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09 January, 2017

जनजातियों को मुख्यधारा में नहीं उन्हें मुख्यधारा मानकर हो विकासः प्रो. शुक्ल

राजिम दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
संगोष्ठी में 200 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत, विदेश से भी आया शोध पत्र

रायपुर-  राजिम के राजीव लोचन शासकीय महाविद्यालय में लोक साहित्य में जनजातीय संस्कृति व परंपरा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन 7 जनवरी को हो गया। समापन मौके पर बतौर मुख्य अतिथि सासंद चंदूलाल साहू, अध्यक्षता छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष विनय कुमार पाठक, विशिष्ठ अतिथि प्राचार्या डॉ. आभा तिवारी और मुख्य वक्ता प्रोफेसर वीरेन्द्र मोहन शुक्ल रहें। 
समापन मौके पर सांसद चंदूलाल साहू ने कहा कि राजिम संस्कृति संगम की नगरी है। छत्तीसगढ़ के भीतर संस्कृति और परंपरा की आदिम इतिहास है। प्रदेश की जनजातियों के विकास के लिए सरकार बेहतर काम कर रही है। ये सच है कि उनके संस्कृति और परंपरा को बचाने निरंतर शोध होते रहना चाहिए साथ विकास के नाम पर उनकी संस्कृतियों को हनन ना हो यह भी देखना जरूरी है। वहीं अध्यक्षता कर रहे डॉ. विनय कुमार पाठक ने कहा कि लोक साहित्य में छत्तीसगढ़ का कोई तोड़ नहीं है। यहां कि वाचन परंपरा बहुत ही प्राचीन है। जनजातियों की संस्कृति और परंपरा में साहित्य के रस मिलते हैं। भले ही वह मौखिक तौर है। जरूरत है कि हमें इसे सहेजने की। लोक साहित्य में जनजातियों की संस्कृति और परंपरा पर अभी बहुत काम होना बाकी है। 
महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. आभा तिवारी ने कहा कि हमारी संस्कृति का आधार लोक ही है। आदिम सभ्यता से ही जनजातीय संस्कृति परंपरा में देखने को मिलता है। लोक संस्कृति उन्नत होगी तो लोक मजबूत होगा। अपनी लोक संस्कृति के लिए देश ही नहीं विदेश में रहने वाले लोग भी चिंतित है। लोक संस्कृति को समझने के लिये लोक समाज से जुड़ना होगा। 
बतौर मुख्य वक्ताप हरि सिंह गौर केंद्रीय वि.वि. के प्रोफेसर डॉ वीरेंद्र मोहन शुक्ल ने कहा कि भारत में हर 7वां आदमी आदिवासी और जनजातीय है। आर्यो के आने के पहले भी जो भी सभ्यता थी भारत की थी वो मूलनिवासी आदिवासियों की थी और बहुत विकसित थी। विकास के नाम , उन्नति के नाम पर , जंगल के नाम पर जनजातीय संस्कृति का विनास हुआ है। लुप्त होती जनजातियों को बचाना ही लोक साहित्य को बचाना होगा। औद्योगिक घरानों से जनजातीय संस्कृति को नुकसान हुआ है। जनजातियों को मुख्यधारा में नहीं बल्कि उन्हें मुख्यधारा मानकर विकास करना होगा। 
वहीं आयोजन के पहले दिन संगोष्ठी का शुभारंभ केरल से आए कालीकट विवि के प्रोफेसर बतौर मुख्य अतिथि डॉ आर सुरेन्द्रन ने किया था।  प्रो. आर. सुरेन्द्रन ने कहा कि लोक भाषा है तभी साहित्य। और लोक संस्कृति में ही साहित्य परंपरा निहित है। छत्तीसगढ़ पदुमपुन्नालाल बख्शी, गजानंद माधव मुक्तिबोध, मुकुटधर पाण्डेय, और माधव सप्रे जैसे हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों की भूमि है। ऐसे भूमि में आना मेरे लिए गौरव की बात है। हम जनजतीय संस्कृति से सीखते है वो हमसे नहीं। उनके संस्कृति और परंपरा को दूर कर हम उन्हें आधुनिक नहीं बना सकते। लोक साहित्य का विकास जनजातीय संस्कृति परंपरा से ही है। 
संगोष्ठी को प्रो. अल्का श्रीवास्ताव, डॉ. रीता यादव सहित अन्य कई विद्धानों ने भी संबोधित किया। संगोष्ठी में विभिन्न कॉलेज से आए 200 से अधिक प्रोफेसर और शोधार्थी छात्र-छात्राओं ने शोध पत्र प्रस्तुत किया। खास बात ये कि विदेशों से भी शोध पत्र संगोष्ठी में आये। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर जी.पी. यदु और आभार गोवर्धन यदु ने किया।

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