-उल-अर्ज में दर्ज है ऐसी भूमि यदि प्रतिशतता के आधार पर अधिक है तब गांव में ग्राम पंचायत की सहमति से जितनी भूमि अधिक है उस भूमि को गांव के ही कुछ भूमिहीन व्यक्तियों के द्वारा संयुक्त रुप से अपने नाम पर चढ़ाने का अनुरोध पंचायत से किया जाता था एवं पंचायत के द्वारा ऐसे व्यक्तियों या समूहों के नाम उक्त अतिरिक्त भूमि को प्रदान किये जाने की अनुशंषा की जाती थी फलस्‍वरूप उन्‍हें यह भूमि, भूमि स्‍वामी हक के रूप में प्राप्‍त हो जाता था। वे उसमें सामूहिक काश्तकारी या गांव के पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करते थे, ऐसी भूमियों को चारागान/चारागाह भूमि कहा जाने लगा।
राजस्व अधिनियम के तहत ऐसे भूमि स्वामियों को भी भूमि स्वामी माना गया। बीच के वर्षों में ऐसे सामूहिक हित के लिए आरक्षित की गई भूमि को उन तथाकथित भूमि स्वामियों के द्वारा, जो वास्तव में उक्त भूमि के ट्रस्टी थे ना कि मालिक,  उसे बेचा जाने लगा। ऐसा ही एक मामला रायपुर के महादेव घाट में बने हनुमान मंदिर का भी है। ऐसे वाकयों की अधिकता होने से सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया और अपने आदेशों में यह स्पष्ट किया कि गांव में पशुओं के लिए आरक्षित इन चारागान भूमियों का व्ययन नहीं किया जा  सकता। इसके लिए सभी जिला कलेक्टरों को निर्देशित भी किया गया कि इस भूमि में का विक्रय न किया जाने एवं इस भूमि का उपयोग इसके मूल उद्देश्य पशुओं के हित संबंधी ही किया जाए।
वर्तमान पर्यावरणीय संकट के कारण सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश सराहनीय है किंतु इसके बाद भी चारागाह भूमियों पर किसानों का कब्जा लगातार बना रहा। इस संबंध में गांव में कहा जाता है कि जहां भी लोगों को पता चलता कि फलां गांव में सरकारी भूमि है तो वहां 'लाल झंडा' गड़ जाता है। इस लाल झंडे का मतलब यह कि, उस भूमि के लिए लोग मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। कुछ उदाहरणों में तो यह भी देखने में आता है कि, सरकारी भूमि में कब्जा करने के लिए लोग अपने निजी भूमि भी बेच कर सरकारी भूमि की ओर आकर्षित हो जाते हैं। कई लोगों के द्वारा अपनी जीवन भर की कमाई पूंजी बेचकर सरकारी भूमि पर कब्जा किया जाता है। ऐसी स्थिति में यदि सरकार उनको वहां से बेदखल करती है तो उनके सामने जीने मरने की समस्या आन पड़ती है। यद्यपि यह वैधानिक प्रक्रिया है किंतु जनता के प्रति राज्य का दायित्व है कि वह उसके आवास एवं जीवन यापन का बेहतर अवसर मुहैया कराए।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रत्येक गांव में दो-चार प्रतिशत ही सरकारी भूमि बच्ची होगी बाकी सब निजी कब्‍जे में है। राजस्व अभिलेखों में इस अवैध कब्‍जे का उल्लेख नहीं है, क्‍योंकि पटवारी बेवजह के झंझट मोल ना लेने के कारण अपने दस्तावेजों में ऐसे अवैध कब्जाधारी किसानों के नाम का उल्लेख नहीं करते फलत: राजस्व अभिलेखों में सरकारी भूमि खाली या पड़त नजर आती है। जबकि इसके उलट पूरे छत्तीसगढ़ में गांव की निस्‍तारी भूमि पर अवैध कब्‍जे हैं। इसके लिए सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए, पटवारी और राजस्व निरीक्षकों को कड़े निर्देश देना चाहिए कि, सरकारी भूमि, सार्वजनिक चारागाह या निस्तार की भूमि पर किसका कब्जा है इसका वाजिब दस्तावेज बनाया जाए। 
-संजीव तिवारी

Popular Posts