ब्लॉग छत्तीसगढ़

04 June, 2011

अफगानिस्तान - दिलेर लोगों की खूबसूरत जमीन

गूगल खोज से प्राप्‍त बुद्ध प्रतिमा का चित्र
मेरे बचपन के अच्छे मित्रों में कुछ पख्‍तून भी थे, जो एक ही परिवार से आते थे। उनमें से एक लड़की, जो कक्षा 6 से कक्षा 11 तक मेरे साथ पढ़ी और अब स्कूल टीचर है, ने मुझे काफी प्रभावित किया। यह परिवार अफगानिस्तान के जलालाबाद के आसपास से तिजारत के लिए छत्तीसगढ़ आया और यहीं का होकर रह गया, इन्हीं लोगों ने अफगानिस्तान और वहां की संस्कृति से मेरा परिचय कराया। स्कूल के इन्हीं दिनों में मैं दुनिया में होने वाली घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लायक हो रहा था। तब अफगानिस्तान में नजीबुल्ला की सरकार थी। समाचार पत्रों में काबुल की तस्वीरों में स्कर्ट व टॉप पहनी फैशनेबल महिलाओं की भरमार होती थी तथा बड़ी संख्‍या में ब्यूटी पार्लर व वीडियो पार्लर दिखाई पड़ते थे, जिनमें हिन्दी फिल्मों की कैसेटें भरी होती थी। कुल मिलाकर नजारा एक आधुनिक एशियाई देश का होता था। पर बाद के सालों में पूरा मंजर ही बदल गया। आज इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने वाले अमेरिका ने ही ट्रेनिंग व हथियार देकर उन तालिबानियों को खड़ा किया जिन्होंने नजीबुल्ला को लैम्प पोस्ट में लटका दिया और पूरे अफगानिस्तान को सत्रहवीं सदी में धकेल दिया।

वैसे अफगानिस्तान का लिखित इतिहास सत्रहवीं शताब्दी से बहुत पहले, सिकंदर के समय से प्रारंभ हो जाता है, जिसने वहां बुकाफेला नामक एक उपनिवेशिक नगर बसाया था। आज भी अफगानिस्तान की बहुत सी नदियों व स्थानों के नाम यूनानी हैं। हेलमण्ड, बामयान इत्यादि अफगानिस्तान के कुछ कबीले भी अपने यूनानी मूल का दावा करते हैं और नृतत्‍वशास्‍त्रीय दृष्टि से उनका दावा ठीक भी लगता है। बाद में कनिष्क के समय जब रेशम मार्ग से तिजारत बढ़ी तो इसका फायदा अफगानिस्तान के साथ-साथ बौद्ध धर्म को भी हुआ। रेशम मार्ग से होने वाली तिजारत का ही पैसा था जिससे बामयान में विशाल बौद्ध प्रतिमाओं का निर्माण हुआ व जिससे कशागर का विशाल बौद्ध मठ सदियों तक चलता रहा। इसी मठ से होकर जाने वाले भारतीय भिक्षुओं ने बौद्ध धर्म को चीन, कोरिया व जापान तक पहुंचाया। कालान्तर में यह क्षेत्र हिन्दू शाहिया शासकों के पास तब तक रहा जब तक तुर्कों ने उन्हें हटाकर क्षेत्र में इस्लाम को न फैला दिया।
अफगानिस्तान को भौगोलिक ढ़ंग से देखें तो हिन्दूकुश पर्वतमाला न सिर्फ इसे दो बराबर भागों में बांटती है वरन्‌ यहां के कबीलाई इलाकों को भी तय करती है। हिन्दूकुश का दक्षिणी हिस्सा पख्‍तूनों का है जो न सिर्फ अफगानिस्तान बल्कि वर्तमान पाकिस्तान के नार्थ-ईस्ट फ्रंटियर प्राविन्स तक फैले हुए हैं। जबकि हिन्दूकुश के उत्तर-पूर्व का क्षेत्र ताजिक लोगों का और उत्तर-पश्चिमी हिस्सा उजबेगों का है इनके अलावा हजारा कबीला भी है ये लोग शिया है व मूलतः व्यापारी है जो पूरे अफगानिस्तान में बसे हैं।

अफगानियों ने इस्लाम के नाम पर पहले भी लूटमार की है जिसके अपने भौगोलिक व आर्थिक कारण रहे है पर ये कभी भी कट्‌टर मुसलमान या फिर कहें इस्लामिक आतंकवादी कभी नहीं रहे पख्‍तून क्षेत्र में भारत की आजादी तक बहुत से कबीलों में इस्लाम, सिक्ख व हिन्दू धर्मों को मानने वाले व्यक्ति साथ-साथ रहते थे। ये लोग अपने क्षेत्र या कबीले के दूसरे धर्म के मानने वालों के साथ भी शादी-ब्याह के रिश्ते कर लिया करते थे पर दूसरे कबीले के सामान धर्म के मानने वालों के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं होता था। स्थानीय कानूनों में हमेशा कबीला प्राथमिक व धर्म द्वितीयक इकाई रहा है। पख्‍तून क्षेत्र में धार्मिक कट्‌टरता फैलाने के जिम्मेदार, पाकिस्तानी फौज के पंजाबी जनरल हैं, जिन्होंने काश्मीर में तथा भारत के साथ युद्धों में पख्‍तूनों को धार्मिक आधार पर भड़काकर अपना उल्लू सीधा किया। इस बात को प्रसिद्ध पख्‍तून नेता खान अब्दुल गफ्फार खान ने बहुत पहले भांप लिया था पर पाकिस्तान बन जाने के बाद वो कुछ विशेष कर नहीं पाए। बाद में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया तो पाकिस्तानी फौज व आईएसआई की मदद से अमेरिका ने इस धार्मिक कट्‌टरपन को और हवा दी जिसका अंतिम परिणाम तालिबान, लादेन या कहें तो 9/11 के रूप में सामने आया। अफगानिस्तान के इस उथल-पुथल भरे दौर में जो एक नाम जेहन में आता है वह अहमदशाह मसूद का है। जो एक ताजिक कमांडर थे तथा जिन्होंने पंजशीर घाटी में सोवियत फौजों को नौ बार शिकस्त दी और घाटी पर अपना कब्जा बनाए रखा। बाद में जब तालिबानियों ने काबुल पर कब्जा कर लिया, तब भी तालिबानी अपने सबसे अच्छे दौर में भी बगराम हवाई अड्‌डे से आगे आने की सोच भी नहीं सकते थे, जो पंजशीर घाटी का मुहाना है।


समाज कल्‍याण में स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा प्राप्‍त विवेकराज सिंह जी स्‍वांत: सुखाय लिखते हैं। अकलतरा में ही इनका माईनिंग का व्‍यवसाय है और इन्‍हें अपने व्‍यवसाय की व्‍यस्‍तता के बीच लेखन का बहुत कम अवसर मिलता है, इसके  वावजूद विवेक जी की यह लेखनी जब हमें व्‍हाया राहुल सिंह जी प्राप्‍त हुई है, तब लगा विवेक जी के इस आलेख को अपने पाठकों के लिए प्रस्‍तुत किया जाए। आपको भी अच्‍छा लगे तो विवेक जी के लिए कमेंटियाईये भी ....

अहमदशाह मसूद, आधुनिक विचारों वाले व्यक्ति थे वे एक अच्छे प्रशासक भी थे। उन्होंने अफगानिस्तान के सबसे बुरे दिनों में भी अपने लोगों को खुशहाल रखने की पूरी कोशिश की। उन्होंने शिक्षा, खास कर महिलाओं की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। मसूद ने पश्चिमी देशों को अलकायदा व इस्लामिक आतंकवाद के दुनिया भर में बढ़ते खतरे के प्रति लगातार आगाह किया जिसे अनसुना कर दिया गया। पर इससे वे अलकायदा के निशाने पर आ गए और 9/11 से ठीक दो दिन पहले पंजशीर घाटी स्थित उनके मुख्‍यालय में बम धमाका कर उन्हें मार डाला गया।

9/11 के बाद अफगानिस्तान में क्या हुआ ये सभी जानते है पर लगातार चले इन युद्धों ने अफगानिस्तान को गर्त में पहुंचा दिया। थोपी गई धार्मिक कट्‌टरता ने एक खुशहाल देश को खंडहर और उसके खुद्दार लोगों को शरणार्थी बना दिया पर अब अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण किया जाना है। हांलाकि यह कठिन काम है पर कुछ उम्मीद की किरणें अभी बाकी हैं। इस देश में खेती योग्य जमीन कम है और जो है उसमें गैर-कानूनी ढंग से अफीम की खेती की जा रही है जिस पर देश की अर्थ व्यवस्था टिकी हुई है। इसे बदलना होगा और किसानों को खाद्यान्न उत्पादन व बागवानी में लगाना होगा। यहां खनिजों का भी अभाव है इसलिए अधिक औद्योगिकीकरण की संभावना नहीं है। पर पर्यटन उद्योग के लिए अच्छी संभावना है। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति अच्छी है, खास कर तब जब कैस्पियन सागर के किनारे के क्षेत्रों में तेल व गैस के विशाल भण्डार मिल रहे हैं जिन्हें विश्व बाजार में पहुंचाने के लिए अफगानिस्तान से होकर जाने वाला रास्ता सबसे आसान व सस्ता होगा। यह रास्ता ही अफगानिस्तान को नव-निर्माण के लिए रकम उपलब्ध करा सकता है। पर इसके लिए जरूरी है कि यहां धार्मिक उफान शांत हो और क्षेत्र में स्थायित्व आए। अगर ऐसा हो सका तो न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि विश्व में भी शांति व समृद्धि आयेगी।


- विवेकराज सिंह

अकलतरा

मो- 9827414145

12 comments:

  1. भगवान करे कि अफ़ग़ानिस्तान के अच्छे दिन वापिस लौटें (पाकिस्तान की पूरी कोशिशों के बावजूद).

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  2. मेरे पड़ोस में भी अफगानी परिवार रहता है...


    जल्द सामान्य जिन्दगी बहाल हो वहाँ...यही दुआ करते हैं.

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  3. वहां भी सुकून रहे ...यही दुआ है......

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  4. काबूल से हमारा संबंध काबूली वाले से रहा। वहाँ के हींग की खुश्बु की गमक आज तक भी है। भारत के उत्तर के प्रांतो में अभी भी अफ़गानी परिवार हैं और एक परिवार तो मेरे गांव के पास ही पी्ढियों से निवास कर रहा है।

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  5. सार्थक और रोचक पोस्‍ट, बढि़या प्रस्‍तुति.

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  6. आपका लेख पढ़के 'काबुलीवाला' याद आ गया ..........................
    ज्ञानवर्धक आलेख के लिए आभार.

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  7. ज्ञानवर्धक आलेख, जल्दी शांति की दुआ है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  8. अफगान समाज के बारे में ज्ञानवर्धक आलेख।

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  9. बेहतरीन लेख... काफी जानकारियाँ दी आपने...

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  10. बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख ! बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर ! लगातार चलने वाले युद्धों ने अफगानिस्तान की कितनी दुर्दशा की है और वहाँ के सामाजिक जनजीवन एवं भौगोलिक परिस्थितियों पर कितना दुष्प्रभाव डाला है इसका हृदयस्पर्शी वर्णन यदि पढ़ना हो तो अफगान लेखक खालिद हुसैनी का उपन्यास "A thousand splendid suns" अवश्य पढ़ें !

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  11. bapis fir se bahi din aa jaye inhi shubkamnao ke sath!

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  12. यहाँ तो ढेर सारी जानकारी मिली...
    ___________________

    'पाखी की दुनिया ' में आपका स्वागत है !!

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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04 June, 2011

अफगानिस्तान - दिलेर लोगों की खूबसूरत जमीन

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मेरे बचपन के अच्छे मित्रों में कुछ पख्‍तून भी थे, जो एक ही परिवार से आते थे। उनमें से एक लड़की, जो कक्षा 6 से कक्षा 11 तक मेरे साथ पढ़ी और अब स्कूल टीचर है, ने मुझे काफी प्रभावित किया। यह परिवार अफगानिस्तान के जलालाबाद के आसपास से तिजारत के लिए छत्तीसगढ़ आया और यहीं का होकर रह गया, इन्हीं लोगों ने अफगानिस्तान और वहां की संस्कृति से मेरा परिचय कराया। स्कूल के इन्हीं दिनों में मैं दुनिया में होने वाली घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लायक हो रहा था। तब अफगानिस्तान में नजीबुल्ला की सरकार थी। समाचार पत्रों में काबुल की तस्वीरों में स्कर्ट व टॉप पहनी फैशनेबल महिलाओं की भरमार होती थी तथा बड़ी संख्‍या में ब्यूटी पार्लर व वीडियो पार्लर दिखाई पड़ते थे, जिनमें हिन्दी फिल्मों की कैसेटें भरी होती थी। कुल मिलाकर नजारा एक आधुनिक एशियाई देश का होता था। पर बाद के सालों में पूरा मंजर ही बदल गया। आज इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने वाले अमेरिका ने ही ट्रेनिंग व हथियार देकर उन तालिबानियों को खड़ा किया जिन्होंने नजीबुल्ला को लैम्प पोस्ट में लटका दिया और पूरे अफगानिस्तान को सत्रहवीं सदी में धकेल दिया।

वैसे अफगानिस्तान का लिखित इतिहास सत्रहवीं शताब्दी से बहुत पहले, सिकंदर के समय से प्रारंभ हो जाता है, जिसने वहां बुकाफेला नामक एक उपनिवेशिक नगर बसाया था। आज भी अफगानिस्तान की बहुत सी नदियों व स्थानों के नाम यूनानी हैं। हेलमण्ड, बामयान इत्यादि अफगानिस्तान के कुछ कबीले भी अपने यूनानी मूल का दावा करते हैं और नृतत्‍वशास्‍त्रीय दृष्टि से उनका दावा ठीक भी लगता है। बाद में कनिष्क के समय जब रेशम मार्ग से तिजारत बढ़ी तो इसका फायदा अफगानिस्तान के साथ-साथ बौद्ध धर्म को भी हुआ। रेशम मार्ग से होने वाली तिजारत का ही पैसा था जिससे बामयान में विशाल बौद्ध प्रतिमाओं का निर्माण हुआ व जिससे कशागर का विशाल बौद्ध मठ सदियों तक चलता रहा। इसी मठ से होकर जाने वाले भारतीय भिक्षुओं ने बौद्ध धर्म को चीन, कोरिया व जापान तक पहुंचाया। कालान्तर में यह क्षेत्र हिन्दू शाहिया शासकों के पास तब तक रहा जब तक तुर्कों ने उन्हें हटाकर क्षेत्र में इस्लाम को न फैला दिया।
अफगानिस्तान को भौगोलिक ढ़ंग से देखें तो हिन्दूकुश पर्वतमाला न सिर्फ इसे दो बराबर भागों में बांटती है वरन्‌ यहां के कबीलाई इलाकों को भी तय करती है। हिन्दूकुश का दक्षिणी हिस्सा पख्‍तूनों का है जो न सिर्फ अफगानिस्तान बल्कि वर्तमान पाकिस्तान के नार्थ-ईस्ट फ्रंटियर प्राविन्स तक फैले हुए हैं। जबकि हिन्दूकुश के उत्तर-पूर्व का क्षेत्र ताजिक लोगों का और उत्तर-पश्चिमी हिस्सा उजबेगों का है इनके अलावा हजारा कबीला भी है ये लोग शिया है व मूलतः व्यापारी है जो पूरे अफगानिस्तान में बसे हैं।

अफगानियों ने इस्लाम के नाम पर पहले भी लूटमार की है जिसके अपने भौगोलिक व आर्थिक कारण रहे है पर ये कभी भी कट्‌टर मुसलमान या फिर कहें इस्लामिक आतंकवादी कभी नहीं रहे पख्‍तून क्षेत्र में भारत की आजादी तक बहुत से कबीलों में इस्लाम, सिक्ख व हिन्दू धर्मों को मानने वाले व्यक्ति साथ-साथ रहते थे। ये लोग अपने क्षेत्र या कबीले के दूसरे धर्म के मानने वालों के साथ भी शादी-ब्याह के रिश्ते कर लिया करते थे पर दूसरे कबीले के सामान धर्म के मानने वालों के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं होता था। स्थानीय कानूनों में हमेशा कबीला प्राथमिक व धर्म द्वितीयक इकाई रहा है। पख्‍तून क्षेत्र में धार्मिक कट्‌टरता फैलाने के जिम्मेदार, पाकिस्तानी फौज के पंजाबी जनरल हैं, जिन्होंने काश्मीर में तथा भारत के साथ युद्धों में पख्‍तूनों को धार्मिक आधार पर भड़काकर अपना उल्लू सीधा किया। इस बात को प्रसिद्ध पख्‍तून नेता खान अब्दुल गफ्फार खान ने बहुत पहले भांप लिया था पर पाकिस्तान बन जाने के बाद वो कुछ विशेष कर नहीं पाए। बाद में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया तो पाकिस्तानी फौज व आईएसआई की मदद से अमेरिका ने इस धार्मिक कट्‌टरपन को और हवा दी जिसका अंतिम परिणाम तालिबान, लादेन या कहें तो 9/11 के रूप में सामने आया। अफगानिस्तान के इस उथल-पुथल भरे दौर में जो एक नाम जेहन में आता है वह अहमदशाह मसूद का है। जो एक ताजिक कमांडर थे तथा जिन्होंने पंजशीर घाटी में सोवियत फौजों को नौ बार शिकस्त दी और घाटी पर अपना कब्जा बनाए रखा। बाद में जब तालिबानियों ने काबुल पर कब्जा कर लिया, तब भी तालिबानी अपने सबसे अच्छे दौर में भी बगराम हवाई अड्‌डे से आगे आने की सोच भी नहीं सकते थे, जो पंजशीर घाटी का मुहाना है।


समाज कल्‍याण में स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा प्राप्‍त विवेकराज सिंह जी स्‍वांत: सुखाय लिखते हैं। अकलतरा में ही इनका माईनिंग का व्‍यवसाय है और इन्‍हें अपने व्‍यवसाय की व्‍यस्‍तता के बीच लेखन का बहुत कम अवसर मिलता है, इसके  वावजूद विवेक जी की यह लेखनी जब हमें व्‍हाया राहुल सिंह जी प्राप्‍त हुई है, तब लगा विवेक जी के इस आलेख को अपने पाठकों के लिए प्रस्‍तुत किया जाए। आपको भी अच्‍छा लगे तो विवेक जी के लिए कमेंटियाईये भी ....

अहमदशाह मसूद, आधुनिक विचारों वाले व्यक्ति थे वे एक अच्छे प्रशासक भी थे। उन्होंने अफगानिस्तान के सबसे बुरे दिनों में भी अपने लोगों को खुशहाल रखने की पूरी कोशिश की। उन्होंने शिक्षा, खास कर महिलाओं की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। मसूद ने पश्चिमी देशों को अलकायदा व इस्लामिक आतंकवाद के दुनिया भर में बढ़ते खतरे के प्रति लगातार आगाह किया जिसे अनसुना कर दिया गया। पर इससे वे अलकायदा के निशाने पर आ गए और 9/11 से ठीक दो दिन पहले पंजशीर घाटी स्थित उनके मुख्‍यालय में बम धमाका कर उन्हें मार डाला गया।

9/11 के बाद अफगानिस्तान में क्या हुआ ये सभी जानते है पर लगातार चले इन युद्धों ने अफगानिस्तान को गर्त में पहुंचा दिया। थोपी गई धार्मिक कट्‌टरता ने एक खुशहाल देश को खंडहर और उसके खुद्दार लोगों को शरणार्थी बना दिया पर अब अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण किया जाना है। हांलाकि यह कठिन काम है पर कुछ उम्मीद की किरणें अभी बाकी हैं। इस देश में खेती योग्य जमीन कम है और जो है उसमें गैर-कानूनी ढंग से अफीम की खेती की जा रही है जिस पर देश की अर्थ व्यवस्था टिकी हुई है। इसे बदलना होगा और किसानों को खाद्यान्न उत्पादन व बागवानी में लगाना होगा। यहां खनिजों का भी अभाव है इसलिए अधिक औद्योगिकीकरण की संभावना नहीं है। पर पर्यटन उद्योग के लिए अच्छी संभावना है। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति अच्छी है, खास कर तब जब कैस्पियन सागर के किनारे के क्षेत्रों में तेल व गैस के विशाल भण्डार मिल रहे हैं जिन्हें विश्व बाजार में पहुंचाने के लिए अफगानिस्तान से होकर जाने वाला रास्ता सबसे आसान व सस्ता होगा। यह रास्ता ही अफगानिस्तान को नव-निर्माण के लिए रकम उपलब्ध करा सकता है। पर इसके लिए जरूरी है कि यहां धार्मिक उफान शांत हो और क्षेत्र में स्थायित्व आए। अगर ऐसा हो सका तो न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि विश्व में भी शांति व समृद्धि आयेगी।


- विवेकराज सिंह

अकलतरा

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