ब्लॉग छत्तीसगढ़

26 February, 2017

भाषा का प्रचार : प्रचार की भाषा

इसाई समुदाय सदियों से से क्षेत्रीय भाषाओं में अपने ईश्वर का संदेश प्रसारित प्रचारित करते रहा है। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के दस्तावेजीकरण के लिए आरंभिक रूप से जो प्रयास हुए वह मिशनरीज लोगों के द्वारा ही किए गए। चाहे वह छत्तीसगढ़ी भाषा के व्याकरण की बात हो या छत्तीसगढ़ी के शब्दकोश के प्रकाशन की बात हो या संग्रहण की बात हो। आज भी इन्होंने क्षेत्रीय भाषाओँ को अपने प्रचार का माध्यम बनाया हुआ है। नीचे दिए गए वेब साईट में कुछ वीडियो है जिसे देखें। यहाँ प्रचार उद्बोधन को इन्होंने छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर प्रस्तुत किया है। भाषा का प्रवाह, प्रस्तुतीकरण के साथ ही स्तरीय है जो शहरी छत्तीसगढ़ी का रूप है। निश्चित तौर पर इसका भावानुवाद किसी छत्तीसगढ़ी के जानकर ने (बिना डमडमा बजाये) किया होगा। यहाँ भाषा के प्रति इनका लगाव और मातृभाषी लोगों का अपनी भाषा के प्रति लगाव (प्रेम) में अंतर जरूर होगा। अपने ईश्वर और धर्म के प्रचार का इनका यह निजी मामला है किन्तु भाषा के प्रति इनकी रूचि स्तुत्य है। फेसबुक-व्हॉट्स एप के ज़माने में हम छत्तीसगढ़ी के प्रति अपने समर्पण और भक्ति का जम कर डमडमा बजाते है, प्रतिफल की अपेक्षा रखते हैं। वैसेइच समय में विश्व पटल पर छत्तीसगढ़ी को 'कलेचुप' झंकृत होते देख कर अच्छा लगा। © संजीव तिवारी https://tv.joycemeyer.org/chhattisgarhi/#

1 comment:

  1. "अहं ब्रह्मास्मि!" के पैमाने पर चलते हुए हमने यह जाना है कि कोई क्या कर रहा है ? इस पर ध्यान देने के पहले हम यह सोचते हैं कि हमें क्या करना है ।
    " अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।
    उदार - चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥"

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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