ब्लॉग छत्तीसगढ़

08 February, 2017

आधुनिकता बोध या पतनशील लोक


एक जमाना था जब मोटियारी टूरी-टूरा मिथलेश साहू और ममता चंद्राकर के गाये ' मोर चढ़ती जवानी के दिन हो चिरईया ल के गोंटी मारंव' गाते थे। गांव के समरस से जब उकता जाते थे तो संत मसीदास के लिखे और शेख हुसैन के गाये 'गजब दिन होगे राजा तोर संग म नई देखेंव खल्‍लारी मेला ओ' भी गाने लगते थे। अइसई दिनों में टूरा लोग अपनी प्रेमिका को सइकिल म चढा के मेला-ठेला ले भी जाते थे। मेला-मड़ई में अकेली मोटियारी अनुराग ठाकुर के पान ठेला वाला के घूर-घूर निहारई को गुनगुनाती भी थी। उन दिनों अक्‍सर प्रेम म पड़ी टूरी लक्ष्‍मण मस्‍तूरिया के लिखे और संगीता चौबे के गाये गीत 'काबर समाये मोर बैरी नैना मा' गाना पसंद करती थी। टूरा लोग भी जादा से जादा पंचराम मिर्झा और कुलवंतिन बाई या फिर बैतल राम साहू के कुछ कड़कते-फड़कते गीत गाकर मर्यादा की सीमा बरकरार रखने का उदीम करते रहते थे।

अब मीर अली मीर के 'नंदा जाही का रे' का जमाना है उनकी इस जायज चिंता के साथ ही लोक गायक और कवि छत्‍तीसगढ़ के आज को लिख रहे हैं। लोक गायक भी समय को गीतों में पिरो कर बाजार में परोस रहे हैं। समाज का बाजार है या बाजार का समाज कुछ समझ में नहीं आ रहा है। अभी बाजार से गुजरते हुए सरलग दो छत्‍तीसगढ़ी गीत सुनकर आगे बढ़ा हूं, झका-झक अंदाज में आधुनिकता बोध। गीत के शब्‍दों और भावों को पकड़ने का उदीम कर रहा हूं, एक गीत में टूरा कह रहा है टूरी से कि मैं तुम्‍हें फोन करूंगा एयरटेल नोकिया मोबाईल से। नोकिया को बाजार से गए जादा दिन नहीं हुए है यानी समय वर्तमान ही है। टूरा यह भी कह रहा है कि मन भर के मजा करेंगें पलंग या खटिये में, हीरो होंडा म बैठ के नंदन वन जाने को तैयार हैं फिर रात के बीत जाने तक मजा उड़ाने का वादा भी है। और भी बहुत कुछ खुल कर है उस गीत में, सबके लिए टूरी की स्‍वीकारोक्ति है वह दुहरा रही है। दूसरे गीत में फुल्‍ल आधुनिकता बोध यानी सुन्‍दरानी इफेक्‍ट है मुखड़े में ही टूरा टूरी से कह रहा है तेरी गोरी बदन को चूम-चूम के चांटूंगा। टूरी भी मस्तियाते हुए कह रही है मेरी गोरी बदन को चूम-चूम के चांट लेना रे। ये पतनशील गीत अगले पचास साल बाद सर्च और डाउनलोड किए जायेंगें नंदाये लोक गीतों की तरह। बहरहाल.. मैं आगे बढ़ गया हूं मुझे नारी अस्मिता की कुछ किताबें खरीदनी है।
- संजीव तिवारी

3 comments:

  1. फ़ॉन्ट तो अलग और अच्छा दिख रहा है परंतु यह स्पीड रीडिंग में व्यवधान पैदा कर रहा है. कोई आसान दिखने वाला फ़ॉन्ट लगाएँ.

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’बाबा आम्टे को याद करते हुए - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. जन - जन के विचार हर कहूँ भी देश अउ प्रदेश के स्तर ल बताथे ग । मनखे के सोच - विचार हर वोला छोटे अउ बडे बनाथे, सञ्जीव !

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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