ब्लॉग छत्तीसगढ़

08 May, 2018

छत्तीसगढ़ में अस्मितावादी लेखन - विनोद साव

विचार गोष्ठी में बाएं से मुख्य वक्ता विनोद साव, डा.जे.आर.सोनी, बी.एल.ठाकुर, मुख्य अतिथि डा.संजय अलंग(IAS), दिनेंद्र दास, छत्तीसगढ़ी वंशी असम निवासी शंकरचंद्र साहू, परदेशीराम वर्मा, अशेश्वर वर्मा.
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर ‘अगासदिया’ भिलाई में ‘छत्तीसगढ़ में अस्मितावादी लेखन पर’ विचार गोष्ठी संपन्न हुई. बुद्ध ने कहा था कि ‘परम्पराओं को इसलिए मत मानो कि इसे मैं मानता हूं या हमारे पूर्वज मानते थे. बरसों पुरानी परंपराओं को अपनाने से पहले यह देख लो कि यह आज भी अपनाने योग्य है या नहीं?.’ जाहिर है बुद्ध का यह कथन परंपराओं और रीति-रिवाजों पर लकीर के फ़कीर बने रहने से समाज को सावधान करना था.  इन परम्पराओं में हमारी अस्मिता निहित होती है. इस अस्मिता की रक्षा को लेकर भी न केवल सामान्यजनों में बल्कि लेखक बुद्धिजीवियों के बीच भी बहस हो जाती है.
हम अपनी अस्मिता को भिन्न माध्यम से तलाशते हैं: इसमें हमारी जातीय स्मृतियों, लोक-गाथाओं, मिथकों, पौराणिक चरित्रों कथाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. ये काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक लगती हैं. योग शास्त्र के अनुसार यह पाँच क्लेशों में से एक है. राग, द्वेष की तरह मन का यह भाव या मनोवृत्ति कि ‘मेरी एक पृथक् और विशिष्ट सत्ता है’.. और यही इसकी सीमा है. कभी अस्मिता रक्षा की भावना इतनी आवेग युक्त हो जाती है कि यह पृथकतावादी आन्दोलन की ओर रूख कर जाती है. यह किसी क्षेत्रीय और साम्प्रदायिक मांग की तरह अपनी अलग ‘टेरिटरी’(भू-भाग) की मांग करने लग जाती है.
बहरहाल छत्तीसगढ़ में अपनी अस्मिता के लिए आवाज़ दीगर राज्यों की तरह उग्र और आक्रामक नहीं रही है. यह छत्तीसगढ़ के रहवासियों की तरह सहृदयता पूर्ण है जिसमें उसके निजपन के आनंदमय संसार की चाहत है जिसमें वह सदा मगनमय होता आया है. छत्तीसगढ़ की अस्मिता की पहचान उसके लोकतत्व के रचे बसे संसार में है जहां से वह अपने जीवन के लिए अतिरिक्त उत्साह और उर्जा प्राप्त करता रहता है. इन्हीं लोकतत्वों की उपज है तीजनबाई, देवदास, सूरजबाई खांडे, रामचंद देशमुख – ये छत्तीसगढ़ी संस्कृति के ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं.
डा.हीरालाल शुक्ल, डा.रमाकांत श्रीवास्तव जैसे अनेक आलोचकों के अनुसार यह माना जाता है कि १५ वीं सदी में खैरागढ़ के राजाश्रित कवि दलपत साय ने अपने संरक्षक लक्ष्मीनिधि राय जो उस समय खोलवा के जमींदार थे - को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ को एक पृथक ईकाई माना था. दलपत साय ने भरी सभा में हुंकारते हुए कहा था कि
‘लक्ष्मीनिधिराय सुनो चित्त दै, गढ़ छत्तीस में न गढैया रही
मरदुमी रही नहि मरदन में, फेर हिम्मत से न लड़ैया रही
भयभाव भरे सब कांप रहे, भय है नहि जाय डरैया रही
दलराम भने सरकार सुनो, नृप कोउ न ढाल अडैया रही‘
इस हुंकार की परिणति चार सौ साल बाद छत्तीसगढ़ राज्य के पृथक अस्तित्व में आने पर हुई.  इन पंक्तियों से यह भी स्पष्ट होता है कि ‘छत्तीसगढ़’ जैसे अंचल का एक चित्र मानस पटल पर उभरने लगा था. छत्तीसगढ़ शब्द का प्रयोग दूसरी बार रतनपुर के कवि गोपाल मिश्र ने अपने काव्य ‘खूब तमाशा’ में सन १६८० में किया.. तब यह क्षेत्र दक्षिण कोसल कहलाता था. ‘छत्तीसगढ़ी’ संज्ञा अस्तित्व में कब आई इस पर इतिहासकार डा.संजय अलंग जैसे प्रबुद्धजन चर्चा करते रहे हैं. उनकी किताब ‘कोसल से छतीसगढ़ तक’में छत्तीस’ क्या है ‘गढ़’ क्या है?‘ इसका पुराना नाम ‘कोसल’ क्यों प्रचलित नहीं हो पाया है क्यों नहीं अपनाया गया. छत्तीसगढ़ का वर्तमान स्वरुप कैसे विकसित हुआ. इन सभी प्रश्नों पर सामूहिक चर्चा वे निरंतर कर रहे हैं.
यहां कुछ उन लेखकों के संदर्भ में बातें की जा सकती हैं जिन्होंने विगत दशकों में इतिहास, कविता और गद्य लेखन के प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करवाई हैं. इनमें हैं हरि ठाकुर, लक्षमण मस्तुरिया और परदेशीराम वर्मा. इन तीनों रचनाकारों ने हिन्दी छत्तीसगढ़ी दोनों में लेखन किया है. हरि ठाकुर जब बोलते थे तब बहुधा इन पंक्तियों से आरम्भ करते थे कि ‘छत्तीसगढ़ की भाषा संस्कृति के प्रति मुझे बड़ा मोह है.’  परदेशी राम वर्मा ने लिखा है कि ‘छत्तीसगढ़ को जानना है तो हरि ठाकुर को पढ़ो.’ छत्तीसगढ़ की गाथा, जल, जंगल और ज़मीन के संघर्ष की शुरूआत, छत्तीसगढ़ का प्रांरभिक इतिहास और सांस्कृतिक विकास, कोसल की भाषा कोसली जैसे नामों से हरि ठाकुर की दर्ज़नों कृतियाँ हैं जिनमें छत्तीसगढ़ का वे तुलनात्मक रूप से अधिक प्रामाणिक इतिहास परोसते हैं. राष्ट्र स्तर पर होने वाले महाविद्रोह में छत्तीसगढ़ के राजाओं और जमीदारों ने भी हिस्सा लिया था. इस राष्ट्रीय अस्मिता को वे रेखांकित करते हैं :
‘छत्तीसगढ़ भी ठोंकिस ताल, अठरा सौ सन्तावन साल।
गरजिस वीर नारायण सिंह, मेटिस सबे फिरंगी चिन्ह।‘  
छत्तीसगढ़ के पहले क्रांतिकारी शहीद वीर नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने पम्फलेट छपाकर ‘लाल जोहार किया है’
परदेशीराम वर्मा ने हिन्दी छत्तीसगढ़ी में आपने विपुल गद्य लेखन से इस अस्मिता की आवाज़ में ऐसा चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न किया कि उनके अनेक समकालीन व परवर्ती लेखक उनका अनुसरण करने लग गए. उन्होंने अपनी कहानियों में छत्तीसगढ़ी लोक-मान्यता से ओतप्रोत परिवेश बुनकर, पात्र व चरित्र खड़े कर, हिन्दी कथाओं में आंचलिक बोली व उनके हाने-मुहावरों का जमकर प्रयोग कर अपनी रचनाओं को और भी संप्रेषणीय बना लिया है.
इनमें लक्ष्मण मस्तुरिया ने जितना लेखन किया उससे ज्यादा अपने गीतों की मंचों पर प्रभावी प्रस्तुति से अपने अस्मितापूर्ण लेखन का अलग प्रभाव उन्होंने जना है और वे लगभग असम के भूपेन हज़ारिका की तरह छत्तीसगढ़ के जनमानस में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले कवि गीतकार हो गए. उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में छंद के स्तर पर भी प्रयोग किए हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहां असम ने अपने सृजनकार भूपेन हजारिका को पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कारों तक पहुँचाया वहीं लक्ष्मण मस्तुरिया की यहां के शासन-प्रशासन और यहां की जनता ने कितनी सुधि ली है इसकी भनक लोगों को नहीं हो पायी, न ही उन्हें किसी पुरस्कार अलंकरण से कभी नवाज़ा गया.

 -  विनोद साव


20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जनमे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व विभाग में सहायक प्रबंधक हैं। fहंदी व्यंग्य के सुस्थापित लेखक विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, अक्षरपर्व, वसुधा, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं। उनके दो उपन्यास, तीन व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों व कहानियों के संग्रह सहित अब तक कुल बारह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल के लिए भी चित्र-कथाएं उन्होंने लिखी हैं। वे उपन्यास के लिए डाॅ. नामवरfसंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी सम्मानित हुए हैं। उनका पता है: मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001 मो.9301148626 ई-मेलः vinod.sao1955@gmail.com

07 May, 2018

यशश्वी गीतकार संत की कृति मउँहा झरे

"26 जनवरी 2014 को राजपथ नई दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस के मुख्य समारोह में जब मउँहा झरे रे.. मउँहा झरे रे.. गीत की पंक्तियां गूंजी और इस छत्तीसगढ़ी लोकगीत पर जब असम के कलाकारों ने भाव नृत्य कर वहां उपस्थित हजारों दर्शकों की तालियां बटोरी तो नि:संदेह हर छत्तीसगढ़िया का सीना चौड़ा हो गया। लोगों के मन में जिज्ञासा थी कि इस गीत के रचनाकार कौन हैं?.. और जब लोगों को पता चला कि इस गीत के रचयिता संस्कारधानी राजनांदगांव के श्री हर्ष कुमार बिंदु है तो लोग चौंक उठे।" किताब के शुरुआती पन्नो में 'लोकगीतों का अविराम यात्री..' में इस किताब के सर्जक से हम सब का परिचय कराते हुए मउँहा झरे किताब के प्रेरक भाई वीरेंद्र बहादुर सिंह की कलम से ऐसा लिखा हुआ पढ़ा तो यकबक मुझे भी विश्वास नहीं हुआ। मैं अब तक इस गीत को पारंपरिक लोकगीत समझ रहा था और संग्रह मेरे हाथ मे होने के बावजूद शीर्षक को लोक प्रतीक के रूप में कवि के द्वारा उपयोग किया हुआ मान रहा था। हर्ष हुआ कि, हर्ष कुमार बिंदु जी की किताब मउँहा झरे मेरे हाथ में है। 
इस किताब में अपने परिवेश से पाठकों को परिचित कराते हुए अपने लेखकीय में स्वयं हर्ष कुमार बिंदु ने लिखा कि छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी राजनांदगांव कला, साहित्य और संगीत की त्रिवेणी है। वे उसी संस्कारधानी के निवासी हैं और उसी संस्कारधानी से यह किताब प्रकाशित हुई है। वे आगे लिखते हैं कि पारंपरिक देवी जस गीत का संस्कार इन्हें अपने पिता बंशीलाल गढ़वाल से प्राप्त हुआ। छत्तीसगढ़ी जस गीतों के वर्तमान स्वरूप और इसके विकास को भी इसमें इन्होंने चित्रित किया है। साथ ही अपनी रचना एवं संगीत यात्रा को भी इस में रेखांकित किया है। इन्होंने छत्तीसगढ़ी देवी जस गीत के प्रथम रचनाकार खैरागढ़ रियासत के राजा कमल नारायण सिंह को बताया है। 
बिंदु जी ने चंदैनी गोंदा, अनुराग धारा, स्वर धारा जैसे सुप्रसिद्ध कलामंचों के साथ भी काम किया है। इनके द्वारा लिखी गई माता पाताल भैरवी की आरती नित्यप्रति राजनांदगांव के पताल भैरवी मंदिर में गायी जाती है। इनके लिखे गीतों के कई कैसेट भी जारी हो चुके हैं। जिनमें मां पाताल भैरवी महिमा एवं नई माने काली कैसेट प्रमुख हैं। जिसे कविता वासनिक एवं लाली ठाकुर आदि ने स्वर दिया है। जस गीत के साथ ही इन्होंने छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक गीतों का भी सृजन किया है जिसे ख्यात गायकों ने स्वर दिया स्वर दिया है। 
प्रस्तुत पुस्तक मउँहा झरे बिंदु जी की ऐसे ही रचनाओं का संकलन है। जो यत्र-तत्र बिखरी हुई थी किंतु प्रकाशित नहीं हुई थी। इन्हें संकलित कर प्रकाशित कराने के संबंध में उन्होंने सोचा भी नहीं था। बेहद संकोची एवं अल्पभाषी बिंदु जी ने इसके लिए सही मायनों में कोई प्रयास ही नहीं किया था। व्‍याख्‍याता एवं कलानाट्य धर्मी मुन्‍ना बाबू एवं सवेरा संकेत के वरिष्ठ सह-संपादक और लोक समीक्षक ठाकुर वीरेंद्र बहादुर सिंह की प्रेरणा से यह संकलन तैयार हो पाया। वीरेंद्र भाई और मुन्‍ना बाबू के उदीम से ही बिंदु जी के इन उत्कृष्ट गीतों से हमारा साक्षात्कार हो पाया। वीरेंद्र भाई ने इसी किताब में राजनांदगांव की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए लिखा भी कि 'संस्कारधानी के रचना कर्म करने वाली साहित्य एवं संगीत की नई पीढ़ी हमेशा अपना बेहतर ही देने का प्रयास करती है।' ..और उन्होंने इस बेहतर रचना को बेहतरीन ढंग से हमे दिया।
डॉ पीसी लाल यादव ने इस किताब की भूमिका में अनेक उदाहरणों के साथ, इस कृति का समीक्षात्मक विवेचन किया है। डॉ यादव इस कृति की उपयोगिता को बहुत सरल शब्दों में स्पष्ट करते हुए लिखते है कि "मउँहा झरे लोक जीवन के ऐना ये, लोक परंपरा के गुरतुर बैना ये। ये मा जिंदगी के मरम, दया-धरम, करमइता के पोठ करम सबो के सुघरई  समाये हे।" और यह भी "मोला भरपूर विश्वास हे जेन गीत जन-जन के कंठ म बसे हे ओ गीत मन ल पाठक किताब के रूप म पढ़ के अउ आनंदित होही।"
इस संग्रह में 110 गीत संग्रहित हैं, जो लोक छंद में छत्तीसगढ़ी के सांस्कृतिक पहलुओं को उद्घाटित करते हैं। इसमें छत्तीसगढ़ी फिल्म बीए फस्ट ईयर ईयर के गीत- आ जाना तै मोला झन तरसा ना रे, सब झन कहिथें तोला कतको हे तोरे सही,  नइ माने रे मन गोरिया, मोरे मन के सजनी तै, सन सनासन सनन सनन पवन चले, खनके रे कंगना, बेरा पहाति अंगना मा मोरे, छम छम पैजन बाजे, आदि के साथ ही अन्य गीत संग्रहित हैं। जिनमें जस गीतों की संख्‍या ज्‍यादा है। छत्‍तीसगढ़ में जस गीत गायन की परम्‍परा बहुत पुरानी है। जस गीत गीतों में लोक में प्रचलित आराध्य के आख्यानों का संदर्भ होता है जो हमें रोमांचित करता है। इसी रोमांच को पकड़ते हुए बिन्‍दु जी लोक भाषा में लोक के मन की बात कहते हुए प्रेम गीत, करमा, व्यंग गीत, खेल गीत, काया खंडी भजन, सुवा गीत, पंथी गीत,  होली गीत और जस गीत तक अपनी लेखनी को विस्तार देते हैं। जो अभिजात्य के बंधनों को तोड़कर नाचने को विवश करते हैं। शायद इसीलिए इन लोक गीतों के साहित्यिक स्‍थापना पर अपनी टिप्पणी देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ जीवन यदु ने लिखा कि "मेरा मानना है कि बिंदु जी का उद्देश्य साहित्य सृजन ना होकर लोग रंजन का सृजन करना है। लोकरंजन भी बहुमूल्य है इसे हमें बिसराना नहीं चाहिए।" हर्ष कुमार बिंदु ऐसे ही लोकरंजनी रचनाओं के लोकप्रिय रचनाकार हैं। जिनके अनेक गीत ऑडियो कैसेट के माध्यम से लोककंठ में तरंगित हैं। आप सब जानते हैं कि इस किताब के शीर्षक गीत 'मउँहा झरे' को तो व्यापक लोकप्रियता प्राप्त हुई है और यह गीत छत्तीसगढ़ के आंगन से देश विदेश में लोकप्रिय हो गया है। कवि को इससे बड़ा रिवार्ड और क्या चाहिए।

मउँहा झरे का विमोचन डॉ.रमन सिंह के द्वारा पिछले वर्ष किया गया था। इस किताब को बैगा ग्रुप राजनांदगांव नें प्रकाशित करवाया है। किताब का मूल्‍य 150 रू. है। इसकी प्रति के लिए आप श्री हर्ष कुमार बिन्‍दु मो. 9589039768, राजनांदगांव से संपर्क कर सकते हैं।
- संजीव तिवारी
#Mahuaa Jhare Re Mahuaa Jhare, #महुआ झरे रे महुआ झरे

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"26 जनवरी 2014 को राजपथ नई दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस के मुख्य समारोह में जब मउँहा झरे रे.. मउँहा झरे रे.. गीत की पंक्तियां गूंजी ...