ब्लॉग छत्तीसगढ़

07 September, 2011

काश्मीर- जलते स्वर्ग की कथा

अगर फिरदौस बर रूये जमी अस्त। 
हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त।। 

ये लाईने शाहजहाँ द्वारा निर्मित दिल्ली के लाल किले के दीवाने खास में लिखी है। जिसे अक्सर काश्मीर के साथ जोड़ दिया जाता है। शाहजहाँ को जन्नत धरती पर उतार लाने की बड़ी ख्वाईश थी। और ताउम्र उसने पूरी लगन से इस पर काम भी किया। उसके द्वारा निर्मित सबसे महत्वपूर्ण ईमारत ताज महल का नक्शा भी हू-ब-हू जन्नत के नक्शे से मिलता है पर जन्नत नैसर्गिक रूप से धरती पर कहीं उतरी है तो वह जगह काश्मीर ही है। किन्तु पिछले साठ सालों में वहां पसरे आतंकवाद ने इस स्वर्ग सी भूमि को जलते नर्क में बदल दिया है। 

जम्मू और काश्मीर के बारे में आगे बढ़ने से पहले इसका आप से परिचय कराते चलें। मूल जम्मू और काश्मीर रियासत को भौगोलिक व सांस्कृतिक रूप से चार भागों में बांटा जा सकता है- बाल्टिस्तान, काश्मीर घाटी, लद्दाख और जम्मू। ये सभी क्षेत्र सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। बाल्टिस्तान-गिलगित व भारतीय कारगिल का क्षेत्र न सिर्फ शिया बाहुल्य है वरन् सामाजिक-नृतत्वशास्त्रीय आधार पर भी ये घाटी के मुसलमानों से भिन्न है। काश्मीर घाटी सुन्नी बाहुल्य क्षेत्र है जो वर्तमान में उपद्रव का केन्‍द्र है। लद्दाख मूलतः तिब्बत का अंग है जहां बौद्ध धर्मानुयायी रहते हैं जबकि जम्मू हिन्दू बाहुल्य है। इस धार्मिक सांस्कृतिक विविधता वाले क्षेत्र को डोगरा शासकों ने बड़ी ही कुशलता से एक राजनैतिक सूत्र में पिरोये रखा।

काश्मीर का राजनैतिक इतिहास अत्यन्त प्राचीन है और यह अनेक वीर व पराक्रमी शासकों की कर्मभूमि रही है। काश्मीर के इतिहास पर कल्हण द्वारा लिखित राजतरंगिणी को प्रथम भारतीय ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है। ग्यारहवीं व बारहवीं शताब्दी में जब समस्त उत्तर भारत तुर्कों के द्वारा रौंदा जा रहा था तब भी काश्मीर हिन्दुओं के पास सुरक्षित रहा। सन् 1339 में शाह मिर्जा नामक एक प्रशासनिक अधिकारी ने राज्य में मची अव्यवस्था का लाभ उठाकर यहां मुस्लिम सत्ता की नींव रखी जिसके उत्तराधिकारियों ने घाटी में ईस्लाम को फैला दिया काश्मीर के मुस्लिम शासकों ने जैनुल अबिदीन विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसे अकबर का पूर्वगामी भी कहा जाता है। उसने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाते हुए प्रशासनिक सुधार किए जिससे क्षेत्र में शांति व समृद्धि आयी। आज भी काश्मीर में लोक गाथा कहने वाले उसे ‘बड़ा शाह’ कहकर याद करते है। कालांतर में महाराजा रणजीत fसंह ने काश्मीर को मुस्लिम शासकों से जीत लिया। उनकी मृत्यु के पश्चात् सन् 1846 में सिक्ख, अंग्रेजों से युद्ध में हारे तो लाहौर की संधि के अनुसार उन्हें हर्जाने के डेढ़ करोड़ रूपये देने थे। चूंकि लाहौर दरबार के पास इतने रूपये नहीं थे इसलिए काश्मीर को 60 लाख रूपये नगद और सालाना, छः पश्मीना शाल अंग्रेजों को नजर करने के एवज में जम्मू के राजा गुलाब सिंह को बेच दिया गया। डोगरो ने लद्दाख को पहले ही तिब्बत से पहले विजित कर लिया था और इसमें काश्मीर के शामिल हो जाने से वर्तमान जम्मू व काश्मीर रियासत स्वरूप में आयी। 

यह रियासत अगले सौ साल तक अक्षुण्ण बनी रही पर 1947 में जब भारत-पाकिस्तान को आजादी मिली, तब इसे नये ढंग की समस्या का सामना करना पड़ा। चूंकि सभी देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलीन हो जाना था, और मुस्लिम बाहुल्य रियासत होने के कारण पाकिस्तान को उम्मीद थी कि काश्मीर उसी का हिस्सा बनेगा। पर तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने इसे स्वतंत्र देश बनाये रखने की मंशा जाहिर की जिससे क्रुद्ध होकर पाकिस्तान ने काबिलाईयों की मदद से काश्मीर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा ने इस आक्रमण को रोकने के लिए भारत से मदद मांगी और भारत में विलय की सहमति दे दी। अक्टूबर 1947 में दोनों नव स्वतंत्र राष्ट्रों की सेनाएं काश्मीर में आमने सामने थी। युद्ध को लम्बा खिंचता देख मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाया गया, जिसके प्रस्ताव के अनुसार ‘‘जहां है जैसे है’’ की स्थिति में युद्ध विराम लागू किया गया। जिस कारण बाल्टिस्तान तथा घाटी के कुछ क्षेत्र सहित काश्मीर का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान के पास रह गया। 

काश्मीर में पाकिस्तान की रूचि के कई कारण है। पहला तो उसका जन्म ही धार्मिक आधार पर हुआ है इसलिए काश्मीर की मुस्लिम बाहुल्य रियासत पर वह अपना स्वाभाविक अधिकार मानता है। जिसे इस बात से भी बल मिलता है कि भारत में हैदराबाद व जुनागढ़ के मुस्लिम शासित राज्यों को हिन्दू बाहुल्य प्रजा के मतानुसार अपने में विलीन कर लिया और इसके विपरीत काश्मीर में उसने महाराजा के मत को सर्वोच्च माना। इसके अतिरिक्त काश्मीर की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण है। यहां से पश्चिमी चीन तथा मध्य एशियाई देशों से समान समुद्र तक लाया जा सकता है जिससे पाकिस्तान के वाणिज्य व व्यापार में काफी तेजी आयेगी। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि पाकिस्तान के पंजाब व सिंध प्रान्त के उपजाऊ मैदानों को सिंचित करने वाली नदियाँ काश्मीर से ही आती है। पाकिस्तान को यह डर है कि यदि भारत ने इन नदियों के रूख को अपनी ओर मोड़ लिया तो पाकिस्तान में भुखमरी के हालात पैदा हो जाएगा। जबकि भारत काश्मीर के विलय को अंतिम मानता है और उसका मत है कि सदियों से काश्मीर का मूल चरित्र धर्म निरपेक्ष रहा है। अतः उसे भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश के साथ ही रहना चाहिए। और जल विवाद के मामले में वह अन्तर्राष्ट्रीय जल प्राधिकरण में इस बात की गारंटी पाकिस्तान को दे चुका है कि उसे कभी भी जल-आपूर्ति बाधित नहीं की जाएगी अंतः उसकी शंका जायज नहीं है। 

दोनों देश इस मसले पर 1947, 1965 व 1971 में युद्ध लड़ चुके है और कारगिल की भिडंत भी इसी कारण हुई थी। जिसमें पाकिस्तान हारकर भी काश्मीर में लगातार आतंकवाद को उकसा रहा है जिससे पूरा दक्षिण एशियाई क्षेत्र अशांत है। अब चूंकि देश परमाणु हथियार बना चुके है ऐसे में अगर अब युद्ध होता है तो भीषण होगा जिसमें पाकिस्तान का तो नामो निशान मिट जायेगा और भारत को भी अकल्पनीय क्षति उठानी होगी।

अतः दोनों देश के लिए बेहतर होगा कि समय रहते समस्या को सुलझा लिया जाये। जिसके लिए कई सुझाव है; पर व्यावहारिक यह होगा कि पाकिस्तान व भारत अपने-अपने हिस्से की काश्मीर घाटी व बाल्टिस्तान पर अपना नियंत्रण ढीला कर दें। और क्षेत्र को सेना रहित कर प्रशासन स्थानीय निकायों को सौंप दिया जाये। जबकि बाह्य मसलों को दोनों देश की साझा कौंसिल देखे जिसमें दोनों देश के समान सदस्य हों तथा जम्मू और लद्दाख को भारत को हिस्सा मान लिया जाये। इस पर बाजपेयी-मुशर्रफ वार्ता में सहमति भी बनी थी और दोनों पक्षों के विशेष गुटों के विरोध के कारण मसला अधर में लटक गया। 


भारतीय पक्ष को भी काश्मीर समले पर न सिर्फ भावनात्मक वरन् व्यवहारिक ढ़ंग से भी सोचना चाहिए। यहां पिछले 64 सालों से सेना बनी हुई है। वास्तविक नियंत्रण रेखा व सियाचीन सेना की तैनाती तथा काश्मीर को हर साल मिलने वाली केन्रीबाय सहायता और विशेष पैकेज में है खरबों रूपये व्यय कर देते हैं। जिससे काश्मीर जैसे दुर्गम क्षेत्र में भी ईंधन खाद्यान्न व रोजमर्रा की अन्य जरूरी चीजें देश के अन्य भागों से सस्ती मिलती है। क्या ये हमारा अपव्यय नहीं है। क्योंकि उड़ीसा, आन्‍ध्र प्रदेश व बिहार में हर साल भुखमरी से अनेकों मौतें होती है। और महाराष्ट्र के किसान कृषि पर सरकारी सबसिडी नहीं मिलने पर आत्महत्या कर रहे हैं और सरकार उन लोगों को हर वस्तु पर सबसिडी दे रही है। जो लाल चौक में पाकिस्तानी झण्डा लहराकर हिन्दुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाते हैं क्या ये बेहतर नहीं होगा कि हम सीमाओं को खोल दें और उन्हें देखने दें कि पाकिस्तान के कब्जे वाले काश्मीर में दुर्दशा का क्या आलम है और क्यों न हम उन्हें अपने पैरों में खड़े होने दें। 

यदि बाजपेयी और मुशर्रफ के बीच में समझौता हो जाता तो इससे भारत को भी लाभ होता। काश्मीर में सेना पर होने वाला खर्च बचता जिससे हम देश के विकास के लिए और अधिक संसाधनों में जुटा पाते, सेना और अर्द्धसैनिक बल अपना पूरा ध्यान उत्तर-पूर्व में लगा पाते और पाकिस्तानी कब्जे वाले काश्मीर तक पहुंच होने के कारण हम क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रख पाते और पाकिस्तानी पंजाब और सिन्ध में जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के एवज में हम उससे अफगानिस्तान तक पहुंचने का गलियारा ले लेते जो हमारे व मध्य एशियाई देशों व उक्रेन व रूस तक हमें स्थल मार्ग से जोड़ देता। जिससे हमारा व्यापार नई ऊंचाईयों तक पहुंच जाता पर पाकिस्तानी सेना ऐसा नहीं चाहती क्योंकि भारत के विरोध के आधार पर ही वह अब तक सत्ता पर काबिज रही व गरीब जनता के पैसों पर ऐश करती रही और उपलब्धि के नाम पर उसके पास पूर्वी पाकिस्तान को खोने के अलावा और कुछ नहीं है। अब सीमा के उस पार भी नवाज शरीफ जैसे कुछ लोग इस बात को समझ रहे हैं और उम्मीद है कि वे जल्द ही समाधान तक पहुंचेंगे जहाँ हम उनका इंतजार कर रहे हैं।

विवेक राज सिंह
समाज कल्‍याण में स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा प्राप्‍त विवेकराज सिंह जी स्‍वांत: सुखाय लिखते हैं।अकलतरा, छत्‍तीसगढ़ में इनका माईनिंग का व्‍यवसाय है. 
इस ब्‍लॉग में विवेक राज सिंह जी के पूर्व आलेख - 
अन्तरिक्ष में मानव के पचास साल 
अफगानिस्तान - दिलेर लोगों की खूबसूरत जमीन

12 comments:

  1. कश्‍मीर का अंतरंग नजारा, विचारपूर्ण और महसूसा सा यथार्थ.

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  2. यह चित्र देख काश्मीर पर रोना आता है।

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  3. सच व हालात के अनुरुप उत्तम लेख।

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  4. आदरणीय संजीव तिवारी जी
    सादर अभिवादन !

    कश्मीर : जलते स्वर्ग की कथा शीर्षक इस विद्वतापूर्ण आलेख के लिए विवेक राज सिंह जी तक बधाई और शुभकामनाएं पहुंचा देने की कृपा करें ।

    लेख का उतरार्द्ध बहुत सारगर्भित है ।



    आपको बीते हुए हर पर्व-त्यौंहार सहित
    आने वाले सभी उत्सवों-मंगलदिवसों के लिए
    ♥ हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !♥
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  5. कश्‍मीर जैसे स्वर्ग को इस आतंकवाद ने नरक में बदल दिया है...
    विचारपूर्ण और यथार्थ का चित्रण करता लेख...

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  6. ऐसा होता कब जब शैतान किस्म के लोग नीति निर्धारक हैं। अच्छी और जानकारी बढ़ाने वाली सुन्दर प्रस्तुति।

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  7. महत्वपूर्ण आलेख पढ़वाने के लिए आ. राहुल जी का विशेष आभार

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  8. अच्छा लेख |बहुत सच कहा है |
    आशा

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  9. धरती के स्वर्ग के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत सार्थक चिंतन...
    विवेक जी को सादर साधुवाद....

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  10. आपकी पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

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  11. सारी दुनिया इनकी हरकतों से परेशान है ! ये भरोसे के लायक ही नहीं ! सुन्दर आलेख !

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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07 September, 2011

काश्मीर- जलते स्वर्ग की कथा

अगर फिरदौस बर रूये जमी अस्त। 
हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त।। 

ये लाईने शाहजहाँ द्वारा निर्मित दिल्ली के लाल किले के दीवाने खास में लिखी है। जिसे अक्सर काश्मीर के साथ जोड़ दिया जाता है। शाहजहाँ को जन्नत धरती पर उतार लाने की बड़ी ख्वाईश थी। और ताउम्र उसने पूरी लगन से इस पर काम भी किया। उसके द्वारा निर्मित सबसे महत्वपूर्ण ईमारत ताज महल का नक्शा भी हू-ब-हू जन्नत के नक्शे से मिलता है पर जन्नत नैसर्गिक रूप से धरती पर कहीं उतरी है तो वह जगह काश्मीर ही है। किन्तु पिछले साठ सालों में वहां पसरे आतंकवाद ने इस स्वर्ग सी भूमि को जलते नर्क में बदल दिया है। 

जम्मू और काश्मीर के बारे में आगे बढ़ने से पहले इसका आप से परिचय कराते चलें। मूल जम्मू और काश्मीर रियासत को भौगोलिक व सांस्कृतिक रूप से चार भागों में बांटा जा सकता है- बाल्टिस्तान, काश्मीर घाटी, लद्दाख और जम्मू। ये सभी क्षेत्र सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। बाल्टिस्तान-गिलगित व भारतीय कारगिल का क्षेत्र न सिर्फ शिया बाहुल्य है वरन् सामाजिक-नृतत्वशास्त्रीय आधार पर भी ये घाटी के मुसलमानों से भिन्न है। काश्मीर घाटी सुन्नी बाहुल्य क्षेत्र है जो वर्तमान में उपद्रव का केन्‍द्र है। लद्दाख मूलतः तिब्बत का अंग है जहां बौद्ध धर्मानुयायी रहते हैं जबकि जम्मू हिन्दू बाहुल्य है। इस धार्मिक सांस्कृतिक विविधता वाले क्षेत्र को डोगरा शासकों ने बड़ी ही कुशलता से एक राजनैतिक सूत्र में पिरोये रखा।

काश्मीर का राजनैतिक इतिहास अत्यन्त प्राचीन है और यह अनेक वीर व पराक्रमी शासकों की कर्मभूमि रही है। काश्मीर के इतिहास पर कल्हण द्वारा लिखित राजतरंगिणी को प्रथम भारतीय ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है। ग्यारहवीं व बारहवीं शताब्दी में जब समस्त उत्तर भारत तुर्कों के द्वारा रौंदा जा रहा था तब भी काश्मीर हिन्दुओं के पास सुरक्षित रहा। सन् 1339 में शाह मिर्जा नामक एक प्रशासनिक अधिकारी ने राज्य में मची अव्यवस्था का लाभ उठाकर यहां मुस्लिम सत्ता की नींव रखी जिसके उत्तराधिकारियों ने घाटी में ईस्लाम को फैला दिया काश्मीर के मुस्लिम शासकों ने जैनुल अबिदीन विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसे अकबर का पूर्वगामी भी कहा जाता है। उसने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाते हुए प्रशासनिक सुधार किए जिससे क्षेत्र में शांति व समृद्धि आयी। आज भी काश्मीर में लोक गाथा कहने वाले उसे ‘बड़ा शाह’ कहकर याद करते है। कालांतर में महाराजा रणजीत fसंह ने काश्मीर को मुस्लिम शासकों से जीत लिया। उनकी मृत्यु के पश्चात् सन् 1846 में सिक्ख, अंग्रेजों से युद्ध में हारे तो लाहौर की संधि के अनुसार उन्हें हर्जाने के डेढ़ करोड़ रूपये देने थे। चूंकि लाहौर दरबार के पास इतने रूपये नहीं थे इसलिए काश्मीर को 60 लाख रूपये नगद और सालाना, छः पश्मीना शाल अंग्रेजों को नजर करने के एवज में जम्मू के राजा गुलाब सिंह को बेच दिया गया। डोगरो ने लद्दाख को पहले ही तिब्बत से पहले विजित कर लिया था और इसमें काश्मीर के शामिल हो जाने से वर्तमान जम्मू व काश्मीर रियासत स्वरूप में आयी। 

यह रियासत अगले सौ साल तक अक्षुण्ण बनी रही पर 1947 में जब भारत-पाकिस्तान को आजादी मिली, तब इसे नये ढंग की समस्या का सामना करना पड़ा। चूंकि सभी देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलीन हो जाना था, और मुस्लिम बाहुल्य रियासत होने के कारण पाकिस्तान को उम्मीद थी कि काश्मीर उसी का हिस्सा बनेगा। पर तत्कालीन महाराजा हरिसिंह ने इसे स्वतंत्र देश बनाये रखने की मंशा जाहिर की जिससे क्रुद्ध होकर पाकिस्तान ने काबिलाईयों की मदद से काश्मीर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा ने इस आक्रमण को रोकने के लिए भारत से मदद मांगी और भारत में विलय की सहमति दे दी। अक्टूबर 1947 में दोनों नव स्वतंत्र राष्ट्रों की सेनाएं काश्मीर में आमने सामने थी। युद्ध को लम्बा खिंचता देख मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाया गया, जिसके प्रस्ताव के अनुसार ‘‘जहां है जैसे है’’ की स्थिति में युद्ध विराम लागू किया गया। जिस कारण बाल्टिस्तान तथा घाटी के कुछ क्षेत्र सहित काश्मीर का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान के पास रह गया। 

काश्मीर में पाकिस्तान की रूचि के कई कारण है। पहला तो उसका जन्म ही धार्मिक आधार पर हुआ है इसलिए काश्मीर की मुस्लिम बाहुल्य रियासत पर वह अपना स्वाभाविक अधिकार मानता है। जिसे इस बात से भी बल मिलता है कि भारत में हैदराबाद व जुनागढ़ के मुस्लिम शासित राज्यों को हिन्दू बाहुल्य प्रजा के मतानुसार अपने में विलीन कर लिया और इसके विपरीत काश्मीर में उसने महाराजा के मत को सर्वोच्च माना। इसके अतिरिक्त काश्मीर की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण है। यहां से पश्चिमी चीन तथा मध्य एशियाई देशों से समान समुद्र तक लाया जा सकता है जिससे पाकिस्तान के वाणिज्य व व्यापार में काफी तेजी आयेगी। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि पाकिस्तान के पंजाब व सिंध प्रान्त के उपजाऊ मैदानों को सिंचित करने वाली नदियाँ काश्मीर से ही आती है। पाकिस्तान को यह डर है कि यदि भारत ने इन नदियों के रूख को अपनी ओर मोड़ लिया तो पाकिस्तान में भुखमरी के हालात पैदा हो जाएगा। जबकि भारत काश्मीर के विलय को अंतिम मानता है और उसका मत है कि सदियों से काश्मीर का मूल चरित्र धर्म निरपेक्ष रहा है। अतः उसे भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश के साथ ही रहना चाहिए। और जल विवाद के मामले में वह अन्तर्राष्ट्रीय जल प्राधिकरण में इस बात की गारंटी पाकिस्तान को दे चुका है कि उसे कभी भी जल-आपूर्ति बाधित नहीं की जाएगी अंतः उसकी शंका जायज नहीं है। 

दोनों देश इस मसले पर 1947, 1965 व 1971 में युद्ध लड़ चुके है और कारगिल की भिडंत भी इसी कारण हुई थी। जिसमें पाकिस्तान हारकर भी काश्मीर में लगातार आतंकवाद को उकसा रहा है जिससे पूरा दक्षिण एशियाई क्षेत्र अशांत है। अब चूंकि देश परमाणु हथियार बना चुके है ऐसे में अगर अब युद्ध होता है तो भीषण होगा जिसमें पाकिस्तान का तो नामो निशान मिट जायेगा और भारत को भी अकल्पनीय क्षति उठानी होगी।

अतः दोनों देश के लिए बेहतर होगा कि समय रहते समस्या को सुलझा लिया जाये। जिसके लिए कई सुझाव है; पर व्यावहारिक यह होगा कि पाकिस्तान व भारत अपने-अपने हिस्से की काश्मीर घाटी व बाल्टिस्तान पर अपना नियंत्रण ढीला कर दें। और क्षेत्र को सेना रहित कर प्रशासन स्थानीय निकायों को सौंप दिया जाये। जबकि बाह्य मसलों को दोनों देश की साझा कौंसिल देखे जिसमें दोनों देश के समान सदस्य हों तथा जम्मू और लद्दाख को भारत को हिस्सा मान लिया जाये। इस पर बाजपेयी-मुशर्रफ वार्ता में सहमति भी बनी थी और दोनों पक्षों के विशेष गुटों के विरोध के कारण मसला अधर में लटक गया। 


भारतीय पक्ष को भी काश्मीर समले पर न सिर्फ भावनात्मक वरन् व्यवहारिक ढ़ंग से भी सोचना चाहिए। यहां पिछले 64 सालों से सेना बनी हुई है। वास्तविक नियंत्रण रेखा व सियाचीन सेना की तैनाती तथा काश्मीर को हर साल मिलने वाली केन्रीबाय सहायता और विशेष पैकेज में है खरबों रूपये व्यय कर देते हैं। जिससे काश्मीर जैसे दुर्गम क्षेत्र में भी ईंधन खाद्यान्न व रोजमर्रा की अन्य जरूरी चीजें देश के अन्य भागों से सस्ती मिलती है। क्या ये हमारा अपव्यय नहीं है। क्योंकि उड़ीसा, आन्‍ध्र प्रदेश व बिहार में हर साल भुखमरी से अनेकों मौतें होती है। और महाराष्ट्र के किसान कृषि पर सरकारी सबसिडी नहीं मिलने पर आत्महत्या कर रहे हैं और सरकार उन लोगों को हर वस्तु पर सबसिडी दे रही है। जो लाल चौक में पाकिस्तानी झण्डा लहराकर हिन्दुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाते हैं क्या ये बेहतर नहीं होगा कि हम सीमाओं को खोल दें और उन्हें देखने दें कि पाकिस्तान के कब्जे वाले काश्मीर में दुर्दशा का क्या आलम है और क्यों न हम उन्हें अपने पैरों में खड़े होने दें। 

यदि बाजपेयी और मुशर्रफ के बीच में समझौता हो जाता तो इससे भारत को भी लाभ होता। काश्मीर में सेना पर होने वाला खर्च बचता जिससे हम देश के विकास के लिए और अधिक संसाधनों में जुटा पाते, सेना और अर्द्धसैनिक बल अपना पूरा ध्यान उत्तर-पूर्व में लगा पाते और पाकिस्तानी कब्जे वाले काश्मीर तक पहुंच होने के कारण हम क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रख पाते और पाकिस्तानी पंजाब और सिन्ध में जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के एवज में हम उससे अफगानिस्तान तक पहुंचने का गलियारा ले लेते जो हमारे व मध्य एशियाई देशों व उक्रेन व रूस तक हमें स्थल मार्ग से जोड़ देता। जिससे हमारा व्यापार नई ऊंचाईयों तक पहुंच जाता पर पाकिस्तानी सेना ऐसा नहीं चाहती क्योंकि भारत के विरोध के आधार पर ही वह अब तक सत्ता पर काबिज रही व गरीब जनता के पैसों पर ऐश करती रही और उपलब्धि के नाम पर उसके पास पूर्वी पाकिस्तान को खोने के अलावा और कुछ नहीं है। अब सीमा के उस पार भी नवाज शरीफ जैसे कुछ लोग इस बात को समझ रहे हैं और उम्मीद है कि वे जल्द ही समाधान तक पहुंचेंगे जहाँ हम उनका इंतजार कर रहे हैं।

विवेक राज सिंह
समाज कल्‍याण में स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा प्राप्‍त विवेकराज सिंह जी स्‍वांत: सुखाय लिखते हैं।अकलतरा, छत्‍तीसगढ़ में इनका माईनिंग का व्‍यवसाय है. 
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अफगानिस्तान - दिलेर लोगों की खूबसूरत जमीन
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